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जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

एक बूंद पानी की कीमत

 


 

सोनपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव था। कभी यह गाँव अपनी हरियाली, ठंडी हवाओं, मीठे पानी और चारों तरफ फैले खेतों के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। गाँव के बीचों-बीच एक बड़ा तालाब था, जिसके किनारे पुराने बरगद और पीपल के पेड़ खड़े रहते थे। बरसात के दिनों में तालाब पानी से लबालब भर जाता था और उसकी सतह पर सूरज की किरणें ऐसे चमकती थीं जैसे किसी ने हजारों छोटे-छोटे दीपक जला दिए हों। तालाब में मछलियाँ तैरती थीं, पक्षी पानी पीते थे और आसपास की मिट्टी हमेशा नम रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे समय बदल गया। कई वर्षों तक बारिश कम होती गई। लोगों ने पेड़ों को काटकर खेत बढ़ा लिए, तालाब की सफाई बंद कर दी और पानी का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे करने लगे। किसी ने यह नहीं सोचा कि जिस पानी को वे आज आसानी से बहा रहे हैं, कल वही पानी उन्हें एक-एक बूंद के लिए तरसा सकता है। कुछ वर्षों बाद सोनपुर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। खेतों में हरियाली की जगह सूखी मिट्टी दिखाई देने लगी, तालाब की जगह गहरी दरारों वाली जमीन बची थी और गाँव के पुराने कुएँ इतने नीचे चले गए थे कि उनकी तलहटी भी दिखाई देने लगी थी।

इसी सोनपुर गाँव में विक्रम नाम का एक युवक रहता था। विक्रम साधारण परिवार से था, लेकिन उसकी सोच बहुत बड़ी थी। उसके पिता का देहांत कई साल पहले हो चुका था। घर में उसकी बूढ़ी माँ और छोटी बहन गौरी थी। पिता के जाने के बाद विक्रम ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी और खेतों में काम करके परिवार चलाने लगा था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन थी, जिस पर वह मौसम के अनुसार खेती करता था। पहले उसके खेत में गेहूँ, धान, सब्जियाँ और दालें उगती थीं, लेकिन अब पानी की कमी के कारण खेत का बड़ा हिस्सा सूखा पड़ा रहता था। विक्रम सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता, घर के बाहर रखे खाली घड़े को उठाता और कई किलोमीटर दूर स्थित पुराने कुएँ की ओर निकल जाता। उसकी माँ अक्सर उसे जाते हुए देखती और कहती, “बेटा, संभलकर जाना, आजकल रास्ते में भी गर्मी बहुत बढ़ गई है।” विक्रम मुस्कुराकर कहता, “माँ, आप चिंता मत करो, मैं जल्दी लौट आऊँगा।” लेकिन वह जानता था कि पानी लाने का रास्ता अब पहले जैसा आसान नहीं रहा था।

एक सुबह विक्रम घर से निकला तो आसमान साफ था और सूरज की पहली किरणें धरती पर पड़ रही थीं। हवा में जरा भी ठंडक नहीं थी। रास्ते में उसे कई लोग दिखाई दिए। किसी के सिर पर घड़ा था, किसी के हाथ में बाल्टी और कोई अपने पशुओं को लेकर पानी की तलाश में जा रहा था। गाँव के बच्चे भी अब खेल के मैदान में नहीं बल्कि पानी भरने की कतार में दिखाई देने लगे थे। जब विक्रम पुराने कुएँ के पास पहुँचा तो वहाँ पहले से बहुत लंबी लाइन लगी हुई थी। लोग चुपचाप अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। कुछ लोग थके हुए जमीन पर बैठे थे और कुछ खाली बर्तनों को बार-बार देख रहे थे। कुएँ में पानी इतना कम बचा था कि एक बाल्टी भरने में कई मिनट लगते थे। विक्रम ने रस्सी नीचे डाली। बाल्टी काफी देर तक नीचे जाती रही। जब उसने बाल्टी ऊपर खींची तो उसमें मुश्किल से आधा पानी था। उसने उस पानी को घड़े में डाला और फिर दूसरी बार रस्सी नीचे डालने लगा। तभी उसके पीछे खड़े एक बूढ़े किसान ने कहा, “बेटा, अब पानी को पानी मत समझना, इसे जीवन समझकर संभालना। हमने अपनी आँखों के सामने इस गाँव का पानी खत्म होते देखा है।”

