एक घने और सुंदर जंगल के किनारे एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ की
शाखाएँ इतनी फैली हुई थीं कि दूर से देखने पर वह किसी विशाल छाते जैसा दिखाई देता
था। उसी बरगद के पेड़ पर एक काला कौआ अपने परिवार के साथ रहता था। उसका नाम कालू
था। कालू देखने में बिल्कुल साधारण था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी बुद्धिमानी
थी। वह हर परिस्थिति को ध्यान से देखता, सोचता और फिर कोई निर्णय लेता था। जंगल के दूसरे
पक्षी अक्सर उसकी समझदारी की प्रशंसा करते थे, जबकि कुछ पक्षी उसकी
बुद्धिमानी से ईर्ष्या भी करते थे। कालू किसी से झगड़ा नहीं करता था। वह मानता था
कि शक्ति से बड़ी चीज बुद्धि है और कठिन से कठिन समस्या का समाधान शांत मन से
सोचने पर निकाला जा सकता है।
कालू के परिवार में उसकी पत्नी काली, दो छोटे बच्चे और बूढ़ी माँ रहती थीं। कालू सुबह
सूरज निकलने से पहले ही उड़ जाता और भोजन की तलाश में दूर-दूर तक जाता। कभी उसे
खेतों में दाने मिलते, कभी किसी पेड़ पर मीठे फल और कभी किसी गाँव के पास बचा हुआ
भोजन। वह जो कुछ भी पाता, उसमें से थोड़ा अपने लिए रखता और बाकी परिवार के लिए ले
आता। उसके बच्चे अभी छोटे थे और उड़ना सीख रहे थे। कालू उन्हें हमेशा एक बात
समझाता था, “बच्चो, दुनिया में हर चीज वैसी नहीं होती जैसी पहली नजर में दिखाई देती है। किसी भी
चीज पर तुरंत विश्वास मत करना। पहले उसे ध्यान से देखो, समझो और फिर निर्णय लो।”
उसके बच्चे उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनते थे।
एक दिन गर्मी का मौसम बहुत भयंकर था। सूरज आसमान में आग बरसा रहा था। जंगल के
छोटे-छोटे तालाब सूख चुके थे और नदी में भी पानी बहुत कम बचा था। पेड़ों के पत्ते
मुरझाने लगे थे और जानवर पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे। कालू सुबह से भोजन
और पानी की तलाश में उड़ रहा था। कई घंटे उड़ने के बाद भी उसे कहीं पानी नहीं
मिला। उसकी चोंच और गला सूखने लगा। पंख भारी लगने लगे और शरीर में कमजोरी महसूस
होने लगी। उसने सोचा कि यदि उसे जल्दी पानी नहीं मिला तो वह अधिक दूर नहीं उड़
पाएगा। वह एक पेड़ की ऊँची शाखा पर बैठ गया और चारों ओर देखने लगा।
दूर उसे एक छोटा-सा गाँव दिखाई दिया। कालू ने सोचा कि शायद गाँव में किसी घर
के बाहर पानी मिल जाए। वह धीरे-धीरे गाँव की ओर उड़ गया। गाँव लगभग सुनसान था
क्योंकि दोपहर की तेज गर्मी में लोग अपने घरों के अंदर आराम कर रहे थे। कालू एक घर
की छत पर बैठा और नीचे देखने लगा। तभी उसकी नजर घर के आँगन में रखे एक मिट्टी के
घड़े पर पड़ी। घड़ा आधा छाया में रखा था और उसके पास कुछ मिट्टी के बर्तन भी पड़े
थे। कालू की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई। वह तुरंत नीचे उड़कर गया और घड़े के
किनारे बैठ गया।
कालू ने घड़े के अंदर झाँका तो उसमें पानी दिखाई दिया। उसकी खुशी का ठिकाना
