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गरीब फिश करी वाला

  बिहार में बसे एक छोटे से गांव रामपुर की अपनी ही पहचान है। यहां के लोग बेहद मेहनती , सरल स्वभाव के और आपसी मेलजोल से रहने वाले हैं। मेहनत और सच्चाई इस गांव की पहचान मानी जाती है। और यहीं की मिट्टी में बसता है अपनापन और संस्कृति की सच्ची खुशबू। उसी गांव में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई संतोष और छोटा भाई आशीष। संतोष घर का बड़ा बेटा था और वह बेहद लालची स्वभाव का था। उसकी पत्नी सोनम भी उसी के जैसे गुणों वाली थी। सोनम हमेशा अपने पति संतोष के कान भरती रहती थी परिवार वालों के खिलाफ। संतोष भी बस सोनम की ही बातें सुनता था। दूसरी तरफ किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। दूसरी तरफ उसका छोटा भाई अशिष है जो मेहनती और शांत स्वभाव का है। उसकी पत्नी कमला थोड़ी गुस्सैल है लेकिन दिल की बहुत साफ है।  दोनों ही अपना काम मिलजुलकर करते हैं। भले ही दोनों छोटे हैं मगर घर को एक बड़े की तरह संभालते हैं। संतोष और आशिष की मां बहुत पहले ही एक हादसे में गुजर गई थी। बाऊजी की तबीयत भी पिछले कुछ महीनों से खराब रहने लगी है। बाऊजी का बस इतना ही सपना था कि पूरा परिवार आपस में मिलजुलकर साथ रहे। संतोष बाऊजी की उतन...

गरीब फिश करी वाला

 बिहार में बसे एक छोटे से गांव रामपुर की अपनी ही पहचान है। यहां के लोग बेहद मेहनती, सरल स्वभाव के और आपसी मेलजोल से रहने वाले हैं। मेहनत और सच्चाई इस गांव की पहचान मानी जाती है। और यहीं की मिट्टी में बसता है अपनापन और संस्कृति की सच्ची खुशबू। उसी गांव में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई संतोष और छोटा भाई आशीष। संतोष घर का बड़ा बेटा था और वह बेहद लालची स्वभाव का था। उसकी पत्नी सोनम भी उसी के जैसे गुणों वाली थी। सोनम हमेशा अपने पति संतोष के कान भरती रहती थी परिवार वालों के खिलाफ। संतोष भी बस सोनम की ही बातें सुनता था। दूसरी तरफ किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। दूसरी तरफ उसका छोटा भाई अशिष है जो मेहनती और शांत स्वभाव का है। उसकी पत्नी कमला थोड़ी गुस्सैल है लेकिन दिल की बहुत साफ है।

 दोनों ही अपना काम मिलजुलकर करते हैं। भले ही दोनों छोटे हैं मगर घर को एक बड़े की तरह संभालते हैं। संतोष और आशिष की मां बहुत पहले ही एक हादसे में गुजर गई थी। बाऊजी की तबीयत भी पिछले कुछ महीनों से खराब रहने लगी है। बाऊजी का बस इतना ही सपना था कि पूरा परिवार आपस में मिलजुलकर साथ रहे। संतोष बाऊजी की उतनी देखभाल नहीं करता जितनी करनी चाहिए। आशीष ही मेहनत करके अपने बाऊजी की पूरी देखभाल करता है। सुबह-सुबह वह फावड़ा लेकर खेत में काम करने चला जाता ताकि कुछ पैसे आ जाए और घर का खर्च चल सके। संतोष तो बस घर पर बिस्तर तोड़ता रहता था और बाऊजी की पेंशन पर ही अपना गुजारा करके महीना निकाल लेता था। आशीष इस बार खेतों से कितनी कमाई हुई? मौका मिलते ही वह किसी ना किसी बहाने से अपने छोटे भाई के पैसे भी ले लेता था।

