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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

तूफान में खड़ा पेड़

 



 

बहुत दूर, पहाड़ों से घिरी एक विशाल और सुनसान घाटी थी। उस घाटी के चारों ओर घना जंगल फैला हुआ था। जंगल इतना पुराना था कि उसकी मिट्टी में अनगिनत मौसमों की कहानियाँ दबी हुई थीं। वहाँ न कोई इंसान था, न किसी इंसान के बनाए रास्ते, न कोई घर और न कोई आवाज जो प्रकृति की आवाज से अलग हो। वहाँ केवल हवा बहती थी, नदी गुनगुनाती थी, पत्तियाँ सरसराती थीं और पक्षी अपनी छोटी-छोटी धुनों से जंगल को जीवित रखते थे। इसी जंगल के बीच एक बहुत पुराना पेड़ खड़ा था। उसका तना विशाल था, उसकी छाल पर समय की गहरी लकीरें थीं और उसकी शाखाएँ इतनी दूर तक फैली थीं कि उनके नीचे कई छोटे पौधे आराम से उग सकते थे। उसकी जड़ें धरती के भीतर बहुत गहराई तक चली गई थीं। किसी को नहीं पता था कि वह पेड़ कितने वर्षों से वहाँ खड़ा था, लेकिन जंगल के पुराने पत्थर भी उसकी उम्र के सामने नए लगते थे।

उस पेड़ ने अपनी पूरी जिंदगी मौसमों के साथ बिताई थी। उसने गर्मियों की तपती धूप को सहा था, जब नदी का पानी कम हो जाता था और जमीन पर दरारें पड़ जाती थीं। उसने सर्दियों की ठंडी हवाओं को महसूस किया था, जब उसकी शाखाओं पर ओस जम जाती थी। उसने हजारों बार बारिश को अपनी पत्तियों पर गिरते देखा था। कभी बारिश धीरे-धीरे आती थी और उसकी जड़ों को ठंडा कर देती थी, तो कभी इतनी तेज होती थी कि जंगल की मिट्टी बहकर नदी में मिलने लगती थी। पेड़ हर मौसम में खड़ा रहा था। उसके आसपास कई छोटे पौधे जन्मे, बड़े हुए और फिर समय के साथ सूखकर मिट्टी में मिल गए, लेकिन वह पेड़ वहीं रहा। उसकी शाखाओं पर पक्षियों ने घोंसले बनाए और फिर दूसरी जगह चले गए। बेलें उसके तने से लिपटीं और समय के साथ सूख गईं। काई ने उसकी छाल को ढक लिया और फिर बारिश के साथ बह गई। लेकिन पेड़ की जड़ें धरती में और गहरी होती चली गईं।

उस जंगल में रहने वाले पक्षियों के लिए वह पेड़ केवल एक पेड़ नहीं था। उसकी मोटी शाखाएँ उन्हें तेज धूप से बचाती थीं और उसकी घनी पत्तियाँ बारिश की बूंदों को धीमा कर देती थीं। छोटे पौधे उसकी छाया में उगते थे। गिलहरियाँ उसकी शाखाओं पर दौड़ती थीं। कभी-कभी हवा उसके पत्तों से गुजरती तो ऐसा लगता जैसे पूरा पेड़ कोई धीमा गीत गा रहा हो। नदी भी उसके पास से होकर गुजरती थी और बरसात के दिनों में उसका पानी पेड़ की जड़ों को छूकर आगे बढ़ता था। पेड़ ने नदी को कई बार शांत देखा था और कई बार उफनते हुए भी देखा था। प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं था, लेकिन उस पेड़ ने एक चीज सीखी थी कि बदलाव से बचा नहीं जा सकता। जो आता है, वह एक दिन चला भी जाता है। जो खिलता है, वह कभी न कभी सूखता है। जो शांत है, वह कभी न कभी तूफान में बदल सकता है।

एक सुबह जंगल असामान्य रूप से शांत था। सूरज की रोशनी पेड़ों की शाखाओं के बीच से छनकर नीचे आ रही थी। नदी का पानी बहुत धीमी गति से बह रहा था। घास पर ओस की बूंदें चमक रही थीं। पक्षी पेड़ों के बीच उड़ रहे थे और हवा इतनी हल्की थी कि पत्तियाँ भी मुश्किल से हिल रही थीं। बूढ़ा पेड़ अपनी शाखाओं को सूर्य की ओर फैलाए खड़ा था। लेकिन दूर आसमान में एक छोटा-सा काला बादल दिखाई दे रहा था। वह बादल धीरे-धीरे बढ़ रहा था। उसके पीछे और बादल आते गए। कुछ ही समय में नीला आकाश धूसर होने लगा। हवा की दिशा बदल गई। उसकी ठंडक अचानक बढ़ गई। पत्तियाँ एक साथ हिलने लगीं। पक्षियों ने अपनी उड़ान रोक दी और सुरक्षित शाखाओं की तलाश करने लगे। जंगल को समझ आ गया था कि कुछ बहुत बड़ा आने वाला है।

