Skip to main content

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

जंगल का बूढ़ा हाथी

 


 

एक घने, अनंत और रहस्यों से भरे प्राचीन जंगल के हृदय स्थल में एक ऐसा जीव निवास करता था, जिसकी कथाएं पीढ़ियों से इस विशाल अरण्य की हवाओं में तैरती रहती थीं। उस महान जीव को पूरा संसार 'बूढ़ा हाथी' के नाम से जानता था। यह बूढ़ा हाथी केवल एक पशु मात्र नहीं था, बल्कि इस संपूर्ण वन पारिस्थितिकी का एक जीवंत इतिहास, एक चलता-फिरता स्तंभ और इस पृथ्वी की प्राचीन स्मृति का प्रतीक था। उसकी आयु इतनी अधिक हो चुकी थी कि उसके शरीर की हर एक झुर्री और त्वचा की हर एक सिकुड़न समय के लंबे सफर और संघर्षों की दास्तान  बयां करती थी। उसके शरीर का विशाल आकार समय के थपेड़ों से और अधिक दृढ़ और रूखा हो गया था, मानो प्रकृति ने खुद उसे अपनी किसी चट्टान से तराश कर इस धरती पर भेजा हो। उसके कान किनारों से कटे-फटे थे, जो इस बात की गवाही देते थे कि उसने अपने लंबे जीवनकाल में अनगिनत आंधियों, तूफानों और संघर्षों का सामना किया था। उसके बड़े-बड़े सफेद दांत, जो कभी उसकी जवानी में उसकी ताकत और शान का प्रतीक हुआ करते थे, अब उम्र के ढलने के साथ काफी घिस चुके थे और कमजोर पड़ गए थे। फिर भी, उसकी आँखों में एक ऐसा अलौकिक तेज, एक अगाध गहराई और एक शांत स्थिरता थी, जो किसी भी बड़े से बड़े शिकारी या भयंकर जीव को भी स्तब्ध कर देती थी। जब वह अपनी भारी-भरकम चाल से जंगल के संकरे रास्तों और घनी झाड़ियों से गुजरता था, तो उसके पैरों की आहट से पूरी धरती मानों सम्मान में कांप उठती थी। वह जंगल का कोई स्वार्थी राजा नहीं था, जो ताकत के बल पर राज करता हो, बल्कि वह एक ऐसा संरक्षक था जिसे हर जीव अपनी इच्छा से अपना मार्गदर्शक और पिता तुल्य मानता था।

 

बूढ़ा हाथी अपने अत्यधिक शांत, गंभीर और धैर्यवान स्वभाव के लिए पूरे इलाके में प्रसिद्ध था। जंगल में जब भी कभी दो शक्तिशाली दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाती, या फिर भोजन और पानी के बंटवारे को लेकर तनाव पैदा हो जाता, तो वे सभी अंततः इसी बूढ़े हाथी के पास न्याय और मार्गदर्शन के लिए आते थे। उसकी लंबी जिंदगी का अनुभव इतना विराट था कि जंगल की हर जटिल समस्या का समाधान उसके पास मिल जाता था। वह कभी भी बिना किसी ठोस कारण के क्रोधित नहीं होता था और न ही कभी उसने अपनी विशालता का दुरुपयोग करके किसी छोटे या कमजोर जीव को डराया या सताया था। इसके विपरीत, वह हमेशा छोटे जीवों की रक्षा करने के लिए सबसे आगे रहता था। जब कभी गर्मियों के भीषण मौसम में आसमान से अंगारे बरसते और जंगल के छोटे-छोटे नाले और तालाब सूखने लगते, तो पूरा जीव-जंतु जगत हताश होकर इसी बूढ़े हाथी की ओर देखता था। उसकी दूरदर्शिता और पैनी नजरें उन गुप्त रास्तों को पहचानती थीं जो आम जानवरों की पहुंच से कोसों दूर हुआ करते थे। वह अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में भी केवल एक ही उद्देश्य के साथ जी रहा था—अपने पूरे जंगल परिवार की रक्षा करना, उन्हें एकजुट रखना और आने वाली पीढ़ियों को जीवन के सबसे मूल्यवान सबक सिखाना। उसके लिए पूरा जंगल उसका अपना परिवार था, और हर एक पत्ता, हर एक जीव उसकी अपनी संतान के समान था।