विक्रम ने बूढ़े किसान की बात ध्यान से सुनी। उसने पूछा, “चाचा, क्या हमारे गाँव में कभी पानी की इतनी कमी नहीं थी?” बूढ़े किसान ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “नहीं बेटा, जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब इस गाँव में कुएँ कभी खाली नहीं होते थे। तालाब साल भर भरा रहता था। बरसात का पानी खेतों में रुकता था और जमीन उसे अपने अंदर समेट लेती थी। पेड़ बहुत थे, इसलिए मिट्टी में नमी बनी रहती थी। फिर लोगों ने तालाब की जमीन पर कब्जा करना शुरू किया, पेड़ काट दिए, नालियाँ बंद कर दीं और पानी को बहने दिया। हमने सोचा था कि पानी हमेशा मिलता रहेगा। लेकिन प्रकृति किसी को चेतावनी बार-बार नहीं देती।” विक्रम कुछ देर तक चुप रहा। उसे लगा जैसे बूढ़े किसान की आवाज में केवल शिकायत नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी भी छिपी थी।

विक्रम पानी लेकर घर पहुँचा तो उसकी माँ ने घड़ा हाथ में लिया और पानी को बहुत सावधानी से एक बड़े बर्तन में डाल दिया। उसने पानी की एक भी बूंद जमीन पर नहीं गिरने दी। विक्रम की छोटी बहन गौरी बोली, “भैया, क्या आज इतना ही पानी मिला?” विक्रम ने सिर हिलाया। माँ ने पानी को अलग-अलग बर्तनों में बाँटना शुरू किया। थोड़ा पानी पीने के लिए, थोड़ा खाना बनाने के लिए और थोड़ा बहुत जरूरी काम के लिए। विक्रम ने देखा कि उसकी माँ अपने हिस्से का पानी भी बचाकर रख रही थी। उसने पूछा, “माँ, आप पानी क्यों नहीं पी रही हैं?” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे प्यास नहीं है।” विक्रम समझ गया कि माँ सच नहीं बोल रही थी। उसने अपना हिस्सा माँ के सामने रख दिया और कहा, “पहले आप पीजिए, फिर मैं पीऊँगा।” माँ ने बहुत समझाया, लेकिन आखिरकार उसे पानी पीना पड़ा। उस दिन विक्रम के मन में पहली बार पानी की कीमत का एहसास पहले से कहीं अधिक गहरा हुआ।

उस दिन दोपहर में विक्रम अपने खेत पर गया। खेत की मिट्टी सूखी हुई थी। उसने हाथ में मिट्टी उठाई तो वह धूल की तरह उँगलियों से नीचे गिर गई। कुछ जगहों पर जमीन में इतनी गहरी दरारें थीं कि उनमें उसका हाथ आसानी से चला जाता था। खेत के किनारे लगे दो छोटे पौधे मुरझा चुके थे। विक्रम ने अपने घड़े से थोड़ा पानी निकाला और पौधों की जड़ों में डाल दिया। पास से गुजर रहे उसके पड़ोसी ने कहा, “विक्रम, अपना पानी पौधों पर मत खर्च करो। घर के लिए भी पानी कम है।” विक्रम ने जवाब दिया, “अगर आज हर पौधे को मरने दिया, तो कल हमें छाया भी नहीं मिलेगी और बारिश रोकने वाली हरियाली भी नहीं बचेगी।” पड़ोसी हँसकर बोला, “एक-दो पौधों से गाँव नहीं बचने वाला।” विक्रम ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में एक विचार जन्म ले चुका था।

शाम को विक्रम गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठा था। वह वही जगह थी जहाँ बचपन में उसके पिता उसे बैठाकर कई कहानियाँ सुनाया करते थे। उसके पिता कहा करते थे कि पानी धरती का खून है और पेड़ धरती के फेफड़े हैं। अगर पानी और पेड़ दोनों खत्म हो गए तो जमीन जीवित नहीं रह सकती। विक्रम ने चारों तरफ देखा। बरगद के अलावा लगभग सारे बड़े पेड़ काट दिए गए थे। तालाब की ओर जाने वाली पुरानी नाली मिट्टी और कचरे से बंद थी। गाँव की कई गलियाँ ऐसी थीं जहाँ बरसात का पानी पहले तालाब तक पहुँचता था, लेकिन अब वहाँ घर और दीवारें बन चुकी थीं। विक्रम ने तय किया कि वह इस समस्या को केवल देखकर चुप नहीं बैठेगा।

