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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

एक बीज की कहानी

 



 

बहुत दूर, एक शांत और हरे-भरे जंगल के बीच एक विशाल वृक्ष खड़ा था। उसकी शाखाएँ इतनी फैली हुई थीं कि दोपहर का सूरज भी उसकी छाया के नीचे आते-आते धीमा महसूस होता था। उसकी पत्तियाँ हवा के साथ सरसराती थीं और जब वर्षा की बूंदें उन पर गिरतीं, तो ऐसा लगता जैसे जंगल में हजारों छोटी घंटियाँ एक साथ बज उठी हों। उस वृक्ष की अनगिनत शाखाओं पर हर मौसम में फूल और फल आते थे। उन्हीं फलों में से एक फल के भीतर एक छोटा-सा बीज जन्म लेने वाला था। वह बीज अभी यह नहीं जानता था कि उसके भीतर एक पूरी दुनिया छिपी है। वह यह भी नहीं जानता था कि एक दिन उसे अंधेरी मिट्टी में दबना होगा, अपनी पुरानी पहचान छोड़नी होगी और मिट्टी को चीरकर प्रकाश की ओर बढ़ना होगा। फिलहाल वह अपने चारों ओर मौजूद गूदे की नरम परत में शांत पड़ा था। उसके चारों ओर उसी फल के कई दूसरे बीज भी थे। सभी एक जैसे दिखते थे, लेकिन हर बीज के भीतर भविष्य की एक अलग कहानी सोई हुई थी।

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। सूरज रोज आकाश में आता, अपनी सुनहरी किरणें जंगल पर बिखेरता और शाम होते-होते पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे चला जाता। रात में चाँद पेड़ों की शाखाओं के बीच से झाँकता और चाँदी जैसी रोशनी धरती पर गिराता। फल धीरे-धीरे पकने लगा। उसकी हरी त्वचा पीली हुई, फिर सुनहरी हुई और अंततः उसमें गहरी मिठास भर गई। बीज ने पहली बार अपने चारों ओर बदलाव महसूस किया। उसे लगा कि जिस जगह वह इतने समय से शांत पड़ा था, वह अब पहले जैसी नहीं रही। फल की बाहरी परत मुलायम होने लगी थी। हवा उसे शाखा पर धीरे-धीरे झुलाती थी। कभी तेज हवा आती तो फल जोर से हिलता, और बीज अपने आसपास के दूसरे बीजों से टकरा जाता। फिर सब कुछ शांत हो जाता। बीज के भीतर एक अनजानी बेचैनी पैदा होने लगी। उसे नहीं पता था कि यह बेचैनी किस चीज की थी। वह केवल इतना महसूस कर सकता था कि उसका समय धीरे-धीरे बदल रहा है।

एक रात जंगल में बहुत तेज हवा चली। बादल आकाश में इकट्ठा हो गए। बिजली चमकी और दूर कहीं बादल गरजे। विशाल वृक्ष की शाखाएँ हवा में झूमने लगीं। फल अपनी डाली से बार-बार टकराने लगा। अंततः एक तेज झोंका आया और वह फल शाखा से टूटकर नीचे गिर पड़ा। वह पत्तों और नरम घास पर आकर रुका। फल के भीतर पड़े बीजों ने पहली बार उस विशाल वृक्ष से अलग होने का अनुभव किया जिसने उन्हें जन्म दिया था। बीज के लिए यह क्षण भय से भरा था। जिस शाखा को उसने कभी देखा तक नहीं था, जिस वृक्ष की जड़ों से उसे जीवन मिला था, वह अब उससे बहुत दूर था। फिर भी उसके भीतर कहीं एक शांत-सी आवाज थी, जैसे मिट्टी स्वयं कह रही हो कि यात्रा अभी शुरू हुई है।

