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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

कलयुग का आगमन

 पांडव इस संसार से विरक्त होकर अपने पौत्र परीक्षित को राज्य सौंप कर स्वयं हिमालय को चले गए थे। एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार खेलने गए। इस प्रकार हमारा मार्ग रोकने वाले कौन होते हो तुम? महाराज परीक्षित मैं कलयुग हूं और काल की आज्ञा से इस धरती पर अवतार हुआ हूं और अब मैं आपके राज्य में प्रवेश करने वाला हूं। तुम्हारी यह दुष्टता, तुम्हारा यह साहस कि तुम पांडव वंशी परीक्षित के होते हुए धरती पर उतरना चाहते हो। इस सृष्टि से धर्म का नाश करना चाहते हो। इससे पहले हम तुम्हारा नाश कर देंगे। राजन प्रकृति के नियम अटल हैं। काल की गति किसी के बल से नहीं रुक सकती। जैसे सतयुग के पश्चात त्रेता युग आया। फिर त्रेता युग के पश्चात जैसे द्वापर युग का आना कोई न रोक ना सका वैसे ही द्वापर युग के बाद कलयुग का आना निश्चित है। इसलिए ज्ञानी जन काल के साथ युद्ध नहीं करते। यदि कलयुग के आने का समय हो गया है तब भी राजा परीक्षित के रहते उसका आगमन नहीं हो सकता।

यदि परीक्षित का रहना काल की गति पर रुकावट है तो संभव है कि परीक्षित के ना रहने का समय आ गया हो वह विधाता जाने किंतु वीर पुरुष मृत्यु के भय से अपने संकल्प का त्याग नहीं करते सो हे कलयुग तुम हमारे राज्य की सीमा से बाहर निकल जाओ राजन काल तो सार्वभौम है वो किसी सीमा को नहीं मानता मानना पड़ेगा हमारा ब्रह्मवर्त धर्म और सत्य का निवास है। इस ब्रह्मवरत से बाहर होना होगा तुम्हें। अन्यथा आज विधाता भी देख लेंगे कि महारथी अर्जुन के पौत्र जिसके गर्भ में रक्षा स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने की थी उसके बाणों में कितनी शक्ति है कि वह कलयुग का सर्वनाश कर सकता है। राजन आपका वचन भी रह जाए और प्रकृति का नियम भी ना टूटे। इसलिए मैं आपके जीवन काल तक अपने आप को कुछ सीमाओं में बांधना स्वीकार करता हूं। और राजन मैं आपकी शरण में आया हूं और शरण में आए हुए को स्थान देना आपका धर्म है। इसलिए मुझे वह स्थान बताइए जहां मैं रह सकूं। तुमने पांडव वंशी राजा से शरण मांगी है। हम तुम्हें रहने का स्थान अवश्य देंगे। परंतु तुम अधर्म के सहायक हो।

इसलिए हम तुम्हें केवल चार स्थानों में रहने की अनुमति देते हैं। तो सुनो कलयुग जहां जुआ खेला जाता हो, जहां मदिरापान होता हो, जहां पर स्त्री संग हो और जहां हिंसा होती हो, उन स्थानों में क्रमशः असत्य, मद, काम और जहां हिंसा और निर्दयता होती हो, सो तुम वहीं रहो। प्रभु किंतु यह चारों स्थान सीमित हैं। मुझे कोई और स्थान भी प्रदान करें। अच्छी बात है। जिस धन में रजोगुण का वास हो और जो धन अधर्म का हो तो तुम सोने में भी रह सकते हो। जो आज्ञा महाराज उस दिन राजा वन में शिकार की तलाश में भटकते-भटकते शाम हो गई थी। वह भूख प्यास से व्याकुल थे। तभी उन्हें कुटिया दिखी समीक ऋषि की। ऋषि उस समय समाधि में ब्रह्मलीन थे। हमें प्यास लगी है। हमें पानी चाहिए। यहां और कोई नहीं है क्या? आप सुन रहे हैं ना? हम राजा परीक्षित हैं और हमें प्यास लगी है। हमें पानी चाहिए। आपको सुनाई नहीं देता क्या? ऋषि उस समय समाधि में ब्रह्मलीन थे। राजा ने उनसे कई बार पानी मांगा परंतु उनका ध्यान राजा पर नहीं गया। राजमुकुट में बैठे कलयुग के कारण उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। कोई पाखंडी है झूठमूठ का समाधि लगाकर अपना प्रभाव डालना चाहता है। राजा का ना कोई स्वागत ना कोई आसन और तो और जल तक नहीं पूछा। इसी समय इस दुष्ट का वध कर देना चाहिए। अवश्य यह दंड का अधिकारी है। परंतु राजा ने उत्तम संस्कारों के कारण अपने आप को उस पाप से रोक लिया।