एक दिन ए जी आज आप बहुत थके हुए लग रहे हैं और इतने दिनों से अच्छे से आराम भी नहीं किया। आज आराम कर लीजिए। अरे कमला संतोष भैया ने सिबाज मंगाया है। मुझे आज खेत [संगीत] के लिए जाना होगा। कमला गुस्से में बोल पड़ी। क्या आप हमेशा अपने बड़े भाई की जिंदगी भर गुलामी करते रहेंगे? अब आराम कीजिए। मुझे तो जाना ही होगा। मुझे माफ करना। इतना कहते ही आशीष अपना फावड़ा उठाकर खेत की ओर निकल गया। दोपहर का समय था और वह भारी धूप में काम करने लगा। आशीष को जरा भी अंदाजा नहीं है कि आज उसके साथ क्या होने वाला है। तभी गांव के दूध वाले भैया हाफते हुए दौड़ते दौड़ते आशीष के पास आए और घबराई हुई आवाज में बोले अरे आशीष तेरे बाबूजी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई है। जल्दी चल।

 इतना कहते ही आशीष के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। आशीष ना कुछ सोच पाया ना ही कुछ समझ पाया। वह बिना एक पल गवाए सीधे अपने घर की ओर भाग पड़ा। खून का रिश्ता होने के कारण संतोष के चेहरे पर उदासी तो थी मगर सोनम के मन में जरा भी गम नहीं था। उधर आशीष और कमला फूट-फूट कर रो रहे थे। जाने से पहले मेरी बस यही इच्छा है कि दोनों भाई आपस में मिलजुल कर रहे। तभी मेरी आत्मा को सच्ची शांति मिलेगी। इतना कहते ही बाऊजी ने अपनी आंखें बंद कर ली और हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गए। बाऊजी के देहांत के बाद संतोष और आशीष ने आपसी मतभेद भुलाकर पूरे विधिविधान से उनका अंतिम संस्कार किया। बाऊजी के देहांत के बाद आशीष गहरे शोक में डूब गया। जैसे उसके जीवन से सब कुछ छीन गया हो। दूसरी ओर बाऊजी के देहांत के कुछ ही दिनों बाद ही संतोष उस दुखद हादसे को पीछे छोड़कर सोनम के साथ अपनी दुनिया में मग्न हो गया। सुनिए जी मुझे आपके छोटे भाई पर जरा भी भरोसा नहीं है। वह शुरू से ही लालची लगता है। बेहतर होगा कि उसे आज ही जायदाद से बेदखल कर दिया जाए। संतोष बिना कुछ सोचे समझे। सोनम मैं अभी जाकर साफ कर देता हूं। मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं। मैं अकेले ही सब संभाल सकता हूं।

इधर तपती धूप में फावड़ा थामे आशीष बिना पानी पिए लगातार मेहनत कर रहा था और उसे इन सब घटनाओं की कोई खबर नहीं थी। कुछ देर बाद संतोष भी वहां आ जाता है और कहता है आशीष मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है। शाम 4:00 बजे चौराहे के पास बरगद के पेड़ के नीचे मुझसे मिलना। ठीक है भैया आपके बताए हुए स्थान और समय पर मैं पहुंच जाऊंगा। इतना कहकर संतोष वहां से चला जाता है। जबकि आशीष वहीं खड़ा गहरी सोच में डूब जाता है और उसके मन में कई सवाल उमड़ने लगते हैं। शाम ढलते ही संतोष अपने बताए हुए स्थान पर समय से भी पहले पहुंच गया और वहीं बैठकर किसी गहरी सोच में डूबा हुआ आशीष का इंतजार करने लगा। आज मैं आशीष को अपने घर से निकालकर अकेला मालिक बन जाऊंगा। तभी आशीष अपने सारे काम समय से पहले ही निपटा लेता है और संतोष के बताए हुए समय पर वहां पहुंच जाता है। बोलिए भैया आप मुझसे कौन सी जरूरी बात करना चाहते थे? जो भी कहना है निसंकोच और खुलकर बताइए।

 अब तुझे मेरे घर में रहने की कोई जरूरत नहीं है। मैं सारा कारोबार खुद संभाल लूंगा। तू चला जा और हमारी जिंदगी से हमेशा के लिए दूर हो जा। अरे भैया अगर मुझसे कोई गलती हो गई हो तो मुझे माफ कर दीजिए मगर ऐसा मत कीजिए। देख अब मुझे कोई भी बात नहीं सुननी है। मैंने जो कहा है वही होगा। मेरा फैसला आखिरी फैसला है। इतना कहकर संतोष बिना कोई बात सुने वहां से मुंह फेर कर जाने लगता है। अब मैं क्या करूं? कहां जाऊं? कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। अब आशीष के पास घर छोड़कर जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। इसलिए वह सुबह-सुबह नए घर की तलाश में निकल पड़ा।

