जय श्री कृष्णा दोस्तों दोस्तों आज हम आपको एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कथा बताने जा रहे हैं इस कथा के माध्यम से हम आपको यह बताएंगे कि इस संसार में सबसे बड़ा दान कौन सा होता है जिसे करने से पूर्ण पुण्य की प्राप्ति होती है और कैसे हम बुरे लोगों की पहचान कर सकते हैं दोस्तों इस कथा के माध्यम से आप जानेंगे कि बुरे लोगों की पहचान कैसे की जा सकती है तो कृपया आप इस कथा को शुरू से अंत तक ध्यान से पढे क्योंकि अधूरा ज्ञान मानव जीवन में अनेक कठिनाइयों का कारण बन सकता है
एक बार भगवान श्री हरि विष्णु जी और माता लक्ष्मी जी क्षीर
सागर में अपने आसन पर बैठे हुए थे तब भगवान विष्णु जी ने देखा कि माता लक्ष्मी जी
किसी गहन सोच में है माता लक्ष्मी जी को गहन सोच में देखकर भगवान विष्णु जी
मुस्कुराते हुए बोले हे देवी ऐसा प्रतीत होता है कि आज आप किसी गहन विचार में डूबी
हुई हैं आप निसंकोच होकर अपने प्रश्न पूछिए हम आपके सभी प्रश्नों का समाधान अवश्य
करेंगे भगवान विष्णु जी की बात सुनकर माता लक्ष्मी ने कहा हे प्रभु आज मेरे मन में
एक जिज्ञासा है मैं यह जानना चाहती हूं कि इस दुनिया में सबसे बड़ा दान कौन सा है
जिससे पूर्ण पुण्य की प्राप्ति होती है और बुरे लोगों की पहचान कैसे की जा सकती है
मनुष्य उन लोगों को कैसे पहचान सकते हैं तब भगवान विष्णु जी ने माता लक्ष्मी जी से
कहा हे देवी आपने सचमुच मानव जाति के कल्याण हेतु अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं
यह प्रश्न मनुष्य के जीवन में अत्यंत मूल्यवान है इसलिए मैं आपको आपके इन प्रश्नों
के उत्तर एक महत्त्वपूर्ण कथा के माध्यम से दूंगा
लेकिन आपको इस कथा को शुरू से लेकर अंत तक ध्यानपूर्वक
सुनना होगा तब माता लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया हे प्रभु मैं आपको वचन देती हूं कि
इस कथा को मैं पूरी श्रद्धा से सुनूंगी और इस कथा का प्रचार समस्त देवलोक में
करूंगी दोस्तों भगवान श्री हरि विष्णु जी देवी लक्ष्मी से कहते हैं हे देवी एक समय
की बात है किसी नगर में एक राजा राज्य करता था वह राजा बहुत ही बलशाली वीर और
अत्यंत ही बुद्धिमान था इसके साथ ही वह धर्म परायण और दयालु भी था उस राजा की रानी
भी संस्कारी और अत्यंत धार्मिक स्वभाव की थी दोनों पति-पत्नी भगवान भोलेनाथ के परम
भक्त थे वे दोनों प्रतिदिन शिवजी के मंदिर में जाकर उनकी पूजा अर्चना किया करते थे
यह उनका प्रतिदिन का नियम था वह राजा अपने राज्य को धर्म पू पूर्वक चला रहा था
उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं रहता था
बल्कि सारी प्रजा
सुख और वैभव से संपन्न रहती थी इसलिए पूरे नगर में हर तरफ खुशियां ही खुशियां
बिखरी रहती थी वहां के जानवर भी एक दूसरे को कोई हानि नहीं पहुंचाते थे यहां तक कि
एक ही नदी में शेर और बकरी शांतिपूर्वक पानी पीते थे ऐसे ही दिन बीत रहे थे राजा
की उम्र ढलती जा रही थी और उनके विवाह को भी कई वर्ष बीत चुके थे लेकिन उस राजा को
कोई संतान नहीं थी हालांकि राजा इस बात को लेकर अधिक चिंता नहीं करते थे वह
निश्चिंत होकर अपनी प्रजा के सुख दुख का ध्यान रखते और प्रजा भी उसे अत्यधिक प्रेम
और सम्मान देती थी एक दिन की बात है वह राजा हर रोज की तरह अपनी पत्नी के साथ
भगवान शिव जी के मंदिर की ओर जा रहे थे तभी अचानक उसने देखा कि सामने वाले घर में
एक स्त्री झाड़ू लगा रही है राजा और रानी जब उस स्त्री के घर के पास से गुजरे तो
वह स्त्री उन्हें देखते ही अपना चेहरा फेर करर तेजी से घर के अंदर चली गई उस
स्त्री का ऐसा व्यवहार देखकर राजा और रानी को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा राजा उस
समय अपनी रानी के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए मंदिर जा रहा था इसलिए
उसने उस स्त्री से कुछ नहीं कहा और सीधे मंदिर पहुंचकर भगवान शिव जी की पूजा अर्चना
की पूजा के बाद राजा अपनी रानी के साथ वापस महल लौट आया
लेकिन महल पहुंचने
के बाद राजा ने अपने एक सैनिक को बुलाया और उसे आदेश दिया कि तुम जाओ और नगर के
बाहरी क्षेत्र में रहने वाली उस स्त्री को अपने साथ महल ले आओ ध्यान रखना तुम उसे
कुछ भी मत बताना कि क्यों बुलाया गया है बस उसे तुम हमारे पास ले आओ भगवान विष्णु
जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी राजा का आदेश पाते ही वह सैनिक तुरंत ही
