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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

पत्थर तोड़ने वाला मजदूर

 


 

सुबह के पाँच बज रहे थे। आसमान अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था। दूर क्षितिज पर हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी और गाँव के चारों तरफ फैले खेतों पर ओस की बूंदें चमक रही थीं। पक्षियों की आवाजें धीरे-धीरे वातावरण में घुल रही थीं, लेकिन गाँव के आखिरी छोर पर बनी एक छोटी-सी झोपड़ी में दिन बहुत पहले शुरू हो चुका था। झोपड़ी के अंदर विशाल अपनी पुरानी चटाई पर बैठा जूते के फीते बाँध रहा था। उसके हाथों पर जगह-जगह मोटे निशान थे। हथेलियाँ फटी हुई थीं और उंगलियों पर पत्थर की चोटों के पुराने निशान साफ दिखाई देते थे। विशाल की उम्र लगभग बत्तीस वर्ष थी। शरीर मजबूत था, लेकिन लगातार मेहनत ने उसके चेहरे पर उम्र से पहले ही थकान की रेखाएँ खींच दी थीं। उसने पास रखी पुरानी कमीज उठाई और पहन ली। तभी पीछे से उसकी पत्नी सीमा की आवाज आई, “इतनी सुबह निकल रहे हो?” विशाल ने पलटकर देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, आज ठेकेदार ने कहा है कि काम जल्दी शुरू होगा।” सीमा उठकर बैठ गई और चिंता से बोली, “कल भी तो रात देर से आए थे। शरीर को थोड़ा आराम भी दे दिया करो।” विशाल हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, “आराम गरीब आदमी की जिंदगी में कहाँ लिखा होता है, सीमा?” सीमा कुछ नहीं बोली, क्योंकि वह जानती थी कि विशाल मजाक में भी सच कह रहा था।

उनके दो बच्चे थे—दस साल का बेटा अमन और सात साल की बेटी गुड़िया। दोनों अभी गहरी नींद में सो रहे थे। विशाल ने दोनों बच्चों को कुछ देर तक देखा। उसकी आँखों में थकान के साथ एक सपना भी था। वह सपना था कि उसके बच्चे कभी उसकी तरह मजदूरी न करें और गरीबी के कारण अपने सपनों को अधूरा न छोड़ें। विशाल ने धीरे से सीमा से कहा, “अमन की फीस इस बार समय पर भरनी है।” सीमा ने चिंता से उसकी ओर देखा और बोली, “पैसे कहाँ से आएँगे?” विशाल ने अपनी जेब टटोली और कहा, “कुछ जमा हैं। बाकी दो दिन की मजदूरी मिल जाएगी।” सीमा ने कहा, “लेकिन घर का राशन भी खत्म होने वाला है।” विशाल कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला, “पहले बच्चों की पढ़ाई। राशन का इंतजाम मैं कर लूँगा।” सीमा की आँखें भर आईं। उसने पूछा, “तुम कब तक सब अकेले संभालोगे?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “जब तक साँस है।” इतना कहकर वह घर से बाहर निकल गया।

गाँव से करीब चार किलोमीटर दूर एक बड़ी पत्थर की खदान थी। वहाँ सुबह से शाम तक हथौड़ों की आवाज गूँजती रहती थी। ठक-ठक-ठक की आवाज दूर तक सुनाई देती थी। विशाल पिछले बारह वर्षों से उसी खदान में पत्थर तोड़ने का काम करता था। उसके पिता भी मजदूर थे। जब विशाल केवल पंद्रह वर्ष का था, उसके पिता एक दुर्घटना में घायल हो गए थे। उनकी कमर में गंभीर चोट आई और वे फिर कभी भारी काम नहीं कर सके। घर में कमाने वाला कोई नहीं था। विशाल ने उसी उम्र में स्कूल छोड़ दिया था। एक दिन उसने अपनी माँ से कहा था, “अम्मा, अब मैं काम करूँगा।” माँ ने रोते हुए कहा था, “नहीं बेटा, तू पढ़। मैं कुछ कर लूँगी।” विशाल ने माँ के हाथ पकड़कर कहा था, “आपने पूरी जिंदगी हमारे लिए मेहनत की है। अब मेरी बारी है।” अगले ही दिन वह खदान में पहुँच गया था।