नहीं रहा। उसने अपनी चोंच अंदर डालने की कोशिश की, लेकिन घड़े का मुँह बहुत
संकरा था। उसने गर्दन जितनी अंदर कर सकता था, की, मगर उसकी चोंच पानी तक नहीं
पहुँच पाई। उसने घड़े को थोड़ा झुकाने की कोशिश की। वह अपनी चोंच से घड़े को धक्का
देने लगा। घड़ा भारी था और जमीन पर मजबूती से रखा हुआ था। कालू ने कई बार कोशिश की,
लेकिन घड़ा
नहीं हिला। वह कुछ देर तक परेशान होकर बैठा रहा।
उसके मन में आया कि शायद अब उसे बिना पानी पिए ही वापस लौटना पड़ेगा। लेकिन
तभी उसने घड़े के पास कुछ छोटे-छोटे कंकड़ देखे। वह कुछ क्षण तक उन कंकड़ों को
देखता रहा। अचानक उसके मन में एक विचार आया। उसने एक कंकड़ अपनी चोंच में उठाया और
घड़े में डाल दिया। कंकड़ पानी में गिरा और हल्की-सी आवाज हुई। पानी का स्तर थोड़ा
ऊपर आया। कालू की आँखों में खुशी दिखाई देने लगी। उसने दूसरा कंकड़ उठाकर घड़े में
डाल दिया। फिर तीसरा, चौथा और पाँचवाँ। धीरे-धीरे वह आसपास से छोटे-छोटे कंकड़
चुनकर घड़े में डालता गया।
कुछ देर बाद पानी पहले की अपेक्षा ऊपर आ गया। कालू ने फिर अपनी चोंच घड़े में
डाली। इस बार उसकी चोंच पानी तक पहुँच गई। उसने भरपूर पानी पिया। ठंडा पानी उसके
गले से नीचे उतरा तो उसे ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में नई जान आ गई हो। उसने संतोष
की साँस ली। वह समझ गया कि समस्या कितनी भी कठिन क्यों न हो, यदि धैर्य और
बुद्धि से काम लिया जाए तो उसका समाधान अवश्य निकाला जा सकता है।
पानी पीने के बाद कालू अपने घर की ओर उड़ गया। रास्ते भर वह अपने बच्चों के
बारे में सोचता रहा। घर पहुँचकर उसने अपनी पत्नी और बच्चों को पूरी घटना सुनाई।
बच्चों ने उत्सुकता से पूछा, “पिताजी, आपने घड़े को तोड़ क्यों नहीं दिया?” कालू मुस्कुराया और बोला,
“बेटा, घड़ा तोड़ने की
कोशिश करने में बहुत समय और मेहनत लगती। हो सकता था कि घड़ा टूटने के बाद पानी भी
मिट्टी में बह जाता। मैंने सोचा कि ऐसी तरकीब खोजी जाए जिससे घड़ा भी सुरक्षित रहे
और पानी भी मिल जाए। बुद्धिमानी का अर्थ केवल कठिन काम करना नहीं, बल्कि कम शक्ति
से सही उपाय निकालना है।”
उस दिन से कालू के बच्चे भी हर समस्या को ध्यान से देखने लगे। वे छोटी-छोटी
चीजों में भी समाधान खोजने की कोशिश करते। कालू उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में
सोचने का अभ्यास कराता था। कभी वह उन्हें कोई फल दूर रखकर कहता कि बिना उड़कर सीधे
उसके पास जाए उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। कभी वह उन्हें पेड़ों की छाया
देखकर दिशा पहचानना सिखाता। वह कहता, “सिर्फ आँखों से देखना पर्याप्त नहीं है।
बुद्धिमान वही है जो देखकर उसके पीछे का कारण समझे।”
कुछ समय बाद जंगल में एक नई समस्या उत्पन्न हो गई। जंगल के पास एक शिकारी आने
लगा था। वह पक्षियों और छोटे जानवरों को पकड़ने के लिए जाल बिछाता था। कई पक्षी