 मगर उसे कोई अच्छा घर नहीं मिल रहा था। तभी उन्हें मिट्टी का एक घर मिल गया। जिसका किराया भी बहुत कम था और जगह भी काफी अच्छी थी। आशीष ने खेती के अलावा कभी कोई दूसरा काम नहीं किया था। इसलिए उसके पास कोई और काम भी नहीं था। घर में चावल का एक दाना तक नहीं है। अगर कोई काम नहीं मिला तो भूखे ही रहना पड़ेगा। मैं अभी गांव के बाजार जाऊंगा। वहां अगर मुझे कोई काम मिल गया तो उससे घर का राशन भी आसानी से आ जाएगा और हमारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी। आशीष काम ढूंढने गांव के बाजार की ओर निकल जाता है। आशीष दुकानदारों से, ठेले वालों से, मोमो वालों से, यहां तक कि होटल वालों से भी काम मांगता है। मगर कोई भी उसे काम देने के लिए तैयार नहीं। सब जगह से ठोकर खाने के बाद आशीष दुर्गा मां के चरणों में आ जाता है। हे मां दुर्गा, मेरी मदद करो। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं।

 मुझे इस संकट से निकालो। मजबूरी के कारण अशिष ने गांव के जमींदार से भाड़े पर एक खेत लिया और उसमें खेती करने लगा। अगर उसी खेत से कुछ आमदनी होती तो घर चल जाता। सूरज ढल चुका था और अशिष भी शाम होने से पहले अपना सारा काम पूरा करके घर लौट आया। आज सुबह-सुबह अशिष जल्दी उठ गया। मन में मछली खाने की इच्छा थी। इसलिए वह खरीदारी करने के लिए बाजार की ओर निकल पड़ा। बाजार पहुंचकर वह अलग-अलग दुकानों को देखते हुए सबसे अच्छी मछली चुनने की सोचने लगा ताकि घर लौट कर स्वादिष्ट भोजन बनाया जा सके। भैया मछली कितने रुपए किलो है। ₹300 किलो है। ₹300 सुनते ही आशीष के मुंह खुले के खुले रह गए। भैया क्या लूट मचा रखी है। जरा कम तो करो। पूरे 300 के है। लेना है तो लो नहीं तो जाओ। मछली तो आशीष को हर हाल में लेनी ही थी। उसे मछली खाने की बहुत जोरों की चाह थी। इसी चाह में थोड़ी देर सोचने के बाद उसने बिना और मोलभाव किए पूरे ₹300 में ही मछली खरीद ली। मन में हल्की सी टीस जरूर थी।

 लेकिन मछली खाने की इच्छा उसके लिए उस वक्त हर चीज से बड़ी थी। कमला मैं मछली ले आया हूं। जल्दी से बना दो। बहुत भूख लगी है और इतने दिनों से खाने का मन भी कर रहा था। बस कुछ देर इंतजार कर लीजिए। उसके बाद मैं आपके लिए स्वादिष्ट मछली की करी बनाकर ले आऊंगी। इतना बोलते ही कमला मछली की थैली उठाकर मछली की करी बनाने चली गई। जब तक मछली की करी बन रही थी। तब तक वह बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करने लगा। कुछ ही देर में कमला ने गरमागरम मछली की करी तैयार कर दी। रसोई से उठती उसकी लाजवाब खुशबू दूर तक फैल रही थी। जैसे ही करी परोसी गई अशिष अपने आप को रोक नहीं पाया और बेसब्री के साथ खाने पर टूट पड़ा। अरे जी बस खाते ही रहोगे या यह भी बताओगे कि बना कैसा है।

बहुत ही स्वादिष्ट बना है। इतनी लाजवाब मछली की करी मैंने आज तक कभी नहीं खाई। हर कौर में मसालों का स्वाद और खुशबू कमाल की लग रही है। मेरे पास ज्यादा पैसे कमाने की एक बढ़िया तरकीब है। बोलो तो बताओ। क्या किसी मुहूर्त का इंतजार कर रही हो? जल्दी बताओ आखिर क्या तरकीब है? इस गांव में एक भी ऐसा होटल नहीं है जहां अच्छा खाना मिलता हो। क्यों ना हम मछली की करीब बेचे? हां। मगर हमारे पास होटल खोलने भर के पैसे कहां है? हां। पर ठेले पर तो मछली के करीब बेच सकते हैं ना। ठेला कहां से आएगा? मेरे पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि ठेला ले सकूं। ठेला किराए पर ले लेते हैं ना? जैसे ही पैसे हो जाएंगे, हम अपना ठेला खरीद लेंगे। आप बाजार से सामान ले आइए ताकि कल से हमारा ठेला तैयार रहे। अगले ही दिन कमला रसोई में मछली की करी बनाने में जुट गई। चूल्हे पर चढ़ी कढ़ाई से उठती खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।

