मकर संक्रांति पर शिवजी ने बनाई खिचड़ी। काशी में रहने वाली सुलोचना और मनोहर दोनों ही भगवान भोलेनाथ के भक्त थे। वह रोज उनकी भक्ति सेवा करती थी। उनकी सुबह से शाम बस शिव जी के नाम से ही होती थी। सुलोचना मैं जा रहा हूं। भोलेनाथ को प्रसाद चढ़ाकर आता हूं। ऐसे कैसे अकेले भोलेनाथ के मंदिर आप जाएंगे? मैं भी आपके साथ चलती हूं। इतने प्यार से महादेव के लिए हलवा मैंने बनाया है और प्रसाद आप अकेले ही जाकर चढ़ा आएंगे। हां। हां हां भाई तुमने ही बनाया है। चलो मेरे साथ तुम भी चलो। अब वह दोनों मंदिर चले जाते हैं और महादेव की पूजा करते हैं। भोलेनाथ के दर्शन करके उन्हें एक अलग ही शांति मिलती थी।
मनोहर एक गरीब रिक्शा चालक था जो अपनी बूढ़ी पत्नी के साथ
रहता था। उनके परिवार में उनके अलावा उनकी एक 10 साल की पोती रहती थी। दरअसल उनके बेटे बहू की मौत कई साल
पहले हो चुकी थी। तब से उन दोनों ने ही उसकी देखभाल की थी। ऐसे ही अब सर्दियां आ
गई थी। एक रोज। सुलोचना बाहर ठंड बहुत ज्यादा है। मुनिया को घर से बाहर मत भेजना
और तुम भी बहुत जरूरी हो तभी घर से बाहर जाना। बाबा आप हमें बोल रहे हैं और खुद
इतनी ठंड में भी रिक्शा चलाने जा रहे हैं। कितनी बड़ी और समझदार हो गए रे तू तो
मुनिया। लेकिन बिटिया मैं काम पर नहीं जाऊंगा तो हम सबका पेट कैसे भरेगा? कोई बात नहीं। हम भूखे
पेट ही रह लेंगे। लेकिन आप इतनी ठंड में बाहर ना जाओ। तू चिंता ना कर।
मैं शाम को जल्दी
लौट आऊंगा। ऐसा कहकर मनोहर कड़कड़ाती हुई ठंड में रिक्शा लेकर निकल पड़ता है और
स्टैंड के पास जाकर खड़ा हो जाता है। लेकिन ठंड इतनी थी कि लोग घरों से बाहर
निकलने की सोच ही नहीं रहे थे। ठंड इतनी ज्यादा है कि कोई सवार ही नहीं आ रही। ऐसे
तो कमाई कैसे होगी? तभी उसकी नजर एक
आदमी पर पड़ती है। साहब साहब आइए छोड़ देता हूं। कहिए कहां जाना है आपको? पाउडर गली लेकर चलोगे।
हां हां साहब क्यों नहीं?
चलिए ना। ₹30 लगेंगे। 30 क्यों बेच दूंगा? चलना है तो चलो नहीं तो
मैं ऑटो ही देख लेता हूं। नहीं नहीं साहब। चलिए मैं 20 में ही छोड़ देता हूं।
मनोहर की सुबह से कुछ भी कमाई नहीं हुई थी। इसलिए वह ₹20 में ही उसे लेकर चल पड़ता
है। जिसके बाद उसे दिन भर में दो सवारी और मिल जाती है। चलो आज कम से कम ₹100 की कमाई तो हो ही गई। अब
सुलोचना ने जो जरूरी सामान मंगवाया है वो तो ले ही चलता हूं। अब वह सब जरूरी सामान
लेकर जैसे आटा दाल लेकर घर चला जाता है। उसके आते ही सुलोचना घर में चूल्हा जलाती
है और तीनों चूल्हे की तपन के पास बैठ जाते हैं।
जिसके बाद तीनों
खाना खाकर सो जाते हैं। ऐसे ही समय बीतता है लेकिन जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे थे
वैसे-वैसे ठंड भी बढ़ती जा रही थी और मनोहर पिछले दो दिन से खाली हाथ ही घर लौट
रहा था। उस रात भी उनके यहां खाने को कुछ नहीं था। इसलिए वह भूखे पेट ही सो जाते
हैं। ऐसे ही मकर संक्रांति वाला दिन भी आ जाता है। वाहवान आज मकर संक्रांति है। सब
खिचड़ी बना रहे हैं और हमारे चूल्हे में आग तक नहीं जली। आप फिक्र मत कीजिए जी।
भगवान भोलेनाथ से ही आस है। शायद वही हमारी सुन ले। हम गरीबों को भी कुछ खाने को
मिल जाए। हमारा कुछ नहीं। नहीं भी खाएंगे तो। कोई फर्क नहीं। लेकिन बेचारी मुनिया
