Skip to main content

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

सब्र का फल

 रामनगर नाम का एक शांत और सुंदर गांव था। जहां अधिकतर लोग खेती या वनों से लकड़ी लाकर अपना जीवन यापन करते थे। गांव के किनारे पर एक मिट्टी का छोटा सा घर था जिसमें लकड़हारा रूपेश अपनी पत्नी रूपपाली और अपने एक बेटे के साथ रहता था। रुपेश मेहनती तो था पर उसकी किस्मत जैसे रूठी हुई थी। वह जब भी जंगल में लकड़ी काटने जाता, उसे मनशाही लकड़ी नहीं मिलती। एक दिन सुबह रूपेश अपनी पुरानी और जंग खाई कुल्हाड़ी कंधे पर लटकाए खाली पेट ही जंगल की ओर निकल पड़ा। रास्ते में वह सोचते हुए चल रहा था।

आज थोड़ा जल्दी निकला हूं। शायद आज अच्छी लकड़ियां मिल जाए। बहुत दिनों से खाली हाथ ही लौट रहा हूं। अब बच्चों की आंखों में जो उम्मीद देखता हूं वो दिल को कचोटती है। जंगल में पहुंचकर रूपेश इधर-उधर भटकता रहा। कभी किसी सूखे पेड़ के पास जाता तो कभी किसी झाड़ झंघाड़ के बीच में घुस जाता। लेकिन हर जगह वही हाल। या तो लकड़ियां गीली थी या पहले से कोई काट चुका था। उसे आज भी कोई अच्छी लकड़ी नहीं मिलती है। पर थक हार कर खाली हाथी घर की तरफ लौटने लगा। सामने से गोविंद लकड़हारा आता दिखा। उसके सिर पर लकड़ियों का बड़ा गट्ठर था और चेहरे पर विजय की मुस्कान।

 गोविंद रूपेश को खाली हाथ ही लौटते देख बोला, अरे रूपेश भैया फिर से खाली हाथ। तुम तो अब जंगल में आने का टाइम टेबल ही बना लो। देर से आना और खाली हाथ लौट जाना। तुम्हें तो आदत हो गई है खाली हाथ जाने की। क्या करूं गोविंद भैया? मनचाही अच्छी लकड़ी ही नहीं मिलती। मैं जंगल आता हूं। उससे पहले ही लोग अच्छी लकड़ियां काट कर ले जाते हैं। जंगल किसी के बाप का थोड़ी ना है। जो पहले आए वो ज्यादा पाते हैं। तुम तो रोज देर से आते हो। फिर शिकायत कैसी? इतना कहकर गोविंद हंसता हुआ आगे बढ़ गया। रूपेश चुपचाप अपने घर लौटने लगा। घर पर रूपेश की पत्नी रूपाली और उसका बेटा बाहर खड़े उसकी राह देख रहे थे।

 अरे आ गए आप? ओह आज फिर से खाली हाथ लौट आए। इसका मतलब आज फिर से कुछ नहीं मिला। ऐसे कैसे काम चलेगा? क्या करूं भाग्यवान? ना लकड़ियां मिली ना उम्मीद। एक भी ऐसा पेड़ नहीं मिला जिसकी मैं लकड़ियां काट सकूं। जंगल भी अब जैसे मेरा साथ छोड़ चुका है। हम तो सोच रहे थे कि आप लकड़ी बेचकर कुछ पैसे लाएंगे और आज रात हम भर पेट खाना खा पाएंगे। अब घर में राशन भी खत्म होने को है। मैं क्या करूं रूपपाली? रोज तो मेहनत करता हूं मगर नसीब ही साथ नहीं देता। बाकी सभी लकड़हारों को लकड़ी मिलती है। सभी अच्छे पैसे कमा रहे हैं। एक मेरी ही किस्मत फूटी हुई है। इसके बाद घर में जितना थोड़ा राशन था वे लोग उसका खाना खाकर सो जाते हैं।

