एक घने, शांत और सुंदर जंगल के बीच एक विशाल हरा मैदान था। मैदान के चारों ओर
ऊँचे-ऊँचे पेड़, झाड़ियाँ और रंग-बिरंगे फूल फैले हुए थे। सुबह होते ही
पक्षियों की चहचहाहट से जंगल गूँज उठता और शाम को ठंडी हवा पत्तों को हिलाते हुए
पूरे जंगल में एक मधुर संगीत पैदा करती। उसी जंगल में अनेक जानवर रहते थे। हिरण
अपनी तेज दौड़ के लिए प्रसिद्ध था, खरगोश अपनी फुर्ती पर गर्व करता था, बंदर अपनी चतुराई के लिए
जाना जाता था और लोमड़ी अपनी चालाकी के लिए। इन्हीं जानवरों के बीच एक शांत स्वभाव
का कछुआ भी रहता था। उसका नाम धीमार था। धीमार बहुत तेज नहीं दौड़ सकता था,
लेकिन वह
धैर्यवान, समझदार और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग था। जंगल के अधिकांश जानवर उसे धीमा
समझकर उसका मजाक उड़ाते थे। फिर भी धीमार किसी की बात का बुरा नहीं मानता था। वह
जानता था कि हर जीव की अपनी अलग क्षमता होती है और किसी की गति कम होने का अर्थ यह
नहीं कि वह जीवन की दौड़ में हमेशा पीछे रहेगा।
कई वर्ष पहले इसी जंगल में एक प्रसिद्ध दौड़ हुई थी। उस दौड़ में धीमार का
मुकाबला जंगल के सबसे तेज खरगोश चंचल से हुआ था। चंचल को अपनी गति पर इतना घमंड था
कि उसे विश्वास था कि कोई भी उसे हरा नहीं सकता। दौड़ शुरू हुई तो खरगोश बहुत आगे
निकल गया। रास्ते में उसने सोचा कि कछुआ बहुत पीछे है, इसलिए थोड़ी देर आराम कर
लेना कोई बड़ी बात नहीं होगी। वह एक पेड़ के नीचे सो गया। दूसरी ओर धीमार बिना
रुके धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा और अंत में जीत की रेखा पार कर गया। उस दिन जंगल में
पहली बार किसी ने देखा कि धैर्य कभी-कभी गति से अधिक शक्तिशाली हो सकता है। धीमार
की जीत की चर्चा दूर-दूर तक हुई, लेकिन खुद धीमार के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। उसने
जीत का घमंड नहीं किया और न ही चंचल को नीचा दिखाया। वह पहले की तरह ही शांत जीवन जीता रहा।
समय बीतता गया। धीरे-धीरे जंगल के जानवर उस पुरानी घटना को भूलने लगे। चंचल भी
फिर से अपनी तेज गति के लिए प्रसिद्ध हो गया। वह अक्सर खुले मैदान में दौड़ता और
बाकी जानवरों को अपनी गति दिखाता। एक दिन उसने कुछ छोटे खरगोशों को दौड़ते देखा और
उन्हें प्रशिक्षण देने लगा। प्रशिक्षण के दौरान एक छोटा खरगोश बोला, “चंचल भैया,
क्या सचमुच
धीमार कछुए ने आपको कभी दौड़ में हरा दिया था?” यह सुनकर चंचल का चेहरा बदल
गया। उसने हँसते हुए कहा, “वह जीत कोई असली जीत नहीं थी। मैंने उसे गंभीरता से लिया ही
नहीं था। अगर मैं पूरी ताकत से दौड़ता, तो वह मेरे आसपास भी नहीं पहुँच पाता।” पास बैठे
बंदर ने उसकी बात सुन ली। बंदर ने मजाक में कहा, “तो फिर एक बार और दौड़
क्यों नहीं लेते?” चंचल कुछ पल चुप रहा। उसके भीतर पुराना अहंकार जाग उठा।
उसने कहा, “क्यों नहीं? इस बार मैं साबित कर दूँगा कि असली
विजेता कौन है।”
अगले दिन चंचल ने जंगल के बीचोंबीच धीमार को खोज लिया। धीमार एक छोटी नदी के
किनारे बैठा पानी की लहरों को देख रहा था। चंचल ने पहुँचते ही कहा, “धीमार, तुम्हें याद है
