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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

बंजर जमीन का किसान

 



 

शंभू एक छोटे से गाँव में रहने वाला गरीब किसान था। उसका गाँव चारों तरफ से पहाड़ियों, सूखे मैदानों और कच्ची पगडंडियों से घिरा हुआ था। गाँव का नाम था रामपुर। कभी रामपुर की पहचान उसकी हरी-भरी खेती और लहलहाते खेतों से होती थी, लेकिन पिछले कई वर्षों से बारिश कम होने के कारण गाँव की जमीन सूखती चली गई थी। खेतों में दरारें पड़ गई थीं और कुएँ का पानी भी धीरे-धीरे नीचे चला गया था। गाँव के कई किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले गए थे। शंभू के पास भी जमीन थी, लेकिन उसकी जमीन को पूरे गाँव में सबसे खराब जमीन माना जाता था। लोग उसे “बंजर जमीन” कहते थे। उस जमीन पर न घास ठीक से उगती थी और न कोई फसल। फिर भी शंभू को अपनी जमीन से बहुत प्यार था। वह अक्सर अपनी जमीन के किनारे बैठकर मिट्टी को हाथ में उठाता और कहता, “तू बंजर नहीं है, बस तुझसे किसी ने प्यार से बात नहीं की।”

शंभू के परिवार में उसकी बूढ़ी माँ जमुना, पत्नी गंगा और दस साल का बेटा छोटू था। घर मिट्टी और खपरैल का बना हुआ था। बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में मिट्टी की दीवारें तपने लगती थीं। परिवार के पास खाने के लिए भी हमेशा पर्याप्त अनाज नहीं रहता था। शंभू सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता, अपनी पुरानी गमछा कंधे पर रखता और खेत की ओर निकल जाता। उसकी पत्नी गंगा कई बार उसे रोकते हुए कहती, “इतनी मेहनत करके भी क्या मिलेगा शंभू? लोग सही कहते हैं, वह जमीन खेती के लायक नहीं है। तुम किसी के खेत में मजदूरी कर लिया करो।” शंभू मुस्कुराकर कहता, “गंगा, अगर हम अपनी जमीन को ही छोड़ देंगे तो फिर अपना कहने के लिए हमारे पास बचेगा क्या?” गंगा उसकी बात सुनकर चुप हो जाती, क्योंकि वह जानती थी कि शंभू अपनी जमीन को सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं मानता था। उसके लिए वह उसके पिता की आखिरी निशानी थी।

शंभू के पिता रामलाल भी किसान थे। उनके पास यही जमीन थी। जब शंभू छोटा था, तब रामलाल उसे अक्सर खेत में ले जाते थे। वे मिट्टी को हाथ में लेकर कहते, “बेटा, जमीन माँ जैसी होती है। अगर हम उसका ध्यान रखें तो वह हमें कभी भूखा नहीं रखेगी।” लेकिन रामलाल के मरने के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। लगातार तीन साल सूखा पड़ा। खेत की मिट्टी कठोर होती गई। रामलाल की बीमारी में घर का बहुत पैसा खर्च हुआ और आखिरकार एक दिन वे दुनिया छोड़ गए। उनकी मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी शंभू के कंधों पर आ गई। उस समय शंभू की उम्र सिर्फ बीस साल थी। उसने पढ़ाई छोड़ दी और खेती करने लगा। मगर खेती ने उसका साथ नहीं दिया। उसने कई बार बीज बोए, लेकिन फसल नहीं हुई। कभी बारिश नहीं आई तो कभी बारिश इतनी तेज हुई कि सारे बीज बह गए।

मीरा ने शंभू को मिट्टी का नमूना लाने के लिए कहा। शंभू अगले दिन अपनी जमीन से अलग-अलग जगह की मिट्टी लेकर कृषि केंद्र पहुँचा। कुछ दिनों बाद मिट्टी की रिपोर्ट आई। मीरा ने रिपोर्ट देखकर कहा, “तुम्हारी जमीन पूरी तरह बंजर नहीं है। इसमें जैविक पदार्थ बहुत कम है, मिट्टी में नमी टिक नहीं रही और पानी तेजी से बह जाता है। अगर तुम मिट्टी में जैविक खाद डालो, पानी रोकने की व्यवस्था करो और ऐसी फसल लगाओ जिसे कम पानी की जरूरत हो, तो धीरे-धीरे जमीन की हालत सुधर सकती है।” शंभू की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई। उसने पूछा, “कितने दिनों में फसल होगी?” मीरा ने कहा, “यह कोई जादू नहीं है। जमीन को ठीक होने में समय लगेगा। लेकिन अगर तुम लगातार मेहनत करोगे तो बदलाव जरूर आएगा।”

