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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

पहाड़ और छोटी चींटी

 


 

बहुत समय पहले, घने जंगलों, नीली नदियों और बादलों से घिरी एक विशाल घाटी में एक बहुत ऊँचा पहाड़ खड़ा था। उस पहाड़ का नाम गर्वाचल था। वह इतना विशाल और ऊँचा था कि उसकी चोटी हमेशा सफेद बादलों के बीच छिपी रहती थी। सुबह जब सूर्य की पहली किरण धरती पर आती, तो सबसे पहले गर्वाचल की बर्फीली चोटी सुनहरी हो उठती। दूर-दूरतक फैले जंगल उसके पैरों के पास किसी हरे समुद्र की तरह दिखाई देते थे। पहाड़ की ढलानों से कई छोटी-बड़ी धाराएँ निकलती थीं, जो आगे जाकर एक बड़ी नदी में मिल जाती थीं। उसकी चट्टानों के बीच अनगिनत पक्षियों के घोंसले थे, पेड़ों की जड़ों के नीचे छोटे-छोटे जीवों के घर थे और उसकी गुफाओं में कई जानवर अपना जीवन बिताते थे। गर्वाचल प्रकृति का एक अद्भुत हिस्सा था, लेकिन उसके भीतर एक ऐसी भावना भी थी जो धीरे-धीरे उसे दूसरों से दूर कर रही थी। उसे अपनी ऊँचाई, अपनी विशालता और अपनी मजबूती पर बहुत घमंड था।

गर्वाचल को लगता था कि संसार में उससे बड़ा कोई नहीं है। जब तेज हवा उसकी चोटी से टकराती और गहरी आवाज पैदा करती, तो वह समझता कि हवा भी उसकी शक्ति से प्रभावित है। जब काले बादल उसकी चोटियों के चारों ओर घूमते, तो वह सोचता कि बादल भी उसके पास आकर विश्राम करते हैं। जब बिजली उसकी चट्टानों के पीछे चमकती, तो उसे लगता कि आकाश उसकी सुंदरता को देखकर रोशनी कर रहा है। नदी जब उसकी तलहटी से बहती हुई आगे जाती, तो पहाड़ उसे देखकर कहता कि उसकी ऊँचाई से निकला पानी ही पूरी घाटी को जीवन देता है। उसे यह याद ही नहीं रहता था कि नदी बादलों से आती है, बादल हवा के साथ चलते हैं और हवा भी प्रकृति के विशाल चक्र का केवल एक हिस्सा है। गर्वाचल अपनी महानता में इतना खो चुका था कि उसने अपने आसपास की हर छोटी चीज को महत्वहीन समझना शुरू कर दिया था।

उसी पहाड़ की तलहटी में मिट्टी के भीतर चींटियों की एक बड़ी बस्ती थी। उस बस्ती में हजारों चींटियाँ रहती थीं। वे मिल-जुलकर सुरंगें बनातीं, भोजन इकट्ठा करतीं, अंडों और छोटे बच्चों की देखभाल करतीं और आने वाले मौसम के लिए दाने जमा करतीं। उसी बस्ती में एक बहुत छोटी चींटी रहती थी जिसका नाम चिंकी था। चिंकी आकार में दूसरी चींटियों जितनी ही छोटी थी, लेकिन उसके मन में सवाल बहुत बड़े थे। वह हर चीज को ध्यान से देखती और उसके बारे में सोचती रहती। उसे यह जानने की इच्छा रहती कि नदी कहाँ से आती है, बादल कहाँ जाते हैं, पेड़ इतने ऊँचे कैसे होते हैं और पहाड़ की चोटी के ऊपर आखिर क्या है। दूसरी चींटियाँ अक्सर उसके सवालों पर हँसती थीं, लेकिन चिंकी अपने सवालों को मन में दबाने के बजाय उनके उत्तर खोजने की कोशिश करती थी।

हर सुबह जब चिंकी भोजन की तलाश में अपनी बस्ती से बाहर निकलती, तो वह कुछ देर के लिए गर्वाचल की ओर जरूर देखती। पहाड़ की चोटी उसे इतनी दूर लगती थी कि कभी-कभी उसे लगता कि शायद वह किसी दूसरे संसार में है। वह सोचती कि अगर वह कभी उस चोटी तक पहुँच पाए, तो वहाँ से पूरी घाटी कैसी दिखाई देगी। क्या वहाँ से नदी चाँदी की पतली रेखा जैसी दिखाई देगी? क्या बादल सचमुच उसके बिल्कुल पास होंगे? क्या सूरज की किरणें वहाँ अलग तरह से चमकती होंगी? इन सवालों ने उसके मन में एक सपना पैदा कर दिया था। वह एक दिन गर्वाचल की चोटी तक पहुँचना चाहती थी।

