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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

बाज़ की उड़ान

 


 

ऊँचे, नुकीले और बादलों को चीरते हुए पहाड़ों की एक लंबी श्रृंखला थी, जिसके बीच एक गहरी घाटी फैली हुई थी। उस घाटी को दूर से देखने पर ऐसा लगता था जैसे धरती ने अपने सीने पर हरे, भूरे और सुनहरे रंगों की कोई विशाल चित्रकारी कर रखी हो। कहीं देवदार के घने वृक्ष थे, कहीं चट्टानों के बीच उगती छोटी-छोटी झाड़ियाँ, कहीं बर्फ से चमकती चोटियाँ थीं और कहीं इतनी गहरी खाइयाँ थीं कि उनमें झाँकने पर केवल धुंध दिखाई देती थी। उसी पर्वत-श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी पर एक विशाल चट्टान थी, जिसे सभी पक्षी ‘आकाश-शिखर’ कहते थे। आकाश-शिखर पर हवा हमेशा तेज चलती थी। कभी वह शांत और ठंडी होती, कभी अचानक गरजती हुई आती और चट्टानों से टकराकर सीटी जैसी आवाज़ निकालती। उसी चट्टान की एक सुरक्षित दरार में एक बाज़ का घोंसला था। घोंसला सूखी टहनियों, मुलायम घास, पंखों और पहाड़ी झाड़ियों की जड़ों से बना था। उसमें एक छोटा-सा बाज़ रहता था, जिसका नाम उसके माता-पिता ने ‘अरुणपंख’ रखा था। उसके पंख अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे। उसके शरीर पर हल्के भूरे रंग के मुलायम पंख थे, आँखों में गहरी चमक थी और पंजों में ऐसी शक्ति थी जो उसकी उम्र से कहीं अधिक लगती थी। अरुणपंख जन्म से ही ऊँचाई का प्रेमी था। जब वह घोंसले से बाहर झाँकता और नीचे फैली घाटी को देखता, तो उसकी आँखें चमक उठतीं। उसे लगता कि नीचे की सारी दुनिया छोटी है और ऊपर फैला आकाश ही उसका असली घर है। वह घंटों चट्टान के किनारे बैठकर बादलों को देखता रहता। कभी बादल उसके नीचे से गुजरते, कभी चोटी को ढँक लेते, कभी सूर्य की किरणें बादलों के बीच से निकलकर पहाड़ों पर सुनहरी धारियाँ बना देतीं। अरुणपंख उन रोशन धारियों को अपनी आँखों से पीछा करता और सोचता कि शायद आकाश के उस पार कोई ऐसी दुनिया होगी जहाँ हवा कभी खत्म नहीं होती। उसकी माँ ‘धवलिका’ उसे अक्सर पंख फैलाकर हवा को महसूस करना सिखाती थी। उसके पिता ‘वज्रपंख’ उसे चट्टानों के ऊपर उठती गर्म हवाओं की दिशा पहचानना बताते थे। अरुणपंख उनकी हर बात ध्यान से सुनता, लेकिन उसके भीतर एक बेचैनी थी। वह केवल घोंसले से कुछ दूरी तक उड़ना नहीं चाहता था। वह पहाड़ों के ऊपर, बादलों के पार और उन दूरस्थ चोटियों तक उड़ना चाहता था जिन्हें सुबह की धुंध में केवल धुँधली रेखाओं के रूप में देखा जा सकता था।

एक सुबह आकाश असाधारण रूप से साफ था। रात की बारिश के बाद हर चट्टान धुली हुई लग रही थी। पेड़ों की पत्तियों पर पानी की बूँदें चमक रही थीं और दूर की बर्फीली चोटियाँ सूर्य की पहली किरणों में नीली और फिर धीरे-धीरे सुनहरी होती जा रही थीं। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके भीतर पहाड़ी गर्म हवा की हल्की धाराएँ भी उठ रही थीं। धवलिका ने घोंसले के सामने आकर अपने विशाल पंख फैलाए और हवा में कुछ क्षण स्थिर रही। फिर उसने बिना पंख फड़फड़ाए ऊँचाई पकड़ ली। वह गोल-गोल घूमती हुई ऊपर उठती गई और थोड़ी ही देर में एक काले बिंदु जैसी दिखाई देने लगी। अरुणपंख उसे देखता रहा। उसके भीतर उत्साह की लहर दौड़ गई। उसने अपने छोटे पंख फैलाए और चट्टान के किनारे तक आया। नीचे गहरी खाई थी। हवा चट्टान से टकराकर उसके चेहरे पर लग रही थी। उसका शरीर काँपा। उसने एक पैर आगे बढ़ाया, फिर पीछे खींच लिया। वज्रपंख उसके पास आया और कुछ नहीं बोला। उसने केवल अपने पंख फैलाए और हवा के सामने स्थिर खड़ा रहा। अरुणपंख ने उसकी ओर देखा। उसे समझ में आया कि उड़ान किसी आदेश से नहीं आती। उड़ान के लिए अपने भीतर के डर को पहचानना पड़ता है और फिर भी हवा पर भरोसा करना पड़ता है। उसने फिर नीचे देखा। खाई गहरी थी, लेकिन हवा उससे भी विशाल थी। उसने आँखें बंद कीं, पंख फैलाए और चट्टान से छलाँग लगा दी। एक क्षण के लिए उसका शरीर नीचे गिरा। उसके छोटे पंख हवा को पकड़ नहीं पाए। उसका हृदय तेजी से धड़कने लगा। फिर अचानक उसके दाएँ पंख के नीचे हवा की एक गर्म धारा आई। उसका शरीर थोड़ा ऊपर उठा। उसने पंख फैलाए। दूसरी हवा ने उसे संभाला। तीसरी हवा ने उसे आगे धकेला। अरुणपंख ने आँखें खोलीं। वह गिर नहीं रहा था। वह उड़ रहा था।