शंभू उसी दिन घर लौटा। गंगा ने पूछा, “क्या हुआ?” शंभू ने मुस्कुराकर कहा, “हमारी जमीन बीमार है, बंजर नहीं।” गंगा कुछ समझ नहीं पाई। शंभू ने उसे पूरी बात बताई। गंगा ने कहा, “लेकिन खाद, बीज और पानी का इंतजाम कहाँ से होगा?” शंभू कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “जहाँ चाह होगी, वहाँ रास्ता भी निकलेगा।” अगले दिन से शंभू ने काम शुरू कर दिया। उसने गाँव के आसपास से सूखे पत्ते, गोबर और जैविक कचरा इकट्ठा करना शुरू किया। उसने खेत के एक कोने में खाद का गड्ढा बनाया। छोटू भी उसके साथ रहता था। दोनों मिलकर गोबर और पत्तियों को गड्ढे में डालते थे। शंभू उसे समझाता, “बेटा, जो चीज हमें बेकार लगती है, वही कभी-कभी जमीन के लिए सबसे कीमती होती है।”

गाँव के लोग शंभू को देखकर हँसने लगे। कोई कहता, “देखो, बंजर जमीन का किसान खाद बना रहा है।” कोई कहता, “इतनी मेहनत से अच्छा शहर जाकर मजदूरी कर ले।” रघुनाथ ने तो एक दिन मजाक करते हुए कहा, “शंभू, तू जमीन को सोना बनाने चला है क्या?” शंभू ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सोना नहीं भैया, बस इतना चाहता हूँ कि मेरी जमीन मेरे परिवार का पेट भर सके।” रघुनाथ ने सिर हिलाया और चला गया। लेकिन शंभू ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।

कुछ महीनों तक उसने लगातार खेत पर काम किया। उसने जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटा। खेत के चारों ओर मेड़ बनाई ताकि बारिश का पानी बहकर बाहर न जाए। उसने छोटी-छोटी नालियाँ बनाई और एक गड्ढा खोदा जिसमें बारिश का पानी जमा हो सके। उसने मीरा की सलाह पर कम पानी वाली दालों और मोटे अनाज की फसल लगाने का निर्णय लिया। पहली बार उसने अपने खेत में बाजरा और अरहर के बीज डाले। बीज डालते समय उसके हाथने लगे। पहली बारिश की बूंद जब शंभू की जमीन पर गिरी तो वह खेत के बीच खड़ा होकर आसमान की ओर देखने लगा। कुछ ही देर में बारिश तेज हो गई। खेत की मेड़ ने पानी को रोक लिया। शंभू की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वह चिल्लाकर बोला, “गंगा! पानी खेत में रुक रहा है!” गंगा भी बाहर आई। उसने देखा कि जिस जमीन पर वर्षों से पानी टिकता नहीं था, वहाँ अब छोटी-सी जलधारा रुककर मिट्टी को भिगो रही थी। दोनों पति काँप रहे थे। उसे डर था कि अगर इस बार भी फसल नहीं हुई तो परिवार की उम्मीद भी टूट जाएगी।

बारिश का मौसम आया। आसमान में बादल घिरने लगे। पहली बारिश की बूंद जब शंभू की जमीन पर गिरी तो वह खेत के बीच खड़ा होकर आसमान की ओर देखने लगा। कुछ ही देर में बारिश तेज हो गई। खेत की मेड़ ने पानी को रोक लिया। शंभू की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वह चिल्लाकर बोला, “गंगा! पानी खेत में रुक रहा है!” गंगा भी बाहर आई। उसने देखा कि जिस जमीन पर वर्षों से पानी टिकता नहीं था, वहाँ अब छोटी-सी जलधारा रुककर मिट्टी को भिगो रही थी। दोनों पति-पत्नी कुछ देर तक बारिश में खड़े रहे। छोटू भी दौड़ता हुआ आया और बोला, “बाबा, हमारी जमीन पानी पी रही है!”

