Skip to main content

दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

गरीब की भक्ति की कहानी

एक समय की बात है हनुमानगंज नाम का एक गांव था उस गांव में त्रिलोकीनाथ नाम का एक व्यक्ति रहता था उसका इस दुनिया में कोई ना था सिवाय हनुमान जी के त्रिलोकीनाथ हनुमान जी का बहुत बड़ा भक्त था वह रोज उनकी पूजा किया करता था त्रिलोकीनाथ हनुमान जी को ही सब मानता था एक मित्र पिता गुरु वह सारी बातें हनुमान जी से किया करता था अरे कहां जा रहे हो त्रिलोकीनाथ इतनी सुबह-सुबह बस भाई हनुमान मंदिर जा रहा था हनुमान जी की पूजा करके दिन शुरुआत करूंगा अच्छी बात है चलो आओ तुम पूजा करके मिलते हैं फिर त्रिलोकीनाथ मंदिर पहुंचता है और मंदिर की साफ सफाई करने लगता है हे प्रभु कितनी धूल मिट्टी है कोई सफाई करने वाला ही नहीं है

 मैं ना रहूं तो यह मंदिर मंदिर ना लगे और आप प्रभु इतने बड़े-बड़े चमत्कार करते हैं जरा सा चमत्कार यहां भी दिखा दो लेकिन नहीं आपको पता है ना कि त्रिलोकीनाथ आएगा और सफाई कर देगा त्रिलोकीनाथ हनुमान जी से बातें करते-करते मंदिर की सफाई कर देता है और फिर हनुमान जी का न लगाता बैठ जाता है तभी उसके ध्यान में हनुमान जी रस्सियों से बंधे हुए दिखाई देते हैं त्रिलोकीनाथ मुझे यहां से छुड़ाओ मैं बंधा हुआ हूं निकालो मुझे यहां से यह क्या है हनुमान जी मुझसे मदद मांग रहे हैं मैं भी ना कुछ भी सोचता हूं त्रिलोकीनाथ इस बात को एक बुरा ख्याल सोचकर मंदिर से बाहर चला जाता है लेकिन अभी भी उसके दिमाग में वही ख्याल घूम रहा होता है तभी उसे रघुनाथ मिलता है क्या हुआ भाई मंदिर से पूजा करके आए लेकिन लगता है मन को शांति नहीं मिली दिमाग में कुछ उथल-पुथल चल रही है क्या हां भाई क्या बताऊं आज बजरंगबली का ध्यान कर रहा था तो मैंने एक दृश्य देखा कि हनुमान जी एक रस्सी में बंधे हुए हैं और मुझसे मदद मांग रहे हैं

भाई हनुमान जी को तुम्हारी मदद की कब से जरूरत आन पड़ी और उन्हें बांध कौन सकता है जरूर यह ख्याल तुम्हारे मन में ऐसे ही आ गया होगा बात तो तुम सही कह रहे हो यह बोलकर त्रिलोकीनाथ वहां से अपने घर आ जाता है संध्या होती है सारी दिनचर्या खत होने के बाद त्रिलोकीनाथ खाना खाकर सो रहा होता है त्रिलोकीनाथ को फिर से वही स्वप्न आता है त्रिलोकीनाथ मुझे यहां से छुड़ाओ मैं बंधा हुआ हूं निकालो मुझे यहां से आप कहां हो प्रभु मैं मंदिर के पीछे आम के पेड़ में फसा हुआ हूं मुझे यहां से निकालकर मंदिर में स्थापित करो यह कैसा स्वप्न है लगता है हनुमान जी स्वप्न के माध्यम से मुझसे कुछ कहना चाहते हैं यह बात कल मुखिया जी के आगे रखनी पड़ेगी अगले दिन त्रिलोकीनाथ ऐसा ही करता है है वो गांव में पंचायत बैठता है सभी गांव वाले वहां खड़े होते हैं क्या हुआ त्रिलोकीनाथ आज पंचायत क्यों जमा की है बात थोड़ी गंभीर है मुखिया जी कल से मुझे बार-बार हनुमान जी स्वप्न के जरिए बता रहे हैं कि वह मंदिर के पीछे आम के वृक्ष में फंसे हुए हैं उन्हें वहां से आजाद करके मंदिर में स्थापित करना है इसीलिए मैं आपसे यह निवेदन करना चाह रहा हूं कि उस वृक्ष को काट के उसमें से हनुमान जी को निकालकर मंदिर में स्थापित करना होगा

