प्रकृति के अंचल में फैले एक महाप्राण वन के मध्य में, सहस्रों वर्षों से एक अति
प्राचीन और विराट वटवृक्ष स्थित था, जिसकी जटाएं अंतरिक्ष को स्पर्श करने की अदम्य
अभिलाषा रखती थीं। उस महान वृक्ष की गहन छांव और विशालकाय शाखाओं का संकुल एक
संपूर्ण ब्रह्मांड की भांति था, जहाँ अनगिनत जीवों, कीट-पतंगों और विहंगों का समष्टिगत लोक बसता था।
उस अरण्य के इस विशिष्ट जीवमंडल में चिंकी नाम की एक छोटी, चंचल और अत्यंत परिश्रमी
गौरैया का वास था। चिंकी का जीवन किसी मानवेतर प्रेरणा के बिना, केवल प्रकृति
के शाश्वत नियमों, स्वतःस्फूर्त प्रज्ञा और जीवन की मूल प्रेरणाओं से संचालित
होता था। वसंत की वे बेलाएँ थीं जब प्रकृति अपनी शीतकालीन निद्रा का परित्याग कर
स्वर्णमयी धूप और नवपल्लवों के श्रृंगार से सज रही थी। उस सुवासित वेला में चिंकी
के अंतस में एक सहज और अदम्य स्पंदन जागा, जिसने उसे अपने अस्तित्व के एक नए चरण, अर्थात्
वंश-विस्तार और आशियाना निर्माण की ओर प्रेरित किया। वह प्रेरणा किसी बाह्य उपदेश
या निर्देश का परिणाम नहीं थी, बल्कि वह उस प्राणवान प्रकृति का ही एक आंतरिक स्वर था जो
हर जीव को अपने वंश को आगे बढ़ाने का अमर संदेश देता है।
आशियाने के निर्माण के लिए चिंकी ने उस महावट की एक अत्यंत सुदृढ़, घनघोर पत्तियों
से आच्छादित और उत्तर-पूर्वी दिशा की ओर फैली हुई शाखा को चुना। वह स्थान तेज
प्रहार करने वाले चक्रवातों, ग्रीष्म की तीव्र धूप और मूसलाधार वृष्टि से पूरी तरह
सुरक्षित था। एक अरुणोदय की बेला में, जब खग कुल अपनी प्रभाती गूंज से अरण्य को जागृत
कर रहा था, चिंकी ने अपने इस वृहद संकल्प का श्रीगणेश किया। तिनके की खोज में उसका यह
पावन अभियान अरण्य के विस्तृत छोरों तक फैल गया। तृण-तृण का संचयन कोई साधारण
कार्य नहीं था; इसके लिए उसे अनगिनत योजन दूर फैले घास के मैदानों, सूखी सरकंडों
से भरे ताल-तटीय क्षेत्रों और वनों के सघन अंतःस्थलों तक उड़ान भरनी पड़ती थी। कभी
उसे धूप में तपकर कड़क हुई घास का कोई उत्कृष्ट टुकड़ा मिलता, तो कभी किसी
झाड़ी की कोटर से मजबूत और लचीली जड़ें खींचकर निकालनी पड़ती थीं। अपनी नन्हीं सी
चोंच में इन पदार्थों को दबाकर, गुरुत्वाकर्षण और हवा के प्रतिरोध के विरुद्ध संघर्ष करते
हुए उसे वापस उस वटवृक्ष तक लौटना होता था।
वह प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य और धैर्य की पराकाष्ठा थी। जब चिंकी तिनकों को
उस वटवृक्ष की शाखा पर लाकर रखती और उन्हें आपस में गूंथने का प्रथम प्रयास करती,
तो प्रकृति के
वेगवान झकोरे उसके घंटों के परिश्रम को पलभर में छिन्न-भिन्न कर देते थे। कई बार
तिनकों का वह कच्चा ढांचा नीचे भूमि पर जा गिरता, और उसके साथ ही उसकी सारी
मेहनत धूल में मिल जाती थी। ऐसी क्षणिक निराशाओं में, उस मूक प्राणी के पास विलाप