कुछ दिनों बाद खेत में छोटे-छोटे पौधे दिखाई देने लगे। शंभू हर सुबह उठकर उन्हें देखने जाता। वह पौधों को ऐसे देखता जैसे कोई पिता अपने बच्चे को पहली बार स्कूल जाते हुए देखता है। कुछ पौधे सूख गए, कुछ को कीड़ों ने नुकसान पहुँचाया, लेकिन कई पौधे बच गए। खेत की मिट्टी में धीरे-धीरे हरियाली दिखाई देने लगी। गाँव के लोग अब शंभू के खेत की ओर देखने लगे। जिन लोगों ने उसका मजाक उड़ाया था, वे अब चुप थे।

लेकिन शंभू की परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। एक रात तेज बारिश हुई। गाँव के कई खेतों में पानी भर गया। शंभू का खेत भी खतरे में था। पानी एक तरफ से मेड़ तोड़ने लगा। शंभू ने टॉर्च उठाई और बारिश में खेत की ओर दौड़ पड़ा। छोटू भी पीछे जाने लगा, लेकिन गंगा ने उसे रोक लिया। शंभू ने घंटों मेहनत करके मिट्टी और पत्थरों से मेड़ को मजबूत किया। उसके हाथों में चोट लग गई, कपड़े कीचड़ से भर गए, लेकिन उसने पानी को खेत से बहने नहीं दिया। सुबह जब बारिश रुकी तो खेत सुरक्षित था। शंभू थककर वहीं बैठ गया। उसने देखा कि उसके लगाए पौधे अभी भी खड़े थे।

कुछ सप्ताह बाद खेत में बाजरे की बालियाँ निकलने लगीं। अरहर के पौधे भी हरे हो गए। शंभू ने एक पौधे को हाथ से छुआ और उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे अपने पिता की बात याद आई—“जमीन माँ जैसी होती है।” उसने आसमान की ओर देखकर कहा, “बाबा, आपने गलत नहीं कहा था। गलती मेरी थी। मैंने जमीन को समझने में देर कर दी।”

उस साल शंभू की फसल बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उसके परिवार के लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी। उसने कुछ अनाज घर के लिए रखा और कुछ बाजार में बेच दिया। पहली बार उसकी जमीन से ऐसी फसल निकली थी जिससे परिवार को उम्मीद मिली। गंगा ने अनाज को हाथ में लेकर कहा, “इतने साल बाद हमारे घर की जमीन ने हमें अपना अनाज दिया है।” शंभू मुस्कुराया और बोला, “यह सिर्फ अनाज नहीं है गंगा, यह हमारी मेहनत का जवाब है।”

धीरे-धीरे शंभू ने खेती के नए तरीके सीखने शुरू किए। उसने फसल के साथ पेड़ लगाए। खेत के किनारे नीम, सहजन और फलदार पौधे लगाए। उसने घर के पास सब्जियों का छोटा बगीचा बनाया। बारिश के पानी को जमा करने के लिए एक और छोटा तालाब बनाया। उसने गाँव के दूसरे किसानों को भी बताया कि पानी बचाना क्यों जरूरी है। कुछ आया। उसने हरी फसल को देखा और काफी देर तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने कहा, “शंभू, मैंने तेरा मजाक उड़ाया था। आज मानना पड़ेगा कि तूने कमाल कर दिया।” शंभू हँसते हुए बोला, “मैंने अकेले कुछ नहीं किया भैया। मिट्टी ने साथ दिया, बारिश ने साथ दिया और मेहनत ने रास्ता बनाया।” रघुनाथ ने पूछा, “मुझे भी अपनी जमीन में पानी रोकने की व्यवस्था करनी है। तू बताएगा?” शंभू ने बिना किसी पुराने अपमान को याद किए कहा, “क्यों नहीं भैया। जमीन किसी में मिट्टी फट जाती थी, वहाँ अब मिट्टी में नमी बनी रहती थी। खेत में केंचुए दिखाई देने लगे। पेड़ों के कारण मिट्टी का कटाव कम हुआ। बारिश का पानी तालाब में जमा होने लगा। शंभू ने फसल बदल-बदलकर लगानी शुरू की। उसने दालें, बाजरा, सब्जियाँ और कुछ फलदार पौधे लगाए। के गाँवों तक पहुँचने लगी। एक दिन कृषि विभाग की टीम गाँव आई। मीरा भी उनके साथ थी। उन्होंने शंभू का खेत देखा और उसकी मेहनत की प्रशंसा की। मीरा ने गाँव के लोगों से कहा, “यह खेत हमें सिखाता है कि जमीन को सिर्फ उसकी वर्तमान स्थिति से नहीं आँकना चाहिए। सही प्रबंधन, पानी संरक्षण और मिट्टी की देखभाल से खराब जमीन की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।” शंभू पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसे किसी सम्मान किसानों ने उसकी बात मानी, कुछ ने नहीं। लेकिन शंभू ने किसी पर दबाव नहीं डाला।

