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Showing posts from January, 2026

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

बुद्धि की तराजू

बहुत समय पहले की बात है। गंगा के किनारे बसा एक समृद्ध नगर था— धनपुर । धनपुर अपने व्यापार , बाज़ार और सेठों की अमीरी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। यहाँ दिन निकलते ही दुकानों के पट खुल जाते और शाम ढलते ही सोने-चाँदी की गिनती शुरू हो जाती। पर इस नगर की एक और पहचान थी—यहाँ के अधिकतर व्यापारी बड़े चालाक और स्वार्थी थे। वे मुनाफ़े के लिए धर्म और मानवता दोनों को ताक पर रख देते थे। इसी नगर में एक दिन चतुर ब्राह्मण का आगमन हुआ। वह लंबे समय से देश-देश घूम रहा था , लोगों को समझता , उनके स्वभाव को परखता और जहाँ अन्याय देखता , वहाँ अपनी बुद्धि से उसे उजागर करता। धनपुर में कदम रखते ही उसने महसूस किया कि यहाँ की हवा में ही लालच घुला हुआ है। हर चेहरे पर मुस्कान थी , पर आँखों में हिसाब-किताब चलता रहता था। नगर के बीचोंबीच एक विशाल बाजार था। चतुर ब्राह्मण वहीं एक पेड़ की छाया में बैठ गया और लोगों को देखने लगा। तभी उसकी नज़र एक बूढ़े किसान पर पड़ी , जो काँपते हाथों से अनाज की बोरी पकड़े खड़ा था। सामने बैठा था नगर का प्रसिद्ध व्यापारी सेठ कुबेरदास — नाम कुबेर का , पर मन में केवल धन की भूख। वह किसान से कह...

“सच्ची विद्वता की पहचान”

  गाँव का नाम था शिवपुर । वही पुराना शिवपुर , जहाँ के लोग सादे दिल के थे और जहाँ कभी-कभी चतुर ब्राह्मण अपनी बुद्धि के ऐसे चमत्कार दिखा जाता था कि लोग वर्षों तक उसकी चर्चा करते रहते थे। पिछली बार जब उसने लालची सेठ को उसकी ही चाल में फँसाया था , तब से पूरे गाँव में उसकी अक़्ल की धाक बैठ गई थी। लोग उसे सम्मान से देखते थे , पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मन में ईर्ष्या पलने लगी थी। उन्हीं में से एक था पंडित हरिहर , जो स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझता था , पर भीतर से घमंडी और चालाक था। एक दिन की बात है। गाँव में खबर फैली कि पास के राज्य विजयनगर का राजा एक बड़ा यज्ञ कराने वाला है। राजा ने घोषणा करवाई थी कि जो भी विद्वान ब्राह्मण यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराएगा , उसे भारी इनाम मिलेगा—सोने की मुद्राएँ , रेशमी वस्त्र और राज्य से सम्मान। यह सुनते ही कई ब्राह्मणों के कान खड़े हो गए। पंडित हरिहर को लगा कि यही मौका है चतुर ब्राह्मण को नीचा दिखाने का। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस बार वह राजा के सामने स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान सिद्ध करेगा। उधर चतुर ब्राह्मण अपने घर के आँगन में बैठा त...