एक सुबह चिंकी ने अपनी बस्ती की दूसरी चींटियों से कहा कि वह पहाड़ की चोटी तक जाने की कोशिश करेगी। उसकी बात सुनकर कई चींटियाँ हँसने लगीं। किसी ने कहा कि वह एक छोटी-सी चट्टान भी ठीक से पार नहीं कर सकती, पहाड़ की चोटी तक कैसे पहुँचेगी। दूसरी चींटी ने कहा कि उसकी यात्रा शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाएगी। कुछ चींटियों ने उसे समझाया कि सपने देखने में कोई बुराई नहीं, लेकिन ऐसा सपना देखना ठीक नहीं जिसे पूरा करना असंभव हो। चिंकी ने उनकी बातें सुनीं, लेकिन उसने किसी से बहस नहीं की। उसने केवल इतना कहा कि उसे यह नहीं पता कि वह सफल होगी या नहीं, लेकिन अगर उसने कोशिश ही नहीं की तो उसे कभी पता नहीं चलेगा कि वह कितनी दूर जा सकती है।

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले चिंकी अपने घर से बाहर निकली। उसने रास्ते के लिए थोड़े से सूखे दाने लिए और पहाड़ की ओर चल पड़ी। जैसे-जैसे वह गर्वाचल के करीब पहुँची, उसका विशाल आकार और स्पष्ट दिखाई देने लगा। पहाड़ की पहली चट्टान के सामने पहुँचकर चिंकी ने ऊपर देखा। उसके सामने पत्थर की एक दीवार जैसी खड़ी थी। उसने धीरे से अपना पहला कदम उस चट्टान पर रखा। तभी ऊपर से गर्वाचल की भारी आवाज गूँजी। उसने पूछा कि इतनी छोटी चींटी इतनी सुबह कहाँ जा रही है। चिंकी ने सिर उठाकर कहा कि वह उसकी चोटी तक जाना चाहती है। पहाड़ उसकी बात सुनकर हँस पड़ा। उसकी हँसी की आवाज चट्टानों से टकराकर पूरी घाटी में गूँजने लगी। उसने कहा कि उसकी चोटी तक पहुँचने में उसे शायद कई जन्म लग जाएँगे। चिंकी ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि उसे नहीं पता कि कितना समय लगेगा, लेकिन वह आज पहला कदम जरूर उठाएगी।

गर्वाचल ने उसकी बात को मजाक समझा और उसे आगे बढ़ने दिया। चिंकी ने चट्टान पर चढ़ना शुरू किया। उसके छोटे-छोटे पैर पत्थर की खुरदरी सतह पर टिकते और वह थोड़ा ऊपर बढ़ती। कई बार उसका पैर फिसल जाता और वह नीचे आ जाती। हर बार वह कुछ पल रुकती, फिर दोबारा कोशिश करती। उसके लिए एक छोटी-सी चट्टान भी किसी बड़े पहाड़ से कम नहीं थी। लेकिन चिंकी ने तय किया था कि वह एक साथ बहुत दूर जाने की कोशिश नहीं करेगी। वह केवल अगले कदम पर ध्यान देगी। अगर सामने बड़ी बाधा होगी, तो वह उसका छोटा हिस्सा पार करेगी। यही सोचकर वह धीरे-धीरे ऊपर बढ़ती रही।

कुछ घंटों बाद वह इतनी ऊँचाई पर पहुँच गई कि नीचे उसकी बस्ती दिखाई देने लगी। घरों के छोटे-छोटे रास्ते अब मिट्टी पर बनी पतली रेखाओं जैसे लग रहे थे। चिंकी ने नीचे देखकर महसूस किया कि उसने वास्तव में काफी दूरी तय कर ली है। उसे खुशी हुई। उसने पहली बार समझा कि छोटी कोशिशें मिलकर बड़ी दूरी तय कर सकती हैं। उसी समय गर्वाचल ने भी उसे देखा और उसके भीतर हल्का-सा आश्चर्य पैदा हुआ। उसने सोचा कि शायद यह चींटी उतनी कमजोर नहीं है जितनी वह समझ रहा था।

