बहुत दूर पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक विशाल मैदान था। कभी यह मैदान
इतना हरा-भरा हुआ करता था कि दूर से देखने पर ऐसा लगता था जैसे धरती ने अपने ऊपर
हरे रंग की एक मुलायम चादर बिछा रखी हो। छोटी-छोटी घास की पत्तियाँ हवा के साथ
लहराती थीं, पेड़ों की शाखाएँ पक्षियों
की आवाजों से भरी रहती थीं और मैदान के बीच से एक पतली नदी चाँदी की रेखा की तरह
बहती थी। बरसात के मौसम में नदी का पानी इतना बढ़ जाता था कि उसके किनारे की
मिट्टी भीगकर गहरी भूरी हो जाती थी और उसकी खुशबू पूरे जंगल में फैल जाती थी। लेकिन
अब वह सब केवल एक पुरानी याद बन चुका था। कई वर्षों से बारिश कम होती जा रही थी और
आखिरकार एक ऐसा समय आया जब आसमान जैसे इस मैदान को भूल ही गया। सूरज दिनभर आग
बरसाता और रात को भी जमीन के भीतर बची हुई गर्मी कम नहीं होती थी। घास सूखकर
मिट्टी में मिल चुकी थी, नदी का पानी
पूरी तरह समाप्त हो चुका था और पेड़ों की शाखाओं पर गिने-चुने पत्ते ही बचे थे।
मैदान की मिट्टी अब इतनी सूख चुकी थी कि उसके शरीर पर हर दिशा में लंबी-लंबी
दरारें पड़ गई थीं। कहीं दरारें इतनी गहरी थीं कि उनके अंदर अंधेरा दिखाई देता था।
हवा चलती तो सूखी मिट्टी की महीन धूल उठती और पूरे मैदान पर फैल जाती। कभी-कभी हवा
उस धूल को दूर पहाड़ियों तक ले जाती और वहाँ से फिर किसी दूसरी दिशा में उड़ा
देती। मिट्टी को अपने ऊपर उड़ती हुई धूल का दर्द महसूस होता था, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकती थी। वह केवल आसमान की ओर देखती
और बादलों की प्रतीक्षा करती रहती। उसे अपने पुराने दिन याद आते थे जब बारिश की
बूंदें उसके ऊपर गिरती थीं और वह उन्हें अपने भीतर समेट लेती थी। पहली बारिश के
बाद उसकी खुशबू इतनी गहरी होती थी कि हवा भी उसे अपने साथ दूर तक लेकर जाती थी।
मिट्टी को याद था कि पानी उसके भीतर उतरकर जड़ों तक पहुँचता था, बीजों को जगाता था और पेड़ों को फिर से हरा कर देता था।
लेकिन अब उसे यह भी याद नहीं था कि आखिरी बार उसके शरीर ने पूरी तरह पानी कब महसूस
किया था।
एक दिन दोपहर के समय सूरज बहुत तेज चमक रहा था। गर्मी इतनी अधिक थी कि मिट्टी
की एक पुरानी दरार अचानक और चौड़ी हो गई। मिट्टी के भीतर से एक हल्की-सी आवाज
निकली, जैसे कोई लंबे समय से दबा
हुआ दर्द बाहर आ गया हो। उसने धीरे से आसमान की ओर देखा और कहा, “मैं अब बहुत थक चुकी हूँ। मेरे भीतर नमी का आखिरी अंश भी
समाप्त हो रहा है। अगर पानी जल्दी नहीं आया तो शायद मेरे भीतर सोए हुए बीज भी
हमेशा के लिए शांत हो जाएँगे।” उसकी आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन पास से गुजर रही हवा ने उसे सुन लिया। हवा कुछ क्षण
मिट्टी के ऊपर ठहरी और बोली, “मैं तुम्हारी
बात बादलों तक पहुँचाऊँगी।” मिट्टी ने उदास होकर पूछा, “क्या वे मेरी आवाज सुनेंगे?” हवा ने कहा, “अगर धरती की
दरारें बहुत गहरी हों तो बादल उन्हें दूर से भी देख लेते हैं।” यह कहकर हवा तेज हो
गई और मैदान से उठकर पहाड़ियों को पार करती हुई आसमान की ओर चली गई।
आसमान के बहुत दूर एक हिस्से में कुछ बादल इकट्ठा हो रहे थे। वे अलग-अलग आकार
के थे। कोई सफेद और हल्का था, कोई धूसर था और
कोई इतना गहरा कि उसके भीतर अंधेरा दिखाई देता था। उन्हीं बादलों के बीच एक
छोटा-सा नया बादल भी था जिसने अभी तक धरती के बहुत कम हिस्से देखे थे। वह अक्सर
बड़े बादलों से पूछता था कि बारिश कहाँ करनी चाहिए। एक बूढ़ा बादल हमेशा उसे
समझाता था कि बारिश वहीं करनी चाहिए जहाँ धरती सचमुच उसका इंतजार कर रही हो। छोटा
बादल पूछता, “लेकिन हमें कैसे पता चलेगा
कि धरती इंतजार कर रही है?” बूढ़ा बादल
कहता, “धरती बोलती नहीं, लेकिन उसकी दरारें बहुत कुछ कहती हैं। जहाँ मिट्टी फट जाती
है, जहाँ नदी का रास्ता सूख
जाता है और जहाँ पेड़ों की पत्तियाँ अपनी चमक खो देती हैं, वहाँ समझना कि धरती पानी के लिए पुकार रही है।”
उसी समय हवा वहाँ पहुँची और उसने मैदान की पूरी कहानी बादलों को सुनाई। उसने