कुछ दिनों तक फल जंगल की जमीन पर पड़ा रहा। सूरज की गर्मी और वर्षा की नमी ने उसकी त्वचा को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया। जंगल की छोटी-छोटी चींटियाँ उसके पास आतीं और चली जातीं। कभी कोई पक्षी फल को चोंच मारता, कभी कोई छोटा जीव उसे उलट देता। अंततः फल फट गया और उसके भीतर छिपे बीज बाहर दिखाई देने लगे। बारिश की एक रात में पानी की धार उन्हें अपने साथ बहाकर थोड़ी दूर ले गई। हमारा छोटा बीज भी बहता हुआ पत्तों, टहनियों और मिट्टी के बीच से गुजरने लगा। कभी वह किसी पत्थर से टकराता, कभी किसी जड़ के नीचे फँस जाता, फिर पानी की अगली लहर उसे आगे धकेल देती। आखिरकार वह एक गहरी, नम जगह पर जाकर रुक गया। ऊपर सूखे पत्तों की मोटी परत थी। नीचे मुलायम मिट्टी थी। बीज धीरे-धीरे मिट्टी में धँस गया।

अब उसके चारों ओर अंधेरा था। ऊपर से सूरज की रोशनी नहीं दिखाई देती थी। चारों ओर केवल मिट्टी थी। शुरू में उसे लगा कि वह खो गया है। उसे अपने पुराने वृक्ष की शाखाएँ याद आईं, हवा की आवाज याद आई और आकाश की खुली विशालता याद आई। लेकिन मिट्टी ने उसे अपने भीतर सुरक्षित कर लिया। बारिश का पानी छोटे-छोटे रास्तों से उसके पास पहुँचने लगा। मिट्टी के कण उसकी सतह से चिपकने लगे। बीज ने पानी को अपने भीतर खींचना शुरू किया। पहले वह थोड़ा फूला, फिर और अधिक। उसकी कठोर बाहरी परत धीरे-धीरे नरम होने लगी। उसके भीतर वर्षों से शांत पड़ी शक्ति जागने लगी। बीज को पहली बार महसूस हुआ कि अंधेरा हमेशा अंत नहीं होता। कभी-कभी अंधेरा किसी नई शुरुआत की पहली जगह होता है।

दिन बीतते गए। ऊपर जंगल में मौसम बदलता रहा। कभी धूप तेज होती, कभी बारिश होती, कभी हवा सूखे पत्तों को उड़ाकर दूर ले जाती। लेकिन मिट्टी के भीतर बीज अपने परिवर्तन से गुजर रहा था। उसका खोल धीरे-धीरे फटने लगा। एक छोटी-सी सफेद जड़ बाहर निकली। वह बहुत नाजुक थी, इतनी नाजुक कि मिट्टी का एक छोटा-सा कण भी उसके लिए पहाड़ जैसा लगता था। फिर भी वह नीचे की ओर बढ़ती गई। उसे नहीं पता था कि उसे किस दिशा में जाना है, लेकिन मिट्टी में मौजूद नमी उसे रास्ता दिखा रही थी। उसकी जड़ ने मिट्टी को पकड़ना शुरू किया। उसी समय बीज के दूसरे हिस्से में एक छोटा-सा अंकुर बनने लगा। वह ऊपर की ओर बढ़ना चाहता था। नीचे जड़ और ऊपर अंकुर—बीज के भीतर दो दिशाओं में एक साथ जीवन फैलने लगा।

अंकुर के लिए ऊपर की यात्रा आसान नहीं थी। उसके रास्ते में कठोर मिट्टी थी। कहीं छोटे पत्थर थे, कहीं सूखी जड़ें थीं। फिर भी वह रुकता नहीं था। हर बार जब मिट्टी उसे दबाती, वह थोड़ा और मजबूत होकर आगे बढ़ता। एक दिन बारिश बहुत तेज हुई। पानी मिट्टी के भीतर भर गया। बीज का अंकुर मिट्टी के एक भारी ढेले के नीचे दब गया। कुछ समय तक उसे लगा कि वह आगे नहीं बढ़ पाएगा। लेकिन उसकी जड़ नीचे और गहरी होती गई। उसने मिट्टी से नमी और पोषण खींचा। उसके भीतर छिपी ऊर्जा धीरे-धीरे बढ़ती रही। अंततः उसने मिट्टी के उस ढेले को थोड़ा-सा ऊपर उठाया और एक पतली हरी नोक बाहर निकली।