 आशीष द्वार पर ठेले को सजाने में लगा हुआ था। वह बड़ी मेहनत और लगन से ठेले को साफ कर रहा था। आशीष ने गांव से होकर गुजरने वाले मुख्य रास्ते पर अपना ठेला लगा दिया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग आ जा सकें। उसने जगह सोच समझ कर चुनी थी। तभी एक ग्राहक आशीष का ठेला देखकर पास आता है और बोलता है अरे भैया यहां क्या मिल रहा है? स्वादिष्ट फिश करी भैया सिर्फ और सिर्फ ₹50 में पूरे गांव में सिर्फ यही मिलेगी। अच्छा चलो एक प्लेट लगा दो। फिर मैं भी देखूं कि कैसी है। आशीष ने अपने पहले ग्राहक को ₹50 वाली फिशरी की एक प्लेट लगा दी। अरे भैया कौन-कौन से मसाले डाले हो? एक प्लेट खाकर तो मन ही भर गया लेकिन दिल अब भी नहीं भरा। स्वाद ऐसा है कि जी चाहता है फिर से एक और प्लेट ले ली जाए। कुछ ही देर में वहां इतनी भीड़ इकट्ठा हो गई। मानो किसी मेले का नजारा हो। जो भी एक प्लेट खाता वहीं आशीष की फिश करी का दीवाना हो जाता। खुशबू और स्वाद ने ऐसा जादू चलाया कि लोग अपने जान पहचान वालों को भी बुलाने लगे और देखते ही देखते आशीष का ठेला पूरे गांव की चर्चा का विषय बन गया। शाम हो चुकी थी।

 अब जाने का समय आ गया था। थोड़ी सी फिश करी बज गई थी। तो आशीष ने उसे पास खड़े बच्चों में बांट दिया। बच्चों के चेहरों पर खुशी खिल उठी और आशीष के मन को भी सुकून मिला कि उसका खाना सिर्फ पेट ही नहीं दिल भी भर गया। कमला आज की कमाई सुनकर तो तेरा मन खुश हो जाएगा। आज पूरे ₹2000 की फिश करी बिक गई। यह तो बहुत अच्छी खबर है। आज से पहले एक दिन में इतनी कमाई कभी नहीं हुई थी। चलो अब कल की तैयारी करते हैं। कल की सुबह आशीष हैरान रह गया। उसके आने से पहले ही उसकी फिश करी के लिए एक बहुत लंबी लाइन लग चुकी थी। ओ भाई मुझे जल्दी एक प्लेट फिश करी दे दो।

 कब से खड़ी हूं। अरे हम भी तो लाइन में लगे हैं। हमें पहले दो बाद में किसी और को देना। आप सभी जरा सब्र रखिए। जल्दबाजी मत कीजिए। सबको फिश करी मिलेगी। किसी को भी खाली हाथ नहीं जाने दूंगा। एक-एक करके सबकी बारी आएगी। बस थोड़ा इंतजार कीजिए। अब आशीष को किसी और की मजदूरी नहीं करनी पड़ती थी। वह अपना खुद का ठेला संभालकर आराम से घर चला जाता था और साथ ही उसके पैसे भी बच जाते थे। 5 साल बाद आशीष के पास पहले एक मिट्टी का घर था लेकिन अब उसका एक अच्छा सा पक्का मकान हो गया था। इसके साथ ही उसके पास अपनी गाड़ी भी थी। गांव में मोमो जलेबी की दुकान और एक होटल भी उसी का था। मेहनत और लगन के बल पर आशीष अब बहुत सी जमीन का मालिक बन चुका था और पूरे गांव में उसकी तरक्की की मिसाल दी जाती थी। अंत भला तो सब भला। हमारी कहानी यहीं खत्म होती है।

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