उस महिला के घर पहुंचता है उस समय महिला का पति भी घर पर नहीं था फिर वह सैनिक उस
स्त्री के घर के दरवाजे को खटखटाने लगता है और कुछ देर बाद वह महिला अपने घर का
दरवाजा खोलती है सामने राजा का सैनिक खड़ा देखकर वह महिला हैरान होती है और पूछती
है क्या हुआ आप मेरे घर पर क्यों आए हैं उस महिला की बात सुनकर राजा का वह सैनिक
उससे कहता है चलो मेरे साथ महाराज ने तुम्हें राजमहल में बुलाया है उन्हें आपसे
कुछ बात पूछनी है यह सुनकर वह महिला अपने मन में सोचती है आखिर महाराज का आदेश है
इसे ठुकराया तो नहीं जा सकता मुझे राज दरबार में जाना ही होगा
उसके बाद वह सैनिक
उस स्त्री को अपने साथ लेकर राजमहल पहुंच गया महल में पहुंचकर वह महिला राजा को
प्रणाम करती है और कहती है हे महाराज आपने मुझे अचानक यहां राजमहल में क्यों
बुलाया है क्या मुझसे कोई गलती हो गई है उस स्त्री की बात सुनकर राजा कहता है तुम
मुझे एक बार बा बताओ आज सुबह जब मैं और मेरी पत्नी भगवान शिव जी के मंदिर जा रहे
थे तो तुमने मुझे देखकर अपना मुंह फेर लिया और मुझे आते हुए देखकर तुम दौड़ते हुए
अपने घर में चली गई तुमने मुझे देखकर ऐसा दुर्व्यवहार क्यों किया तब वह महिला
निर्भीकता से राजा से कहती है हे महाराज आप भले ही मुझे मृत्युदंड दे दे तो भी
मुझे कोई ऐतराज नहीं परंतु मैं सच ही कहूंगी आपके महल में बड़े-बड़े विद्वान है
पंडित है अगर मैं गलत बात बोलूं तो आप उनसे पूछ सकते हैं कि हमारे नगर में यह
मान्यता है कि जो सुबह-सुबह आपका चेहरा देख लेता है तो उस व्यक्ति का पूरा दिन
खराब हो जाता है
क्योंकि आप संतान
हीन है अभी तक आपको संतान की प्राप्ति नहीं हुई है इसी कारण मैंने आपका मुंह देखकर
अपना मुंह फेर लिया था और अपने घर के अंदर चली गई थी उस महिला की ऐसी बात सुनकर
राजा आश्चर्य में पड़ जाता है वह अपने मन में सोचता है कि यह महिला तो बिल्कुल
सत्य कह रही है यदि किसी नगर के राजा को संतान नहीं हो तो यह उसकी प्रजा के लिए
बिल्कुल भी शुभ नहीं माना जाता उसके बाद राजा उस महिला को वापस अपने घर जाने की
अनुमति देता है फिर राजा अपने मन में यह विचार करने लगता है कि अब मुझे भगवान शिव
जी के मंदिर में जाकर संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करना चाहिए ऐसा सोचकर वह राजा
अपने कक्ष में लौटकर रानी से कहता है हे प्रिय हमारे नगर के लोग हमारे चेहरे को
देखना भी पसंद नहीं करते हैं क्योंकि हमारे पास अभी तक कोई संतान नहीं है
इसलिए हमें भगवान
शिव जी के मंदिर में जाकर संतान प्राप्ति का यज्ञ करना चाहिए हम भगवान भोलेनाथ के
मंदिर में चलते हैं और भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे हमें पुत्र प्रदान
करें राजा की बात सुनकर रानी भी उसकी बात मान लेती है फिर राजा और रानी दोनों
भगवान शिव जी के मंदिर पहुंचते हैं और भगवान शिव जी की पूजा करके संतान प्राप्ति
के लिए यज्ञ का आयोजन करते हैं भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे
देवी पुत्र प्राप्ति के लिए राजा और रानी ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन यज्ञ संपन्न
होने के बाद भी उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई यज्ञ के निष्फल होने से राजा
अत्यंत निराश हो गया यज्ञ का आयोजन करने वाले पंडित जी भी सोच में पड़ गए पंडित जी
ने मन ही मन सोचा अब तक जितने भी यज्ञ मैंने किए हैं उनमें से कोई भी यज्ञ आज तक
विफल नहीं हुआ है इसका अर्थ यह है कि शायद इस राजा के भाग्य में ही खोट है और ऐसा
प्रतीत होता है कि ईश्वर ने इस राजा के भाग्य में संतान का योग नहीं लिखा है इसलिए
संतान प्राप्ति का यज्ञ करने के बाद भी उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई राजा हर
संभव प्रयास करके थक चुका था
और अब वह गहरे
निराशा में डूबा रहता था वह दिन रात संतान की कमी के बारे में सोचता और चिंता में
खोया रहता था एक दिन सिंहासन पर बैठे-बैठे राजा को अचानक एक बात याद आती है कि
दूसरे नगर के वन में एक महात्मा जी निवास करते हैं जिनकी ख्याति दूर दूर तक फैली
है राजा के मन में विचार आता है कि शायद उन महात्मा के पास मेरे इस कष्ट का कोई
समाधान हो अगर मैं उनके पास जाऊं तो संभवतः वे मुझे पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय
बता सके मुझे उनके पास जाना चाहिए अपने मन में यह निर्णय लेकर राजा तुरंत अपनी
