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Showing posts from September, 2026

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

टूटा हुआ पौधा

    एक विशाल और सुंदर जंगल के किनारे एक शांत बगीचा था। उस बगीचे में पेड़ , पौधे , फूल , बेलें , घास और झाड़ियाँ मिल-जुलकर रहते थे। सुबह होते ही ओस की बूंदें पत्तियों पर मोतियों की तरह चमकने लगतीं और सूरज की पहली किरणें जब धरती को छूतीं , तो पूरा बगीचा सुनहरी रोशनी से भर जाता। हवा धीरे-धीरे चलती और पेड़ों की पत्तियाँ सरसराकर ऐसी ध्वनि पैदा करतीं , जैसे प्रकृति स्वयं कोई मधुर गीत गा रही हो। रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों के ऊपर मंडरातीं , मधुमक्खियाँ फूलों से रस इकट्ठा करतीं और पक्षी पेड़ों की शाखाओं पर बैठकर मधुर स्वर में चहचहाते। इसी सुंदर बगीचे के एक शांत कोने में मिट्टी की एक छोटी-सी जगह पर एक नन्हा पौधा उगा हुआ था। उसका तना पतला था , पत्तियाँ छोटी थीं और शाखाएँ अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई थीं। वह बगीचे के बड़े पेड़ों की तुलना में बहुत छोटा था , लेकिन उसके भीतर जीवन को लेकर बहुत बड़ा उत्साह था। वह हर सुबह सूरज की ओर अपनी नन्ही पत्तियाँ फैलाता और गर्म किरणों को अपने भीतर समेटकर धीरे-धीरे बढ़ता रहता। उस छोटे पौधे के पास एक विशाल बरगद का पेड़ था। बरगद इतना पुराना और विशाल था कि...

मिट्टी से बना घड़ा

    गर्मी की तपती दोपहरी में जब आसमान से आग बरस रही होती है, तब गाँव के एक छोटे से कोने में नीम की ठंडी छाँव के नीचे रखा मिट्टी का घड़ा जीवन का दूसरा नाम बन जाता है। गाँव के उसी पुराने और पारंपरिक कुम्हार बाड़े में एक बुजुर्ग कुम्हार रहते थे, जिनका नाम मोहन था। मोहन की उम्र भले ही ढल चुकी थी, लेकिन उनके हाथों का जादू आज भी जवान था। उनके बनाए हुए मिट्टी के बर्तन न केवल उनके गाँव में, बल्कि आसपास के कई इलाकों में अपनी खूबसूरती और मजबूती के लिए प्रसिद्ध थे। मोहन के लिए मिट्टी केवल जीविका का साधन नहीं थी, बल्कि वह उसकी साधना, उसका इष्ट और उसका सबसे सच्चा साथी थी। वह अक्सर कहा करता था कि मिट्टी मूक नहीं होती, अगर इसे सच्चे दिल से सुना जाए तो यह अपने भीतर छुपे सारे रहस्यों को बयां कर देती है। मोहन की सुबह रोज सूरज उगने से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर चाक के पास बैठ जाता और मिट्टी तैयार करने की प्रक्रिया में जुट जाता। एक बेहतरीन घड़ा बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी का चुनाव करना होता था। मोहन तालाब की पक्की और चिकनी मिट्टी चुनकर लाता था, जिसमें वह अपने अनुभव के...

एक बूंद पानी की कीमत

    सोनपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव था। कभी यह गाँव अपनी हरियाली , ठंडी हवाओं , मीठे पानी और चारों तरफ फैले खेतों के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। गाँव के बीचों-बीच एक बड़ा तालाब था , जिसके किनारे पुराने बरगद और पीपल के पेड़ खड़े रहते थे। बरसात के दिनों में तालाब पानी से लबालब भर जाता था और उसकी सतह पर सूरज की किरणें ऐसे चमकती थीं जैसे किसी ने हजारों छोटे-छोटे दीपक जला दिए हों। तालाब में मछलियाँ तैरती थीं , पक्षी पानी पीते थे और आसपास की मिट्टी हमेशा नम रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे समय बदल गया। कई वर्षों तक बारिश कम होती गई। लोगों ने पेड़ों को काटकर खेत बढ़ा लिए , तालाब की सफाई बंद कर दी और पानी का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे करने लगे। किसी ने यह नहीं सोचा कि जिस पानी को वे आज आसानी से बहा रहे हैं , कल वही पानी उन्हें एक-एक बूंद के लिए तरसा सकता है। कुछ वर्षों बाद सोनपुर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। खेतों में हरियाली की जगह सूखी मिट्टी दिखाई देने लगी , तालाब की जगह गहरी दरारों वाली जमीन बची थी और गाँव के पुराने कुएँ इतने नीचे चले गए थे कि उनकी तलहटी भी दिखाई देने लगी थी। इसी सोनपुर गाँ...