कल से भूखी है। नहीं दादी मां मुझे भी भूख नहीं है और अगर भूख लग भी रही है तो मैं
पानी पी लेती हूं। उससे थोड़ा आराम मिल जा रहा है। उधर कैलाश पर्वत पर शिव जी
ध्यान में लीन थे। प्राणनाथ आज मकर संक्रांति है। काशी में आपके भक्त खिचड़ी
चढ़ाने को आतुर हैं।
देखिए तो कैसे
मंदिर के बाहर आपके भक्तों की भीड़ लगी हुई है। यह सुनकर शिव जी ने धीरे से आंखें
खोली। उनका ध्यान तो बस मनोहर की झोपड़ी की ओर ही था। पार्वती यह सभी भक्त भले ही
हमें खिचड़ी चढ़ाएं लेकिन असल में तो हमारा सारा ध्यान मनोहर और उसके परिवार की ओर
है। उनके यहां आज पकाने को कुछ भी नहीं है। इसीलिए आज हम उनके यहां जाएंगे स्वयं
खिचड़ी पकाने। यह बात सुनकर माता पार्वती और नंदी चौंक उठे। नंदी ने चौंक कर कहा।
प्रभु आप स्वयं हां नंदी आज खिचड़ी केवल अन्न नहीं कर्म और करुणा का प्रसाद बनेगी।
ऐसा कहकर महादेव धरती लोक की और मनोहर की झोपड़ी की ओर देखने लगे और फिर कुछ ही पल
में शिवजी भिखारी के वेश में आ गए। फिर माता पार्वती ने चिंतित होकर कहा, स्वामी इतनी ठंड में आप
कहां जा रहे हैं? जब भक्त ठंड और
भूख में हो तो शिव कैसे महलों में रहे? मुझे अपने भक्त की तैयारी के लिए यह सब करना पड़ेगा।
ऐसा कहकर शिव जी
भिखारी बनकर झोपड़ी के द्वार पहुंचे। अलख निरंजन भोले बाबा की जय कोई खिचड़ी
मिलेगी क्या बाबा माफ करना आज तो हमारे पास अन्न का दाना भी नहीं यह सुनकर शिवजी
मुस्कुराए अगर मन में श्रद्धा हो तो खाली बर्तन भी भर जाते हैं। अगर आप मुझे अपनी
रसोई में कुछ पकाने की अनुमति दें तो मैं लेकिन बाबा हमारे पास तो कुछ भी नहीं है।
उसकी चिंता आप मत कीजिए। मेरी झोली में थोड़े चावल और दाल है। ठीक है। अगर आप रसोई
इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आप देख सकते हैं। फिर कुछ ही देर में पूरी झोपड़ी में
खिचड़ी की सुगंध फैल गई। ये देख मुनिया की आंखें चमक उठी। दादी मां कितनी अच्छी
खुशबू आ रही है ना। शिवजी खिचड़ी चलाते हुए बोले। मकर संक्रांति पर जो खिचड़ी
प्रेम से बनती है वो भूख नहीं भाग्य मिटाती है। फिर जैसे ही खिचड़ी बनकर तैयार हुई
तो वो सब हैरान रह गए। इतनी सी चावल दाल की खिचड़ी इतनी सारी बन गई। फिर शिवजी ने
पहला कौर उठाया।
उन्होंने पहले कौर
को जमीन पर रखा। यह उन आत्माओं के लिए जो बिना अन्न के संसार छोड़ गए। दूसरा कौर
नंदी के नाम। यह देख मनोहर बोला बाबा आप कौन है? तभी भिखारी का रूप विलीन हुआ। सामने साक्षात
शिव जी खड़े थे। प्रभु हमें क्षमा करें जो पहचान ना सके। इसमें तुम्हारी कोई गलती
नहीं मनोहर। मैं तुम तीनों की भक्ति से बड़ा प्रसन्न हूं। अब से तुम्हारे यहां कभी
भंडार खाली नहीं होंगे। मकर संक्रांति पर खिचड़ी केवल परंपरा नहीं यह करुणा का
पर्व है। इसके बाद मनोहर का घर पक्का बन गया। साथ ही उसका घर भंडार से भर गया।
जौनपुर गांव में बलदेव नाम का एक आदमी रहता था। बलदेव की गांव में ही एक छोटी सी
दुकान थी। बलदेव की दो शादियां हुई थी। उसकी पहली पत्नी पूजा से कोई संतान नहीं
हुई। इसलिए उसने प्रज्ञा से दूसरी शादी कर ली थी। पहले तो प्रज्ञा स्वभाव की अच्छी
थी। पूजा के साथ घर के हर कामकाज में हाथ बटाती थी। लेकिन शादी के साल भर बाद ही