रानी के पास जाता है और उससे कहता है हे प्रिय दूसरे नगर के वन में एक महान तपस्वी
और ज्ञानी महात्मा जी रहते हैं मुझे लगता है कि हमें उनके पास जाना चाहिए हो सकता
है कि वे हमें पुत्र प्राप्ति का कोई मार्ग सुझा दे फिर रानी भी राजा की इस बात से
सहमत हो गई रानी ने कहा हे स्वामी आपकी बात बिल्कुल सही है हमें महात्मा जी से
अवश्य मिलना चाहिए रानी की सहमति पाकर राजा और रानी दोनों ने एक रथ में बैठकर
महात्मा जी के दर्शन के लिए दूसरे वन की ओर प्रस्थान किया
कुछ समय के बाद वे दोनों वन में पहुंच गए रथ से उतरकर राजा
और रानी दोनों जंगल के भीतर जाने लगे ऊंचे नीचे रास्तों से गुजरते हुए वे महात्मा
के आश्रम की ओर बढ़ने लगे भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी
फिर राजा और रानी वन के भीतर महात्मा जी की कुटि के पास पहुंच जाते हैं वहां वे
देखते हैं कि महात्मा जी एक विशाल वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न होकर साधना में लीन है
यह दृश्य देखकर राजा और रानी कुछ देर तक खामोशी से खड़े रह जाते हैं ताकि महात्मा
जी की साधना में कोई विघ्न ना आए दोनों हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक महात्मा जी के
सामने खड़े रहते हैं कुछ समय बाद महात्मा जी अपनी साधना से बाहर आते हैं और अपनी
आंखें खोलते हैं तब वे देखते हैं कि राजा और रानी उनके सामने अपने दोनों हाथों को
जोड़कर खड़े हुए हैं वे महात्मा जी उस राजा को अच्छी तरह से जानते भी थे इसलिए वे
राजा को देखते ही पहचान लेते हैं और राजा से मुस्कुराते हुए कहते हैं हे राजन आज
आप यूं अचानक से हमारे पास किस प्रयोजन से पधारे हैं तब राजा ने नम्रता से महात्मा
जी को प्रणाम किया और अपनी व्यथा महात्मा जी को कह सुनाई उसने बताया कि कैसे
उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया परंतु सभी व्यर्थ गए यह सब सुनने के बाद
महात्मा जी कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए और अपनी आंखें बंद कर ली वे ध्यानत होकर
राजा के जीवन की घटनाओं का आंतरिक दृष्टि से अवलोकन करने लगे कुछ समय बाद महात्मा
जी ने अपनी आंखें खोली और गंभीर स्वर में बोले राजन मैंने आपके जीवन का एक ऐसा
सत्य देखा है
जिसे सुनकर आपको
कष्ट हो सकता है आपके पिछले जन्म में किए गए एक पाप का फल इस जन्म में आपके भा पर
भारी पड़ा है आपने पिछले जन्म में एक ऐसा घोर पाप किया था जिसके परिणाम स्वरूप इस
जीवन में आपके भाग्य में संतान प्राप्ति का योग नहीं है इसी कारण से आपके सभी
प्रयास निष्फल हो रहे हैं भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी
महात्मा जी की बातें सुनकर राजा उनके चरणों में गिर पड़ा और विनती करते हुए बोला
हे महात्म कृपा करके आप ऐसा मत कहिए आप ही हमारे दुख को हरने का कोई उपाय सुझाए
राजा की यह व्याकुलता देखकर महात्मा जी ने उसे सहारा देकर अपने चरणों से उठाया और
बोले हे राजन इतनी अधीरता आपको बिल्कुल भी शोभा नहीं देती मैं अभी आपको आपके इस
कष्ट का निवारण करने का उपाय बताता हूं जिसे करने के बाद आपको अवश्य ही पुत्र की
प्राप्ति होगी इतना कहकर वे महात्मा जी अपनी कुटिया के भीतर जाते हैं और थोड़ी देर
के बाद हाथ में एक कटोरी में खीर लेकर बाहर आ जाते हैं
उन्होंने वह खीर
राजा को देते हुए कहा राजन महल पहुंचकर आप और रानी साहिबा दोनों ही स्नानादि के
बाद इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करें ऐसा करने से आपको निश्चित ही पुत्र की
प्राप्ति होगी परंतु राजन आप मेरी एक बात याद रखना इस पुत्र की आयु मात्र 20 वर्ष की ही होगी जिस दिन
आपके पुत्र की आयु 20 वर्ष की होगी उसी
दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी महात्मा जी की इस बात को सुन राजा गहरी सोच में डूब गया
वह अपने मन में सोचने लगा चलो 20 वर्ष के लिए ही सही परंतु इस संतान हीनता का कलंक तो मिट
जाएगा हमें संतान का सुख तो मिलेगा राजा ने मन ही मन इस बात को स्वीकार कर लिया और
महात्मा जी से निवेदन किया हे महात्म आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन स्वीकार है कृपा
करके हमें यह अवसर दे महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए राजा को आशीर्वाद दिया राजा और
रानी ने महात्मा जी को प्रणाम किया उनकी चरण वंदना की और विनम्रता पूर्वक आभार
