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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

मकड़ी का जाला और राजा

 



 

संध्या की लालिमा जब अवंती के गगनचुंबी महलों के स्वर्णशिखरों पर बिखरती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरी धरती ने सोने का आभूषण पहन लिया हो। विंध्याचल की तराई में बसा अवंती राज्य अपनी अतुलनीय संपदा, शांति, कला, संस्कृति और न्यायप्रियता के लिए पूरे आर्यावर्त में प्रसिद्ध था। यहाँ के खेतों में सोना उगलता था, नदियों का जल अमृत के समान शीतल था और प्रजा का जीवन संगीत की तरह मधुर और निश्चिंत था। इस महान राज्य के सिंहासन पर विराजमान थे महाराजा विक्रमादित्य। वे केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि अपनी प्रजा के लिए पिता, संरक्षक और मार्गदर्शक थे। उनकी न्यायप्रियता की चर्चाएं दूर-दूर के देशों तक फैली थीं। उनके दरबार में विद्वानों, संतों और कलाकारों का हमेशा सम्मान होता था। महाराजा विक्रमादित्य का जीवन अनुशासन, धर्म और पराक्रम का एक अद्भुत संगम था। वे सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाते थे, ध्यान करते थे और फिर प्रजा के कल्याण के लिए राज्य के कार्यों में जुट जाते थे। उनकी सेना अजेय थी और उनके सेनापति विक्रम सिंह की वीरता से शत्रु थर-थर कांपते थे। रानी मधुलिका के करुणा और दानशीलता के चर्चे हर घर में गूंजते थे। अवंती का यह स्वर्णकाल अपने चरम पर था, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी कोई साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तो ईर्ष्या की नजरें उस पर गड़ने लगती हैं।

 

अवंती के पूर्व में एक पहाड़ी और बंजर राज्य था— 'महिष्मती'। इस राज्य का राजा था सुबाहु। सुबाहु एक अत्यंत क्रूर, महत्त्वाकांक्षी और लोलुप शासक था। वह छल, कपट, हत्या और विश्वासघात को अपनी कूटनीति का सबसे बड़ा हथियार मानता था। उसके राज्य की बंजर भूमि और घटता हुआ खजाना उसे हमेशा बेचैन रखता था। वह लंबे समय से अवंती की हरियाली, उसकी अपार संपत्ति और उसके वैभव को हड़पने के सपने देख रहा था। उसने कई बार अपनी गुप्तचरी के माध्यम से अवंती की सीमाओं को टटोला था, लेकिन राजा विक्रमादित्य के मजबूत गुप्तचर तंत्र और सतर्क सेना के कारण उसकी दाल नहीं गल पा रही थी। वह शरद पूर्णिमा की रात थी। आकाश में पूरा चाँद अपनी समस्त कलाओं के साथ खिल रहा था। अवंती की राजधानी में 'शरदोत्सव' की धूम थी। महलों से लेकर झोपड़ियों तक दीपों की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। चारों ओर संगीत, नृत्य और उत्सव का उल्लास था। राज्य के अधिकांश सैनिक और नागरिक इस राष्ट्रीय उत्सव में मग्न थे। सेना को भी त्योहार के अवसर पर विशेष अवकाश और छूट दी गई थी। सीमाओं पर तैनात संतरियों की चौकसी भी उस रात उत्सव के रंग में थोड़ी ढीली पड़ गई थी। यही वह क्षण था जिसका सुबाहु इंतजार कर रहा था। उसने अपनी एक लाख से अधिक की विशाल और बर्बर सेना को दो हिस्सों में बांटा। एक हिस्से ने उत्तर दिशा से अचानक अवंती के मुख्य सीमावर्ती दुर्ग पर सोते हुए संतरियों को मौत के घाट उतार दिया, और दूसरे हिस्से ने सीधे राजधानी की ओर कूच कर दिया। इस अचानक और धोखेधड़ी वाले आक्रमण की भनक तक किसी को नहीं लगी।

 