बादल अब पूरे आकाश पर छा चुके थे। सूरज गायब हो गया था। दिन होते हुए भी जंगल में अंधेरा उतरने लगा था। हवा पहले धीरे चली, फिर तेज हुई और कुछ ही देर में वह इतनी शक्तिशाली हो गई कि छोटे पेड़ जमीन तक झुकने लगे। दूर पहाड़ों के पीछे बिजली चमकी। कुछ क्षण बाद आसमान में भयंकर गर्जना हुई। नदी की सतह पर तेज लहरें बनने लगीं। सूखी पत्तियाँ हवा में गोल-गोल घूमने लगीं। बूढ़े पेड़ ने अपनी शाखाओं को कसकर फैलाया और अपनी जड़ों को धरती के भीतर और मजबूत कर लिया। वह जानता था कि तूफान आने वाला है। उसने अपने लंबे जीवन में ऐसे कई तूफान देखे थे, लेकिन हर तूफान अपने साथ एक नई परीक्षा लेकर आता था।

पहली बारिश की बूंद उसके ऊपर गिरी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। कुछ ही क्षणों में हजारों बूंदें आसमान से गिरने लगीं। बारिश इतनी तेज थी कि दूर की चीजें दिखाई देना बंद हो गईं। हवा चीख रही थी। बिजली बार-बार आकाश को चीर रही थी। जंगल के छोटे पेड़ बुरी तरह हिल रहे थे। कई सूखी शाखाएँ टूटकर जमीन पर गिरने लगीं। बूढ़े पेड़ की पत्तियाँ लगातार फड़फड़ा रही थीं। उसकी पतली टहनियाँ हवा में झूल रही थीं। उसके तने पर बारिश की धाराएँ बह रही थीं। तूफान लगातार अपनी ताकत बढ़ाता जा रहा था।

हवा ने अचानक अपना रुख बदला और पूरी शक्ति से पेड़ पर हमला किया। पेड़ का विशाल तना एक ओर झुक गया। उसकी जड़ों के आसपास की मिट्टी हिलने लगी। कुछ जड़ें जमीन के ऊपर दिखाई देने लगीं। पेड़ ने अपनी पूरी शक्ति से धरती को पकड़ा। उसकी शाखाएँ काँप रही थीं। कुछ पत्तियाँ टूटकर दूर उड़ गईं। एक बड़ी सूखी टहनी हवा में उड़ी और नदी में जा गिरी। पेड़ दर्द से जैसे भीतर तक काँप उठा, लेकिन वह गिरा नहीं। हवा ने उसे फिर धक्का दिया। इस बार उसका तना और ज्यादा झुका। ऐसा लगा जैसे अगले ही पल वह जमीन पर गिर जाएगा। लेकिन उसकी गहरी जड़ों ने धरती को पकड़ रखा था। उसके भीतर वर्षों से जमा ताकत उसे संभाले हुए थी।

तूफान को जैसे चुनौती पसंद आ गई थी। हवा ने अपनी गति और बढ़ा दी। पेड़ की ऊपरी शाखाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं। बिजली की चमक से पूरा जंगल कुछ क्षणों के लिए सफेद हो जाता और फिर सब कुछ अंधेरे में डूब जाता। बारिश अब पानी की दीवार जैसी लग रही थी। नदी अपने किनारों से बाहर निकलने लगी। जंगल की जमीन पर पानी भरने लगा। छोटे पौधे पानी में डूबने लगे। घास जमीन से चिपक गई। कई घोंसले टूटकर नीचे गिर गए। लेकिन बूढ़ा पेड़ अभी भी खड़ा था। उसकी शाखाओं पर बैठा एक छोटा पक्षी बारिश से बचने के लिए पत्तियों के बीच छिपा हुआ था। पेड़ की पत्तियाँ हवा में इतनी तेजी से हिल रही थीं कि फिर भी उसने उस छोटे जीव को अपने बीच जगह दे रखी थी।