क्या पगला तो नहीं गए हो ना त्रिलोकीनाथ माना कि तुम हनुमान जी के भक्त हो लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तुम कुछ भी बोलो और हम मान ले अपनी इस बेफिजूल के बात के लिए तुमने पंचायत का समय बर्बाद किया है पर मुखिया जी मैं सच कह रहा हूं एक बार उस पेड़ को काट कर देख लेते हैं त्रिलोकीनाथ क्यों जिद्द कर रहे हो बेकार की यह सब तुम्हारा भ्रम है जाओ घर जाओ जाओ यहां से आज की सभा यही समाप्त की जाती है मुखिया त्रिलोकीनाथ को भगा देता है और कड़े शब्दों में पेड़ काटने के लिए मना कर देता है त्रिलोकीनाथ उदास मन लिए घर की ओर जाने लगता है तभी रघुनाथ उसके कंधे पर हाथ रखता है त्रिलोकीनाथ परेशान मत हो यह सब तुम्हारे मन का वहम होगा ज्यादा ध्यान मत दो और वैसे भी वह आम का वृक्ष मुखिया जी का है और पता है उस अकेले वृक्ष से कितने फल आते हैं वह तुम्हारी बात पे वृक्ष तो नहीं काटने वाले ज्यादा सोचो मत जाओ आराम करो सब ठीक हो जाएगा यह बोलकर रघुनाथ वहां से चला जाता है लेकिन इस बात से त्रिलोकीनाथ को अभी संतुष्टि नहीं मिली थी

उसका मन अभी भी व्याकुल था भाड़ में जाए मुखिया जी और सब हनुमान जी ने मुझसे बोला है वो मुझसे मदद मांग रहे हैं कोई नहीं हि साथ देगा तो भी मैं उनकी मदद करूंगा त्रिलोकीनाथ किसी की बात नहीं मानता वो एक कुल्हाड़ी उठाता है और उस पेड़ को काटने के लिए निकल पड़ता है मंदिर के पीछे पहुंचकर बजरंग बली का नाम लेकर त्रिलोकीनाथ उस पेड़ पर कुल्हाड़ी चला देता है उसे ऐसा करते हुए गांव का एक व्यक्ति देख लेता है और व भागता हुआ जाकर सभी गांव वालों को यह बात बताता है और सबको इकट्ठा करके ले आ जय बजरंग बली जय बजरंग बली कोई बात नहीं प्रभु कोई आपकी मदद नहीं करेगा तो क्या मैं भी नहीं करूंगा मैं अवश्य निकालू आपको इस वृक्ष में से हां त्रिलोकीनाथ तुमने यह क्या किया तुमने अपने पागल पन्ने की वजह से मेरा इतना सुंदर वृक्ष काट दिया मैंने पंचायत में कहा था ना कि कोई वृक्ष नहीं काटेगा त्रिलोकीनाथ तुम यह कैसी हट कर रहे हो तुम इतनी मूर्खता का काम करोगे हमें अंदाजा नहीं था पर भाइयों मैं सच कह रहा हूं स्वप्न में हनुमान जी आते थे और इसी वृक्ष को काटने के लिए कहते थे वो यही क ही कैद है अच्छा तो तुमने इसलिए यह वृक्ष काट दिए तुम्हें दिखे कहीं हनुमान जी कहां है क्या किसी को यहां हनुमान जी दिखाई पड़ रहे हैं

 त्रिलोकीनाथ तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी यह बात चल ही रही होती है कि तभी हनुमान जी की एक सुंदर प्रतिमा उस वृक्ष के तने से प्रकट हो जाती है जिसे देख सभी गांव वाले भौचक्का रह जाते हैं किसी को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता वो सभी बजरंग की जय जय करने लगते हैं और सभी त्रिलोकीनाथ से माफी मांगते हैं अब सभी गांव वाले पूरे सम्मान सहित वृक्ष से प्रकट हुई हनुमान जी की प्रतिमा को मंदिर में स्थापित कर देते हैं तब से हनुमान जी की कृपा से पूरे गांव में सुख शांति छा जाती है और त्रिलोकीनाथ को गांव में एक अलग ही सम्मान मिलने लग जाता है एक समय की बात है द्वारिका नगरी में भगवान श्री कृष्ण अपनी रानी रुक्मणी और सत्यभामा के साथ वार्तालाप कर रहे थे प्रभु आपसे एक प्रश्न पूछना था कैसा प्रश्न प्रिय पूछो प्रभु हर विवाहित स्त्री अपनी मांग में सिंदूर लगाती है इसकी सुंदरता अपने स्थान पर किंतु सिंदूर का असली महत्व क्या है मैं यह जानना चाहती हूं रुक्मिणी यदि आप यह प्रश्न किसी स्त्री से पूछे तो ज्यादा अच्छा रहेगा ऐसा क्यों प्रिय क्या तुम्हें मेरे ज्ञान पर संदेह है नहीं नहीं संदेह नहीं प्रभु आप तो सर्व ज्ञाता है किंतु किंतु क्या प्री प्रभु जिसने कभी सिंदूर लगाया ही ना हो वो प्रेम की उस गहरी भावना को कैसे बताएगा जो सिंदूर के साथ जुड़ी है