आधी रात का सन्नाटा जब चीखों और तलवारों की खनक से गूंजा, तो महलों की नींद उड़ गई। राजा विक्रमादित्य तुरंत अपने शयनकक्ष से बाहर आए। उन्होंने अपनी स्वर्णजटित कवच धारण की और अपनी प्रसिद्ध तलवार 'असिराज' को हाथ में लिया। उन्होंने तुरंत अपने मंत्रियों और सेनापति को संदेश भेजा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शत्रु सेना राजधानी के मुख्य द्वारों को तोड़कर भीतर घुस चुकी थी। युद्ध का वह मैदान रक्त से लाल हो गया। अवंती के सैनिकों ने अपने राजा के सम्मान और मातृभूमि की रक्षा के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया। बिना किसी पूर्व तैयारी के भी उन्होंने सुबाहु की सेना को कड़ी टक्कर दी। राजा विक्रमादित्य खुद युद्ध के मैदान में उतर पड़े। जहाँ-जहाँ उनकी तलवार उठती थी, शत्रु की सेना में भगदड़ मच जाती थी। उन्होंने अकेले ही सुबाहु के कई प्रमुख सेनापतियों को धूल चटा दी। लेकिन संख्या बल और धोखे की रणनीति के आगे वीरता भी कभी-कभी लाचार हो जाती है। सुबाहु की सेना ने हर तरफ से घेरकर आग लगाना शुरू कर दिया। राजधानी के मकान, बाजार और मंदिर जलने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया। सेनापति विक्रम सिंह बुरी तरह घायल होकर वीरगति को प्राप्त हो गए। मंत्री परिषद के कुछ सदस्यों ने राजा से अनुरोध किया कि यदि वे जीवित रहेंगे, तो राज्य को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार युद्धक्षेत्र में कटमरने के बजाय रणनीति के तहत पीछे हटना ही इस समय बुद्धिमानी होगी। भारी मन, आंखों में अंगारों और सीने में सुलगते हुए प्रतिशोध की आग के साथ, राजा विक्रमादित्य को अपनी ही राजधानी को लपटों में घिरता हुआ छोड़कर पीछे हटना पड़ा। उनके साथ केवल चार-पाँच निष्ठावान अंगरक्षक और मंत्री ही बचे थे। वे गुप्त सुरंग के रास्ते से निकलकर पास के घने और बीहड़ जंगलों की ओर भाग निकले। पीछे छूट गया था उनका वैभव, उनका परिवार, उनकी प्रजा और उनका महान साम्राज्य, जो अब एक क्रूर राक्षस के अधीन जा चुका था।

 

राजधानी और महल छूट जाने के बाद राजा विक्रमादित्य और उनके बचे हुए साथी गहरे और अंधकारमय जंगलों में भटकते रहे। वह जंगल इतना घना था कि सूर्य की किरणें भी जमीन तक पहुँचने में असमर्थ थीं। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़, जहरीली झाड़ियाँ, कांटेदार लताएँ और जंगली जानवरों की भयंकर दहाड़ें गूंजती रहती थीं। राजा विक्रमादित्य, जिन्होंने जीवन भर महलों के मखमली बिस्तरों पर विश्राम किया था और जिन्हें चांदी-सोने के बर्तनों में छप्पन भोग परोसे जाते थे, आज वे कंटीले रास्तों पर नंगे पैर चलने को मजबूर थे। उनके पैरों में छाले पड़ चुके थे, बदन पर युद्ध के दौरान लगे घावों से खून रिस रहा था और पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं था। वे कई दिनों तक केवल जंगलों के कंद-मूल और पेड़ों के पत्ते खाकर या नदियों का गंदा पानी पीकर जीवित रहे। जंगल के इस कठिन सफर के दौरान धीरे-धीरे स्थिति की भयावहता को देखकर उनके साथ आए अधिकांश अंगरक्षक और सैनिक भी एक-एक करके साथ छोड़ गए। कुछ लोग भूख और थकान से दम तोड़ गए, तो कुछ डर के मारे दूसरे रास्तों पर निकल गए। अंत में, राजा के साथ केवल उनके सबसे पुराने और वफादार मंत्री देवशर्मा और एक साधारण सैनिक मंगल ही बचे थे। कई दिनों की इस दर्दनाक भटकन के बाद, वे एक बहुत ही दुर्गम और कटीली पहाड़ी के पास पहुंचे। उस पहाड़ी के बीचों-बीच एक बहुत बड़ी और गहरी प्राकृतिक गुफा थी। गुफा का मुहाना झाड़ियों से ढका हुआ था और उसके भीतर घना अंधेरा था। बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी, जिससे ठंड और भी बढ़ गई थी। महाराज, यहीं शरण लेनी होगी। आगे बढ़ना इस बारिश और आपकी शारीरिक स्थिति में असंभव है, मंत्री देवशर्मा ने कांपते हुए स्वर में कहा। राजा विक्रमादित्य ने गूंगे पत्थरों की तरह सिर हिलाया और उस अंधेरी गुफा के भीतर कदम रखा। गुफा के भीतर नमी थी, चमगादड़ों के उड़ने की आवाजें थीं और ठंडी हवा के झोंके सनसना रहे थे। जमीन पर गीली मिट्टी और नुकीले पत्थर बिखरे थे। राजा एक कोने में पीठ टिकाकर बैठ गए। वह क्षण राजा विक्रमादित्य के जीवन का सबसे कठिन और काला क्षण था। शारीरिक कष्ट से कहीं अधिक मानसिक कष्ट उन्हें अंदर ही अंदर जला रहा था। वे अपनी आंखें बंद करते, तो उन्हें राजधानी में जलते हुए घर, रोती हुई प्रजा और वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों के चेहरे दिखाई देते थे।