हमारी पुरानी दौड़?” धीमार ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और बोला, “हाँ, याद है। वह
मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण सीख थी।” चंचल ने कहा, “मेरे लिए वह एक अधूरी कहानी
है। मैं चाहता हूँ कि हम फिर से दौड़ लगाएँ।” धीमार ने कुछ देर सोचा। उसने पूछा,
“क्या तुम्हें
सच में लगता है कि यह दौड़ जरूरी है?” चंचल बोला, “जरूरी नहीं, लेकिन मैं यह
साबित करना चाहता हूँ कि पिछली बार मेरी हार सिर्फ मेरी लापरवाही की वजह से हुई
थी।” धीमार ने शांत स्वर में कहा, “अगर तुम्हें अपनी बात साबित करनी है, तो मैं तैयार हूँ। लेकिन इस
बार दौड़ केवल गति की नहीं होगी। हमें एक ऐसा रास्ता चुनना चाहिए जिसमें
केवल तेज दौड़ना ही पर्याप्त न हो।” चंचल ने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली।
दौड़ की घोषणा पूरे जंगल में कर दी गई। इस बार जंगल के बुजुर्ग उल्लू ने
रास्ता तय करने की जिम्मेदारी ली। उसने ऐसा मार्ग चुना जो जंगल के खुले मैदान से
शुरू होकर घने पेड़ों के बीच से गुजरता था, फिर पत्थरों वाली ढलान से
नीचे जाता था, एक छोटी नदी को पार करता था, दलदली जमीन के किनारे से
गुजरता था और अंत में पहाड़ी की चोटी तक पहुँचता था। उल्लू ने कहा, “यह दौड़ केवल
पैरों की ताकत नहीं, बल्कि धैर्य, बुद्धि और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने की
परीक्षा भी होगी।” सभी जानवर उत्साहित हो गए। बंदर पेड़ों पर उछलते हुए खबर फैलाने
लगा। हिरणों ने रास्ते की सफाई की। पक्षियों ने ऊपर से पूरा मार्ग देखने का काम
संभाला। हाथियों ने नदी के पास पड़े बड़े पत्थरों को किनारे कर दिया। जंगल में ऐसा
लग रहा था जैसे कोई बड़ा उत्सव आने वाला हो।
दौड़ से एक रात पहले जंगल में बहुत चर्चा हुई। कुछ जानवर चंचल का समर्थन कर
रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि इस बार खरगोश अपनी पूरी गति दिखाएगा। कुछ जानवर
धीमार के साथ थे, क्योंकि उन्होंने उसकी पहली जीत देखी थी। लेकिन धीमार स्वयं
इन चर्चाओं से दूर रहा। वह एक पेड़ के नीचे बैठकर अपने रास्ते के बारे में सोच रहा
था। उसने पूरे मार्ग को कई बार अपने मन में दोहराया। खुले मैदान में वह जानता था
कि चंचल बहुत आगे निकल जाएगा। पत्थरों वाली ढलान पर उसे सावधानी रखनी होगी। नदी के
पास पानी की गहराई देखनी होगी। दलदली जमीन में गलत कदम उसे बहुत पीछे कर सकता था।
पहाड़ी पर पहुँचते-पहुँचते उसकी धीमी गति उसके लिए कठिन हो सकती थी। फिर भी उसने
तय किया कि वह अपनी तुलना चंचल से नहीं करेगा। वह केवल रास्ते पर ध्यान देगा।
दूसरी ओर चंचल पूरी तरह आत्मविश्वास से भरा हुआ था। उसने अपने दोस्तों से कहा,
“इस बार मैं
शुरुआत से अंत तक बिना रुके दौड़ूँगा। कोई गलती नहीं होगी।” बंदर ने पूछा,
“और अगर रास्ते
में कोई मुश्किल आ गई तो?” चंचल हँसकर बोला, “मुश्किलें धीमे जीवों के लिए होती हैं। मेरे लिए
नहीं।” एक बूढ़े हिरण ने उसकी बात सुनी और कहा, “गति अच्छी बात है, लेकिन रास्ते
को कभी कम मत समझना।” चंचल ने सिर हिलाया, लेकिन उसके मन में यह बात नहीं उतरी। उसे लगता
