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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

खुद को बदलने की शुरुआत

 

 


 

शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी गली थी, जहाँ सुबह होते ही चाय की दुकानों से उठती भाप, साइकिलों की घंटियाँ और लोगों की आवाज़ें मिलकर एक अलग ही दुनिया बना देती थीं। उसी गली के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा किराए का मकान था, जिसमें विमल अपनी माँ के साथ रहता था। घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसकी माँ ने हमेशा उसे साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखने की कोशिश की थी। घर की दीवारों पर समय के निशान थे, खिड़की के पास रखी पुरानी लकड़ी की मेज पर कुछ किताबें पड़ी रहती थीं और एक कोने में विमल का बिखरा हुआ सामान हमेशा इस बात की गवाही देता था कि वह अपनी जिंदगी को लेकर कितना लापरवाह हो चुका था। विमल की उम्र लगभग अट्ठाईस साल थी। उसके सामने जिंदगी की लंबी राह थी, लेकिन उसे ऐसा लगता था जैसे उसकी जिंदगी पहले ही कहीं रुक गई है। वह अक्सर दोस्तों के साथ घंटों बैठा रहता, मोबाइल पर बेवजह वीडियो देखता, देर रात तक जागता और सुबह देर से उठता। काम उसके पास था, लेकिन वह उसमें मन नहीं लगाता था। पैसे कम थे, तो वह परिस्थितियों को दोष देता था। मौके नहीं मिलते थे, तो वह किस्मत को दोष देता था। लोग उसकी मदद नहीं करते थे, तो वह लोगों को स्वार्थी कहता था। धीरे-धीरे उसने अपनी जिंदगी की हर समस्या के लिए कोई न कोई बाहरी कारण ढूँढ़ लिया था। बस एक चीज़ थी जिसे वह कभी अपनी समस्या नहीं मानता था—वह खुद।

 

विमल एक निजी कंपनी में काम करता था। नौकरी बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी जरूर थी कि घर का खर्च किसी तरह चल सके। उसके पिता का कुछ वर्ष पहले निधन हो चुका था। पिता के जाने के बाद उसकी माँ ने सिलाई का काम करके घर संभाला था। माँ हमेशा चाहती थीं कि विमल अपने पैरों पर खड़ा हो, मेहनत करे और एक दिन ऐसा जीवन जिए जिसमें उसे किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े। लेकिन विमल का स्वभाव धीरे-धीरे ऐसा हो गया था कि वह माँ की किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता था। माँ सुबह उसे उठाने आतीं तो वह चादर सिर तक खींचकर कहता, “बस पाँच मिनट और।” वे पाँच मिनट अक्सर एक घंटे में बदल जाते। माँ कहतीं, “बेटा, समय की कीमत समझो।” विमल हँसकर जवाब देता, “माँ, मेरी जिंदगी में ऐसा भी क्या खास होने वाला है कि समय की इतनी चिंता करूँ?” माँ उसकी तरफ देखतीं और चुप हो जातीं। उन्हें पता था कि बेटा बुरा नहीं है, लेकिन उसने अपने अंदर की अच्छी चीज़ों पर धूल जमा दी है।

 

विमल का सबसे करीबी दोस्त था राघव। राघव भी उसी शहर में रहता था, लेकिन दोनों की जिंदगी में जमीन-आसमान का फर्क था। राघव भी कभी बहुत अनुशासित नहीं था, लेकिन उसने कुछ वर्षों पहले अपनी जिंदगी बदलने का फैसला किया था। उसने सुबह जल्दी उठना शुरू किया, नई चीजें सीखीं, अपनी नौकरी के साथ-साथ एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया और धीरे-धीरे उसकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। जब भी वह विमल से मिलता, उसे समझाने की कोशिश करता। एक दिन दोनों चाय की दुकान पर बैठे थे। राघव ने कहा, “विमल, तू इतना परेशान क्यों रहता है?” विमल ने चाय का कप रखते हुए कहा, “परेशान न रहूँ तो क्या करूँ? नौकरी में तरक्की नहीं, पैसे नहीं, घर की जिम्मेदारियाँ अलग और ऊपर से कोई साथ देने वाला नहीं।” राघव मुस्कुराया और बोला, “तूने कभी सोचा है कि इन सब चीजों में तेरी अपनी गलती कितनी है?” विमल तुरंत नाराज़ हो गया। उसने कहा, “मतलब अब मेरी जिंदगी खराब है तो उसकी वजह भी मैं ही हूँ?” राघव ने शांत स्वर में कहा, “मैं यही कह रहा हूँ। अगर समस्या तू है, तो समाधान भी तू ही बन सकता है।” विमल ने उसकी बात का मजाक उड़ाया और कहा, “तू तो अब मोटिवेशनल स्पीकर बन गया है।” दोनों हँस पड़े, लेकिन राघव की बात विमल के मन में कहीं गहराई में जाकर बैठ गई।