 

उनके भीतर का अहंकार, जो एक राजा होने के नाते स्वाभाविक था, वह अब पूरी तरह चकनाचूर हो चुका था। लेकिन उसके स्थान पर एक भयानक, सुन्न कर देने वाला अवसाद उनके मन पर हावी हो गया था। वे दिन-रात एक ही बात सोचते रहते थे कि सब कुछ समाप्त हो गया है। मेरी सेना कहाँ है? मेरा मुकुट कहाँ है? मैं अपनी प्रजा की रक्षा नहीं कर पाया। मैं एक असफल राजा हूँ। एक भगोड़ा हूँ। अब इस जीवन का क्या मूल्य? मंत्री देवशर्मा उन्हें समझाने की बहुत कोशिश करते थे। वे कहते थे कि आपदाएं राजाओं के जीवन का हिस्सा होती हैं। राम को भी वनवास मिला था, युधिष्ठिर को भी जुए में सब कुछ खोना पड़ा था। समय बदलता है, आप धैर्य रखें। लेकिन राजा पर इन वचनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। निराशा का अंधकार उनके प्राणों में इस कदर बस चुका था कि उन्होंने अपनी चमचमाती हुई तलवार 'असिराज' को गुफा के एक अंधेरे कोने में फेंक दिया था। उन्होंने भोजन करना भी लगभग बंद कर दिया था। वे घंटों एक ही दिशा में शून्य की तरफ देखते रहते थे। उनका शरीर अब हड्डियों का ढांचा मात्र बन चुका था और उनकी आँखों की चमक पूरी तरह बुझ चुकी थी। वे मौत का इंतज़ार कर रहे थे, क्योंकि उनके अनुसार एक हारे हुए राजा के लिए जीने का कोई अधिकार नहीं था। हफ्तों बीत गए। गुफा के बाहर बारिश बंद हो चुकी थी, लेकिन राजा विक्रमादित्य के मन का मौसम अभी भी पतझड़ और अंधकार से घिरा हुआ था। एक दोपहर, जब मंत्री देवशर्मा बाहर से कुछ कंद-मूल ढूंढकर लाने गए थे और सैनिक मंगल गुफा के मुहाने पर पहरा दे रहा था, राजा विक्रमादित्य अपनी सुस्त और बेजान आँखों से गुफा की नम और पथरीली दीवारों को घूर रहे थे। अचानक, उनकी नजर गुफा के ऊपरी कोने पर पड़ी। वहाँ एक बहुत ही सूक्ष्म और कमजोर प्राणी था— एक छोटी सी मकड़ी। वह मकड़ी गुफा की चिकनी, गीली और काई से भरी दीवार पर ऊपर की ओर चढ़ने का अथक प्रयास कर रही थी। उसके मुंह में रेशम का एक बहुत ही बारीक और अदृश्य धागा था, जिसे वह दीवार के ऊपरी छोर पर किसी दरार में चिपकाना चाहती थी ताकि वह अपना जाला बुन सके। राजा विक्रमादित्य का ध्यान अनजाने ही उस मकड़ी की तरफ खिंच गया। उनके जीवन की उदासी और शून्यता में मानो किसी ने एक तिनके की सुई चुभा दी हो। वे पलकें झपकाए बिना उस मकड़ी को देखने लगे। मकड़ी ने अपने छोटे-छोटे पैरों से दीवार पर ऊपर की तरफ रेंगना शुरू किया। उसने आधे रास्ते की दूरी तय कर ली थी। राजा के मन में एक अजीब सी कौतुक भरी जिज्ञासा जागी कि क्या यह कमजोर जीव इतनी चिकनी दीवार पर चढ़ पाएगा? ठीक उसी समय, दीवार पर नमी के कारण उस मकड़ी का एक पैर फिसल गया। वह बिना किसी सहारे के सीधे नीचे गुफा के ठंडे पत्थरों पर आ गिरी। राजा ने मन ही मन सोचा कि बेचारी! इतनी ठंड और चिकनी दीवार पर चढ़ना इसके बस का नहीं है। अब यह हार मानकर बैठ जाएगी।