अगली सुबह वह गाँव के बुजुर्गों के पास गया। उसने सबको तालाब की सफाई और पुरानी नाली खोलने की बात बताई। कुछ लोगों ने उसकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन कई लोग हँसने लगे। एक व्यक्ति बोला, “जब बारिश ही नहीं होती तो तालाब साफ करके क्या होगा?” विक्रम ने कहा, “बारिश कम होती है, लेकिन जब होती है तो उसका पानी भी हम रोक नहीं पाते। अगर तालाब और नालियाँ साफ होंगी तो थोड़ी बारिश का पानी भी जमा किया जा सकता है।” एक और आदमी बोला, “तुम्हें खेती का इतना अनुभव नहीं है कि गाँव को पानी सिखाओ।” विक्रम ने शांत स्वर में कहा, “मैं किसी को सिखाने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि अगर हम कुछ नहीं करेंगे तो आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे।” बुजुर्गों में से एक ने विक्रम की बात का समर्थन किया, लेकिन फिर भी कोई बड़ा निर्णय नहीं हुआ।

कुछ दिनों बाद गाँव में पानी की समस्या और बढ़ गई। पुराने कुएँ का पानी भी लगभग खत्म हो गया। अब लोगों को दूसरे गाँव तक जाना पड़ता था। एक दिन गाँव की एक महिला पानी लेने गई तो रास्ते में बेहोश होकर गिर पड़ी। लोग उसे उठाकर घर लाए। इस घटना ने गाँव के लोगों को पहली बार गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया। विक्रम ने उसी शाम सभी लोगों को बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया। उसने कहा, “हम रोज पानी के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन हम पानी बचाने के लिए एक साथ क्यों नहीं लड़ सकते? तालाब की सफाई हम खुद कर सकते हैं। पुरानी नाली खोल सकते हैं। घरों की छतों से बारिश का पानी जमा कर सकते हैं। खेतों के किनारे छोटे-छोटे गड्ढे बना सकते हैं ताकि बारिश का पानी जमीन में जाए। अगर हम अभी शुरुआत करें तो शायद देर नहीं हुई है।”

इस बार गाँव के कुछ युवाओं ने विक्रम का साथ दिया। अगले दिन सुबह विक्रम, गौरी और गाँव के कई युवक तालाब की सूखी जमीन पर पहुँचे। उन्होंने वहाँ जमा प्लास्टिक, कचरा, पत्थर और झाड़ियाँ हटानी शुरू कीं। शुरुआत में काम बहुत कठिन था। धूप तेज थी और पानी पीने के लिए भी पर्याप्त नहीं था। फिर भी सभी काम करते रहे। गाँव के बच्चों ने भी छोटे-छोटे कचरे के टुकड़े उठाने शुरू कर दिए। कुछ महिलाएँ अपने घरों से थोड़ा पानी लेकर आईं ताकि काम करने वालों को प्यास लगने पर पानी मिल सके। धीरे-धीरे पूरे गाँव का माहौल बदलने लगा।

तीन दिन तक लगातार काम करने के बाद तालाब की पुरानी नाली दिखाई देने लगी। विक्रम ने देखा कि नाली मिट्टी से पूरी तरह बंद थी। उसने युवाओं के साथ मिलकर मिट्टी हटाई। नाली के आगे एक पुराना पत्थर का रास्ता था जो तालाब तक जाता था। विक्रम को समझ आ गया कि कभी बारिश का पानी इसी रास्ते से तालाब में आता होगा। उसने लोगों से कहा कि इस रास्ते को भी साफ करना होगा। सभी ने मिलकर काम किया। कई दिनों की मेहनत के बाद तालाब का रास्ता खुल गया। अब केवल बारिश का इंतजार था।