 

कुछ दिन बाद कंपनी में एक जरूरी प्रोजेक्ट आया। उस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी विमल की टीम को दी गई। अगर टीम सफल होती, तो कर्मचारियों को पदोन्नति और वेतन वृद्धि मिलने की संभावना थी। विमल के अधिकारी ने सभी कर्मचारियों से कहा कि अगले दो महीनों में उन्हें बहुत मेहनत करनी होगी। बाकी लोग काम में लग गए, लेकिन विमल ने शुरुआत के कुछ दिनों बाद ही अपना ध्यान खो दिया। वह काम को टालता रहा। जब कोई उसे याद दिलाता तो वह कहता, “हो जाएगा।” जब समय कम होने लगा तो उसने दूसरों पर निर्भर रहना शुरू कर दिया। एक शाम उसके अधिकारी ने उसे अपने कमरे में बुलाया और पूछा, “विमल, तुम्हारा काम अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ?” विमल ने कहा, “सर, मुझे बाकी लोगों से जानकारी समय पर नहीं मिली।” अधिकारी ने कुछ देर उसकी तरफ देखा और फिर बोले, “हर बार तुम्हारे पास कोई न कोई कारण होता है। कभी साथी कर्मचारी जिम्मेदार होते हैं, कभी सिस्टम, कभी समय और कभी परिस्थितियाँ। लेकिन एक बार भी तुमने यह नहीं कहा कि गलती मेरी थी।” विमल चुप रहा। अधिकारी ने आगे कहा, “तुममें क्षमता है, लेकिन क्षमता का कोई मतलब नहीं अगर उसके साथ जिम्मेदारी नहीं है।” यह बात विमल को अच्छी नहीं लगी। वह कमरे से बाहर आया और मन ही मन अधिकारी को ही दोष देने लगा।

 

प्रोजेक्ट की अंतिम तारीख आई और विमल की लापरवाही के कारण टीम का काम प्रभावित हुआ। कंपनी को नुकसान हुआ और पूरी टीम की मेहनत पर पानी फिर गया। बैठक में अधिकारी ने साफ कहा कि सबसे बड़ी गलती विमल की थी क्योंकि उसने अपनी जिम्मेदारी समय पर पूरी नहीं की। विमल के कुछ सहकर्मी उससे नाराज़ हो गए। जिस पदोन्नति की वह उम्मीद कर रहा था, वह तो नहीं मिली, उल्टा उसे चेतावनी दे दी गई। घर लौटते समय वह बहुत गुस्से में था। उसे लग रहा था कि दुनिया उसके खिलाफ है। उसने रास्ते में राघव को फोन किया और कहा, “सब मेरे खिलाफ हैं।” राघव ने पूछा, “क्या हुआ?” विमल ने सारी बात बताई। राघव कुछ देर चुप रहा और फिर बोला, “इस बार भी तू यही कहेगा कि गलती तेरी नहीं थी?” विमल ने गुस्से में फोन काट दिया।

 

उस रात विमल देर तक सो नहीं सका। कमरे में अंधेरा था और खिड़की से बाहर सड़क की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। माँ दूसरे कमरे में सो रही थीं। विमल मोबाइल हाथ में लेकर बैठा था, लेकिन पहली बार उसे मोबाइल देखने का मन नहीं हो रहा था। उसे अधिकारी की बात याद आ रही थी—“एक बार भी तुमने यह नहीं कहा कि गलती मेरी थी।” उसने अपने जीवन के पिछले कुछ वर्षों को याद करना शुरू किया। कॉलेज में जब अच्छे अंक नहीं आए थे, उसने शिक्षकों को दोष दिया था। नौकरी में जब प्रमोशन नहीं मिला, उसने बॉस को दोष दिया था। जब पैसे कम पड़ते थे, वह किस्मत को दोष देता था। जब दोस्त दूर हुए, उसने कहा कि लोग बदल गए हैं। जब माँ उसे समझाती थीं, तो वह कहता था कि माँ उसे समझती ही नहीं। लेकिन उसने कभी खुद से नहीं पूछा था कि शायद बदलने की जरूरत उसे ही है।