 

लेकिन वह मकड़ी हार मानने वालों में से नहीं थी। जमीन पर गिरने के कुछ ही पक्षणों बाद, वह संभली। उसने अपने रेशमी धागे को फिर से संभाला और दोबारा दीवार की तरफ बढ़ी। इस बार उसने और अधिक सावधानी से एक-एक कदम उठाया। वह पिछली बार से थोड़ा और ऊपर पहुँची। लगभग दो-तिहाई दूरी उसने तय कर ली थी। तभी गुफा की छत से पानी की एक बड़ी बूंद सीधे उस मकड़ी पर आ गिरी, और उस बूंद के झटके से वह मकड़ी एक बार फिर तेजी से नीचे की ओर लुढ़क गई। राजा विक्रमादित्य इस बार थोड़ा और आगे खिसक आए। उनकी आँखें उस छोटी सी मकड़ी पर गड़ गईं। उनके भीतर का दार्शनिक और योद्धा जाग रहा था, जो अब एक कीट के संघर्ष में अपने जीवन की परछाई देख रहा था। मकड़ी ने हार नहीं मानी। उसने तीसरी बार प्रयास किया। वह फिर ऊपर चढ़ी, लेकिन इस बार एक हल्की सी हवा के झोंके ने उसे फिर से नीचे गिरा दिया। राजा विक्रमादित्य ने अपने मन में गिनती शुरू की। चौथी बार वह चढ़ी, और फिर गिर गई। पाँचवीं बार उसने जोर लगाया, और आधी दूरी से नीचे आ गिरी। छठी बार थोड़ा और ऊपर गई, पर पकड़ छूट गई। सातवीं बार उसने पूरी ताकत लगाई, लेकिन फिर असफलता हाथ लगी। आठवीं बार फिर से प्रयास, और फिर से पतन। नौवीं बार राजा की साँसें मानो थम सी गईं। क्या यह जीव नौ बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारेगा? नौवीं बार भी वह मकड़ी दीवार पर आधी चढ़ी और नीचे आ गिरी। नौ बार की लगातार असफलताओं के बाद, किसी भी साधारण जीव की ऊर्जा समाप्त हो जाती, उसकी हिम्मत टूट जाती और वह मौत को गले लगा लेता। राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि अब बस, खेल खत्म। अब यह मकड़ी मर जाएगी या हमेशा के लिए छिप जाएगी। लेकिन वह नन्ही सी मकड़ी चमत्कार करने के लिए बनी थी। नौ बार गिरने के बाद, उसने थोड़ी देर विश्राम किया, अपने पैरों को समेटा और दसवीं बार फिर से उस चिकनी दीवार पर अपने सफर की शुरुआत की। इस बार उसकी गति धीमी थी, लेकिन उसके हर कदम में एक अजीब सा अटूट संकल्प था। उसने उन सभी जगहों को छोड़ा जहाँ से वह पहले फिसली थी। उसने नए रास्तों का चुनाव किया। उसने अपने रेशमी धागे को अधिक मजबूती से दीवारों में पिरोया। राजा विक्रमादित्य सांस रोके उसे देख रहे थे। और तब... वह पल आया। वह नन्ही सी मकड़ी धीरे-धीरे रेंगते हुए दीवार के उस आखिरी छोर तक पहुँच गई, जहाँ उसे अपना जाला बुनना था। उसने सुरक्षित रूप से अपने धागे को दीवार की दरार में पक्का किया और विजय के उल्लास में अपने नन्हे पैरों को थिरकाया। कुछ ही पलों में, उसने वहाँ अपना सुंदर और जादुई जाला बुनना शुरू कर दिया।