 अगले दिन रूपेश पहले से भी ज्यादा जल्दी उठता है। कुल्हाड़ी लेकर अंधेरे में ही जंगल की ओर चल पड़ता है। आज कोई मुझसे पहले नहीं पहुंचेगा। आज मैं बहुत सारी लकड़ियां काट कर ले आऊंगा। आज तो लकड़ियों की कमी नहीं होगी। पर जंगल में पहुंच कर देखा तो वही हाल। लकड़ियां पहले से काट ली गई थी। रूपेश यह देख के दुखी हो जाता है। ये क्या? मैं तो सूरज उगने से पहले आ गया और फिर भी सारे पेड़ कटे हुए हैं। तभी उसे सामने से मंगल लकड़हारा आता दिखा जो लकड़ियों से भरी बैलगाड़ी खींचता हुआ आ रहा था। उसे देखकर रूपेश उससे बोला क्या मंगल भाई? इतनी सुबह-सुबह ये सब कैसे कर लिया? इतनी सारी लकड़ियां कैसे काट ली इतनी जल्दी? अरे भाई मैं तो रात में ही आ जाता हूं। जब सब सो रहे होते हैं तब मैं लकड़ी काटता हूं।

 सुबह तो पूरा जंगल भर जाता है लकड़हारों से। इसीलिए मैं रात में ही आकर लकड़ियां काट कर ले जाता हूं। लगता है यह काम मेरे बस का नहीं है। मैं इतना जल्दी आया सोचा आज तो अच्छी लकड़ियां मिलेगी। पर यहां तो मुझसे ही पहले रात में ही लकड़ियां काट ली गई हैं। अब क्या करूं मैं? समझ नहीं आता। माफ करना भाई। तुम्हें लकड़ी देने का मन तो है पर इस बार मेरे घर में भी बहुत जरूरत है। इसलिए माफ करना मैं लकड़ियां नहीं दे सकता। इतना कहकर मंगल लकड़हारा अपनी बैलगाड़ी लेकर चला गया। और रूपेश रोज की तरह घूम फिर कर मायूस होकर घर लौट आया। ऐसे ही दिन बीतते गए। रूपेश को लकड़ियां नहीं मिली।

 घर में राशन खत्म हो गया था। बच्चे भूखे पेट सोने लगे। सुनिए जी अब तो घर में राशन भी खत्म हो गया है। अब भी अगर लकड़ियां नहीं बिकी तो हम सबको भूखा ही रहना पड़ेगा। मुझे अब कोई ना कोई रास्ता निकालना ही होगा। ऐसे हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते वरना हम सब भूखे मर जाएंगे। हमेशा की तरह रूपेश आज भी एक उम्मीद लिए जंगल की ओर जा रहा था कि रास्ते में उसने देखा एक व्यक्ति जमीन पर बैठा कराह रहा है। पास जाकर देखा तो वह एक कीमती कपड़ों में सजा हुआ व्यक्ति था। उसे देखकर रूपेश बोला मुखिया जी आपको क्या हुआ? आप ऐसे क्यों करा रहे हैं? अरे भाई मेरी मदद करो। मैं शिकार पर निकला था लेकिन पता नहीं कैसे अचानक से इस फंदे में फंस गया हूं।

 पैर से खून भी बह रहा है। आप चिंता मत कीजिए मुखिया जी। मैं अभी आपको निकालता हूं। रूपेश ने सावधानी से फंदा खोला। मुखिया का पैर बाहर निकाला और उसने अपने हाथों से पट्टी बांध दी। तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद। तुमने मेरी जान बचाई है। तुम कौन हो? और इस जंगल में क्या कर रहे हो? मेरा नाम रूपेश है मुखिया जी। मैं रामनगर का एक लकड़हारा हूं। रोज इस जंगल में लकड़ियां काटने आता हूं। फिर रूपेश अपनी सारी बात मुखिया जी को बताता है। रूपेश तुमने मेरी जान बचाई है। इसलिए आज से उत्तर दिशा का मेरा जंगल केवल तुम्हारे लिए आरक्षित है। वहां अब तुम्हारे सिवा कोई और लकड़ी नहीं काटेगा। मुखिया जी की यह बात सुनकर रूपेश बहुत खुश हो जाता है। आपका बहुत-बहुत आभार मुखिया जी। आपने मुझ जैसे गरीब की जिंदगी बदल दी। मैं इतने दिनों से काफी परेशान था।