बताया कि एक विशाल मैदान पूरी तरह सूख चुका है, नदी का पानी समाप्त हो गया है, पेड़ों की
जड़ें पानी खोजते-खोजते बहुत गहराई तक जा चुकी हैं और मिट्टी के भीतर कई बीज
वर्षों से बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। छोटा बादल यह सुनकर बहुत दुखी हुआ। उसने
पूछा, “क्या वहाँ सचमुच एक भी बूंद
पानी नहीं है?” हवा ने कहा, “बहुत कम।” छोटा बादल बोला, “अगर हम वहाँ बारिश नहीं करेंगे तो क्या होगा?” हवा कुछ क्षण शांत रही और फिर बोली, “शायद मिट्टी के भीतर बचा हुआ जीवन भी समाप्त हो जाएगा।” बूढ़े बादल ने यह सुना
तो उसने बाकी बादलों की ओर देखा और कहा, “हमें उस मैदान की ओर चलना चाहिए।” सभी बादल धीरे-धीरे एक दिशा में बढ़ने लगे।
छोटा बादल उनके साथ उड़ रहा था और पहली बार उसके भीतर यह इच्छा जागी कि वह किसी
सूखी धरती को फिर से हरा होते हुए देखना चाहता है।
उधर मैदान में मिट्टी अब भी आसमान की ओर देख रही थी। दिन बीत गया, शाम आई और रात भी गुजर गई, लेकिन कोई बादल नहीं आया। मिट्टी निराश हो गई। उसने सोचा कि शायद हवा केवल उसे
दिलासा देने के लिए गई थी। उसी समय उसके भीतर बहुत गहराई में पड़ा एक छोटा-सा बीज
उसकी उदासी महसूस कर रहा था। बीज वर्षों से मिट्टी के अंदर सोया हुआ था। उसने
मिट्टी से पूछा, “तुम इतनी दुखी
क्यों हो?” मिट्टी ने कहा, “बारिश अभी तक नहीं आई।” बीज ने धीरे से कहा, “लेकिन वह आएगी।” मिट्टी ने पूछा, “तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?” बीज ने कहा, “क्योंकि मेरे
भीतर अभी भी जीवन की थोड़ी-सी शक्ति बची है। जब तक वह शक्ति है, मैं बारिश की प्रतीक्षा कर सकता हूँ।” मिट्टी ने आश्चर्य से
पूछा, “तुम इतने वर्षों से यहाँ
पड़े हो, फिर भी तुम्हारे भीतर जीवन
कैसे बचा है?” बीज ने कहा, “मैंने समय को गिनना छोड़ दिया है। मैंने केवल अपनी शक्ति को
बचाकर रखा है।”
अगली सुबह आसमान का रंग बदलने लगा। पहले दूर क्षितिज पर एक पतली धूसर रेखा
दिखाई दी। धीरे-धीरे वह रेखा फैलती गई और कुछ ही समय में आकाश का बड़ा हिस्सा
बादलों से ढक गया। सूरज की तेज रोशनी कम होने लगी। हवा अचानक ठंडी हो गई। पेड़ों
की सूखी शाखाएँ हिलने लगीं और मिट्टी ने पहली बार लंबे समय बाद अपने शरीर पर ठंडी
हवा महसूस की। फिर आसमान में जोरदार गर्जना हुई। छोटा बादल डर गया और उसने बूढ़े
बादल से पूछा, “क्या मैंने कुछ गलत किया?” बूढ़ा बादल हँसकर बोला, “नहीं, यह तो बारिश के आने की
घोषणा है।” बिजली आसमान को चीरती हुई चमकी और मिट्टी काँप उठी। उसके भीतर सोया हुआ
बीज जागने लगा। उसने पूछा, “क्या यह बारिश
है?” मिट्टी ने कहा, “अभी नहीं। यह बारिश का वादा है।”
कुछ क्षणों तक आसमान शांत रहा। फिर एक छोटी-सी बूंद बादल से अलग हुई। हवा ने
उसे धीरे से नीचे की ओर धकेला। वह बूंद घूमती हुई मैदान तक पहुँची और सूखी मिट्टी
पर गिरी। “टप।” बस इतनी-सी आवाज हुई, लेकिन मिट्टी
के लिए वह आवाज किसी मधुर संगीत से कम नहीं थी। बूंद ने मिट्टी की सतह पर एक
छोटा-सा गहरा निशान बनाया। मिट्टी ने उसे महसूस किया और धीरे से कहा, “तुम आ गई।” उसके बाद दूसरी बूंद गिरी, फिर तीसरी और फिर अचानक हजारों बूंदें आसमान से नीचे आने
लगीं। कुछ ही क्षणों में बारिश तेज हो गई। सूखी धरती पर पानी बरसने लगा। मिट्टी की
दरारों में पानी भरने लगा और धीरे-धीरे वह पानी जमीन के भीतर उतरने लगा। मिट्टी को
ऐसा लगा जैसे उसका शरीर वर्षों की थकान के बाद पहली बार साँस ले रहा हो।
बारिश और मिट्टी का एक अनोखा रिश्ता था। बारिश ने मिट्टी से पूछा, “तुमने मुझे इतना याद किया?” मिट्टी ने कहा, “तुम्हें भूलना
संभव नहीं था।” बारिश बोली, “मैं देर से
नहीं आई, तुम्हें मेरी प्रतीक्षा
बहुत लंबी लगी।” मिट्टी ने कहा, “मेरे लिए हर
दिन बहुत लंबा था।” बारिश ने उसकी बात सुनी और अपनी बूंदों को और धीरे-धीरे जमीन
पर गिरने दिया। मिट्टी ने उन बूंदों को अपने भीतर समेटना शुरू किया। ऊपर की कठोर
परत नरम होने लगी। दरारों के किनारे गीले हो गए। सूखी मिट्टी का रंग धीरे-धीरे