उस पहली उड़ान में कोई सुंदरता नहीं थी। उसके पंख असंतुलित थे, उसका शरीर बार-बार नीचे झुक रहा था और उसकी पूँछ दिशा बदलने में देर कर रही थी। वह कभी दाएँ घूमता, कभी बाएँ। कई बार उसे लगा कि वह चट्टान से टकरा जाएगा। लेकिन हर गलती के साथ वह हवा को थोड़ा और समझने लगा। हवा केवल उसे धकेल नहीं रही थी; वह उसे उठा भी रही थी। उसने महसूस किया कि यदि वह हर समय पंख फड़फड़ाएगा तो जल्दी थक जाएगा। जब उसने पंखों को स्थिर किया, तो हवा स्वयं उसे ऊपर उठाने लगी। वह पहली बार समझ पाया कि आकाश में शक्ति केवल पंखों में नहीं होती। शक्ति हवा में भी होती है, और सच्चा उड़ने वाला वही है जो अपनी शक्ति के साथ प्रकृति की शक्ति को पहचान सके। कुछ देर बाद वह फिर घोंसले के पास लौट आया। उसके पंख काँप रहे थे, साँस तेज चल रही थी, लेकिन उसकी आँखों में ऐसी चमक थी जो पहले कभी नहीं थी। धवलिका ने उसकी गर्दन को अपनी चोंच से हल्के से छुआ। वज्रपंख ने दूर पहाड़ों की ओर देखा। अरुणपंख समझ गया कि यह केवल शुरुआत थी।

अगले कई दिनों तक अरुणपंख ने उड़ान का अभ्यास किया। वह सुबह की पहली हवा में निकलता और चट्टानों के बीच गोल-गोल घूमता। उसने जाना कि सुबह की हवा हल्की होती है, दोपहर की गर्म हवा ऊँचाई देती है और शाम की हवा अचानक दिशा बदल सकती है। उसने घाटी के ऊपर उठती गर्म धाराओं को पहचानना शुरू किया। जब सूर्य किसी गहरी चट्टान को गर्म करता, तो उसके ऊपर की हवा हल्की होकर ऊपर उठती। अरुणपंख उस हवा में प्रवेश करता और बिना पंख फड़फड़ाए ऊपर उठ जाता। उसे यह खेल बहुत पसंद था। वह कभी बादलों के नीचे जाता, कभी उनके किनारे तक पहुँचता। नीचे से घाटी छोटी दिखाई देती और पेड़ घास के छोटे गुच्छों जैसे लगते। पहाड़ी नदियाँ चाँदी की पतली रेखाओं जैसी दिखाई देतीं। दूर एक विशाल झील थी, जिसका पानी सुबह नीला और शाम को नारंगी दिखाई देता था। झील के ऊपर सफेद पंखों वाले सारस उड़ते थे। उनके दल के बीच एक बूढ़ा सारस था, जिसका नाम ‘श्वेतचक्र’ था। वह लंबे समय से उन पहाड़ों के ऊपर उड़ता आया था और मौसम की चाल पहचानता था। एक दिन उसने अरुणपंख को बहुत ऊँचाई पर अकेले उड़ते देखा। वह उसके पास आया और कुछ देर साथ-साथ उड़ता रहा। श्वेतचक्र ने कहा कि आकाश में केवल ऊपर जाना ही उड़ान नहीं है। कभी-कभी नीचे आना भी उतना ही आवश्यक होता है। उसने बताया कि ऊँचाई का अर्थ केवल ऊँचा उड़ना नहीं, बल्कि यह जानना भी है कि कब कितनी ऊँचाई रखनी चाहिए। अरुणपंख ने उसकी बात मन में रख ली।

कुछ सप्ताह बीते। अरुणपंख के पंख अब मजबूत हो चुके थे। उसका शरीर लंबा और शक्तिशाली हो गया था। उसकी दृष्टि इतनी तीक्ष्ण थी कि वह बहुत ऊँचाई से घाटी के नीचे चलती हुई छोटी-सी छिपकली तक को देख सकता था। अब उसे शिकार की कला भी सीखनी थी। वज्रपंख उसे घाटी के ऊपर ले जाता और नीचे घूमते छोटे जीवों की गति पहचानना सिखाता। वह बताता कि जल्दबाजी करने वाला बाज़ अक्सर लक्ष्य से चूक जाता है। सही समय का इंतजार करने वाला बाज़ कम शक्ति लगाकर भी सफल होता है। अरुणपंख कई बार असफल हुआ। कभी वह बहुत जल्दी नीचे झपटता और शिकार उससे पहले ही चट्टान के पीछे छिप जाता। कभी वह बहुत देर करता और अवसर निकल जाता। लेकिन हर असफलता उसे कुछ नया सिखाती। धीरे-धीरे उसने हवा, दूरी और गति के बीच संबंध समझना शुरू किया। अब वह झपटते समय पंखों को शरीर के पास खींच सकता था और फिर आखिरी क्षण में पंख खोलकर अपनी गति नियंत्रित कर सकता था। उसकी पहली सफल शिकार-उड़ान के बाद वज्रपंख ने उसे दूर एक ऊँची चोटी तक जाने की अनुमति दी। अरुणपंख के लिए वह दिन उत्सव जैसा था।

