बहुत दूर, ऊँची-ऊँची पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक सुंदर घाटी थी,
जिसका नाम
उजासवन था। उजासवन में प्रकृति की हर चीज़ जैसे अपनी एक अलग कहानी कहती थी। वहाँ
साल और बरगद के विशाल पेड़ थे, जिनकी शाखाएँ आसमान को छूती थीं। उनके बीच से निर्मला नाम
की एक शांत नदी बहती थी, जिसका पानी चाँदनी में चाँदी की तरह चमकता था। नदी के
किनारे छोटे-छोटे फूल खिले रहते थे और रात होते ही कुछ फूल अपनी हल्की नीली चमक से
अँधेरे को सुंदर बना देते थे। घाटी की सबसे ऊँची पहाड़ी पर पत्थरों से बना एक बहुत
पुराना मंदिर था। मंदिर की दीवारें जगह-जगह से टूट चुकी थीं, छत का एक
हिस्सा गिर चुका था और उसकी खिड़कियों पर बेलें चढ़ी हुई थीं। उस मंदिर के भीतर
पत्थर की एक छोटी-सी चौकी थी और उसी चौकी पर मिट्टी का एक पुराना दीपक रखा था।
उसका नाम दीपू था। दीपू आकार में बहुत छोटा था। उसके शरीर पर कई महीन दरारें थीं
और उसका रंग भी समय के साथ फीका पड़ चुका था। उसके भीतर एक पुरानी बाती थी,
लेकिन लंबे समय
से उसमें तेल नहीं डाला गया था। इसलिए वह वर्षों से जल नहीं पाया था।
दीपू अक्सर मंदिर की खिड़की से बाहर देखा करता था। दिन में वह पेड़ों की
हरियाली, नदी की चमक और पहाड़ियों के सुंदर रंग देखता, लेकिन रात में उसकी नजर
सबसे ज्यादा आकाश पर टिक जाती। जब चाँद निकलता तो उसकी चाँदनी मंदिर की टूटी
खिड़की से भीतर आती और दीपू के पास रखे पत्थरों को चमका देती। दीपू चाँद को देखकर
सोचता कि चाँद कितना बड़ा और सुंदर है। उसकी रोशनी पूरी घाटी में फैल जाती है,
जबकि दीपू की
अपनी कोई रोशनी ही नहीं थी। एक रात उसने चाँद से पूछा, “चाँद भैया, तुम इतने बड़े
हो और तुम्हारी रोशनी इतनी दूर तक जाती है। मेरी तो कोई रोशनी ही नहीं है। अगर कभी
मैं जल भी गया तो शायद मेरी रोशनी केवल इस छोटी-सी चौकी तक ही पहुँचेगी। फिर मेरे
होने का क्या मतलब है?” चाँद कुछ देर शांत रहा। फिर उसकी चाँदनी दीपू के ऊपर और नरम
होकर पड़ी। चाँद ने कहा, “दीपू, रोशनी की कीमत इस बात से नहीं होती कि वह कितनी दूर तक
फैलती है। कभी-कभी एक छोटी रोशनी भी बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वह उस
अँधेरे में दिखाई देती है जहाँ बड़ी रोशनी नहीं पहुँच पाती।” दीपू ने पूछा,
“लेकिन अगर मेरे
पास जलने के लिए तेल ही न हो तो?” चाँद मुस्कुराया और बोला, “जब समय आएगा, रास्ता भी
मिलेगा।” उस रात दीपू बहुत देर तक चाँद की बात सोचता रहा।
कुछ दिनों बाद उजासवन में बारिश का मौसम शुरू हुआ। आसमान में काले बादल छा गए।
दिनभर हवा पेड़ों की शाखाओं को हिलाती रही और शाम होते-होते बारिश शुरू हो गई।
पहले बूंदें धीरे-धीरे गिर रही थीं, लेकिन कुछ ही समय में बारिश इतनी तेज हो गई कि
पूरी घाटी पानी की आवाज से भर गई। निर्मला नदी का पानी तेजी से बढ़ने लगा। पेड़
अपनी भारी शाखाओं को झुकाने लगे। छोटी-छोटी धाराएँ पहाड़ी से नीचे उतरने लगीं और