 इसलिए इस प्रश्न का उत्तर तो केवल एक स्त्री ही दे सकती है जो प्रतिदिन अपनी मांग में सिंदूर लगाती है उचित है परंतु जिसने लगाया वो पुरुष तो समझ सकता है प्रभु ऐसा कौन सा पुरुष है जो सिंदूर लगाता है श्री राम भक्त हनुमान हनुमान किंतु हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी है उनका सिंदूर से कैसा लगाव नाथ ये कैसी पहेली है यह पहेली तो वही मुझे जिसने उन्हें सिंदूर लगाने का विचार दिया ठीक है प्रभु यह पहेली मैं ही सुलझा देती हूं आप दोनों ये कैसी बातें कर रहे हैं मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं यह कहानी तब की है जब मैं और प्रभु यानी राम और सीता वनवास पूरा कर अयोध्या आ चुके थे एक दिन माता सीता अपना श्रृंगार कर रही थी और हनुमान जी माता सीता के पास बैठे उन्हें श्रृंगार करते हुए देख रहे थे क्या हुआ पुत्र आज तुम मेरे पास क्यों बैठे हो ऐसे तो तुम प्रतिदिन प्रभु के चरणों में ही रहते हो कोई प्रश्न है क्या माता मैं बहुत बड़ी दुविधा में फंसा हुआ हूं संकट मोचन को कैसी सुविधा ने घेर लिया माता मैं देखता हूं कि हर कोई प्रभु श्री राम को प्रसन्न करने के लिए भेंट देता है

 लेकिन मैं उन्हें ऐसा कौन सा भेट दूं जिसे देख वह प्रसन्न हो जाए प्रभु श्री राम को सबसे अधिक क्या प्रिय है माता पुत्र प्रभु श्री राम को तो किसी वस्तु से मोह नहीं है उनके लिए संसार में सब कुछ समान है इसलिए वह प्रत्येक वस्तु से प्रसन्न रहते हैं आप यह सिंदूर क्यों लगाती हैं यह तो सुहाग की निशानी है और इसे लगाने से प्रभु श्रीराम प्रसन्न होते हैं मैं यह सिंदूर अपने प्रभु श्री राम की लंबी आयु की कामना के लिए लगाती हूं इसे लगाने से आपके प्रभु और मेरे पति की आयु बढ़ेगी अच्छा यानी एक च मुकी भर सिंदूर से प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी आयु भी बढ़ जाती है यह सब सुनकर हनुमान जी वहां से चले जाते हैं और कुछ देर बाद पूरे शरीर पर सिंदूर लगाकर माता सीता के सामने आते हैं पुत्र यह तुमने क्या किया माता मैंने भी अपने प्रभु की लंबी आयु के लिए सिंदूर लगा लिया है अब उन पर कोई संकट नहीं आएगा पुत्र हनुमान तुम कितने भोले हो माता अब तो प्रभु श्री राम मुझसे प्रसन्न हो जाएंगे ना अवश्य माता सीता की आज्ञा पाकर हनुमान जी उसी भेष में श्री राम के पास पहुंचे श्री राम अपने दरबार में बैठे थे तभी वहां श्री राम की जय जयकार करते हुए हनुमान जी पहुंचते हैं हनुमान जी के इस भेष को देख सभा में उपस्थित सभी लोग उन पर हंसने लगे

