धर्मपुर गांव में रहने वाला रामधन एक बेहद गरीब किसान था। इस बार उसने गांव के सेठ से उधार लेकर खेती की थी। मौसम अच्छा रहा और खेतों में पहली बार फसल बहुत अच्छी आई थी। पूरे परिवार में एक उम्मीद जाग उठी थी। देखो सुनीता इस बार कितनी अच्छी फसल हुई है। भगवान ने हमारी सुन ली। लगता है अब बच्चों को भूखा नहीं सोना पड़ेगा। हां रामधन इस बार मेहनत रंग लाई है। अब अगर फसल सही सलामत कट गई तो कुछ महीनों का चैन मिल जाएगा। पिताजी क्या इस बार हम स्कूल जा पाएंगे? जरूर बेटा। अब तो तुझे अच्छे कपड़े और किताबें भी दिलवाऊंगा। पिताजी मेरे लिए क्या लाओगे? बोलो ना पिताजी। तेरे लिए गुड़िया और नई चूड़ियां लाऊंगा। लेकिन शायद किस्मत को ये मुस्कानें राज नहीं आई। शाम ढलते ही आसमान पर काले बादल गिर गए और तेज आंधी के साथ मुस्कान बननी शुरू हो गई। रामधन जल्दी चलो। खेत में पानी भरने लगा है। हे भगवान कहीं सब कुछ ना बह जाए। रामधन भाग कर खेत पहुंचा। वहां का दृश्य देखकर उसका दिल बैठ गया। खेत पूरा पानी में भर चुका था और सारी फसल भी डूब चुकी थी। अब क्या बचा भगवान? सब कुछ खत्म हो गया। मेरी मेहनत, मेरी उम्मीद सब बह गई। अब बच्चों को क्या खिलाएंगे जी? घर में तो एक मुट्ठी अनाज भी नहीं बचा है। अगले दिन सुबह रामधन सेठ हरिराम के पास गया जिसके पास से उसने कर्जा लिया था। उसे उम्मीद थी कि शायद सेठ थोड़ा सा समय दे देगा। सेठ जी बारिश में सब कुछ बर्बाद हो गया। थोड़ी मोहलत दे दीजिए। अगली बार फसल होगी तो सारा कर्ज चुका दूंगा। तुम्हें अब कोई मोहलत नहीं मिलेगी रामधन। कागज के हिसाब से अब वो जमीन मेरी है। सेठ जी वो मेरी पुश्तैनी जमीन है। आप ऐसा मत करिए। मुझे कागज से मतलब है। भावना से नहीं। अब वो जमीन मेरे नाम है और तुम लोग तुरंत उसे खाली कर दो। रामधन की जमीन भी चली गई और उसके पास अब कुछ भी नहीं बचा था। उसके पास अब ना तो खेत था ना पैसा और ना ही कोई आसरा। सुनीता अब इस गांव में हमारे लिए कुछ नहीं बचा। चलो जंगल की ओर चलते हैं। शायद वहां कहीं इससे छुपाने की जगह मिल जाए। ठीक है रामधन। अब जैसी तुम्हारी मर्जी। और इसी के साथ एक गरीब किसान अपने टूटे सपनों को समेटे अपने परिवार को लेकर निकल पड़ा। अनजाने अंधेरे की ओर। सेठ ने उन्हें जमीन से भी निकाल दिया था और अब उनके पास ना घर का ठिकाना था ना ही खाने के लिए कुछ था। रामधन का परिवार एक बार फिर सड़क पर था। बारिश अब रुक चुकी थी। लेकिन उनके जीवन की बरसात थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। चलो सुनीता अब पीछे मत देखो। जो हो गया उसे सोचने से कुछ नहीं होगा। अब घर नहीं बचा सुनीता। बस जिम्मेदारी बची है इन बच्चों की। इन्हें भूखा नहीं सोने दूंगा। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। पिताजी अब हम कहां जाएंगे? बेटा अभी हम एक जगह चल रहे हैं। वहां शायद कोई बूढ़े बाबा रहते हैं जंगल के किनारे पर। सुना है वो अच्छे इंसान हैं। मुझे बहुत भूख लगी है बाबू। मुझे खाना चाहिए। थोड़ा और चल ले बेटा। वहां पहुंचते ही कुछ इंतजाम कर लेंगे। रामधन का परिवार गांव से बाहर निकल कर जंगल की ओर बढ़ गया। उन्हें दूर से ही एक टूटी हुई कुटिया दिखाई दी। पास जाने पर देखा वहां पर एक बूढ़ा साधु अपनी धुनी रमाए बैठा था। बाबा प्रणाम। हम लोग बहुत मुसीबत में हैं। हमारे पास अब कुछ भी नहीं बचा। बेटा तुम्हारे चेहरे पर ईमानदारी दिख रही है। तुम चाहो तो इस कुटिया में रह सकते हो। कुछ ज्यादा नहीं है लेकिन सिर छुपाने की जगह मिल जाएगी। आपका धन्यवान बाबा। भगवान आपको सुख दे। अब वही टूटी कुटिया उनका नया ठिकाना बन गई थी। अगले दिन सुबह रामधन जंगल में लकड़ी काटने निकला ताकि बाजार में उसे बेचकर कुछ पैसे मिल जाए। सुनीता मैं जंगल जा रहा हूं। लकड़ियां काट कर लाऊंगा। फिर उसे बेचकर कुछ सब्जी लाएंगे बच्चों के लिए। जल्दी लौट आना। खाना भी बनाना है और बच्चों को भी कुछ खिलाना है। जी। रामधन दिनभर जंगल में पसीना बहाकर लकड़ियां काटता रहा और शाम होते ही उन्हें लेकर बाजार की ओर गया। वहां उसे बहुत कम पैसे मिले। पर उसने कुछ आलू, प्याज और थोड़ा सा आटा खरीद लिया। ये लो सुनीता। कुछ खाने का सामान लाया हूं। कुछ खास तो नहीं है लेकिन बच्चों का पेट तो भर जाएगा। तुमने इतना सब किया रामधन। अब तुम हाथ मुंह धोकर बैठो तो मैं तुम्हारे लिए भी रोटियां सेक देती हूं। मां क्या आज गुड़ नहीं आया? आज नहीं बिटिया लेकिन हम कल जरूर से गुड़ लेकर आ जाएंगे। रात को सभी ने सूखी रोटियों के साथ उबली सब्जी खाई और पहली बार किसी को भी कोई शिकायत नहीं थी। सबकी आंखों में थकान थी। लेकिन उस थकान में भी एक उम्मीद छिपी थी। अब हर दिन ऐसा ही होगा। मैं मेहनत करूंगा और हम सब मिलकर आगे बढ़ेंगे। हमारे पास कुछ भी नहीं है। लेकिन हम एक साथ हैं। यही सबसे बड़ी बात है। कठिनाइयों का पहाड़ उनके सामने खड़ा था। लेकिन रामधन ने हार नहीं मानी। उसका सफर अभी लंबा था। लेकिन उसका इरादा सटीक था। रामधन अब रोज जंगल जाकर लकड़ियां काटता और शाम तक उसे बाजार में बेचकर जो भी मिलता उससे राशन लाता। बच्चों की आंखों में अभी भूख दिखती थी लेकिन वो अब शिकायत नहीं करते थे। परिवार के लिए संघर्ष अब उनकी आदत बन गई थी। सुनिए जी जल्दी लौट आइएगा। कल बहुत देर हो गई थी और बिटिया आपके बिना ही सो गई थी। हां सुनीता जल्दी लौटूंगा। आज थोड़ी ज्यादा लकड़ियां लाऊंगा ताकि कुछ पैसे ज्यादा मिल जाए। पिताजी आज क्या गुड़ भी लाएंगे? जरूर बेटा इस बार तेरे लिए गुड़ भी और मां के लिए एक साड़ी का सपना भी लेकर आऊंगा। और मेरे लिए चूड़ियां। तुम्हारे लिए सबसे सुंदर चूड़ियां बिटिया। बस भगवान थोड़ा साथ दे। रामधन मुस्कुराते हुए जंगल की ओर निकल पड़ा। लेकिन आज वो हर रोज से थोड़ा आगे निकल गया। वो सोच रहा था कि जितना ज्यादा लकड़ी मिलेगा उतना ज्यादा ही अच्छा होगा। आज ज्यादा लकड़ी चाहिए। ज्यादा लकड़ी मतलब ज्यादा पैसा। ज्यादा पैसा मतलब सबके चेहरे पर खुशी। पेड़ों की गहराइयों में वो इतना आगे निकल गया कि उसे पता ही नहीं चला कि वो कहां पहुंच गया है। दूर तक सिर्फ जंगल ही जंगल था। वहां पर कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। नहीं कोई आवाज थी। अरे यह कौन सी जगह है? यह रास्ता तो रोज वाला नहीं लगता। लगता है कहीं गलत दिशा