 

जंगल के छोटे बच्चे, चाहे वे उछल-कूद करने वाले बंदरों की टोलियां हों, मैदानों में दौड़ने वाले हिरणों के नटखट शावक हों, या फिर झाड़ियों में छिपकर खेलने वाले तेंदुए के छोटे बच्चे हों, वे सभी बूढ़े हाथी के सबसे प्रिय मित्र थे। वे बिना किसी डर के इस विशालकाय जीव के करीब आ जाते थे। छोटे बंदर उसकी लंबी और शक्तिशाली सूंड को पकड़कर उस पर झूला झूलते थे और अपनी किलकारियों से पूरे जंगल को गुंजायमान कर देते थे। हिरण के बच्चे उसकी विशालकाय और गर्म पीठ पर चढ़कर सवारी का आनंद लेते थे। बूढ़ा हाथी भी बच्चों के इस असीम प्रेम और नटखटपन से कभी विचलित नहीं होता था, बल्कि वह बड़ी ही आत्मीयता, धैर्य और स्नेह के साथ उनके हर खेल को सहन करता था। जब कभी कोई बच्चा खेल-खेल में भटक जाता या किसी मुसीबत में फंस जाता, तो बूढ़ा हाथी अपनी सूंड के सहारे उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देता था। वह बच्चों को यह भी सिखाता था कि जंगल का कानून क्या है, कैसे खतरे की आहट मिलते ही सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी चाहिए, और कैसे एकता के सूत्र में बंधकर बड़े से बड़े संकट का मुकाबला किया जा सकता है। युवा जानवर उसे अपना परम गुरु मानते थे और उसकी हर एक सीख को अपने जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानते थे। उसके सानिध्य में रहने वाले हर जीव के मन से डर हमेशा के लिए गायब हो जाता था, क्योंकि वे जानते थे कि जब तक यह बूढ़ा हाथी उनके बीच मौजूद है, तब तक कोई भी बाहरी खतरा उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता।

 

लेकिन, जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ा, इस प्राचीन जंगल की शांत और नैसर्गिक लय में व्यवधान उत्पन्न होने लगा। इंसानी बस्तियां धीरे-धीरे जंगल की हरी-भरी सीमाओं को काटते हुए भीतर की ओर बढ़ने लगीं। बड़े-बड़े पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों के वाणिज्यिक दोहन के कारण जानवरों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ने लगा, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में एक भयंकर असंतुलन पैदा हो गया। बूढ़ा हाथी इस आसन्न संकट को बहुत गहराई से महसूस कर रहा था। वह समझ चुका था कि अब वह समय आ गया है जब उसे केवल अपने परिवार की देखभाल ही नहीं करनी है, बल्कि इंसानों के इस आधुनिक और विनाशकारी लालच के खिलाफ एक मौन लेकिन दृढ़ प्रतिरोध भी खड़ा करना है। उसने कई बार अपनी इन बूढ़ी आंखों से इंसानों को जंगल की पवित्र सीमा लांघते हुए देखा था। कुछ लोग उसकी विशाल काया को देखकर भयभीत होकर लौट जाते थे, लेकिन कुछ ऐसे लालची लोग भी थे जो उसकी तरफ गंदी नजरों से देखते थे, जिनकी निगाहें उसके कीमती और प्राचीन सफेद दांतों पर टिकी होती थीं। ऐसे लोभी इंसानों के मन में प्रकृति के प्रति कोई सम्मान नहीं था, वे केवल धन और अपने स्वार्थ के अंधेरे में डूबे हुए थे। इसके बावजूद, बूढ़ा हाथी कभी भी बिना सोचे-समझे आक्रामक नहीं हुआ। उसकी शांत और अडिग निगाहें हर आने वाले खतरे को भांप लेती थीं, और वह अपने भीतर एक अजीब सी अटूट शक्ति महसूस करता था जो उसे अपनी माटी और अपने परिवार की रक्षा के लिए आखिरी सांस तक लड़ने की प्रेरणा देती थी।