बदलकर गहरा भूरा होने लगा। कुछ समय बाद मैदान से वह पुरानी खुशबू उठी जिसे मिट्टी
वर्षों से भूल चुकी थी। हवा ने उस खुशबू को अपने साथ उठाया और पेड़ों तक ले गई।
पेड़ों ने अपनी सूखी शाखाओं के बीच उस सुगंध को महसूस किया और उन्हें लगा कि शायद उनके भीतर भी कुछ बदल रहा है।
मिट्टी के बहुत अंदर वह छोटा-सा बीज बारिश की बूंदों को महसूस कर रहा था। पहली
बूंद उसके पास पहुँची तो बीज के भीतर हल्की-सी हलचल हुई। दूसरी बूंद ने उसकी कठोर
बाहरी परत को नरम किया। तीसरी बूंद के बाद बीज ने अपनी पुरानी परत को धीरे-धीरे
खोलना शुरू कर दिया। मिट्टी ने पूछा, “क्या तुम जाग
रहे हो?” बीज ने कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि उसके भीतर एक नया जीवन जन्म ले रहा था। थोड़ी देर
बाद उसके भीतर से एक नन्ही सफेद जड़ बाहर आई। उसने मिट्टी को छुआ। मिट्टी ने उसे
अपने भीतर जगह दी और कहा, “नीचे जाओ, वहाँ पानी है।” जड़ धीरे-धीरे आगे बढ़ी। रास्ते में उसे
छोटे पत्थर मिले, सूखी जड़ें
मिलीं और मिट्टी की कठोर परतें मिलीं, लेकिन उसने हार
नहीं मानी। वह रास्ता बदलती रही और अंततः उसे एक नम जगह मिली। उसने पानी को अपने
भीतर लिया और बीज के अंदर जीवन की शक्ति बढ़ने लगी।
उसी समय बीज की दूसरी दिशा से एक छोटी-सी हरी कोंपल ऊपर की ओर बढ़ने लगी। उसने
मिट्टी की सतह की ओर रास्ता बनाया। मिट्टी ने उसे धीरे से कहा, “ऊपर जाओ।” कोंपल ने पूछा, “ऊपर क्या है?” मिट्टी ने कहा, “आकाश।” कोंपल ने पूछा, “और वहाँ क्या है?” मिट्टी ने कहा, “सूरज।” कोंपल ने फिर पूछा, “और उसके बाद?” मिट्टी
मुस्कुराई और बोली, “उसके बाद
तुम्हें खुद पता चलेगा।” कोंपल ऊपर बढ़ती गई। आखिरकार वह मिट्टी की सतह को चीरकर
बाहर आ गई। पहली बार उसने आसमान देखा। बारिश की बूंदें उसकी नन्ही पत्तियों पर गिर
रही थीं। वह हवा के साथ झुकती और फिर सीधी हो जाती। मिट्टी ने उसे देखकर महसूस किया कि वर्षों की प्रतीक्षा सफल हुई है।
उधर सूखी नदी के पुराने रास्ते में भी बदलाव शुरू हो चुका था। पहाड़ियों से
बारिश का पानी बहकर नीचे आने लगा। पहले एक छोटी-सी धारा बनी। फिर दूसरी धारा उससे
जुड़ गई। पानी पत्थरों के बीच से गुजरने लगा। सूखी नदी के पत्थर चमकने लगे। एक
पत्थर ने दूसरे से कहा, “सुनो, कुछ बह रहा है।” दूसरे पत्थर ने ध्यान से सुना और कहा, “हाँ, पानी।” थोड़ी
देर में छोटी धाराएँ मिलकर एक पतली नदी बन गईं। नदी ने जैसे वर्षों की नींद से
आँखें खोलीं। उसने बारिश से पूछा, “क्या तुम वापस
आ गई?” बारिश ने कहा, “हाँ।” नदी ने कहा, “मैं तो अपना रास्ता कभी भूली ही नहीं थी, केवल मेरे भीतर बहने वाला पानी चला गया था।” बारिश ने कहा, “अब पानी वापस आ गया है।” नदी धीरे-धीरे मैदान की ओर बहने लगी।
मैदान के किनारे खड़ा सबसे पुराना पेड़ भी बारिश की बूंदों में भीग रहा था।
उसकी छाल बहुत सूख चुकी थी और उसकी कई शाखाएँ बिल्कुल खाली थीं। लेकिन उसकी जड़ें
अभी भी मिट्टी की गहराई में जीवित थीं। जैसे ही पानी जड़ों तक पहुँचा, पेड़ ने अपने भीतर एक हलचल महसूस की। उसने मिट्टी से पूछा, “क्या सचमुच बारिश लौट आई है?” मिट्टी ने कहा, “हाँ।” पेड़ ने
कहा, “क्या मैं फिर से हरा हो
सकता हूँ?” मिट्टी ने उत्तर दिया, “अगर तुम्हारी जड़ों में शक्ति बची है तो क्यों नहीं?” पेड़ ने पानी को अपनी जड़ों में खींचना शुरू किया।
धीरे-धीरे उसके तने के भीतर रस चलने लगा। एक सूखी शाखा पर बहुत छोटी-सी कली दिखाई
दी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। बारिश की बूंदें उन कलियों पर गिरती रहीं और पेड़ को
लगा कि उसके भीतर सोया हुआ जीवन
फिर से जाग रहा है।
तीन दिनों तक लगातार बारिश हुई। मैदान की मिट्टी नरम हो गई। पुराने गड्ढे पानी
से भर गए। सूखी नदी अब एक छोटी लेकिन जीवित धारा बन चुकी थी। घास की पतली हरी
रेखाएँ जमीन से बाहर आने लगीं। पेड़ों पर नई कलियाँ दिखाई देने लगीं। मिट्टी के
भीतर छिपे कई बीज जाग गए। किसी जगह से एक नन्ही पत्ती निकली, कहीं से दो पत्तियाँ और कहीं से घास का छोटा-सा गुच्छा।