उसके जाल में फँस चुके थे। हिरन, खरगोश और गिलहरियाँ भी उससे डरने लगी थीं। जंगल के जानवरों
ने एक बैठक की। सबने मिलकर निर्णय लिया कि शिकारी से बचने का कोई उपाय खोजना
चाहिए।
सभा में बंदर ने कहा, “हम सभी जंगल के दूसरे हिस्से में चले जाते हैं।” हिरन बोला,
“लेकिन वहाँ
पानी बहुत कम है।” खरगोश ने कहा, “हम दिन में छिपे रहेंगे और रात में बाहर निकलेंगे।” उल्लू
ने कहा, “शिकारी रात में भी आ सकता है।” सभी अपनी-अपनी राय दे रहे थे, लेकिन किसी के
पास कोई स्थायी समाधान नहीं था।
कालू चुपचाप सबकी बातें सुन रहा था। अंत में उसने कहा, “शिकारी से केवल भागकर बचना
मुश्किल है। हमें उसकी योजना को समझना होगा।” जानवरों ने उसकी ओर देखा। कालू ने
आगे कहा, “वह जाल कहाँ लगाता है, किस समय आता है और किस प्रकार का चारा इस्तेमाल करता है,
यह जानना जरूरी
है। यदि हम उसकी चाल पहले से समझ जाएँ तो उससे बच सकते हैं।”
अगले कई दिनों तक कालू ने दूर से शिकारी पर नजर रखी। वह पेड़ों की ऊँची शाखाओं
पर बैठकर देखता कि शिकारी कहाँ जाता है, जाल कैसे बिछाता है और किस जगह भोजन रखता है।
उसने देखा कि शिकारी सुबह जल्दी आता, झाड़ियों के बीच जाल लगाता और उसके ऊपर पत्तियाँ
डाल देता। फिर वह दूर छिपकर बैठ जाता और किसी जानवर के जाल में फँसने का इंतजार
करता।
कालू ने यह बात जंगल के सभी जानवरों को बताई। उसने उन्हें समझाया कि किसी भी
अनजान भोजन को छूने से पहले जमीन और आसपास की चीजों को ध्यान से देखना चाहिए। उसने
पक्षियों को ऊपर से जाल पहचानना सिखाया। हिरनों को उन स्थानों से बचने को कहा जहाँ
जमीन असामान्य दिखाई देती थी। खरगोशों को बताया कि यदि किसी जगह ताजा भोजन पड़ा हो
तो उसके आसपास जरूर जाँच करें।
एक सुबह कालू ने देखा कि शिकारी ने एक बड़ा जाल बिछाया है। जाल के बीच में
अनाज के दाने रखे थे। कुछ गौरैया उन दानों को देखकर नीचे उतरने लगीं। कालू ने जोर
से काँव-काँव करके उन्हें चेतावनी दी। गौरैयाएँ रुक गईं। तभी शिकारी झाड़ी के पीछे
से निकला और जाल को देखने लगा। उसे कोई पक्षी नहीं मिला तो वह निराश होकर वहाँ से
चला गया।
उस दिन जंगल के पक्षियों को कालू की बुद्धिमानी का महत्व समझ में आया। सभी ने
उसका धन्यवाद किया। लेकिन कालू ने कहा, “मेरी बुद्धिमानी तभी उपयोगी है जब हम सब मिलकर
उसका लाभ उठाएँ। अकेला कोई भी जीव हर खतरे से नहीं बच सकता। एक-दूसरे की मदद करने
से हम मजबूत बनते हैं।”
कुछ दिनों तक जंगल में शांति रही। शिकारी को लगातार असफलता मिल रही थी। उसने
कई नए तरीके अपनाए, लेकिन कालू और दूसरे जानवर सतर्क रहते। धीरे-धीरे शिकारी को
लगा कि इस जंगल में शिकार करना आसान नहीं है। उसने वहाँ आना कम कर दिया।
इसी बीच जंगल में एक और संकट आया। एक रात अचानक तेज आँधी आई। पेड़ जोर-जोर से
हिलने लगे। कई छोटी शाखाएँ टूटकर गिर गईं। बारिश भी शुरू हो गई। कालू का परिवार