दोपहर होते-होते सूरज बहुत तेज हो गया। चट्टानें गर्म होने लगीं। चिंकी के छोटे शरीर पर गर्मी का असर होने लगा। उसे प्यास लगी और उसके पैर भी थक गए। उसने एक पत्थर की छाया में बैठकर कुछ देर आराम किया। वहाँ उसे एक छोटी-सी पानी की बूंद दिखाई दी, जो रात की ओस से बची हुई थी। उसने वह बूंद पी और अपने शरीर में नई ऊर्जा महसूस की। उसने सोचा कि थकान का मतलब हार नहीं होता। थकान केवल यह बताती है कि शरीर को थोड़ी देर आराम चाहिए। वह कुछ समय बाद फिर उठी और आगे बढ़ गई।

शाम के समय आकाश अचानक काला होने लगा। बादल तेजी से पहाड़ की ओर बढ़े। हवा तेज हुई और फिर बारिश शुरू हो गई। बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें चिंकी के लिए किसी भारी पत्थर की तरह थीं। वह जल्दी से एक चट्टान की दरार में छिप गई। बाहर पानी तेज धाराओं में बहने लगा। पहाड़ की ढलानों पर छोटे झरने बनने लगे। मिट्टी बहकर नीचे जाने लगी। चिंकी ने उस रात आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की। उसने समझदारी से उसी जगह रुकने का निर्णय लिया। गर्वाचल ने उससे कहा कि अब वापस लौट जाना चाहिए। उसने कहा कि प्रकृति ने उसे संकेत दे दिया है कि यह यात्रा उसके लिए बहुत कठिन है। चिंकी ने उत्तर दिया कि आज रुकना हार नहीं है। जब मौसम ठीक होगा, तब वह फिर आगे बढ़ेगी।

सुबह बारिश बंद हुई तो रास्ता पूरी तरह बदल चुका था। जहाँ कल सूखी मिट्टी थी, वहाँ कीचड़ था। कई छोटे रास्ते बह चुके थे। कुछ पत्थर अपनी जगह से खिसक गए थे। चिंकी ने कुछ देर तक रास्ता देखा और फिर आगे जाने के लिए नया मार्ग खोजने लगी। उसे एक चट्टान के नीचे एक संकरी दरार दिखाई दी। वह उसमें घुसी और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। दरार इतनी संकरी थी कि कई जगह उसे अपने शरीर को मोड़ना पड़ा। अंदर अंधेरा था, लेकिन ऊपर से हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। उसने उस रोशनी की दिशा में चलना जारी रखा। काफी देर बाद वह दरार से बाहर निकली और एक छोटी घाटी में पहुँच गई जहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले थे।

उस घाटी में मधुमक्खियाँ फूलों से रस इकट्ठा कर रही थीं। उन्होंने चिंकी को देखा और पूछा कि वह इतनी ऊँचाई पर अकेली क्यों घूम रही है। चिंकी ने अपनी यात्रा के बारे में बताया। मधुमक्खियों ने उसे सलाह दी कि ऊपर जाते समय उसे तेज हवा और ठंड से सावधान रहना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पहाड़ की ऊँचाई जितनी बढ़ती जाएगी, रास्ते उतने ही कठिन होते जाएँगे। चिंकी ने उनका धन्यवाद किया और आगे चल पड़ी। उसके भीतर अब एक नया विश्वास था। उसने कई कठिनाइयाँ पार कर ली थीं और हर कठिनाई के बाद उसे कोई न कोई नया रास्ता मिला था।

कुछ दिनों तक चिंकी इसी तरह आगे बढ़ती रही। कभी वह किसी पेड़ की जड़ के नीचे आराम करती, कभी पत्थर की दरार में रात बिताती और कभी सूखे पत्तों के बीच छिपकर तेज हवा से बचती। रास्ते में उसे कई छोटे जीव मिले। एक गिलहरी ने उसे एक सुरक्षित चट्टानी रास्ता बताया। एक पहाड़ी पक्षी ने उसे चेतावनी दी कि आगे की ढलान पर पत्थर ढीले हैं। एक केंचुए ने बारिश के बाद बनी मिट्टी की सुरंग का रास्ता दिखाया। चिंकी ने हर जीव की मदद को याद रखा। उसे समझ आने लगा कि कोई भी यात्रा अकेले पूरी नहीं होती। कभी-कभी रास्ते में मिले छोटे-छोटे सहारे ही हमें बड़ी बाधाओं से पार कराते हैं।