प्रज्ञा ने दो जुड़वा बेटों को जन्म दिया और उस घर को एक साथ दो चिराग देने के बाद
तो अब प्रज्ञा घमंड में रहने लगी।
अब वो घर के किसी
काम को भी हाथ नहीं लगाती और ना ही अपने बच्चों की ठीक से देखरेख करती। बलदेव भी
अब प्रज्ञा को ही ज्यादा प्यार करता तो वहीं पूजा सारा दिन घर का काम करती। दोनों
बच्चों का भी ध्यान रखती साथ ही घर में मां पार्वती की भी पूजा अर्चना करती। दरअसल
पूजा मां पार्वती की बड़ी भक्त थी। जो हर रोज सुबह उठकर सुबह सबसे पहले उनकी ही
पूजा करती। एक रोज मां पार्वती कैलाश में ध्यान में बैठी मन ही मन मुस्कुरा रही
थी। तभी भगवान शिव वहां आए। क्या बात है देवी? आपके मुख पर एक पल में हंसी और एक पल में चिंता। आखिर ऐसी
क्या बात है? स्वामी पृथ्वी
लोक पर एक प्रज्ञा नाम की स्त्री को झूठा अभिमान हो रखा है। वो यह बिल्कुल ही भूल
गई है कि बुरे कर्मों का फल बुरा ही होता है। वो मेरी परम भक्त पूजा को बहुत
प्रताड़ित करती है। यहां तक कि वो अपनी संतान तक का ध्यान भी नहीं रखती। उनकी
देखभाल भी पूजा ही करती है। अगर ऐसी बात है देवी तो फिर आप अपने भक्त को चिंता में
देखकर मुस्कुरा क्यों रही हैं? स्वामी मैं यह सोच कर मुस्कुरा रही हूं कि खुद को बड़ा
समझने वाला इंसान कितनी बड़ी गलती करता रहता है।
इस बात का बोध उसे
खुद ही नहीं रहता। जबकि वो अच्छे से जानता है कि बुरे कर्मों का फल हमेशा बुरा ही
होता है। यह कहकर दोनों धरती लोक पर उनके घर की ओर देखने लगते हैं। जहां धरती लोक
पर प्रज्ञा सोकर उठती है और जोर-जोर से पूजा को आवाज लगाने लगती है। पूजा दीदी
पूजा दीदी बस आ गई प्रज्ञा। वो बच्चों को खाना खिला रही थी। क्या हुआ? कुछ चाहिए क्या? आप अच्छे से जानती है ना
जब तक मुझे बिस्तर पर चाय ना मिले मेरी आंख नहीं खुलती। पूजा जल्दी से चाय लेकर आई
जिसे पीते ही हम इतनी घटिया चाय बनाई है ना इलायची है ना अदरक। सुबह-सुबह मेरा
सारा मूड खराब कर दिया। जाओ अब मेरे लिए दूसरी बढ़िया सी चाय बनाकर लाओ। पूजा फिर
से रसोई में जाती है और चाय बनाकर ले आती है। जिसे पीने के बाद प्रज्ञा बिस्तर से
उतरती है और नहाकर अपने साथ श्रृंगार में लग जाती है। एक रोज सुनिए आपने कहा था आप
मुझे दो नई साड़ियां और चूड़ी दिलवाएंगे मेले से। हां हां जो चाहिए वो ले लेना।
चलो अब और हां पूजा तुम दोनों बच्चों का ध्यान रखना।
हम शाम तक लौट
आएंगे। पूजा बेचारी घर के कामों में लग जाती है। साथ ही दोनों बच्चों को भी
संभालती। ऐसे ही समय बीता और अब अंश और वंश दोनों बच्चे 8 साल के हो गए। लेकिन वो
दोनों ही प्रज्ञा से ज्यादा पूजा के करीब थे। एक रोज पूजा को बुखार था इसलिए घर के
काम निपटाकर वो आराम करने चली गई। तभी प्रज्ञा उसके कमरे में आई। ये क्या? तुम यहां आराम कर रही हो? शाम को दूसरे गांव से
मेरी चचेरी बहनें आ रही हैं। मुझसे मिलने तो उनके लिए खाने में कुछ अच्छे पकवान
बना लेना। लेकिन मुझे तेज बुखार है प्रज्ञा। आज रहने दो। तुम उन्हें एक-दो दिन बाद
बुला लेना। अच्छा तो महारानी की तबीयत खराब हो रही है। बड़े अच्छे बहाने बना लेती
हो। चलो अभी उठकर पकवान की तैयारी करो। इससे पहले कि मेहमान घर में आ जाए। मम्मी
तुम्हें दिख नहीं रहा क्या?