वह उसकी जिंदगी का पहला प्रकाश था।

सूरज की एक किरण उस छोटे अंकुर पर पड़ी। अंकुर कुछ क्षणों के लिए स्थिर रहा। उसके लिए वह किरण किसी चमत्कार से कम नहीं थी। इतने लंबे अंधेरे के बाद पहली बार उसे गर्माहट महसूस हुई। हवा ने उसके छोटे-से शरीर को छुआ। पास की घास की पत्तियाँ उसके ऊपर झुक गईं। ओस की बूंदें उसकी नन्ही पत्तियों पर ठहर गईं। वह अभी इतना छोटा था कि जंगल के विशाल वृक्षों की तुलना में दिखाई भी नहीं देता था, लेकिन उसके भीतर एक पूरा भविष्य जाग चुका था।

सुबह की हवा ने उसे धीरे से हिलाया। अंकुर पहली बार समझ रहा था कि बाहर की दुनिया कितनी बड़ी है। ऊपर नीला आकाश था। दूर विशाल वृक्ष थे। चारों ओर घास, झाड़ियाँ और छोटे पौधे थे। कुछ पत्तियाँ धूप में चमक रही थीं। कुछ फूलों से सुगंध फैल रही थी। कहीं वर्षा के बाद पानी जमा था। हर चीज जीवित थी और हर चीज अपने तरीके से आगे बढ़ रही थी। छोटा अंकुर उस संसार को देखता रहा। उसके भीतर एक इच्छा जन्मी—वह भी एक दिन इतना बड़ा होना चाहता था कि उसकी शाखाओं पर पक्षी बैठें, उसकी छाया में घास उगे और उसकी जड़ों के पास मिट्टी को मजबूती मिले।

लेकिन प्रकृति ने उसे तुरंत बड़ा होने की अनुमति नहीं दी। अभी उसे बहुत कुछ सीखना था।

पहली चुनौती गर्मी थी। कुछ सप्ताह बाद बारिश कम हो गई और सूरज बहुत तेज चमकने लगा। मिट्टी की ऊपरी परत सूखने लगी। अंकुर की छोटी पत्तियाँ दोपहर की गर्मी में झुक जातीं। उसकी जड़ें नीचे पानी खोजतीं। कभी-कभी मिट्टी इतनी सूखी हो जाती कि उसे नमी का एक छोटा कण भी मुश्किल से मिलता। अंकुर ने अपनी जड़ों को और गहरा भेजना शुरू किया। जितना ऊपर उसका शरीर बढ़ता, उतना ही नीचे उसका आधार मजबूत होता गया। वह समझने लगा कि केवल ऊपर बढ़ना पर्याप्त नहीं है। मजबूत बनने के लिए नीचे भी जाना पड़ता है।

एक दिन गर्म हवा का बहुत तेज झोंका आया। अंकुर का पतला तना जोर से झुका। उसे लगा कि वह टूट जाएगा। हवा बार-बार उसे एक ओर धकेलती रही। लेकिन उसकी जड़ें मिट्टी में गहराई तक जा चुकी थीं। उन्होंने उसे पकड़कर रखा। तना झुका, फिर सीधा हुआ। हवा चली, फिर शांत हुई। अंकुर बच गया। उस दिन उसने पहली बार जाना कि मजबूती का अर्थ यह नहीं कि कभी झुकना नहीं चाहिए। कभी-कभी झुककर ही टूटने से बचा जा सकता है।

इसके बाद वर्षा का मौसम आया। काले बादल आकाश पर छा गए। पहली बूंद जब उसकी पत्ती पर गिरी तो अंकुर ने उसे अपने पूरे अस्तित्व से महसूस किया। फिर दूसरी बूंद आई, फिर तीसरी। कुछ ही देर में बारिश तेज हो गई। मिट्टी गीली हो गई। छोटी-छोटी धाराएँ उसके आसपास बहने लगीं। उसकी जड़ें पानी से भरने लगीं। उसका तना तेजी से बढ़ने लगा। नई पत्तियाँ निकलने लगीं। हर नई पत्ती उसके लिए एक नई आशा थी।