एक दिन चिंकी के सामने एक बहुत ऊँची खड़ी चट्टान आ गई। वह लगभग सीधी दीवार जैसी थी। उसके ऊपर जाने का कोई आसान रास्ता नहीं था। चिंकी ने पहले बाईं ओर रास्ता खोजा, लेकिन वहाँ गहरी दरार थी। फिर उसने दाईं ओर देखा, लेकिन वहाँ पत्थर बहुत ढीले थे। उसने कुछ देर सोचकर चट्टान की सतह को ध्यान से देखा। उसे एक पतली दरार दिखाई दी जो ऊपर की ओर जा रही थी। वह इतनी छोटी थी कि शायद किसी बड़े जीव की नजर भी उस पर न जाती, लेकिन चिंकी के लिए वही रास्ता था। उसने अपने छोटे पैर उस दरार में टिकाए और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी।

वह कई बार फिसली। एक बार उसका शरीर काफी नीचे तक खिसक गया। उसके पैर काँपने लगे। उसे लगा कि शायद वह इस बाधा को पार नहीं कर पाएगी। उसने नीचे देखा और फिर ऊपर देखा। ऊपर चोटी अभी भी बहुत दूर थी। कुछ क्षणों के लिए उसके मन में वापस लौटने का विचार आया। लेकिन तभी उसे अपनी पहली सुबह याद आई जब उसने केवल पहला कदम उठाया था। उसने सोचा कि अगर वह उस दिन डरकर वापस लौट जाती, तो आज यहाँ तक कभी नहीं पहुँचती। उसने अपनी सारी शक्ति इकट्ठी की और फिर ऊपर चढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे वह चट्टान के ऊपरी हिस्से तक पहुँच गई।

उसके ऊपर पहुँचते ही गर्वाचल ने पहली बार गंभीर आवाज में कहा कि उसने उसे गलत समझा था। चिंकी ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों कहा। पहाड़ ने उत्तर दिया कि उसे लगता था कि केवल बड़ी और मजबूत चीजें ही कठिनाइयों को पार कर सकती हैं। लेकिन इस छोटी-सी चींटी ने उसे दिखा दिया कि लगातार प्रयास करने वाला छोटा जीव भी बहुत दूर जा सकता है। चिंकी ने मुस्कुराकर कहा कि वह खुद को बहुत शक्तिशाली नहीं मानती। उसे तो बस इतना पता है कि जब एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा रास्ता खोजने की कोशिश करनी चाहिए।

गर्वाचल इस बात पर चुप हो गया। उसे अपने भीतर पहली बार विनम्रता का अनुभव हुआ। उसने महसूस किया कि उसकी विशालता ने उसे दूसरों की क्षमताओं को देखने से रोक दिया था। वह इतना बड़ा था कि उसे लगता था कि हर छोटी चीज उसके सामने महत्वहीन है। लेकिन अब एक छोटी चींटी उसकी आँखें खोल रही थी।

यात्रा अभी खत्म नहीं हुई थी। चिंकी को अभी बहुत ऊपर जाना था। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती गई, पेड़ कम होते गए। हवा ठंडी होती गई। जमीन पर बर्फ दिखाई देने लगी। चट्टानों पर जमी बर्फ उसके छोटे पैरों के लिए बहुत फिसलन भरी थी। उसे हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ता। कई बार हवा इतनी तेज चलती कि वह पीछे की ओर धकेल दी जाती। तब वह किसी पत्थर के पीछे छिप जाती और हवा के शांत होने का इंतजार करती।