 क्रोधवश उन्होंने मरा हुआ सांप महर्षि समीक के गले में डाल दिया। राजमुकुट में बैठा काल यह सब देखकर हंसता है। उसी समय समीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी एक बड़ा तेजस्वी बालक था। वो उस समय नदी में स्नान कर रहा था। वहां ऋषि कुमारों ने जाकर उसे सब बताया कि किस प्रकार एक राजा ने उनका तिरस्कार किया है और उनके गले में एक सांप डाल दिया है। उनकी बात सुनकर वह क्रोध से पागल हो गया और उसी क्षण उसने अंजलि में जल भरकर राजा को श्राप दे दिया। जिस अभिमानी मूर्ख राजा ने मेरे महान पिता का ऐसे घोर अपमान किया है। वही महापापी आज से सातवें दिन तक्षक नाग के काटने से उसकी प्रचंड विष अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा। यह मेरा श्राप है और यह शाप इस धरती में कोई भी काट नहीं सकेगा। यह विनोद किसने किया हमारे साथ? गुरुदेव एक राजा आया था। हां, किसी घमंडी, क्रूर और महापापी राजा ने यह दुष्कर्म किया है। परंतु वह इसका दंड अवश्य भोगेगा। मैंने उसे भयानक श्राप दिया है। श्राप कैसा श्राप? हां पिताश्री। जो आपका अपमान करेगा वो इसका दंड अवश्य पाएगा।

 तक्षक नाग के विष में जो भयानक ज्वाला होती है, आज से सातवें दिन वो उसी ज्वाला में जलकर भस्म हो जाएगा। तुम जानते हो वो कौन था? नहीं। बिना जाने ही तुमने दंड दे दिया। वत्स तुमने बड़ा अनर्थ कर दिया। एक बड़े ही यशस्वी धर्म धुरंधर सम्राट को एक छोटी सी भूल के लिए इतना भयानक श्राप दे दिया। वह परम भक्त हैं। गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले हैं। अपनी प्रजा को संतान की भांति पालने वाले हैं। ऐसे राज्षि हैं जिनका सम्मान स्वयं देवता भी करते हैं। मूर्ख बालक ऐसे राजा के ना रहने से जो संसार में अनाचार फैलेगा। वैदिक धर्म का लोप हो जाएगा। लोग वर्ण शंकर हो जाएंगे। इस पाप में तुम्हारा भी भाग गिना जाएगा। तपस्या से शक्ति अवश्य मिलती है। परंतु उस शक्ति का उपयोग अपना बदला लेने के लिए कभी नहीं किया जाता। भक्त अपने अपमान, आक्षेप अथवा मारपीट का भी बदला नहीं लेते। तुमने तो एक निर्दोष राजा पर प्रहार किया है। जिसकी बुद्धि कुछ समय के लिए कलयुग ने हर ली थी। तुमने यह घोर अनर्थ किया है। अरे ये मैंने क्या कर दिया? प्राणनाथ आप इतने अचानक से घबरा क्यों गए? जैसे किसी आशंका से भयभीत हो उठे हो। हां रानी मैं भयभीत हो गया हूं। यह कलयुग का पहला प्रहार है। आगे क्या होगा? बस उसी का भय है। कैसा प्रहार स्वामी? आज मेरे हाथ से अनर्थ हो गया। जो हमारे कुल में आज तक नहीं किया गया वो आज मैंने किया।

