बहुत दूर एक घने जंगल में ऊँचे-ऊँचे पेड़ों, हरी-भरी झाड़ियों और
छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच जानवरों का एक विशाल संसार बसा हुआ था। उस जंगल का नाम
सुंदरवन था। सुंदरवन में हर तरह के जानवर रहते थे। वहाँ हाथियों के बड़े झुंड थे,
हिरणों के झुंड
थे, बंदरों की पूरी टोली थी, जंगली भैंसे, भेड़िए, लोमड़ियाँ, खरगोश और तरह-तरह के पक्षी
भी रहते थे। लेकिन उन सभी जानवरों का राजा एक विशाल और ताकतवर शेर था, जिसका नाम
वीरसिंह था। वीरसिंह की दहाड़ इतनी तेज थी कि जब वह पहाड़ी के ऊपर खड़ा होकर
दहाड़ता, तो दूर नदी के किनारे बैठे जानवर भी डरकर अपने घरों में छिप जाते थे। उसके
शरीर पर घने सुनहरे बाल थे, उसके पंजे बेहद मजबूत थे और उसकी आँखों में ऐसी चमक थी कि
जंगल का कोई जानवर उसकी आँखों में सीधे देखने की हिम्मत नहीं करता था।
वीरसिंह की एक शेरनी थी जिसका नाम रानी था। कुछ साल पहले उनके घर एक नन्हे
शावक ने जन्म लिया था। उसका नाम शेरू रखा गया। शेरू देखने में बहुत प्यारा था,
लेकिन बाकी
शेरों के बच्चों से बिल्कुल अलग था। जब दूसरे शावक कुछ ही महीनों में दौड़ने लगे
थे, शेरू बहुत धीरे-धीरे चलता था। जब दूसरे शावक पेड़ों के पीछे छिपकर एक-दूसरे पर
झपटते और खेलते थे, शेरू थोड़ी देर दौड़ने के बाद ही थक जाता था। उसका शरीर भी
बाकी शेरों की तुलना में कमजोर था। उसके पंजे छोटे थे, दाँत उतने मजबूत नहीं थे और
उसकी दहाड़ भी बहुत धीमी थी। जब वह दहाड़ने की कोशिश करता तो उसके मुँह से केवल
हल्की-सी आवाज निकलती।
शेरू की माँ रानी उससे बहुत प्यार करती थी। वह हमेशा कहती थी कि मेरा बच्चा
दूसरों से अलग है, लेकिन अलग होना कमजोरी नहीं होती। मगर जंगल के बाकी जानवर
शेरू को देखकर उसका मजाक उड़ाते थे। बंदरों की टोली उसे देखकर हँसती और कहती,
देखो जंगल का
सबसे कमजोर शेर आ गया। हिरण आपस में बातें करते कि यह कैसा शेर है जो खुद इतनी
तेजी से नहीं दौड़ सकता। यहाँ तक कि कुछ छोटे शावक भी शेरू को खेल में अपने साथ
लेने से मना कर देते थे। शेरू यह सब सुनता, लेकिन किसी से कुछ नहीं
कहता। वह चुपचाप जंगल के एक कोने में चला जाता और अकेले बैठकर अपनी कमजोरियों के
बारे में सोचता रहता।
एक दिन शेरू ने अपने पिता वीरसिंह को दूसरे शेरों के साथ शिकार करते देखा।
वीरसिंह ने कुछ ही क्षणों में एक जंगली भैंसे को पकड़ लिया। सारे जानवर उसकी ताकत
देखकर डर गए। शेरू दूर खड़ा अपने पिता को देख रहा था। उसकी आँखों में गर्व भी था
और दुख भी। वह सोच रहा था कि मेरे पिता इतने शक्तिशाली हैं, लेकिन मैं इतना कमजोर क्यों
हूँ। जब वीरसिंह वापस अपनी गुफा में आया तो शेरू उसके पास गया और बोला, बाबूजी,
क्या मैं कभी
आपकी तरह ताकतवर बन पाऊँगा? वीरसिंह ने बेटे की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, बेटा, ताकत केवल शरीर