लेकिन बहुत अधिक पानी भी एक चुनौती था। लगातार बारिश के बाद मिट्टी नरम हो गई। एक रात तेज पानी की धारा उसके पास से बहने लगी। मिट्टी का कुछ हिस्सा बह गया और अंकुर की जड़ें बाहर दिखाई देने लगीं। उसका छोटा शरीर पानी के साथ हिलने लगा। उसे लगा कि अब वह मिट्टी से उखड़ जाएगा। लेकिन उसी समय एक मोटी सूखी टहनी बहकर आई और उसके पास अटक गई। पानी की गति थोड़ी बदल गई। मिट्टी उसके आसपास फिर जमा होने लगी। धीरे-धीरे उसकी जड़ें दोबारा ढक गईं। अंकुर ने राहत की सांस ली, हालांकि उसके पास सांस लेने के लिए फेफड़े नहीं थे। फिर भी उसे लगा जैसे जीवन ने उसे एक और अवसर दिया हो।

समय बीतता गया। छोटा अंकुर अब एक पौधा बन चुका था। उसके तने में मजबूती आने लगी थी। उसकी पत्तियाँ पहले से बड़ी और घनी हो गई थीं। सुबह होते ही वह सूरज की ओर अपनी पत्तियाँ फैला देता। सूरज की रोशनी से वह अपने भीतर भोजन बनाता। रात में चाँदनी उसके ऊपर गिरती और ठंडी हवा उसे धीरे-धीरे झुलाती। कभी-कभी ओस की बूंदें उसकी पत्तियों पर चमकतीं और सुबह की पहली रोशनी में छोटे सितारों जैसी दिखाई देतीं।फिर एक दिन जंगल में एक भयंकर तूफान आया।

आकाश अचानक काला हो गया। हवा इतनी तेज चली कि बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाएँ भी जोर-जोर से हिलने लगीं। बादल गरजने लगे। बिजली चमकने लगी। छोटा पौधा डर गया। उसके पास अभी मजबूत तना नहीं था। उसने अपनी सारी जड़ों को मिट्टी में कसकर पकड़ लिया। हवा ने उसे एक तरफ झुकाया। फिर दूसरी तरफ। उसकी कुछ पत्तियाँ टूटकर दूर उड़ गईं। एक छोटी शाखा भी टूट गई। पौधे को दर्द हुआ। उसे लगा कि शायद वह इस तूफान से बच नहीं पाएगा।लेकिन उसकी जड़ें मिट्टी के भीतर शांत थीं।

बाहर जितना अधिक तूफान था, भीतर उतनी ही अधिक स्थिरता थी। जड़ें मिट्टी को पकड़ती रहीं। तूफान पूरी रात चलता रहा। सुबह जब सूरज निकला तो जंगल का दृश्य बदल चुका था। कई सूखी शाखाएँ जमीन पर पड़ी थीं। पत्तियाँ चारों ओर बिखरी थीं। कुछ छोटे पौधे पूरी तरह मिट्टी में दब गए थे। हमारा पौधा घायल था, लेकिन जीवित था। उसकी एक शाखा टूट चुकी थी, कई पत्तियाँ गायब थीं, पर उसका तना खड़ा था।सुबह की पहली किरण उसके ऊपर पड़ी। पौधे ने महसूस किया कि रात बीत चुकी है।उसने अपनी बची हुई पत्तियों को धीरे-धीरे फैलाया।

कुछ दिनों बाद उसकी टूटी शाखा के पास से एक नई कोंपल निकल आई। वह बहुत छोटी थी, लेकिन हरी और चमकदार थी। पौधे ने जाना कि टूट जाना हमेशा समाप्त हो जाना नहीं होता। कभी-कभी टूटे हुए स्थान से ही नया जीवन जन्म लेता है।