पूरा मैदान धीरे-धीरे बदल रहा था। जहाँ कुछ दिन पहले केवल धूल और दरारें थीं, वहाँ अब जीवन की छोटी-छोटी निशानियाँ दिखाई देने लगी थीं।
मिट्टी ने बारिश से कहा, “तुमने मुझे बदल
दिया।” बारिश ने उत्तर दिया, “नहीं, मैंने केवल तुम्हें तुम्हारी पुरानी शक्ति याद दिलाई है। जीवन तुम्हारे भीतर पहले से मौजूद था।”
चौथे दिन बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी। बादल हल्के होने लगे और सूरज उनकी ओट
से बाहर आया। उसकी किरणें गीली मिट्टी पर पड़ीं तो जमीन से हल्की भाप उठने लगी।
पूरा मैदान चमकने लगा। नदी के पानी पर सूर्य की रोशनी पड़ रही थी। पेड़ों की नई
पत्तियाँ चमक रही थीं और घास पर पानी की बूंदें मोतियों जैसी दिखाई दे रही थीं।
छोटा बादल दूर जाने से पहले मैदान को देख रहा था। उसने मिट्टी से कहा, “मैं फिर आऊँगा।” मिट्टी ने कहा, “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी।” बारिश की आखिरी बूंद एक
नन्ही कोंपल पर गिरी। कोंपल कुछ क्षण झुकी, फिर सीधी हो गई। सूरज की
गर्म रोशनी उसके ऊपर पड़ी और वह धीरे-धीरे फैलने लगी।
दिन बीतते गए। नन्हा पौधा बढ़ने लगा। उसकी जड़ें मिट्टी के भीतर गहरी होती गईं
और उसकी पत्तियाँ आकाश की ओर फैलने लगीं। एक दिन उसने मिट्टी से पूछा, “क्या मैं बड़ा होकर पेड़ बनूँगा?” मिट्टी ने कहा,
“अगर तुम अपनी जड़ों को मजबूत रखोगे तो जरूर।” पौधे ने पूछा, “क्या मुझे हमेशा बारिश मिलती रहेगी?” मिट्टी ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “नहीं। बारिश हमेशा एक जैसी नहीं होती। कभी अधिक आएगी, कभी कम और कभी लंबे समय तक नहीं आएगी।” पौधे ने पूछा, “फिर मैं क्या करूँगा?” मिट्टी ने कहा, “तुम्हें
प्रतीक्षा करना सीखना होगा और जो पानी मिले उसे सँभालना होगा।” पौधे ने अपनी जड़ों
को और गहरा किया। उसने समझ लिया कि केवल ऊपर बढ़ना ही जीवन नहीं है। मजबूत बनने के
लिए नीचे भी जाना पड़ता है।
समय के साथ मैदान में फिर से घास फैलने लगी। पुराने पेड़ पर नई पत्तियाँ आ
गईं। नदी चौड़ी होने लगी। कई छोटे पौधे बड़े होने लगे और उनके ऊपर नए बीज बनने
लगे। हवा अब सूखी धूल नहीं उड़ाती थी। वह हरी पत्तियों को छूती और उनके बीच से
गुजरती हुई मधुर आवाज पैदा करती थी। कभी-कभी वह दूर पहाड़ियों तक जाती और वहाँ से
ठंडी हवा लेकर लौटती। मैदान में अब जीवन वापस आ चुका था। लेकिन मिट्टी अपने पुराने
दिनों को भूली नहीं थी। उसे पता था कि प्रकृति में कोई मौसम हमेशा के लिए नहीं
रहता। बारिश के बाद धूप आती है, धूप के बाद
गर्मी आती है और गर्मी के बाद फिर बादल लौटते हैं।
कुछ वर्षों बाद एक ऐसा मौसम आया जब बारिश फिर कम हो गई। पहले साल बादल कम आए।
दूसरे साल बारिश और कम हुई। तीसरे साल बादल आए भी तो जल्दी चले गए। नदी का पानी
घटने लगा। घास पीली होने लगी और पेड़ों की कुछ पत्तियाँ गिरने लगीं। लेकिन इस बार
मिट्टी पहले जैसी कमजोर नहीं थी। उसने अपनी नमी को गहराई में सुरक्षित रखा था।
पौधों की जड़ें अब पहले से अधिक गहरी थीं। नदी का एक हिस्सा जमीन के भीतर बह रहा
था। घास की जड़ों ने मिट्टी को मजबूती से पकड़ रखा था। पेड़ जानते थे कि पानी कम
होने पर अपनी वृद्धि धीमी करनी है। जंगल में किसी को घबराहट नहीं थी, क्योंकि सबको पता था कि सूखा कठिन हो सकता है, लेकिन यह हमेशा
के लिए नहीं रहता।
गर्मी बढ़ती गई। सूरज की किरणें तेज होती गईं। कुछ छोटी धाराएँ सूख गईं, लेकिन नदी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। मिट्टी ने अपनी गहराई
में बचा पानी संभालकर रखा। पेड़ों की जड़ों ने धीरे-धीरे उसे खींचा। घास ने अपनी
वृद्धि कम कर दी। बीज मिट्टी के भीतर सुरक्षित पड़े रहे। सब प्रतीक्षा कर रहे थे।
एक शाम अचानक दूर क्षितिज से ठंडी हवा आई। मिट्टी ने हवा को महसूस किया और पूछा, “क्या बादल आ रहे हैं?” हवा ने कहा, “हाँ।” पेड़ों
की पत्तियाँ हिलने लगीं। नदी की धारा थोड़ी तेज हो गई। मिट्टी ने अपने भीतर छिपे
बीजों से कहा, “तैयार रहो।” वे शांत रहे, क्योंकि उन्हें पता था कि समय करीब है।