 

एक वर्ष प्रकृति ने अपनी सबसे विकराल और क्रूर परीक्षा ली। उस साल आसमान में एक भी बादल नहीं मंडराया और सूरज ने अपनी सारी आग इस धरती पर उड़ेल दी। भीषण गर्मी के कारण जंगल की नदियां, झीलें और पारंपरिक तालाब पूरी तरह सूखकर बंजर जमीन में तब्दील हो गए। धरती फट गई और दूर-दूर तक पानी की एक बूंद भी दिखाई नहीं देती थी। इस भीषण सूखे ने पूरे जंगल में हाहाकार मचा दिया। पानी की एक-एक बूंद के लिए त्राहि-त्राहि मच गई। प्यास से बेहाल जानवर पानी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे और कई कमजोर जीव तो रास्ते में ही दम तोड़ने लगे। जंगल के उस पुराने और शांत वातावरण में अब केवल डर, निराशा और मौत की चीखें गूंज रही थीं। ऐसे अत्यंत कठिन और आपदा से भरे समय में एक बार फिर पूरे जंगल की उम्मीदें और निगाहें केवल और केवल उस बूढ़े हाथी पर आकर टिक गईं। सभी जानवर अपनी तमाम परेशानियों को भुलाकर बूढ़ा हाथी के पास पहुंचे और उससे अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई। उनकी आँखों में आंसू थे और गले सूखे हुए थे। बूढ़ा हाथी कुछ देर के लिए अपनी बड़ी-बड़ी आंखें बंद करके खड़ा हो गया और अपनी असीम स्मृति के पन्नों को पलटने लगा। उसे अपने बचपन और जवानी के दिनों का एक ऐसा गुप्त और भूला हुआ रास्ता याद आया, जिसके बारे में आज के युवा जानवरों को कोई जानकारी नहीं थी। उस रास्ते के अंत में जमीन के भीतर मीठे पानी का एक विशाल और गुप्त सोता हुआ करता था, जो बड़े-बड़े चट्टानी पहाड़ों के पीछे छिपा हुआ था।

 

लेकिन उस गुप्त जलस्रोत तक पहुंचना कोई साधारण काम नहीं था। वह रास्ता बहुत ही दुर्गम, जोखिम भरा और लंबा था। वहां तक पहुंचने के लिए खूंखार चट्टानों के बीच से गुजरना पड़ता था और रास्ते में कई दलदली इलाके थे जो किसी को भी अपने अंदर समा सकते थे। इसके बावजूद, बिना एक पल भी गंवाए, बूढ़े हाथी ने अपने पूरे परिवार और जंगल के उन तमाम प्यासे जानवरों को इकट्ठा किया जो उस लंबी यात्रा को तय करने में सक्षम थे। उसने अपनी भारी आवाज में एक ऐसा धीमा और आश्वस्त करने वाला नाद निकाला, जिसने सभी के मुरझाए हुए दिलों में फिर से जान फूंक दी। उसने खुद इस कठिन यात्रा की अगुवाई करने का फैसला किया। उसकी चाल भले ही अब उम्र के कारण धीमी हो गई थी, लेकिन उसके भीतर का संकल्प किसी चट्टान से भी ज्यादा मजबूत था। यात्रा शुरू होते ही मुश्किलें सामने आने लगीं। रास्ते के नुकीले पत्थर जानवरों के पैरों को लहूलुहान करने लगे और चिलचिलाती धूप ने सबकी बची-खुची ऊर्जा को भी सोख लिया। कई युवा और ताकतवर जानवर रास्ते में ही थककर हार मानने लगे और बैठने लगे। ऐसे मौकों पर बूढ़ा हाथी कभी आगे निकलने की जल्दी नहीं करता था। वह रुकता, अपनी लंबी और मजबूत सूंड से उन थके हुए जानवरों को प्यार सेसहलाता, उन्हें उठाता और अपने साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहता था। उसने खुद सबसे आगे रहकर उन बड़ी-बड़ी चट्टानों और कांटों भरी झाड़ियों को अपनी विशाल देह से हटाया, ताकि पीछे आ रहे उसके साथियों को कम से कम कठिनाइयों का सामना करना पड़े। उसके अपने पुराने पैर कई जगहों से छिल चुके थे और जख्मी हो गए थे, और उसे भारी सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी, लेकिन उसके मन में अपने साथियों को बचाने की जो जिजीविषा और अटूट प्रेम था, उसने उसे एक पल के लिए भी कमजोर नहीं पड़ने दिया।