करने या किसी से सहायता मांगने का कोई विकल्प नहीं था। वह केवल मौन भाव से अपनी
दुर्बलताओं का आकलन करती, प्रकृति की गति को समझती और पुनः दोगुनी ऊर्जा के साथ उसी
कार्य में प्रवृत्त हो जाती। उसने अपनी सहज प्रज्ञा से तिनकों को आपस में उलझाकर
एक विशेष प्रकार की गांठ बनाने की कला सीखी। धीरे-धीरे, उसकी चोंच की निपुणता और
उसके अदम्य पुरुषार्थ के फलस्वरूप एक गोलार्द्ध, प्यालेनुमा और अत्यंत
सुदृढ़ ढांचे का निर्माण होने लगा। वह ढांचा न केवल तिनकों का समूह था, बल्कि वह उसके
असीम धैर्य, एकाग्रता और जीवटता का जीवंत दस्तावेज बन रहा था।
बाहरी आवरण के सुदृढ़ होने के उपरांत, चिंकी ने उस घोंसले के आंतरिक भाग को नवजात
जीवों की कोमलता के अनुकूल बनाने का एक और कठिन अभियान आरंभ किया। उसने अरण्य के
विभिन्न कोनों से रुई के समान उड़ने वाले पादप रेशे, पुष्पों के पराग-कोश,
वटवृक्ष की
कोमल छाल की बारीक छलनियां और अन्य विहंगों द्वारा छोड़े गए अत्यंत मुलायम पंखों
को चुन-चुनकर एकत्र किया। प्रत्येक तंतु और प्रत्येक पंख को उसने इस प्रकार
व्यवस्थित किया कि वह न केवल शीतकाल में उष्णता प्रदान कर सके, बल्कि ग्रीष्म
और वर्षा में भी एक समशीतोष्ण वातावरण का सृजन कर सके। लगभग पंद्रह दिवस के अनवरत
श्रम के पश्चात, वह कलाकृति बनकर पूर्ण हुई। वह घोंसला इस प्रकार से वटवृक्ष
की पत्तियों के विन्यास के बीच छिपा हुआ था कि किसी भी दूरगामी शिकारी की दृष्टि
उस तक पहुंच ही नहीं सकती थी। उस पूर्णता को प्राप्त कर, चिंकी की आंखों में एक मौन
संतोष और अवर्णनीय तृप्ति का भाव तैर गया, जो किसी भी शब्द या मानवेतर भाषा से परे था।
उस सुंदर आशियाने के निर्माण के कुछ ही सूर्य चक्रों के पश्चात, उसी महावट के
पश्चिमी छोर पर निवास करने वाला चिकू नामक एक बलिष्ठ, साहसी और ओजस्वी पक्षी उस
क्षेत्र में आया। चिकू की उड़ान में एक अद्भुत गति थी और उसकी स्वर-लहरी में वनों
की मुक्त हवाओं का नाद समाहित था। जब चिकू ने उस एकांत शाखा पर चिंकी द्वारा
निर्मित उस अद्वितीय और कलात्मक घोंसले को देखा, तो वह उसकी वास्तुकला और
उसके अगाध परिश्रम पर पूरी तरह मुग्ध हो गया। वह कुछ क्षणों तक उस आशियाने के
चारों ओर मंडराता रहा, और फिर एक विशिष्ट, सौहार्दपूर्ण स्वर में अपनी उपस्थिति का अहसास
कराया। चिंकी ने उस आगत का स्वागत अपने पंखों की एक सूक्ष्म थपकी और मधुर चहचहाहट
के साथ किया। वह मिलन किसी सामाजिक अनुबंध या अनुष्ठान का परिणाम नहीं था, बल्कि वह
प्रकृति के उस शाश्वत आकर्षण का सहज प्रस्फुटन था जो समस्त जीवों को एक सूत्र में
बांधता है। वे दोनों अब उस आशियाने के सहचर बन चुके थे, और उनके जीवन का यह नया
अध्याय समस्त संशयों से परे, प्रकृति के सानिध्य में आगे बढ़ रहा था।
सहचर्य के इस पवित्र बंधन के कुछ ही दिनों पश्चात, चिंकी ने उस घोंसले के