आसमान धीरे-धीरे काला होने लगा। बादल एक-दूसरे से मिलकर विशाल समूह बनाते गए।
बिजली चमकी और कुछ ही देर में पहली बूंद गिरी। इस बार मिट्टी ने उस बूंद को पहले
से अधिक गहराई तक पहुँचाया। उसने पानी को बहने नहीं दिया। घास की जड़ों ने जमीन को
थामे रखा और पेड़ों की जड़ों ने नमी को अपने भीतर खींच लिया। बारिश तेज हुई तो
छोटी धाराएँ बनने लगीं और वे नदी तक पहुँचने लगीं। इस बार मैदान बारिश के लिए
तैयार था। बारिश ने मिट्टी से कहा, “तुम बदल गई
हो।” मिट्टी ने उत्तर दिया, “तुमने मुझे
सिखाया कि पानी केवल पाने की चीज नहीं है, उसे सँभालना भी पड़ता है।” बारिश ने कहा, “और तुमने मुझे सिखाया कि मेरी हर बूंद तभी अर्थपूर्ण है जब कोई उसे जीवन में बदल सके।”
कई वर्षों में वह मैदान धीरे-धीरे एक विशाल जंगल में बदल गया। जहाँ कभी सूखी
मिट्टी थी, वहाँ अब ऊँचे-ऊँचे पेड़
खड़े थे। उनकी शाखाओं पर अनगिनत पत्तियाँ थीं। नदी उनके बीच से होकर बहती थी। उसके
किनारे घास की मोटी परत थी। मिट्टी गहरी, नरम और उपजाऊ हो चुकी थी। हर मौसम में नए बीज गिरते और उनमें से कुछ उसी वर्ष
अंकुरित हो जाते, जबकि कुछ अगले
मौसम की प्रतीक्षा करते। जंगल की सबसे पुरानी जड़ों में वह समय अब भी दर्ज था जब
पानी की एक बूंद के लिए धरती तरसती थी। लेकिन नई पीढ़ी के बीज उस समय को केवल कहानी के रूप में जानते थे।
एक दिन हवा ने पुराने पेड़ से पूछा, “क्या यह वही जगह है जहाँ कभी केवल सूखी मिट्टी और दरारें थीं?” पेड़ ने अपनी शाखाएँ हिलाईं और कहा, “हाँ।” हवा ने आश्चर्य से पूछा, “फिर यह सब कैसे बदल गया?” पेड़ ने कहा, “एक बूंद से
शुरुआत हुई थी।” हवा हँसते हुए बोली, “सिर्फ एक बूंद
से इतना बड़ा जंगल?” पेड़ ने कहा, “बूंद अकेली नहीं थी। उसके नीचे मिट्टी थी, मिट्टी के भीतर बीज थे, बीजों में जीवन था और ऊपर सूरज था। फिर समय था, धैर्य था और बार-बार लौटती बारिश थी। जंगल किसी एक दिन में नहीं बना।”
एक छोटे बीज ने यह बातचीत सुनी और पूछा, “क्या मुझे भी कभी इतना बड़ा होना है?” पेड़ ने कहा, “बड़ा होना
जरूरी नहीं, जीवित रहना जरूरी है।” बीज
ने पूछा, “जीवित कैसे रहें?” पेड़ ने कहा, “अपनी जड़ों को
मजबूत करो, पानी को पहचानो, धूप को स्वीकार करो और जब समय कठिन हो तो अपनी शक्ति बचाकर
रखो।” बीज ने पूछा, “अगर बारिश देर
से आए तो?” पेड़ ने कहा, “तब प्रतीक्षा करो।” बीज ने पूछा, “अगर बहुत अधिक बारिश हो जाए तो?” पेड़ ने कहा, “तब पानी को
रास्ता दो।” बीज ने फिर पूछा, “और अगर बारिश
बिल्कुल न आए?” पेड़ ने कुछ देर चुप रहकर
कहा, “तब भी अपने भीतर जीवन को जितना संभव हो सुरक्षित रखो।”
एक रात आसमान बिल्कुल साफ था। चाँद नदी के पानी में चमक रहा था। हवा बहुत धीमी
थी और जंगल की पत्तियाँ लगभग स्थिर थीं। मिट्टी ने ऊपर देखा और उसे दूर एक छोटा-सा
बादल दिखाई दिया। उसने कहा, “क्या तुम्हें
वह समय याद है जब तुम पहली बार मेरे ऊपर बरसे थे?” बादल ने कहा, “हाँ।” मिट्टी
ने पूछा, “तब मैं बहुत कमजोर थी।”
बादल ने उत्तर दिया, “लेकिन तुम खत्म
नहीं हुई थीं।” मिट्टी बोली, “मेरे भीतर एक
छोटा-सा बीज था।” बादल ने कहा, “और मेरे भीतर
पानी।” दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर मिट्टी ने कहा, “शायद जीवन हमेशा दो चीजों से बनता है—किसी का आना और किसी का उसे स्वीकार करना।” बादल मुस्कुराया और
धीरे-धीरे आगे बढ़ गया।
वर्षों बाद भी जंगल में एक जगह ऐसी थी जहाँ मिट्टी का रंग बाकी जमीन से थोड़ा
अलग था। वहाँ पुराने सूखे दिनों की दरारों के निशान अभी भी दिखाई देते थे। नदी उसी
जगह से होकर गुजरती थी और वहाँ की घास बाकी जगहों से अधिक घनी थी। पुराने पेड़ की
सबसे बड़ी शाखा उस जगह पर छाया करती थी। हवा ने एक दिन मिट्टी से पूछा, “यह जगह इतनी खास क्यों है?” मिट्टी ने कहा, “क्योंकि यहाँ
कभी सूखा सबसे गहरा था।” हवा ने पूछा,
“फिर यहाँ हरियाली सबसे अधिक क्यों है?” मिट्टी ने कहा, “क्योंकि यहाँ