मंदिर की सीढ़ियों तक पानी पहुँचने लगा। रात होते-होते चाँद बादलों के पीछे पूरी
तरह छिप गया और तारों का भी कोई पता नहीं था। मंदिर के अंदर इतना अँधेरा था कि
दीवारें भी दिखाई नहीं दे रही थीं। अचानक हवा का एक तेज झोंका टूटी खिड़की से भीतर
आया और दीपू को हिला गया। दीपू डरकर बोला, “आज तो सचमुच बहुत अँधेरा
है।” तभी हवा ने कहा, “आज रास्ते भी दिखाई नहीं दे रहे।” दीपू ने पूछा, “क्या तुम्हें
भी रास्ता दिखाई नहीं देता?” हवा ने जवाब दिया, “मुझे दिशा का एहसास रहता है, लेकिन जब तूफान
बहुत तेज हो जाता है तो सब कुछ बदल जाता है।” कुछ देर बाद नदी की तेज आवाज मंदिर
तक पहुँची। निर्मला बोली, “मेरे किनारे टूट रहे हैं। पानी अपनी सीमा से बाहर जा रहा
है।” दीपू ने उसकी बात सुनी और पहली बार उसे लगा कि केवल वही नहीं, बल्कि पूरी
घाटी इस अँधेरे और तूफान से परेशान है।
सुबह हुई तो बारिश कुछ कम हो चुकी थी। मंदिर के बाहर की जमीन कीचड़ से भर गई
थी। पेड़ों की कई टहनियाँ टूटकर गिर चुकी थीं। नदी पहले से कहीं अधिक चौड़ी दिखाई
दे रही थी। दीपू ने अपनी सूखी बाती को देखा और सोचा कि अगर उसके भीतर तेल होता तो
वह शायद रात के अँधेरे को थोड़ा कम कर सकता था। तभी मंदिर की दीवार पर उगी हरी काई
ने धीमी आवाज में कहा, “अगर तुम्हें तेल चाहिए तो पुराना तेल-घर अभी भी घाटी के
नीचे कहीं मौजूद है।” दीपू ने आश्चर्य से पूछा, “तेल-घर? वह कहाँ है?”
काई ने कहा,
“बहुत साल पहले
वहाँ दीपों के लिए तेल रखा जाता था। अब वह बेलों और झाड़ियों से ढक चुका है,
लेकिन शायद
वहाँ कुछ बचा हो।” दीपू के भीतर आशा की छोटी-सी किरण जगी। उसने कहा, “अगर वहाँ
थोड़ा-सा तेल भी बचा होगा तो मैं उसे खोजकर लाऊँगा।” लेकिन समस्या यह थी कि दीपू
अपने स्थान से हिल नहीं सकता था। वह मिट्टी का दीपक था और पत्थर की चौकी पर रखा
था। तभी हवा ने उसकी मदद करने का निर्णय लिया। उसने मंदिर के बाहर पड़ी एक पुरानी
छोटी मिट्टी की गाड़ी को धक्का दिया। गाड़ी का एक पहिया टूटा था, लेकिन दूसरा
अभी भी घूम सकता था। हवा ने धीरे से दीपू को उठाया और गाड़ी के भीतर रख दिया। दीपू
ने पहली बार मंदिर की चौकी छोड़ी और जंगल की ओर अपनी यात्रा शुरू की।
गाड़ी पहाड़ी से नीचे धीरे-धीरे लुढ़कने लगी। रास्ता बारिश के कारण फिसलन भरा
था। कभी पहिया पत्थर से टकराता और गाड़ी रुक जाती, कभी कीचड़ में फँस जाती।
हवा उसे पीछे से धक्का देती और सूखे पत्तों को रास्ते पर बिछाकर दिशा दिखाती। कुछ
दूर जाने के बाद वे निर्मला नदी के किनारे पहुँचे। नदी आज बहुत तेज बह रही थी।
उसके पानी में पेड़ों की टहनियाँ और पत्ते बह रहे थे। दीपू ने नदी से पूछा,
“निर्मला,
क्या तुम्हें
पता है कि पुराना तेल-घर कहाँ है?” नदी ने अपनी एक छोटी धारा को किनारे की ओर मोड़ते हुए कहा,
“वह मेरे पुराने
किनारे के पास है। पिछले तूफानों में उसका रास्ता मिट चुका है, लेकिन मैं