व्यक्त किया इसके बाद राजा और रानी अपने रथ में बैठकर महल की ओर लौट चले इसके बाद
महल पहुंचकर राजा और रानी स्नान आदि कर भगवान भोलेनाथ जी का प्रसाद मानते हुए
श्रद्धा से उस खीर को ग्रहण करते हैं उसके कुछ ही दिनों बाद रानी गर्भवती हो जाती
है जिससे रानी बहुत ही प्रसन्न हो जाती है
जब राजा ने यह शुभ
समा सुना तो वह भी खुशी से झूम उठा संतान प्राप्ति का यह सुखद समाचार सुनने के बाद
राजा ने महात्मा जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का निश्चय किया राजा अपने
रथ में ढेर सारे फल फूल वस्त्र और अन्य भेंट सामग्रियां रखकर वन में महात्मा जी की
कुटिया की ओर चल पड़ा कुटिया के निकट पहुंचकर राजा ने अपने रथ को रोक दिया और
विनम्र भाव से नीचे उतरकर महात्मा जी के पास पहुंचा महात्मा जी ध्यान मग्न बैठे थे
राजा ने उनके पास जाकर सभी वस्त्र फल फूल उन्हें समर्पित किए और गहरे आदर के साथ
प्रणाम करते हुए कहा हे महात्म आपकी ही कृपा से हमें संतान प्राप्ति का सुख
प्राप्त होने जा रहा है इसलिए आप मेरी यह तुच्छ सी भेंट कृपा कर स्वीकार करें
महात्मा जी राजा की विनम्रता और कृतज्ञता से अत्यंत प्रसन्न हुए उन्होंने राजा की
भेंट को स्वीकार कर उसे आशीर्वाद दिया और कहा राजन तुम्हारी भक्ति और संकल्प ने ही
तुम्हारे जीवन को फलवर्स है वह अनमोल है जाओ तुम्हारी संतान गुणवान और धर्म निष्ठ
हो उसके बाद राजा ने महात्मा जी का आशीर्वाद पाकर उनसे विदा ली और अपने रथ में
बैठकर वापस अपने महल की ओर प्रस्थान करते हैं महल लौटकर राजा बहुत ही खुशियां
मनाता है भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी ऐसे ही दिन रहे थे
आखिरकार वह शुभ दिन
आया जब राजा के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ पुत्र के जन्म से जैसे महल में खुशियों
की बयार बहने लगी राजा ने पुत्र प्राप्ति की खुशी में पूरे नगर में उत्सव का आयोजन
किया महल को फूलों और रंगबिरंगी अपने पिता के ही गुणों का प्रतीक बनते हुए बड़ा
होने लगा वह अपने पिता की तरह ही धर्म निष्ठ आत्मानुभूति मत्ता शौर्य और भक्ति के
गुण प्रकट होने लगे जिससे राजा का हृदय गर्व से भर उठता शौर्यवीर के गुणों और आचरण
को देखकर सभी आश्वस्त थे कि वह एक दिन अपने पिता की तरह महान राजा बनेगा जैसे-जैसे
समय बीता राजा का हृदय गर्व और खुश से भरता गया संतान सुख की प्राप्ति ने उसकी सभी
चिंताओं को मानो हर लिया था और वह अपने पुत्र में संपूर्ण संसार का आनंद खोजने लगा
वह राजा पुत्र के प्रति अपने स्नेह में इतना डूब गया कि वह यह महत्त्वपूर्ण बात भी
भूल बैठा कि उसके पुत्र की आयु मात्र 20 वर्ष तक की है भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं
हे देवी फिर एक दिन
जब उस राजा को यह बात याद आती है कि उसके पुत्र वर की आयु मात्र 20 वर्ष की ही है इसलिए जब
राजा के पुत्र शौर्यवीर की आयु 15 वर्ष हो जाती है तब वह राजा दिन रात पुत्र के भविष्य को
लेकर व्याकुल रहने लगा इस बीच एक अन्य नगर में एक महा पराक्रमी राजा का राज्य था
उस राजा की एकमात्र पुत्री थी जो अपनी सुंदरता और दयालुता के लिए प्रसिद्ध थी वह
देखने में ऐसी लगती थी मानो स्वर्ग की अप्सरा स्वयं धरती पर उतर आई हो वह बहुत ही
दानी स्वभाव की थी क्योंकि उसने अपने माता-पिता से धर्म और संस्कारों की शिक्षा ली
थी इसलिए उसका हृदय करुणा और उदारता से भरा हुआ था वह प्रतिदिन सुबह उठकर पक्षियों
को दाना डालती और अपने द्वार पर आने वाले साधु संतों भिक्षुओं को सदा ही आदर से
भोजन कराती थी कोई भी भूखा उसके द्वार से खाली हाथ नहीं लौटता था ऐसे ही दिन बीत
रहे थे उस राजा की पुत्री भी अपने गुणों के साथ बड़ी हो रही थी एक दिन जब शौर्यवीर
के पिता को यह बात पता चली कि दूसरे नगर में एक धीर वर और पराक्रमी राजा राज्य
करता है जिसकी पुत्री गुणों की खान है साथ ही वह अत्यंत सुंदर भी है
तो राजा ने अपने मन
में सोचा कि ऐसी धर्मात्मा और तेजस्वी कन्या के साथ अपने पुत्र शौर्यवीर का विवाह
करना उचित रहेगा मुझे इसी प्रकार की कन्या की तलाश थी जिसके साथ मैं अपने पुत्र का
विवाह कर सकूं और हमारी वंश परंपरा को बनाए रख सको इस विचार के साथ ही राजा ने
अपने मन में निर्णय किया कि वह उस राजा से प्रस्ताव रखेगा जिससे वह अपने पुत्र
शौर्यवीर का विवाह उस सुंदर और धार्मिक कन्या के साथ कर सके भगवान विष्णु जी माता