अपने घोंसले में था। तेज हवा के कारण उनका घोंसला बुरी तरह हिलने लगा। कालू ने
देखा कि घोंसले की एक मुख्य टहनी टूटने वाली है। यदि वह टूट जाती तो पूरा घोंसला
नीचे गिर सकता था।
काली घबरा गई। उसने कहा, “अब हम क्या करें?” कालू ने घोंसले के आसपास देखा। पास ही एक मजबूत
बेल लटक रही थी। उसने तुरंत बेल को अपनी चोंच से खींचा और उसके एक हिस्से को
घोंसले की शाखा के चारों ओर लपेटने लगा। काली भी उसकी मदद करने लगी। दोनों ने
मिलकर बेल को शाखा से कसकर बाँध दिया। बच्चों को उन्होंने घोंसले के बीच में
सुरक्षित बैठा दिया। पूरी रात हवा चलती रही, लेकिन बेल के सहारे घोंसला
बच गया।
सुबह जब बारिश रुकी तो जंगल का दृश्य बदल चुका था। कई पेड़ गिर गए थे और कई
घोंसले टूट चुके थे। कालू ने अपने बच्चों को सुरक्षित देखकर राहत की साँस ली। उसने
उन्हें समझाया, “मुश्किल समय में घबराने से समस्या बढ़ जाती है। पहले खतरे
को पहचानो, फिर उपलब्ध साधनों को देखो और उसके बाद उपाय करो।”
कालू की बुद्धिमानी की चर्चा अब पूरे जंगल में
होने लगी थी। लेकिन जहाँ प्रशंसा होती है, वहाँ कभी-कभी ईर्ष्या भी जन्म लेती है। जंगल में
एक लोमड़ी रहती थी जिसका नाम लाली था। वह बहुत चालाक थी, लेकिन उसकी चालाकी अक्सर
दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए होती थी। उसे यह अच्छा नहीं लगता था कि सभी
जानवर कालू की प्रशंसा करते हैं। वह सोचती थी कि आखिर एक छोटा-सा कौआ इतना सम्मान
कैसे पा सकता है।
एक दिन लाली ने सोचा कि वह कालू को किसी तरह मूर्ख साबित करेगी। उसने जंगल के
किनारे एक मीठे फल का टुकड़ा देखा और उसे कालू के रास्ते में रख दिया। फिर वह
झाड़ी के पीछे छिप गई। कुछ देर बाद कालू वहाँ से गुजरा। उसकी नजर फल पर पड़ी। वह
नीचे उतरने ही वाला था कि उसे जमीन पर कुछ अजीब निशान दिखाई दिए। उसने ध्यान से
देखा। फल के पास मिट्टी पर लोमड़ी के पंजों के निशान थे, लेकिन फल के आसपास किसी
पक्षी या दूसरे जानवर के निशान नहीं थे।
कालू को संदेह हुआ। उसने सीधे फल उठाने के बजाय ऊपर पेड़ पर बैठकर आसपास देखा।
तभी उसने झाड़ी के पीछे लाली की पूँछ का थोड़ा हिस्सा देखा। कालू समझ गया कि कोई
चाल चल रही है। वह मुस्कुराया और बोला, “लाली बहन, यदि तुम्हें मुझसे कुछ कहना
है तो सामने आओ।” लाली झाड़ी से बाहर निकली और बोली, “मैं तो बस यह देख रही थी कि
तुम सच में इतने बुद्धिमान हो या नहीं।”
कालू ने शांत स्वर में कहा, “बुद्धिमानी की परीक्षा दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि सही
निर्णय लेने में होती है।” लाली कुछ नहीं बोली। उसे समझ आ गया कि कालू उसकी चाल
समझ चुका है। वह शर्मिंदा होकर वहाँ से चली गई।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। कुछ समय बाद जंगल में भीषण सूखा पड़ गया।
इस बार समस्या इतनी गंभीर थी कि कई जानवरों के लिए भोजन और पानी दोनों कम पड़ने