पहली बार जब उसने भारी हथौड़ा उठाया था, तो उसकी हथेली काँप रही थी। ठेकेदार ने उसे देखकर हँसते हुए कहा था, “अरे बच्चे, ये काम तेरे बस का नहीं है।” विशाल ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने हथौड़ा उठाया और पत्थर पर पहली चोट मारी। ठक! पत्थर नहीं टूटा। उसने दूसरी चोट मारी। ठक! फिर तीसरी चोट मारी। कुछ देर बाद पत्थर में दरार आई। विशाल ने पूरी ताकत लगाई और आखिरकार पत्थर टूट गया। ठेकेदार ने उसकी तरफ देखा और कहा, “काम कर लेगा।” उसी दिन से विशाल की मजदूरी शुरू हो गई थी।

बारह साल तक उसने लगातार पत्थर तोड़े। अब वह उस काम में माहिर हो चुका था। वह पत्थर को देखकर बता सकता था कि कहाँ चोट करने पर वह आसानी से टूटेगा। लेकिन इस हुनर की कीमत उसके शरीर ने चुकाई थी। उसकी पीठ में हमेशा दर्द रहता था। कभी कंधे में सूजन होती, कभी हाथ में चोट लग जाती, लेकिन वह हर सुबह समय पर काम पर पहुँचता था। उस दिन भी वह खदान में पहुँचा तो मजदूरों की लंबी कतार लगी हुई थी। ठेकेदार रघुवीर सिंह अपनी मोटरसाइकिल से आया और जोर से आवाज लगाई, “सब लोग काम शुरू करो!” सभी मजदूर अपने-अपने औजार लेकर काम में लग गए। विशाल ने भी हथौड़ा उठाया और पत्थर पर चोट करने लगा। ठक! ठक! ठक! कुछ ही देर में उसके माथे पर पसीना आ गया। सूरज ऊपर चढ़ता गया और गर्मी बढ़ती गई, लेकिन हथौड़े की आवाज नहीं रुकी।

दोपहर में मजदूर एक पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे। विशाल ने अपनी छोटी-सी पोटली खोली। उसमें दो सूखी रोटियाँ और थोड़ा नमक था। पास बैठे बुजुर्ग मजदूर रामदीन ने पूछा, “बस इतना ही?” विशाल हँस पड़ा और बोला, “रोटी दो हैं, भूख भी तो दो ही है।” रामदीन उसकी बात समझ गया। उसने पूछा, “बच्चों की फीस का इंतजाम हुआ?” विशाल ने कहा, “हो जाएगा।” रामदीन बोला, “तू हमेशा यही कहता है—हो जाएगा।” विशाल ने दूर पड़े पत्थरों की ओर देखते हुए कहा, “पत्थर भी तो पहली चोट में नहीं टूटता काका।” रामदीन मुस्कुराया और बोला, “तू पत्थर से ज्यादा मजबूत है, विशाल।”

विशाल का बेटा अमन पढ़ाई में बहुत तेज था। वह अक्सर अपने पिता को देखकर कहता, “बाबा, मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा।” विशाल हर बार कहता, “बनना बेटा। लेकिन सिर्फ बड़ा आदमी मत बनना, अच्छा आदमी भी बनना।” अमन पूछता, “आप मुझे इंजीनियर बनाओगे?” विशाल कुछ पल चुप रहता और फिर उसके चेहरे पर विश्वास आ जाता। वह कहता, “हाँ।” अमन फिर पूछता, “चाहे बहुत पैसे लगें?” विशाल जवाब देता, “हाँ।” “चाहे आपको बहुत काम करना पड़े?” विशाल उसके सिर पर हाथ रखकर कहता, “तू बस पढ़ाई करना।” एक दिन अमन ने अपने पिता के हाथों को देखा और पूछा, “बाबा, आपके हाथ इतने फटे हुए क्यों हैं?” विशाल ने अपने हाथ छिपाने की कोशिश की और कहा, “कुछ नहीं।” अमन बोला, “पत्थर ने काट दिया?” विशाल हँसा और बोला, “हाँ।” अमन ने गंभीर होकर कहा, “जब मैं बड़ा हो जाऊँगा ना, तब आपको काम नहीं करने दूँगा।” विशाल की आँखों में आँसू आ गए। उसने बेटे को गले लगा लिया और कहा, “मुझे काम से परेशानी नहीं है बेटा। मुझे बस इस बात की खुशी चाहिए कि तुम मुझसे आगे जाओ।”