सुरक्षित गर्भ में तीन अत्यंत सूक्ष्म, सुडौल और हल्के नीले वर्ण के अंडों को जन्म दिया,
जिन पर भूरे
रंग के सुंदर चित्तीदार बिंदु अंकित थे। वे तीनों अंडे उस घोंसले की धड़कन बन गए।
अब चिंकी और चिकू का संपूर्ण अस्तित्व, उनकी समस्त ऊर्जा और उनकी हर एक उड़ान केवल उन
तीन अंडों की सुरक्षा और उष्णता के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई। चिंकी अधिकांश समय
उन अंडों पर बैठकर अपने शरीर की ऊष्मा उन्हें प्रदान करती, जबकि चिकू वटवृक्ष से दूर,
अरण्य के
विभिन्न क्षेत्रों में जाकर कीट-पतंगों और ऊर्जावान बीजों की खोज करता, ताकि वह अपनी
सहचरी को समय पर पोषण दे सके। उनका यह श्रम विभाजन पूरी तरह नैसर्गिक और स्वचालित
था, जिसमें किसी भी प्रकार के विवाद, स्वार्थ या संकोच का कोई स्थान नहीं था। वे
दोनों भली-भांति जानते थे कि उनका यह संयुक्त उत्तरदायित्व ही उनके वंश के भविष्य
की एकमात्र कुंजी है।
ग्रीष्म की मद्धम ऊष्मा के पश्चात, अरण्य के ऊपर मानसून के प्रलयकारी मेघों ने अपना
आधिपत्य जमा लिया। आकाश में सघन काले मेघों का साम्राज्य छा गया, और वायुमंडल
में एक भारी और डरावनी शांत घुटन भर गई। अचानक, प्रकृति अपने सबसे रौद्र और
विकराल रूप में प्रकट हुई। मूसलाधार वृष्टि के साथ-साथ भयंकर चक्रवातीय आंधी ने उस
महावट की जड़ों से लेकर शाखाओं तक को झकझोर कर रख दिया। वह आंधी इतनी तीव्र थी कि
बड़े-बड़े वृक्षों के तने चीखने लगे और अनगिनत छोटे जीव अपनी रक्षा के लिए इधर-उधर
भागने लगे। उस भयंकर प्रलय के मध्य, चिंकी और चिकू का वह घोंसला भी मृत्यु के मुख के
समान प्रतीत होने वाली उस आंधी में तिनके की भांति हिलने लगा। तेज वर्षा की सुई
जैसी बूंदें जब गिरने लगीं, तो चिंकी ने बिना एक क्षण गंवाए अपने पंखों को पूरी तरह से
फैला दिया और उन तीनों अंडों को अपने वक्ष-स्थल और कोमल पंखों के नीचे इस प्रकार
छुपा लिया कि एक बूंद भी उन तक न पहुंच सके।
किंतु संकट केवल ऊपर से नहीं था, बल्कि चारों ओर से था। चिकू ने अपनी सहचरी और उन
अंडों के ठीक ऊपर अपने शरीर का एक अजेय आवरण बना लिया। वह स्वयं आंधी के थपेड़ों,
मूसलाधार पानी
की धाराओं और कड़कती हुई बिजलियों के बीच अडिग खड़ा रहा, ताकि उसका पूरा शरीर एक कवच
की भांति चिंकी और उस आशियाने की रक्षा कर सके। वह पूरी रात अरण्य के उस
महासंग्राम में बिना हिले-डुले, अपनी समस्त प्राण-शक्ति को केंद्रित किए हुए डटे रहे। उनके
उस मूक, निःस्वार्थ और अगाध प्रेम के आगे प्रकृति का वह विकराल रूप भी जैसे पस्त होने
लगा। जब अगले दिन सूर्य की पहली किरण ने उन काले मेघों को चीरकर अपनी छटा बिखेरी,
तो अरण्य का वह
दृश्य शांत हो चुका था। चिंकी और चिकू का वह तिनकों का आशियाना कुछ तिरछा अवश्य हो
गया था, किंतु वह अपनी जगह पर दृढ़ता से टिका हुआ था। उनके वे तीनों अंडे पूरी तरह