एक दिन रघुनाथ खुद शंभू के खेत पर आया। उसने हरी फसल को देखा और काफी देर तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने कहा, “शंभू, मैंने तेरा मजाक उड़ाया था। आज मानना पड़ेगा कि तूने कमाल कर दिया।” शंभू हँसते हुए बोला, “मैंने अकेले कुछ नहीं किया भैया। मिट्टी ने साथ दिया, बारिश ने साथ दिया और मेहनत ने रास्ता बनाया।” रघुनाथ ने पूछा, “मुझे भी अपनी जमीन में पानी रोकने की व्यवस्था करनी है। तू बताएगा?” शंभू ने बिना किसी पुराने अपमान को याद किए कहा, “क्यों नहीं भैया। जमीन किसी एक की नहीं होती, हम सबकी जिम्मेदारी है।”

समय बीतता गया। अगले दो वर्षों में शंभू की जमीन की हालत काफी बदल गई। पहले जहाँ गर्मियों में मिट्टी फट जाती थी, वहाँ अब मिट्टी में नमी बनी रहती थी। खेत में केंचुए दिखाई देने लगे। पेड़ों के कारण मिट्टी का कटाव कम हुआ। बारिश का पानी तालाब में जमा होने लगा। शंभू ने फसल बदल-बदलकर लगानी शुरू की। उसने दालें, बाजरा, सब्जियाँ और कुछ फलदार पौधे लगाए। अब उसका परिवार सिर्फ अनाज पर निर्भर नहीं था। सब्जियाँ बेचकर भी थोड़ी आमदनी होने लगी।

शंभू की सफलता की चर्चा आसपास के गाँवों तक पहुँचने लगी। एक दिन कृषि विभाग की टीम गाँव आई। मीरा भी उनके साथ थी। उन्होंने शंभू का खेत देखा और उसकी मेहनत की प्रशंसा की। मीरा ने गाँव के लोगों से कहा, “यह खेत हमें सिखाता है कि जमीन को सिर्फ उसकी वर्तमान स्थिति से नहीं आँकना चाहिए। सही प्रबंधन, पानी संरक्षण और मिट्टी की देखभाल से खराब जमीन की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।” शंभू पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसे किसी सम्मान की इच्छा नहीं थी। उसके लिए सबसे बड़ा सम्मान यह था कि उसका बेटा अब भूखे पेट सोने से बच गया था।

छोटू अब बड़ा हो रहा था। वह स्कूल जाने लगा था। वह अक्सर अपने पिता के खेत में आता और पौधों की देखभाल करता। एक दिन उसने अपने शिक्षक से कहा कि उसके पिता ने बंजर जमीन को खेती लायक बनाया है। शिक्षक ने पूरी कक्षा को शंभू की कहानी सुनाई। स्कूल के बच्चे एक दिन शंभू के खेत पर आए। उन्होंने देखा कि कैसे बारिश का पानी तालाब में जमा होता है, कैसे जैविक खाद बनती है और कैसे खेत में अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। शंभू ने बच्चों से कहा, “बच्चो, खेती सिर्फ हल चलाने का नाम नहीं है। खेती समझने लगे। बड़े किसानों के खेतों में भी फसल सूखने लगी। रघुनाथ के खेत में पानी की कमी हो गई। लेकिन शंभू के खेत में पिछली बारिश का जमा किया हुआ पानी और मिट्टी में बची नमी के कारण फसल पूरी तरह नष्ट नहीं हुई। शंभू ने अपने तालाब का पानी सावधानी से इस्तेमाल किया। उसने पड़ोस के किसानों को भी थोड़ी मात्रा में पानी दिया। गंगा ने कहा, “अगर पानी खत्म हो गया तो हमारी फसल भी खराब हो जाएगी।” शंभू ने जवाब दिया, “अगर पड़ोसी भूखा रहेगा तो हमारी फसल किस काम की? पानी थोड़ा है, लेकिन बाँटकर इस्तेमाल करेंगे तो कई घरदारी, धैर्य और प्रकृति के साथ मिलकर चलने का नाम है।”