एक दिन खदान में काम सामान्य से ज्यादा कठिन था। एक बहुत बड़ा पत्थर जमीन में फँसा हुआ था। ठेकेदार ने मजदूरों से कहा, “आज इसे तोड़ना ही है।” विशाल और उसके साथियों ने काम शुरू किया। सुबह से दोपहर हो गई। पत्थर में छोटी-छोटी दरारें तो पड़ीं, लेकिन वह टूट नहीं रहा था। रघुवीर बार-बार चिल्ला रहा था, “जल्दी करो!” विशाल ने कहा, “पत्थर बहुत भारी है। सावधानी से करना होगा।” रघुवीर गुस्से में बोला, “तुम लोग मजदूर हो। तुम्हारा काम है काम करना। ज्यादा समझदारी मत दिखाओ।” विशाल चुप हो गया। उसने हथौड़ा उठाया। रामदीन ने कहा, “विशाल, संभलकर।” विशाल ने सिर हिलाया और पत्थर की दरार को ध्यान से देखा। फिर उसने जोर से चोट की। एक बड़ी दरार बन गई। दूसरी चोट के बाद पत्थर हिलने लगा। तीसरी चोट से अचानक पत्थर का एक भारी हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। विशाल पीछे हट गया, लेकिन उसी समय ऊपर से छोटे पत्थरों का ढेर खिसक गया। एक बड़ा पत्थर उसके कंधे पर जा लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा। रामदीन जोर से चिल्लाया, “विशाल!” मजदूर दौड़कर उसके पास आए। उसके कंधे से खून निकल रहा था। ठेकेदार ने बस इतना कहा, “इसे बाहर ले जाओ। बाकी लोग काम करो।” रामदीन गुस्से में बोला, “इंसान है ये!” ठेकेदार ने कंधे उचकाए और कहा, “काम बंद नहीं होना चाहिए।” विशाल ने दर्द सहते हुए कहा, “काका, झगड़ा मत करो।”

उसे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जाँच करने के बाद बताया कि उसके कंधे में गंभीर चोट है और कम से कम दो महीने तक उसे भारी काम नहीं करना चाहिए। यह सुनकर विशाल का चेहरा उतर गया। उसने पूछा, “डॉक्टर साहब, दो महीने?” डॉक्टर ने कहा, “हाँ।” विशाल ने चिंता से पूछा, “लेकिन घर कैसे चलेगा?” डॉक्टर के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। सीमा अस्पताल में उसके पास बैठी थी। विशाल ने सबसे पहले पूछा, “बच्चे ठीक हैं?” सीमा ने कहा, “हाँ।” विशाल ने फिर पूछा, “अमन की फीस?” सीमा चुप हो गई। विशाल समझ गया। उसने आँखें बंद कर लीं और कहा, “मैंने कहा था ना, फीस भरना जरूरी है।” सीमा ने कहा, “पहले तुम्हारा इलाज जरूरी है।” विशाल बोला, “अगर बच्चों की पढ़ाई रुक गई तो मेरा इलाज किस काम का?” सीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने कहा, “तुम अपने बारे में कभी क्यों नहीं सोचते?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “मैं अपने बारे में ही सोचता हूँ। मेरे बच्चे ही तो मेरा भविष्य हैं।”