लगे। जंगल के बीचोंबीच एक पुराना कुआँ था, लेकिन उसकी गहराई बहुत अधिक थी। उसमें थोड़ा-सा
पानी बचा था, पर अधिकांश जानवर वहाँ तक पहुँच नहीं सकते थे।
हाथी अपनी सूँड से पानी निकालने की कोशिश करता, लेकिन कुआँ बहुत संकरा था।
बंदर रस्सी खोजने लगे। हिरन कुएँ के पास जाकर लौट आते। सभी परेशान थे। कालू कुएँ
के किनारे बैठा और अंदर झाँकने लगा। उसने देखा कि पानी नीचे बहुत कम था, लेकिन कुएँ की
दीवार में कुछ पुराने पत्थर निकले हुए थे।
उसने सोचा कि यदि कोई हल्की चीज नीचे डालकर पानी को ऊपर खींच सके तो शायद काम
बन सकता है। तभी उसे पास पड़े सूखे नारियल के खोल दिखाई दिए। उसने एक खोल उठाया और
उसकी मजबूती जाँची। फिर उसने बेल की एक लंबी लता खोजी। उसने लता को नारियल के खोल
से बाँध दिया और उसे धीरे-धीरे कुएँ में उतारा। पहली बार खोल उलट गया और खाली बाहर
आया। दूसरी बार भी ऐसा ही हुआ।
कालू ने हार नहीं मानी। उसने खोल में एक छोटा-सा पत्थर रख दिया ताकि वह पानी
में सीधा रहे। फिर उसे धीरे-धीरे नीचे उतारा। इस बार खोल पानी में ठीक से बैठ गया।
कालू ने लता खींची और खोल ऊपर आ गया। उसमें थोड़ा पानी था। उसने पानी पास रखे एक
बड़े बर्तन में डाल दिया। फिर वही प्रक्रिया दोहराई गई।
कुछ देर बाद बंदर और दूसरे पक्षी भी उसकी मदद करने लगे। वे पानी निकाल-निकालकर
एक बड़े पात्र में जमा करने लगे। हाथी ने उस पात्र को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।
धीरे-धीरे सभी जानवरों के लिए पानी इकट्ठा होने लगा।
यह देखकर जंगल के सभी जीवों को समझ आया कि बुद्धिमानी केवल एक व्यक्ति की
विशेषता नहीं होनी चाहिए। जब बुद्धि और सहयोग साथ मिलते हैं, तो बड़ी से
बड़ी समस्या हल की जा सकती है।
कालू ने इस अवसर पर जंगल के सभी बच्चों को एकत्र किया और कहा, “आज हमने पानी
बचाया है, लेकिन भविष्य में हमें ऐसी स्थिति से बचने की तैयारी भी करनी होगी। केवल संकट
आने पर उपाय करना पर्याप्त नहीं है। समझदार वही है जो संकट आने से पहले उसकी
तैयारी कर ले।”
उसने सुझाव दिया कि जंगल के अलग-अलग हिस्सों में छोटे जलाशय बनाए जाएँ,
सूखे मौसम के
लिए बीज और फल सुरक्षित रखे जाएँ और कमजोर जानवरों के लिए सुरक्षित स्थान बनाए
जाएँ। सभी जानवरों ने उसकी बात मानी। अगले कई सप्ताह तक वे मिलकर काम करते रहे।
बंदरों ने शाखाएँ हटाईं, हाथियों ने मिट्टी खोदी, हिरनों ने सुरक्षित स्थान
खोजे, पक्षियों ने बीज इकट्ठे किए और खरगोशों ने छोटे जलस्रोतों की पहचान की।
कुछ महीनों बाद बारिश आई। जंगल फिर हरा-भरा हो गया। पेड़ों पर नए पत्ते आ गए।
नदियाँ भर गईं और पक्षियों के गीतों से जंगल गूँजने लगा। लेकिन इस बार जंगल पहले
से अधिक तैयार था। जानवरों ने पानी जमा किया और भोजन भी सुरक्षित रखा।
कालू का सम्मान और बढ़ गया। एक दिन जंगल के राजा शेर ने सभी जानवरों की सभा
बुलाई। शेर ने कहा, “हमारे जंगल में बहुत से शक्तिशाली और तेज जीव हैं, लेकिन कालू ने
