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शबरी की अमर भक्ति

  घने जंगलों से घिरी हरियाली से भरपूर शांत और निर्मल वातावरण से युक्त एक वनभूमि इसी दिव्य वन में जन्मी थी सबरी जिन्हें आगे चलकर संसार शबरी माता माता के नाम से जानेगा। उनकी कथा केवल एक स्त्री या एक भीलनी की कथा नहीं है। यह कथा है भक्ति की , समर्पण की , निर्दोष प्रेम की , त्याग की और उस महान विश्वास की जिसके आगे स्वयं भगवान भी खींचे चले आते हैं। समय बीता और जब वो विवाह योग्य हुई , घर में उत्सव शुरू हो गए। ढोल नगाड़े बजे , पूरा वन उसकी शादी की तैयारियां देखने को उमड़ आया। उसके पिता ने जैसा उनके कुल में परंपरा थी। बारातियों के स्वागत के लिए मांस की व्यवस्था करने हेतु सैकड़ों हिरण , खरगोश , जंगली पक्षी और अन्य वन्य प्राणी पकड़े। इन जानवरों को यहां क्यों लाया गया है ? यह सब कष्ट में है। इनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? पिताजी इन सभी को आपने यहां इस तरह क्यों रखा है ? बेटी परंपरा है।  बारातियों का स्वागत इनके मांस से होगा। मेरी शादी में इतने सारे जानवरों को मारा जाएगा। मेरे कारण इतने सारे निर्दोष पशु मरेंगे। पिताजी इतने सारे जानवरों को मारना पाप है। यह निर्दोष हैं। मेरी शादी के इन्हे...

कंजूस सेठ

 एक आदमी था। नाम था करोड़ी सेठ। दिन भर की भागदौड़ के बाद वह अपनी राशन की दुकान में अपने मुनीम के साथ शांति से बैठा हुआ था। अभी थोड़ी देर पहले ही ग्राहकों को राशन देकर दुकान खाली हुई थी और अब दोपहर का समय हो चुका था। करोड़ी सेठ का एक सादा सा नियम था। वो रोज अपने घर से ही खाना मंगवाया करता था। आज तो अच्छी कमाई हो गई। चलो अब खाना खा लेते हैं। अरे सेठ जी आज क्यों ना जलेबी मंगा लें। आज आपकी कमाई भी तो हो गई है ना। अरे चुप बिल्कुल चुप। कोई सुन ना ले। कहां कमाई हुई है रे? और हां घर से खाना लाया है ना चुपचाप खा ले। अरे सेठ जी ठीक है खा लेता हूं।

 अरे सेठ ये आप खीर से किशमिश क्यों निकाल रहे हैं? अच्छा अब समझा आपको अच्छी नहीं लगती। लाओ मैं खा लूं। बिल्कुल नहीं। छू भी मत लेना। यह किशमिश बहुत कीमती है। पिछले एक साल से मैं हर बार खीर बनवाते समय डलवाता हूं। फिर निकाल कर सुखा लेता हूं और दोबारा काम में आ जाती है। अरे ऐसे कंजूस सेठ से पाला पड़ा है कि अब क्या बताऊं। शाम होते ही करोड़ी सेठ अपनी दुकान बंद करता है। ताला लगाकर घर की ओर चल पड़ता है। रास्ता वही पुराना था। और चलते-चलते गांव के एक चौराहे पर उसे कुछ लोग मिल जाते हैं। अरे सेठ जी माघ का महीना आ गया है भैया। चलो ना गंगा जी नहाने चलते हैं। पाप भी धुल जाएगा और ठंड भी लग जाएगी। अरे नहीं भैया तुम लोग ही जाओ। वो क्या है ना मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही। अभी-अभी लग रहा है खराब होने वाली है।

