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Showing posts from January, 2026

प्यारी बेटी का जीवन

  एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान अपनी एकमात्र बेटी रानी   के साथ रेहता   था। रानी   की मां का देहांत उसके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया था। उस वक्त रानी   इतनी छोटी थी कि उसे मां का चेहरा भी याद नहीं रहा। गांव के लोगों ने कई बार पिता को समझाया कि वो   दूसरी शादी कर ले ताकि बच्ची को मां का साया मिल सके। पर उसने हर बार मना कर दिया। रानी  मेरी पत्नी की आखिरी निशानी है। मैं उसे किसी और के साए में नहीं पालना चाहता। सौतेली मां चाहे कितनी भी अच्छी क्यों ना हो उसके मन में वो  अपनापन नहीं हो सकता जो एक सगी मां के दिल में होता है। मैं ही इसका पिता भी हूं और मां भी। जब तक जिंदा हूं इसे किसी की कमी मेंहसूस नहीं होने दूंगा। उसने ठान लिया था कि वो  अपनी बेटी को खुद ही पाल पोस कर बड़ा करेगा। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये । वो  खेतों में दिन रात मेहनत करता और जो थोड़ा बहुत  कमाता उसी में दोनों का जीवन चलता। गरीबी थी पर उस घर में प्रेम और अपनापन की कोई कमी नहीं थी। रानी  के लिए उसके पिता ही उसका पूरा संसार थे। मां भी , पिता भी और ...

बुद्धि की तराजू

बहुत समय पहले की बात है। गंगा के किनारे बसा एक समृद्ध नगर था— धनपुर । धनपुर अपने व्यापार , बाज़ार और सेठों की अमीरी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। यहाँ दिन निकलते ही दुकानों के पट खुल जाते और शाम ढलते ही सोने-चाँदी की गिनती शुरू हो जाती। पर इस नगर की एक और पहचान थी—यहाँ के अधिकतर व्यापारी बड़े चालाक और स्वार्थी थे। वे मुनाफ़े के लिए धर्म और मानवता दोनों को ताक पर रख देते थे। इसी नगर में एक दिन चतुर ब्राह्मण का आगमन हुआ। वह लंबे समय से देश-देश घूम रहा था , लोगों को समझता , उनके स्वभाव को परखता और जहाँ अन्याय देखता , वहाँ अपनी बुद्धि से उसे उजागर करता। धनपुर में कदम रखते ही उसने महसूस किया कि यहाँ की हवा में ही लालच घुला हुआ है। हर चेहरे पर मुस्कान थी , पर आँखों में हिसाब-किताब चलता रहता था। नगर के बीचोंबीच एक विशाल बाजार था। चतुर ब्राह्मण वहीं एक पेड़ की छाया में बैठ गया और लोगों को देखने लगा। तभी उसकी नज़र एक बूढ़े किसान पर पड़ी , जो काँपते हाथों से अनाज की बोरी पकड़े खड़ा था। सामने बैठा था नगर का प्रसिद्ध व्यापारी सेठ कुबेरदास — नाम कुबेर का , पर मन में केवल धन की भूख। वह किसान से कह...

“सच्ची विद्वता की पहचान”

  गाँव का नाम था शिवपुर । वही पुराना शिवपुर , जहाँ के लोग सादे दिल के थे और जहाँ कभी-कभी चतुर ब्राह्मण अपनी बुद्धि के ऐसे चमत्कार दिखा जाता था कि लोग वर्षों तक उसकी चर्चा करते रहते थे। पिछली बार जब उसने लालची सेठ को उसकी ही चाल में फँसाया था , तब से पूरे गाँव में उसकी अक़्ल की धाक बैठ गई थी। लोग उसे सम्मान से देखते थे , पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मन में ईर्ष्या पलने लगी थी। उन्हीं में से एक था पंडित हरिहर , जो स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझता था , पर भीतर से घमंडी और चालाक था। एक दिन की बात है। गाँव में खबर फैली कि पास के राज्य विजयनगर का राजा एक बड़ा यज्ञ कराने वाला है। राजा ने घोषणा करवाई थी कि जो भी विद्वान ब्राह्मण यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराएगा , उसे भारी इनाम मिलेगा—सोने की मुद्राएँ , रेशमी वस्त्र और राज्य से सम्मान। यह सुनते ही कई ब्राह्मणों के कान खड़े हो गए। पंडित हरिहर को लगा कि यही मौका है चतुर ब्राह्मण को नीचा दिखाने का। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस बार वह राजा के सामने स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान सिद्ध करेगा। उधर चतुर ब्राह्मण अपने घर के आँगन में बैठा त...