था कि जंगल में उससे तेज कोई नहीं है। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यही थी
कि वह अपनी ताकत को जानता था, लेकिन अपनी सीमाओं को नहीं।
सुबह सूरज निकलने से पहले ही जंगल के जानवर दौड़ की शुरुआत वाली जगह पर जमा हो
गए। मैदान के एक छोर पर चंचल खड़ा था और दूसरे छोर पर धीमार। दोनों के सामने लंबा
रास्ता था। उल्लू एक ऊँची शाखा पर बैठा था। उसने सभी को शांत होने का संकेत दिया।
हवा में हल्की ठंडक थी। पेड़ों के बीच से सूर्य की पहली किरणें जमीन पर पड़ रही
थीं। उल्लू ने कहा, “याद रखो, जीत केवल सबसे पहले पहुँचने का नाम नहीं है। सच्ची जीत उस
जीव की होती है जो रास्ते की कठिनाइयों के बीच अपने लक्ष्य को नहीं भूलता।” चंचल
मुस्कुराया। धीमार ने सिर झुकाकर रास्ते की ओर देखा। फिर उल्लू ने संकेत दिया और
दौड़ शुरू हो गई।
जैसे ही दौड़ शुरू हुई, चंचल बिजली की तरह आगे निकल गया। कुछ ही क्षणों में वह
धीमार से बहुत दूर हो गया। मैदान में खड़े जानवर चिल्लाने लगे। बंदर पेड़ की
शाखाओं से झूलते हुए उसके साथ दौड़ रहा था। चंचल के कदम बहुत तेज थे। उसके कानों
में हवा की आवाज आ रही थी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो धीमार मुश्किल से दिखाई दे
रहा था। वह मन ही मन हँसा और सोचा, “इस बार तो जीत पहले से ही तय है।” लेकिन धीमार
ने उसे जाते हुए देखकर अपनी गति में कोई बदलाव
नहीं किया। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। उसके लिए दौड़ अभी शुरू ही हुई थी।
कुछ दूरी पर रास्ता घने जंगल में प्रवेश करता था। वहाँ जमीन पर सूखे पत्तों की
मोटी परत थी। चंचल तेजी से दौड़ता रहा, लेकिन सूखे पत्तों के नीचे छिपी एक छोटी लकड़ी
उसके पैर से टकराई और वह लड़खड़ा गया। वह गिरा नहीं, लेकिन उसकी गति कुछ क्षण के
लिए रुक गई। उसने लकड़ी को हटाया और फिर दौड़ने लगा। इस छोटी
घटना ने उसे याद दिलाया कि जंगल का रास्ता मैदान जैसा आसान नहीं था। फिर भी वह
रुका नहीं।
धीमार जब उसी जगह पहुँचा तो उसने सूखे पत्तों को ध्यान से देखा। उसने सामने की
जमीन पर पड़े निशानों से समझ लिया कि कहीं-कहीं लकड़ियाँ छिपी हुई हैं। वह और धीरे
चलने लगा। कुछ जानवर जो पेड़ों पर बैठे थे, उसे देखकर हँसे। एक बंदर
बोला, “इतना धीरे चलोगे तो चंचल पहाड़ी पर पहुँचकर वापस भी आ जाएगा!” धीमार ने कोई
उत्तर नहीं दिया। वह बस अपने रास्ते पर चलता रहा। कुछ ही देर
बाद उसे एक सुरक्षित रास्ता मिला जहाँ जमीन साफ थी। उसने उसी रास्ते को चुना
और बिना फिसले आगे निकल गया।
आगे पत्थरों वाली ढलान शुरू हुई। चंचल वहाँ भी तेज दौड़ना चाहता था, लेकिन ढलान
बहुत खड़ी थी। उसने अपने पंजों को जमीन पर मजबूती से टिकाया और नीचे उतरना शुरू
किया। अचानक एक ढीला पत्थर उसके पैर के नीचे से खिसक गया। चंचल आगे की ओर फिसला और
एक झाड़ी से जा टकराया। उसे चोट तो नहीं लगी, लेकिन उसका शरीर कुछ क्षण
तक उलझा रहा। उसने झुंझलाकर झाड़ी से खुद को बाहर निकाला। इस बार उसके चेहरे पर
आत्मविश्वास की जगह चिंता दिखाई देने लगी। उसने पहली बार सोचा कि शायद केवल तेज
होना पर्याप्त नहीं है।