एक रात बर्फीला तूफान आया। आसमान पूरी तरह सफेद हो गया। हवा की आवाज इतनी तेज थी कि ऐसा लगता था जैसे पूरा पहाड़ किसी विशाल समुद्र में डूब गया हो। चिंकी एक चट्टान के नीचे सुरक्षित जगह पर बैठी रही। उसने पहली बार अपनी यात्रा को लेकर गंभीर डर महसूस किया। उसने सोचा कि क्या वह वास्तव में चोटी तक पहुँच पाएगी। उसी समय गर्वाचल ने कहा कि अगर वह चाहे तो यहीं से लौट सकती है। उसने बहुत लंबा रास्ता तय कर लिया है और उसने अपने साहस को साबित कर दिया है। चिंकी ने कहा कि अगर चोटी तक पहुँचना उसके लिए बहुत खतरनाक होगा, तो वह जरूर लौटेगी, लेकिन केवल डर के कारण नहीं। उसने सीखा है कि साहस का अर्थ खतरे को अनदेखा करना नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेना है।

सुबह तूफान रुक गया। सूरज निकला तो पूरी पहाड़ी बर्फ से ढकी हुई थी। आसमान साफ था और दूर तक बादलों का समुद्र दिखाई दे रहा था। चिंकी ने ऊपर देखा और पहली बार उसे गर्वाचल की वास्तविक चोटी दिखाई दी। अब वह पहले से कहीं ज्यादा करीब थी। उसके भीतर उत्साह भर गया। उसने धीरे से कहा कि अब उसे बस कुछ और कदम उठाने हैं।

उसने यात्रा फिर शुरू की। रास्ता अब बहुत कठिन था। कई जगह चट्टानें इतनी संकरी थीं कि उसे किनारे से चिपककर चलना पड़ता। नीचे गहरी ढलान थी। हवा लगातार उसके शरीर से टकरा रही थी। लेकिन अब चिंकी ने अपने मन को शांत रखा। उसने पूरी चोटी के बारे में सोचना बंद कर दिया। वह केवल अगले सुरक्षित स्थान तक पहुँचने के बारे में सोचती। एक कदम, फिर दूसरा कदम, फिर तीसरा। इसी तरह वह आगे बढ़ती रही।

कुछ समय बाद वह एक बड़ी दरार के सामने पहुँची। दरार इतनी चौड़ी थी कि वह उसे पार नहीं कर सकती थी। उसने इधर-उधर देखा। एक ओर एक पतली चट्टानी पट्टी थी जो दरार के ऊपर से गुजर रही थी। वह रास्ता बहुत खतरनाक था। चिंकी कुछ देर सोचती रही। उसने हवा की दिशा देखी, चट्टान की मजबूती को महसूस किया और फिर धीरे-धीरे उस पट्टी पर चलने लगी। आधे रास्ते में तेज हवा चली। उसका संतुलन बिगड़ गया। उसका एक पैर फिसल गया और वह लगभग नीचे गिर गई। लेकिन उसने चट्टान की खुरदरी सतह पकड़ ली। कुछ क्षणों तक वह वहीं लटकी रही। उसके भीतर डर था, लेकिन उसने घबराकर अपनी पकड़ नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे उसने खुद को ऊपर खींचा और फिर आगे बढ़ी।

आखिरकार वह दरार पार कर गई। अब चोटी कुछ ही दूरी पर थी। चिंकी ने पीछे मुड़कर देखा। उसे अपनी पूरी यात्रा दिखाई देने लगी। दूर नीचे जंगल, नदी और उसकी छोटी-सी बस्ती दिखाई दे रही थी। बादलों के बीच से सूरज की किरणें घाटी पर पड़ रही थीं। उसने महसूस किया कि जिस पहाड़ को वह कभी असंभव समझती थी, उसकी चोटी अब उसके सामने थी। उसने अपने छोटे-से शरीर में जितनी ऊर्जा बची थी, उसे इकट्ठा किया और आगे बढ़ी।

कुछ ही देर बाद चिंकी गर्वाचल की चोटी पर पहुँच गई।

वहाँ पहुँचते ही वह कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत रही। उसके सामने चारों ओर बादलों का विशाल समुद्र था। दूर-दूर तक कई छोटी-बड़ी पर्वत चोटियाँ दिखाई दे रही थीं। नदी नीचे एक चमकती हुई रेखा जैसी लग रही थी। जंगल हरे रंग की चादर जैसा दिखाई दे रहा था। हवा बहुत ठंडी थी, लेकिन उसके भीतर एक अद्भुत शांति थी। चिंकी ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। उसने सोचा कि अगर उसने उस दिन अपनी बस्ती की चींटियों की हँसी से डरकर कोशिश न की होती, तो वह यह दृश्य कभी नहीं देख पाती।