वर्षों का समय गुजरने लगा। पौधा धीरे-धीरे एक युवा वृक्ष बन गया। उसका तना मोटा होने लगा। शाखाएँ दूर-दूर तक फैलने लगीं। उसकी जड़ें मिट्टी के भीतर गहरी और चौड़ी होती गईं। अब गर्मी आती तो उसकी छाया में मिट्टी जल्दी नहीं सूखती। वर्षा आती तो उसकी जड़ें मिट्टी को बहने से रोकतीं। हवा चलती तो उसकी पत्तियाँ जंगल में मधुर संगीत पैदा करतीं।

उसके ऊपर कई छोटे पक्षी आने लगे। वे उसकी शाखाओं पर कुछ देर आराम करते और फिर आकाश में उड़ जाते। छोटी तितलियाँ उसकी पत्तियों के आसपास मंडरातीं। भौंरे उसके फूलों के पास गूंजते। बारिश के दिनों में उसकी शाखाओं से बूंदें धीरे-धीरे नीचे गिरतीं। उसके आसपास घास घनी होने लगी। छोटे पौधे उसकी छाया में उगने लगे।

वृक्ष अब समझने लगा था कि वह अकेला नहीं है। उसकी जिंदगी केवल उसकी अपनी नहीं थी। उसकी पत्तियों से गिरने वाली छाया किसी और के लिए ठंडी जगह थी। उसकी जड़ों के पास की मिट्टी किसी और पौधे के लिए सुरक्षित जगह थी। उसकी शाखाएँ किसी और जीव के लिए आश्रय थीं। उसके फूल किसी और के लिए भोजन थे। उसके फल किसी और यात्रा की शुरुआत बनने वाले थे।

फिर एक वसंत आया, जब वृक्ष पहली बार फूलों से भर गया। उसकी शाखाओं पर छोटी-छोटी कलियाँ आईं। कुछ दिनों में वे फूलों में बदल गईं। हवा जब उनके बीच से गुजरती तो सुगंध पूरे जंगल में फैल जाती। फूलों के बाद छोटे फल बनने लगे। वृक्ष ने उन फलों को धीरे-धीरे बड़ा होते देखा। उसे अपने जन्म की याद आई। उसे वह पुराना फल याद आया, जिसके भीतर वह कभी एक छोटा-सा बीज बनकर पड़ा था। उसे याद आया कि कैसे वह शाखा से गिरा था, पानी के साथ बहा था और अंधेरी मिट्टी में दब गया था।अब वही कहानी फिर से उसके भीतर दोहराई जा रही थी।

एक फल धीरे-धीरे पकने लगा। उसके भीतर नए बीज बनने लगे। उन बीजों में से एक छोटा-सा बीज बिल्कुल वैसा ही था जैसा कभी वह स्वयं था। वह शांत पड़ा था। उसे नहीं पता था कि उसके सामने क्या आने वाला है। वृक्ष उसे देख नहीं सकता था, लेकिन उसकी हर कोशिका में उस बीज की सुरक्षा का भाव था।मौसम फिर बदला।

फल पक गया। हवा चलने लगी। एक शाम तेज झोंका आया और वह फल शाखा से टूटकर नीचे गिर पड़ा। फल के भीतर बीज सुरक्षित था। कुछ दिनों बाद फल मिट्टी पर पड़ा-पड़ा गलने लगा। बारिश आई। पानी ने उसे नरम किया। बीज बाहर निकला और मिट्टी में जा पहुँचा।अब एक नई यात्रा शुरू हुई।

वह छोटा बीज अंधेरी मिट्टी में पड़ा था। उसे कुछ पता नहीं था कि उसके ऊपर एक विशाल वृक्ष खड़ा है। उसे यह भी नहीं पता था कि उसी वृक्ष के भीतर कभी कोई छोटा बीज इसी तरह अंधेरे से गुजरा था। उसके चारों ओर मिट्टी थी। पानी धीरे-धीरे उसके पास आ रहा था। सूरज की गर्मी मिट्टी को गर्म कर रही थी।कुछ दिनों बाद बीज फूलने लगा।उसका खोल फटा।एक छोटी जड़ बाहर निकली।और फिर एक नन्हा अंकुर मिट्टी के भीतर से ऊपर की ओर बढ़ने लगा।