में नहीं होती। शेरू ने पूछा, तो फिर ताकत कहाँ होती है? वीरसिंह ने कहा, ताकत शरीर में
दिखाई देती है, लेकिन असली ताकत दिल और दिमाग में छिपी होती है।
शेरू ने पिता की बात सुनी, लेकिन वह उसे पूरी तरह समझ नहीं पाया। वह चाहता था कि उसके
शरीर में भी वही शक्ति हो जो उसके पिता के शरीर में थी। वह चाहता था कि उसकी दहाड़
सुनकर जंगल काँप जाए। वह चाहता था कि दूसरे जानवर उसे कमजोर न कहें। अगले दिन से
उसने खुद को मजबूत बनाने की कोशिश शुरू कर दी। वह सुबह-सुबह पहाड़ी पर दौड़ने
जाता। पहले दिन वह कुछ ही दूरी दौड़कर गिर गया। उसके पैरों में दर्द होने लगा।
लेकिन उसने हार नहीं मानी। अगले दिन उसने फिर कोशिश की। इस बार वह पहले से थोड़ा
ज्यादा दौड़ा। धीरे-धीरे उसने दौड़ने की आदत बना ली।
कुछ दिनों बाद जंगल के शावकों के बीच ताकत की प्रतियोगिता हुई। प्रतियोगिता
में तय हुआ कि जो शावक सबसे तेज दौड़ेगा, सबसे ऊँची चट्टान पर चढ़ेगा और सबसे जोर से
दहाड़ेगा, उसे जंगल का सबसे बहादुर शावक माना जाएगा। शेरू भी प्रतियोगिता में शामिल होना
चाहता था। उसकी माँ ने उसे समझाया कि अगर तुम तैयार हो तो जरूर भाग लो। लेकिन शेरू
के मन में डर था कि कहीं सबके सामने फिर उसका मजाक न बने। फिर भी उसने हिम्मत की
और प्रतियोगिता में पहुँच गया।
दौड़ शुरू हुई। सभी शावक तेजी से भागने लगे। शेरू ने भी पूरी ताकत लगाई,
लेकिन कुछ ही
देर में बाकी शावक उससे बहुत आगे निकल गए। जब वह अंतिम स्थान पर पहुँचा तो बंदरों
ने पेड़ों से आवाज लगाई कि अरे, इसे दौड़ना नहीं आता। शेरू का दिल टूट गया। वह किसी तरह
दौड़ पूरी करके चुपचाप वहाँ से चला गया। इसके बाद चट्टान पर चढ़ने की प्रतियोगिता
हुई। शेरू ने पूरी कोशिश की, लेकिन वह आधे रास्ते से फिसल गया। बाकी शावक ऊपर पहुँच गए
और उसका मजाक उड़ाने लगे। अंत में दहाड़ने की बारी आई। जब शेरू ने दहाड़ने की
कोशिश की तो उसकी आवाज इतनी धीमी निकली कि सामने बैठे खरगोश भी नहीं डरे। सभी हँस
पड़े।
उस शाम शेरू बहुत दुखी होकर नदी के किनारे बैठा था। वह अपनी परछाई को पानी में
देख रहा था। उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे। उसने खुद से कहा, शायद मैं सच
में जंगल का सबसे कमजोर शेर हूँ। शायद मेरे अंदर शेर होने की कोई ताकत ही नहीं है।
तभी वहाँ एक बूढ़ा हाथी आया। उसका नाम गजराज था। गजराज जंगल के सबसे बुद्धिमान
जानवरों में से एक माना जाता था। उसने शेरू को उदास देखा तो पूछा, क्या हुआ बेटा?
शेरू ने कहा,
सब मुझ पर
हँसते हैं। मैं किसी काम में अच्छा नहीं हूँ। मैं तेज नहीं दौड़ सकता, ऊँची चट्टान पर
नहीं चढ़ सकता और मेरी दहाड़ भी कमजोर है। गजराज मुस्कुराया और बोला, क्या तुमने कभी
सोचा है कि शायद तुम्हारी ताकत किसी ऐसी जगह छिपी हो जिसे तुमने अभी तक खोजा ही
नहीं?