 आज अगर आप नहीं मिलते तो हमारे पूरे परिवार को भूखा ही सोना पड़ता। मुखिया जी द्वारा दिया गया जंगल रूपेश के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अगले दिन वह बड़े ही विश्वास और जोश के साथ उस विशेष जंगल में पहुंचा जिसे अब सिर्फ उसके लिए आरक्षित किया गया था। [संगीत] अरे वाह कितना सुंदर और शांत जंगल है। चारों ओर ऊंचे मजबूत और सीधे खड़े पेड़। इनसे तो खूब लकड़ी मिलेगी। भगवान का लाख लाख शुक्र है। आज हमें खाली पेट नहीं सोना पड़ेगा। चलो अभी जल्दी से लकड़ियां काट लेता हूं। रूपेश ने एक मजबूत पेड़ के तने पर कुल्हाड़ी चलाई। लेकिन पेड़ पर कोई असर नहीं हुआ। जिसे देख रूपेश दंग रह गया। अरे ये क्या? मैंने तो आज ही कुल्हाड़ी की धार तेज की थी। फिर भी पेड़ पर कोई असर नहीं हो रहा।

 रूपेश ने फिर से कुल्हाड़ी चलाई पर पेड़ पर कोई असर नहीं हुआ। उसने दूसरे पेड़ पर कोशिश की। फिर तीसरे पर। पर हर जगह वही हाल। पेड़ पर कोई असर नहीं हो रहा था। रूपेश को घबराहट होने लगी। ये क्या? एक भी पेड़ पर कुल्हाड़ी का कोई असर नहीं हो रहा। कहीं मुखिया जी ने मुझे कोई बंजर जंगल तो नहीं दे दिया। अब क्या होगा? बच्चों के लिए यही तो उम्मीद जागी थी। तभी पीछे से एक मधुर और शांत स्वर आया। पुत्र वो पेड़ ऐसे नहीं कटेगा। प्रणाम बाबा। आप कौन हैं? और यह पेड़ कैसे कटेगा फिर? मैं इस वन का रक्षक हूं। तपोवन बाबा। यह जंगल कोई साधारण जंगल नहीं है। इसकी रक्षा वर्षों से मैं कर रहा हूं। परंतु बाबा इस जंगल से लकड़ियां काटने का अधिकार मुझे मुखिया जी ने दिया है। मुझे लकड़ी काटनी है। मेरा परिवार भूखा है। फिर रूपेश ने उन्हें अपनी पूरी व्यथा सुना दी।

 गरीबी, बच्चों की भूख, दूसरों का ताना और अब उम्मीद का अंतिम सहारा। तपोवन बाबा ने गहरी सांस ली और बोले, तुम सच्चे और मेहनती लगते हो पुत्र इसलिए मैं इस वन को तुम्हारे लिए खोलता हूं। पर एक शर्त पर कैसी शर्त बाबा? तुम केवल उतनी ही लकड़ी काटोगे जितनी जरूरत हो। और जब कोई जरूरतमंद मिले तो उसकी मदद अवश्य करोगे। अगर तुमने लोभ किया या पेड़ों का दोहन किया तो यह जंगल फिर से बंद हो जाएगा। बिल्कुल बाबा मैं वचन देता हूं कि मैं जरूरत से अधिक लकड़ियां कभी नहीं काटूंगा और जरूरतमंद की मदद भी करूंगा। रूपेश ने उस दिन जरूरत भर की लकड़ी काटी। बाजार में बेची और पहले दिन ही उसे दुगने पैसे मिले। घर पहुंचते ही उसने आटा, चावल, दाल, सब्जी, मिठाई, बच्चों के लिए गुड़ और रूपपाली के लिए एक नई साड़ी ली। लो रूपाली, आज तुम्हारे और बच्चों के लिए सब लाया हूं।