लक्ष्मी से कहते हैं हे देवी फिर शौय वर के पिता ने अपने पुत्र के विवाह का
प्रस्ताव संदेशवाहक के माध्यम से दूसरे नगर के राजा तक पहुंचाया जब दूसरे नगर के
राजा ने यह प्रस्ताव सुना तो उसने अपने मन में विचार किया कि चलो अब मुझे अपनी
पुत्री का विवाह कर देना चाहिए और मैंने सुना है कि इस राजा के पुत्र की आयु मात्र
20 वर्ष ही है इस राजा का
पुत्र बहुत ही योग्य पराक्रमी और धर्म परायण है भले ही उसकी आयु का भविष्य
अनिश्चित हो इसलिए अगर उसके यहां कोई पुत्र पैदा हो गया तो उसका वंश आगे बढ़ता
रहेगा
जिससे पुत्री भी
अपनी संतान के साथ सुखी रहेगी इन विचारों को मन में संजोए हुए उस राजा ने शौर्यवीर
के विवाह प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया फिर कुछ ही दिनों के भीतर शुभ मुहूर्त
में शौर्यवीर का उस राजकुमारी के साथ विवाह हो गया वह राजकुमारी ना केवल सुंदर थी
बल्कि बहुत ही दयालु स्वभाव की थी उसने अपने बचपन से ही यह नियम अपनाया था कि जब
तक वह किसी भूखे या असहाय प्राणी को भोजन नहीं करवाती तब तक वह स्वयं भोजन ग्रहण
नहीं करती उसके माता-पिता ने उसे सेवा और दान की भावना सिखाई थी और उसने उसे अपने
जीवन का अटूट हिस्सा बना लिया था विवाह के पश्चात राजकुमारी का यह नियम उसके
ससुराल में भी जारी रहा हर सुबह वह महल के द्वार पर जाकर जरूरतमंद लोगों को भोजन
करवाती और अपने हाथों से उन्हें अन्न दान करती उसकी यह दया भावना देखकर महल के सभी
लोग उसका बहुत सम्मान करने लगे थे धीरे-धीरे ऐसे ही समय गुजर रहा था और हर गुजरते
दिन के साथ शौर्यवीर की उम्र भी बढ़ रही थी राजा और रानी इस बात को लेकर मन ही मन
चिंतित रहते कि उनका पुत्र अब अपने जीवन के अंतिम समय की ओर बढ़ रहा है
उन्हें महात्मा की
वह भविष्यवाणी हमेशा याद रहती कि शौर्यवीर की आयु केवल 20 वर्ष ही होगी इस दुखद
सत्य को केवल राजा और रानी ही जानते थे उन्होंने यह बात किसी और को नहीं बताई थी
ताकि महल में कोई चिंता का माहौल ना बने जैसे-जैसे शौर्यवीर की आयु 20 वर्ष की ओर बढ़ती जा रही
थी राजा और रानी के दिल की धड़कनें तेज हो जाती अपने पुत्र के प्रति उनका प्रेम और
मोह इतना अधिक था कि वे चाहकर भी इस चिंता से मुक्त नहीं हो पाते थे भगवान विष्णु
जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी फिर वह दिन भी आ जाता है जब शौर्यवीर के
जीवन के मात्र तीन दिन शेष रह जाते हैं राजा और रानी का दिल भारी हो जाता है राजा
बार-बार अपने मन में सोचने लगा कि अब मैं क्या करूं मेरा पुत्र तीन दिन बाद मुझसे
हमेशा के लिए दूर हो जाएगा क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मैं उसे बचा सकूं रानी
भी इस दुख से भरी थी और हर पल अपने पुत्र के जीवन की कल्पना करती रहती इसलिए उनके
पुत्र मोह ने उन्हें बीमार और कमजोर बना दिया था दोनों इतने दुखी थे कि अब
उन्होंने भोजन करना भी छोड़ दिया था परंतु अपनी पीड़ा को उन्होंने किसी के सामने
प्रकट नहीं किया वे नहीं चाहते थे कि महल के लोग उनके पुत्र की मृत्यु की बात
सुनकर दुखी हो और चिंता में पड़ जाए
फिर वह आखिरी दिन
भी आ पहुंचा जिस दिन शौर्यवीर की आयु पूरी होनी थी उसकी मृत्यु होनी थी फिर उस दिन
जैसे ही सुबह हुई राजा और रानी अपनी चिंता और दुख से व्याकुल होकर भगवान भोलेनाथ
के मंदिर में बैठकर उनकी पूजा अर्चना में लग गए वे दोनों भगवान भोलेनाथ से
प्रार्थना करते हुए कहने लगे हे प्रभु आप कृपा करके हमें पुत्र की मृत्यु होने के
दुख को सहन करने की शक्ति दीजिए हम जानते हैं कि जो भी किसी के भाग्य में लिखा
होता है उसे कोई बदल नहीं सकता वह होकर ही रहता है परंतु हमारे लिए यह समय बहुत ही
कठिन है उधर राजकुमार शौर्यवीर की पत्नी अपने दैनिक धर्म कर्म के कामों में लगी
हुई थी हर दिन की तरह वह भूखे गरीबों और निर्धनों को भोजन करा रही थी पक्षियों को
दाना डल रही थी और जरूरतमंदों की सहायता में लगी थी उसे अपने पति की आयु के बारे
में कुछ भी पता नहीं था
इसलिए वह निश्चिंत
होकर अपने कार्यों में मग्न थी इसी बीच यमलोक में धर्मराज जी ने देखा कि आज
राजकुमार शौर्यवीर की मृत्यु का दिन है तो उन्होंने तुरंत ही अपने दो प्रमुख दूतों
को बुलाया और उन्हें आदेश दिया जाओ और अब से कुछ समय बाद राजकुमार शौर्यवीर के
प्राण उसके शरीर से निकालकर अपने साथ यमलोक ले आओ परंतु ध्यान रहे कि उसकी मृत्यु