अगले कुछ हफ्ते बहुत कठिन थे। विशाल काम नहीं कर सकता था। घर में पैसे खत्म होने लगे। राशन उधार आने लगा। सीमा ने घरों में काम करना शुरू कर दिया। वह सुबह जल्दी उठती, घर का काम करती और फिर दूसरों के घरों में बर्तन साफ करने चली जाती। विशाल अपनी चोट के कारण घर पर बैठा रहता। उसे सबसे ज्यादा परेशानी इस बात से होती कि वह अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पा रहा था। एक दिन उसने अपने हथौड़े को देखा। वही हथौड़ा जिससे उसने बारह साल तक पत्थर तोड़े थे। उसने उसे हाथ में उठाया, लेकिन दर्द के कारण हाथ काँप गया। वह चुपचाप बैठ गया। तभी अमन उसके पास आया और बोला, “बाबा, आप उदास क्यों हैं?” विशाल ने कहा, “कुछ नहीं।” अमन ने बताया, “मैंने मास्टर जी से कहा कि मैं इंजीनियर बनूँगा।” विशाल मुस्कुराया और पूछा, “फिर?” अमन ने कहा, “मास्टर जी ने कहा कि उसके लिए बहुत पढ़ना पड़ेगा।” विशाल बोला, “तो पढ़ना।” अमन ने धीरे से कहा, “लेकिन फीस?” विशाल ने बेटे की आँखों में देखा और कहा, “फीस की चिंता मत करो।” अमन बोला, “बाबा, आप ठीक हो जाओ। मैं पढ़ाई खुद करूँगा।” विशाल ने उसे सीने से लगा लिया।

एक शाम गाँव के स्कूल के शिक्षक सुरेश जी विशाल से मिलने आए। उन्होंने कहा, “तुम्हारा बेटा बहुत होशियार है।” विशाल ने कहा, “हाँ मास्टर जी। मैं चाहता हूँ कि वह खूब पढ़े।” सुरेश जी ने पूछा, “तुमने कभी सोचा है कि मजदूरी के अलावा कुछ और किया जा सकता है?” विशाल हँस पड़ा और बोला, “हम जैसे लोगों के लिए?” सुरेश जी ने कहा, “क्यों नहीं?” विशाल ने कहा, “मेरे पास पढ़ाई नहीं है।” सुरेश जी बोले, “लेकिन अनुभव है। तुम पत्थर को पहचानते हो। तुम्हें पता है कौन-सा पत्थर किस काम का है, उसे कैसे काटना है और कैसे आकार देना है। यह भी एक हुनर है।” विशाल चुप हो गया। सुरेश जी ने बताया कि गाँव के पास नई सड़क बन रही है और वहाँ पत्थर काटने तथा आकार देने वाले कारीगरों की जरूरत है। वहाँ मजदूरी से ज्यादा पैसे मिल सकते थे। विशाल ने पूछा, “लेकिन मैं सीखूँगा कैसे?” सुरेश जी मुस्कुराए और बोले, “तुम पहले से आधा काम जानते हो।”

चोट ठीक होने के बाद विशाल वापस पुरानी खदान में नहीं गया। उसने सड़क निर्माण के पास काम शुरू किया। वहाँ वह पत्थरों को सिर्फ तोड़ता नहीं था, बल्कि उन्हें सही आकार देता था। पहले दिन उसकी कमाई मजदूरी जितनी ही थी। दूसरे दिन उसने एक राजमिस्त्री से पत्थर की नाप सीखनी शुरू की। तीसरे दिन उसने छैनी से पत्थर पर निशान बनाना सीखा। धीरे-धीरे उसका काम बेहतर होने लगा। कुछ महीनों बाद लोग उसे “विशाल कारीगर” कहने लगे। उसकी कमाई पहले से अधिक होने लगी, लेकिन उसने अपना खर्च नहीं बढ़ाया। उसने हर महीने कुछ पैसे अलग रखने शुरू कर दिए। सीमा ने पूछा, “ये पैसे कहाँ रख रहे हो?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “अमन की पढ़ाई के लिए।” सीमा ने पूछा, “और गुड़िया?” विशाल ने कहा, “उसके लिए भी।”

समय बीतता गया। अमन आठवीं कक्षा में पहुँच गया। वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता था। एक दिन वह स्कूल से लौटकर बोला, “बाबा, मुझे शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ने का मौका मिल सकता है।” विशाल ने पूछा, “कितने पैसे लगेंगे?” अमन ने रकम बताई। रकम सुनकर विशाल कुछ क्षण चुप रहा। इतने पैसे उसके लिए बहुत ज्यादा थे, लेकिन उसने दृढ़ आवाज में कहा, “तू पढ़ेगा।” सीमा ने चिंता से पूछा, “इतने पैसे कहाँ से आएँगे?” विशाल ने कहा, “मैं रात में भी काम करूँगा।” अगले दिन से उसने दिन में पत्थर काटने का काम शुरू किया और शाम को गाँव में छोटे निर्माण कार्य करने लगा। कई बार वह रात को थककर लौटता तो उसके पैर काँप रहे होते, लेकिन जैसे ही वह अमन की किताबें देखता, उसके अंदर नई ताकत आ जाती।