तुम्हें संकेत दे सकती हूँ।” नदी ने कुछ चमकीले बीजों को अपनी धारा में बहाया। वे
बीज किनारे से होते हुए जंगल की ओर जाने लगे। दीपू ने उनका पीछा किया। रास्ते में
एक विशाल बरगद का पेड़ आया। उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकली हुई थीं। गाड़ी कीचड़
में फँस गई। दीपू निराश होकर बोला, “मैं शायद कभी वहाँ नहीं पहुँच पाऊँगा।” बरगद ने
अपनी भारी शाखाएँ हिलाईं और कहा, “रास्ता कठिन हो तो रुकना नहीं चाहिए। मेरी जड़ें भी कभी
छोटी थीं। समय के साथ वे गहरी होती गईं। मजबूती आकार से नहीं, धैर्य से आती
है।” बरगद की एक जड़ ने गाड़ी के पहिए को सहारा दिया और हवा ने उसे आगे धकेल दिया।
गाड़ी फिर चल पड़ी।
आगे जंगल और घना होता गया। ऊँची बेलों ने रास्ता पूरी तरह बंद कर रखा था। सूरज
की रोशनी भी जमीन तक ठीक से नहीं पहुँच रही थी। दीपू ने चारों ओर देखा और सोचा कि
शायद यही वह जगह है जहाँ तेल-घर छिपा होगा। तभी एक पुरानी लोहे की घंटी दिखाई दी।
वह पेड़ की एक शाखा से लटक रही थी और वर्षों से जंग लगी हुई थी। दीपू ने उससे पूछा,
“क्या तुम्हें
पता है कि तेल-घर कहाँ है?” घंटी ने अपनी धीमी आवाज में कहा, “यही रास्ता उसके पास जाता
है, लेकिन बेलों ने इसे बंद कर दिया है।” हवा ने बेलों को हटाने की कोशिश की,
लेकिन कुछ
बेलें बहुत मजबूत थीं। तभी एक छोटी गिलहरी वहाँ आई। उसने अपनी तेज दाँतों से सूखी
बेलों को काटना शुरू किया। एक बेल कटी, फिर दूसरी, फिर तीसरी। धीरे-धीरे
रास्ता खुलने लगा। दीपू ने गिलहरी को देखकर कहा, “तुम इतनी छोटी हो, फिर भी इतना
बड़ा काम कर रही हो।” गिलहरी ने अपनी पूँछ हिलाई और जैसे कह रही हो, “छोटा होना किसी
काम के लिए बाधा नहीं।” यह बात दीपू के मन में गहराई से उतर गई।
कुछ देर बाद उन्हें एक पुरानी पत्थर की इमारत दिखाई दी। उसकी छत आधी टूट चुकी
थी और दीवारों पर काई जमी थी। दरवाजे पर मोटी बेलें चढ़ी थीं। यही पुराना तेल-घर
था। हवा ने बेलों को हटाया और गिलहरी ने छोटे-छोटे रास्ते साफ किए। दीपू को भीतर
ले जाया गया। वहाँ कई बड़े मिट्टी के घड़े रखे थे। कुछ टूट चुके थे, कुछ उलटे पड़े
थे और कुछ पूरी तरह खाली थे। दीपू का मन थोड़ा उदास हुआ। उसे लगा कि शायद उसकी खोज
व्यर्थ जाएगी। लेकिन तभी एक घड़े के पीछे छोटा-सा पात्र दिखाई दिया। उसमें गाढ़े
रंग का थोड़ा-सा तेल बचा हुआ था। दीपू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने कहा,
“इतना-सा तेल ही
सही, लेकिन इससे एक लौ तो जल सकती है।” तेल को सावधानी से छोटी कटोरी में रखा गया और गाड़ी में सुरक्षित रख दिया गया। अब वापस मंदिर जाना था।
वापसी का रास्ता और भी कठिन था। बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। पहाड़ी से पानी
तेजी से उतर रहा था। रास्ते के कई हिस्से टूट गए थे। एक जगह गाड़ी का पहिया गहरी
कीचड़ में फँस गया। दीपू ने तेल के पात्र को कसकर पकड़ा। उसे डर था कि अगर तेल गिर