वृक्ष की शाखाएँ हवा में हिल रही थीं। उसकी पत्तियाँ सूरज की रोशनी में चमक रही थीं। नीचे मिट्टी में नया जीवन जन्म ले रहा था। वृक्ष को लगा जैसे उसकी अपनी कहानी फिर से शुरू हो गई हो। उसे समझ आया कि जीवन कभी एक कहानी पर समाप्त नहीं होता। एक बीज वृक्ष बनता है, वृक्ष फल देता है, फल फिर बीज देता है और बीज फिर मिट्टी में लौट जाता है।इसी तरह जंगल की कहानी चलती रहती है।

कई वर्ष बाद वह छोटा अंकुर भी एक पौधा बन गया। उसके पास एक पुराना वृक्ष खड़ा था, जिसकी छाया उसके ऊपर पड़ती थी। जब गर्मी बहुत तेज होती, पुराना वृक्ष उसे छाया देता। जब बारिश आती, उसकी शाखाएँ पानी की गति को थोड़ा रोकतीं। जब तेज हवा चलती, उसकी बड़ी शाखाएँ छोटे पौधे को पूरी तरह नहीं रोकतीं, लेकिन हवा की तीव्रता को कम कर देतीं।छोटा पौधा धीरे-धीरे बढ़ता रहा।

एक दिन उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी ऊँचाई इतनी हो गई है कि उसकी पत्तियाँ पुराने वृक्ष की कुछ निचली शाखाओं तक पहुँच रही हैं। उसने ऊपर देखा। विशाल वृक्ष अब पहले से भी अधिक बड़ा लग रहा था। उसकी छाल पर समय के निशान थे। उसकी कुछ शाखाएँ सूख चुकी थीं। लेकिन उसकी जड़ें अभी भी मजबूत थीं।छोटे पौधे ने उस वृक्ष से कुछ नहीं माँगा। उसे केवल बढ़ना था।

वर्षों बाद पुराना वृक्ष बूढ़ा हो गया। उसकी शाखाएँ कम होने लगीं। कुछ मौसमों ने उसे कमजोर कर दिया। एक भारी तूफान में उसकी एक बड़ी शाखा टूट गई। फिर एक और वर्षा ऋतु में उसका तना भीतर से कमजोर होने लगा। जंगल ने उसे गिरते हुए देखा। एक सुबह तेज हवा चली और विशाल वृक्ष धीरे-धीरे झुककर धरती पर आ गिरा।जमीन हिल उठी।उसके गिरने से धूल और सूखे पत्ते हवा में उड़ गए।लेकिन जंगल में जीवन रुका नहीं।

उस वृक्ष का तना अब मिट्टी का हिस्सा बनने लगा। उसकी लकड़ी धीरे-धीरे टूटने लगी। वर्षा उसके भीतर उतरने लगी। छोटे जीव उसकी छाल के बीच रहने लगे। कवक और सूक्ष्म जीव उसकी लकड़ी को मिट्टी में बदलने लगे। उसकी पुरानी जड़ें मिट्टी को पकड़े रहीं। जो वृक्ष कभी मिट्टी से जीवन लेता था, अब वही मिट्टी को वापस जीवन दे रहा था।पास खड़ा युवा वृक्ष उसे देखता रहा।उसकी शाखाओं पर नई पत्तियाँ निकल रही थीं।उसने अपने भीतर एक गहरी समझ महसूस की।

जीवन लेने और देने का चक्र एक ही है।जो मिट्टी से मिलता है, वह एक दिन मिट्टी को लौटता है।जो बीज से जन्म लेता है, वह एक दिन नए बीजों को जन्म देता है।जो वृक्ष कभी अकेला अंकुर था, वह एक दिन पूरे जंगल का हिस्सा बन जाता है।युवा वृक्ष बढ़ता गया। उसकी शाखाएँ फैलती गईं। उसकी जड़ें गहरी होती गईं। एक दिन उसके ऊपर भी फूल आए। फिर फल आए। फिर उन फलों के भीतर बीज बनने लगे।