बड़ी मां की तबीयत
खराब है। हां उन्हें आराम करने दो। ऐ ज्यादा टीर टर की ना तो एक थप्पड़ लगाऊंगी
दोनों को। समझे? आए बड़ी मां के
चमचे। हम नहीं उन्हें कुछ मत बोलो। मैं मैं भी रसोई में जाकर तैयारी करती हूं।
दोनों बच्चे अपनी बड़ी मां का दुख देखकर मां पार्वती से प्रार्थना करने लगे। देवी
मां हमारी बड़ी मां आपको रोज पूजा करती है। सबका कितना ध्यान भी रखती है। फिर भी
गंदी मां उनको इतना सताती है। आप बड़ी मां के दुख कम क्यों नहीं करती? कैलाश में बैठे भोलेनाथ
मां पार्वती से कहते हैं। देवी अब तो बता दीजिए कि आप अपने इस भक्त की मदद क्यों
नहीं करती? प्रभु आप तो
अंतर्यामी हैं। भला आपसे क्या ही छुपाए। लेकिन आप पूछते हैं तो बता देती हूं।
दरअसल पिछले जन्म में पूजा प्रज्ञा की सास थी और वो प्रज्ञा
को बहुत तड़पाती थी और प्रज्ञा उस वक्त अच्छी थी इसलिए वो दोनों ही अभी अपने पिछले
जन्म के पाप और पुण्य भुगत रही हैं। लेकिन अब बहुत ही जल्द पूजा के कष्ट दूर
होंगे। ऐसे ही नया साल आता है। नए साल पर पूजा दोनों बेटों के साथ मंदिर से लौट
रही थी। लेकिन जैसे ही वह रोड पार करने लगी, सामने से एक तेज कार आ रही थी जिसने पूजा को टक्कर मार दी
और उसे काफी चोटें आ गई। तभी मां पार्वती एक औरत का भेष बनाकर वहां आती है और उसे
जल्दी से अस्पताल ले जाती है। फिर उसकी पट्टी करवाकर व्हीलचेयर पर उसे घर लेकर आती
है। यह सब देख प्रज्ञा काफी चिंतित हो जाती है। सत्यानाश क्या जरूरत थी गाड़ी के
आगे आकर मरने की? अरे अब घर का
सारा काम कौन करेगा? एक मिनट कहीं तू
जानबूझकर उस गाड़ी के आगे तो नहीं आ गई ताकि तुझे काम ना करना पड़े? ना बाबा ना मैं तो
बिल्कुल नहीं करने वाली घर के काम। तभी उस औरत के भेष में आई मां पार्वती बोली
देखिए आप चिंता मत कीजिए।
जब तक ये ठीक नहीं
हो जाती मैं यहां रहकर इनकी देखभाल कर लूंगी और साथ में घर के सारे काम भी। आप बस
बदले में मुझे दो रोटी खाने को दे दीजिएगा। अब मां पार्वती वहीं रहकर पूजा की
देखभाल करने लगी। साथ ही घर का सारा कामकाज भी करती। उधर कैलाश में बैठे भगवान शिव
को मां पार्वती की याद सताने लगी। उन्होंने वासुनाग को देवी पार्वती के पास अपना
संदेश लेकर भेजा। वासुनाग खिड़की के रास्ते मां पार्वती से मिलने रसोई में पहुंच
जाते हैं और भोलेनाथ का संदेश देकर मां पार्वती के कहने पर वापस लौट गए। ऐसे ही एक
रोज हम तो देवी पार्वती से मिलने नहीं जा सकते। लेकिन तुम जाकर उन्हें संदेश दो कि
कल मकर संक्रांति आने वाली है और इस दिन वो अपने हाथों से हमारे लिए खिचड़ी बनाती
हैं। तो इस बार भी हमें उनके हाथों की खिचड़ी खाने का बड़ा मन है। अवश्य महादेव