धीमार जब ढलान पर पहुँचा तो उसने तुरंत अपनी गति कम कर दी। उसने अपना शरीर
नीचे झुका लिया और धीरे-धीरे एक-एक कदम रखते हुए नीचे उतरने लगा। उसके मजबूत पंजे
पत्थरों के बीच टिकते गए। रास्ता कठिन था, लेकिन वह गिरा नहीं। ऊपर बैठे पक्षी उसे देख रहे
थे। एक पक्षी ने दूसरे से कहा, “देखो, धीमा है लेकिन संभलकर चल रहा है।” कुछ समय बाद धीमार नीचे
पहुँच गया। वहाँ उसे चंचल के पैरों के निशान दिखाई दिए। उसे समझ आया
कि खरगोश बहुत दूर नहीं है। फिर भी उसने दौड़ने की कोशिश नहीं की। उसने अपनी स्थिर
गति बनाए रखी।
अब दोनों के सामने छोटी नदी थी। नदी बहुत चौड़ी नहीं थी, लेकिन पानी का
बहाव तेज था। नदी के ऊपर कुछ बड़े पत्थर थे जिन पर पैर रखकर दूसरी ओर जाया जा सकता
था। चंचल ने सोचा कि उसे एक-एक पत्थर पर रुककर जाने की जरूरत
नहीं है। वह छलांग लगाकर आगे बढ़ने लगा। पहली छलांग सफल रही। दूसरी भी सफल रही।
लेकिन तीसरी छलांग में उसका पैर गीले पत्थर पर पड़ा और वह फिसलकर पानी में गिर
गया। पानी गहरा नहीं था, लेकिन तेज बहाव ने उसे कुछ दूरी तक बहा दिया। वह किसी तरह
किनारे आया। उसका शरीर भीग चुका था और उसकी गति काफी कम हो गई थी।
धीमार नदी के पास पहुँचा तो उसने पानी को ध्यान से देखा। उसने बहाव की दिशा
समझी और ऐसे पत्थर चुने जो सूखे और स्थिर थे। वह बहुत सावधानी से एक पत्थर से
दूसरे पत्थर पर बढ़ता गया। कुछ देर बाद वह नदी के दूसरी ओर
पहुँच गया। अब चंचल उससे बहुत आगे नहीं था। दोनों के बीच का अंतर तेजी से कम हो
रहा था।
नदी के बाद दलदली जमीन थी। वहाँ मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देती थी, लेकिन नीचे
पानी और नरम कीचड़ था। चंचल ने जैसे ही उस जमीन पर कदम रखा, उसका एक पैर कीचड़ में धँस
गया। उसने जोर लगाकर पैर निकाला, लेकिन दूसरा पैर और गहराई तक धँस गया। वह परेशान हो गया।
उसने इधर-उधर देखा और समझने की कोशिश की कि किस तरफ जमीन मजबूत है। दूर एक संकरा
रास्ता दिखाई दे रहा था जहाँ घास कुछ अधिक घनी थी। उसने अनुमान लगाया कि वहाँ जमीन मजबूत हो सकती है। धीरे-धीरे वह उस दिशा में बढ़ा और अंततः दलदल से
बाहर निकल गया।
धीमार भी दलदल के पास पहुँचा। उसने तुरंत अपनी चाल रोक दी। उसने जमीन पर पड़े
सूखे पत्तों को देखा। कुछ पत्ते ऊपर से सूखे थे लेकिन नीचे दबाने पर धँस जाते थे।
उसने अपनी छड़ी जैसी एक छोटी टहनी से जमीन को जाँचना शुरू किया। जहाँ जमीन मजबूत
लगती, वह वहाँ कदम रखता। इस तरह वह बहुत धीरे-धीरे दलदल पार करने लगा। चंचल को यह
देखकर विश्वास नहीं हुआ कि धीमार इतनी कठिन जमीन पर भी बिना फँसे आगे बढ़ रहा है। वह कुछ दूर जाकर रुक गया और पीछे मुड़कर देखने लगा। धीमार लगातार उसकी
ओर आ रहा था।
चंचल के भीतर बेचैनी बढ़ने लगी। वह सोचने लगा, “मैं उससे इतना आगे था,
फिर भी वह
लगातार मेरे करीब कैसे पहुँच रहा है?” उसे समझ आया कि धीमार अपनी गति से नहीं, बल्कि अपनी
गलतियाँ न करके उससे मुकाबला कर रहा था। चंचल के लिए यह विचार असहज था। उसने फिर
तेजी से दौड़ना शुरू किया। अब उसके सामने अंतिम हिस्सा था—पहाड़ी। पहाड़ी बहुत
ऊँची नहीं थी, लेकिन रास्ता घुमावदार और चढ़ाई वाला था। चंचल ने सोचा कि