 

उस नन्ही सी मकड़ी की दसवीं बार की विजय ने राजा विक्रमादित्य के भीतर वर्षों से सोए हुए पुरुषार्थ को एक झटके में जगा दिया। ऐसा लगा मानो उनके शरीर में बिजली की करोड़ों वोल्ट की धारा एक साथ प्रवाहित हो गई हो। वे अपनी जगह से बिजली की तेजी से खड़े हो गए। उनकी आँखें जो पिछले कई हफ्तों से बुझी हुई थीं, अब अंगारों की तरह दहक रही थीं। उनके चेहरे की रेखाओं में निराशा की जगह एक दृढ़ प्रतिज्ञा ने ले ली थी। वे जोर से हंसे—एक ऐसी हंसी जिसमें वर्षों का दर्द और भविष्य की जीत की गूंज थी। उन्होंने खुद से कहा कि हे ईश्वर! मैं मूर्ख था। मैं एक मनुष्य हूँ, अवंती का राजा विक्रमादित्य हूँ, जिसके पास बुद्धि है, बाहुबल है, और पराक्रम है। मैंने तो जीवन में केवल एक ही युद्ध हारा है, और मैं अपनी हार मानकर इस गुफा में मौत का इंतज़ार कर रहा था! और यह छोटी सी, बुद्धिहीन कीट रूपी मकड़ी... जिसमें सोचने-समझने की शक्ति भी मुझसे नगण्य है, वह नौ बार असफल होने के बाद भी दसवीं बार अपनी पूरी ताकत से प्रयास करती है और सफल हो जाती है! यदि एक मकड़ी हार नहीं मान सकती, तो मैं कैसे हार मान सकता हूँ? राजा ने आगे बढ़कर गुफा के उस कोने को देखा जहाँ उन्होंने अपनी तलवार 'असिराज' फेंकी थी। उन्होंने तेजी से जाकर उस तलवार को उठाया। धूल और नमी से सनी उस तलवार को उन्होंने अपने वस्त्र से साफ किया। जब उन्होंने तलवार को चमकाया, तो उसकी धार में उनके चेहरे का वह पुराना तेज फिर से दिखाई देने लगा, जो सुबाहु के आक्रमण से पहले हुआ करता था। उन्होंने तलवार को गर्व से अपनी कमर में खोंस लिया। उनके कदम अब भारी नहीं, बल्कि फौलादी थे। बाहर आते ही उन्होंने अपने मंत्री देवशर्मा और सैनिक मंगल को आवाज दी। उनकी आवाज में वह गूंज थी जो महीनों बाद सुनी गई थी। देवशर्मा दौड़ते हुए आए और घबराकर बोले कि महाराज! क्या हुआ? सब ठीक तो है? राजा विक्रमादित्य ने अपने कंधे पर हाथ रखा और एक मुस्कान के साथ कहा कि देवशर्मा! सब कुछ ठीक नहीं है, बल्कि अब सब कुछ ठीक होने की शुरुआत होने वाली है। हमारी हार केवल एक अस्थायी बाधा थी। हमारा राज्य हमसे छीना गया है, लेकिन हमारा पुरुषार्थ और हमारा अधिकार अभी भी जिंदा है। हम इस गुफा से बाहर निकलेंगे और अपने अवंती को वापस जीतेंगे! मंत्री देवशर्मा की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने राजा के चरणों में सिर झुका दिया। उन्हें विश्वास हो गया था कि उनका पुराना, प्रतापी राजा वापस लौट आया है।

 