अमन ने दसवीं की परीक्षा दी। जिस दिन उसका परिणाम आया, वह दौड़ता हुआ घर आया और चिल्लाया, “बाबा!” विशाल उस समय बाहर पत्थर पर काम कर रहा था। उसने पूछा, “क्या हुआ?” अमन ने कागज आगे कर दिया। उसकी आँखों में खुशी थी। उसने कहा, “मैं पूरे जिले में तीसरे नंबर पर आया हूँ!” विशाल कुछ पल तक कागज देखता रहा। उसे विश्वास नहीं हुआ। फिर उसने बेटे को गले लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए। अमन ने कहा, “बाबा, अब मैं आपको काम नहीं करने दूँगा।” विशाल हँसा और बोला, “अभी नहीं बेटा। अभी बहुत दूर जाना है।”

कुछ समय बाद अमन को शहर के एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिल गया। अब खर्च और बढ़ गया। विशाल ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेचने का फैसला किया। सीमा ने कहा, “यह जमीन मत बेचो। यही तो हमारी आखिरी संपत्ति है।” विशाल ने कहा, “जमीन बच्चों से बड़ी नहीं है।” सीमा चुप हो गई। जब अमन को पता चला तो उसने कहा, “बाबा, मैं नहीं जाऊँगा।” विशाल ने कठोर आवाज में कहा, “तू जाएगा।” अमन बोला, “लेकिन जमीन…” विशाल ने उसे रोकते हुए कहा, “जमीन फिर खरीदी जा सकती है। समय और मौका वापस नहीं आता।” अमन शहर चला गया। विशाल ने पहली बार अपने बेटे को बस में बैठते हुए देखा। बस धीरे-धीरे आगे बढ़ गई। विशाल बहुत देर तक सड़क की ओर देखता रहा। उसके मन में एक ही बात थी—“मेरी मेहनत अब उसके सपनों में बदल रही है।”

शहर में अमन ने पढ़ाई शुरू कर दी। विशाल पहले की तरह काम करता रहा। उसकी उम्र बढ़ रही थी और शरीर अब पहले जैसा मजबूत नहीं था, लेकिन उसके भीतर का जुनून और मजबूत हो चुका था। वह गाँव के युवाओं को भी पत्थर काटने और निर्माण का काम सिखाने लगा। एक दिन एक लड़का उसके पास आया और बोला, “चाचा, मुझे भी काम सीखना है।” विशाल ने पूछा, “क्यों?” लड़के ने कहा, “घर में पैसे नहीं हैं।” विशाल ने कहा, “काम सीखना अच्छी बात है, लेकिन पढ़ाई मत छोड़ना।” लड़का बोला, “मेरे पास पैसे नहीं हैं।” विशाल ने जवाब दिया, “दिन में काम सीखो, रात में पढ़ो।” लड़के ने पूछा, “आप मुझे सिखाएँगे?” विशाल मुस्कुराया और बोला, “क्यों नहीं?” धीरे-धीरे उसके पास कई लड़के आने लगे। विशाल उन्हें सिर्फ काम नहीं सिखाता था, वह उन्हें समझाता था कि हुनर हाथों को मजबूत करता है, लेकिन शिक्षा जिंदगी का रास्ता बदल सकती है।

कुछ वर्षों बाद विशाल ने अपनी जमा पूँजी से एक छोटी-सी पत्थर काटने की दुकान शुरू की। शुरुआत में उसके पास केवल एक मशीन थी। लोग उसका मजाक उड़ाते थे और कहते थे, “मजदूर दुकान चलाएगा?” विशाल मुस्कुराकर जवाब देता, “मजदूर भी सपना देख सकता है।” पहले महीने बहुत कम काम मिला। दूसरे महीने भी ज्यादा काम नहीं आया, लेकिन विशाल ने हार नहीं मानी। वह ग्राहकों से अच्छा व्यवहार करता, काम समय पर करता और गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करता। धीरे-धीरे उसकी दुकान चलने लगी। एक साल में उसने दो मशीनें खरीद लीं। फिर चार मजदूर रखे और कुछ वर्षों बाद वही छोटा काम एक छोटी कंपनी में बदल गया। विशाल अब भी मजदूरों के साथ बैठकर खाना खाता था। वह अपने पुराने दिनों को कभी नहीं भूला।