वह अपनी पूरी ताकत लगाकर पहाड़ी पर चढ़ जाएगा और जीत निश्चित कर देगा।
वह तेजी से ऊपर बढ़ने लगा। लेकिन लगातार दौड़ने, नदी में गिरने और दलदल पार
करने के कारण उसके शरीर में थकान आ चुकी थी। कुछ ही दूरी पर उसकी साँस तेज हो गई।
वह रुकना नहीं चाहता था, इसलिए धीरे-धीरे ही सही, आगे बढ़ता रहा। दूसरी ओर
धीमार पहाड़ी के नीचे पहुँचा। उसके शरीर में भी थकान थी। उसके पैर भारी हो गए थे।
लेकिन उसे पता था कि अब लक्ष्य ज्यादा दूर नहीं है। उसने अपने मन में कहा, “एक कदम और।” फिर उसने दूसरा कदम बढ़ाया।
पहाड़ी की चढ़ाई के बीच चंचल एक बड़े पत्थर के पास बैठ गया। उसने सोचा,
“बस थोड़ी देर
आराम कर लेता हूँ।” लेकिन इस बार वह पिछली दौड़ की तरह पेड़ के नीचे सोया नहीं।
उसे अपनी पुरानी गलती याद थी। उसने कुछ क्षण साँस संभाली और फिर खड़ा हो गया। तभी
उसने पीछे देखा। धीमार उसे दिखाई दे रहा था। यह दृश्य देखकर चंचल के भीतर अजीब
भावना पैदा हुई। उसने पहली बार धीमार को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे जीव के रूप में देखा जो हार मानने के लिए तैयार नहीं था।
धीमार धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। हर कदम कठिन था। कभी उसका पैर पत्थर पर
फिसलता, कभी उसे कुछ पल रुकना पड़ता। लेकिन वह पीछे नहीं लौटा। चंचल ने आगे बढ़ने की
कोशिश की, मगर थकान अब बहुत अधिक थी। कुछ ही देर में धीमार उसके पास पहुँच गया। दोनों
कुछ क्षण एक-दूसरे के पास चलते रहे। चंचल ने धीमार से कहा, “तुम अभी भी इतनी धीमी गति
से चल रहे हो?” धीमार मुस्कुराया और बोला, “मेरी गति मेरे लिए पर्याप्त
है। मुझे बस आगे बढ़ते रहना है।” चंचल ने कहा, “तुम्हें डर नहीं लगता कि
मैं फिर तुमसे आगे निकल जाऊँगा?” धीमार ने उत्तर दिया, “अगर तुम आगे निकलते हो तो
मैं तुम्हारे पीछे चलता रहूँगा। मेरा लक्ष्य तुम्हें रोकना नहीं,
मंजिल तक
पहुँचना है।”
चंचल ने यह बात सुनी और कुछ नहीं कहा। दोनों कुछ देर साथ-साथ ऊपर बढ़ते रहे।
फिर चंचल ने अपनी बची हुई ताकत जुटाई और तेजी से आगे निकल गया। उसे लगा कि शायद
अभी भी वह जीत सकता है। धीमार ने उसे जाते देखा और अपनी चाल नहीं बदली। कुछ ही देर
बाद चंचल अंतिम मोड़ पर पहुँच गया। सामने पहाड़ी की चोटी दिखाई दे रही थी। वहाँ
जीत की रेखा खींची गई थी। जंगल के जानवर ऊपर से चिल्ला रहे थे। चंचल के भीतर फिर
उत्साह जागा। उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।
लेकिन अंतिम कुछ कदमों पर उसके पैर अचानक कमजोर पड़ गए। वह घुटनों के बल बैठ
गया। उसकी साँस बहुत तेज चल रही थी। उसने जीत की रेखा को देखा, जो कुछ ही दूरी
पर थी। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। तभी पीछे से धीमार आता
दिखाई दिया। वह अभी भी धीरे चल रहा था। उसके कदम थके
हुए थे, लेकिन स्थिर थे।
धीमार चंचल के पास पहुँचा। वह जीत की रेखा से बस कुछ कदम दूर था। चंचल ने उसकी
ओर देखा। उसके चेहरे पर हार की चिंता थी। धीमार चाहता तो बिना रुके आगे बढ़ सकता
था और जीत सकता था। लेकिन वह रुक गया। उसने चंचल से कहा, “उठो। मंजिल सामने है।” चंचल