गया तो उसकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी। तभी बरगद की एक लंबी जड़ मिट्टी के ऊपर
दिखाई दी। हवा ने गाड़ी को उस जड़ की ओर धकेला और गाड़ी धीरे-धीरे उसके ऊपर से
निकल गई। आगे एक छोटी जलधारा रास्ता काट रही थी। निर्मला ने अपनी धारा को थोड़ा
मोड़ा और पानी का बहाव कम कर दिया। गाड़ी उस रास्ते से निकल गई। हर कदम पर कोई न
कोई उसकी मदद कर रहा था। दीपू को समझ आने लगा कि जिस रोशनी
को वह अकेले अपनी रोशनी समझ रहा था, उसकी यात्रा वास्तव में सबकी सहायता से पूरी हो
रही थी।
जब वे मंदिर पहुँचे तब रात हो चुकी थी। आसमान फिर काले बादलों से ढका था।
मंदिर के भीतर घना अँधेरा था। दीपू को उसकी पुरानी चौकी पर वापस रखा गया। तेल
कटोरी में डाला गया और पुरानी बाती को उसमें भिगोया गया। अब केवल एक चीज़ की जरूरत
थी—आग। मंदिर में कोई जलती हुई चीज़ नहीं थी। हवा ने सूखी घास इकट्ठी की और दो
छोटे पत्थरों को आपस में टकराया। एक छोटी-सी चिंगारी निकली। सूखी घास ने उस
चिंगारी को पकड़ लिया। हवा ने बहुत सावधानी से छोटी लौ को दीपू की बाती तक
पहुँचाया। कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ। फिर बाती के एक सिरे पर हल्की नारंगी चमक दिखाई
दी। वह चमक धीरे-धीरे बढ़ी और अचानक दीपू जल उठा। उसकी लौ बहुत छोटी थी। इतनी छोटी
कि वह मंदिर की केवल एक दीवार तक रोशनी पहुँचा सकती थी। लेकिन दीपू के लिए वह
दुनिया की सबसे सुंदर रोशनी थी। उसने चारों ओर देखा और खुशी से कहा, “मैं जल रहा
हूँ!” उसकी रोशनी ने पत्थर की चौकी को चमका दिया। फिर पास की दीवार दिखाई देने
लगी। मंदिर का एक कोना उजला हो गया। बाहर खड़े पेड़ों की पत्तियों पर भी उसकी
हल्की चमक दिखाई देने लगी।
रात गहराती गई। चाँद अभी भी बादलों के पीछे छिपा था। लेकिन मंदिर की खिड़की से
दीपू की छोटी लौ बाहर दिखाई दे रही थी। जंगल के छोटे जीवों ने उसे देखा। गिलहरी ने
अपने घोंसले से बाहर झाँका और कहा, “मंदिर में उजाला है।” पक्षियों ने पत्तों के बीच
से उस रोशनी को देखा। निर्मला नदी के पानी में दीपक की छोटी-सी चमक दिखाई दी। बरगद
की पत्तियों पर सुनहरी झिलमिलाहट पड़ने लगी। हवा भी उस रात बहुत धीरे चलने लगी
ताकि दीपू की लौ बुझ न जाए। थोड़ी देर बाद बादल हटे और चाँद दिखाई दिया। चाँद ने
मंदिर की ओर देखा और कहा, “देखा दीपू, तुम्हें मेरी तरह पूरी घाटी को रोशन करने की जरूरत नहीं थी।
जहाँ अँधेरा था, वहाँ तुमने अपना छोटा-सा उजाला कर दिया।” दीपू ने
मुस्कुराकर कहा, “अब मुझे समझ में आने लगा है।”
लेकिन उसी रात तूफान का दूसरा दौर शुरू हुआ। हवा अचानक तेज हो गई। मंदिर की
टूटी छत से पानी की बूंदें अंदर गिरने लगीं। एक बूंद दीपू के पास आकर गिरी और उसकी
लौ काँप उठी। दीपू डर गया। उसने कहा, “मैं बुझ जाऊँगा!” हवा ने अपनी दिशा बदलकर मंदिर
के भीतर आने वाली बारिश को रोकने की कोशिश की। बरगद की शाखाएँ मंदिर की टूटी छत के