कुछ समय बाद गाँव में एक बड़ी समस्या आई। उस वर्ष बारिश बहुत कम हुई। गाँव के कई कुएँ सूखने लगे। बड़े किसानों के खेतों में भी फसल सूखने लगी। रघुनाथ के खेत में पानी की कमी हो गई। लेकिन शंभू के खेत में पिछली बारिश का जमा किया हुआ पानी और मिट्टी में बची नमी के कारण फसल पूरी तरह नष्ट नहीं हुई। शंभू ने अपने तालाब का पानी सावधानी से इस्तेमाल किया। उसने पड़ोस के किसानों को भी थोड़ी मात्रा में पानी दिया। गंगा ने कहा, “अगर पानी खत्म हो गया तो हमारी फसल भी खराब हो जाएगी।” शंभू ने जवाब दिया, “अगर पड़ोसी भूखा रहेगा तो हमारी फसल किस काम की? पानी थोड़ा है, लेकिन बाँटकर इस्तेमाल करेंगे तो कई घर बच सकते हैं।”

शंभू ने पानी को जरूरत के अनुसार बाँटने के लिए गाँव के किसानों की बैठक बुलाई। उसने कहा, “हम सब अगर अलग-अलग पानी खींचेंगे तो कुछ ही दिनों में सब सूख जाएगा। क्यों न हम मिलकर पानी बचाएँ?” पहले कुछ लोगों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया, लेकिन धीरे-धीरे सभी तैयार हो गए। गाँव में पानी बचाने के लिए नियम बनाए गए। तालाब की सफाई हुई। पुराने कुओं की मरम्मत की गई। खेतों में मेड़बंदी शुरू हुई। गाँव के कई किसानों ने पेड़ लगाए।

दो साल के अंदर रामपुर गाँव का रूप बदलने लगा। गाँव के बाहर जो जमीन पहले सूखी और बेकार दिखाई देती थी, वहाँ अब छोटे-छोटे खेत और पेड़ दिखाई देने लगे। लोगों ने समझ लिया कि केवल बारिश का इंतजार करने से खेती नहीं बच सकती। पानी को रोकना, मिट्टी को बचाना और फसल का सही चुनाव करना भी जरूरी है। शंभू अब गाँव के किसानों के साथ मिलकर काम करता था। लेकिन उसने कभी यह नहीं कहा कि वह सबसे बड़ा किसान है। वह हमेशा कहता, “मैं भी सीख रहा हूँ। जमीन हर साल हमें कुछ नया सिखाती है।”

एक दिन गाँव की पंचायत में शंभू को बुलाया गया। मुखिया ने कहा, “शंभू, हम चाहते हैं कि तुम गाँव के किसानों की समिति का नेतृत्व करो।” शंभू ने हाथ जोड़कर कहा, “मैं नेता नहीं बनना चाहता। अगर आप सच में कुछ करना चाहते हैं तो ऐसी व्यवस्था बनाइए जिसमें हर किसान को पानी, मिट्टी की जाँच और खेती की जानकारी मिल सके।” उसकी बात सुनकर पंचायत ने कृषि विभाग से संपर्क किया। गाँव में मिट्टी की जाँच का शिविर लगाया गया। किसानों को जैविक खाद, जल संरक्षण और फसल विविधता के बारे में प्रशिक्षण दिया गया।