 आज पूरा बाजार ही खरीद लाया। हे भगवान, क्या यह वही रूपेश है जो कल तक खाली हाथ लौट रहा था? लगता है कोई चमत्कार हो गया है। इतने सारे पैसे कहां से आए तुम्हारे पास? चमत्कार नहीं भाग्यवान यह एक सच्चे मुखिया जी और एक बाबा की कृपा है जो हम पर हुई है। फिर रूपेश ने रूपपाली को सारी बात विस्तार से बताई। मुखिया जी से लेकर तपोवन बाबा तक। कुछ दिनों तक रूपेश लकड़ियां काटता रहा और अच्छी कमाई करता रहा। एक दिन उसने विचार किया अगर मैं इन लकड़ियों को जलाकर कोयला बनाऊं तो दाम और अधिक मिलेगा। बाजार में कोयले की भारी मांग है जिससे मुझे अच्छा मुनाफा होगा। और फिर क्या था? रूपेश ने अगले ही दिन से यह प्रयोग शुरू कर दिया। लकड़ियों को सही तरीके से सुलगाकर उनका कोयला तैयार करने लगा। धीरे-धीरे उसका कोयला बहुत प्रसिद्ध हो गया। गांव के व्यापारियों में उसके कोयले की चर्चा होने लगी।

 रूपेश भैया का कोयला आसपास में सबसे बढ़िया है। धुआं कम और गर्मी ज्यादा देता है। हां भैया उसके कोयले का कोई मुकाबला नहीं। पता नहीं वो इतनी अच्छी लकड़ियां कहां से लाता है और उसका कोयला इतना अच्छा होता है। देखा रूपाली अब लोग मेरे नाम से कोयला खरीदते हैं। मेरा कोयला बनाने का विचार कितना सही साबित हुआ। हां, सच कहा आपने? अगर इसी प्रकार से चलता रहा तो हम थोड़े ही दिनों में बहुत पैसे वाले हो जाएंगे। कुछ ही महीनों में रूपेश ने अच्छा धन जोड़ लिया। उसने अपनी मिट्टी के घर को तोड़कर पक्के ईंटों वाला दो मंजिला मकान बना लिया। गेट पर टीन की छत, अंदर पानी का हैंडपंप और बाहर लकड़ियों का बड़ा स्टोर। अरे यह वही रूपेश है ना जिसका लोग मजाक उड़ाते थे।

 अब देखो तो सही इसने तो कोठी बना ली है। भाई यह इसकी मेहनत और समझदारी का नतीजा है। इसने इसके लिए बहुत मेहनत की है। इस प्रकार से पूरे गांव में रूपेश की चर्चा होने लगी। एक दिन अचानक गांव में जोरदार बारिश शुरू हो गई। लगातार कई दिन बारिश होती रही। सारे लकड़हारों की लकड़ियां भीग गई। जंगल में सारे पेड़ भी पानी से लथपट हो चुके थे। अब क्या करें? सारी लकड़ियां तो गीली हो गई। अब इन्हें बेच भी नहीं सकते और इन्हें खरीदेगा भी कौन? उस रूपेश के पास तो सूखी लकड़ियों का भंडार है। वही हमारी मदद कर सकता है। चलो चलो फिर रूपेश के पास ही चलते हैं। शायद वह हमारी कुछ मदद कर दे। इसके बाद वे सब रूपेश के घर पहुंचे। रूपेश भैया हम बड़ी मुश्किल में हैं।

हमारी सारी लकड़ियां भीग गई हैं और जंगल में भी पानी भरा पड़ा है। थोड़ा लकड़ी दे दो ताकि हम भी बाजार में बेच सकें। अच्छा अब याद आए हम जब मैं भटक रहा था। मुझे जब खाली हाथ लौटना पड़ता था तब तुम ही हंसते थे ना। और अब आप लोगों को मुझसे मदद चाहिए। चले जाओ यहां से। नहीं दूंगा एक टहनी भी। निकलो यहां से। वे सब निराश होकर लौट गए। तभी उसकी पत्नी रूपपाली बोली, सुनिए जी, जब सबने आपका मजाक उड़ाया तब हमें दुख हुआ। लेकिन अगर हम भी वैसा ही करें तो क्या फर्क रह जाएगा हम में और उनमें? फर्क इतना ही है कि अब मैं कमजोर नहीं हूं। और मदद उसी की की जाती है जो अपनों को समझे। उन्होंने मेरी भी बुरे समय में मदद नहीं की। अब रूपेश दिन रात लकड़ी काटने और कोयला बनाने में लग गया। उसे पैसे की इतनी आदत हो गई कि वह जरूरत से ज्यादा पेड़ काटने लगा।