ऊपर झुक गईं। गिलहरी ने सूखे पत्तों को दरवाजे के पास जमा कर दिया ताकि पानी अंदर
कम आए। काई ने पत्थरों पर गिरने वाली नमी को अपने भीतर सोख लिया। निर्मला ने अपनी
धार का एक हिस्सा दूसरी दिशा में मोड़ दिया ताकि मंदिर की नींव में पानी न भर सके।
सबने मिलकर उस छोटी लौ को बचाया। कुछ देर बाद तूफान थोड़ा शांत हुआ और दीपू की लौ
फिर सीधी हो गई। उसने चारों ओर देखा और महसूस किया कि उसकी रोशनी अकेली नहीं थी। जिस तरह वह दूसरों को उजाला दे रहा था, उसी तरह दूसरे भी उसकी लौ
को बचा रहे थे।
रात बीत गई। सुबह की पहली किरण पहाड़ी के पीछे से निकली। आकाश सुनहरा हो गया।
निर्मला नदी के पानी पर सूरज की चमक पड़ने लगी। पेड़ों की पत्तियों पर ओस की
बूंदें चमकने लगीं। दीपू के भीतर तेल लगभग समाप्त हो चुका था। उसकी
लौ बहुत छोटी रह गई थी। लेकिन उसके मन में कोई दुख नहीं था। उसने पूरी रात जलकर
अँधेरे को जितना कम कर सकता था, उतना किया था। जैसे ही सूर्य की पहली किरण मंदिर के भीतर
पहुँची, दीपू की लौ धीरे-धीरे शांत हो गई। एक पतली-सी धुएँ की रेखा ऊपर उठी और हवा में
घुल गई। दीपू बुझ गया, लेकिन उसके भीतर एक नया विश्वास पैदा
हो चुका था। उसे अब पता था कि छोटी रोशनी भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
उस दिन से उजासवन में दीपू का सम्मान होने लगा। जब भी कोई तूफानी रात आती,
जंगल के जीव
उसे फिर तेल से भरते और उसकी बाती जलाते। दीपू हर बार उसी तरह छोटी लौ से जलता।
कभी उसकी रोशनी केवल मंदिर की चौकी तक पहुँचती, कभी दीवार तक, कभी खिड़की से
बाहर तक। लेकिन हर बार कोई न कोई उसकी रोशनी देखकर साहस पाता। एक रात एक छोटी
चिड़िया तेज बारिश में रास्ता भूल गई। उसे दूर मंदिर की रोशनी दिखाई दी और वह उसी
दिशा में उड़कर सुरक्षित पेड़ तक पहुँच गई। दूसरी रात जंगल में धुंध इतनी घनी थी
कि रास्ते दिखाई नहीं दे रहे थे। मंदिर की लौ ने कई छोटे जीवों को सही दिशा का
संकेत दिया। एक और रात हवा बहुत तेज थी और पेड़ों की शाखाएँ टूट
रही थीं। तब भी दीपू की लौ मंदिर के भीतर जलती रही।
समय गुजरता गया। मौसम बदलते रहे। बरसात आई और चली गई। गर्मी आई और नदी का पानी
कम हुआ। फिर शरद आया और आकाश साफ हो गया। सर्दियों में मंदिर धुंध से ढक जाता।
लेकिन दीपू वहीं रहता। उसकी मिट्टी पुरानी होती गई। उसकी दरारें बड़ी होती गईं। एक
दिन उसका एक छोटा किनारा टूटकर गिर गया। दीपू दुखी हो गया। उसने चाँद से कहा,
“अब मैं पहले से
भी छोटा हो गया हूँ।” चाँद ने कहा, “तुम छोटे नहीं हुए। तुमने समय के साथ बहुत कुछ
सीखा है।” दीपू ने पूछा, “क्या सीख भी रोशनी बन सकती है?” चाँद ने उत्तर दिया,
“हाँ। लौ बुझ
सकती है, लेकिन उससे मिली सीख दूसरे दीपकों में जलती रहती है।”
उस दिन से उजासवन में एक सुंदर परंपरा शुरू हुई। हर वर्ष पहली बारिश की रात
मंदिर में दीपू को साफ किया जाता। उसके भीतर नया तेल डाला जाता और नई बाती रखी
