बहुत समय पहले हिमालय की तलहटी में एक शांत राज्य बसा था , जहाँ प्रकृति और साधना का अनोखा संगम देखने को मिलता था। उस राज्य से थोड़ा दूर एक प्राचीन बौद्ध मठ था , जहाँ भिक्षु आत्मज्ञान की खोज में अपना जीवन समर्पित कर देते थे। उसी मठ में भद्रसेन नाम का एक भिक्षु रहता था। बाहर से देखने पर वह अत्यंत शांत , संयमी और अनुशासित दिखाई देता था। उसकी आँखों में झुकी हुई विनम्रता , धीमी चाल और मधुर वाणी लोगों को यह विश्वास दिलाती थी कि वह सच्चा साधक है। मठ में आने वाले दानदाता और नए शिष्य उसे आदर की दृष्टि से देखते थे , पर कोई यह नहीं जानता था कि उसके मन के भीतर लोभ की गहरी जड़ें फैली हुई थीं। भद्रसेन का अतीत अभावों से भरा था। बचपन में उसने गरीबी का ऐसा रूप देखा था जिसने उसके मन में हमेशा के लिए डर बसा दिया था। कई बार वह बिना भोजन सोया , कई बार अपमान सहा। उसी पीड़ा ने उसके भीतर यह भावना पैदा कर दी थी कि जीवन में सबसे बड़ा खतरा खाली हाथ रह जाना है। जब वह बड़ा हुआ और मठ में आया , तब उसने सोचा कि भिक्षु बनने से उसे सुरक्षा मिलेगी , सम्मान मिलेगा और जीवन की अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी। उसने त्याग का मार्...
सर्दियों की वह सुबह कुछ अलग ही थी। कोहरा इतना घना था कि सूरज मानो खेतों से डरकर कहीं छिप गया हो। गाँव के बाहर फैले खेत सफ़ेद चादर ओढ़े सो रहे थे और ठंडी हवा हर साँस के साथ किसान के फेफड़ों में उतर रही थी। रामदयाल अपने कच्चे घर के आँगन में खड़ा था , हाथ में फटी हुई ऊनी शाल , आँखों में कई बरसों की थकान और उम्मीदों का बोझ लिए। वह इस धरती का बेटा था , उसी मिट्टी में जन्मा , उसी मिट्टी में पसीना बहाने वाला। सर्दी उसके लिए मौसम नहीं थी , बल्कि एक परीक्षा थी—हर साल लौटने वाली , हर बार कुछ छीन लेने वाली। रामदयाल के खेत गाँव के आख़िरी छोर पर थे। तीन बीघा ज़मीन , जो कभी उसके पिता की शान हुआ करती थी , अब उसकी ज़िम्मेदारी थी। गेहूँ की फसल खड़ी थी , लेकिन ठंड ने उसकी बढ़त रोक दी थी। पाला पड़ने का डर हर रात उसे सोने नहीं देता था। वह जानता था कि एक भी कड़ाके की रात उसकी महीनों की मेहनत को बर्बाद कर सकती है। जब वह खेत की ओर चला , तो उसके पैरों के नीचे ज़मीन कड़कड़ाकर आवाज़ कर रही थी , जैसे ठंड से जमी हुई मिट्टी भी दर्द में हो। उसकी पत्नी , सीता , पीछे से आवाज़ लगाती है—“थोड़ा संभलकर जाना , हवा बहु...