 वो अपमान मैंने किया है एक महामुनि का। यह सब उस राजमुकुट के कारण है। अच्छा परंतु इस मुकुट में ऐसा क्या है? महारानी यह मुकुट हमारे दादा भीम ने जरासंध से युद्ध में जीता था। और हमने आज ही कलयुग से कहा था कि तुम द्वेष के धन में रह सकते हो। और वही हमारे ही सोने के मुकुट में विराज गया। और उस कलयुग ने उसी समय हमारी बुद्धि हर ली और हमसे ऐसा पाप करवा दिया जिससे विनाश निश्चय है। मुनिवर महाराज अब वे विश्राम करने के लिए चले गए हैं। आप कल प्रातः ही उनके दर्शन कर सकते हैं। यह उनकी निद्रा का समय है। नहीं वत्स यह उनकी निद्रा का समय नहीं जागने का समय है और मैं उन्हें जगाने आया हूं। उन्हें अपनी आती हुई मृत्यु का ज्ञान नहीं है। कल प्रातः तक तो बहुत समय निकल जाएगा। इसलिए मेरे लिए उनसे इसी समय मिलना परम आवश्यक है। इसी में उनकी भलाई है। जाओ तुरंत उन्हें हमारे आने की सूचना दो। जो आज्ञा मुनिवर फिर क्या हुआ महाराज? फिर क्या? बस जैसे ही मैंने मुकुट उतारा तभी मेरी पवित्र बुद्धि जागी। मैं इस अपराध के लिए बड़े से बड़े दंड का अधिकारी हूं। यदि आप उनके पास जाकर उनसे क्षमा मांग लें तो वे अवश्य आपको क्षमा कर देंगे।

 वे क्षमा करें या ना करें यह उनके ऊपर है। परंतु हमसे अपराध हुआ है तो हमें क्षमा मांगनी ही चाहिए। हम कल प्रातः उनके पास जाएंगे। महाराज की जय हो। क्या है महाराज? द्वार पर महामुनि समीक्ष ऋषि आपके दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या स्वयं महामुनि समीक्ष? जी महाराज। क्या वे क्रोध में है? रानी आप ये कैसी विचित्र बातें कर रही हैं? वे क्रोध में हो या ना हो परंतु इससे हमारे धर्म और कर्तव्य में कोई अंतर नहीं आना चाहिए। महामुनि द्वार पर खड़े हैं। हमें उन्हें अंदर लाकर यथोचित सत्कार करना चाहिए। महाराज आपके आगमन से राजमहल पवित्र हो गया है। इससे पहले कि आप हमारे दुष्कर्म की बात कहें। हम अपना अपराध स्वीकार करते हैं और आपको यह आश्वासन देते हैं कि हमारे उस जघन्य अपराध के लिए जो भी आप दंड देना चाहें हम उसे स्वीकार करेंगे। राजन तुम सचमुच एक महात्मा हो। हम अपने दिव्य दृष्टि से सब कुछ देख चुके हैं। जो कुछ भी हुआ वह तुम्हारे राजमुकुट में विराजमान कलयुग के प्रभाव के कारण हुआ। इसमें तुम्हारा दोष नहीं था। दोष तो केवल समय का है। इसलिए हमारे हृदय में यह सोचकर अत्यंत पीड़ा हो रही है कि जिस अपराध के लिए वास्तव में कोई और दोषी है उसके लिए तुम्हें इतना कठोर दंड भोगना पड़ेगा। प्रेरणा चाहे किसी की भी हो परंतु दोष तो मेरे ही द्वारा हुआ है।