लेकिन बारिश अभी दूर थी। गाँव के लोग फिर भी निराश नहीं हुए। विक्रम ने सुझाव दिया कि हर घर में पानी बचाने की व्यवस्था की जाए। उसने पुराने ड्रम और बड़े बर्तनों का इस्तेमाल करके बारिश का पानी जमा करने का तरीका बताया। उसने लोगों को समझाया कि छत पर गिरने वाला पानी पाइप के माध्यम से किसी टंकी या गड्ढे में जमा किया जा सकता है। कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया, लेकिन कई घरों ने उसकी बात मान ली। विक्रम ने अपने घर की छत पर सबसे पहले यह व्यवस्था बनाई। गौरी ने पाइप जोड़ने में उसकी मदद की। उसकी माँ दूर खड़ी होकर दोनों को देखती रही और उसके चेहरे पर वर्षों बाद उम्मीद दिखाई दी।

कुछ सप्ताह बाद आसमान में बादल दिखाई दिए। पूरा गाँव बादलों की ओर देखने लगा। हवा में नमी बढ़ने लगी। बच्चों ने खुशी से चिल्लाना शुरू कर दिया। शाम तक तेज हवा चलने लगी और फिर अचानक बारिश की पहली बूंद जमीन पर गिरी। विक्रम ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। एक बूंद उसकी हथेली पर आकर ठहर गई। वह कुछ पल तक उस बूंद को देखता रहा। उसे लगा जैसे पूरी धरती ने राहत की साँस ली हो। कुछ ही मिनटों में बारिश तेज हो गई। छतों से पानी बहने लगा। गाँव के लोग खुशी से बाहर निकल आए। बच्चों ने बारिश में नाचना शुरू कर दिया। लेकिन विक्रम और उसके साथियों ने तुरंत पानी जमा करने वाली व्यवस्थाओं की ओर ध्यान दिया। बारिश का पानी पाइप से टंकियों और गड्ढों में जाने लगा। पुरानी नाली से पानी बहता हुआ तालाब की ओर जाने लगा।

तालाब में धीरे-धीरे पानी जमा होने लगा। पहले एक पतली धारा बनी, फिर वह धारा चौड़ी होने लगी। गाँव के लोग तालाब के किनारे खड़े होकर उसे भरते देखते रहे। कई बुजुर्गों की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें अपना बचपन याद आ गया था। रातभर बारिश होती रही। सुबह जब सूरज निकला तो तालाब में पानी की एक चमकदार परत दिखाई दे रही थी। वह अभी पूरी तरह नहीं भरा था, लेकिन उसके अंदर जीवन लौटने का संकेत साफ दिखाई दे रहा था।

विक्रम ने उसी दिन गाँव वालों से कहा, “यह पानी सिर्फ आज की खुशी नहीं है। अगर हमने इसे फिर से बर्बाद किया तो कुछ वर्षों बाद यही समस्या वापस आ जाएगी। हमें पानी को जमा करना ही नहीं, जमीन के अंदर भी पहुँचाना होगा।” उसने खेतों के पास छोटे-छोटे जलसंचय गड्ढे बनवाए। गाँव के युवाओं ने मिट्टी काटकर कई जगह छोटे बाँध बनाए। पेड़ लगाने का अभियान शुरू किया गया। हर परिवार से कहा गया कि कम से कम दो पेड़ लगाए जाएँ और उनकी देखभाल की जाए। बच्चों को भी इस काम में शामिल किया गया। गौरी ने गाँव के बच्चों के साथ मिलकर एक छोटा-सा समूह बनाया जिसका नाम उन्होंने “जल प्रहरी” रखा। बच्चे घर-घर जाकर लोगों को समझाते कि नल खुला न छोड़ें, बर्तन धोते समय पानी बचाएँ और जरूरत से ज्यादा पानी न लें।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। एक साल बाद फिर गर्मी आई। इस बार बारिश पिछले साल से कम हुई। कुछ लोग घबरा गए और कहने लगे कि सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। विक्रम ने गाँव वालों को समझाया कि बदलाव एक वर्ष में नहीं आता। पिछले वर्ष जमा किए गए पानी से तालाब में कुछ पानी बचा था। पेड़ों के कारण मिट्टी में नमी भी थी। पुराने कुएँ में भी पिछले वर्षों की तुलना में पानी ज्यादा था। गाँव के लोगों को पहली बार समझ आया कि पानी बचाने का असर केवल बारिश के समय नहीं बल्कि लंबे समय तक दिखाई देता है।