एक विशेष कारण से होनी है उसकी मृत्यु एक सांड द्वारा उसे पीछे से ठोकर मारने से
ही होगी जब वह सांड राजकुमार शौर्यवीर को पीछे से ठोकर मारेगा तभी उसके प्राण
हमारे पास आ सकेंगे इसके लिए तुम दोनों एक सांड के पास जाकर उसे राजकुमार शौर्यवीर
की मृत्यु के लिए प्रेरित करो धर्मराज के आदेशानुसार वे दोनों दूत यमलोक से धरती
पर जाने के लिए तत्पर हो गए भगवान विष्णु जी माता लक्ष्मी से कहते हैं हे देवी वे
दोनों यमदूत राजकुमार शौर्यवीर के प्राण लेने के लिए आकाश मार्ग से होते हुए
पृथ्वी लोक पहुंच जाते हैं दूसरी ओर धर्मराज की माया के प्रभाव से एक सांड ने अपने
मन में सोचा कि आज मुझे राजमहल के सुंदर बगीचे में प्रवेश करना चाहिए और वहां
घूमना चाहिए मुझे देखना चाहिए कि राजमहल का बगीचा कैसा है फिर बिना किसी रुकावट के
वह सांड धीरे-धीरे चलते हुए महल के बगीचे में जा पहुंचा संयोग से यह वही बगीचा था
जहां राजकुमार शौर्यवीर प्रतिदिन टहलने के लिए आते थे
धर्मराज की माया से
प्रेरित वह सांड जैसे ही बगीचे में प्रवेश करता है तो वहां जाकर वह घास चरने और
इधर-उधर घूमने लगता है उसी समय धर्मराज जी के दो दूत राजमहल के बगीचे के द्वार के
पास खड़े हो गए वे दोनों बगीचे के भीतर की गतिविधियों पर नजर बनाए रखते हैं कुछ
समय बाद राजकुमार शौर्यवीर उस बगीचे में टहलने के लिए आता है राजकुमार शौर्यवीर को
सांड के वहां होने का एहसास नहीं था और वह अपने विचारों में खोए हुए बगीचे में
टहलने लगता है तब वे दोनों यमदूत अपने मन में सोचते हैं अब बस थोड़ी ही देर में
राजकुमार शौर्यवीर की आयु समाप्त होने का समय निकट आ जाएगा हमें इंतजार है उस पल
का जब यह सांड राजकुमार को ठोकर मारेगा तब हम उसके प्राण ले कर यमलोक लौट जाएंगे
जब वे दोनों दूत यह विचार कर रहे थे कि तभी क्या होता है कि एक अन्य नगर में एक
निर्धन ब्राह्मण रहता था उस ब्राह्मण की एक पुत्री थी जिसका समय रहते उसने विवाह
कर दिया था लेकिन दुर्भाग्य से उसकी बेटी का पति एक दुष्ट प्रवृत्ति का व्यक्ति था
जो बहुत ही मदिरापान करता था जुआ खेलता था और पराई स्त्रियों के साथ संबंध बनाता
था
यही नहीं वह अपनी
पत्नी को नशे में होकर अक्सर मारता पीटता था और उसे घर से निकालना चाहता था उसकी
इस आदत के कारण गरीब ब्राह्मण की बेटी बहुत ही दुखी और पीड़ित रहने लगी थी लेकिन
वह गरीब ब्राह्मण की बेटी जब अपने पति के साथ कुछ समय तक रही तब एक दिन वह गर्भवती
हो जाती है इसलिए एक दिन उसने अपने पति की मारपीट से तंग आकर उसे छोड़कर वह अपने
पिता के घर अपने मायके में आ जाती है वह आंसुओं से भरी आंखों के साथ अपने पिता से
कहती है पिताजी आज के बाद मैं अपने पति के साथ नहीं रह सकती क्योंकि वह मुझे रोज
मारता पीटता है और बुरी तरह से अपमानित करता है और मैं उसके इस व्यवहार से तंग आकर
उसको छोड़कर मायके चली आई हूं मुझे क्षमा कर दीजिए पर अब मैं अपने मायके में ही
रहना चाहती हूं उसका पिता अब बहुत ही वृद्ध हो चुका था और अब उसकी कमाई का कोई ठोस
साधन नहीं था जिसके कारण उसे प्रतिदिन नगर के विभिन्न घरों में जाकर भिक्षा मांगनी
पड़ती थी ताकि वह किसी प्रकार अपने और अपने परिवार का पेट भर सके भगवान विष्णु जी
कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं
हे देवी जब उसकी
बेटी का गर्भकाल पूरा हुआ तो उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया लेकिन जन्म देने के
बाद उसे बहुत तेज भूख लगने लगी उसे भोजन की आवश्यकता थी प्रसव के बाद भूख कई गुना
बढ़ जाती है इसलिए वह अपने पिता से भोजन मांगने लगी दुर्भाग्यवश उसके पिता सुबह से
ही भिक्षा के लिए नगर नगर गए हुए थे परंतु रोज-रोज भिक्षा मांगने के कारण उस दिन
किसी ने उसे भिक्षा नहीं दी थी भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे
देवी गरीबी किसी भी मनुष्य के लिए एक सबसे बड़ा अभिशाप है और यह उसके आत्म सम्मान
और अस्तित्व के लिए अत्यंत पीड़ादायक होती है उधर उस गरीब ब्राह्मण को किसी ने भी
भोजन नहीं दिया इसलिए वह खाली हाथ ही घर वापस लौट आता है इधर उसकी पुत्री भूख से
बहुत ही व्याकुल हो रही थी जब वृद्ध ब्राह्मण निराश होकर खाली हाथ घर लौटा और उसकी
बेटी ने उसे बिना भोजन के आते देखा तो वह दुखी होकर रोते हुए अपने पिता से बोली
पिताजी अब मुझसे भूख सहन नहीं होती पूरे तीन दिन बीत चुके हैं और मैंने भोजन का एक