गर्वाचल ने बहुत धीमी आवाज में कहा कि आज उसने उसे हरा दिया है। चिंकी ने आश्चर्य से पूछा कि उसने पहाड़ को कैसे हराया। पहाड़ ने कहा कि उसने उसकी ऊँचाई को नहीं हराया, बल्कि उसके अहंकार को हरा दिया है। उसे लगता था कि बड़ा होना ही महान होना है। लेकिन अब उसे समझ आ गया कि सच्ची महानता किसी के आकार में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और साहस में होती है। चिंकी ने कहा कि उसने भी पहाड़ से बहुत कुछ सीखा है। उसने सीखा कि बड़ी चीजें डरावनी लग सकती हैं, लेकिन उन्हें समझने और सम्मान देने से डर कम हो जाता है।

कुछ देर बाद चिंकी ने कहा कि अब उसे वापस जाना चाहिए। गर्वाचल ने पूछा कि क्या उसे नीचे उतरने में डर नहीं लगेगा। चिंकी ने मुस्कुराकर कहा कि डर लगेगा, लेकिन अब उसे पता है कि कठिन रास्ते को छोटे हिस्सों में बाँटकर पार किया जा सकता है। पहाड़ ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि उसकी यात्रा केवल उसकी अपनी जीत नहीं है। उसकी कहानी उन सभी छोटे जीवों के लिए प्रेरणा बनेगी जिन्हें कभी अपनी क्षमता पर संदेह होता है।

चिंकी नीचे उतरने लगी। नीचे जाने का रास्ता भी कठिन था, लेकिन अब उसे कई रास्तों का अनुभव हो चुका था। वह सावधानी से आगे बढ़ती रही। जहाँ रास्ता फिसलन भरा होता, वह धीरे चलती। जहाँ हवा तेज होती, वह सुरक्षित जगह खोजती। जहाँ उसे पानी मिलता, वह थोड़ी देर रुकती। रास्ते में उसे फिर वही गिलहरी मिली। उसने पूछा कि क्या चिंकी चोटी तक पहुँच गई। चिंकी ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। मधुमक्खियों ने उसे देखा तो खुशी से उसके आसपास मंडराने लगीं। बूढ़े कछुए ने उसे देखकर कहा कि जिसने बिना रुके चलना सीख लिया, उसके लिए कोई भी रास्ता हमेशा के लिए बंद नहीं रहता।

कई दिनों बाद चिंकी अपनी बस्ती में लौट आई। उसकी साथी चींटियाँ उसे देखकर इकट्ठी हो गईं। जिन चींटियों ने कभी उसका मजाक उड़ाया था, वे अब उसके सामने चुप खड़ी थीं। उन्होंने उससे पूछा कि क्या सच में वह पहाड़ की चोटी तक पहुँच गई थी। चिंकी ने कहा कि हाँ, लेकिन उसने यह भी कहा कि चोटी तक पहुँचना उसकी यात्रा का केवल एक हिस्सा था। असली सीख उसे रास्ते में मिली। उसने समझा कि गिरना बुरा नहीं है, बुरा तब है जब गिरने के बाद उठने की कोशिश छोड़ दी जाए। उसने यह भी समझा कि किसी छोटे जीव को केवल उसके आकार से कमजोर नहीं समझना चाहिए।

उस दिन से चींटियों की बस्ती में एक बड़ा बदलाव आया। जब भी कोई छोटी चींटी कोई नया सपना बताती, बाकी चींटियाँ उसका मजाक नहीं उड़ातीं। वे पहले उसकी बात सुनतीं और फिर पूछतीं कि वह अपना सपना पूरा करने के लिए क्या कदम उठाएगी। चिंकी ने किसी को यह नहीं सिखाया कि हर कठिन काम जरूर पूरा होगा। उसने केवल इतना सिखाया कि किसी काम को असंभव मानने से पहले उसे समझना और कोशिश करना जरूरी है।