अरे हनुमान यह क्या लगाकर आए हो अपने शरीर पर दरबार में आने से पहले नहाना उचित नहीं समझा क्या यह सिंदूर है यह मैंने अपने प्रभु के लिए लगाया है प्रभु के लिए आखिर तुम्हारे इस सिंदूर से प्रभु का क्या लेना देना लगता है हनुमान जी ने गुलाल की बोरी अपने ऊपर गिरा ली अब लोग इन परे हंसे ना इसलिए ऐसी वैसी कहानियां बना रहे हैं क्यों हनुमान मैं सत्य बोल रहा हूं ना हनुमान यह तुमने कैसा रूप धारण किया है प्रभु यह रूप मैंने आपके लिए ही धारण किया है आज मैं माता के पास बैठा था वह अपनी मांग में चुटकी भर सिंदूर लगा रही थी तभी मैंने उनसे उस सिंदूर का महत्व पूछा तो उन्होंने कहा कि यह सिंदूर आपकी लंबी आयु के लिए लगा उस चुटकी भर सिंदूर से आपकी आयु लंबी हो जाएगी और आप पर कोई संकट नहीं आएगा और आप चुटकी भर सिंदूर को देखकर प्रसन्न भी होते हैं तो मैंने विचार किया कि एक चुटकी भर सिंदूर से आपकी आयु बढ़ सकती है

तो मैंने आपके लिए सिंदूर पूरे शरीर पर लगा लिया इससे आप चिरंजीवी हो जाएंगे और मुझे देख आप इतना प्रसन्न होंगे कि मुझे अपने हृदय से लगा लेंगे हनुमान जी का यह भक्ति भाव और भोलापन देख श्री राम अपने आप को रोक नहीं पाते और वह आकर हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लेते हैं यह देख सभा में बैठे सभी लोग आश्चर्य चकित रह जाते हैं प्रभु अब आपको कोई भी संकट छू नहीं सकता हनुमान तुम्हारे होते तो मुझे से भी कोई संकट छू नहीं सकता क्योंकि तुम संकट मोचन जो हो हनुमान तुम्हारा हृदय बहुत कोमल है और उस हृदय में मेरे लिए इतना स्नेह देखकर मैं भाव विभोर हो उठा पुत्र आज मंगलवार के दिन तुमने यह जो मेरे लिए मंगल कामना की है मैं वचन देता हूं कि आगे भी कोई भक्त मंगलवार के दिन तुम इस सिंदूरी रूप के दर्शन करेगा मैं उसके लिए इतना ही कृपालु हो जाऊंगा भक्त तो यह है सिंदूर का महत् जो कि हनुमान ने भी समझा एक और महत्व की बात थी जो मैंने हनुमान से कही थी वो यही कि विवाहित स्त्री की मांग का सिंदूर प्रतीक है कि व अपने स्वामी के प्रति समर्पित है और हनुमान जी ने अपने देह पर सिंदूर लगाकर अपनी भक्ति को प्रभु के चरणों में 

Comments

Popular posts from this blog

शेरू: एक वफ़ादार आत्मा

गाँव के बाहर पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटा-सा कुत्ता अक्सर बैठा दिखाई देता था। उसकी आँखें भूरी थीं , लेकिन उनमें एक अजीब-सी चमक थी , जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो , बहुत कुछ सहा हो। गाँव वाले उसे “शेरू” कहकर बुलाते थे , हालाँकि कोई नहीं जानता था कि उसका असली नाम क्या है , या कभी कोई नाम था भी या नहीं। शेरू जन्म से आवारा नहीं था , लेकिन परिस्थितियों ने उसे आवारा बना दिया था। वह कभी किसी के घर का प्यारा पालतू रहा होगा , यह उसकी आदतों से साफ झलकता था—वह इंसानों से डरता नहीं था , बच्चों के पास जाते समय पूँछ हिलाता था , और किसी के बुलाने पर तुरंत ध्यान देता था। शेरू को सबसे ज़्यादा पसंद था सुबह का समय। जब सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे से निकलता और हवा में ठंडक घुली रहती , तब वह पूरे गाँव का चक्कर लगाता। कहीं कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए , कहीं कोई दुलार कर दे , तो उसका दिन बन जाता। लेकिन गाँव के ज़्यादातर लोग उसे बस एक आवारा कुत्ता ही समझते थे—कोई पत्थर मार देता , कोई डाँट देता , और कोई अनदेखा कर देता। फिर भी शेरू का भरोसा इंसानों से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। गाँव में एक छोटा-सा घर था , जह...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...