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संतोष की शक्ति

      एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक युवक रहता था। गाँव का नाम माधवपुर था। चारों ओर हरे-भरे खेत , मिट्टी की पगडंडियाँ , आम और पीपल के पेड़ तथा दूर तक फैली पहाड़ियों ने उस गाँव को बहुत सुंदर बना दिया था। राघव का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। परिवार के पास थोड़ी-सी जमीन थी , जिससे किसी तरह पूरे साल का खर्च चलता था। राघव बचपन से ही मेहनती और समझदार था , लेकिन उसके मन में एक कमी थी। वह अपनी जिंदगी से कभी संतुष्ट नहीं रहता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास दूसरों की तुलना में बहुत कम है। गाँव में किसी के पास नया घर होता तो उसे अपना घर छोटा लगता , किसी के पास बैलगाड़ी होती तो वह अपने पिता की पुरानी साइकिल को देखकर दुखी हो जाता और जब किसी के पास अधिक पैसा होता तो उसे लगता कि उसका जीवन बेकार है।   राघव की माँ अक्सर उसे समझाती थीं , “ बेटा , जीवन में मेहनत करना बहुत जरूरी है , लेकिन जो कुछ हमारे पास है उसकी कद्र करना भी उतना ही जरूरी है। अगर मन में संतोष नहीं होगा तो दुनिया की सारी दौलत भी कम लगेगी।” राघव माँ की बात सुन ...

जगन्नाथ परिवार की दिव्य लीला

 आधा दिन निकल गया। शाम होने को है। अब इसके मौन व्रत को तोड़ने कुछ बड़ा करना होगा। अभी करता हूं। ओ अब क्या करूं? ये क्या? धन्यवाद। ये मधुमक्खियां वहां क्या कर रही हैं? ये पेड़ काटेंगे तो सीधा जाकर बलराम के सर पर गिरेगा। इतना दर्द होगा कि उसका मौन व्रत जरूर टूटेगा। अरे ये सब डर के क्यों भाग रहे हैं? प्रणाम। भैया आपने बलराम को बचाया। धन्यवाद। जिसके साथ जगन्नाथ हो, उस भक्त का साथ सारी सृष्टि देती है। तुम भले ही उसकी मदद ना कर सके, पर हम में से कोई भी उसका व्रत नहीं टूटने देंगे। अब तो इस बलदाम का व्रत तोड़ के रहूंगी। मेरी प्यारी सुभद्रा अब क्या करें? उसका व्रत तो नहीं टूटा।

 उसका व्रत तो तुड़वा के ही रहूंगी मैं। अब हमें कुछ और करना होगा। क्या कुछ जो बलराम के लिए अपने जगन्नाथ प्रभु से भी ज्यादा जरूरी हो। ऐसा कुछ है क्या? हां है। बलराम बलराम वो डाकू वो डाकू। हां वो मंदिर में चोरी करने आए थे। तेरे मां-बा ने उन्हें रोका तो वो उनको उठाकर ले गए। जल्दी जल्दी चल। लेकिन मां बाबा ये बलराम का मौन टूट गया टूट गया बलराम का मौन अरे ये तो मोर बाबा के सिर्फ पुतले कैसे बुद्धू बनाया इस बोंदू बलराम को टूट गया टूट गया का टूट गया नहीं टूटा क्योंकि सूर्यास्त हो चुका है और मौन व्रत सूर्यास्त तक ही करना था बलराम को पर सूर्यास्त हुआ कैसे अभी तो कितना समय शेष है ये असंभव संभव है।

प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों के लिए असंभव को संभव कर ही देते हैं। बलराम ने सच्चे मन से मौन व्रत किया और उसका मौन व्रत भी धोखे से तोड़ा तुम लोगों ने। इसीलिए प्रभु जगन्नाथ ने ही चमत्कार किया है। नहीं नहीं हमने कुछ नहीं किया। चुप करो। मैंने स्वयं देखा था तुम्हें बलराम के घर से जंबो और सोमनाथ के कपड़े चुराते हुए। आएगा जब बलराम का मन टूटेगा। देव जानी मजाक की भी एक सीमा होती है। इस बार तुमने हद पार कर दी। अब तुम चारों को दंड मिलेगा। बटू मटरू ये दोनों छोटे हैं पर तुम तो बड़े हो। तुम भी इनके कहे में आ गए। महाराज राजकुमारी की बात कैसे टालते? उनका आदेश कैसे ना मानते? महाराज क्षमा करें। मेरा मन व्रत टूट गया। नहीं बलराम यह सारी सृष्टि और इसके सारे नियम, कायदे, सिद्धांत सब भगवान की इच्छा से चलते हैं। जब जगन्नाथ भगवान ने तुम्हारा व्रत पूरा करने के लिए सूर्य को अस्त कर दिया तो हम कौन होते हैं तुम्हारे व्रत को अधूरा समझने वाले? चलो बलराम।

 मंदिर में तुम्हारे व्रत की विधि पूर्ण करनी है। सैनिकों इन चारों को ले जाकर महल में नजरबंदी में रखो। जब तक मैं ना कहूं इनका घर से बाहर निकलना मना है। ये हुई ना बात। इसी के साथ तुम्हारा मौन व्रत संपूर्ण हुआ। ये लो प्रभु का प्रसाद। जय जगन्नाथ। अकेले-अकेले खाएगा। मुझे भी खिला जगन तूने ये सही नहीं किया। मैंने तुझे मना किया था ना मेरी मदद मत करना। मेरा व्रत भी टूट गया और तू भी शर्त हार गया। अरे मैंने तेरी कोई मदद नहीं की। झूठ मत बोल। वो मधुमक्खी देवजानी का पत्थर गटरूम मटरू को डराना मेरी आंखें बंद थी पर कान तो खुले थे और फिर वो सूर्यास्त करना वो सब लक्ष्मी जी दाऊ भैया और सुभद्रा ने किया और सच कह रहा हूं सूर्यदेव भी खुद अपने आप अस्त हुए मैं तो खुद चकित हो गया था पर जैसा कि मेरे भैया ने कहा मेरे भक्तों की रक्षा मैं चाहे करूं या ना करूं वो सुरक्षित हो ही जाते हैं। रो नहीं। यह पहली बार नहीं हुआ। रामायण और महाभारत तक में सूर्य देवता जैसे कईयों ने मेरे भक्तों का साथ दिया है।