हमें सिखाया है कि केवल ताकत और गति ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। सही समय पर सही विचार
करना भी बहुत बड़ी शक्ति है।”
सभी जानवरों ने तालियाँ बजाकर कालू का स्वागत किया। कालू ने विनम्रता से सिर
झुका लिया। उसने कहा, “महाराज, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता था। यदि बंदर, हाथी, हिरन, खरगोश और दूसरे
पक्षी मेरी बात न मानते, तो मेरी बुद्धि किसी काम की नहीं होती। इसलिए असली शक्ति
बुद्धि, धैर्य और एकता में है।”
उस दिन के बाद जंगल में एक नियम बनाया गया कि किसी भी संकट के समय पहले शांत
होकर परिस्थिति को समझा जाएगा, फिर सभी मिलकर समाधान खोजेंगे। छोटे से छोटा जीव भी अपनी
बात रख सकता था। कालू विशेष रूप से बच्चों को प्रोत्साहित करता था कि वे प्रश्न
पूछें और किसी समस्या को देखकर तुरंत हार न मानें।
एक दिन कालू का छोटा बेटा उसके पास आया और बोला, “पिताजी, मैं भी आपके
जैसा बुद्धिमान बनना चाहता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए?” कालू ने उसे प्यार से अपने
पास बैठाया और कहा, “बेटा, बुद्धिमान बनने के लिए बहुत सारी किताबें पढ़ना ही जरूरी
नहीं है। अपने आसपास की दुनिया को ध्यान से देखो। किसी की बात बिना सोचे मत मानो।
गलती हो जाए तो उससे सीखो। मुश्किल समय में घबराओ मत। और सबसे जरूरी बात—अपनी
बुद्धि का उपयोग केवल अपने लाभ के लिए मत करो। दूसरों की मदद करने के लिए भी करो।”
बेटे ने पूछा, “क्या बुद्धिमान व्यक्ति कभी गलती नहीं करता?” कालू हँस पड़ा
और बोला, “बिल्कुल करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भी गलती करता है, लेकिन वह अपनी गलती छिपाने
के बजाय उसे स्वीकार करता है और उससे सीखता है। जो व्यक्ति अपनी गलती से सीख लेता
है, उसकी बुद्धि बढ़ती रहती है। जो अपनी गलती को सही साबित करने में लगा रहता है,
वह कभी आगे
नहीं बढ़ता।”
समय बीतता गया। कालू बूढ़ा होने लगा, लेकिन उसकी बुद्धि और अनुभव बढ़ते गए। अब जंगल
के युवा पक्षी भी उससे सलाह लेने आते। कभी किसी को अपना घोंसला सुरक्षित बनाना
होता, कभी किसी को भोजन ढूँढ़ने का रास्ता चाहिए होता, कभी कोई खतरे से बचने की
योजना पूछता। कालू सभी की बात ध्यान से सुनता और फिर सलाह देता।
एक वर्ष जंगल में अचानक आग लग गई। गर्मी बहुत अधिक थी और सूखी घास में आग तेजी
से फैल रही थी। जानवर घबरा गए। कुछ इधर-उधर भागने लगे। कालू ने ऊँचाई से पूरा जंगल
देखा और समझ गया कि आग किस दिशा में बढ़ रही है। उसने पक्षियों को अलग-अलग दिशाओं
में भेजकर जानवरों को सुरक्षित नदी की ओर जाने का संदेश दिया। हाथियों ने अपने
शरीर और सूँड से रास्ते में पानी डाला। बंदरों ने छोटे जानवरों को ऊँची शाखाओं से
सुरक्षित रास्ते दिखाए। हिरनों ने खुले मैदान की ओर दौड़कर झुंडों को संगठित किया।