में आ गया। वो इधर-उधर देखने लगा लेकिन उसे कोई दिशा समझ नहीं आ रही थी। आसमान में बादल घेरने लगे थे और हल्की सी बारिश भी शुरू हो गई थी। हे भगवान अब क्या करूं? जिस दिशा से आया था वो भी भूल गया। अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। उधर झोपड़ी में सुनीता बार-बार जंगल की ओर देख रही थी। सूरज ढल चुका था लेकिन रामधन नहीं लौटा। आज बहुत देर हो गई है। अब तक तो वो रोज लौट आते हैं। आज इतनी देर क्यों हो गई है? मां पिताजी को कुछ हो तो नहीं गया। ऐसा मत बोल बेटा। वो ठीक होंगे। बस शायद ज्यादा दूर तक निकल गए होंगे। मुझे डर लग रहा है मां। उधर रामधन थक कर एक पत्थर पर बैठ गया। उसकी आंखें नम हो गई। लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटाई और आगे बढ़ा। तभी एक छोटी सी रोशनी दिखाई दी। वो क्या है? वहां कोई घर जैसा दिख रहा है या फिर कोई आग जला रहा है? चलो देखता हूं। वो उस रोशनी की ओर बढ़ा और उसे एक अजीब सी गुफा दिखाई दी। जिसमें से पीली सी चमक आ रही थी। वो थोड़ा घबराया लेकिन फिर अंदर गया। यह कैसी जगह है? सब कुछ सुनसान है। लेकिन यहां रोशनी कैसी? गुफा के अंदर वो जैसे ही आगे बढ़ा, उसे सामने एक अलग ही दुनिया दिखाई दी। वो एक गांव जैसा था। लेकिन वहां कोई इंसान नहीं था। पूरा गांव सोने के जैसा चमक रहा था। यह तो कोई सपना लग रहा है। मगर मैं तो जाग रहा हूं। फिर यह क्या है? अचानक दो सिपाही आए और रामधन से बोले तुम कौन हो और यहां कैसे आए? मेरा नाम रामधन है। मैं गरीब किसान हूं। रास्ता भटक गया हूं। राजा के पास चलो। वो तुमसे मिलना चाहते हैं। रामधन डरते हुए उनके साथ महल की ओर चल पड़ा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब उसके साथ क्या होने वाला है। रामधन डर और हैरानी के बीच आगे बढ़ रहा था। सोने जैसे इस गांव में कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन यह जगह किसी सपने जैसी लग रही थी। मैं कहीं सपना तो नहीं देख रहा हूं। सब कुछ इतना चमकदार कैसे है? और यह लोग कौन हैं? सिपाही उसे महल के मुख्य दरवाजे तक ले गए। वहां अंदर से एक तेज और गंभीर आवाज आई। उसे भीतर ले आओ। रामधन अंदर गया तो सामने एक ऊंचे आसन पर एक वृद्ध राजा बैठे थे। जिनके चेहरे पर तेज और आंखों में करुणा थी। बताओ कौन हो तुम? और यहां कैसे आए? महाराज, मेरा नाम रामधन है। मैं एक गरीब किसान हूं। बारिश में मेरी सारी फसल बह गई। सेठ ने मेरी जमीन छीन ली और अब मैं जंगल से लकड़ी काटकर अपने बच्चों का पेट पालता हूं। आज रास्ता भटक गया तो यह गुफा दिखी। तुम्हारी बातों में सच्चाई दिखती है रामधन। तुम्हारा संघर्ष तुम्हारी आंखों में साफ दिखाई देता है। महाराज हम तो बस दो रोटी के लिए मेहनत करते हैं। हम गरीबों का तो कोई सहारा नहीं होता। तुम जैसे लोग ही असली राजा होते हैं रामधन जो बिना शिकायत के परिवार को बचाने के लिए लड़ते हैं। राजा ने पास खड़े सिपाही को इशारा किया और एक छोटी सी तिजोरी मंगवाई। रामधन ये लो कुछ सोने के सिक्के। इन्हें अपने पास रख लो और अपने घर जाओ। अपने बच्चों के लिए कुछ खाना और कपड़े लाओ और एक नई शुरुआत