 

वह उठकर कमरे की बत्ती जलाकर आईने के सामने खड़ा हो गया। कुछ देर तक वह अपने चेहरे को देखता रहा। उसे लगा जैसे आईने में दिखाई देने वाला व्यक्ति वही विमल था जिसे वह वर्षों से दूसरों के सामने दिखाता आया था, लेकिन वह यह भूल गया था कि खुद से कुछ छिपाया नहीं जा सकता। उसने धीमे से खुद से पूछा, “मैं आखिर बन क्या गया हूँ?” उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था। उसने मेज पर पड़ी एक पुरानी डायरी उठाई। यह डायरी उसके पिता ने उसे कई साल पहले दी थी। पिता कहा करते थे, “जब कभी जिंदगी समझ न आए, तो अपने विचार लिखना। कागज कभी झूठ नहीं बोलता।” विमल ने डायरी खोली। कई पन्ने खाली थे। उसने पेन उठाया और पहली बार अपने बारे में ईमानदारी से लिखा—“मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी समस्या शायद मेरी परिस्थितियाँ नहीं, मेरा रवैया है।”

 

उस एक वाक्य को लिखने के बाद उसे अजीब-सा महसूस हुआ। जैसे उसने अपने अंदर छिपे किसी सच का दरवाजा खोल दिया हो। उसने अगले पन्ने पर लिखा, “मैं देर से उठता हूँ। मैं काम टालता हूँ। मैं दूसरों को दोष देता हूँ। मैं अपने समय की कद्र नहीं करता। मैं नई चीजें सीखने से बचता हूँ। मैं अपनी गलतियाँ स्वीकार नहीं करता। मैं माँ की बातों को नजरअंदाज करता हूँ। मैं अपने भविष्य के बारे में सोचने के बजाय वर्तमान में आराम तलाशता हूँ।” लिखते-लिखते उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने डायरी बंद कर दी। उसे महसूस हुआ कि किसी और ने उसकी जिंदगी नहीं बिगाड़ी थी। उसने खुद अपनी जिंदगी को धीरे-धीरे कमजोर किया था।

 

अगली सुबह जब अलार्म बजा तो विमल ने हमेशा की तरह उसे बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन तभी उसे पिछली रात की डायरी याद आ गई। उसने कुछ सेकंड आँखें बंद कीं और फिर बिस्तर से उठ गया। घड़ी में सुबह के पाँच बजकर पैंतालीस मिनट हो रहे थे। इतनी सुबह उठना उसके लिए वर्षों बाद हुआ था। बाहर अभी अंधेरा था। माँ भी जाग गईं और जब उन्होंने विमल को उठे हुए देखा तो हैरान रह गईं। उन्होंने पूछा, “आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या?” विमल मुस्कुराया और बोला, “नहीं माँ, बस मैं थोड़ा बदलने की कोशिश कर रहा हूँ।” माँ ने उसकी तरफ देखा। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

 

विमल ने उस दिन कोई बड़ा लक्ष्य नहीं बनाया। उसने सिर्फ यह तय किया कि वह अगले चौबीस घंटे बेहतर तरीके से जीने की कोशिश करेगा। उसने कमरे की सफाई की, अपना बिस्तर ठीक किया, मोबाइल को कुछ देर के लिए बंद किया और आधे घंटे तक टहलने चला गया। रास्ते में उसे कई बार वापस घर जाकर सो जाने का मन हुआ, लेकिन वह चलता रहा। उसे महसूस हुआ कि खुद को बदलना भाषण सुनने जितना आसान नहीं था। जब शरीर वर्षों से आलस का आदी हो जाए, तो अनुशासन का पहला कदम ही बहुत भारी लगता है। लेकिन उस दिन उसने एक बात समझी—बदलाव का मतलब यह नहीं कि इंसान एक दिन में पूरी तरह बदल जाए। बदलाव का मतलब है कि वह हर दिन अपने पुराने रूप से थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करे।

 