जाती। जब दीपू की लौ जलती तो उसकी लौ से जंगल के दूसरे छोटे दीपक जलाए जाते। वे
दीपक नदी के किनारे रखे जाते, पेड़ों के नीचे रखे जाते और पहाड़ी के रास्तों पर रखे जाते।
रात होते ही पूरा उजासवन छोटी-छोटी रोशनियों से चमकने लगता। आकाश से देखने पर ऐसा
लगता जैसे जमीन पर हजारों तारे उतर आए हों। चाँद उन्हें देखकर प्रसन्न होता और
कहता, “देखो, एक छोटी लौ कितनी दूर तक जा सकती है।” दीपू हर बार यह देखकर खुश होता कि उसकी
रोशनी कम नहीं हुई थी। उसने अपनी लौ दूसरों को दी थी और बदले में रोशनी और बढ़ गई थी।
एक बार उजासवन में बहुत भयंकर तूफान आया। कई दिनों तक बादल गरजते रहे। हवा
इतनी तेज चली कि बड़े-बड़े पेड़ भी झुक गए। निर्मला नदी का पानी पहाड़ी की ढलान तक
पहुँच गया। मंदिर की दीवारें काँपने लगीं। उस रात दीपू जल रहा था। हवा के तेज
झोंके से उसकी लौ बार-बार काँपती। बारिश की बूंदें उसके पास गिरतीं और उसकी लौ
छोटी हो जाती। फिर भी दीपू बुझने से बचता रहा। उसने हवा से कहा, “मैं बहुत छोटा
हूँ, लेकिन मैं कोशिश करता रहूँगा।” हवा ने कहा, “और मैं तुम्हें बुझने नहीं
दूँगी।” बरगद ने अपनी शाखाएँ मंदिर के ऊपर फैला दीं। निर्मला ने अपना पानी दूसरी
दिशा में मोड़ लिया। गिलहरी ने सूखे पत्तों और टहनियों से मंदिर के दरवाजे के पास
एक छोटी दीवार बना दी। सबने मिलकर दीपू की रक्षा की। आखिरकार तूफान गुजर गया। जब
सुबह हुई तो जंगल के कई हिस्से टूट चुके थे, लेकिन मंदिर में दीपू की लौ अब भी जल रही थी। वह बहुत छोटी थी, मगर जीवित थी।
उस दिन दीपू ने समझा कि बड़ी रोशनी होना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि अँधेरे
के बीच रोशनी बनी रहे। बिजली आकाश में चमकती थी और एक पल में पूरी घाटी को उजाला
कर देती थी, लेकिन वह केवल क्षणभर रहती थी। चाँद रातभर रोशनी देता था, लेकिन बादल उसे
छिपा सकते थे। सूर्य सुबह तक दिखाई नहीं देता था। दीपू की रोशनी छोटी थी, मगर वह वहीं
रहती थी जहाँ उसे जरूरत थी। उसने जाना कि रोशनी का अर्थ केवल चमकना नहीं है। रोशनी
का अर्थ है अँधेरे में बने रहना, रास्ता दिखाना और किसी दूसरे के डर को थोड़ा कम करना।
कई वर्ष बीत गए। बरगद और विशाल हो गया। उसकी जड़ें मंदिर के चारों ओर फैल गईं।
निर्मला नदी ने अपना रास्ता थोड़ा बदल लिया, लेकिन उसकी आवाज अब भी
मंदिर तक आती थी। गिलहरियों की कई पीढ़ियाँ मंदिर के आसपास रहने लगीं। हवा हर मौसम
में मंदिर की खिड़की से होकर गुजरती रही। चाँद हर रात आकाश में आता रहा। दीपू अब
बहुत पुराना हो चुका था। उसकी मिट्टी पर कई निशान थे। उसका एक हिस्सा टूट चुका था
और उसकी सतह पर काई की पतली परत जम गई थी। लेकिन जब भी उसे तेल और
बाती मिलती, वह फिर जल उठता।
एक रात एक छोटा तारा चाँद से पूछ बैठा, “क्या यह सच है कि इतनी सारी
रोशनियाँ उस छोटे दीपक से निकली हैं?” चाँद ने कहा, “हाँ।” तारे ने पूछा,
“लेकिन उसने तो