शेरू ने आश्चर्य से पूछा, मेरी ताकत कहाँ छिपी हो सकती है? गजराज ने कहा, यह तुम्हें खुद
खोजना होगा। हर जीव को प्रकृति ने कोई न कोई विशेष गुण दिया है। किसी के पास तेज
पैर हैं, किसी के पास मजबूत शरीर, किसी के पास उड़ने की क्षमता और किसी के पास तेज बुद्धि।
अगर तुम दूसरों जैसा बनने की कोशिश करते रहोगे तो हमेशा खुद को कमजोर समझोगे।
लेकिन जिस दिन तुम अपनी विशेषता पहचान लोगे, उसी दिन तुम्हें अपनी असली
ताकत मिल जाएगी। शेरू ने गजराज की बात ध्यान से सुनी। उस दिन पहली बार उसे लगा कि
शायद उसके अंदर भी कुछ ऐसा है जिसे उसने अभी पहचाना नहीं है।
अगले दिन शेरू ने जंगल को ध्यान से देखना शुरू किया। वह जानना चाहता था कि वह
किस काम में अच्छा है। उसने देखा कि बंदर पेड़ों पर बहुत तेजी से चढ़ते हैं,
हिरण तेज
दौड़ते हैं, हाथी भारी चीजें उठा सकते हैं और भेड़िए बहुत दूर से गंध पहचान लेते हैं। शेरू
ने भी अपनी क्षमताओं को परखना शुरू किया। उसने पाया कि वह जंगल की आवाजों को बहुत
ध्यान से सुन सकता है। बहुत दूर से आने वाली हल्की-सी आवाज भी उसे सुनाई देती थी।
उसे रात में दूसरों की तुलना में बेहतर दिखाई देता था। इसके अलावा वह रास्तों और
पेड़ों को बहुत जल्दी याद कर लेता था।
शेरू को अपनी इन क्षमताओं का पहले कभी एहसास नहीं हुआ था। उसने सोचा कि शायद
यही उसकी ताकत है। वह रोज जंगल में घूमता और अलग-अलग आवाजों को पहचानने की कोशिश
करता। उसे पता चलने लगा कि कौन-सी आवाज किस जानवर की है और कौन-सी आवाज खतरे का
संकेत है। धीरे-धीरे वह जंगल के रास्तों को इतनी अच्छी तरह पहचानने लगा कि बिना
किसी परेशानी के दूर तक जा सकता था। लेकिन अभी तक उसने अपनी इस ताकत का इस्तेमाल
किसी बड़े काम में नहीं किया था।
एक रात जंगल में अचानक बहुत तेज आँधी आई। पेड़ हिलने लगे और कई शाखाएँ टूटकर
गिरने लगीं। जानवर अपने घरों में छिप गए। उसी रात शेरू ने दूर से एक अजीब आवाज
सुनी। आवाज बहुत हल्की थी, लेकिन शेरू ने उसे पहचान लिया। वह किसी छोटे जानवर के रोने
की आवाज थी। शेरू ने आवाज की दिशा में जाना शुरू किया। थोड़ी दूर जाने पर उसे एक
छोटा हिरण का बच्चा मिला जो गिरे हुए पेड़ की शाखाओं के बीच फँसा हुआ था। बच्चा डर
के कारण काँप रहा था।
शेरू ने अपनी पूरी ताकत लगाकर शाखा हटाने की कोशिश की, लेकिन वह शाखा उसके लिए
बहुत भारी थी। उसने मदद के लिए आवाज लगाई। कुछ देर बाद गजराज वहाँ पहुँच गया। हाथी
ने अपनी सूँड से शाखा हटाई और हिरण के बच्चे को बाहर निकाल दिया। हिरण की माँ ने
शेरू को धन्यवाद दिया। शेरू ने कहा, मैंने तो सिर्फ उसकी आवाज सुनी थी। गजराज ने
मुस्कुराकर कहा, और अगर तुमने वह आवाज नहीं सुनी होती तो शायद हम उसे ढूँढ
ही नहीं पाते। उस रात शेरू को पहली बार अपनी कमजोरी के अंदर छिपी ताकत का एहसास
हुआ।
कुछ दिनों बाद जंगल में पानी की कमी होने लगी। नदी का पानी कम हो रहा था और
छोटे तालाब सूखने लगे थे। जानवर पानी की तलाश में दूर-दूर जाने लगे। कई छोटे जानवर
परेशान थे। जंगल के बड़े जानवरों ने एक सभा बुलाई। वीरसिंह ने कहा कि हमें जंगल
में नया पानी का स्रोत ढूँढना होगा। सभी जानवर अलग-अलग दिशाओं में खोजने लगे। शेरू