ऑफिस में भी उसने अपना रवैया बदलने की कोशिश की। उसने अपने अधिकारी के पास जाकर कहा, “सर, पिछली गलती मेरी थी। मैंने काम समय पर पूरा नहीं किया और टीम को परेशानी हुई। मैं इसके लिए माफी चाहता हूँ।” अधिकारी कुछ क्षण उसे देखते रहे। शायद उन्होंने विमल से ऐसी बात की उम्मीद नहीं की थी। उन्होंने कहा, “गलती मानना अच्छी शुरुआत है। अब इसे दोहराना मत।” विमल ने सिर हिलाया। उस दिन उसने अपने काम की एक सूची बनाई और सबसे जरूरी काम पहले करने शुरू किए। जब किसी सहकर्मी से जानकारी समय पर नहीं मिली, तो उसने शिकायत करने के बजाय खुद जाकर बात की। उसे समझ आने लगा कि जिम्मेदारी लेने से समस्या छोटी नहीं होती, लेकिन इंसान मजबूत जरूर हो जाता है।

 

हालाँकि बदलाव की राह इतनी आसान नहीं थी। कुछ दिन तक विमल बहुत उत्साहित रहा। वह सुबह उठता, व्यायाम करता, पढ़ाई करता और काम समय पर पूरा करता। उसे लगता था कि अब सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन दसवें दिन एक सुबह बारिश हो रही थी। अलार्म बजा और उसने सोचा, “आज नहीं उठता, कल से पक्का।” वह फिर सो गया। जब उठा तो आठ बज चुके थे। ऑफिस पहुँचने में देर हुई। काम भी बिगड़ा। शाम को वह खुद से नाराज़ हुआ। पहले होता तो वह किसी को दोष देता, लेकिन इस बार उसने डायरी खोली और लिखा, “आज मैं हार गया, लेकिन मैं खत्म नहीं हुआ।” उसने समझा कि बदलाव में पीछे हटना भी होता है। जरूरी यह नहीं कि इंसान कभी गिरे ही नहीं; जरूरी यह है कि गिरने के बाद वह खुद को उठाना सीख जाए।

 

कुछ सप्ताह बाद विमल ने एक और आदत बदलने का फैसला किया। वह हर रात सोने से पहले अगले दिन के तीन जरूरी काम लिखने लगा। उसने मोबाइल इस्तेमाल करने का समय कम किया। पहले वह रात के दो-दो बजे तक सोशल मीडिया देखता रहता था। अब उसने तय किया कि रात दस बजे के बाद मोबाइल दूर रखेगा। शुरुआत में उसे बहुत बेचैनी हुई। उसे लगता था कि मोबाइल के बिना वह खाली हो गया है। लेकिन धीरे-धीरे उसने उस खाली समय में किताबें पढ़ना शुरू किया। उसे पहली बार पता चला कि वर्षों से उसके भीतर सीखने की इच्छा दबकर बैठी थी।

 

एक दिन राघव उससे मिलने आया। उसने विमल को देखकर कहा, “भाई, तू सच में बदल रहा है।” विमल हँसकर बोला, “अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है।” राघव ने पूछा, “सबसे बड़ा बदलाव क्या महसूस हुआ?” विमल ने कुछ देर सोचा और कहा, “पहले मैं अपनी जिंदगी का दर्शक था। अब मुझे लगता है कि मैं उसका जिम्मेदार हूँ।” राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “यही असली बदलाव है।” दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर विमल ने कहा, “लेकिन एक बात समझ नहीं आती। इतने साल मैंने खुद को क्यों नहीं बदला?” राघव ने कहा, “क्योंकि तू बदलाव चाहता था, लेकिन कीमत नहीं देना चाहता था। हर बदलाव की एक कीमत होती है—आलस छोड़ना, बहाने छोड़ना, कुछ लोगों की राय छोड़ना और कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान भी छोड़नी पड़ती है।”

 

विमल ने यह बात गांठ बाँध ली। उसने तय किया कि अब वह अपनी जिंदगी किसी और की स्वीकृति के आधार पर नहीं जिएगा। पहले वह सोचता था कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे। अगर कोई उसकी आलोचना करता, तो वह तुरंत नाराज़ हो जाता। अब उसने आलोचना को सुनना शुरू किया। हर आलोचना सही नहीं होती, लेकिन हर आलोचना को बिना सुने खारिज करना भी सही नहीं था। उसने अपने सहकर्मियों से पूछा कि उसकी कौन-सी आदतें उन्हें परेशान करती हैं। कुछ लोगों ने कहा कि वह पहले बहुत देर से जवाब देता था। किसी ने कहा कि वह काम को आखिरी समय तक टालता था। किसी ने कहा कि वह तनाव में चिड़चिड़ा हो जाता था। पहले शायद विमल इन बातों पर बहस करता, लेकिन अब उसने सब लिखा। उसने खुद से कहा, “अगर दस लोग एक ही बात कह रहे हैं, तो शायद मुझे उस पर विचार करना चाहिए।”