उस चोटी के पार एक ऐसी घाटी थी जहाँ से आगे का आकाश उसके लिए अनजान था। वहाँ ऊँचे काले पहाड़ थे, जिनकी चोटियाँ हमेशा धुंध से घिरी रहती थीं। पक्षियों के बीच उस क्षेत्र को ‘गर्जन-घाटी’ कहा जाता था। कहा जाता था कि वहाँ हवा अचानक बदल जाती है और कई बार बिना बादल के भी इतनी तेज गर्जना होती है कि पूरी घाटी काँप उठती है। अरुणपंख को उस घाटी को देखने की तीव्र इच्छा थी। धवलिका ने उसे सावधान किया। उसने कहा कि हर अनजान आकाश बुरा नहीं होता, लेकिन हर अनजान आकाश सुरक्षित भी नहीं होता। अरुणपंख ने सिर झुका दिया। वह लौट आया, लेकिन गर्जन-घाटी की छवि उसके मन में बनी रही।

एक दिन दोपहर के समय आकाश अचानक बदलने लगा। पश्चिम से काले बादल उठे। हवा का तापमान तेजी से गिरा। दूर की चोटियों पर बर्फीली धुंध फैलने लगी। पक्षियों के झुंड नीचे की ओर लौटने लगे। श्वेतचक्र ने अपने दल को झील के पास सुरक्षित वृक्षों की ओर मोड़ दिया। पहाड़ी कौवे चट्टानों की दरारों में घुस गए। छोटी चिड़ियाँ झाड़ियों के भीतर छिप गईं। लेकिन अरुणपंख उस समय एक ऊँची चोटी के ऊपर था। उसने देखा कि उसके सामने का आकाश काले और नीले रंग का हो रहा है। बिजली की चमक बादलों के भीतर घूम रही थी। उसे तुरंत वापस लौटना था। उसने पंख फैलाए और पूर्व की ओर मुड़ा। तभी एक तेज हवा ने उसे ऊपर उठा लिया। दूसरी हवा ने उसे बाईं ओर धकेल दिया। तीसरी हवा इतनी शक्तिशाली थी कि वह कुछ क्षण तक अपनी दिशा ही नहीं समझ पाया। उसने पंख मोड़े और नीचे आने की कोशिश की, लेकिन नीचे भी हवा घूम रही थी। वह पहली बार उस शक्ति के सामने था जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सकता था।

तूफान अचानक पूरी तरह जाग उठा। बादलों के बीच बिजली चमकी और गर्जना से पहाड़ गूँज उठे। बारिश की मोटी बूँदें उसके पंखों से टकराने लगीं। कुछ ही क्षणों में उसके पंख भारी हो गए। उड़ना कठिन हो गया। अरुणपंख ने एक चट्टान की ओर जाने की कोशिश की, लेकिन हवा ने उसे फिर दूर धकेल दिया। उसके भीतर भय पैदा हुआ। उसे अपना घोंसला याद आया। धवलिका की आँखें याद आईं। वज्रपंख की शांत उड़ान याद आई। उसने खुद को संभाला और सोचा कि डर दिशा नहीं देता, लेकिन हवा दिशा का संकेत देती है। उसने अपने पंखों को थोड़ा मोड़ा और हवा के बहाव को महसूस करने लगा। कुछ क्षण बाद उसे पता चला कि हवा सीधे ऊपर नहीं जा रही थी। वह चट्टानों के बीच घूमकर एक बड़ी वृत्ताकार धारा बना रही थी। अरुणपंख उस धारा के साथ बहने लगा। वह धीरे-धीरे तूफान के केंद्र से बाहर निकलने लगा। बारिश कम हुई। बादलों के बीच एक धुंधली रोशनी दिखाई दी। उसने उस रोशनी की दिशा पकड़ी और बहुत देर बाद एक विशाल काली चट्टान के नीचे पहुँच गया।

वह पूरी तरह थक चुका था। उसके पंख पानी से भीगे थे। शरीर काँप रहा था। उसने चट्टान की दरार में शरण ली। वहाँ एक बूढ़ा पर्वतीय उल्लू बैठा था। उसके पंख धूसर थे और आँखें गहरी पीली। उसका नाम ‘निशानयन’ था। उसने अरुणपंख को देखा और कहा कि तूफान से लड़ना मूर्खता है। तूफान से बचना बुद्धिमानी है। अरुणपंख ने उसकी ओर देखा। निशानयन ने कहा कि आकाश किसी का शत्रु नहीं है। जो उसे समझने की कोशिश करता है, उसके लिए वही आकाश मार्ग बन जाता है; जो उसे जीतने की कोशिश करता है, उसके लिए वही आकाश संकट बन सकता है। अरुणपंख ने उस रात चट्टान की दरार में विश्राम किया। बाहर बारिश लगातार गिरती रही। बिजली चमकती रही। लेकिन उसके भीतर पहली बार एक नया विश्वास जन्म ले रहा था। उसे समझ आने लगा था कि महान उड़ान केवल ऊँचाई की कहानी नहीं होती। महान उड़ान वह होती है जिसमें उड़ने वाला अपने डर, अपनी सीमाओं और प्रकृति की शक्ति—तीनों को समझना सीखता है।