केवल एक लौ जलाई थी।” चाँद बोला, “एक लौ ही तो काफी होती है।” तारा आश्चर्य में पड़ गया। चाँद
ने कहा, “जब एक दीपक दूसरे दीपक को जलाता है तो पहली लौ की रोशनी कम नहीं होती। इसी तरह
अच्छाई, साहस और उम्मीद भी बाँटने से कम नहीं होते।” दीपू ने यह बात
सुनी और उसकी लौ हल्के से काँपकर जैसे मुस्कुरा उठी।
एक बहुत शांत रात आई। आकाश बिल्कुल साफ था। निर्मला नदी बिना किसी शोर के बह
रही थी। बरगद की पत्तियाँ स्थिर थीं। हवा बहुत धीमी थी। मंदिर के भीतर दीपू की लौ
जल रही थी। उस रात दीपू ने चाँद से कहा, “मुझे लगता है कि मेरी लौ अब बहुत थक गई है।”
चाँद ने कहा, “हर लौ को एक दिन शांत होना पड़ता है।” दीपू ने पूछा,
“क्या उसके बाद
अँधेरा वापस आ जाएगा?” चाँद ने मंदिर के बाहर देखा। वहाँ सैकड़ों छोटे दीपक जल रहे
थे। उसने कहा, “जब एक लौ दूसरी लौ जला देती है, तो पहली लौ के शांत होने के
बाद भी रोशनी बनी रहती है।” दीपू ने उन सभी रोशनियों को देखा। उसे वे छोटी-छोटी लौ
नहीं, बल्कि अपने जीवन की यादें लगीं। उसने देखा कि उसकी
छोटी-सी यात्रा कितनी दूर तक पहुँच चुकी थी।
दीपू की लौ धीरे-धीरे छोटी होने लगी। उसने मंदिर की दीवारों को आखिरी बार
देखा। उसने बरगद की विशाल छाया देखी। उसने निर्मला की चमकती धारा देखी। उसने आकाश
में चमकते तारों को देखा। फिर उसने चाँद की ओर देखा और कहा, “अब मुझे अपने
छोटा होने का दुख नहीं है।” चाँद ने पूछा, “क्यों?” दीपू ने कहा,
“क्योंकि मैंने
समझ लिया है कि रोशनी का आकार नहीं, उसका उद्देश्य महत्वपूर्ण है।” यह कहते ही उसकी
लौ एक पल के लिए चमकी और फिर धीरे-धीरे बुझ गई। मंदिर में अँधेरा छाया, लेकिन बाहर
सैकड़ों दीपक जल रहे थे। इसलिए मंदिर पूरी तरह अँधेरा नहीं हुआ।
सुबह जब सूरज निकला तो उसकी पहली किरण दीपू पर पड़ी। दीपक शांत था। उसके भीतर
अब कोई लौ नहीं थी। लेकिन उसके आसपास कई छोटे दीपक रखे थे। वे सभी कभी न कभी उसी
की लौ से जले थे। उजासवन में अब यह बात सब जानते थे कि एक दीपक की जिंदगी केवल
उसकी अपनी लौ तक सीमित नहीं होती। वह जितनी रोशनी दूसरों में बाँटता है, उतनी ही उसकी
कहानी लंबी होती जाती है। दीपू अब स्वयं नहीं जलता था,
लेकिन उसकी
कहानी हर नई लौ में जीवित थी।
समय के साथ उजासवन के हर अँधेरे रास्ते पर छोटी-छोटी रोशनियाँ दिखाई देने
लगीं। जब घना कोहरा आता, दीपक जलते। जब तूफान आता, उन्हें पेड़ों की शाखाओं के
नीचे सुरक्षित रखा जाता। जब नदी का पानी बढ़ता, किनारे पर रोशनी जलाई जाती।
जब रात बहुत लंबी होती, मंदिर की खिड़की में एक दीपक जरूर चमकता। और हर बार जब कोई
छोटी लौ जलती, चाँद उसे आकाश से देखता और दीपू
को याद करता।
एक दिन एक बहुत छोटा दीपक मंदिर की चौकी पर रखा गया। वह नया था, चमकदार था और
उसमें कोई दरार नहीं थी। उसने पुराने दीपू के बारे में सुना था। उसने चाँद से पूछा,
“क्या सच में वह
इतना छोटा था?” चाँद ने कहा, “हाँ।” छोटे दीपक ने पूछा, “फिर वह इतना