 

समय बीतता गया। तीन महीने में विमल के अंदर एक नया आत्मविश्वास दिखाई देने लगा। उसकी जिंदगी में अचानक कोई चमत्कार नहीं हुआ था। उसकी तनख्वाह अभी भी वही थी। घर वही था। समस्याएँ भी थीं। लेकिन अब समस्याओं को देखने वाला व्यक्ति बदल चुका था। पहले थोड़ी परेशानी आते ही वह टूट जाता था। अब वह बैठकर सोचता था कि इसका समाधान क्या हो सकता है। पहले उसे कोई अवसर नहीं मिलता था तो वह शिकायत करता था। अब वह खुद अवसर तलाशता था। उसने इंटरनेट पर नई स्किल सीखना शुरू किया। हर दिन ऑफिस के बाद एक घंटे पढ़ाई करता। धीरे-धीरे उसने एक नया कौशल सीखा और छोटे-छोटे फ्रीलांस प्रोजेक्ट लेने लगा।

 

एक शाम माँ ने उसे देर रात तक पढ़ते देखा। उन्होंने पूछा, “बेटा, इतना क्यों कर रहे हो? थक नहीं जाते?” विमल ने मुस्कुराकर कहा, “थकता हूँ माँ, लेकिन अब मुझे थकान से डर नहीं लगता।” माँ ने पूछा, “पहले डर लगता था?” विमल ने कहा, “पहले मेहनत से डरता था। अब पछतावे से डरता हूँ।” माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, “तेरे पिता भी यही चाहते थे कि तू अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद उठाए।” विमल कुछ देर शांत रहा। उसे पिता की याद आ गई। उसने महसूस किया कि शायद वह अपने पिता की उस बात को समझने में बहुत देर कर चुका था—“जिंदगी किसी के बदलने का इंतजार नहीं करती।”

 

छह महीने बाद कंपनी में एक नई जिम्मेदारी के लिए कर्मचारियों का चयन होना था। इस बार विमल ने खुद आवेदन किया। पहले वह सोचता कि शायद उसे मौका नहीं मिलेगा। लेकिन इस बार उसने सोचा कि परिणाम चाहे जो हो, कोशिश करना उसकी जिम्मेदारी है। इंटरव्यू के दिन वह घबराया हुआ था। लेकिन उसने पूरी ईमानदारी से जवाब दिए। उससे उसकी पिछली गलतियों के बारे में भी पूछा गया। उसने कहा, “मैंने अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा है। पहले मैं जिम्मेदारी से भागता था, लेकिन अब मैं समझ चुका हूँ कि गलती छिपाने से इंसान छोटा होता है और उसे स्वीकार करके सुधारने से बड़ा।” इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी ने उसकी बात ध्यान से सुनी।

 

कुछ दिनों बाद विमल को पता चला कि उसका चयन हो गया है। उसकी पदोन्नति हुई थी। वेतन भी बढ़ा था। सहकर्मियों ने उसे बधाई दी। राघव ने फोन करके कहा, “देखा, मेहनत रंग लाई।” विमल मुस्कुराया और बोला, “हाँ, लेकिन असली जीत प्रमोशन नहीं है।” राघव ने पूछा, “फिर?” विमल ने कहा, “असली जीत यह है कि अब मैं अपनी जिंदगी के लिए किसी और को दोष नहीं देता।”

 

लेकिन जिंदगी ने विमल को अभी पूरी तरह परखा नहीं था। कुछ समय बाद उसकी माँ बीमार पड़ गईं। इलाज के खर्च ने उसकी आर्थिक स्थिति हिला दी। पुराने विमल के लिए यह स्थिति बहुत बड़ी होती। वह शायद कहता कि जिंदगी हमेशा उसके साथ गलत करती है। लेकिन इस बार उसने अलग तरीके से काम किया। उसने अपने खर्चों की सूची बनाई, गैर-जरूरी खर्च बंद किए, अतिरिक्त काम लिया और माँ के इलाज की जिम्मेदारी संभाली। कई रातें वह अस्पताल में बैठा रहा। कभी थक जाता, कभी डरता, कभी अकेले में रोता, लेकिन उसने खुद को टूटने नहीं दिया।

 