बारिश की पहली बूंद सबसे गहराई तक गई थी।” हवा ने आश्चर्य से पूछा, “क्या सचमुच एक बूंद इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है?” मिट्टी ने कहा,
“अगर उसके नीचे जीवन
प्रतीक्षा कर रहा हो, तो एक बूंद भी
एक पूरी दुनिया की शुरुआत बन सकती है।”
समय आगे बढ़ता रहा। मौसम बदलते रहे। कभी बारिश अधिक हुई, कभी कम। कभी तूफान आया, कभी हल्की फुहार। कभी नदी उफान पर आई और कभी वह शांत होकर बहती रही। लेकिन
जंगल ने हर मौसम से कुछ न कुछ सीखा। मिट्टी ने पानी सँभालना सीखा, पेड़ों ने जड़ों को गहरा करना सीखा, घास ने जमीन को पकड़ना सीखा, नदी ने अपने रास्ते को मजबूत करना सीखा और बीजों ने प्रतीक्षा करना सीखा। अब
सूखा आता भी तो जंगल पूरी तरह टूटता नहीं था। उसे पता था कि कठिन समय गुजर जाएगा।
कहीं न कहीं कोई बीज जीवित रहेगा। किसी जड़ में थोड़ी नमी बची होगी। किसी बादल में
बारिश का पानी होगा।
एक वर्ष बारिश बहुत अधिक हुई। कई दिनों तक लगातार पानी गिरता रहा। नदी का पानी
बढ़कर किनारों तक पहुँच गया। मिट्टी को डर लगा कि कहीं पानी सब कुछ बहाकर न ले
जाए। लेकिन इस बार उसने अपनी पुरानी कमजोरी को याद किया और पानी के लिए रास्ते बना
दिए। छोटी धाराएँ नदी तक पहुँचने लगीं। अतिरिक्त पानी जंगल के बाहर बड़े जलाशय की
ओर चला गया। पेड़ों की जड़ों ने मिट्टी को पकड़कर रखा और घास ने जमीन को बहने से
बचाया। कुछ दिनों बाद बारिश रुक गई। जंगल सुरक्षित था। मिट्टी ने बारिश से कहा, “पहले मैं पानी के लिए तरसती थी, अब मुझे समझ आया कि बहुत कम और बहुत अधिक पानी दोनों कठिन
हो सकते हैं।” बारिश ने कहा, “इसीलिए संतुलन
जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।”
बहुत लंबे समय बाद वह छोटा बीज, जो कभी मिट्टी
के अंदर सोया था, एक विशाल पेड़
बन चुका था। उसकी शाखाओं पर अनगिनत बीज लगते थे। जब हवा चलती तो वे बीज दूर-दूर तक
उड़ जाते और नई जमीनों पर गिरते। पेड़ हर बीज को जाते हुए देखता और सोचता कि शायद
उनमें से कोई ऐसी जगह गिरेगा जहाँ अभी जीवन का इंतजार हो। एक दिन हवा ने एक छोटा
बीज उसी जंगल के एक शांत कोने में गिरा दिया। बीज मिट्टी के भीतर गया और उसने
आसपास फैले जंगल को महसूस किया। उसने पूछा, “क्या यहाँ कभी सूखा पड़ा था?” मिट्टी ने कहा, “हाँ।” बीज ने आश्चर्य से पूछा, “इतना बड़ा जंगल होने के बाद भी?” मिट्टी ने कहा,
“जंगल हमेशा से इतना बड़ा नहीं था।” बीज ने पूछा, “तो फिर यह सब कैसे बना?” मिट्टी ने कहा, “बारिश आई थी। जीवन जागा था। जड़ें बढ़ी थीं। समय गुजरा था। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह
थी कि किसी ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी।”
एक गर्मी फिर आई। सूरज ने जंगल को तपाया। कई पत्तियाँ सूखने लगीं। नदी का पानी
घटने लगा। आसमान कई दिनों तक साफ रहा। छोटे बीज ने मिट्टी से पूछा, “क्या अब फिर बारिश नहीं आएगी?” मिट्टी ने कहा, “आएगी।” बीज ने
पूछा, “तुम्हें कैसे पता?” मिट्टी ने कहा,
“क्योंकि मैंने पहले भी सूखा देखा है और उसके बाद बारिश को आते देखा है।” बीज
ने पूछा, “अगर इस बार देर हो गई तो?” मिट्टी ने कहा,
“हम प्रतीक्षा करेंगे।” बीज ने पूछा, “अगर बहुत देर हो गई?” मिट्टी ने कहा, “तब भी।” बीज चुप हो गया। उसने अपनी जड़ों को मिट्टी में और
गहरा किया और अपनी सारी शक्ति को बचाकर
रखने लगा।
कुछ सप्ताह बाद हवा का रुख बदल गया। दूर पहाड़ियों से ठंडी हवा चली। जंगल की
पत्तियाँ एक साथ हिलने लगीं। नदी ने अचानक अपने भीतर हलचल महसूस की। मिट्टी ने हवा
से पूछा, “क्या वे आ रहे हैं?” हवा ने कहा, “हाँ।” आसमान के
दूर किनारे पर बादलों की एक पतली परत दिखाई दी। वह धीरे-धीरे मोटी होती गई। कुछ ही
समय में पूरा आकाश गहरे बादलों से ढक गया। बिजली चमकी। गर्जना हुई। छोटे बीज ने
उत्साह से कहा, “बारिश!” मिट्टी ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, बारिश।”
पहली बूंद फिर उसी तरह गिरी जैसे वर्षों पहले गिरी थी। “टप।” मिट्टी ने उसे
अपने भीतर समेट लिया। दूसरी बूंद आई। फिर तीसरी। उसके बाद हजारों बूंदें आकाश से