सुरक्षित थे, और माता-पिता की उस महान तपस्या ने जीवन की एक और कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक
पार कर लिया था।
वह पावन बेला भी शीघ्र ही आ पहुँची, जिसका वे दोनों न जाने कितने दिनों से प्रतीक्षा
कर रहे थे। एक शांत प्रातःकाल, जब ओस की बूंदें पत्तियों से टपक रही थीं, अंडों के भीतर
से एक अत्यंत सूक्ष्म, स्पंदित करने वाली खड़खड़ाहट की ध्वनि सुनाई दी। चिंकी ने
अपनी पलकों को स्थिर करके उस ध्वनि पर अपनी संपूर्ण चेतना केंद्रित कर दी। सबसे
पहले, केंद्र में स्थित एक अंडे पर एक नन्हीं सी चोंच की आंतरिक ठोकर पड़ी, जिससे उस पर एक
महीन रेखा जैसी दरार उभर आई। उस प्रथम क्रैक के साथ ही जीवन की उस अज्ञात शक्ति ने
अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। कुछ ही घंटों के अंतराल में, एक के बाद एक तीनों अंडों
के आवरण टूट गए, और उनसे तीन अत्यंत छोटे, गीले, पंखहीन और
पारदर्शी से दिखने वाले चूजे बाहर आ गए। उनकी आंखें अभी तक बंद थीं, उनके शरीर पर
कोई आवरण नहीं था, और वे अपनी दुर्बलता के कारण केवल हल्के से कंपन कर रहे थे।
किंतु उनके मुख से निकलने वाली वह नन्हीं, क्षीण और जीवन से भरी हुई चीख उस पूरे वटवृक्ष
की डालियों में गूंज उठी।
चिंकी और चिकू के उस संपूर्ण अस्तित्व में एक अभूतपूर्व और अकल्पनीय आनंद की
लहर दौड़ गई। वे दोनों अपने नवजात शिशुओं को देखकर इस प्रकार पुलकित हो उठे मानो
उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड को जीत लिया हो। अब उस छोटे से घोंसले में एक नए जीवन
का कोलाहल आरंभ हो चुका था। उन तीन नन्हें चूजों का भरण-पोषण करना अब उस दंपत्ति
के लिए एक महाअभियान बन गया था। चूजों की भूख असीम थी; जैसे ही वे अपनी चोंचें ऊपर
की ओर फैलाते, चिंकी और चिकू को तुरंत ही भोजन की तलाश में निकलना पड़ता
था। वे दिनभर अरण्य के चप्पे-चप्पे को छान डालते—कभी किसी सड़े हुए तने के भीतर
छिपे कीटों को निकालते, तो कभी घास के बीजों को अपनी चोंच में भरकर लाते। वे स्वयं
उस समय तक कुछ ग्रहण नहीं करते थे जब तक कि उनके तीनों बच्चे तृप्त नहीं हो जाते
थे। कई बार ऐसा भी होता था कि दिनभर के अथक परिश्रम के पश्चात भी उन्हें पर्याप्त
भोजन नहीं मिल पाता था, किंतु वे स्वयं भूखे रहकर भी अपने बच्चों की जीवन-ऊर्जा को
बनाए रखते थे।
सप्ताह बीतते गए, और प्रकृति के पोषण तथा माता-पिता के उस अनवरत समर्पण के
फलस्वरूप वे तीनों चूजे अब तेजी से आकार लेने लगे। उनके उन नग्न शरीरों पर अब
सुनहरे, भूरे और मखमली पंखों का एक सुंदर आवरण उग आया था। उनकी आंखें पूरी तरह खुल
चुकी थीं, और उनकी दृष्टियाँ अब उस वटवृक्ष की परिधि से बाहर निकलकर दूर तक फैले हुए
अनंत आकाश को निहारने लगी थीं। उनका वह घोंसला, जो कभी उनके लिए एक विशाल
महल की भांति प्रतीत होता था, अब उनके बढ़ते हुए शरीरों के कारण अत्यंत संकीर्ण होने लगा