करो। महाराज, मैं यह नहीं ले सकता। हम गरीब हैं, लेकिन मेहनती हैं। यह मेहनत का ही इनाम है। अगर यह तुम जैसे ईमानदार आदमी को नहीं दूंगा, तो किसे दूंगा? रामधन की आंखों में आंसू आ गए। वो झुककर राजा के चरणों में गया। आपने तो जैसे मेरी जिंदगी बदल दी महाराज, अब मैं अपने बच्चों को भूखा नहीं रखूंगा। जाओ रामधन, लेकिन याद रखना यह गांव सिर्फ उन्हीं को दिखाई देता है जो सच्चे दिल से मेहनत करता है और अपने स्वार्थ से ऊपर होते हैं। अगली सुबह रामधन इन सिक्कों को लेकर बाजार में गया। वहां से उसने खूब सारा राशन लिया। बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे और सुनीता के लिए एक रंगीन साड़ी खरीदी। आज दिल से सुकून मिला सुनीता। बच्चों के चेहरे पर जो मुस्कान देखी है वो सब कुछ भूल जाने जैसी है। अब लगता है जैसे हमारा भाग्य सच में बदल गया है। लेकिन इन सिक्कों से कर्ज चुकाना भी जरूरी है जी। रामधन उसी दिन सीधा सेठ हरिराम के घर पर गया। उसके हाथ में सिक्कों से भरी थैली थी। सेठ जी ये लीजिए आपका कर्जा। पूरा चुका रहा हूं। एक-एक सिक्का मेहनत से आया है। रामधन, यह सब कैसे हुआ? अचानक तू इतना अमीर कैसे हो गया? कहीं चोरी तो नहीं की? सेठ जी, मैं गरीब हूं लेकिन चोर नहीं, मेहनत की है और भगवान की दया से यह मिला है। तू यह सब कहानी मुझे मत सुना। अब अगर तुझे कर्ज चुकाना ही था, तो पहले क्यों नहीं चुकाया? अब चुका दिया सेठ जी। और अब आप मेरी जमीन के कागज भी लौटा दीजिए। सेठ को शक था लेकिन सामने सोने के सिक्के दिखकर वह चुप हो गया। जमीन के कागज लौट आए और रामधन वहां से निकल गया। पिताजी अब क्या हम फिर से उसी खेत में काम करेंगे? हां बेटा। अब वो खेत फिर से हमारा है। अब हम उसमें मेहनत करेंगे। लेकिन एक और सपना भी है। सपना कैसा? मैं बस सिर्फ खेती नहीं करूंगा। लकड़ी बेचने का छोटा कारोबार भी शुरू करूंगा। जंगल से लकड़ी लाऊंगा और गांव में बेचूंगा। रामधन ने दो दिन में लकड़ी बेचने का एक ठेला बनवाया और अब हर सुबह जंगल जाता और शाम को बाजार में बेचकर लकड़ियों को घर पर लौटता। धीरे-धीरे उसके पास पैसा भी बढ़ने लगा और गांव वाले भी अब उसे सम्मान की नजर से देखने लगे। देखो राम धन अब अमीर हो गया। लगता है भगवान की कुछ खास कृपा हुई है इस पर। लेकिन सेठ हरिराम को चैन नहीं पड़ा। वो रोज सोचता कि आखिर रामधन के पास अचानक इतना धन कहां से आ गया है। उसने ठान लिया था कि अब वो इस रहस्य का पता लगा कर ही रहेगा। रामधन अब मैं चुपचाप नहीं रहूंगा। मुझे भी देखना है यह पैसा आया कहां से। जरूर कोई राज है। एक दिन रामधन फिर से लकड़ी लेने जंगल गया और उसी रास्ते पर चला गया जिससे गुफा की ओर जाया जाता था। लेकिन पीछे-पीछे सेठ भी छिपकर उसके पीछे आने लगा। आज फिर उसी रास्ते से जाऊंगा। राजा जी को धन्यवाद तो देना ही है। तो यही है रास्ता। तू यहीं से गया था। अब तो मैं भी तेरे पीछेछे चलूंगा। देखता हूं क्या खेल है। कुछ ही दूर पर वो गुफा होगी अब। गुफा कहां है? दिखाई क्यों नहीं दे रही? लगता है किसी रहस्य में छुपा है सब। वो रही मेरी गुफा। वही जगह जहां मेरी तकदीर पलटी। तो तू