सुबह जब बादल छँटे, तो दुनिया बदली हुई लग रही थी। पहाड़ों पर बर्फ की नई परत चमक रही थी। घाटी की नदियाँ उफान पर थीं। कई छोटे पेड़ टूट गए थे। कुछ पक्षियों के पुराने घोंसले हवा में उड़ गए थे। लेकिन सूर्य की रोशनी लौट आई थी। अरुणपंख ने अपने पंख फैलाए। वे अभी भी थोड़े भारी थे, मगर उनमें शक्ति लौट रही थी। उसने चट्टान से उड़ान भरी और धीरे-धीरे अपने परिचित पर्वत की ओर लौटने लगा। रास्ते में उसने कई पक्षियों को देखा जो तूफान के बाद अपने घोंसले ठीक कर रहे थे। किसी ने किसी से शिकायत नहीं की। प्रकृति ने जो बदला था, उसे सभी अपने-अपने तरीके से फिर बना रहे थे। अरुणपंख ने देखा कि एक छोटी-सी चिड़िया टूटी हुई टहनी लेकर बार-बार अपने घोंसले की ओर जा रही थी। हवा हर बार टहनी गिरा देती, लेकिन वह फिर लौटती। अरुणपंख कुछ देर उसके ऊपर मंडराता रहा। उसे समझ आया कि उड़ान केवल आकाश जीतने का नाम नहीं है। उड़ान का अर्थ लौटना भी है।

जब वह आकाश-शिखर पर पहुँचा, तो धवलिका और वज्रपंख उसे देखकर शांत हो गए। किसी ने उसे डाँटा नहीं। अरुणपंख घोंसले के भीतर बैठ गया। उसके शरीर पर तूफान के निशान थे। कुछ पंख टूट गए थे। लेकिन उसकी आँखों में पहले से कहीं अधिक गहराई थी। वज्रपंख ने उसे देखा और कहा कि अब वह केवल उड़ना नहीं सीख रहा, बल्कि आकाश को समझना सीख रहा है। अरुणपंख ने दूर क्षितिज की ओर देखा। तूफान के बाद आकाश बेहद साफ था। इतनी दूर तक पर्वत दिखाई दे रहे थे जितने पहले कभी नहीं दिखे थे। उस दिन पहली बार उसे लगा कि उसकी दुनिया केवल आकाश-शिखर तक सीमित नहीं है।

समय बीतता गया। ऋतुएँ बदलती रहीं। गर्मियों में पहाड़ों की ढलानों पर पीले फूल खिलते। बरसात में घाटी हरी चादर जैसी हो जाती। शरद में हवा पारदर्शी और ठंडी हो जाती। सर्दियों में बर्फ सब कुछ ढँक लेती। अरुणपंख हर मौसम के साथ उड़ान का नया रूप सीखता। उसने जाना कि बर्फीली हवा भारी होती है और उसमें लंबे समय तक उड़ना कठिन होता है। उसने जाना कि गर्मियों में पहाड़ी चट्टानों से उठने वाली हवा ऊँचाई पाने का सबसे अच्छा रास्ता है। उसने जाना कि बादलों के भीतर प्रवेश करने से पहले हवा की गंध और तापमान बदलता है। उसने जाना कि पक्षियों के झुंड की दिशा से भी आने वाले मौसम का अनुमान लगाया जा सकता है। उसकी दृष्टि अब केवल शिकार के लिए नहीं थी। वह दूर आकाश को पढ़ने लगी थी।

एक शाम वह झील के ऊपर उड़ रहा था। सूर्य पहाड़ों के पीछे जाने वाला था। पानी पर लाल और सुनहरी रोशनी तैर रही थी। उसी समय उसने देखा कि उत्तर दिशा में एक विशाल काला बादल धीरे-धीरे बन रहा है। हवा की दिशा असामान्य थी। दूर कहीं बिजली चमक रही थी। अरुणपंख ने तुरंत घाटी की ओर लौटना शुरू किया। रास्ते में उसने पक्षियों के कई छोटे समूह देखे जो अभी भी खुले आकाश में थे। उसने ऊँची आवाज़ में पुकारकर उन्हें नीचे जाने का संकेत दिया। सारसों ने उसकी दिशा देखी और झील के किनारे उतर गए। कौवों ने चट्टानों की ओर उड़ान भरी। छोटी चिड़ियाँ झाड़ियों में चली गईं। कुछ ही समय बाद तूफान आया। लेकिन इस बार बहुत कम पक्षी खुले आकाश में थे। अरुणपंख ने पहली बार महसूस किया कि उसके सीखे हुए ज्ञान का अर्थ केवल स्वयं को बचाना नहीं था। वह अब दूसरे पक्षियों के लिए भी आकाश का संकेत बन सकता था।

धीरे-धीरे उसका नाम पूरी पर्वत-श्रृंखला में फैल गया। पक्षी उसे अब केवल अरुणपंख नहीं कहते थे। वे उसे ‘आकाश-पथदर्शी’ कहने लगे थे। लेकिन उसे यह नाम पसंद नहीं था। जब कोई उसे महान कहता, तो वह हमेशा आकाश की ओर देखता। उसे पता था कि वह केवल हवा को पढ़ना सीख पाया है। आकाश उससे कहीं बड़ा है। उसने कभी यह नहीं माना कि वह आकाश का स्वामी है। उसके लिए आकाश एक शिक्षक था। पहाड़ उसके पुराने साथी थे। हवा उसकी मार्गदर्शक थी। बादल उसके बदलते हुए संकेत थे। तूफान उसका कठोर गुरु था।