था। वे बार-बार अपने नए और शक्तिशाली पंखों को फड़फड़ाने का अभ्यास करते, घोंسले की मुंडेर
पर खड़े होकर नीचे की उस हरी-भरी पृथ्वी को देखते, और उड़ने की उस अदम्य लालसा
को महसूस करते जो उनके भीतर हिलोरे ले रही थी। वे समझ चुके थे कि उनका वह आशियाना
अब उनके जीवन का अंतिम गंतव्य नहीं है, बल्कि वह तो केवल उस अनंत आकाश की यात्रा का एक
शुरुआती प्रस्थान बिंदु मात्र था।
वह स्वर्णिम प्रातःकाल आ ही गया जब उस वटवृक्ष की शाखा पर एक ऐतिहासिक और
स्वाभाविक घटना घटी। चिकू घोंसले की सबसे ऊपरी और मजबूत शाखा पर जाकर बैठ गया और
उसने अपने पंखों को पूरी तरह फैलाकर एक विशिष्ट, ओजस्वी स्वर में आह्वान
किया। उस आह्वान को सुनते ही पहले चूजे ने अपने भीतर छिपी सारी संकोच और भय की
भावनाओं को त्याग दिया। उसने घोंसले के किनारे पर अपने पंजों को मजबूत किया,
अपने नव-विकसित
पंखों को तीव्र गति से फड़फड़ाया, और हवा में एक साहसिक छलांग लगा दी। कुछ क्षणों के लिए वह
वायु में लड़खड़ाया, किंतु उसकी सहज प्रज्ञा और पंखों की गति ने उसे संभाल लिया।
वह उड़ते हुए पास की ही एक दूसरी हरी-भरी डाल पर जाकर सुरक्षित रूप से उतर गया। उस
दृश्य को देखकर चिंकी के अंतस में संतोष की एक ऐसी शीतल धारा बही जो शब्दों में
व्यक्त नहीं की जा सकती थी। एक के बाद एक, तीनों बच्चों ने उस घोंसले की सुरक्षा का त्याग
किया और अपने माता-पिता के मार्गदर्शन में उस नीले गगन के अंचल में अपनी पहली
स्वतंत्र उड़ान भरी।
संध्या की वह शांत बेला जब उतरी, तो वह वटवृक्ष का घोंसला पूरी तरह सूना हो चुका
था। उसके वे तीनों बच्चे अब बड़े हो चुके थे और अपनी खुद की स्वतंत्र दुनिया का
निर्माण करने के लिए अरण्य के दूरदराज के क्षेत्रों में उड़ चुके थे। चिंकी और
चिकू, जो इस पूरी यात्रा के मुख्य शिल्पी थे, धीरे-धीरे उड़कर वापस उसी
पुराने, कुछ बिखरे हुए और तिनकों के उस जीर्णशीर्ण आशियाने में लौटे। यद्यपि अब उस
घोंसले की वह पहली जैसी चमक नहीं बची थी, उसके कई तिनके आंधी के थपेड़ों से बिखर चुके थे,
और उसकी
दीवारें कुछ ढीली पड़ चुकी थीं, किंतु उस छोटे से स्थान के कण-कण में उनके संघर्ष, उनके अटूट
प्रेम, उनके अनथक परिश्रम और उनके उस महान समर्पण की जीवंत स्मृतियां आज भी वैसी ही
पवित्र रूप में विद्यमान थीं। उन्होंने एक-दूसरे के अत्यंत समीप बैठकर उस सुनसान
और शांत आशियाने की ओर देखा, और प्रकृति के इस शाश्वत चक्र को स्वीकार करते हुए एक लंबी,
तृप्त और
संतोषी सांस ली। वह घोंसला मात्र सूखी घास और तिनकों का एक ढेर नहीं था, बल्कि वह उस
अरण्य के इतिहास में जीवंतता, त्याग और प्रेम का एक ऐसा अमर प्रतीक बन चुका था जो समय की
किसी भी सीमा से परे, प्रकृति के शाश्वत पन्नों पर सदा-सदा के लिए अंकित हो गया।
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