भी उनके साथ जाना चाहता था, लेकिन कुछ जानवरों ने कहा कि तुम क्या करोगे? तुम तो कमजोर
हो। शेरू इस बार चुप नहीं रहा। उसने कहा, मैं भी जंगल का हिस्सा हूँ। मुझे भी खोजने
दीजिए।
शेरू अकेला जंगल के उत्तरी हिस्से की ओर चला गया। वहाँ घना जंगल था और बहुत कम
जानवर जाते थे। उसने जमीन की नमी देखी, पक्षियों की आवाजें सुनीं और कुछ दूर तक उनका
पीछा किया। उसे लगा कि पक्षी किसी पानी के स्रोत के पास जा रहे हैं। वह आगे बढ़ता
गया। कुछ घंटों बाद उसे एक पतली जलधारा दिखाई दी जो बड़े पत्थरों के पीछे से निकल
रही थी। उसने पानी चखा। पानी साफ था। शेरू खुशी से वापस दौड़ा और सभी जानवरों को
उस जगह ले गया।
सभी जानवर आश्चर्यचकित थे। जिस शेर को वे कमजोर समझते थे, उसने पूरे जंगल
के लिए पानी का नया स्रोत खोज लिया था। वीरसिंह ने बेटे को गले लगाकर कहा, आज तुमने साबित
कर दिया कि ताकत केवल पंजों की ताकत नहीं होती। शेरू की आँखों में खुशी के आँसू आ
गए। लेकिन कुछ जानवर अभी भी उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए थे। उन्हें लगता था
कि एक-दो अच्छे काम करने से कोई ताकतवर नहीं बन जाता।
कुछ महीनों बाद जंगल में एक बड़ी मुसीबत आने वाली थी। जंगल की सीमा के पास कुछ
शिकारी घूम रहे थे। वे जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए जाल बिछा रहे थे। एक सुबह
शेरू ने दूर से लोहे की हल्की आवाज सुनी। उसे कुछ अजीब लगा। उसने उस दिशा में जाकर
देखा तो उसे जमीन पर छिपा हुआ जाल दिखाई दिया। उसने तुरंत समझ लिया कि यह इंसानों
का बनाया हुआ जाल है। वह वापस भागा और जानवरों को सावधान किया। उसने कहा कि जंगल
के उस हिस्से में मत जाना।
वीरसिंह ने कुछ जानवरों को साथ लेकर उस क्षेत्र की जाँच की। वहाँ सचमुच कई जाल
बिछे हुए थे। शेरू की सतर्कता के कारण कई जानवर बच गए। अब धीरे-धीरे जंगल के जानवर
समझने लगे कि शेरू की कमजोरी केवल शरीर में थी, उसके साहस और बुद्धि में
नहीं। लेकिन सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी।
एक दिन वीरसिंह जंगल की सीमा पर गश्त कर रहा था। तभी उसे एक शिकारी के जाल में
फँसाने की कोशिश की गई। वीरसिंह ने जाल देख लिया और बच गया, लेकिन उसी दौरान शिकारी ने
उस पर हमला कर दिया। वीरसिंह घायल हो गया और एक गहरी खाई के पास गिर पड़ा। उसके
साथ गए जानवर डरकर भाग गए। शेरू को जब यह खबर मिली तो वह तुरंत वहाँ पहुँचा।
उसने देखा कि उसका पिता घायल पड़ा है। शेरू का दिल काँप उठा। उसने पिता को
उठाने की कोशिश की, लेकिन वह उन्हें उठा नहीं सकता था। उसने आसपास देखा और उसे
एक पुरानी पगडंडी दिखाई दी। उसे याद आया कि इस रास्ते से होकर एक सुरक्षित गुफा तक
पहुँचा जा सकता है। लेकिन रास्ता बहुत कठिन था। शेरू अकेला अपने पिता को बचाने की
कोशिश करने लगा।
वह दौड़कर गजराज के पास गया और उसे सारी बात बताई। गजराज तुरंत उसके साथ चला।
दोनों ने मिलकर वीरसिंह को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। शेरू ने रास्ते में कई बार
खतरे की आवाजें सुनीं और गजराज को सही दिशा बताई। अंततः वीरसिंह को सुरक्षित गुफा