एक दिन विशाल को खबर मिली कि जिस खदान में उसने बारह साल मजदूरी की थी, वहाँ नया प्रबंधन आया है। वह वहाँ गया। पुराने रास्ते को देखकर उसकी आँखों के सामने अपना बचपन घूम गया। उसे वह पहला दिन याद आया, पहली चोट, पहला घाव, पिता का चेहरा, माँ की आँखें, सीमा की चिंता और अमन का सपना। वह कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। तभी उसे रामदीन काका दिखाई दिए। वे अब बहुत बूढ़े हो चुके थे। विशाल ने उन्हें पहचान लिया और पुकारा, “काका!” रामदीन ने ध्यान से देखा और फिर उनकी आँखें चमक उठीं। उन्होंने कहा, “अरे विशाल!” दोनों गले मिल गए। रामदीन की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, “तू तो बहुत बदल गया।” विशाल ने उनके पैर छुए और बोला, “काका, शरीर बदला है, दिल नहीं।” रामदीन हँस पड़े और बोले, “याद है, तू कहता था—पत्थर पहली चोट में नहीं टूटता?” विशाल मुस्कुराया और बोला, “आज भी मानता हूँ।”

कुछ दिनों बाद खदान में फिर एक दुर्घटना हुई। एक युवा मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गया। विशाल को बहुत दुख हुआ। उसने मजदूरों से कहा, “काम जरूरी है, लेकिन जिंदगी उससे ज्यादा जरूरी है।” उसने प्रबंधन से सुरक्षा उपकरणों की मांग की। पहले उसकी बात नहीं मानी गई, लेकिन विशाल ने हार नहीं मानी। उसने मजदूरों को संगठित किया। सबने मिलकर लिखित शिकायत की। आखिरकार खदान में हेलमेट, दस्ताने और सुरक्षा जाल की व्यवस्था की गई। विशाल ने मजदूरों से कहा, “हम गरीब हैं, लेकिन हमारी जिंदगी सस्ती नहीं है।” उसकी यह बात आसपास के इलाकों में भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।

कुछ समय बाद अमन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली। उसे एक बड़ी निर्माण कंपनी में नौकरी मिल गई। पहली तनख्वाह मिलने पर वह सीधे गाँव आया। विशाल उस समय अपनी दुकान पर काम कर रहा था। अमन ने अपनी पहली तनख्वाह का लिफाफा उसके हाथ में रखते हुए कहा, “बाबा, मेरी पहली तनख्वाह।” विशाल ने लिफाफा खोलने से मना कर दिया और कहा, “ये तुम्हारी मेहनत है।” अमन ने उसके हाथ पकड़ लिए और कहा, “नहीं बाबा। मेरी मेहनत से पहले आपकी मेहनत है।” उसने अपने पिता के फटे हुए हाथों को देखा और कहा, “इन हाथों ने मेरे लिए पत्थर तोड़े हैं। अब मैं इन हाथों को आराम दूँगा।” विशाल हँस पड़ा और बोला, “मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ।” अमन भी हँसने लगा और बोला, “आप कभी बूढ़े होंगे भी नहीं।”