तुम लोग जाओ मैं यहीं ठीक हूं। अच्छा सेठ जी जैसी आपकी मर्जी आप आराम करो। हम लोग गंगा मैया से आपकी सेहत भी मांग लेंगे। अरे बेटा वो बस नाम का ही है करोड़ी सेठ। असल में तो मक्खी चूस है। मक्खी चूस कहीं नहीं जाएगा वो। खर्चे के नाम से ही उसकी आत्मा कांप जाती है। [हंसी] [संगीत] अरे सुनती हो भाग्यवान? ये लो किशमिश धोकर रख लेना। अगली दफा काम आएगी। अरे ठीक है लाओ। अरे सुनते हो जी। गांव से कुछ लोग गंगा स्नान के लिए जा रहे हैं। आप क्यों नहीं जा रहे? आप भी जाओ ना। अरे नहीं। मुझे भी गांव वालों ने पूछा था। मैंने मना कर दिया। पर क्यों? मना क्यों कर दिया आपने? क्या दिक्कत है जाने में? अच्छा सुनो मैं बताता हूं क्यों नहीं जा रहा। अगर मैं गंगा स्नान करने गया तो वहां के पंडित हमसे दान दक्षिणा मांगेंगे ना इसीलिए नहीं जा रहा। अरे आप भी ना जाइए और कल ही गंगा स्नान करके आइए। पर दक्षिणा मैं एक उपाय बताती हूं। तुम ना एक भी पैसा मत ले जाना।

 तो कोई क्या ही मांगेगा। हां, यह तरकीब अच्छी है। ठीक है। मैं भोर होते ही जाता हूं। सुबह का समय था। करोड़ी सेठ गंगा जी के लिए घर से निकल पड़ा। कुछ ही देर में वो गंगा जी के तट पर पहुंच चुका था। चारों तरफ लोगों की भीड़ थी। शोर था, हलचल थी। अचानक करोड़ी सेठ रुक जाता है। वो एक पल के लिए ठिठक जाता है और फिर अपनी नजर चारों तरफ दौड़ाता है। अरे बाप रे पंडा जी यहां कहां से आ गए? नहीं नहीं यहां नहीं रुकना। चलो कहीं और जगह ढूंढते हैं। तभी सेज की नजर एक ऐसी जगह पर पड़ी जहां सन्नाटा था। और चलते-चलते वो अनजाने में श्मशान घाट की ओर पहुंच गया। अरे वाह इस श्मशान घाट की खाली जगह से अच्छी जगह और क्या होगी? और तो और यहां कोई यजमान भी नहीं है। जल्दी से नहा लेता हूं और चुपचाप निकल जाता हूं। उधर ऊपर से भगवान शिव और माता पार्वती कंजूस सेठ की कंजूसी देखकर मुस्कुरा रहे थे। स्वामी यह सेठ तो दान के नाम से ही पीछे हट जाता है। इतनी कंजूसी मैंने आज तक नहीं देखी। देवी अगर कंजूसी की कोई प्रतियोगिता होती तो यह सेठ पहला पुरस्कार ले जाता। स्वामी लगता है अगर गंगा मैया भी इससे दक्षिणा मांग लेती तो यह नहाए बिना ही घर भाग जाता। देवी अब तो मुझे डर है कहीं यह सेठ सांस भी गिनगिन कर ना लेने लगे। अब देखना देवी हम क्या करते हैं।

परंतु स्वामी आप क्या करने वाले हैं? बस देवी आप देखती जाइए। अरे चलो नहा लिया। अब जल्दी से निकल चलते हैं। कहीं कोई आ गया तो कुछ देना पड़ जाएगा। अरे ये कहां से आ गया? हे राम अब क्या होगा? राम राम भैया। आओ हमारे पास। तिलक तो लगवा लो और हमारी दक्षिणा भी देते जाओ। अरे मैं तो पैसे से बचने के लिए इसी घाट पर आया था। यहां भी यह कैसे आ गया? अरे हां पंडित जी राम-राम। अच्छा यह बताइए कैसी दक्षिणा की बात कर रहे हैं? हम तो यहां श्मशान घाट में स्नान करने आए हैं। मैं भी तो श्मशान का ही वासी हूं। मतलब वो तुम्हें नहीं आएगा समझ में। अब जल्दी से मेरी दक्षिणा दो। अच्छा ऐसा करो तो मेरे हिसाब में लिख लो। हम पैसे लेकर नहीं आए हैं। जब हमारे गांव में फेरी लगाने आओ तो 10 पैसे ले लेना। ठीक है। अरे आज तो बच ही गया। हे राम मेरे जैसा बुद्धिमान कोई नहीं होगा।