कालू ने सबसे पहले यह सुनिश्चित किया कि छोटे और कमजोर जानवर सुरक्षित जगह
पहुँच जाएँ। फिर वह स्वयं नदी के किनारे गया। कुछ समय बाद आग उस क्षेत्र से दूर
चली गई। कई पेड़ जल गए, लेकिन जंगल के अधिकांश जीव बच गए।
उस घटना के बाद शेर ने कालू से कहा, “तुम्हारी बुद्धि ने आज फिर हमारे जंगल को बचाया
है।” कालू ने उत्तर दिया, “बुद्धि का सबसे अच्छा उपयोग वही है जिससे किसी का जीवन बच
सके।”
लाली लोमड़ी भी वहाँ मौजूद थी। वह काफी देर तक चुप रही। फिर उसने कालू के पास
जाकर कहा, “कालू, मैंने कभी तुम्हारी बुद्धिमानी को स्वीकार नहीं किया था। मैं तुमसे ईर्ष्या
करती थी। मैंने तुम्हें मूर्ख साबित करने की कोशिश भी की थी। लेकिन आज मैंने देखा
कि तुमने अपनी बुद्धि का उपयोग कभी किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं किया। तुमने
हमेशा दूसरों की मदद की। अब मैं समझती हूँ कि असली बुद्धिमानी यही है।”
कालू ने मुस्कुराकर कहा, “लाली बहन, अपनी गलती समझ लेना भी बुद्धिमानी की निशानी है। यदि हम
अपनी गलतियों से सीख लें तो हमारा अतीत हमारे भविष्य को बेहतर बना सकता है।”
लाली ने उस दिन से अपना व्यवहार बदलने का निर्णय लिया। अब वह दूसरे जानवरों को
धोखा देने के बजाय उनकी मदद करने लगी। धीरे-धीरे जंगल में उसकी भी अच्छी प्रतिष्ठा
बनने लगी। कालू ने उसे कभी उसकी पुरानी गलतियों के लिए अपमानित नहीं किया। वह कहता
था कि किसी व्यक्ति या जीव को उसकी एक गलती से हमेशा के लिए नहीं आँकना चाहिए।
कई वर्षों बाद कालू के बच्चे बड़े हो गए। वे स्वयं अच्छे और समझदार पक्षी बन
चुके थे। वे अपने बच्चों को वही बातें सिखाते जो कालू ने उन्हें सिखाई थीं। घड़े
की कहानी अब जंगल के हर बच्चे को पता थी। जब भी कोई बच्चा किसी कठिन समस्या को
देखकर घबरा जाता, उसके माता-पिता कहते, “कालू कौए को याद करो। पानी
घड़े के नीचे था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने कंकड़ डालकर पानी ऊपर ला
दिया।”
इस कहानी ने जंगल की पीढ़ियों को एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी। बुद्धिमानी का अर्थ
केवल चालाक होना नहीं है। चालाक व्यक्ति अपने लाभ के लिए दूसरों को धोखा दे सकता
है, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति परिस्थिति को समझकर ऐसा रास्ता खोजता है जिसमें समस्या का समाधान हो और अनावश्यक नुकसान न हो। बुद्धिमानी के साथ धैर्य
हो तो असंभव लगने वाला काम भी संभव हो सकता है। बुद्धिमानी के साथ सहयोग हो तो
पूरी दुनिया बदल सकती है।
एक शाम बूढ़ा कालू अपने पुराने बरगद के पेड़ की सबसे ऊँची शाखा पर बैठा
सूर्यास्त देख रहा था। आसमान लाल और सुनहरे रंग से भर गया था। नीचे जंगल में उसके
बच्चे और उनके बच्चे खेल रहे थे। हवा धीरे-धीरे चल रही थी और पेड़ों के पत्ते मधुर
आवाज कर रहे थे। कालू ने आँखें बंद कीं और अपने जीवन के उन सभी दिनों को याद