कुछ वर्षों बाद जिले में मजदूर सम्मान समारोह आयोजित किया गया। अलग-अलग क्षेत्रों के मेहनतकश लोगों को सम्मानित किया जाना था। विशाल का नाम भी चुना गया। जब मंच से उसका नाम पुकारा गया—“श्री विशाल कुमार, जिन्होंने पत्थर मजदूर के रूप में अपने जीवन की शुरुआत की और आज सैकड़ों युवाओं को रोजगार तथा कौशल प्रशिक्षण दे रहे हैं”—तो पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। विशाल मंच पर पहुँचा। उसे सम्मान-पत्र और स्मृति-चिह्न दिया गया। उसने माइक पकड़ा और कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, “मैंने जिंदगी में बहुत पत्थर तोड़े हैं। लेकिन आज समझ में आता है कि सबसे कठिन पत्थर बाहर नहीं, हमारे अंदर होता है। वह पत्थर है—हार मान लेने का डर। गरीबी मुश्किल है, भूख मुश्किल है, बीमारी मुश्किल है, लेकिन इन सबके बीच अगर इंसान अपने सपने को जिंदा रखे, तो रास्ता जरूर निकलता है।” उसने अपने हाथ ऊपर उठाए। फटी हुई हथेलियाँ अब भी दिखाई दे रही थीं। उसने कहा, “इन हाथों ने पत्थर तोड़े हैं। इन्हीं हाथों ने मेरे बच्चों के सपने बनाए हैं।” पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

लेकिन जिंदगी की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ वर्षों बाद विशाल की माँ बहुत बीमार हो गईं। वह उन्हें शहर के अस्पताल ले गया। माँ ने बिस्तर पर लेटे हुए उसका हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा, तूने बहुत मेहनत की।” विशाल ने जवाब दिया, “आपने मुझे मेहनत करना सिखाया था।” माँ ने पूछा, “तेरे बच्चे?” विशाल ने कहा, “अमन इंजीनियर बन गया है। गुड़िया भी पढ़ रही है।” माँ की आँखों में खुशी आ गई। उन्होंने कहा, “फिर मेरी जिंदगी सफल हो गई।” कुछ दिनों बाद माँ दुनिया छोड़कर चली गईं। विशाल टूट गया। वह रातभर माँ की पुरानी तस्वीर के सामने बैठा रहा। उसे बचपन याद आया। माँ की आवाज याद आई—“पढ़ बेटा।” उसने खुद पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन उसने अपने बच्चों को पढ़ाया था। उसे लगा जैसे उसकी माँ का सपना उसके बच्चों के जरिए पूरा हुआ हो।

गुड़िया भी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। एक दिन उसने अपने पिता से कहा, “पापा, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ।” विशाल ने बिना सोचे कहा, “बनना।” गुड़िया ने कहा, “बहुत पैसे लगेंगे।” विशाल मुस्कुराकर बोला, “तुम बस मेहनत करो।” सीमा हँसकर बोली, “तुम हर बच्चे से यही कहते हो।” विशाल ने कहा, “क्योंकि मेरे पास उन्हें देने के लिए सबसे बड़ी चीज पैसा नहीं, भरोसा है।”

समय बीतता गया। अमन एक सफल इंजीनियर बन गया और गुड़िया ने मेडिकल की पढ़ाई शुरू कर दी। विशाल की कंपनी में अब पचास से ज्यादा मजदूर काम करते थे। लेकिन उसके ऑफिस की दीवार पर एक पुराना हथौड़ा टंगा हुआ था। उस पर धूल जम गई थी। एक दिन अमन ने पूछा, “बाबा, इस पुराने हथौड़े को क्यों रखा है?” विशाल ने कहा, “इसने मेरी जिंदगी बदली है।” अमन ने पूछा, “कैसे?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “इसी से मैंने पहली बार पत्थर तोड़ा था।” अमन बोला, “और इसी से?” विशाल ने जवाब दिया, “नहीं। इसी ने मुझे सिखाया कि लगातार चोट करते रहो तो पत्थर भी टूटता है।” अमन ने हथौड़े को ध्यान से देखा। विशाल ने उसे बताया कि वह हथौड़ा उसके जीवन की पहली कमाई, पहला संघर्ष और पहला सपना था।

विशाल ने अब एक और सपना देखा। वह गाँव में गरीब बच्चों के लिए एक छोटा-सा शिक्षा केंद्र खोलना चाहता था। उसने अपनी कंपनी के मुनाफे से एक जमीन खरीदी और वहाँ एक छोटी-सी इमारत बनवाई। उसने उसका नाम रखा—“मेहनत शिक्षा केंद्र।” उद्घाटन के दिन गाँव के बहुत से लोग आए। मंच पर विशाल खड़ा था। उसके पास अब पैसा था, सम्मान था और एक सफल कंपनी थी, लेकिन उसकी आवाज में वही सादगी थी। उसने कहा, “मैं कभी स्कूल की फीस नहीं भर पाया था। इसलिए मैंने तय किया कि मेरे गाँव का कोई बच्चा सिर्फ गरीबी की वजह से पढ़ाई नहीं छोड़ेगा।” तालियाँ बजने लगीं। अमन ने अपने पिता को गर्व से देखा। गुड़िया की आँखों में आँसू थे और सीमा मुस्कुरा रही थी।