गुफा छोड़ने के बाद राजा विक्रमादित्य ने अपनी अगली चाल के बारे में सोचा। वे भली-भांति जानते थे कि इस समय उनके पास न तो कोई सेना है, न ही पर्याप्त हथियार और न ही कोई बहुत बड़ा खजाना। सुबाहु की एक लाख सैनिकों की सुसज्जित सेना के सामने उनके तीन लोग एक तिनके के समान थे। सीधे युद्ध के मैदान में उतरना सीधे तौर पर आत्महत्या करने जैसा होता। इसलिए, राजा ने एक अत्यंत सूक्ष्म, गहरी और दीर्घकालिक रणनीति बनाई। सबसे पहले उन्होंने विंध्याचल के जंगलों और आसपास के छोटे गाँवों में घूमना शुरू किया। उन्होंने उन सभी पूर्व सैनिकों, किसानों और युवाओं को खोजना शुरू किया जो सुबाहु के अत्याचारों, भारी करों और जुल्मों से त्रस्त हो चुके थे। राजा अपनी पहचान छिपाकर उन लोगों से मिलते और उनके दिलों में अपने राज्य के प्रति प्रेम और विद्रोह की आग भड़काते थे। दूसरा, राजा ने तय किया कि वे आमने-सामने की सेना से लड़ने के बजाय छिपकर वार करने की पद्धति अपनाएंगे। उन्होंने जंगल के युवाओं को तीरंदाजी, तलवारबाजी और चुपचाप शत्रु के ठिकानों पर हमला करने का विशेष प्रशिक्षण देना शुरू किया। तीसरा, राजा की छोटी सी टुकड़ी ने सुबाहु की सेना के राशन और हथियारों के काफिलों पर जंगलों से अचानक हमले करना शुरू कर दिया। वे रसद लूट लेते और सैनिकों को मौत के घाट उतारकर रातों-रात जंगलों में गायब हो जाते थे। सुबाहु की सेना इस बात से परेशान हो गई कि जंगल में कोई अदृश्य शक्ति है जो उनके सैनिकों को लगातार समाप्त कर रही है। चौथा, राजधानी और आसपास के नगरों में राजा के वफादार गुप्तचरों ने यह अफवाह और सच फैलाना शुरू कर दिया कि उनके प्रिय राजा विक्रमादित्य जीवित हैं और वे जल्द ही सुबाहु के शासन का अंत करने आ रहे हैं। इससे अवंती की दुखी जनता के मन में एक नई आशा की किरण जग गई। जनता ने अंदर ही अंदर राजा को कर देना बंद कर दिया और सुबाहु के खिलाफ गुप्त रूप से मदद करना शुरू कर दिया। महीनों की इस कठिन और सुनियोजित मेहनत के रंग दिखने लगे। एक साल के भीतर ही राजा विक्रमादित्य के पास तीन हजार अत्यंत प्रशिक्षित, निष्ठावान और मौत से ना डरने वाले सैनिकों की एक गुप्त सेना तैयार हो चुकी थी। उनके पास पहाड़ों की गुफाओं में हथियारों का अच्छा खासा जखीरा जमा हो चुका था और जनता का पूरा समर्थन उनके साथ था।

 