रघुनाथ भी अब बदल चुका था। उसने अपनी जमीन के एक हिस्से में तालाब बनाया और पेड़ लगाए। एक दिन उसने शंभू से कहा, “तूने मुझे एक बात सिखाई है। मैं जमीन को सिर्फ कमाई का साधन समझता था, लेकिन तूने मुझे बताया कि जमीन को बचाना भी उतना ही जरूरी है।” शंभू ने अपने घर की टूटी छत ठीक करवाई। छोटू के लिए किताबें खरीदीं। बूढ़ी माँ जमुना के इलाज के लिए पैसे जमा किए। गंगा ने घर के सामने फूल और सब्जियों का छोटा बगीचा बना लिया। अब उनके घर में पहले जैसी चिंता नहीं थी। फिर भी शंभू का जीवन सादा हीाकर कहा, “बेटा, तेरे पिता आज होते तो तुझे देखकर बहुत खुश होते।” शंभू की आँखें भर आईं। उसने माँ के पैर छुए और कहा, “अम्मा, मैंने बस उनकी बात मानने की कोशिश की है।” जमुना बोली, “तेरे पिता कहते थे कि खेत को बेट चारों ओर फसल लहरा रही थी। हवा चल रही थी और बाजरे की बालियाँ धीरे-धीरे झूम रही थीं। उसने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई। कुछ साल पहले यही मिट्टी उसके हाथों से फिसलकर धूल बन जाती थी। आज वही मिट्टी नमी से भरी थी। शंभू ने मिट्टी को जमीन हमेशा ऐसी रहे, इसके लिए मेहनत करनी होगी। अगर हम इसे फिर से लापरवाही से छोड़ देंगे तो यह फिर कमजोर हो सकती है।” छोटू ने कहा, “मैं आपकी तरह इसकी देखभाल करूँगा।” शंभू ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “मुझे खुशी है कि के बारे में पढ़ना शुरू किया। वह गाँव के किसानों के लिए नई जानकारी लाता। उसने मोबाइल से मौसम की जानकारी लेना सीखा, मिट्टी की जाँच करवाना सीखा और पानी की बचत के नए तरीके खोजे। शंभू उसे देखकर गर्व महसूस करता था। वह कहता, “मैंने मिट्टी को बच जमीन का किसान” कहने लगे। पहले यह नाम उसका मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन अब वही नाम सम्मान का प्रतीक बन गया था। जब कोई नया किसान अपनी खराब जमीन की शिकायत लेकर शंभू के पास आता तो वह हमेशा एक ही बात कहता, “पहले मिट्टी को समझो। जमीन को दोष देने पास आया और बोला, “मेरी जमीन भी तुम्हारी जमीन जैसी है। मैं क्या करूँ?” शंभू उसे खेत में ले गया। उसने मिट्टी हाथ में लेकर कहा, “सबसे पहले इसकी जाँच करवाओ। फिर पानी रोकने की कोशिश करो। जैविक पदार्थ बढ़ाओ। ऐसी फसल चुनो जो तुम्हारे क्षेत्र और पानी के हिसाब से हो। और सबसे जरूरी बात—एक साल में चमत्कार की उम्मीद मत करना।” किसान ने पूछा, “अगर फसल फिर भी नहीं हुई?” शंभू ने कहा, “तो कारण खोजेंगे और दोबारा कोशिश करेंगे। किसान का सबसे बड़ा हथियार उसकी मेहनत के साथ उसका धैर्य। गाँव में पहले जो किसान एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते थे, अब एक-दूसरे की मदद करने लगे। शंभू कहता बारिश हुई। तालाब भर गए। खेतों में हरियाली छा गई। लोग खुश थे। लेकिन शंभू ने किसानों से कहा, “खुशी मनाओ, लेकिन पानी को बेकार मत जाने दो। आज पानी ज्यादा है, इसलिए कल के लिए बचाओ।” गाँव वालों ने उसकी बात मानी। उन्होंने पानी को खेतों और तालाबों में रोकने गए थे और हाथों की नसें उभर आई थीं। लेकिन जब वह खेत में जाता तो उसकी चाल में अभी भी वही उत्साह होता। एक शाम वह अपने खेत की मेड़ पर बैठा सूर्यास्त देख रहा था। छोटू अब जवान हो चुका था और उसके पास बैठा था। शंभू ने कहा, “छोटू, जब मैं तेरी उम्र का था, तब मुझे लगता था कि जमीन ने मुझे धोखा दिया है। फिर समझ आया कि असल में मैंने जमीन को समझा ही नहीं था।” छोटू ने कहा, “बाबा, आपने सिर्फ जमीन नहीं बदली, आपने पूरे गाँव को बदल दिया।” शंभू खेतों पर सुनहरी रोशनी फैल गई थी। हवा में फसल की खुशबू थी। शंभू ने अपनी जमीन की ओर देखा। उसे अपने पिता याद आए, अपनी पहली असफल फसल याद आई, लोगों की हँसी याद आई, वह रात याद आई जब उसने हार मानने का सोचा थाइसे संभालकर रखना। इसमें सिर्फ मिट्टी नहीं है। इसमें हमारे परिवार की मेहनत है, तेरी दादी की दुआ है, तेरी माँ की मेहनत है, मेरे पिता की सीख है और इस गाँव के लोगों की उम्मीद है। जमीन कभी किसी एक पी सूरज की आखिरी किरण उसके खेत पर पड़ रही थी। कभी जिस जमीन को लोग बेकार समझते थे, आज वही जमीन गाँव के लिए प्रेरणा बन चुकी थी। जिस किसान को लोग मूर्ख कहते थे, उसी किसान ने साबित कर दिया था कि हर सूखी मिट्टी हमेशा के लिए बंजर नहीं होती। कभी-कभी जमीन को सिर्फ कहता, गाँव के बुजुर्ग उसे शंभू की कहानी सुनाते। वे कहते, “बंजर जमीन वह नहीं जिसमें फसल नहीं उगती। बंजर तो वह सोच है जो कोशिश करने से पहले ही हार मान लेती है।” शंभू की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए यही संदेश बन गई कि प्रकृति को कहा, “भैया, जमीन बची रहेगी तो खेती भी रहेगी। खेती रहेगी तो गाँव भी रहेगा।”