एक दिन श्वेतचक्र उसके पास आया। वह अब पहले से बहुत बूढ़ा हो चुका था। उसके पंखों का सफेद रंग हल्का धूसर पड़ गया था। उसने कहा कि दक्षिण के पहाड़ों के पार एक विशाल पठार है, जहाँ इस वर्ष बहुत कम बारिश हुई है। वहाँ के कई छोटे जलस्रोत सूख रहे हैं। उसने पूछा कि क्या अरुणपंख उस क्षेत्र तक उड़ सकता है और वहाँ के पक्षियों को पानी वाले सुरक्षित स्थानों की दिशा दिखा सकता है। अरुणपंख ने बिना देर किए सहमति दी। उसके साथ कुछ अन्य पक्षी भी चल पड़े। यात्रा लंबी थी। उन्हें ऊँची चोटियों, गहरी घाटियों और खुले मैदानों के ऊपर से गुजरना था।

पहले दिन यात्रा आसान रही। सुबह की हवा उनके पक्ष में थी। अरुणपंख सबसे आगे उड़ रहा था। उसके पीछे सारसों का छोटा दल, कुछ पहाड़ी कौवे और दो चीलें उड़ रही थीं। दोपहर तक वे ऊँचे पठार पर पहुँच गए। वहाँ की जमीन सूखी थी। घास पीली पड़ चुकी थी। कुछ छोटे तालाब पूरी तरह सूख गए थे। पक्षी पानी की तलाश में दूर-दूर तक उड़ रहे थे। अरुणपंख ने ऊँचाई से पूरे क्षेत्र को देखा। उसे एक चमकीली रेखा दिखाई दी। वह नीचे गया। वह पानी नहीं था, बल्कि धूप में चमकती पत्थरों की एक पंक्ति थी। वह आगे बढ़ा। कुछ देर बाद उसे एक गहरी घाटी दिखाई दी जिसके तल में नीले रंग की पतली धारा बह रही थी। धारा बहुत छोटी थी, लेकिन उसमें पानी साफ था। उसने उस स्थान को याद रखा और वापस लौट आया। फिर उसने दूसरे पक्षियों को उस दिशा में उड़ने का संकेत दिया। धीरे-धीरे अनेक पक्षी उस जलस्रोत तक पहुँच गए।

लेकिन यात्रा अभी पूरी नहीं हुई थी। पठार के दूसरे छोर पर एक विशाल सूखा मैदान था। वहाँ हवा गर्म और भारी थी। दोपहर में जमीन से उठती गर्म हवा इतनी तेज थी कि अरुणपंख को ऊँचाई पाने में कठिनाई नहीं हुई, लेकिन नीचे उतरना मुश्किल था। उसने देखा कि कई छोटे पक्षी गर्म हवा में भटक रहे थे। उसने उन्हें एक चट्टानी किनारे की ओर निर्देशित किया जहाँ छाया थी। उसने सीखा कि कभी-कभी नेतृत्व आगे उड़ने का नाम नहीं है; कभी-कभी किसी छोटे जीव के लिए सुरक्षित स्थान खोजने का नाम भी नेतृत्व है।

तीसरे दिन आकाश में धूल का तूफान उठा। पूरा पठार पीले धुएँ जैसा दिखाई देने लगा। पक्षियों के लिए दिशा पहचानना कठिन हो गया। सूर्य दिखाई नहीं दे रहा था। हवा लगातार घूम रही थी। अरुणपंख ने अपने पंख समेटे और जमीन के करीब उड़ने के बजाय एक ऊँची चट्टान की ओट में जाने का निर्णय लिया। बाकी पक्षी भी उसके पीछे आए। कुछ समय तक वे वहीं रुके रहे। धूल की आँधी ने आकाश को ढँक दिया। कई घंटों बाद हवा शांत हुई। जब सूर्य दिखाई दिया, तो अरुणपंख ने देखा कि जिस दिशा में वे जा रहे थे, वह गलत दिशा थी। यदि वे सीधे उड़ते रहते, तो वे जलस्रोत से दूर चले जाते। उसने अपनी दृष्टि से पर्वतों की आकृति पहचानी और दल को सही दिशा में मोड़ा। उस दिन सबने जाना कि आकाश साफ न हो तो भी रास्ता खोजा जा सकता है, यदि स्मृति और अनुभव साथ हों।

कई दिनों बाद वे अपने पर्वत लौटे। अरुणपंख अब पहले से अधिक मजबूत था, लेकिन उसके भीतर विनम्रता भी बढ़ गई थी। उसने देखा कि उसकी अनुपस्थिति में आकाश-शिखर पर कई युवा बाज़ उड़ना सीख रहे थे। उनमें से एक बहुत छोटा बाज़ था जो बार-बार चट्टान के किनारे आता और डरकर पीछे हट जाता। अरुणपंख उसे देखता रहा। उसे अपनी पहली उड़ान याद आई। वही काँपते पंख, वही गहरी खाई, वही हवा का पहला स्पर्श। उसने उस छोटे बाज़ के पास जाकर अपने पंख फैलाए। उसने उसे धक्का नहीं दिया। उसने केवल हवा में उड़कर दिखाया कि कैसे पंख स्थिर रखे जाते हैं। छोटा बाज़ कुछ देर देखता रहा। फिर उसने भी पंख फैलाए। उसने छलाँग लगाई। एक क्षण के लिए वह नीचे गिरा। फिर हवा ने उसे उठा लिया। अरुणपंख उसके साथ उड़ता रहा।

उस दिन अरुणपंख ने समझा कि उड़ान का सबसे सुंदर क्षण वह नहीं है जब कोई सबसे ऊँचाई पर पहुँचता है। सबसे सुंदर क्षण वह है जब कोई दूसरे को पहली बार उड़ते हुए देखता है। आकाश में कोई स्थायी सिंहासन नहीं होता। जो आज ऊँचा उड़ रहा है, कल किसी और को उड़ना सिखाएगा। पहाड़ वही रहते हैं, लेकिन पंख बदलते रहते हैं। हवा वही रहती है, लेकिन उड़ने वाले बदलते रहते हैं। इसी तरह आकाश की परंपरा आगे बढ़ती है।