वासुदेव ये संदेश मां पार्वती को देने चले जाते हैं। अरे हम यह बात कैसे भूल गए? कल तो मकर संक्रांत है।
हम अवश्य महादेव के
लिए खिचड़ी बनाकर भेजेंगे। अगले दिन अंश और वंश दोनों ही सुबह से पतंग उड़ा रहे
थे। तो वहीं मां पार्वती रसोई में खिचड़ी बनाने की तैयारी में लग जाती हैं। खिचड़ी
की महक पूरे घर में फैल जाती है। साथ ही कैलाश में बैठे भगवान शिव तक भी खुशबू
जाती है। वाह, यह महक तो हमारी
पार्वती के हाथों की खिचड़ी की है। वो वासुनाग को धरती लोक पर मां पार्वती के हाथ
की बनी खिचड़ी लेने भेज देते हैं। मां पार्वती वासुनाग के हाथों उन सबके लिए चुपके
से खिचड़ी भेज देती है। उधर खिचड़ी की महक पूरे गांव में भी फैलने लगती है। अब घरवाले
भी रसोई की तरफ खींचे चले आते हैं। साथ ही गांव के लोग भी उस खुशबू की ओर खींचे
चले आते हैं। आखिर ये किस चीज की महक है इतनी अच्छी? ऐसा कौन सा पकवान बना है? भला मकर संक्रांति का
त्यौहार खिचड़ी के बिना पूरा हो पाया है कभी? महक तो बहुत अच्छी है क्या? हमें भी खाने को मिलेगी। हां हां। क्यों नहीं।
ऐ क्या? हां हां। यहां
क्या लंगर लग रहा है? और वैसे भी इसने
खिचड़ी हम घर वालों के लिए बनाई है।
पूरे कुबे के लिए नहीं। आप चिंता मत करो मालकिन सबके लिए हो
जाएगा। अच्छा तो तेरा कहना है कि इस छोटे पतीले में बनी ये खिचड़ी सबको हो जाएगी।
चल ठीक है। सभी गांव वालों आंगन में बैठ जाओ। ये मैडम सबको भरपेट खिचड़ी खाने को
देंगी। वो सभी गांव वालों को भी खिचड़ी परोसती है। सभी गांव वाले भी उस खिचड़ी के
स्वाद में खो जाते हैं क्योंकि इतनी अच्छी खिचड़ी उन्होंने कभी खाई ही नहीं थी।
लेकिन घर वाले यह देख हैरान थे कि उस छोटे से पतीले से खिचड़ी खत्म ही नहीं होती।
फिर पूजा को समझते देर नहीं लगती और वो मां के पैरों में गिर जाती है। आप कोई
साधारण स्त्री नहीं है। हो ना हो आप जरूर मेरी मां पार्वती ही हैं। मां मुझे दर्शन
दो मां। तभी मां पार्वती उन्हें दर्शन देती है। मां पार्वती के दर्शन पाकर सभी
गांव वाले हैरान थे। मां आपने मेरी इतनी सेवा की और मैं इतनी अभागन हूं कि आपको
पहचान भी नहीं पाई। तुम मेरी परम भक्त हो और तुम्हारी रक्षा के लिए तो मुझे आना ही
था।
अब से तुम्हें किसी
चीज की कमी नहीं होगी। यह कहकर मां पार्वती अंतर्ध्य हो जाती हैं। प्रज्ञा और
बलदेव को भी अपनी गलती का एहसास होता है और वह भी पूजा से माफी मांगते हैं। उस दिन
के बाद पूजा के सारे दुख दर्द दूर हो गए और वह अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने
लगी।
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