अचानक एक भयंकर बिजली पास के पहाड़ पर गिरी। उसकी आवाज से पूरी घाटी काँप उठी। उसी क्षण हवा ने पेड़ की सबसे बड़ी शाखाओं में से एक को जोर से मोड़ा। शाखा पहले चरमराई, फिर उसके भीतर से एक गहरी आवाज आई और अगले ही पल वह टूटकर नीचे गिर गई। शाखा के साथ हजारों पत्तियाँ भी जमीन पर बिखर गईं। पेड़ का शरीर जैसे एक हिस्सा खो चुका था। उसका संतुलन भी बिगड़ गया। उसका तना और झुक गया। उसकी कुछ जड़ें मिट्टी से बाहर निकल आईं। बारिश उनके ऊपर लगातार गिर रही थी। मिट्टी पानी के साथ बह रही थी और जड़ों के नीचे की जमीन कमजोर होती जा रही थी।

अब पेड़ के सामने सबसे कठिन समय था। वह अपनी जगह से हिलना नहीं चाहता था, लेकिन धरती उसे छोड़ती जा रही थी। हवा उसे गिराना चाहती थी और पानी उसकी जड़ों के नीचे की मिट्टी बहा रहा था। उसकी शाखाएँ टूट चुकी थीं। उसका शरीर घायल था। फिर भी उसके भीतर कहीं एक गहरी शक्ति बची हुई थी। वह शक्ति उसकी जड़ों में थी। वे जड़ें केवल मिट्टी में नहीं थीं। वे वर्षों से धरती के पत्थरों, गहराई में मौजूद नमी और आसपास की मिट्टी से जुड़ी थीं। उन्होंने अनगिनत मौसम देखे थे। उन्होंने सूखे समय में पानी खोजा था। उन्होंने बारिश में मिट्टी को पकड़े रखा था। अब वही जड़ें पेड़ को अंतिम बार संभाल रही थीं।

तूफान कई घंटों तक चलता रहा। कभी हवा तेज होती, कभी कुछ क्षणों के लिए धीमी पड़ती और फिर पहले से अधिक शक्ति के साथ लौटती। हर बार बूढ़ा पेड़ थोड़ा झुकता, लेकिन वापस संभल जाता। उसकी कई शाखाएँ टूट चुकी थीं। उसकी पत्तियाँ लगभग आधी उड़ चुकी थीं। तने पर बिजली के पुराने निशान साफ दिखाई दे रहे थे। फिर भी उसकी सबसे मजबूत शाखाएँ आकाश की ओर उठी थीं। ऐसा लगता था जैसे वह अंधेरे आसमान के सामने अपनी आखिरी ताकत से खड़ा हो।

रात और गहरी हो गई। बारिश लगातार गिरती रही। जंगल में अब पक्षियों की आवाज नहीं थी। केवल तूफान की गर्जना सुनाई दे रही थी। नदी का पानी तेज होकर जंगल के बीच से गुजर रहा था। पेड़ की जड़ों के पास मिट्टी लगातार बह रही थी। अचानक पेड़ का एक हिस्सा जमीन से थोड़ा ऊपर उठ गया। उसका तना बुरी तरह काँपा। कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा कि अब वह गिर जाएगा। हवा ने पूरी शक्ति से उसे धक्का दिया। पेड़ एक तरफ झुका। उसकी जड़ें कराहती हुई मिट्टी में खिंच गईं। लेकिन उसी समय उसकी एक गहरी जड़ एक बड़े पत्थर के चारों ओर कस गई। पत्थर ने जड़ को सहारा दिया। दूसरी जड़ें भी मिट्टी और चट्टानों के बीच फँस गईं। पेड़ रुक गया।

तूफान अब भी पूरी ताकत से चल रहा था, लेकिन पेड़ को एक सहारा मिल चुका था। वह पूरी तरह सीधा नहीं था। वह पहले जैसा भी नहीं था। उसकी शाखाएँ टूट चुकी थीं और उसका तना घायल था। लेकिन वह गिरा नहीं था। वह झुका हुआ था, काँप रहा था, बारिश से भीगा हुआ था, फिर भी धरती से जुड़ा हुआ था। शायद यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी। वह तूफान को रोकने की कोशिश नहीं कर रहा था। वह केवल अपनी जड़ों को नहीं छोड़ रहा था।

धीरे-धीरे रात गुजरने लगी। बादलों की गर्जना कम होने लगी। हवा की गति घटने लगी। बारिश की धाराएँ पतली होने लगीं। बिजली दूर चली गई। नदी अब भी तेज थी, लेकिन उसका पानी धीरे-धीरे अपने किनारों की ओर लौटने लगा। आकाश के एक कोने में हल्की रोशनी दिखाई दी। तूफान चला गया था।