कुछ वर्षों बाद अरुणपंख स्वयं पर्वत-श्रृंखला का सबसे अनुभवी बाज़ बन चुका था। उसके पंखों पर अब गहरे रंग के मजबूत पंख थे। उसकी आँखों में पहले जैसी चमक थी, लेकिन अब उसमें अनुभव की शांति भी थी। वह अक्सर अकेला बहुत दूर तक उड़ता। कभी वह बर्फीली चोटियों के ऊपर जाता, कभी झील के ऊपर चक्कर लगाता, कभी गर्जन-घाटी के ऊपर से गुजरता। वह उस चट्टान को भी देखता जहाँ उसने पहली बार तूफान से बचना सीखा था। उसे लगता जैसे वह चट्टान अब भी उसकी प्रतीक्षा कर रही हो। वह हर बार वहाँ कुछ देर बैठता और नीचे बहती हवा को सुनता।

एक दिन उसने देखा कि आकाश असामान्य रूप से शांत है। न बादल थे, न तेज हवा, न पक्षियों की आवाज़। पूरी पर्वत-श्रृंखला जैसे किसी बड़े परिवर्तन से पहले रुक गई हो। अरुणपंख ने क्षितिज की ओर देखा। दूर बहुत दक्षिण में एक विशाल धूसर पट्टी दिखाई दी। वह धीरे-धीरे बढ़ रही थी। उसने हवा की गंध महसूस की। उसमें समुद्र जैसी नमी थी, जबकि समुद्र वहाँ से बहुत दूर था। यह संकेत था कि बहुत बड़ा मौसम आने वाला है। उसने तुरंत सभी पक्षियों को ऊँची चोटियों से नीचे सुरक्षित घाटियों की ओर जाने का संकेत दिया। पक्षियों के झुंड उड़ने लगे। छोटे जीव चट्टानों की दरारों में छिपने लगे। अरुणपंख स्वयं सबसे पीछे रहा ताकि कोई पक्षी पीछे न छूटे।

रात तक आकाश काला हो गया। बिजली ने पहाड़ों को सफेद रोशनी में चमका दिया। बारिश इतनी तेज हुई कि घाटियाँ नदियों में बदल गईं। हवा ने कई पेड़ उखाड़ दिए। चट्टानों से पत्थर टूटकर नीचे गिरने लगे। लेकिन अधिकांश पक्षी सुरक्षित थे। वे चट्टानों की ओट में थे। अरुणपंख ने एक ऊँची दरार में आश्रय लिया। बाहर प्रकृति की विशाल शक्ति गर्जना कर रही थी। उसे अपना पहला तूफान याद आया। तब वह अकेला और अनुभवहीन था। अब उसके आसपास कई छोटे पक्षी थे जो उसकी उपस्थिति से शांत थे। उसने महसूस किया कि समय ने उसे केवल मजबूत नहीं बनाया था; समय ने उसे दूसरों के लिए आश्रय बनना भी सिखाया था।

सुबह तूफान समाप्त हुआ। सूर्य बादलों के पीछे से निकला। पर्वतों पर पानी की हजारों धाराएँ चमकने लगीं। घाटी में नए झरने बन गए थे। सूखी धरती भीग गई थी। पेड़ों की जड़ों को पानी मिला था। कई टूटी शाखाओं के बीच नई हरियाली दिखाई देने लगी। पक्षी अपने आश्रयों से बाहर निकले। हवा में थकान थी, लेकिन जीवन भी था। अरुणपंख आकाश में उठा। उसने नीचे देखा। पूरी पर्वत-श्रृंखला अब पहले से अधिक चमकीली लग रही थी। तूफान ने बहुत कुछ बदला था, लेकिन उसने जीवन को समाप्त नहीं किया था। उसने उसे एक नया रूप दिया था।

अरुणपंख बहुत ऊपर गया। उसने पंख फैलाए और हवा को अपने नीचे बहने दिया। अब उसे पंख फड़फड़ाने की आवश्यकता नहीं थी। वह हवा के साथ बह रहा था। नीचे पहाड़ थे, उनसे भी नीचे घाटियाँ थीं, उनसे नीचे नदियाँ थीं, और उन सबके ऊपर वह विशाल आकाश था। उसने दूर क्षितिज की ओर देखा। वहाँ सूर्य उग रहा था। बादलों की परतें सुनहरी हो रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे आकाश स्वयं किसी विशाल द्वार की तरह खुल रहा हो। अरुणपंख उस दिशा में उड़ चला।

उसकी उड़ान अब किसी लक्ष्य की तलाश नहीं थी। वह किसी चोटी को जीतने नहीं जा रहा था। वह किसी सीमा को तोड़ने नहीं जा रहा था। वह केवल उड़ रहा था—क्योंकि उड़ना उसके अस्तित्व का हिस्सा था। हवा उसके पंखों के नीचे थी। सूर्य उसके ऊपर था। पहाड़ पीछे छूट रहे थे। झीलें छोटी होती जा रही थीं। बादल उसके बराबर आ गए। कुछ देर बाद वह बादलों के ऊपर था। नीचे सफेद बादलों का समुद्र फैला था। उनकी चोटियाँ सूर्य की रोशनी में चमक रही थीं। उसे लगा जैसे धरती कहीं नीचे सो रही हो और आकाश जाग रहा हो।