 बलराम सच्चे भक्त से कोई नियम टूट भी जाए तो मैं जानता हूं उससे भक्त की भक्ति में कोई कमी नहीं आती। और कभी-कभी भगवान को भी लीलाएं करनी पड़ती हैं। समझा बुद्धू भक्त मेरा। समझ गया मेरे लीलाधर भगवान समझ गया। अब मेरा प्रसाद दो। नहीं दूंगा। अरे बड़े पंडा जी देखिए ना ये बहरूपिया बलराम बनकर पूरी में घूम रहा है। पता नहीं कौन है ये। तो हमें क्या करना चाहिए? इसे यहां मंदिर में आने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। तुम जो भी हो चले जाओ यहां से। वरना मैं सेनापति जी को बता दूंगा। ठीक है। जब मेरे माता-पिता, मेरे मित्र, मेरा जगन सबकी खुशी तुम्हारे साथ होने में ही है तो मैं यहां से चला जाता हूं। चतुर्भुजो जगन्नाथ कंठ शोभित कौस्तुभ पद्मनाभो वेद गर्वस चंद्र सूर्य विलोचना जगन तू आ गया। हां। और देख मैं किसे साथ लाया हूं। ये वो हैं जो मेरे हृदय में सबसे उच्च स्थान पर रहते हैं।

 ये मेरे महादेव हैं। हर हर महादेव। बलराम मैं तुम्हारी निष्पाप भक्ति से अति प्रसन्न हूं। तुम्हारी भक्ति में कोई लोभ, लालसा, छल, कपट नहीं है। और इसीलिए तुम जगन्नाथ प्रभु के परम भक्तों में गिने जाओगे। तुम्हारी भक्ति प्रेरणादायक होगी और युगों तक तुम्हारी भक्ति भाव का उदाहरण दिया जाएगा। तू सब जानता था हम जेह ना कृपा करे पुरारी सो ना पावा मुनि भगति हमारी महादेव की कृपा से ही नारायण की परम भक्ति प्राप्त होती है बलराम और अब तुम पर उनकी पूर्ण कृपा है मैंने सिंहासन पर फतह पाली। कांटे कांटे मेरे पीठ पीछे कांटे घुस गए। आय रे कुछ भी तो नहीं है। लगता है हुजूर के दिमाग में कांटे घुस गए हैं।

 सारा द्वीप ढूंढ लिया पर पीने का पानी कहीं नहीं मिला। अच्छा तो ये समस्या है। पर तूने वो पानी चख के देखा है क्या? हां ये तो बिल्कुल किसी मीठे पानी की झील जैसा मीठा है। हां ये तो ये तो मीठा पानी है। इसके पहले कि हम ये सारा पानी खत्म कर लें। भगवान को जल चढ़ा लेते हैं। अब चाहे लाख कांटे बिछा ले थकी का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। चालाकी का नाम तकी। साहब साहब बचाओ बचाओ। लगता है हुजूर पूरी तरह से पागल हो गए। बचाओ नहीं नहीं इस गर्भावग्रह में जरूर कोई राज छिपा है। मैं पता लगा कर रहूंगा। इन्हें बाहर निकालो। ये तो गटरू मटरू है। एक और साजिश ये मंदिर नहीं साजिशों की सल्तनत है। महान तकी खान के साथ इतना बड़ा मजाक।

अलाकी का नाम तकी तकिया पीसेगा चक्की। हम इनके साथ यहां रहे तो हम भी बेशक पागल हो जाएंगे। महाराज की जय हो। हम अपनी पूरी सेना के साथ पूरी आ चुके हैं। हम आक्रमण के लिए तैयार हैं। हम एक सिपाही को कंकना शिखरी द्वीप में भेजो। बड़े पंडा को लौट आने का संदेशा देने के लिए। कंटोला की सब्जी बड़ा स्वादिष्ट है। बड़े पंडा जी वो देखो राजदूत। मंदिर तो खाली है। टक्की खान के सिपाही कहां गए? महाराज हम मूर्तियां लेकर आ गए। बचाओ बचाओ महाराज दुष्ट तक्की खान से बचाओ घबराने की कोई बात नहीं कटुरू मटरू मंदिर पूरी तरह से खाली है तकक्की खान कहां है वो निहत्ता है।

 हम निहत्ते पर वार नहीं करते। मैं समझ गया जगन्नाथ की सही जगह यहां है। मुझे बस इनकी सेवा करने दो और इनकी शरण में रहने दो। तुम यहीं पूरी में रहोगे तक की और जब चाहो सिपाही तुम्हें कारागार से दर्शन के लिए मंदिर ले आएंगे। चिकुच अक्कड़ मकड़ बड़ा घुमक्कड़ किधर गया वो किधर गया ना इधर ना उधर ना इधर ना उधर अरे किधर गया वो किधर संकट भागे तुम दबा के जब वो साथ हो है ना कोई उसके जैसा ऐसा यार वो नुस्खे हैं अनोखे उसकी ही बातों में प्यार की ऐसी झलकी उसकी आंखों में जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ चिकड़े मकड़ बड़ा घुमा किधर गया वो किधर

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