 

कई दिनों और रातों की निरंतर, थका देने वाली और दर्दनाक यात्रा के बाद, आखिरकार बूढ़ा हाथी सबको उस छिपे हुए और अमूल्य जलस्रोत तक ले आने में सफल हो गया। जैसे ही जानवरों ने उस ठंडे, स्वच्छ और मीठे पानी को देखा, उनकी सारी थकान और पीड़ा पल भर में हवा हो गई। वे खुशी से झूम उठे और दौड़कर उस पानी में उतर गए। अपनी सूंड भरकर पानी पीने और अपने शरीर पर डालने का जो सुख उस समय उन्हें मिला, उसका शब्दों में वर्णन करना असंभव था। उस ठंडे पानी को पीकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो मृत्यु की कगार पर खड़े उस पूरे जंगल को एक नया और अलौकिक जीवन मिल गया हो। छोटे-छोटे शावकों और कमजोर जीवों की जान में जान आ गई, और पूरे जंगल का वातावरण फिर से एक सकारात्मक ऊर्जा और जीवंतता से भर गया। सभी जानवरों की आंखें कृतज्ञता और सम्मान के आंसुओं से भर आईं। वे सब उस बूढ़े हाथी के चारों ओर एक सुरक्षा घेरे की तरह खड़े हो गए और अपनी-अपनी ध्वनियों में उसका आभार व्यक्त करने लगे। लेकिन बूढ़ा हाथी इन तमाम जयकारों और प्रशंसाओं से बहुत दूर, पानी के एक कोने में चुपचाप खड़ा होकर बस मुस्कुरा रहा था। उसके चेहरे पर जो संतोष और शांति थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि उसने अपने जीवन के सबसे बड़े कर्तव्य को पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ निभा दिया था। उसे अब इस बात का कोई मलाल नहीं था कि उसके शरीर को कितनी पीड़ा उठानी पड़ी है, क्योंकि उसके अपने जीवित और सुरक्षित थे।

 

लेकिन इस बड़ी सफलता और राहत के कुछ ही हफ्तों बाद, जंगल पर एक और बहुत बड़ा और गहरा संकट मंडराने लगा। इस बार खतरा प्रकृति का नहीं, बल्कि इंसानी लालच और क्रूरता का था। कुछ खूंखार और लालची शिकारी, जो अवैध रूप से वन्यजीवों के अंगों की तस्करी करते थे, गुप्त रूप से जंगल के बहुत भीतर तक घुस आए थे। उनका एकमात्र और मुख्य उद्देश्य किसी भी कीमत पर उस बूढ़े हाथी के विशाल और कीमती सफेद दांतों को हासिल करना था। इन शिकारियों ने आधुनिक हथियारों, नुकीले भालों और दूर तक फैलने वाले खतरनाक जालों के साथ जंगल के चप्पे-चप्पे को घेरना शुरू कर दिया था। जब जंगल के अन्य समझदार जानवरों और पक्षियों को इस जानलेवा खतरे की भनक लगी, तो वे बुरी तरह सहम गए। वे किसी भी कीमत पर यह नहीं देखना चाहते थे कि उनके महान मार्गदर्शक, रक्षक और प्रिय बुजुर्ग पर कोई भी आंच आए। हिरणों, बंदरों और पक्षियों ने मिलकर एक योजना बनाई और बूढ़ा हाथी के पास जाकर अनुरोध किया कि वह किसी सुरक्षित और गुप्त गुफा में छिप जाए, जहां शिकारी उसे ढूंढ न सकें। लेकिन बूढ़ा हाथी ने बहुत ही शांत और दृढ़ स्वर में उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उसने अपने साथियों को समझाया कि डरकर छिपने से कभी भी समस्या का समाधान नहीं होता है, और संकट की इस घड़ी में अपनी माटी को छोड़कर पीठ दिखाना उसके स्वाभिमान के खिलाफ है। उसने कहा कि अन्याय और लालच के सामने झुकने से बेहतर है कि उनका डटकर सामना किया जाए, चाहे इसके लिए जो भी मूल्य चुकाना पड़े।