एक रात अस्पताल के गलियारे में बैठा विमल बहुत परेशान था। तभी उसने अपनी डायरी निकाली। पिछले पन्नों में उसे वह वाक्य दिखाई दिया—“मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी समस्या शायद मेरी परिस्थितियाँ नहीं, मेरा रवैया है।” उसने नीचे लिखा, “आज मेरी परिस्थितियाँ कठिन हैं, लेकिन मेरा रवैया मेरे हाथ में है।” उसने डायरी बंद कर दी। उस रात उसे पहली बार समझ आया कि खुद को बदलने का मतलब सिर्फ नौकरी, पैसा या सफलता पाना नहीं है। असली बदलाव तब होता है जब कठिन समय में भी इंसान अपने भीतर की शांति और जिम्मेदारी को बनाए रखता है।

 

माँ कुछ सप्ताह बाद ठीक होकर घर लौट आईं। घर पहले जैसा ही था, लेकिन विमल के लिए वह घर अब अलग लग रहा था। उसे हर चीज में मेहनत दिखाई देती थी। माँ की सिलाई मशीन, पिता की पुरानी तस्वीर, लकड़ी की मेज और वह छोटी-सी डायरी—सब उसे याद दिलाते थे कि जिंदगी कितनी तेजी से गुजरती है। उसने माँ से कहा, “माँ, मुझे माफ कर दो।” माँ ने पूछा, “किस बात के लिए?” विमल ने कहा, “इतने साल मैंने आपकी बातें नहीं सुनीं। आपने मुझे समझाने की कोशिश की और मैंने आपको ही गलत समझा।” माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “माँ को अपने बच्चे से माफी नहीं चाहिए। बस इतना चाहती हूँ कि मेरा बच्चा खुश रहे और सही रास्ते पर चले।” विमल की आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

कुछ समय बाद विमल ने अपने मोहल्ले के कुछ युवाओं को पढ़ाना शुरू किया। वह उन्हें समय प्रबंधन, नौकरी की तैयारी और नई स्किल सीखने के बारे में बताता। एक दिन एक लड़के ने उससे पूछा, “भैया, जिंदगी बदलने के लिए सबसे जरूरी चीज क्या है?” विमल कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “सबसे जरूरी है यह मानना कि बदलाव की शुरुआत तुमसे हो सकती है।” लड़के ने पूछा, “अगर परिस्थितियाँ खराब हों तो?” विमल ने कहा, “परिस्थितियाँ हमेशा तुम्हारे हाथ में नहीं होतीं। लेकिन उनके जवाब में तुम क्या करते हो, यह काफी हद तक तुम्हारे हाथ में होता है।” फिर उसने कहा, “तुम्हें पूरी जिंदगी एक साथ नहीं बदलनी। बस आज का दिन कल से बेहतर बनाना है।”

 

विमल अब भी इंसान था। उससे गलतियाँ होती थीं। कभी वह गुस्सा करता, कभी थक जाता, कभी किसी काम को टाल देता। लेकिन अब उसके अंदर एक फर्क था। वह अपनी गलती पहचान लेता था। पहले गलती उसके लिए शर्म की बात थी, अब सीखने का मौका थी। पहले असफलता उसके लिए अपनी कीमत कम होने का प्रमाण थी, अब वह उसे रास्ते का एक हिस्सा समझता था। पहले वह दूसरों की सफलता देखकर खुद को असफल मानता था, अब वह अपनी यात्रा की तुलना अपने पुराने रूप से करता था।

 

एक वर्ष पूरा होने पर विमल ने अपनी पुरानी डायरी खोली। उसने पहले पन्ने पर लिखी तारीख देखी। ठीक एक साल पहले उसी रात उसने अपने बारे में पहली बार सच लिखा था। उसने डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा, “एक साल पहले मैं सोचता था कि दुनिया मुझे बदल देगी। आज समझता हूँ कि दुनिया बदलने का इंतजार करना सबसे बड़ी गलती है। दुनिया वही रहती है, लेकिन जब इंसान खुद बदलता है तो उसे वही दुनिया अलग दिखाई देने लगती है।”

 

वह खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर वही गली थी। वही चाय की दुकान, वही लोग, वही सड़क, वही आवाजें। कुछ भी खास नहीं बदला था। लेकिन विमल बदल चुका था। उसे महसूस हुआ कि कभी-कभी जिंदगी में सबसे बड़ी क्रांति बाहर नहीं, भीतर होती है। कोई शोर नहीं होता, कोई घोषणा नहीं होती, कोई तालियाँ नहीं बजतीं। बस एक दिन इंसान अपने आप से कहता है—“अब

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