गर्वाचल में भी बदलाव आ चुका था। अब उसे अपनी ऊँचाई पर पहले जैसा घमंड नहीं था। जब छोटे पक्षी उसकी चट्टानों पर बैठते, तो उसे अच्छा लगता। जब पेड़ों की जड़ें उसकी ढलानों को थामतीं, तो वह उन्हें महत्व देता। जब नदी उसकी तलहटी से बहती, तो वह समझता कि उसका अस्तित्व केवल उसकी चट्टानों के कारण नहीं है। बादल उसे पानी देते हैं, पेड़ मिट्टी को संभालते हैं, हवा मौसम बदलती है और छोटे जीव उसकी दुनिया को जीवंत बनाते हैं। उसे अब समझ आने लगा था कि प्रकृति में कोई भी अकेला महान नहीं है।

एक दिन तेज हवा गर्वाचल की चोटी से गुजर रही थी। उसने पूछा कि क्या पहाड़ को अब भी लगता है कि वह संसार की सबसे महान चीज है। गर्वाचल ने मुस्कुराकर कहा कि अब वह जानता है कि महानता की कोई एक माप नहीं होती। ऊँचाई महान हो सकती है, लेकिन विनम्रता भी महान है। शक्ति महान हो सकती है, लेकिन धैर्य भी महान है। आकार बड़ा हो सकता है, लेकिन साहस उससे भी बड़ा हो सकता है।

समय गुजरता गया। ऋतुएँ बदलती रहीं। वसंत में पहाड़ की ढलानों पर लाल और पीले फूल खिलते। गर्मियों में नदी तेज बहती। बरसात में झरने चट्टानों से नीचे गिरते और सर्दियों में पूरी चोटी बर्फ से ढक जाती। चिंकी अब भी अपनी बस्ती में रहती थी। उसका शरीर पहले जैसा छोटा था। उसके पैर पहले जैसे छोटे थे। उसकी आवाज भी बहुत धीमी थी। लेकिन उसके भीतर का आत्मविश्वास पहले से कहीं बड़ा था।

कभी-कभी वह बस्ती से बाहर निकलकर गर्वाचल की चोटी को देखती। उसे अपनी पूरी यात्रा याद आती। उसे पहली चट्टान याद आती, बारिश की रात याद आती, वह संकरी दरार याद आती, खड़ी चट्टान याद आती, बर्फीला तूफान याद आता और वह अंतिम दरार भी याद आती जहाँ वह लगभग गिर गई थी। हर याद उसे यही बताती कि उसने एक ही दिन में पहाड़ को नहीं चढ़ा था। उसने हर दिन थोड़ा-थोड़ा रास्ता तय किया था।

एक शाम सूर्य अस्त हो रहा था। आकाश लाल और सुनहरे रंगों से भर गया था। गर्वाचल की चोटी पर आखिरी किरणें चमक रही थीं। चिंकी अपनी बस्ती के बाहर बैठी पहाड़ को देख रही थी। पहाड़ ने उससे पूछा कि क्या वह फिर कभी उसकी चोटी पर आएगी। चिंकी ने कहा कि शायद वह फिर आएगी, लेकिन इस बार किसी दूसरे रास्ते से। गर्वाचल की हँसी चट्टानों से टकराकर पूरी घाटी में गूँज उठी। अब उसकी हँसी में अहंकार नहीं था। उसमें अपनापन था।

धीरे-धीरे जंगल के सभी जीवों को चिंकी और गर्वाचल की कहानी पता चल गई। पक्षी अपने बच्चों को बताते कि आकार देखकर किसी को कमजोर नहीं समझना चाहिए। गिलहरियाँ अपने छोटे बच्चों को समझातीं कि रास्ता कठिन हो तो उसे छोटे हिस्सों में बाँटकर चलना चाहिए। कछुआ कहता कि गति से ज्यादा महत्वपूर्ण निरंतरता है। मधुमक्खियाँ कहतीं कि मिल-जुलकर मिलने वाली छोटी-छोटी मदद भी किसी बड़ी यात्रा को आसान बना सकती है। और गर्वाचल हर बार यह कहानी सुनकर शांत रहता, क्योंकि वह जानता था कि उस छोटी-सी चींटी ने केवल अपनी मंजिल नहीं पाई थी, उसने एक विशाल पहाड़ को भी बदल दिया था।