समय के साथ शंभू की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी। उसने अपने घर की टूटी छत ठीक करवाई। छोटू के लिए किताबें खरीदीं। बूढ़ी माँ जमुना के इलाज के लिए पैसे जमा किए। गंगा ने घर के सामने फूल और सब्जियों का छोटा बगीचा बना लिया। अब उनके घर में पहले जैसी चिंता नहीं थी। फिर भी शंभू का जीवन सादा ही रहा। वह आज भी सुबह सूरज निकलने से पहले उठता, खेत में जाता और मिट्टी को हाथ में लेकर देखता।

एक सुबह जमुना ने शंभू को बुलाकर कहा, “बेटा, तेरे पिता आज होते तो तुझे देखकर बहुत खुश होते।” शंभू की आँखें भर आईं। उसने माँ के पैर छुए और कहा, “अम्मा, मैंने बस उनकी बात मानने की कोशिश की है।” जमुना बोली, “तेरे पिता कहते थे कि खेत को बेटा समझकर नहीं, माँ समझकर देखना। तूने माँ की सेवा की, इसलिए उसने तुझे अपना आशीर्वाद दिया।”

उस दिन शंभू खेत के बीच बैठा था। उसके चारों ओर फसल लहरा रही थी। हवा चल रही थी और बाजरे की बालियाँ धीरे-धीरे झूम रही थीं। उसने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई। कुछ साल पहले यही मिट्टी उसके हाथों से फिसलकर धूल बन जाती थी। आज वही मिट्टी नमी से भरी थी। शंभू ने मिट्टी को माथे से लगाया और कहा, “लोग तुझे बंजर कहते थे, लेकिन तूने मुझे कभी निराश नहीं किया। मुझे बस तुझे समझने में समय लगा।”

छोटू उसके पास आया और बोला, “बाबा, अब हमारी जमीन बंजर नहीं है ना?” शंभू मुस्कुराया और बोला, “नहीं बेटा। लेकिन याद रखना, जमीन हमेशा ऐसी रहे, इसके लिए मेहनत करनी होगी। अगर हम इसे फिर से लापरवाही से छोड़ देंगे तो यह फिर कमजोर हो सकती है।” छोटू ने कहा, “मैं आपकी तरह इसकी देखभाल करूँगा।” शंभू ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “मुझे खुशी है कि तू जमीन को सिर्फ खेत नहीं समझता।”

कुछ वर्षों बाद छोटू ने खेती के साथ पढ़ाई भी जारी रखी। उसने कृषि विज्ञान के बारे में पढ़ना शुरू किया। वह गाँव के किसानों के लिए नई जानकारी लाता। उसने मोबाइल से मौसम की जानकारी लेना सीखा, मिट्टी की जाँच करवाना सीखा और पानी की बचत के नए तरीके खोजे। शंभू उसे देखकर गर्व महसूस करता था। वह कहता, “मैंने मिट्टी को बचाने की शुरुआत की थी, तू इसे और बेहतर बनाना।”

रामपुर की कहानी धीरे-धीरे आसपास के गाँवों तक पहुँच गई। लोग शंभू को “बंजर जमीन का किसान” कहने लगे। पहले यह नाम उसका मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन अब वही नाम सम्मान का प्रतीक बन गया था। जब कोई नया किसान अपनी खराब जमीन की शिकायत लेकर शंभू के पास आता तो वह हमेशा एक ही बात कहता, “पहले मिट्टी को समझो। जमीन को दोष देने से कुछ नहीं होगा। देखो उसमें कमी क्या है और फिर धीरे-धीरे उसे सुधारो।”

एक बार एक गरीब किसान उसके पास आया और बोला, “मेरी जमीन भी तुम्हारी जमीन जैसी है। मैं क्या करूँ?” शंभू उसे खेत में ले गया। उसने मिट्टी हाथ में लेकर कहा, “सबसे पहले इसकी जाँच करवाओ। फिर पानी रोकने की कोशिश करो। जैविक पदार्थ बढ़ाओ। ऐसी फसल चुनो जो तुम्हारे क्षेत्र और पानी के हिसाब से हो। और सबसे जरूरी बात—एक साल में चमत्कार की उम्मीद मत करना।” किसान ने पूछा, “अगर फसल फिर भी नहीं हुई?” शंभू ने कहा, “तो कारण खोजेंगे और दोबारा कोशिश करेंगे। किसान का सबसे बड़ा हथियार उसकी मेहनत के साथ उसका धैर्य है।”