यहीं आया था। अब मैं भी आऊंगा और जितना सोना मिलेगा सब मेरा होगा। हे भगवान बस एक बार फिर उस राजा से मिलना हो जाए। अब तेरा भगवान नहीं मेरा दिमाग चलेगा। मैं चुपचाप देखूंगा। तू क्या करता है? राजा जी क्या आप सुन रहे हैं? मैं फिर से आया हूं। किससे बात कर रहा है यह? कोई है क्या भीतर? कौन हो तुम? मैं रामधन हूं। राजा जी से मिलना है। यह आवाज कहां से आई? अंदर कोई सच में है। अंदर आओ। राजा जी तुम्हारी ही राह देख रहे हैं। हैं? यह लोग तो इसे जानते हैं पहले से। यह जरूर कोई बड़ा राज है। मैं बहुत आभारी हूं राजा जी का। उन्होंने मेरे जीवन को रोशनी दी। अब बहुत देख लिया। अब मेरी बारी है। सेठ धीरे से गुफा की ओर बढ़ा। जैसे ही वह अंदर जाने लगा, एक तेज चमक प्रकट हुई और चारों ओर अंधेरा छा गया। रुको। कौन हो तुम? मैं सेठ हरिराम हूं। मुझे भी राजा से मिलना है। तुम्हारे अंदर लालच की गंध है। राजा ऐसे लोगों से नहीं मिलते। मैं जानता हूं राम धन को यह सब कैसे मिला। उसे उसकी ईमानदारी ने दिया और तुम्हें तुम्हारा लालच यहां से दूर ले जाएगा। नहीं, मैं भी वही चाहता हूं जो उसे मिला। तुमने गरीबों की जमीन छीनी और अब उसे भी छीनना चाहते हो। यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। राजा के आदेश पर तुम्हें बंदी बनाया जाता है। नहीं, यह अन्याय है। मैं कुछ नहीं कर रहा था। तुम्हारी सजा तुम्हारे कर्मों से तय हुई है। सेठ को सैनिक पकड़ कर अंधेरे में ले गए और गुफा फिर से शांत हो गई। राजा जी, आपने इंसाफ किया। वो आदमी दूसरों की तकदीर चुराता था और तुम दूसरों के लिए मेहनत करते हो। जाओ रामधन अब तुम अपने जीवन में हमेशा सुरक्षित रहोगे। धन्यवाद राजा जी। मैं कभी आपके विश्वास को नहीं तोडूंगा। रामधन गुफा से बाहर निकला और अब उसके चेहरे पर संतोष था। लेकिन साथ ही मन में एक सवाल भी था। क्या यह रहस्य कभी किसी और को भी दिखेगा या सिर्फ उन्हीं को जिनका दिल सच्चा होता है? अब्रामधन के पास सब कुछ था। लेकिन वो फिर भी उसी सादगी से जीता रहा। आज सब कुछ साफ हो गया। सेठ का लालच उसका अंत बना और ईमानदारी मेरी ताकत। तुम आज जल्दी लौट आए जी। सब ठीक तो है ना? सब ठीक है सुनीता। अब कोई डर नहीं रहा। राजा जी ने सब देख लिया और न्याय भी दिया। पिताजी सेठ कहां गया अब? जहां ऐसे लोगों को जाना चाहिए। वहां गया बेटा। अब क्या करने का सोच रहे हो आप? अब गांव में छोटा सा व्यापार शुरू करूंगा। लकड़ी और कोयले का एक गोदाम खोलूंगा और गांव के लोगों को भी काम दूंगा। अगले दिन से रामधन ने एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली। कुछ लकड़ियां जंगल से लाकर वहां पर बेचना शुरू किया। लोगों को अच्छा सामान मिला और रामधन को मेहनत की इज्जत मिलने लगी। राम धन भाई तुम्हारा माल तो बढ़िया होता है। अब हमें बाहर नहीं जाना पड़ता और भाव भी ठीक देते हो। दिल से व्यापार करते हो। हम तो सबके हैं भाई। जब हम भूखे थे तब भी गांव हमारे साथ था। अब हम थोड़ा कुछ कर सकें तो वही सबसे बड़ी बात है। गांव में अब लोग रामधन को सम्मान से देखने लगे। जो कभी सबसे नीचे था। अब सबसे ऊपर बैठा करता था