 जंगल में अब गिनती के ही पेड़ रह गए थे। अब जो भी बचा है सब काट लेता हूं। बाद में जो होगा देखा जाएगा। एक दिन बारिश की वजह से रूपेश की कुछ लकड़ियां गीली रह गई थी। रूपेश ने सोचा कि कोयला नहीं बना तो लकड़ी ही बेच दूं। वह लकड़ियां लेकर बाजार चला गया। बाजार में एक बुजुर्ग व्यापारी आया। वह दुर्लभ वस्तुओं का ज्ञानी था। वह रूपेश के पास आकर बोला, भैया, यह लकड़ियां कितने की है? जो आप उचित समझो दे देना। वैसे भी यह गीली है। इनका कोयला नहीं बन सका। इसीलिए मैं इन्हें यहां ले आया। बुजुर्ग व्यापारी ने एक लकड़ी को उठाया और उसे सूंघने लगा। सूंघते ही सुंदरलाल चौंक पड़ा। अरे यह तो चंदन है और तुम इसे जलाकर कोयला बना रहे थे। मूर्ख आदमी। ये आप क्या कह रहे हैं? क्या ये चंदन था? हां। यह सुगंधित चंदन है। इसका मूल्य हजारों में होता है और तुम इसे राख बना रहे थे। तुमसे बड़ा मूर्ख मैंने आज तक नहीं देखा। इतना कहकर बुजुर्ग व्यापारी चला गया। रूपेश सिर पकड़ कर बैठ गया। हे भगवान ये मैंने क्या कर दिया? मैंने तो अपनी किस्मत खुद जला दी।

तभी पीछे से वही रहस्यमई आवाज आई जो उस दिन जंगल में आई थी। उसने देखा तो उसके सामने तपोवन बाबा खड़े थे। मैंने पहले ही कहा था तुमसे जरूरत से ज्यादा मत काटो और दूसरों की मदद करो। पर तुम लोभी बन गए। दूसरों को तिरस्कृत किया। अब देखो वो चंदन जो तुम्हें लखपति बना सकता था, तुमने उसे राख में बदल दिया। बाबा मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अपने लालच में सब भूल गया। मुझे ज्यादा पैसों का लालच पड़ गया था। अब तुम्हारे लिए वह जंगल भी बंद हो गया है। पेड़ खत्म, सौभाग्य समाप्त। अब तुम कभी उस जंगल से लकड़ियां नहीं काट पाओगे। इतना कहकर तपोवन बाबा वहां से चले गए। रूपेश घंटों तक उसी जगह बैठा रहा जहां वहां कभी पूरे विश्वास के साथ पेड़ काटा करता था। अब वहां ना कोई पेड़ बचा था ना उम्मीद। मैंने कितना बड़ा पाप कर दिया। चंदन को जलाकर राग बना दिया। वो जो भगवान का दिया एक वरदान था उसे अपने लालच से खत्म कर दिया। मेरी बुद्धि मारी गई थी जो इतनी महंगी लकड़ी को जलाकर राख कर दिया। रूपेश उदास मन से घर लौटा। उसके चेहरे से साफ झलक रहा था कि कुछ बहुत बड़ा खो चुका है।

 क्या हुआ? आप इतने थके हुए और उदास क्यों लग रहे हैं? कोई परेशानी है क्या? रूपेश ने धीरे-धीरे सारी बात रूपपाली को बताई। चंदन की पहचान, बुजुर्ग व्यापारी की बात और तपोवन बाबा की डांट। आपने गलती की पर गलती तो हर इंसान से हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि जीवन खत्म हो गया। इसमें चिंता करने की कोई बात नहीं है। पर मैं अपने लालच में अंधा हो गया था। रूपपाली जो मदद मांगने आए उन्हें अपशब्द कहे। जब मुझे जरूरत थी तब सब ने ताना मारा। लेकिन क्या मैं उनसे अलग था? अगर आप अब भी कुछ अच्छा करना चाहे तो अभी भी समय है। हो सकता है जंगल ना रहे पर सेवा का रास्ता अब भी खुला है। अगले दिन रूपेश ने अपना पुराना गट्ठर और कुल्हाड़ी उठाई और गांव की गलियों में घूमने लगा। वो हर उस लकड़हारे के पास गया जिसे उसने पहले मना कर दिया था। गोविंद भाई, मंगल भाई, मैं आप सब से माफी मांगने आया हूं। जब आप सबको मेरी जरूरत थी तब मैंने मुंह मोड़ लिया। मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अरे नहीं रूपेश भैया आप क्यों माफी मांग रहे हैं? अब तो आप बहुत बड़े आदमी हो चुके हो। हम तो आपके आगे कुछ भी नहीं। नहीं गोविंद मैं अब वही हूं जो पहले था।