गिरने लगीं। जंगल की हर पत्ती चमकने लगी। घास झूमने लगी। नदी भरने लगी। मिट्टी ने
पानी को गहराई तक पहुँचाया। छोटे बीज ने पानी महसूस किया और उसके भीतर जीवन की
हलचल शुरू हो गई। बारिश ने मिट्टी से पूछा, “क्या तुम्हें मेरी याद थी?” मिट्टी ने कहा, “तुम्हारी हर बूंद की याद थी।” बारिश ने पूछा, “और क्या तुम्हें डर नहीं लगा कि मैं शायद न आऊँ?” मिट्टी ने कहा,
“डर लगा था, लेकिन इस बार मुझे पता था कि डर के बावजूद जड़ों को मजबूत
रखना चाहिए।”
बारिश लगातार गिरती रही और जंगल उसके संगीत में डूब गया। पेड़ों की शाखाएँ
हिलती रहीं, नदी बहती रही और मिट्टी
पानी को अपने भीतर समेटती रही। उस रात जंगल के भीतर हजारों बीजों ने पानी महसूस
किया। कुछ तुरंत जाग गए, कुछ ने थोड़ा
और इंतजार किया और कुछ अगले मौसम तक सोए रहे। लेकिन अब किसी बीज को यह डर नहीं था
कि बारिश का अर्थ केवल एक बार का चमत्कार है। वे जानते थे कि प्रकृति चक्र में
चलती है। बारिश आएगी, धूप आएगी, सूखा आएगा, फिर बारिश
आएगी। जीवन हर बार खुद को नए रूप में जन्म
देगा।
सुबह जब बारिश रुकी तो सूरज बादलों के पीछे से धीरे-धीरे बाहर आया। पूरा जंगल
चमक रहा था। पत्तियों पर पानी की बूंदें थीं। नदी पहले से अधिक भरी हुई थी। मिट्टी
गीली थी और उसकी खुशबू हवा में फैल रही थी। एक छोटा पौधा मिट्टी से बाहर निकला।
उसने पहली बार सूरज देखा। मिट्टी ने उससे कहा, “स्वागत है।” पौधे ने पूछा, “यह दुनिया कैसी
है?” मिट्टी ने कहा, “सुंदर भी और कठिन भी।” पौधे ने पूछा, “क्या यहाँ हमेशा बारिश होगी?” मिट्टी ने कहा, “नहीं।” पौधे ने
पूछा, “तो क्या मुझे डरना चाहिए?” मिट्टी ने कहा,
“नहीं। तुम्हें अपनी जड़ों पर विश्वास रखना चाहिए।”
पौधा धीरे-धीरे बढ़ता गया। उसके साथ कई दूसरे पौधे भी उगे। समय बीतता गया और
जंगल और घना होता गया। नदी का पानी दूर तक जाता रहा। बादल हर वर्ष लौटते रहे। हवा
जंगल की खुशबू लेकर पहाड़ियों और मैदानों के पार जाती रही। और मिट्टी अपनी गहराई
में उस पुराने बीज की कहानी सँभालकर रखती रही जिसने वर्षों तक पानी की प्रतीक्षा
की थी। वह कहानी अब हर नए बीज को सुनाई जाती थी। कहानी में कोई राजा नहीं था, कोई महल नहीं था, कोई युद्ध नहीं था। उसमें केवल सूखी मिट्टी थी, एक बूंद बारिश थी और जीवन को बचाकर रखने की जिद थी।
मिट्टी अब समझ चुकी थी कि सूखापन हमेशा मृत्यु का संकेत नहीं होता। कभी-कभी
सूखी जमीन के नीचे जीवन अपनी सबसे बड़ी शक्ति के साथ सो रहा होता है। बादल दूर
दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इसका
अर्थ यह नहीं कि बारिश समाप्त हो गई। नदी सूख सकती है, लेकिन उसका रास्ता मिटता नहीं। पेड़ पत्तियाँ खो सकते हैं, लेकिन उनकी जड़ें जीवित रह सकती हैं। बीज वर्षों तक शांत रह सकता है, लेकिन सही समय आने पर वह पूरी दुनिया को बदल सकता है।
एक शाम सूरज ढल रहा था। आसमान नारंगी और लाल रंग से भर गया था। नदी शांत बह
रही थी। हवा पेड़ों की शाखाओं से गुजर रही थी। मिट्टी नम थी। दूर एक बादल
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। मिट्टी ने उसे देखकर कहा, “तुम फिर आओगे न?” बादल ने कहा, “जब भी तुम्हें मेरी जरूरत होगी।” मिट्टी मुस्कुराई और बोली, “मुझे अब पता है कि जरूरत के समय प्रतीक्षा करना भी एक शक्ति
है।” बादल ने कहा, “और मुझे पता है
कि गिरना ही मेरा उद्देश्य नहीं है, किसी धरती को जीवन देना मेरा उद्देश्य है।”
उस रात जंगल में हवा बहुत धीमी थी। पेड़ स्थिर खड़े थे। नदी का पानी चाँदनी
में चमक रहा था। मिट्टी के भीतर अनगिनत बीज शांत पड़े थे। कुछ अगले दिन अंकुरित
होने वाले थे, कुछ अगले मौसम में और कुछ
वर्षों बाद। लेकिन हर बीज के भीतर एक छोटी-सी संभावना थी। आसमान में बादल आगे
बढ़ते रहे। कहीं दूर शायद कोई और सूखी धरती बारिश की प्रतीक्षा कर रही थी। हवा उस
दिशा में चली गई। बादल भी उसी ओर बढ़ने
लगे।
क्योंकि बारिश जानती थी कि दुनिया में कहीं न कहीं हमेशा कोई ऐसी मिट्टी होती