 इसके लिए मुझे दंड मिलना उचित होगा। इसलिए हे मुनिवर आप हमें कठोर से कठोर दंड देने में संकोच ना करें। नहीं राजन मैं तुम्हें कदापि दंड नहीं देना चाहता क्योंकि मैं तुम्हें दोषी नहीं मानता तो दंड क्यों दूं यहां तक कि यदि मेरे वश में होता तो लोक कल्याण के लिए वह दंड तुम्हारे बदले मैं स्वयं स्वीकार कर लेता। कलयुग में प्रजा को तुम्हारे जैसा राजा फिर कहां मिलेगा? तुम्हारे जैसे धर्मात्मा राजा के जीवन की रक्षा करना लोक कल्याण का कार्य है। परंतु क्या करें राजन? मेरे वश में अब कुछ भी नहीं है। तुम्हारा दंड निर्धारित हो चुका है। प्रभु यह दंड किसने निर्धारित किया है? मेरे पुत्र ऋषि श्रृंगी ने। जब उसने ऋषि कुमारों के मुख से यह सुना कि किसी राजा ने उसके पिता के गले में मरा हुआ सर्प डालकर घोर अपमान किया है तो उसी क्षण वो क्रोध में वशीभूत हो गया और उसने तुम्हें यह श्राप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नाग के काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। नहीं यह नहीं हो सकता। विधि के धनुष से दुर्भाग्य का बाण निकल चुका है। वो वापस नहीं होगा। मैं तुम्हें यही बताने आया हूं कि इस संसार में तुम्हारे बचने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए केवल तुम एक ही काम करो। तुम अपने परलोक को सुधारने का कार्य करो। और हां राजन जिस स्त्री और पुत्र की तुम चिंता कर रहे हो वे तुम्हारे साथ नहीं जाएंगे। वे यहीं रहेंगे।

 चिंता और मोह को छोड़कर तुम इसी क्षण अपने गुरुजनों से परामर्श लो जिससे वे तुम्हें वह सद्मार्ग दिखाएं जिससे तुम अपनी गति सुधार सको ताकि तुम इस देह को छोड़कर जब दूसरे लोक में जाओ तो तुम्हारा वैसा ही सत्कार हो जैसा महापुरुषों का होता है जैसा देवलोक में होता है। राजन भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति दे। महाराज परीक्षित आप अर्ध रात्रि के समय सब कुशल तो है ना गुरुदेव मुझे अभी-अभी यह ज्ञात हुआ है कि महामुनि समीक के पुत्र ऋषि श्रृंगी ने मुझे श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन मेरी मृत्यु हो जाएगी। भगवन मैं यह जानने के लिए आपके पास आया हूं कि जिस मनुष्य के जीवन में केवल सात दिन शेष रह जाए तो वह ऐसा क्या करें? कौन सा कर्म करें जिससे उसका परलोक सुधर जाए और वह मुक्ति प्राप्त कर सके। हे राजन जिसे मुक्ति की कामना हो उसके पास केवल एक ही मार्ग है भक्ति का मार्ग। परंतु गुरुदेव प्राणी के हृदय में भक्ति इस प्रकार प्रवाहित हो इसका कोई सरल साधन है क्या? हे राजन अति सरल साधन है। भगवान वेदव्यास ने कहा है व्यासाय विष्णु रूपाय व्यास रूपाय विष्णवे नमो व ब्रह्म निधए वासिष्ठाय नमो नमः इदम पुराणम पठ यह सदा शणोतिवा भक्ति युतो नर सर्व पाप विन्मरक्तो यत फलम तदवापनोयात अर्थात जो फल तपस्या योग एवं समाधि से भी प्राप्त नहीं होता कलयुग में वही फल श्री हरि के कीर्तन से अर्थात कृष्ण लीला के गान से सहज ही प्राप्त हो जाता है। इसलिए राजन तुम श्रीमद् भागवत का श्रवण और कीर्तन करो।

 उसमें श्री कृष्ण की लीलाओं का दिव्य वर्णन है। उसी के श्रवण से उत्पन्न हुई भक्ति तुम्हारे मोक्ष का कारण बनेगी। यदि ऐसा है गुरुदेव तो आप मुझे अपना सेवक मानकर मुझे भागवत कथा का दान दीजिए। राजन इस समय उसके पूर्ण अधिकारी भगवान वेदव्यास के पुत्र भगवान सुखदेव जी हैं। तुम उनकी शरण में जाओ। वे अवश्य ही तुम्हें श्रीमद् भागवत का श्रवण पान कराएंगे।

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