प्रसिद्ध कैसे हुआ?” चाँद ने कहा, “क्योंकि उसने कभी यह नहीं पूछा कि उसकी रोशनी
कितनी बड़ी है। उसने केवल यह पूछा कि वह अँधेरे में कहाँ काम आ सकती है।” नया दीपक
कुछ देर शांत रहा। फिर उसकी बाती जलाई गई। उसकी छोटी-सी लौ उठी और मंदिर की दीवार
पर एक सुनहरी चमक फैल गई।
उस क्षण हवा मंदिर से होकर गुजरी। बरगद की पत्तियाँ हिलीं। निर्मला नदी में
रोशनी की एक लकीर बनी। आकाश में चाँद चमका। और दूर कहीं एक तारा टूटकर चमका। ऐसा
लगा जैसे पूरा उजासवन कह रहा हो कि एक छोटी रोशनी कभी वास्तव में छोटी नहीं होती।
अगर वह किसी अँधेरे को थोड़ा भी कम कर दे, किसी रास्ते को थोड़ा भी स्पष्ट कर दे, किसी डर को थोड़ा भी शांत कर दे, तो उसका अस्तित्व सार्थक हो जाता है।
दीपू की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई, क्योंकि उसकी रोशनी अब किसी एक मिट्टी के दीपक
में बंद नहीं थी। वह हर उस लौ में थी जो अँधेरे के बीच जलती थी। वह हर उस चमक में
थी जो किसी रास्ते को दिखाती थी। वह हर उस उम्मीद में थी जो तूफान के बाद भी बची
रहती थी। वह हर उस छोटे प्रयास में थी जो किसी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता था।
उजासवन के जंगल ने यह सीख हमेशा के लिए याद रखी कि अँधेरे को पूरी तरह मिटाने की
जरूरत नहीं होती। कभी-कभी बस एक छोटी-सी रोशनी जलाना ही पर्याप्त होता है। और जब
वह रोशनी दूसरी रोशनी को जन्म देती है, तब अँधेरा चाहे
कितना भी गहरा क्यों न हो, हमेशा थोड़ा पीछे हटता है।
इस तरह मिट्टी का वह छोटा-सा दीपक, जो कभी अपने छोटे होने पर दुखी हुआ करता था,
उजासवन की सबसे
बड़ी सीख बन गया। उसकी लौ छोटी थी, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा था। उसकी जिंदगी लंबी नहीं थी,
लेकिन उसकी
रोशनी की कहानी बहुत लंबी हो गई। वह खुद एक दिन बुझ गया, लेकिन उसके द्वारा जलाई गई
रोशनियाँ जलती रहीं। और जब भी रात गहरी होती, चाँद की चाँदनी के नीचे
उजासवन में अनगिनत छोटी-छोटी लौ चमकतीं। तब हवा धीरे से पेड़ों के बीच से गुजरती
और जैसे फुसफुसाकर कहती, “एक छोटी रोशनी भी अँधेरे को चुनौती देने के लिए काफी होती है।”
और पहाड़ी के पुराने मंदिर की चौकी पर, जहाँ कभी दीपू रखा करता था,
हर नई लौ के
साथ उसकी याद फिर से जन्म लेती रही। कोई उसे देख नहीं सकता था, लेकिन उसकी
कहानी हर चमक में महसूस की जा सकती थी। चाँद ऊपर से मुस्कुराता, तारे झिलमिलाते,
नदी अपनी धुन
में बहती और बरगद अपनी शाखाएँ हिलाता। उजासवन की रातें फिर कभी पूरी तरह अँधेरी
नहीं हुईं, क्योंकि वहाँ एक छोटे दीपक ने सबको सिखा दिया था कि रोशनी की शुरुआत हमेशा
बड़ी नहीं होती। कभी-कभी वह केवल एक छोटी-सी लौ होती है, जो चुपचाप जलती है और
दुनिया से बस इतना कहती है—“जहाँ तक मेरी रोशनी पहुँचती है,
वहाँ तक अँधेरा
थोड़ा कम है।”
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