लेकिन फिर भी जमीन से जुड़ा हुआ था। तुमने सब कुछ सच में संभाल लिया रामधन। मैं बहुत खुश हूं तुम्हारे लिए। नहीं सुनीता भगवान ने हम पर भरोसा किया और हमने उस भरोसे को निभा दिया। कोई है बाहर देखूं। इस वक्त कौन हो सकता है? जी। कौन है भाई? रामधन जी आप ही हैं। हां कहिए। मैं राजा जी का दूत हूं। उन्होंने आपको एक संदेश भेजा है। राजा जी का संदेश मेरे लिए। हां, उन्होंने आपको बुलाया है। उन्हें आपसे कुछ खास बात करनी है। किस लिए बुलाया है? क्या बात हुई है? सब ठीक तो है ना? मुझे बस इतना कहा गया है कि राम धन को तुरंत लेकर आना है। ठीक है। मैं सुबह चलता हूं। नहीं आप अभी चलिए। मैं साथ हूं। रास्ता सुरक्षित है। ठीक है। बच्चों का ध्यान रखना सुनीता। पिताजी जल्दी लौट आना। रामधन बिना सवाल किए दूध के साथ निकल पड़ा। रात के अंधेरे में उसकी चाल धीमी थी। लेकिन मन में विश्वास था। राजा जी इंतजार कर रहे हैं। अंदर आइए। राजा जी ने रात में बुलाया है। जरूर कोई जरूरी बात होगी। आओ रामधन बैठो। प्रणाम महाराज आपने मुझे याद किया। रामधन हम कई दिनों से देख रहे हैं। तुमने जिस तरह से जिंदगी को फिर से खड़ा किया है वह बहुत प्रेरणादायक है। महाराज आपने जिस दिन मदद की उसी दिन मेरी किस्मत बदली। हमारे पास अब ज्यादा उम्र नहीं बची और कोई वारिस भी नहीं है। हम चाहते हैं कि तुम हमारे उत्तरधिकारी बनो। मैं राजगद्दी पर बैठूं। यह कैसे संभव है? हमने तुम्हारे व्यवहार, ईमानदारी और परिश्रम को परखा है। और यही गुण एक सच्चे राजा में होने चाहिए। मुझे सोचने का समय दीजिए महाराज। तुम्हें कल सुबह तक का समय देते हैं। फैसला सोच समझ कर लेना। रामधन महल से बाहर निकला। उसके मन में सवालों की बाढ़ थी। लेकिन साथ ही एक नई उम्मीद भी थी। रामधन क्या फैसला किया तुमने? महाराज मैं रात भर सोचता रहा। यह गद्दी एक जिम्मेदारी है। मैंने कभी इसका सपनों में भी नहीं सोचा था। लेकिन अगर आप मुझे योग्य मानते हैं तो मैं यह जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं। तुम्हारा यह उत्तर ही साबित करता है कि तुम इसके लायक हो। मैं वादा करता हूं कि मैं हमेशा गरीबों के साथ खड़ा रहूंगा। किसी के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। महाराज रामधन को राजसी वस्त्र पहनाए जाएं। रामधन को नया वस्त्र पहनाया गया। उसके माथे पर राजतिलक किया गया और उसे सिंहासन पर बैठाया गया। रामधन क्या यह सच में सपना है? नहीं सुनीता यह भगवान की मर्जी है। अब हम भूखे नहीं सोएंगे बल्कि दूसरों की भूख मिटाने की जिम्मेदारी लेंगे। अब मैं राजा का बेटा हूं। नहीं बेटा तुम जनता के सेवक के बेटे हो। हम राजा नहीं सेवक बनकर जिएंगे। धर्मपुर गांव के उसी गरीब किसान ने जो बारिश में सब कुछ खो चुका था। आज अपने संघर्ष से राजमहल तक का सफर तय किया था उसने। जिस राजा ने लकड़ी काटकर बच्चों को पाला वही सही मायनों में जनता का राजा होता है। रामधन ने ना तो अमीरी को घमंड बनने दिया ना गरीबी को शर्म। उसने हर परिस्थिति को स्वीकार किया और मेहनत से अपनी तकदीर लिख दी।
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