सुबह जब पहली सूर्य किरण जंगल पर पड़ी, तो पूरा दृश्य बदल चुका था। जहाँ पहले घना जंगल था, वहाँ जगह-जगह टूटी शाखाएँ पड़ी थीं। कई छोटे पेड़ जमीन पर गिरे थे। पत्तियाँ कीचड़ में दब गई थीं। नदी का पानी गंदा था। मिट्टी बह चुकी थी। कई घोंसले टूटे हुए थे। लेकिन उसी उजड़े हुए जंगल के बीच बूढ़ा पेड़ अब भी खड़ा था।वह पहले जैसा नहीं था।

उसकी एक विशाल शाखा गायब थी। उसकी छाल कई जगह से फट चुकी थी। उसकी जड़ें मिट्टी से बाहर दिखाई दे रही थीं। उसका तना थोड़ा झुका हुआ था। उसकी बहुत-सी पत्तियाँ गिर चुकी थीं। लेकिन उसकी कुछ शाखाओं पर अभी भी हरी पत्तियाँ थीं। सूरज की रोशनी उन पत्तियों पर पड़ी तो वे चमकने लगीं।

सुबह की हवा धीरे-धीरे जंगल में लौटी। उसने टूटे हुए पेड़ों को छुआ। उसने नदी की सतह पर हाथ फेरा। फिर वह बूढ़े पेड़ की शाखाओं के बीच से होकर गुजरी। इस बार हवा में तूफान की हिंसा नहीं थी। वह शांत थी। उसने पेड़ की पत्तियों को हल्के से हिलाया। पेड़ ने भी धीरे से अपनी शाखाएँ हिलाईं। ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को पहचानते हों।

कुछ समय बाद जंगल में जीवन फिर लौटने लगा। पक्षी अपने पुराने स्थानों को देखने आए। जिन घोंसलों को तूफान ने तोड़ दिया था, उनके आसपास नए तिनके दिखाई देने लगे। नदी के किनारे नई घास उगने लगी। मिट्टी में दबे छोटे बीज पानी पाकर फूटने लगे। टूटे हुए पेड़ों के पास नए पौधे निकल आए। जंगल ने अपनी चोटों को छिपाने की कोशिश नहीं की। वह उन्हें अपने भीतर लेकर फिर से बढ़ने लगा।

बूढ़ा पेड़ भी धीरे-धीरे बदलने लगा। उसकी टूटी शाखाओं के पास छोटे-छोटे नए अंकुर निकल आए। कुछ महीनों बाद उन पर नई पत्तियाँ उगने लगीं। उसकी जड़ों के पास मिट्टी फिर जमा होने लगी। नदी ने अपना रास्ता थोड़ा बदल लिया और उसकी एक छोटी धारा पेड़ की जड़ों तक आने लगी। बारिश ने जमीन को फिर नम कर दिया। पेड़ की छाल पर नई काई उगने लगी।समय बीतता गया।एक मौसम गया।दूसरा आया।फिर तीसरा।

पेड़ अब भी थोड़ा झुका हुआ था। उसका तना पहले से अधिक घायल था। उसकी पुरानी शाखाओं में से कुछ कभी वापस नहीं आईं। लेकिन उसके शरीर से नई शाखाएँ निकलने लगी थीं। वह पहले जैसा विशाल नहीं रहा था, लेकिन अब उसके भीतर एक नई सुंदरता थी। उसकी चोटें उसकी कमजोरी नहीं लगती थीं। वे उसकी कहानी का हिस्सा बन चुकी थीं।

कई वर्षों बाद उसी जंगल में एक छोटा पौधा बड़ा होकर पेड़ बनने लगा। वह बूढ़े पेड़ की छाया के पास उगा था। उसकी पतली शाखाएँ हवा में हिलती थीं। जब तेज हवा आती तो वह डरकर झुक जाता। लेकिन बूढ़ा पेड़ उसके ऊपर अपनी शाखाएँ फैलाए खड़ा रहता। वह छोटा पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता गया। उसने कई मौसम देखे। उसने पहली बार बारिश को महसूस किया। उसने पहली बार तेज हवा का सामना किया। उसने पहली बार बिजली की चमक देखी।एक दिन फिर आसमान पर काले बादल दिखाई दिए।हवा बदल गई।दूर पहाड़ों के पीछे बिजली चमकी।छोटा पेड़ काँपने लगा।बूढ़े पेड़ ने अपनी शाखाएँ हिलाईं।हवा तेज होती गई।बारिश शुरू हुई।छोटा पेड़ झुक गया।तूफान ने जंगल को घेर लिया।