वह ऐतिहासिक दिन आ गया। गुप्तचरों से राजा विक्रमादित्य को अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना मिली कि राजा सुबाहु अपनी मुख्य सेना के एक बड़े हिस्से के साथ राजधानी से दूर किसी उत्सव और पड़ोसी राज्य पर नए आक्रमण की योजना के सिलसिले में सीमावर्ती इलाके में जा रहा है। राजधानी के मुख्य किले में इस समय सुरक्षा व्यवस्था केवल सामान्य स्तर पर है और सैनिकों की संख्या भी कम है। राजा विक्रमादित्य ने अपनी रणनीतिक बैठक बुलाई और अपने सेनापतियों से कहा कि मित्रों! यह वही क्षण है जिसके लिए हमने एक वर्ष तक खून-पसीना बहाया है। आज या तो हम अवंती को मुक्त कराएंगे, या वीरगति को प्राप्त होंगे। रात के सन्नाटे में, राजा विक्रमादित्य की तीन हजार की गुप्त सेना ने राजधानी के चारों ओर घेराबंदी कर ली। स्थानीय नागरिकों ने रात के समय किले के गुप्त दरवाजों को अंदर से खोल दिया। यह आक्रमण इतना अचानक, सटीक और तीव्र था कि सुबाहु की बची हुई सेना को संभलने का मौका ही नहीं मिला। चारों तरफ हर-हर महादेव और 'जय अवंती' के नारे गूंज उठे। अवंती की आम जनता भी अपने घरों से लाठियों, तलवारों और मशालों के साथ सड़कों पर उतर आई। उन्होंने सुबाहु के सैनिकों पर पत्थरों से हमला कर दिया। सुबाहु के सैनिक असमंजस में पड़ गए कि वे बाहर के प्रशिक्षित छापामार सैनिकों से लड़ें या अपने ही घरों से बगावत करती हुई जनता से। चारों तरफ हाहाकार मच गया। राजा विक्रमादित्य अपनी चमचमाती तलवार 'असिराज' के साथ सबसे आगे थे। उन्होंने किले के मुख्य द्वार को अपने हाथों से तोड़ डाला। उनका पराक्रम देखकर उनके सैनिकों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने दुश्मनों को गाजर-मूली की तरह काटना शुरू कर दिया। जब इस आक्रमण की खबर सुबाहु को मिली, तो वह आगबबूला हो गया। वह अपनी विशेष टुकड़ी के साथ तुरंत राजधानी की ओर दौड़ा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। किले के प्रांगण में राजा विक्रमादित्य और सुबाहु का आमने-सामने का भयंकर द्वंद्व हुआ। सुबाहु अपने घमंड, अहंकार और क्रूरता के बल पर तलवार चला रहा था। वह चिल्लाया कि रे विक्रमादित्य! तू उस दिन भाग गया था, आज तुझे मौत के घाट उतारकर इस राज्य को हमेशा के लिए मेरा बना दूंगा! राजा विक्रमादित्य ने शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया कि सुबाहु! छल से जीता हुआ राज्य और चोरी किया हुआ ताज कभी किसी का नहीं होता। आज तुझे तेरी औकात दिखाने का वक्त आ गया है। दोनों के बीच तलवारों की खनक से पूरा किला गूंज उठा। चिंगारियां उड़ रही थीं। सुबाहु ने कई वार किए, लेकिन विक्रमादित्य के डिफेंस और उनके क्रोध के आगे उसका एक भी वार टिक नहीं सका। एक जबरदस्त और अंतिम प्रहार से राजा विक्रमादित्य ने सुबाहु की तलवार को हवा में उछाल दिया और उसकी छाती पर अपनी तलवार की नोक रख दी। सुबाहु घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ा। उसकी आँखें डर से फटी हुई थीं। उसने अपनी जान की भीख माँगी। राजधानी की बालकनी से जब अवंती की जनता ने अपने राजा को विजयी देखा, तो पूरा शहर खुशी के आंसुओं और जयकारों से गूंज उठा। एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते विक्रमादित्य ने सुबाहु का वध नहीं किया। उन्होंने उसे जंजीरों में जकड़वा दिया और अवंती की सीमा से हमेशा के लिए खदेड़ दिया। साथ ही, उसकी आधी भूमि को अवंती के अधीन कर लिया।

 

अवंती में एक बार फिर से दीवाली से भी भव्य उत्सव मनाया गया। घरों में दीप जले, महलों को फूलों से सजाया गया और प्रजा ने अपने प्रिय राजा का भगवान की तरह स्वागत किया। राजा विक्रमादित्य ने सिंहासन पर पुनः बैठकर सबसे पहले गरीबों, घायलों और युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिवारों की सहायता के लिए भारी खजाना खोल दिया। अपने राज्याभिषेक के ठीक बाद, राजा विक्रमादित्य ने अपने दरबार के मुख्य कक्ष में एक बहुत ही अनूठी और सुंदर सोने की मूर्ति बनवाई। वह मूर्ति एक सुंदर और बारीक मकड़ी के जाले के आकार की थी, जिसके केंद्र में एक नन्ही सी मकड़ी बैठी थी। उन्होंने अपने दरबारियों, मंत्रियों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक संदेश दिया, जो आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है कि जीवन में असफलताएं, विपत्तियां और संकट केवल हमारी परीक्षा लेने आते हैं। जो व्यक्ति पहली या दूसरी असफलता से डरकर हार मान लेता है, वह अपनी किस्मत को खुद को कोसने के सिवाय कुछ नहीं देता। लेकिन जो मनुष्य उस नन्ही सी मकड़ी की तरह बार-बार गिरने के बावजूद निरंतर प्रयास करता रहता है, इस ब्रह्मांड की कोई भी ताकत उसे उसकी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। असफलता कोई अंत नहीं है, बल्कि सफलता की सबसे पहली और मजबूत सीढ़ी है। इस प्रकार, राजा विक्रमादित्य की यह कथा हमें यह सिखाती है कि हमारे जीवन में कितनी भी बड़ी बाधा क्यों न आए, हमें कभी भी अपनी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद एक नया और सुनहरा सवेरा जरूर आता है।

 

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एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...