ने कहा, “तुम आगे बढ़ो। तुम जीत गए।” धीमार ने सिर हिलाया और कहा, “हम दोनों यहाँ
तक पहुँचे हैं। अब तुम उठो।” चंचल ने किसी तरह अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की। धीमार ने उसके साथ कदम मिलाया। दोनों धीरे-धीरे अंतिम रेखा की ओर
बढ़े।
जब दोनों ने एक साथ जीत की रेखा पार की, पूरा जंगल तालियों और खुशी
की आवाजों से गूँज उठा। किसी ने नहीं सोचा था कि दौड़ इस तरह समाप्त होगी। उल्लू
ने घोषणा की, “इस दौड़ में सबसे पहले कौन पहुँचा, यह महत्वपूर्ण नहीं।
महत्वपूर्ण यह है कि आज दोनों ने अपनी-अपनी सीमाओं को पहचाना और उन्हें पार किया।”
कुछ जानवर धीमार को विजेता कह रहे थे, कुछ चंचल की मेहनत की प्रशंसा कर रहे थे। लेकिन
धीमार ने साफ कहा, “यह केवल मेरी जीत नहीं है। यह हम दोनों की जीत
है।”
चंचल कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने धीमार की ओर देखा और कहा, “पहली बार मैंने
तुम्हें हराने की कोशिश की थी। दूसरी बार मैंने खुद को साबित करने की कोशिश की।
लेकिन आज मुझे समझ आया कि असली मुकाबला किसी दूसरे जीव से नहीं, बल्कि अपने
अहंकार और अपनी कमजोरियों से होता है।” धीमार मुस्कुराया। उसने कहा, “गति तुम्हारी
ताकत है और धैर्य मेरी। अगर हम अपनी ताकत को
समझदारी से इस्तेमाल करें तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।”
उस दिन के बाद जंगल में चंचल का व्यवहार बदलने लगा। वह अब भी तेज दौड़ता था,
लेकिन अपनी गति
पर घमंड नहीं करता था। जब कोई छोटा जानवर उससे सलाह माँगता तो वह उसे केवल तेजी से
दौड़ना नहीं सिखाता, बल्कि रास्ते को समझना, अपनी ताकत बचाकर रखना और
गलतियों से सीखना भी सिखाता। दूसरी ओर धीमार भी अपनी जीत को लेकर कभी घमंड नहीं
करता। वह अक्सर जंगल के छोटे जीवों को बताता कि धीमा होना कमजोरी नहीं है, बशर्ते कदम
लगातार आगे बढ़ते रहें।
कुछ दिनों बाद जंगल में तेज बारिश हुई। नदी का पानी बढ़ गया और कई छोटे रास्ते
बंद हो गए। अनेक जानवर अपने घरों से बाहर निकलने में परेशान होने लगे। चंचल ने
अपनी तेज गति से रास्तों की जानकारी जुटाई, जबकि धीमार ने सुरक्षित
रास्तों को पहचानने में मदद की। दोनों ने मिलकर कई छोटे जानवरों को सुरक्षित स्थान
तक पहुँचाया। उस दिन जंगल के सभी जीवों को समझ आया कि किसी एक की क्षमता हमेशा
पर्याप्त नहीं होती। कभी गति की जरूरत होती है, कभी धैर्य की, कभी बुद्धि की
और कभी दूसरों का साथ देने की।
धीरे-धीरे उस दूसरी दौड़ की कहानी पूरे जंगल की सबसे प्रसिद्ध कहानी बन गई।
लेकिन इस बार लोग केवल यह नहीं कहते थे कि कछुए ने खरगोश को हराया। वे कहते थे कि
कछुए ने दूसरी बार जीतकर यह साबित किया कि जीत का अर्थ हमेशा किसी को पीछे छोड़ना
नहीं होता। कभी-कभी जीत का अर्थ अपनी कमजोरी पर विजय पाना होता है। कभी जीत का
अर्थ हार के डर के बावजूद आगे बढ़ना होता है। और कभी जीत का अर्थ यह होता है कि
मंजिल के ठीक सामने खड़े होकर भी अपने प्रतिद्वंद्वी को अकेला न
छोड़ना।
समय के साथ धीमार बूढ़ा होने लगा। उसके कदम पहले से भी धीमे हो गए, लेकिन उसकी