लेकिन इस बार छोटा पेड़ अकेला नहीं था। उसके पास बूढ़ा पेड़ खड़ा था। वह अभी भी मजबूत था। उसकी जड़ें पहले से भी ज्यादा गहरी हो चुकी थीं। उसने अपने लंबे जीवन में सीखा था कि हर तूफान को रोकना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी तूफान को गुजरने देना पड़ता है। कभी झुकना पड़ता है। कभी कुछ शाखाएँ खोनी पड़ती हैं। लेकिन जब तक जड़ें धरती से जुड़ी रहें, तब तक जीवन फिर लौट सकता है।

उस रात हवा बहुत तेज चली। छोटे पेड़ की शाखाएँ काँपती रहीं। बारिश उसके ऊपर बरसती रही। लेकिन वह गिरा नहीं। बूढ़े पेड़ की शाखाएँ उसके ऊपर एक सुरक्षा की तरह फैली थीं। दोनों पेड़ तूफान के बीच खड़े रहे।सुबह जब तूफान खत्म हुआ, तो आसमान फिर साफ था। सूर्य धीरे-धीरे बादलों के पीछे से निकला। जंगल की जमीन पर पानी चमक रहा था। हवा में मिट्टी की सुगंध थी। नदी शांत होकर बह रही थी। बूढ़े पेड़ की टूटी शाखाओं के बीच नई पत्तियाँ चमक रही थीं। छोटा पेड़ भी खड़ा था। उसकी कुछ पत्तियाँ टूट गई थीं, उसकी एक शाखा झुक गई थी, लेकिन उसकी जड़ें धरती में थीं।

सूरज की रोशनी दोनों पेड़ों पर पड़ी।बूढ़ा पेड़ चुप था।छोटा पेड़ भी चुप था।लेकिन उस सुबह जंगल की चुप्पी में एक गहरा अर्थ था।तूफान आया था।उसने बहुत कुछ तोड़ा था।उसने शाखाएँ छीनी थीं।पत्तियाँ उड़ाई थीं।मिट्टी बहाई थी।लेकिन वह जंगल का जीवन खत्म नहीं कर सका था।क्योंकि जीवन केवल शाखाओं में नहीं होता।जीवन जड़ों में भी होता है।और जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वह टूटने के बाद भी फिर उग सकता है।बूढ़ा पेड़ अब पहले जैसा नहीं था, लेकिन शायद उसे पहले जैसा होने की जरूरत भी नहीं थी। उसकी टूटी शाखाएँ बता रही थीं कि उसने तूफान देखा था। उसकी गहरी जड़ें बता रही थीं कि उसने हार नहीं मानी थी। उसकी नई पत्तियाँ बता रही थीं कि अंत के बाद भी शुरुआत संभव है।सालों तक वह पेड़ उसी जंगल में खड़ा रहा।हर बार जब बारिश आती, उसकी शाखाएँ बूंदों से भर जातीं।हर बार जब हवा चलती, उसकी पत्तियाँ गातीं।

हर बार जब सूरज उगता, उसकी छाया लंबी होकर जंगल में फैल जाती।और जब भी दूर आसमान में काले बादल दिखाई देते, जंगल के छोटे पौधे उसकी ओर देखते।वह अब केवल एक पुराना पेड़ नहीं था।वह तूफानों की स्मृति था।वह धैर्य की निशानी था।वह उस शक्ति का प्रतीक था जो बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन धरती के भीतर गहराई में मौजूद रहती है।और जब अगला तूफान आया, तो पेड़ फिर खड़ा था।हवा गरजी।बादल गरजे।बिजली चमकी।बारिश बरसी।पेड़ झुका।उसकी शाखाएँ काँपीं।कुछ पत्तियाँ फिर उड़ गईं।लेकिन उसकी जड़ें धरती के भीतर और गहरी थीं।इसलिए तूफान गुजर गया।और पेड़ वहीं रहा।थोड़ा झुका हुआ।थोड़ा घायल।लेकिन जीवित।क्योंकि मजबूत वही नहीं होता जो कभी नहीं टूटता। मजबूत वह होता है जो टूटने के बाद भी अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है और फिर से बढ़ना सीखता है।

 

 

 

 

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