उसी क्षण उसे अपने जीवन की पहली उड़ान याद आई। वह छोटी-सी छलाँग, गिरने का भय, हवा का पहला स्पर्श और फिर अचानक ऊपर उठता शरीर। उसे लगा कि उसकी पूरी यात्रा उसी एक क्षण का विस्तार थी। उसने सीखा था कि डर के बावजूद पंख फैलाने पड़ते हैं। उसने सीखा था कि हवा को हराया नहीं जा सकता, लेकिन उसके साथ चला जा सकता है। उसने सीखा था कि तूफान से लड़ने की बजाय उसके रास्ते को समझना चाहिए। उसने सीखा था कि ऊँचाई का अर्थ दूसरों से ऊपर होना नहीं, बल्कि अपने भीतर की सीमाओं से आगे जाना है। उसने सीखा था कि सच्ची शक्ति अकेले उड़ने में नहीं, बल्कि दूसरों को सुरक्षित उड़ना सिखाने में है।

अरुणपंख ने नीचे देखा। दूर एक छोटा-सा काला बिंदु बादलों के ऊपर उठ रहा था। वह वही युवा बाज़ था जिसे उसने कुछ समय पहले पहली उड़ान सिखाई थी। अब वह उसके पीछे-पीछे उड़ रहा था। अरुणपंख ने अपने पंखों की गति थोड़ी धीमी कर दी। युवा बाज़ उसके पास आ गया। दोनों कुछ देर साथ उड़ते रहे। कोई शब्द नहीं था। केवल हवा की आवाज़ थी। सूर्य की रोशनी उनके पंखों पर पड़ रही थी। दोनों बाज़ एक विशाल वृत्त बनाते हुए ऊपर उठे। फिर अरुणपंख ने अपने पंख स्थिर कर लिए। युवा बाज़ ने भी वैसा ही किया। दोनों हवा की गर्म धारा में तैरते हुए ऊँचे और ऊँचे उठने लगे।

नीचे पर्वत छोटे होते गए। झील चमकते हुए एक बिंदु में बदल गई। बादल नीचे रह गए। हवा पतली और ठंडी हो गई। फिर भी दोनों उड़ते रहे। अरुणपंख ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसे पता था कि उड़ान का कोई अंतिम आकाश नहीं होता। हर ऊँचाई के बाद एक नई ऊँचाई होती है। हर क्षितिज के बाद एक नया क्षितिज होता है। हर तूफान के बाद एक नया साफ आकाश आता है। और हर बाज़ के भीतर एक ऐसी उड़ान छिपी होती है जिसे वह तभी जान पाता है जब वह चट्टान के किनारे खड़ा होकर अपने पंखों पर विश्वास करता है।

शाम तक अरुणपंख और युवा बाज़ वापस आकाश-शिखर पर लौट आए। सूर्य डूब रहा था। पहाड़ों की चोटियाँ लाल हो गई थीं। घाटी पर लंबी परछाइयाँ फैल रही थीं। पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। हवा अब शांत थी। अरुणपंख चट्टान के सबसे ऊँचे हिस्से पर बैठ गया। उसने अपने पंख समेट लिए। उसके सामने वही विशाल आकाश था जिसे वह बचपन से देखता आया था। लेकिन अब वह आकाश उसे पहले जैसा अनजान नहीं लगता था। वह जानता था कि आकाश को पूरी तरह कोई नहीं जान सकता। फिर भी हर उड़ान उसे उसके थोड़ा और करीब ले जाती है।

रात आई। तारों से आकाश भर गया। पहाड़ अंधेरे में विशाल छायाओं की तरह खड़े थे। घाटी में कहीं-कहीं जुगनुओं की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। हवा चट्टान से टकराकर धीमी ध्वनि निकाल रही थी। अरुणपंख ने आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे हवा कह रही हो कि उड़ान अभी समाप्त नहीं हुई। अगले सूर्योदय के साथ फिर एक नई हवा उठेगी, नए बादल आएँगे, नई दिशाएँ खुलेंगी और कोई नया पंख पहली बार आकाश को छुएगा।

अगली सुबह जब सूर्य क्षितिज से ऊपर उठा, तो अरुणपंख ने फिर अपने पंख फैलाए। वह चट्टान से आगे बढ़ा। हवा उसके नीचे थी। उसने एक हल्का-सा मोड़ लिया और आकाश में गोल चक्कर बनाते हुए ऊपर उठ गया। युवा बाज़ उसके पीछे था। दूर सारसों का झुंड उड़ रहा था। पहाड़ी कौवे चट्टानों के ऊपर मंडरा रहे थे। झील पर सूर्य की रोशनी चमक रही थी। पूरी घाटी जाग रही थी। अरुणपंख ने ऊँचाई पकड़ी और क्षितिज की ओर उड़ चला।

उसकी परछाईं कुछ क्षण चट्टान पर दिखाई दी, फिर बादलों के ऊपर चली गई। नीचे पहाड़ स्थिर थे, लेकिन उनके ऊपर हवा गतिशील थी। आकाश विशाल था, लेकिन उसके भीतर उड़ने वाले पंखों के लिए अनगिनत रास्ते थे। अरुणपंख को अब यह समझ आ चुका था कि उड़ान केवल शरीर की गति नहीं है। उड़ान विश्वास है। उड़ान साहस है। उड़ान सीखना है। उड़ान गिरकर फिर उठना है। उड़ान तूफान में दिशा खोजना है। उड़ान किसी सीमा के सामने रुकने के बजाय उसे समझना है। उड़ान अपने लिए रास्ता बनाने के साथ-साथ आने वाले पंखों के लिए भी आकाश खुला छोड़ना है।