में पहुँचा दिया गया। कुछ दिनों तक उसका इलाज हुआ और वह धीरे-धीरे स्वस्थ होने
लगा।
जब वीरसिंह ठीक हुआ तो उसने अपने बेटे से कहा, शेरू, आज तुमने मेरी
जान बचाई है। शेरू ने कहा, बाबूजी, मैंने तो बस वही किया जो मुझे करना चाहिए था। वीरसिंह ने
कहा, नहीं बेटा। आज तुमने वह कर दिखाया जो कई ताकतवर जानवर भी नहीं कर पाए।
तुम्हारे पास मेरी जैसी ताकत नहीं है, लेकिन तुम्हारे पास कुछ और है। तुम्हारे पास
धैर्य है, सुनने की शक्ति है, समझदारी है और सबसे बड़ी बात, तुम डर के बावजूद सही काम
करने की हिम्मत रखते हो।
इसके बाद जंगल में शेरू की इज्जत बढ़ने लगी। अब कोई उसे कमजोर कहकर मजाक नहीं
उड़ाता था। लेकिन शेरू के अंदर घमंड नहीं आया। वह अब भी पहले की तरह शांत रहता था।
वह छोटे जानवरों की मदद करता, बच्चों को रास्ता दिखाता और खतरे के समय सबको सावधान करता।
उसे समझ आ गया था कि ताकत का मतलब दूसरों को डराना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उनकी
रक्षा करना है।
एक दिन जंगल में अचानक भयंकर आग लग गई। गर्मी बहुत ज्यादा थी और सूखी घास के
कारण आग तेजी से फैलने लगी। जानवरों में अफरा-तफरी मच गई। हिरण इधर-उधर भागने लगे,
बंदर पेड़ों से
नीचे उतरने लगे और छोटे जानवर डरकर चीखने लगे। हवा तेज होने के कारण आग जंगल के
बीच की ओर बढ़ रही थी। वीरसिंह ने सभी जानवरों को सुरक्षित स्थान की ओर जाने का
आदेश दिया।
लेकिन तभी शेरू ने कुछ सुना। आग के शोर के बीच उसे छोटे बच्चों के रोने की
आवाज सुनाई दी। वह आवाज जंगल के उस हिस्से से आ रही थी जहाँ कुछ खरगोशों और हिरणों
के बच्चे फँसे हुए थे। शेरू तुरंत उस दिशा में दौड़ा। धुआँ इतना घना था कि कुछ
दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन शेरू अपनी सुनने की शक्ति के सहारे आगे बढ़ता गया।
उसे रास्ते में कई गिरे हुए पेड़ मिले। उसने बच्चों को आवाज लगाई। बच्चों ने
जवाब दिया। शेरू धीरे-धीरे आवाज का पीछा करता हुआ वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि कई
छोटे जानवर एक चट्टान के पीछे फँसे हुए हैं। आग चारों तरफ फैल रही थी। शेरू ने
उन्हें बाहर निकलने का रास्ता बताया और खुद सबसे आगे चलने लगा। वह धुएँ में रास्ता
पहचानता हुआ उन्हें सुरक्षित जगह तक ले आया।
जब वह वापस लौटा तो कई जानवरों ने उसे घेर लिया। सबकी आँखों में सम्मान था। एक
छोटा बंदर, जो कभी उसका मजाक उड़ाता था, उसके पास आया और बोला, शेरू, हमें माफ कर
दो। हम तुम्हें कमजोर समझते थे। आज अगर तुम नहीं आते तो पता नहीं क्या होता। शेरू
ने मुस्कुराकर कहा, दोस्ती में माफी कैसी? हम सब एक ही जंगल के परिवार
हैं।
आग बुझने के बाद जंगल में एक बड़ी सभा हुई। वीरसिंह ने सभी जानवरों के सामने
कहा, आज मैं अपने बेटे शेरू पर गर्व करता हूँ। मैंने उसे हमेशा समझाया था कि असली
ताकत शरीर में नहीं, मन में होती है। आज उसने यह बात पूरे जंगल को समझा दी है।
इसके बाद वीरसिंह ने शेरू को जंगल का रक्षक घोषित किया। यह सुनकर सभी जानवरों ने
खुशी जताई।
शेरू के लिए यह बहुत बड़ा सम्मान था। लेकिन उसने कहा, मैं अकेला रक्षक नहीं हूँ।