भी कण नहीं खाया है अब तो ऐसा लगता है कि भूख के कारण मेरे प्राण ही निकल जाएंगे
लेकिन अगर आपको कुछ
भिक्षा में मिला हो तो मुझे खाने को दे दीजिए नहीं तो मेरे प्राण निकल जाएंगे तब
उसका वृद्ध पिता अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए कहता है पुत्री मैं कुछ ही देर
में लौटूंगा मैं अब दूसरे नगर में जाऊंगा और वहां के राजा के महल के द्वार पर जाकर
भिक्षा मांगूंगा अगर वहां से मुझे कुछ भी मिल जाता है तो तुरंत तुम्हारे लिए लेकर
आऊंगा अपनी बेटी से यह कहकर वृद्ध ब्राह्मण वहां से निकल पड़ा इधर राजकुमार
शौर्यवीर की पत्नी जो कि रोजाना गरीबों को भोजन करवाती थी उस दिन उस नगर के राजा
और रानी दोनों अत्यधिक बीमार पड़ गए थे क्योंकि पुत्र मोह के कारण वे बहुत ही
चिंतित थे और शौर्यवीर की पत्नी उनके कक्ष में थी इसलिए आज उसने गरीबों को भोजन
नहीं करा वाया था परंतु उसने अपने पति के लिए भोजन बनाया था और भोजन की थाल सजाकर
रख दी थी कि जब उसका पति बगीचे से लौटेगा तो वह उसे भोजन कराएगी क्योंकि उसका पति
अपने माता-पिता के पास बैठ बैठकर उनकी सेवा करके अपने बगीचे में घूमने के लिए गया
हुआ था
भगवान विष्णु जी
कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं हे देवी इधर वह वृद्ध ब्राह्मण राज महल के द्वार पर
पहुंच जाता है जब राजकुमार की पत्नी ने उसे देखा तो उसके मन में उस वृद्ध ब्राह्मण
के प्रति दया उमड़ आई उसके बाद वह वृद्ध ब्राह्मण उस राजकुमार की पत्नी की तरफ
देखकर विनम्रता से उससे कहता है हे पुत्री यदि मुझे इसमें से कुछ भोजन मिल जाए तो
तुम्हारा बड़ा ही उपकार होगा राजकुमार की पत्नी को उस ब्राह्मण की बात सुनकर उस पर
बहुत दया आई उसने सोचा यह तो कोई गरीब ब्राह्मण है जो भूखा है और मुझसे कुछ भोजन
मांग रहा है यह सोचकर राजकुमारी की पत्नी उसे भोजन देने के लिए तैयार हो गई लेकिन
अचानक वह अपने मन में सोचने लगती है कि यह भोजन तो मैंने अपने पति के लिए बनाया है
अगर मैं इसे यह भोजन दे दूंगी तो मेरे पति क्या खाएंगे लेकिन अगले ही पल उसने सोचा
मेरे पति तो अब भी बगीचे में घूमने के लिए गए हुए हैं तब तक मैं यह भोजन इस गरीब
ब्राह्मण को दे देती हूं और जब मेरे पति वापस आएंगे तो मैं उनके लिए नया भोजन बना
दूंगी यह भूखे ब्राह्मण की सहायता करना अधिक आवश्यक है अपने मन में यह सोचकर
राजकुमार की पत्नी ने अपने पति के लिए बनाया हुआ भोजन उस भूखे ब्राह्मण को दे दिया
उसके बाद वह
ब्राह्मण भोजन की थाली लेकर जल्दी-जल्दी अपने नगर की ओर रवाना हो गया और वह भोजन
लेकर अपने घर आ गया उसकी पुत्री तीन दिनों से भूखी थी उसने तीन दिनों से कुछ भी
नहीं खाया था और उसके चेहरे पर भूख की पीड़ा साफ झलक रही थी उधर राजकुमार शौर्यवीर
जो बगीचे में टहलने गया था अपने कक्ष की ओर वापस लौट रहा था बगीचे के बाहर खड़े
यमदूत राजकुमार के प्राण लेने के लिए तैयार थे और एक सांड भी धर्मराज की माया से
प्रेरित होकर वही घूम रहा था वे दोनों यमदूत मन में सोच रहे थे कि बस अब कुछ ही पल
बाकी है और जैसे ही सांड राजकुमार को पीछे से ठोकर मारेगा हम राजकुमार के प्राण हर
लेंगे और यमलोक लौट जाएंगे भगवान विष्णु जी माता लक्ष्मी से कहते हैं हे देवी इधर
वह वृद्ध ब्राह्मण अपने घर पहुंचा और उसने तुरंत अपनी भूखी बेटी को वह भोजन दे
दिया तब उसकी बेटी उससे कहने लगी पिताजी यह भोजन आप कहां से लाए हैं तब वृद्ध
ब्राह्मण ने उत्तर देते हुए कहा पुत्री यह भोजन मुझे दूसरे नगर की महारानी ने दिया
है उस नगर के राजा की पुत्र वधु बहुत ही दयालु और उदार हृदय की है उसने मुझ पर दया
करके मुझे यह स्वादिष्ट भोजन दिया है उस भोजन को देखकर उस वृद्ध ब्राह्मण की बेटी
की आत्मा से आशीर्वाद निकलने लगा वह भगवान से प्रार्थना करने लगी कि हे भगवान
जिसने भी मेरे पिता को यह भोजन दिया है
उसका सुहाग अमर रहे
और वह सदा सौभाग्यवती बनी रहे जैसे ही उसने भोजन का निवाला अपने मुंह में डाला
उसकी आत्मा की तृप्ति हो गई और उसकी आत्मा से सच्चे मन से आशीर्वाद निकलने लगे कि
महारानी का पति दीर्घायु और स्वस्थ रहे इधर राजकुमार शौर्यवीर अपने महल की ओर बढ़
रहा था और बगीचे के बाहर खड़े यमदूत उसकी मृत्यु का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे
परंतु जैसे ही राजकुमार बगीचे में उस सांड के सामने पहुंचा तो सांड ने तुरंत उसे