और इसीलिए पर्वतों की उस विशाल श्रृंखला में जब भी सुबह की पहली किरण आकाश-शिखर पर पड़ती, एक बाज़ को ऊँचाई पर उड़ते हुए देखा जा सकता था। कभी वह बादलों के ऊपर होता, कभी झील के ऊपर, कभी बर्फीली चोटियों के बीच और कभी दूर गर्जन-घाटी की ओर। उसकी उड़ान हर दिन अलग होती थी, लेकिन उसका अर्थ हमेशा एक ही रहता था—आकाश किसी एक का नहीं होता। जो पंख फैलाने का साहस करता है, उसके लिए आकाश रास्ता बन जाता है। जो हवा को समझता है, वह बिना थके दूर तक जा सकता है। जो तूफान से सीखता है, वह अगली उड़ान के लिए और मजबूत बनता है। और जो अपनी उड़ान किसी दूसरे पंख को सिखा देता है, उसकी उड़ान उसके शरीर से कहीं आगे तक जीवित रहती है।

बहुत समय बाद भी आकाश-शिखर पर बाज़ों की नई पीढ़ियाँ जन्म लेती रहीं। छोटे पंख पहली बार चट्टान के किनारे काँपते रहे। कुछ नीचे गिरकर फिर उठे। कुछ हवा को तुरंत समझ गए। कुछ ने तूफानों का सामना किया। कुछ ने दूरस्थ घाटियों में नए जलस्रोत खोजे। लेकिन हर पीढ़ी में एक कहानी दोहराई जाती रही—एक छोटे बाज़ की कहानी जिसने पहली बार गहरी खाई के ऊपर अपने पंख फैलाए थे, हवा पर भरोसा किया था और गिरने के भय के बावजूद उड़ गया था। उस कहानी का नाम था ‘बाज़ की उड़ान’।

और जब कभी कोई नया बाज़ पहली बार आकाश में उठता, तो ऊँचे पहाड़ों के बीच हवा जैसे धीमे से फुसफुसाती—पंख फैलाओ, गिरने से मत डरो, हवा को समझो, दिशा को पहचानो और उड़ते रहो। क्योंकि आकाश की कोई आखिरी सीमा नहीं होती। क्षितिज के पार हमेशा एक और क्षितिज होता है। बादलों के ऊपर हमेशा एक और खुला आकाश होता है। और हर सच्ची उड़ान अपने पीछे एक ऐसी राह छोड़ जाती है, जिस पर आने वाले पंख और भी दूर तक उड़ सकते हैं।

सूर्य धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता गया। अरुणपंख की आकृति आकाश में छोटी होती गई। फिर वह बादलों के बीच खो गया। कुछ क्षण बाद वह फिर दिखाई दिया—इस बार और भी ऊँचाई पर। उसके पंख पूरी तरह खुले थे। हवा उसके साथ थी। नीचे पर्वत मौन खड़े थे और ऊपर अनंत आकाश फैला था। उसने एक लंबा चक्कर लगाया और दूर क्षितिज की ओर बढ़ गया। उसकी उड़ान को कोई सीमा रोक नहीं रही थी। उसके सामने केवल आकाश था, और आकाश के पार एक अनंत संभावना।

यही बाज़ की उड़ान थी—एक ऐसी उड़ान जो चट्टान से शुरू होकर बादलों तक पहुँची, तूफानों से गुजरी, घाटियों को पार करती हुई दूर के क्षितिज तक गई और फिर एक नई पीढ़ी के पंखों में अपना रास्ता छोड़ गई। यह उड़ान किसी विजय की कहानी नहीं थी, क्योंकि आकाश को जीता नहीं जा सकता। यह किसी अंत की कहानी भी नहीं थी, क्योंकि उड़ान का अंत केवल अगली उड़ान की शुरुआत होता है। यह प्रकृति के साथ चलना सीखने की कहानी थी। यह डर के ऊपर विश्वास रखने की कहानी थी। यह हवा को दुश्मन नहीं, साथी मानने की कहानी थी। यह उस क्षण की कहानी थी जब एक छोटा-सा बाज़ चट्टान के किनारे खड़ा हुआ, उसने नीचे देखा, ऊपर देखा, अपने पंख फैलाए और पहली बार समझा कि उसके भीतर जितनी शक्ति है, उससे कहीं अधिक शक्ति उस हवा में है जो उसे थामने के लिए तैयार खड़ी है।

और उस दिन से लेकर अनगिनत सूर्योदयों तक, आकाश-शिखर के ऊपर बाज़ों की उड़ान चलती रही। कोई पंख थकता तो कोई नया पंख खुलता। कोई घोंसला टूटता तो कोई नया घोंसला बनता। कोई तूफान आता तो उसके बाद नीला आकाश लौटता। कोई पक्षी रास्ता भूलता तो कोई अनुभवी पंख उसे दिशा दिखाता। पहाड़ सब देखते रहे। नदियाँ बहती रहीं। बादल आते-जाते रहे। ऋतुएँ बदलती रहीं। लेकिन आकाश की कहानी कभी समाप्त नहीं हुई।

क्योंकि जहाँ पंख हैं, वहाँ उड़ान की संभावना है। जहाँ हवा है, वहाँ दिशा की संभावना है। जहाँ भय है, वहाँ साहस की संभावना है। और जहाँ कोई छोटा-सा पंख पहली बार चट्टान के किनारे आकर अपने भीतर झाँकता है, वहीं से एक नई कहानी शुरू होती है—बाज़ की उड़ान की कहानी।

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