जंगल तभी सुरक्षित रहेगा जब हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करेंगे। हाथी अपनी ताकत से
मदद करेंगे, बंदर ऊँचे पेड़ों से निगरानी करेंगे, पक्षी दूर तक देखकर खबर देंगे, हिरण खतरे का
संकेत देंगे और हम शेर रास्तों की सुरक्षा करेंगे। सभी जानवरों ने उसकी बात मान
ली।
समय बीतता गया। शेरू अब बड़ा हो चुका था। उसका शरीर अभी भी दूसरे शेरों जितना
मजबूत नहीं था। उसकी दहाड़ भी बहुत ज्यादा तेज नहीं हुई थी। लेकिन उसकी आँखों में
आत्मविश्वास था। अब उसे अपनी कमजोरी पर शर्म नहीं आती थी। उसे पता था कि हर जीव का
अपना महत्व होता है। वह अपने शरीर को बदलने की कोशिश करने के बजाय अपनी क्षमताओं
को बेहतर बनाने पर ध्यान देता था।
एक दिन एक छोटा शावक उसके पास आया और बोला, शेरू भैया, मैं भी आपकी
तरह बनना चाहता हूँ। शेरू ने पूछा, क्यों? शावक ने कहा, क्योंकि आप सबसे बहादुर हैं। शेरू मुस्कुराया और
बोला, मेरी तरह बनने की जरूरत नहीं है। तुम खुद जैसे हो, वैसे ही अच्छे हो। बस अपनी
ताकत पहचानो और उसका सही इस्तेमाल करो। शावक ने पूछा, अगर मैं कमजोर हुआ तो?
शेरू ने कहा,
कमजोरी कोई
शर्म की बात नहीं है। अपनी कमजोरी को पहचानकर उसे स्वीकार करना ही ताकत की पहली
सीढ़ी है।
शेरू अब अक्सर जंगल के बच्चों को यही सीख देता था। वह उन्हें बताता कि जिंदगी
में हर किसी को कभी न कभी ऐसा समय आता है जब दूसरे लोग उसे कमजोर समझते हैं। कुछ
लोग उसके सपनों पर हँसते हैं, कुछ उसकी कमियों को गिनाते हैं और कुछ उसे यह विश्वास
दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह कुछ नहीं कर सकता। लेकिन इंसान या जानवर की असली
पहचान दूसरों की बातों से नहीं होती। असली पहचान उसके काम और उसके हौसले से होती
है।
एक शाम शेरू उसी पहाड़ी पर बैठा था जहाँ बचपन में वह खुद को कमजोर समझकर रोया
करता था। सूर्य डूब रहा था। नीचे पूरा जंगल सुनहरे रंग में चमक रहा था। उसे अपना
बचपन याद आया। उसे याद आया कि कैसे दूसरे शावक उसका मजाक उड़ाते थे, कैसे वह अकेले
बैठकर रोता था और कैसे उसे लगता था कि वह कभी किसी काम का नहीं बन पाएगा। फिर उसे
गजराज की बात याद आई कि हर जीव की अपनी विशेषता होती है।
उसी समय गजराज उसके पास आकर बैठ गया। उसने कहा, क्या सोच रहे हो? शेरू ने
मुस्कुराकर कहा, सोच रहा हूँ कि कभी मुझे लगता था कि मैं जंगल का सबसे कमजोर
शेर हूँ। गजराज ने कहा, और अब? शेरू ने जंगल की ओर देखते हुए कहा, अब मुझे लगता है कि मैं
कमजोर नहीं था। मैं बस अपनी ताकत को पहचान नहीं पाया था। गजराज ने कहा, यही तो जिंदगी
का सबसे बड़ा सबक है।
कुछ देर दोनों शांत बैठे रहे। फिर शेरू ने कहा, अगर उस समय मैं दूसरों की
बात मानकर कोशिश करना छोड़ देता तो आज शायद कुछ भी नहीं बदलता। गजराज ने कहा,
इसलिए हमेशा
याद रखना कि दूसरों की आवाज से ज्यादा महत्वपूर्ण तुम्हारे अंदर की आवाज होती है।
दुनिया तुम्हें कमजोर कह सकती है, लेकिन अगर तुम्हें अपने रास्ते पर विश्वास है तो चलते रहो।
उस रात जंगल में चाँद बहुत चमक रहा था। सभी जानवर अपने-अपने घरों में आराम कर
रहे थे। शेरू पहाड़ी के ऊपर खड़ा था। उसने आसमान की ओर देखा और पहली बार पूरे