 

अपनी इस अटूट और साहसिक प्रतिज्ञा के साथ, बूढ़ा हाथी धीरे-धीरे उस दिशा में आगे बढ़ने लगा जहां से शिकारियों के आने की गंध और आहट आ रही थी। वह अकेला था, उसके पास इंसानों जैसे आधुनिक हथियार नहीं थे, लेकिन उसकी आंतरिक हिम्मत, उसका विशाल अनुभव और उसकी बुद्धि किसी भी बड़ी सेना से कहीं अधिक शक्तिशाली थी। उसने अपनी रणनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए शिकारियों को एक ऐसे रास्ते की तरफ खींचना शुरू कर दिया, जो घने जंगल के बीच एक बहुत बड़े, खतरनाक और गहरे दलदली इलाके से होकर गुजरता था। शिकारी जब उस विशाल हाथी के पैरों के निशान देखते हुए आगे बढ़ रहे थे, तो उन्हें लगा कि यह बूढ़ा जानवर अब बूढ़ा और लाचार हो चुका है और आसानी से उनके जाल में फंस जाएगा। वे अपनी जीत के घमंड में अंधे होकर उसकी तरफ तेजी से लपके, लेकिन वे इस भयंकर सच्चाई से पूरी तरह अनजान थे कि उस जंगल की एक-एक इंच जमीन, उसका हर एक पत्ता और उसका हर एक कोना बूढ़ा हाथी की हथेलियों की तरह वाकिफ था। जैसे ही शिकारी उस दलदली क्षेत्र के बिलकुल करीब पहुंचे, बूढ़ा हाथी ने एक ऐसा भयानक और गूंजता हुआ चीत्कार किया, जो पूरे जंगल के आसमान में गूंज उठा। उसकी वह दहाड़ इतनी तीव्र और प्रकंपित करने वाली थी कि उसे सुनकर शिकारियों के हाथ से हथियार छूट गए और उनके होश उड़ गए। वे डर के मारे बुरी तरह कांपने लगे और अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन उस भगदड़ और दहशत में, कई शिकारी खुद ही उस गहरे दलदल और कटीली झाड़ियों के जाल में फंसते चले गए, जहां से निकलना उनके लिए नामुमकिन साबित हुआ।

 

शिकारियों के उस खतरनाक दल को पूरी तरह खदेड़ने और भगाने के बाद, बूढ़ा हाथी थोड़ा रुका और उसने राहत की लंबी सांस ली। लेकिन उस संघर्ष के दौरान उसके शरीर की जो बची-खुची ऊर्जा थी, वह भी लगभग समाप्त हो चुकी थी। उसने अपने भीतर महसूस किया कि अब उसके शरीर के अंग और उसकी कोशिकाएं पूरी तरह जवाब दे रही हैं। उसकी सांसें बहुत भारी और धीमी हो चुकी थीं, और उसके विशाल पैरों में अब वह वजन उठाने या एक कदम भी आगे बढ़ाने की शक्ति नहीं बची थी जो कभी इस धरती को कंपा देती थी। वह अच्छी तरह समझ चुका था कि उसकी इस लंबी, संघर्षपूर्ण और अर्थपूर्ण यात्रा का अंतिम पड़ाव अब आ चुका है। उसने अपनी बची हुई थोड़ी सी ऊर्जा को समेटा और बहुत ही धीमी, शांत चाल से चलते हुए उसी प्राचीन और विशाल वटवृक्ष के पास जा पहुंचा, जिसके विशाल छत्र के नीचे उसने अपने जीवन के कई अनगिनत दशक बिताए थे। उस वटवृक्ष की ठंडी छांव हमेशा से उसका सबसे बड़ा विश्राम स्थल रही थी। जब वह वहां पहुंचा, तो उसने देखा कि जंगल के सारे जानवर, पक्षी और छोटे-छोटे जीव अपने उस प्यारे और महान हाथी को अंतिम विदाई देने के लिए पहले से ही वहां बड़ी संख्या में जमा हो चुके थे। किसी की भी आंखें सूखी नहीं थीं; हर जानवर की नम आंखों में एक अगाध शोक, एक गहरा सम्मान और अपने प्रिय मार्गदर्शक के प्रति अटूट प्रेम साफ झलक रहा था। हवा में एक अजीब सी खामोशी और भारीपन छा गया था, मानो पूरा ब्रह्मांड इस महान क्षण की गंभीरता को महसूस कर रहा हो।