चिंकी की कहानी की सबसे बड़ी सीख यही थी कि किसी की क्षमता उसके आकार से तय नहीं होती। एक छोटी चींटी के पैर बहुत छोटे हो सकते हैं, लेकिन अगर उनमें लगातार आगे बढ़ने की शक्ति हो, तो वे विशाल पहाड़ की चोटी तक पहुँच सकते हैं। दूसरी ओर एक विशाल पहाड़ कितना भी ऊँचा क्यों न हो, अगर उसके भीतर अहंकार है तो वह भी अधूरा है। सच्ची ऊँचाई उस समय आती है जब शक्ति के साथ विनम्रता और साहस के साथ समझदारी जुड़ती है।

प्रकृति ने उस दिन जैसे दोनों को एक-दूसरे का शिक्षक बना दिया था। चिंकी ने पहाड़ को विनम्रता सिखाई और पहाड़ ने चिंकी को अपनी सीमाओं से आगे बढ़ना सिखाया। दोनों अलग थे, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे को पूरा किया। पहाड़ स्थिर था और चींटी लगातार चलती थी। पहाड़ विशाल था और चींटी छोटी। पहाड़ हजारों वर्षों से खड़ा था और चींटी का जीवन बहुत छोटा था। फिर भी दोनों के बीच एक ऐसी मित्रता बन गई थी जो आकार, समय और शक्ति की सभी सीमाओं से बड़ी थी।

एक शांत रात जब पूरा जंगल सो रहा था, आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे। गर्वाचल की चोटी तारों के नीचे शांत खड़ी थी। उसकी तलहटी में चिंकी अपनी बस्ती में सो रही थी। हवा धीरे-धीरे पेड़ों के बीच से गुजर रही थी। नदी मधुर आवाज में बह रही थी। दूर कहीं किसी पक्षी ने नींद में पंख हिलाए। उस रात पहाड़ ने चुपचाप नीचे देखा और उसे अपनी तलहटी में एक बहुत छोटी-सी दुनिया दिखाई दी। उसे याद आया कि कभी उसने उसी छोटी-सी चींटी को महत्वहीन समझा था। अब उसे पता था कि प्रकृति में कोई भी जीव इतना छोटा नहीं कि उससे कुछ सीखा न जा सके।

अगली सुबह सूर्य की पहली किरण फिर गर्वाचल की चोटी पर पड़ी। धीरे-धीरे सुनहरी रोशनी पहाड़ की ढलानों से नीचे उतरती हुई जंगल और नदी तक पहुँची। चिंकी ने अपनी आँखें खोलीं, अपने घर से बाहर निकली और ऊपर पहाड़ की ओर देखा। गर्वाचल की चोटी चमक रही थी। चिंकी मुस्कुराई। उसके सामने फिर एक नया दिन था। उसने अपने छोटे-से पैर को आगे बढ़ाया और चल पड़ी। उसके लिए हर सुबह एक नई यात्रा थी, हर रास्ता एक नया अवसर था और हर चुनौती एक नई सीख।

गर्वाचल ने उसे जाते हुए देखा और उसके भीतर से एक शांत गूँज निकली, जैसे वह कह रहा हो कि दुनिया में सबसे बड़ी चीज हमेशा सबसे ऊँची नहीं होती। कभी-कभी सबसे छोटी चीज ही सबसे बड़ी सीख दे जाती है। चिंकी ने पीछे मुड़कर पहाड़ की ओर देखा और मुस्कुराई। फिर वह अपने काम में लग गई। वह छोटी थी, लेकिन अब उसे अपने छोटे होने से कोई शिकायत नहीं थी। उसे पता था कि छोटे कदम भी बड़े रास्ते तय कर सकते हैं, बशर्ते वे रुकें नहीं।

और इस तरह एक विशाल पहाड़ और एक छोटी-सी चींटी की कहानी जंगल की मिट्टी, नदी की लहरों, हवा की आवाज और पक्षियों के गीतों में हमेशा के लिए बस गई। जब भी कोई जीव किसी कठिन रास्ते के सामने खड़ा होकर डरता, हवा गर्वाचल की चोटी से गुजरती और उसकी गूँज घाटी में फैल जाती। उस गूँज में जैसे एक संदेश छिपा रहता था कि रास्ता कितना भी बड़ा हो, शुरुआत हमेशा एक छोटे कदम से होती है। मंजिल कितनी भी ऊँची हो, उसे एक-एक कदम करके ही पाया जाता है। और जो जीव अपने भीतर विश्वास, धैर्य और मेहनत को जीवित रखता है, उसके लिए कोई भी पहाड़ हमेशा के लिए असंभव नहीं रहता।

 

 

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