एक गरीब लकड़हारा। बस फर्क यह है कि मैंने अपने घमंड और लालच से अपना भाग्य जला डाला। अब मैं चाहता हूं कि मैं फिर से इंसान बन सकूं। मददगार इंसान। यह सुनकर सबकी आंखें भर आई। आप जैसा ईमानदार आदमी हमने कभी नहीं देखा भैया। जो अपनी गलती खुले दिल से स्वीकार कर ले वही असली इंसान होता है। हम सब मिलकर फिर से पेड़ लगाएंगे। जिस जंगल ने हमें जीवन दिया अब हमारी बारी है उसे जीवन देने की। फिर सबने मिलकर पुराने जंगल में पौधे लगाने शुरू किए। हर दिन कुछ लोग समय निकालकर जंगल को नया रूप देने में लग गए। कुछ महीनों में वह उजड़ा हुआ जंगल हराभरा होने लगा। एक सुबह रूपेश पौधों को पानी दे रहा था कि तभी पीछे से वहीं शांत स्वर सुनाई दिया। पुत्र मैं तुम्हारे अच्छे विचारों से प्रसन्न हुआ। अब तुम फिर से उसके योग्य हो गए हो। बाबा मैंने आपकी बात नहीं मानी और उसका फल भुगता। अब मैं सेवा करना चाहता हूं ताकि अपनी आत्मा को फिर से पवित्र कर सकूं।

 तुम्हारा पश्चाताप सच्चा है। अब मैं तुम्हें एक और वरदान देता हूं। दक्षिण दिशा में एक और जंगल है जहां चंदन के पेड़ हैं। परंतु अब तुम केवल व्यापार नहीं करोगे। तुम वहां से प्राप्त होने वाली धनराशि का एक भाग जरूरतमंदों की सेवा में लगाओगे और हो सके उतने पौधे लगाओगे। आपका आदेश सर माथे पर बाबा। रूपेश अब फिर से चंदन की लकड़ी की पहचान करके उसका उचित उपयोग करने लगा। लेकिन इस बार वह कमाता भी था और जरूरतमंदों की सहायता भी करता था। जंगल में खूब सारे पेड़ भी लगाए। गांव में अनाथ बच्चों के लिए एक स्कूल बनवाया। बीमारों के लिए एक छोटा सा औषधालय खोला। अब गांव में लोग उसे वन सेवक रूपेश के नाम से जानने लगे। एक दिन मुखिया जी फिर से रामनगर आए।

 जब उन्होंने देखा कि रूपेश अब गांव का सबसे इज्जतदार और प्रिय व्यक्ति बन गया है तो वे बहुत प्रसन्न हुए। रूपेश तुमने सिर्फ लकड़ी नहीं काटी। अपने कर्मों से अपनी किस्मत तराशी है। तुम्हें देखकर गर्व होता है कि मैंने अपना जंगल सही हाथों में सौंपा है। यह सब आपके आशीर्वाद और तपोवन बाबा की सीख से ही संभव हो सका है। मुखिया जी। मुखिया जी ने रूपेश को अच्छे पुरस्कार दिए और सारे वन सौंप दिए। कहानी की सीख प्रकृति का दोहन नहीं उसका संरक्षण करो। जिन्होंने तुम्हें गिराया उन्हें उठाने का मौका दो। फर्क वहीं से शुरू होता है। लोभ में पड़ा व्यक्ति अपना भाग्य राख बना बैठता है। गलती स्वीकार कर आगे बढ़ना ही सच्चा परिवर्तन है। इस प्रकार की मजेदार कहानियों को सुनने के लिए हमारे चैनल अकू टोन को सब्सक्राइब करना ना भूलें।

Comments

Popular posts from this blog

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...