आँखों की चमक वैसी ही रही। चंचल भी उम्र के साथ उतना तेज नहीं रहा। एक शाम दोनों
उसी पहाड़ी के पास बैठे थे जहाँ उनकी दूसरी दौड़ समाप्त हुई थी। सूरज धीरे-धीरे
पेड़ों के पीछे उतर रहा था। हवा में ठंडक थी। चंचल ने कहा, “धीमार, अगर उस दिन तुम
मुझे उठने का मौका नहीं देते तो तुम बहुत आगे निकल सकते थे।” धीमार ने मुस्कुराकर
कहा, “शायद। लेकिन तब मैं केवल दौड़ जीतता। उस दिन तुम्हारे साथ चलकर मैंने उससे
बड़ी जीत हासिल की।” चंचल ने पूछा, “वह बड़ी जीत क्या थी?” धीमार ने पहाड़ी के नीचे
फैले जंगल की ओर देखते हुए कहा, “यह समझ कि किसी को हराना आसान हो सकता है, लेकिन किसी को
गिरने के बाद उठने में मदद करना उससे कहीं बड़ी बात है।”
चंचल ने कुछ नहीं कहा। उसने धीरे से अपना सिर झुका लिया। दोनों कुछ देर तक
चुपचाप सूर्यास्त देखते रहे। दूर जंगल में छोटे जानवर खेल रहे थे। कुछ खरगोश दौड़
रहे थे, कुछ कछुए धीरे-धीरे चल रहे थे। अब किसी को किसी की गति पर हँसी नहीं आती थी।
जंगल के जानवरों ने सीख लिया था कि हर जीव की अपनी गति होती है, अपना रास्ता
होता है और अपनी मंजिल होती है।
उस दिन के बाद जंगल में जब भी कोई किसी को उसकी कमजोरी के कारण छोटा समझता,
बुजुर्ग उल्लू
उसे कछुए की दूसरी जीत की कहानी सुनाता। वह कहता, “एक बार की जीत तुम्हें
प्रसिद्ध बना सकती है, लेकिन दूसरी जीत तुम्हारे चरित्र को पहचान देती है। पहली
जीत में कछुए ने साबित किया कि धैर्य गति को हरा सकता है। दूसरी जीत में उसने
साबित किया कि धैर्य केवल दूसरों को हराने के लिए नहीं, बल्कि कठिन रास्तों पर साथ
चलने के लिए भी होता है।”
और इस तरह जंगल में कछुए की दूसरी जीत केवल एक दौड़ की कहानी नहीं रही। वह आने
वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसी सीख बन गई जिसमें किसी मनुष्य की आवश्यकता नहीं थी,
क्योंकि जंगल
के जीव स्वयं अपनी दुनिया में उस सीख को जीते थे। धीमार ने अपनी धीमी चाल से यह
दिखाया कि लगातार आगे बढ़ने वाला जीव अंततः बहुत दूर पहुँच सकता है। चंचल ने अपनी
हार से यह सीखा कि तेज होना महान है, लेकिन अपनी सीमाओं को समझना उससे भी महान है।
दोनों ने मिलकर यह सिद्ध किया कि असली विजेता वह नहीं जो हमेशा सबसे आगे दौड़ता है,
बल्कि वह है जो
कठिन समय में भी रुकता नहीं, अपनी गलतियों से सीखता है और मंजिल तक पहुँचते समय अपने
साथियों को पीछे छोड़ने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देता है।
उस विशाल जंगल में आज भी जब सुबह की पहली किरण मैदान पर पड़ती, हवा पेड़ों की
पत्तियों को हिलाती और दूर से किसी खरगोश के दौड़ने की आवाज आती, तो ऐसा लगता
जैसे जंगल खुद उस पुरानी कहानी को दोहरा रहा हो। कहीं कोई कछुआ धीरे-धीरे अपनी राह
पर बढ़ रहा होता, तो कोई छोटा जानवर उसे देखकर मुस्कुराता और कहता, “धीरे चलो,
लेकिन चलते
रहो।” और यही कछुए की दूसरी जीत की सबसे बड़ी कहानी थी—मंजिल
तक पहुँचने की गति अलग हो सकती है, लेकिन जो जीव धैर्य,
साहस और निरंतरता के साथ आगे बढ़ता रहता है, उसकी यात्रा कभी व्यर्थ
नहीं जाती।
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