ना गांव का नाम बताया ना अपना नाम। अब कैसे आएगा दक्षिणा लेने? कुछ दिन बाद अरे मुनीम हिसाब ठीक से कर रहा है ना एक पैसे का भी हिसाब गलत मत देना और हां आज ब्याज का हिसाब लेने चलना है। तभी बाहर से एक साबू की आवाज आती है। अलख निरंजन भिक्षाम देही। अरे बाप रे बाप यह पंडा कहां से आ गया रे? अब क्या करूं मैं? हे राम। अरे तुम दोनों ध्यान से सुनो। अंदर आओ जल्दी। तुम दोनों उस पंडे से कह देना कि मैं कहीं बाहर गया हूं। वो दक्षिणा लेने आया है। पता नहीं कहां-कहां से आ जाते हैं। लेकिन सेठ जी अगर वो अंदर आ गया तो क्या होगा? अरे सुनो तुम कह देना कि मैं मर गया। करोड़ी सेठ मर गया। अभी-अभी मरा है। बिल्कुल अभी। लेकिन यह झूठ क्यों बोलना? अरे बस तुम रोने का नाटक करना और कुछ भी हो जाए सच मत बोलना। अलख निरंजन।

 अरे सुनो बालिके हमारी उस सेठ से दक्षिणा लेनी है जरा। अरे मेरा सेठ मर गया रे। हे भगवान। ये क्या कर दिया रे विधाता। हे भगवान मेरा एक ही आदमी था। हाय दैया रे वो भी मुझसे रूठ के चला गया। हाय दैया रे। अब तो किशमिश रखी रह जाएगी। दैया रे। अरे पंडा जी वो सेठ तो अभी-अभी मर गया। पता नहीं कैसे। लेकिन मर गया। वैसे अच्छा ही हुआ। बहुत कंजूस था। मुझे समय पर तनख्वाह भी नहीं देता था। अरे रे बहुत बुरा हुआ। हम तुम्हारा दुख समझ सकते हैं। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है? अच्छा चलो जल्दी इनका अंतिम संस्कार कर देते हैं। बाहर गांव वालों की भीड़ जमा हो जाती है। सेठ को अर्थी पर लिटाया जाता है। घर वाले रोने का नाटक कर रहे होते हैं और सेठ अंदर ही अंदर डर रहा होता है। लेकिन सेठ की कंजूसी देखो। अब भी हिल नहीं रहा। राम नाम सत्य है। राम नाम सत्य है। राम नाम सत्य है। राम नाम सत्य है। थोड़ी देर में सेठ को लेकर श्मशान घाट पहुंच जाते हैं। अच्छा अब जल्दी करो। एक आदमी आग लगाने ही वाला होता है। तभी अचानक सेठ खड़ा हो जाता है।

 अरे जल्दी पकड़ो। वह जिंदा नहीं है। आत्मा है। उसे पकड़ कर लेओ जल्दी। गांव वाले उसे पकड़ कर वापस लाते हैं और फिर से लेटाने लगते हैं। तभी साधु जोर-जोर से हंसने लगता है। अरे आखिर तुम हो कौन? और क्यों मेरे पीछे पड़े हो? मुझे माफ कर दो। मैंने कुछ नहीं किया कसम से। अच्छा। ठीक है। छोड़ देता हूं तुम्हें। आओ हमारे साथ चलो। हम तुम्हें बता ही देते हैं कि हम कौन हैं। साधु अपने असली रूप में आ जाता है। वो स्वयं भगवान शिव होते हैं। हम आज तक भांग धतूरा से ही प्रसन्न होते थे। मगर आज तुम्हारी कंजूसी ने हमारा दिल जीत लिया। अरे सेठ मैं तुम्हारी कंजूसी से बहुत प्रसन्न हुआ हूं। तुम्हारे जैसा कंजूस पूरे संसार में नहीं देखा। बताओ मुझसे क्या वरदान मांगते हो? पहले आप हमें विश्वास दिलाइए कि बाद में पलटेंगे तो नहीं। अच्छा ठीक है। मैं वचन देता हूं। मैं नहीं पलटूंगा। तो फिर वो जो आपकी दक्षिणा के 10 पैसे थे ना बस वह माफ कर दीजिए। तथास्तु कल्याण हो।

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