उनमें से एक बीज बिल्कुल छोटा था।वह फल के भीतर शांत पड़ा था।बाहर हवा चल रही थी।पत्तियाँ सरसराती थीं।सूरज चमक रहा था।दूर बादल इकट्ठे हो रहे थे।बीज को कुछ पता नहीं था कि उसका फल कब गिरेगा। उसे नहीं पता था कि वह किस दिशा में जाएगा। शायद वह बारिश के पानी के साथ दूर बह जाएगा। शायद किसी पत्ती के नीचे दब जाएगा। शायद किसी पत्थर के पास जाकर रुक जाएगा। शायद उसे लंबे समय तक पानी नहीं मिलेगा। शायद कोई तूफान उसे उखाड़ देगा। शायद गर्मी उसे सुखाने की कोशिश करेगी।

लेकिन उसके भीतर एक शक्ति थी।वह शक्ति थी—बढ़ने की इच्छा।बीज ने अभी तक दुनिया नहीं देखी थी, लेकिन उसके भीतर एक पूरा वृक्ष छिपा था।एक शाम हवा तेज हुई।फल शाखा से अलग हुआ।वह नीचे गिरा।

बीज ने फिर से यात्रा शुरू की।और कहीं, उसी विशाल जंगल की किसी नम मिट्टी में, एक छोटी-सी जगह उसका इंतजार कर रही थी।रात आई।चाँद निकला।बारिश की पहली बूंद गिरी।बीज मिट्टी में धीरे-धीरे दब गया।अंधेरा फिर लौट आया।लेकिन इस बार अंधेरा डरावना नहीं था।क्योंकि अंधेरे के भीतर एक नया जीवन जाग रहा था।

कुछ दिनों बाद बीज की बाहरी परत नरम हुई। उसके भीतर से एक नन्ही जड़ निकली। वह मिट्टी में नीचे गई। फिर एक छोटा अंकुर ऊपर बढ़ा। मिट्टी भारी थी, लेकिन अंकुर ने उसे चीर दिया। सूरज की पहली किरण उसकी नन्ही पत्ती पर पड़ी।

वह चमक उठी।हवा ने उसे छुआ।बारिश ने उसे भिगोया।मिट्टी ने उसे थामा।सूरज ने उसे ऊर्जा दी।और जंगल ने उसे अपनी विशाल हरियाली में जगह दे दी।वह बीज अब केवल बीज नहीं था।वह एक शुरुआत था।एक ऐसी शुरुआत, जिसमें एक वृक्ष बनने की संभावना थी।और उस वृक्ष के भीतर भविष्य में हजारों नए बीज छिपे होने वाले थे।

इस तरह एक छोटा-सा बीज जंगल की अनंत कहानी का हिस्सा बन गया। उसने सीखा कि गिरना हार नहीं है, अंधेरा अंत नहीं है, तूफान विनाश नहीं है और छोटा होना कमजोरी नहीं है। जड़ें दिखाई नहीं देतीं, फिर भी वही वृक्ष को खड़ा रखती हैं। बीज दिखाई नहीं देता, फिर भी उसके भीतर पूरा भविष्य छिपा रहता है। मिट्टी शांत रहती है, फिर भी उसी की गोद से जंगल जन्म लेते हैं। बारिश गिरती है और मिट्टी को जीवन देती है। सूरज जलता है और पत्तियों को ऊर्जा देता है। हवा चलती है और बीजों को दूर तक ले जाती है।और जंगल की हर पत्ती, हर जड़, हर फूल और हर बीज एक ही बात कहता है—जीवन कभी रुकता नहीं।एक बीज गिरता है तो कहानी खत्म नहीं होती।वहीं से अगली कहानी शुरू होती है।

 

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