पीछे से ठोकर मारने के लिए अपनी ताकत जुटाई वह अपनी सींघ से उसे मारने ही वाला था
कि तभी अचानक से दो देवदूत वहां प्रकट हो जाते हैं और अपनी दिव्य शक्ति से उस सांड
को बेहोश कर देते हैं वह सांड हिल भी नहीं पा रहा था
उसमें आगे बढ़ने की
बिल्कुल भी शक्ति नहीं बची थी इस पर वह सांड अपने मन में सोचने लगा कि यह मुझे
क्या हो गया अभी तो मैं इस राजकुमार को पीछे से ठोकर मारने आया था और अब मैं खुद
ही चलने में असमर्थ हूं उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे और क्यों हो रहा
है भगवान विष्णु जी माता लक्ष्मी से कहते हैं हे देवी यह सब उस ब्राह्मण की भूखी
बेटी के आशीर्वाद का प्रभाव था जो उसने भोजन करते समय दिया था उस आशीर्वाद की
शक्ति के कारण ही वे देवदूत वहां आकर खड़े हो गए थे इसके बाद वे देवदूत यमराज के
उन दूतों से कहते हैं हे यमदूत तुम इस राजकुमार के प्राण नहीं ले सकते जिस प्रकार
श्राप असर दिखा सकता है उसी प्रकार आशीर्वाद भी फलित हो सकता है अब राजकुमार और
सांड के बीच वे दो देवदूत आशीर्वाद रूपी दीवार बनकर खड़े थे और राजकुमारी का दान
मृत्यु के समय को आगे नहीं बढ़ने दे रहा था फिर वे यमदूत उन देव दूतों से कहते हैं
हे देवदू तों तुम
सभी यहां से लौट जाओ और हमें हमारा काम करने दो क्योंकि हमारा उद्देश्य है इस
राजकुमार के प्राण लेकर यमलोक लौट जाना तब देव दूतों ने दृढ़ता से उत्तर दिया नहीं
यम दूतों ऐसा कभी नहीं हो सकता हमारे रहते यह असंभव है क्योंकि हमें स्वयं भगवान
शिव जी ने यहां भेजा है दोनों पक्षों के बीच बहस छेड़ गई और फिर यह बहस धीरे-धीरे
एक युद्ध में बदल गई देव दूतों की अद्वितीय शक्ति के सामने यमदूत असहाय हो गए और
हार मानकर वापस यमलोक लौट गए यमलोक में पहुंचकर यम दूतों ने यमराज जी से कहा हे
महाराज हम उस राजकुमार के प्राण नहीं ले पाए तब यमराज जी अपने उन दूतों से कहते
हैं यह कैसी विडंबना है तुम लोग खाली हाथ क्यों वापस लौट आए यमराज जी की बात सुनकर
यमदूत यमराज जी से कहते हैं हे महाराज हम उस राजकुमार के प्राणों को लेने के लिए
गए थे
लेकिन अचानक से पता
नहीं दो देवदूत हमारे सामने आकर खड़े हो गए और उन दोनों के सामने हमारी कोई भी
शक्ति काम नहीं कर पाई यमराज यह सुनकर सोच में पड़ गए और बोले ऐसी कौन सी बड़ी
शक्ति है जो उस राजकुमार की मृत्यु के मार्ग में बाधा बन रही है फिर वे यमदूत
यमराज जी से कहते हैं हे महाराज एक तो उसके दान की शक्ति और आशीर्वाद की शक्ति
जिसने देवदू तों को और भी शक्तिशाली बना दिया है तब यमराज जी अपने दूतों से कहते
हैं लगता है यह कार्य तुमसे नहीं हो पाएगा तुम लोग रहने दो मुझे स्वयं पृथ्वी लोक
पर जाकर उस राजकुमार के प्राण लेने होंगे भगवान विष्णु जी कथा सुनाते हुए आगे कहते
हैं हे देवी फिर अपने दूतों से इतना कहकर यमराज जी स्वयं पृथ्वी लोक पर पहुंच जाते
हैं और उस राजा के महल के बगीचे में प्रकट हुए वहां उन देवदू तों से यमराज जी कहते
हैं हे देवदू तों क्या तुम लोग नहीं जानते कि विधि का विधान अटल है जब किसी की आयु
पूरी हो जाती है तो उसे यमलोक जाना ही होता है और इस राजकुमार की भी आयु अब पूर्ण
हो चुकी है
इसलिए मैं इसके
प्राण लेने आया हूं तब देवदू तों ने यमराज से कहा हे प्रभु आप हमें बताइए कि
ब्रह्मा जी और विष्णु जी तक को भी श्राप का प्रभाव सहना पड़ा था यदि श्राप का मान
रखा जा सकता है तो क्या आशीर्वाद का मान नहीं रखा जा सकता इस राजकुमार को भूखे को
भोजन देने का आशीर्वाद प्राप्त है उन देवदू तों की बात सुनकर यमराज जी उन देवदू
तों से कहते हैं आप लोग सत्य कह रहे हैं परंतु अब मुझे क्या करना होगा तब वे
देवदूत यमराज जी से कहते हैं हे प्रभु आप इस राजकुमार की आयु 100 वर्ष कर दीजिए इसके बाद
ही आप इस राजकुमार के प्राण लेने के लिए पधार सकते हैं और यही भगवान शिव जी का भी
आदेश है उन देवदू तों की बात मानकर यमराज जी ने राजकुमार शौर्यवीर की आयु 100 वर्ष कर दी और वापस यमलोक
लौट गए भगवान विष्णु जी कहते हैं हे देवी प्रकार एक भूखे को भोजन देने के पुण्य के
कारण उस राजकुमार की मृत्यु टल गई और उसकी आयु भी बढ़ गई इसी कारण कहा जाता है कि
अन्न दान सबसे बड़ा दान है किसी भूखे को दिया गया अन्न अश्वमेध यज्ञ के फल के
बराबर होता है भगवान विष्णु जी माता लक्ष्मी जी से कहते हैं
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