धीरे-धीरे रामपुर में किसानों का एक समूह बन गया। सभी मिलकर बीज खरीदते, तालाबों की सफाई करते और खेती की जानकारी साझा करते। गाँव में पहले जो किसान एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते थे, अब एक-दूसरे की मदद करने लगे। शंभू कहता था, “एक किसान की अच्छी फसल से एक घर बचता है, लेकिन पूरे गाँव की अच्छी खेती से पूरा गाँव बचता है।”

एक साल गाँव में बहुत अच्छी बारिश हुई। तालाब भर गए। खेतों में हरियाली छा गई। लोग खुश थे। लेकिन शंभू ने किसानों से कहा, “खुशी मनाओ, लेकिन पानी को बेकार मत जाने दो। आज पानी ज्यादा है, इसलिए कल के लिए बचाओ।” गाँव वालों ने उसकी बात मानी। उन्होंने पानी को खेतों और तालाबों में रोकने के लिए कई छोटे बाँध बनाए। अगले सूखे साल में यही पानी उनके काम आया।

शंभू अब बूढ़ा होने लगा था। उसके बाल सफेद हो गए थे और हाथों की नसें उभर आई थीं। लेकिन जब वह खेत में जाता तो उसकी चाल में अभी भी वही उत्साह होता। एक शाम वह अपने खेत की मेड़ पर बैठा सूर्यास्त देख रहा था। छोटू अब जवान हो चुका था और उसके पास बैठा था। शंभू ने कहा, “छोटू, जब मैं तेरी उम्र का था, तब मुझे लगता था कि जमीन ने मुझे धोखा दिया है। फिर समझ आया कि असल में मैंने जमीन को समझा ही नहीं था।” छोटू ने कहा, “बाबा, आपने सिर्फ जमीन नहीं बदली, आपने पूरे गाँव को बदल दिया।” शंभू हँसा और बोला, “नहीं बेटा, मैंने सिर्फ शुरुआत की थी। बदलाव सबने मिलकर किया।”

सूरज धीरे-धीरे पहाड़ियों के पीछे छिप रहा था। खेतों पर सुनहरी रोशनी फैल गई थी। हवा में फसल की खुशबू थी। शंभू ने अपनी जमीन की ओर देखा। उसे अपने पिता याद आए, अपनी पहली असफल फसल याद आई, लोगों की हँसी याद आई, वह रात याद आई जब उसने हार मानने का सोचा था और वह दिन भी याद आया जब पहली बार उसकी जमीन पर हरियाली दिखाई दी थी।

उसने मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई और छोटू के हाथ में रख दी। उसने कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें सिर्फ मिट्टी नहीं है। इसमें हमारे परिवार की मेहनत है, तेरी दादी की दुआ है, तेरी माँ की मेहनत है, मेरे पिता की सीख है और इस गाँव के लोगों की उम्मीद है। जमीन कभी किसी एक पीढ़ी की नहीं होती। हम इसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं और आने वाली पीढ़ी को वापस देते हैं।”

छोटू ने मिट्टी को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसने कहा, “मैं वादा करता हूँ बाबा, इसे कभी बंजर नहीं होने दूँगा।”

शंभू ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा। बादलों के बीच से सूरज की आखिरी किरण उसके खेत पर पड़ रही थी। कभी जिस जमीन को लोग बेकार समझते थे, आज वही जमीन गाँव के लिए प्रेरणा बन चुकी थी। जिस किसान को लोग मूर्ख कहते थे, उसी किसान ने साबित कर दिया था कि हर सूखी मिट्टी हमेशा के लिए बंजर नहीं होती। कभी-कभी जमीन को सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि धैर्य, समझ, मेहनत और उम्मीद की जरूरत होती है।

और उस दिन के बाद रामपुर में जब भी कोई किसी जमीन को “बंजर” कहता, गाँव के बुजुर्ग उसे शंभू की कहानी सुनाते। वे कहते, “बंजर जमीन वह नहीं जिसमें फसल नहीं उगती। बंजर तो वह सोच है जो कोशिश करने से पहले ही हार मान लेती है।” शंभू की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए यही संदेश बन गई कि प्रकृति को समझकर, मेहनत और धैर्य के साथ काम किया जाए तो कठिन से कठिन जमीन में भी जीवन की हरियाली लौटाई जा सकती है।

 

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