एक शाम विशाल अपने शिक्षा केंद्र के बाहर बैठा था। सूरज डूब रहा था और आसमान नारंगी रंग का हो चुका था। कुछ बच्चे अंदर पढ़ रहे थे। विशाल के हाथ में वही पुराना हथौड़ा था। एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला, “विशाल चाचा, ये हथौड़ा क्यों रखा है?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि इससे मैंने बहुत पत्थर तोड़े हैं।” बच्चे ने पूछा, “आपको डर नहीं लगता था?” विशाल ने कहा, “लगता था।” बच्चा बोला, “फिर काम कैसे करते थे?” विशाल ने बच्चे के सिर पर हाथ रखा और कहा, “डर का मतलब यह नहीं कि हम रुक जाएँ।” बच्चा बोला, “फिर क्या करें?” विशाल ने आसमान की ओर देखा और कहा, “एक कदम आगे बढ़ाएँ।” बच्चा मुस्कुराकर अंदर चला गया।

विशाल कुछ देर तक बच्चों को देखता रहा। उसके चेहरे पर संतोष था। उसे लगा कि जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीना था—बचपन, पढ़ाई, आराम और सुविधाएँ। लेकिन जिंदगी ने उसे कुछ बहुत बड़ा भी दिया था—मेहनत पर विश्वास। उसने खुद कम पढ़ाई की थी, लेकिन शिक्षा का महत्व समझा था। उसके हाथ फट गए थे, लेकिन उसने अपने बच्चों का भविष्य सँवार दिया था। उसके शरीर पर चोटें आई थीं, लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा था। आखिरकार एक दिन वह समझ गया कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसके पास मौजूद धन नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है मेहनत करने की इच्छा, मुश्किल समय में धैर्य और अपने सपनों पर विश्वास।

रात हो चुकी थी। विशाल घर लौटने के लिए उठा। उसने आखिरी बार शिक्षा केंद्र की ओर देखा। दीवार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“पत्थर कितना भी कठोर हो, लगातार मेहनत के सामने एक दिन टूटता जरूर है।” विशाल धीरे-धीरे घर की ओर चल पड़ा। उसकी चाल में अब पहले जैसी थकान नहीं थी। उसने जिंदगी भर पत्थर तोड़े थे, लेकिन असल में वह पत्थर नहीं, अपनी किस्मत तराश रहा था। एक गरीब मजदूर का बेटा होने के बावजूद उसने अपने बच्चों को सपने देखने की आजादी दी थी। उसने खुद कम पढ़ाई की, लेकिन शिक्षा का महत्व समझा। उसके हाथ फट गए, लेकिन उसने अपने बच्चों का भविष्य सँवार दिया। उसके शरीर पर चोटें आईं, लेकिन उसका हौसला कभी नहीं टूटा।

विशाल ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे उसकी माँ कहीं दूर से मुस्कुरा रही हों। उसने मन ही मन कहा, “अम्मा, मैंने पढ़ाई तो नहीं की… लेकिन आपके सपने को मरने नहीं दिया।” हवा धीरे-धीरे चल रही थी। दूर मंदिर की घंटी बज रही थी। गाँव की उस छोटी-सी सड़क पर एक साधारण मजदूर का बेटा अपने बनाए हुए असाधारण भविष्य की ओर बढ़ रहा था। उसकी कहानी इस बात का प्रमाण बन चुकी थी कि इंसान चाहे कितना भी गरीब क्यों न हो, अगर उसके अंदर मेहनत करने का साहस और अपने सपनों को पूरा करने का जुनून हो, तो वह अपनी जिंदगी की दिशा बदल सकता है। पत्थर तोड़ने वाला विशाल आखिरकार खुद एक मिसाल बन चुका था।

 

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