आत्मविश्वास के साथ दहाड़ने की कोशिश की। उसकी दहाड़ पहले जैसी बहुत तेज नहीं थी,
लेकिन उसमें
आत्मविश्वास था। वह आवाज पूरे जंगल में गूँजी। जानवरों ने उसे सुना और मुस्कुराए।
अब शेरू को अपनी आवाज की ऊँचाई की चिंता नहीं थी। उसे पता था कि उसकी असली
आवाज उसके कामों में है। उसने साबित कर दिया था कि सबसे कमजोर शरीर वाला भी सबसे
मजबूत दिल वाला हो सकता है। उसने यह भी साबित किया कि ताकत का अर्थ केवल शिकार
करना, लड़ना या दूसरों को डराना नहीं है। असली ताकत है डर के बावजूद सही काम करना,
दूसरों की मदद
करना, अपनी कमियों को स्वीकार करना और लगातार खुद को बेहतर बनाते रहना।
कुछ वर्षों बाद सुंदरवन का जंगल पहले से भी ज्यादा सुरक्षित और खुशहाल हो गया।
जानवरों के बीच आपसी सहयोग बढ़ गया। हर कोई अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार जंगल की
रक्षा करता था। शेरू अब जंगल के सबसे सम्मानित जानवरों में से एक था। लेकिन जब भी
कोई उससे पूछता कि तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, वह कहता, मेरी सबसे बड़ी
उपलब्धि यह नहीं है कि मैं जंगल का रक्षक बना। मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि
मैंने खुद को कमजोर समझना छोड़ दिया।
शेरू की कहानी धीरे-धीरे जंगल की सीमा से बाहर भी फैल गई। दूर-दूर से जानवर
उसके बारे में सुनने आने लगे। हर कोई उससे एक ही बात सीखता कि अपनी तुलना दूसरों
से मत करो। अगर तुम किसी और की तरह बनने की कोशिश करोगे तो अपनी असली क्षमता कभी
नहीं पहचान पाओगे। अपनी कमजोरी को देखकर निराश होने के बजाय यह खोजो कि तुम्हारे
अंदर कौन-सी ताकत छिपी है। हो सकता है कि दुनिया तुम्हें कमजोर समझती हो, लेकिन तुम्हारे
अंदर ऐसी क्षमता हो जो किसी और में नहीं।
एक दिन शेरू अपने पिता वीरसिंह के साथ जंगल में घूम रहा था। वीरसिंह अब बूढ़ा
हो चुका था। उसके बाल सफेद होने लगे थे और उसकी चाल पहले जैसी तेज नहीं रही थी।
उसने शेरू से कहा, बेटा, जब तुम छोटे थे तब मुझे डर था कि तुम मेरे जैसा ताकतवर नहीं
बन पाओगे। लेकिन आज मुझे खुशी है कि तुम मेरे जैसे नहीं बने। तुम अपने जैसे बने।
शेरू ने पिता की ओर देखा और कहा, बाबूजी, अगर आपने उस समय मुझे मेरी कमजोरी के कारण रोक दिया होता तो
मैं कभी अपनी ताकत नहीं खोज पाता। वीरसिंह ने कहा, एक पिता के लिए इससे बड़ी
खुशी क्या होगी कि उसका बच्चा उससे भी बेहतर इंसान बने।
शेरू ने अपने पिता के साथ चलते हुए कहा, मैंने एक बात सीखी है।
वीरसिंह ने पूछा, क्या? शेरू बोला, किसी को कमजोर समझना आसान है, लेकिन उसकी ताकत पहचानना
बहुत मुश्किल। वीरसिंह मुस्कुराए और बोले, और जो दूसरों की ताकत पहचान लेता है, वही असली नेता
बनता है।
शाम होते-होते दोनों गुफा के पास लौट आए। सामने जंगल में छोटे शावक खेल रहे
थे। उनमें से एक शावक गिर पड़ा और बाकी बच्चे उस पर हँसने लगे। शेरू ने उसे उठाया
और कहा, गिरना बुरी बात नहीं है। गिरने के बाद उठना जरूरी है। शावक ने आँसू पोंछे और
फिर खेलने लगा। शेरू दूर खड़ा उसे देखता रहा। उसे लगा कि शायद यही उसकी जिंदगी का
सबसे बड़ा उद्देश्य है। वह केवल जंगल की रक्षा नहीं करना चाहता था, बल्कि वह हर उस