किया—प्यास से परेशान वह दिन, घड़े में कंकड़ डालना, शिकारी से जंगल को बचाना,
आँधी में
घोंसला बचाना, सूखे में पानी निकालना और आग के समय जानवरों को सुरक्षित
करना।
उसने महसूस किया कि उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उसने घड़े से पानी
निकाल लिया था। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने दूसरों को भी सोचने, धैर्य रखने और
मिलकर समस्याओं का समाधान करने की प्रेरणा दी थी।
उसका छोटा पोता उसके पास उड़कर आया और बोला, “दादाजी, क्या सचमुच आप
इतने बुद्धिमान थे?” कालू मुस्कुराया और बोला, “नहीं बेटा, मैं कोई जादूगर
नहीं था। मैं बस समस्या देखकर घबराता नहीं था। मैं उसे ध्यान से देखता था और खुद
से पूछता था—‘इस परिस्थिति में मेरे पास क्या-क्या साधन हैं और मैं उनका सही उपयोग
कैसे कर सकता हूँ?’ यही सोच मुझे रास्ता दिखाती थी।”
पोते ने पूछा, “अगर पहली कोशिश असफल हो जाए तो?” कालू ने कहा, “तो दूसरी कोशिश
करो। दूसरी असफल हो तो तीसरी करो। लेकिन हर बार वही गलती मत दोहराओ। अपनी असफलता
से कुछ नया सीखो। यही कोशिश धीरे-धीरे अनुभव बनती है और अनुभव से बुद्धिमानी आती
है।”
फिर कालू ने आसमान की ओर देखा और कहा, “याद रखना, जीवन में ऐसी
बहुत-सी परिस्थितियाँ आएँगी जिनमें तुम्हें लगेगा कि रास्ता बंद है। उस समय डरकर
बैठ मत जाना। चारों ओर देखना, सोचना, प्रश्न करना और प्रयास करना। कभी-कभी समाधान तुम्हारे बहुत
पास होगा, लेकिन तुम उसे इसलिए नहीं देख पाओगे क्योंकि तुम परेशानी को देखकर घबरा रहे
होगे।”
पोते ने दादाजी की बात ध्यान से सुनी और उनके पंख से लगकर बैठ गया। सूर्य
धीरे-धीरे क्षितिज के नीचे उतर रहा था। जंगल पर शाम का अँधेरा छाने लगा था। दूर
कहीं किसी पक्षी ने मधुर आवाज में पुकारा। कालू ने अपने पोते से कहा, “चलो, अब घर लौटते
हैं।”
दोनों बरगद के पेड़ की ओर उड़ चले। उनके पीछे सुनहरा आसमान था और सामने उनका
सुरक्षित घर। कालू की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन चुकी थी। हर
बच्चा जानता था कि एक छोटा-सा कौआ भी अपनी बुद्धि, धैर्य और सही सोच के बल पर
बड़ी से बड़ी कठिनाई को हरा सकता है।
इस प्रकार कौए की बुद्धिमानी की कहानी हमें सिखाती है कि
मुश्किल परिस्थिति में घबराने के बजाय शांत रहकर सोच-विचार करना चाहिए। समस्या
चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका कोई न कोई समाधान अवश्य होता है। हमें अपने
आसपास उपलब्ध साधनों का सही उपयोग करना चाहिए, असफलता से सीखना चाहिए और
अपनी बुद्धि का प्रयोग केवल अपने लाभ के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की सहायता के
लिए भी करना चाहिए। सच्ची बुद्धिमानी वही है जो स्वयं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ
दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाए।
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