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प्यारी बेटी का जीवन

  एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान अपनी एकमात्र बेटी रानी   के साथ रेहता   था। रानी   की मां का देहांत उसके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया था। उस वक्त रानी   इतनी छोटी थी कि उसे मां का चेहरा भी याद नहीं रहा। गांव के लोगों ने कई बार पिता को समझाया कि वो   दूसरी शादी कर ले ताकि बच्ची को मां का साया मिल सके। पर उसने हर बार मना कर दिया। रानी  मेरी पत्नी की आखिरी निशानी है। मैं उसे किसी और के साए में नहीं पालना चाहता। सौतेली मां चाहे कितनी भी अच्छी क्यों ना हो उसके मन में वो  अपनापन नहीं हो सकता जो एक सगी मां के दिल में होता है। मैं ही इसका पिता भी हूं और मां भी। जब तक जिंदा हूं इसे किसी की कमी मेंहसूस नहीं होने दूंगा। उसने ठान लिया था कि वो  अपनी बेटी को खुद ही पाल पोस कर बड़ा करेगा। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये । वो  खेतों में दिन रात मेहनत करता और जो थोड़ा बहुत  कमाता उसी में दोनों का जीवन चलता। गरीबी थी पर उस घर में प्रेम और अपनापन की कोई कमी नहीं थी। रानी  के लिए उसके पिता ही उसका पूरा संसार थे। मां भी , पिता भी और ...
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कर्म का चक्र

  कर्म का चक्र हिमालय की तलहटी में बसा आनंदपुर गाँव अपनी शांति, प्राकृतिक सुंदरता और सरल लोगों के लिए प्रसिद्ध था। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल हवेली थी, जिसमें राघव शरण और उसकी पत्नी कामिनी रहते थे। राघव एक दयालु, धर्मपरायण और उदार व्यक्ति था। वह हमेशा गरीबों की सहायता करता और गाँव के लोगों के सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहता था। लेकिन उसकी पत्नी कामिनी का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। वह अत्यंत सुंदर और धनी थी, परंतु उसे अपने रूप और संपत्ति पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि धन ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है और जिसके पास धन नहीं, वह सम्मान के योग्य नहीं है। जब भी कोई गरीब, भिखारी या जरूरतमंद उनके घर सहायता माँगने आता, कामिनी उसे अपमानित करके लौटा देती। कई बार राघव उसे समझाने का प्रयास करता कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके धन में नहीं, बल्कि उसके कर्मों में होता है। लेकिन कामिनी उसकी बातों को हँसी में उड़ा देती। उसे विश्वास था कि उसका वैभव और सुख हमेशा उसके साथ रहेगा। समय बीतता गया और उसका अहंकार बढ़ता गया। एक वर्ष आनंदपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में भयंकर अकाल पड़ गया। खेत सूख गए, कुएँ ख...

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

अनुशासन: सूरज की सफलता की कहानी

  सूरज का जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ था , जहाँ सुविधाएँ बहुत कम थीं लेकिन सपनों की कोई कमी नहीं थी। बचपन से ही सूरज का स्वभाव थोड़ा अलग था। वह बाकी बच्चों की तरह दिन भर खेल-कूद में समय बिताने के बजाय कुछ नया सीखने की कोशिश करता रहता था। उसके पिता एक साधारण किसान थे और माँ घर संभालती थीं। घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी , लेकिन माता-पिता ने सूरज को हमेशा अच्छे संस्कार दिए। वे अक्सर कहते थे कि “जीवन में आगे बढ़ने के लिए सबसे जरूरी चीज़ है अनुशासन।” यह बात सूरज के मन में गहराई से बैठ गई थी। गाँव के स्कूल में पढ़ाई का माहौल बहुत अच्छा नहीं था। शिक्षक कभी-कभी ही समय पर आते और पढ़ाई भी उतनी प्रभावी नहीं होती थी। लेकिन सूरज ने कभी इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वह रोज़ सुबह जल्दी उठता , सबसे पहले अपने दिन की योजना बनाता और फिर पढ़ाई में लग जाता। कई बार उसे समझ नहीं आता कि कौन सा विषय कैसे पढ़े , लेकिन वह हार नहीं मानता। वह अपने से बड़े बच्चों से पूछता , पुराने किताबों को पढ़ता और धीरे-धीरे खुद ही रास्ता ढूंढ लेता। सूरज के दोस्त अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते थे। वे कहते , “...