जीव को यह विश्वास दिलाना चाहता था कि उसकी अपनी कोई न कोई खासियत जरूर है।
रात को शेरू फिर पहाड़ी पर गया। उसने नीचे देखा तो पूरा जंगल शांत था। हवा
पेड़ों की पत्तियों से होकर गुजर रही थी। चाँद की रोशनी में नदी चमक रही थी। उसने
आँखें बंद कीं और अपने जीवन के हर उस पल को याद किया जब उसने खुद को कमजोर समझा
था। फिर उसने मुस्कुराकर कहा, अगर मैं उन दिनों हार मान लेता तो मुझे कभी पता नहीं चलता
कि मेरे अंदर क्या छिपा है।
उसने आसमान की तरफ देखा और कहा, कमजोरी वह नहीं जो हमारे शरीर में होती है। असली
कमजोरी तब होती है जब हम खुद पर विश्वास करना छोड़ देते हैं। और ताकत वह नहीं जो
दूसरों को हराने के लिए इस्तेमाल की जाए। असली ताकत वह है जो किसी गिरे हुए को
उठाने के काम आए।
उस दिन से सुंदरवन के जंगल में एक कहावत मशहूर हो गई। जानवर अपने बच्चों से
कहते थे कि अगर कभी तुम्हें कोई कमजोर कहे तो शेरू को याद करना। क्योंकि शेरू वह
शेर था जिसका शरीर जंगल के दूसरे शेरों से कमजोर था, लेकिन जिसका दिल पूरे जंगल
से मजबूत था। उसने साबित कर दिया था कि किसी की कीमत उसकी बाहरी ताकत से नहीं,
बल्कि उसके
साहस, बुद्धि, धैर्य और दूसरों के लिए किए गए कामों से होती है।
और इस तरह जंगल का सबसे कमजोर कहलाने वाला शेर एक दिन जंगल का सबसे भरोसेमंद
रक्षक बन गया। उसकी दहाड़ शायद सबसे ऊँची नहीं थी, उसके पंजे शायद सबसे मजबूत
नहीं थे और उसका शरीर शायद सबसे विशाल नहीं था, लेकिन जब जंगल में कोई
मुसीबत आती थी तो सबसे पहले जानवर उसी को याद करते थे। क्योंकि वे जानते थे कि
शेरू डर सकता है, थक सकता है और घायल भी हो सकता है, लेकिन वह मुसीबत देखकर कभी
किसी को अकेला नहीं छोड़ेगा।
कहानी का अंत यही सीख देता है कि दुनिया चाहे हमें किसी भी नाम से पुकारे,
हमें खुद अपने
बारे में फैसला करना चाहिए। अगर कोई हमें कमजोर समझता है तो हमें उसके सामने खुद
को साबित करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को पहचानने के लिए मेहनत करनी चाहिए। हर इंसान और
हर जीव के अंदर कोई न कोई ऐसी ताकत होती है जो उसे दूसरों से अलग बनाती है। जरूरत
केवल उसे पहचानने की होती है। शेरू ने अपनी ताकत तब पहचानी जब उसने दूसरों की नकल
करना छोड़ दिया और अपने भीतर झाँकना शुरू किया। इसलिए अगर जिंदगी में कभी आपको लगे
कि आप दूसरों से कमजोर हैं, तो रुकिए मत। अपनी ताकत खोजिए, अपनी कमियों को स्वीकार
कीजिए, मेहनत करते रहिए और खुद पर विश्वास रखिए। क्योंकि हो सकता है कि जिस कमजोरी को
देखकर आज दुनिया आप पर हँस रही है, वही कमजोरी कल आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाए।
और सुंदरवन की उस पहाड़ी पर आज भी जब चाँदनी रात में हवा पेड़ों से टकराती है,
तो ऐसा लगता है
जैसे दूर कहीं शेरू की धीमी लेकिन आत्मविश्वास से भरी दहाड़ सुनाई देती है। वह
दहाड़ जंगल को डराती नहीं, बल्कि एक संदेश देती है कि असली ताकत शरीर की नहीं, हिम्मत की होती
है। जो खुद पर विश्वास करना सीख जाता है, उसे दुनिया की कोई भी कमजोरी हमेशा के लिए रोक
नहीं सकती।
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