है जो उसकी प्रतीक्षा कर रही होती है। और मिट्टी जानती थी कि चाहे सूखा कितना भी
लंबा क्यों न हो, जीवन की
संभावना को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं है। किसी गहरी दरार के नीचे कोई बीज
जीवित हो सकता है। किसी सूखी जड़ के भीतर थोड़ी-सी शक्ति बची हो सकती है। किसी दूर
के बादल में पानी जमा हो सकता है। और जब वह बादल सही समय पर आएगा, जब पहली बूंद धरती को छुएगी, तब एक नई कहानी शुरू होगी।
इसलिए सूखी मिट्टी ने कभी बारिश से यह शिकायत नहीं की कि वह देर से आई। उसने
केवल इतना कहा, “जब तुम आईं, तब मैं तैयार थी।” बारिश ने उत्तर दिया, “और जब मैं आई, तब तुम्हारे
भीतर जीवन अभी बाकी था।”
यही उनका सबसे बड़ा रिश्ता था। बारिश अकेले जंगल नहीं बना सकती थी और मिट्टी
अकेले बारिश को बुला नहीं सकती थी। लेकिन दोनों के मिलते ही बीज जाग सकते थे, जड़ें बढ़ सकती थीं, नदियाँ बह सकती थीं और धरती फिर से हरी हो सकती थी। यही प्रकृति का रहस्य था—कोई भी जीवन अकेले नहीं चलता। बादल
को धरती चाहिए, धरती को पानी चाहिए, बीज को मिट्टी चाहिए, पौधे को सूरज चाहिए, नदी को पहाड़
चाहिए और जंगल को इन सभी
का संतुलन चाहिए।
वर्षों बाद जब कोई नया बीज मिट्टी में गिरता, तो मिट्टी उसे धीरे से यही कहानी सुनाती। वह कहती, “एक समय मैं बहुत सूखी थी। मेरी दरारें गहरी थीं। मेरे ऊपर
घास नहीं थी। मेरी नदी सूख चुकी थी। लेकिन मेरे भीतर एक बीज था जिसने हार नहीं
मानी। फिर एक दिन बारिश आई। उसने मेरी दरारों को भरा, मेरे भीतर पानी पहुँचाया और उस बीज को जगा दिया। वह बीज एक
पौधा बना, पौधा पेड़ बना और उस पेड़
से फिर अनगिनत बीज पैदा हुए। आज जो जंगल तुम देख रहे हो, उसकी शुरुआत उसी प्रतीक्षा से हुई थी।”
और हर नया बीज उस कहानी को सुनकर मिट्टी में और गहराई तक चला जाता।उसे पता होता कि भविष्य में क्या होगा, यह कोई नहीं
जानता।लेकिन वह यह जरूर जानता था कि अगर बारिश आए तो उसे जागना है, अगर धूप आए तो उसे बढ़ना है, अगर हवा चले तो उसे झुकना है, अगर सूखा आए तो
उसे अपनी शक्ति बचानी है और अगर समय कठिन हो जाए तो उसे अपनी जड़ों पर विश्वास
रखना है।आसमान में बादल चलते
रहे।नदी बहती रही।पेड़ बढ़ते रहे।घास फैलती रही।बीज गिरते रहे।मिट्टी जीवन सँभालती रही।और बारिश जब भी आती, सूखी धरती की हर पुरानी दरार में एक नई कहानी लिख जाती।
इस तरह “सूखी मिट्टी और बारिश” की कहानी कभी समाप्त नहीं हुई। क्योंकि यह केवल
एक मैदान की कहानी नहीं थी। यह हर उस धरती की कहानी थी जो कभी सूख जाती है, हर उस बीज की कहानी थी जो कठिन समय में भी अपने भीतर जीवन
बचाकर रखता है और हर उस बारिश की कहानी थी जो देर से सही, लेकिन किसी न किसी दिन लौट आती है।
कभी-कभी जीवन बहुत कमजोर दिखाई देता है। कभी ऐसा लगता है कि सब कुछ समाप्त हो
चुका है। लेकिन प्रकृति हमें बार-बार याद दिलाती है कि अंत दिखाई देना और वास्तव
में अंत हो जाना एक ही बात नहीं है। सूखी मिट्टी के भीतर छिपा बीज इसका प्रमाण है।
सूखी नदी के नीचे बहता पानी इसका प्रमाण है। सूखे पेड़ की शाखा पर निकलती छोटी-सी कली इसका प्रमाण है। और आसमान में धीरे-धीरे जमा होते
बादल इसका प्रमाण हैं।
इसलिए जब भी धरती सूखी हो, दरारें गहरी
हों और आसमान खाली दिखाई दे, तब भी कहीं न
कहीं एक संभावना जीवित रहती है। शायद वह बहुत छोटी हो। शायद दिखाई न दे। शायद उसे
जागने में बहुत समय लगे। लेकिन अगर मिट्टी उसे बचाकर रखे और बारिश किसी दिन लौट आए, तो वही छोटी-सी
संभावना एक पूरे जंगल में बदल सकती है।
और जब पहली बूंद फिर से सूखी मिट्टी पर गिरती है, तो उसकी आवाज
केवल “टप” नहीं होती।वह आवाज कहती है—“मैं लौट आई
हूँ।”मिट्टी उत्तर देती है—“मैं तैयार
हूँ।”बीज कहता है—“मैं जीवित हूँ।”जड़ कहती है—“मैं बढ़ूँगी।”नदी कहती है—“मैं फिर
बहूँगी।”पेड़ कहता है—“मैं फिर हरा
होऊँगा।”
और धरती चुपचाप मुस्कुराकर कहती है—“जीवन कभी सचमुच हारता नहीं, वह केवल सही बारिश की प्रतीक्षा करता है।”
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