 

बूढ़ा हाथी उस प्राचीन वटवृक्ष की मजबूत जड़ों के पास बहुत ही आराम से और शांति के साथ लेट गया। उसकी विशाल देह अब पूरी तरह स्थिर हो चुकी थी। उसने अपनी लंबी और शक्तिशाली सूंड को एक आखिरी बार बहुत ही प्यार से ऊपर उठाया और हवा में धीरे से लहराया, मानो वह अपने पूरे जंगल परिवार, उन नटखट बंदरों, प्यारे शावकों और सभी मूक जीवों को एक अंतिम और स्नेहिल विदाई दे रहा हो। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं, और उसके चेहरे पर किसी प्रकार का कोई डर या कष्ट नहीं था, बल्कि एक परम शांति, असीम संतोष और पूर्णता का भाव व्याप्त था। उसने अपने पूरे जीवन में कभी किसी का अहित नहीं किया था, कभी किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया था, और हमेशा धर्म, करुणा और न्याय के मार्ग पर अटूट रहकर अपना जीवन जिया था। जब उसने अपनी जीवन की अंतिम सांस ली, तो ऐसा लगा मानो कुछ पलों के लिए इस पूरे जंगल की धड़कनें पूरी तरह थम गईं हों। पेड़ों से हवाओं का चलना अचानक रुक गया, पत्तों की वह चिर-परिचित सरसराहट भी शांत हो गई, और प्रकृति ने खुद उस महान आत्मा के सम्मान में अपनी गति रोक दी। चारों तरफ एक गहरी और पवित्र खामोशी छा गई, जो उस युगपुरुष हाथी को उसकी महान सेवाओं के लिए एक मौन और सर्वव्यापी श्रद्धांजलि दे रही थी।

 

वह बूढ़ा हाथी शारीरिक रूप से भले ही हमेशा के लिए इस नश्वर दुनिया से विदा हो गया था, लेकिन उसकी अनगिनत यादें, उसके महान कार्य और उसके द्वारा दिए गए जीवन के पाठ हमेशा-हमेशा के लिए उस जंगल के कण-कण, हवाओं और पेड़ों की छाल में बस गए। आने वाली पीढ़ियां और नए शावक हमेशा उस महान हाथी की बहादुरी, बुद्धिमत्ता और बलिदान की कहानियों को एक-दूसरे को बड़े चाव से सुनाती रहीं। उसके शरीर के वे सफेद दांत भले ही इंसानी शिकारियों के लालच और क्रूरता का केंद्र बने रहे हों, लेकिन उसका असली और अमर खजाना उसका बहुत बड़ा दिल, उसकी असीम दया, उसकी क्षमाशीलता और उसकी महान दूरदर्शिता थी, जिसे कोई भी शिकारी या लालची इंसान कभी चुरा नहीं सका। जंगल के वे युवा जानवर अब पूरी तरह बड़े हो चुके थे और वे पूरी जिम्मेदारी के साथ उसी रास्ते पर चल रहे थे जो बूढ़ा हाथी उन्हें सिखाकर गया था। वे अब खुद जंगल की हर एक मुसीबत से अपने परिवार की रक्षा करते थे। इस तरह वह साधारण सा दिखने वाला बूढ़ा हाथी इस संसार में अमर हो गया, और आज भी उस प्राचीन जंगल की सुदूर हवाओं में उसकी बहादुरी, न्यायप्रियता और बुद्धिमत्ता की दास्तान गूंजती रहती है, जो हर सुनने वाले के दिल में एक नई प्रेरणा और साहस का संचार कर देती है।

 

Comments

Popular posts from this blog

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...