उसी गर्मी में एक दिन विक्रम खेत से लौट रहा था। रास्ते में उसे एक छोटा बच्चा दिखाई दिया, जिसके हाथ में आधा भरा हुआ गिलास था। बच्चा गिलास का पानी खेलते-खेलते जमीन पर गिरा रहा था। विक्रम ने उसे रोका और पूछा, “तुम पानी क्यों गिरा रहे हो?” बच्चे ने कहा, “यह तो बस थोड़ा-सा पानी है।” विक्रम मुस्कुराया और जमीन पर गिरी पानी की बूंदों को देखते हुए बोला, “तुम्हें यह थोड़ा-सा पानी लग रहा है, लेकिन अगर हजार लोग रोज इतना ही पानी बर्बाद करें तो सोचो कितना पानी खत्म हो जाएगा।” बच्चे ने गिलास को दोनों हाथों से पकड़ लिया और बोला, “अब मैं पानी नहीं गिराऊँगा।” विक्रम ने उसके सिर पर हाथ रखा।

उस शाम विक्रम अपनी माँ के पास बैठा था। माँ ने उससे पूछा, “बेटा, तुम्हें याद है जब घर में पानी की एक-एक बूंद के लिए चिंता होती थी?” विक्रम ने कहा, “हाँ माँ, वही दिन तो मुझे हमेशा याद रहेंगे।” माँ बोली, “तुमने उस समय हार नहीं मानी। अगर तुम भी बाकी लोगों की तरह सोचते कि पानी की समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी तो शायद आज गाँव की हालत अलग होती।” विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, “मैंने कुछ अकेले नहीं किया माँ। जब लोगों ने मिलकर काम किया, तभी बदलाव आया।”

कुछ दिनों बाद गाँव में एक बड़ी सभा हुई। इस सभा में सभी लोग मौजूद थे। बुजुर्ग, किसान, महिलाएँ, बच्चे और युवा सभी बरगद के नीचे बैठे थे। गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, “हमने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है, लेकिन आज हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमने पानी की कीमत बहुत देर से समझी।” उन्होंने विक्रम की ओर देखते हुए कहा, “इस लड़के ने हमें कोई चमत्कार नहीं दिया। इसने हमें हमारी अपनी गलती दिखाई और उसे सुधारने का रास्ता बताया।” लोगों ने तालियाँ बजाईं। विक्रम ने हाथ जोड़कर कहा, “अगर हम फिर से वही गलती करेंगे तो यह सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। पानी किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह सबका है और इसे बचाना भी सबकी जिम्मेदारी है।”

समय बीतता गया। सोनपुर धीरे-धीरे बदलने लगा। तालाब की सफाई नियमित होने लगी। बरसात का पानी अब सीधे नालियों में बहकर गाँव से बाहर नहीं जाता था। कई जगह छोटे जलसंचय क्षेत्र बनाए गए। खेतों में पानी बचाने वाली खेती की तकनीक अपनाई गई। लोगों ने पेड़ों को काटना बंद कर दिया। पुराने कुओं की सफाई की गई। गाँव की गलियों में पानी बर्बाद करने पर लोग एक-दूसरे को समझाने लगे। सबसे बड़ा बदलाव लोगों की सोच में आया था। पहले पानी केवल एक साधारण चीज माना जाता था, लेकिन अब हर व्यक्ति उसे जीवन का आधार समझने लगा था।

एक वर्ष बरसात बहुत अच्छी हुई। तालाब पूरी तरह भर गया। उसकी सतह पर कमल के फूल दिखाई देने लगे। पक्षी वापस आने लगे। तालाब के किनारे नए लगाए गए पेड़ धीरे-धीरे बड़े होने लगे। खेतों में फिर से हरियाली लौट आई। दूर से सोनपुर को देखने पर ऐसा लगता था जैसे सूखी धरती पर किसी ने हरे रंग की चादर बिछा दी हो। गाँव के बच्चे तालाब के किनारे खेलते, लेकिन अब वे पानी में कचरा नहीं डालते थे। उन्हें बचपन से सिखाया गया था कि तालाब केवल पानी का स्थान नहीं बल्कि पूरे गाँव का जीवन है।

एक दिन विक्रम उसी तालाब के किनारे बैठा था। शाम का समय था। सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे जा रहा था। तालाब के पानी पर सुनहरी रोशनी पड़ रही थी। विक्रम ने अपनी हथेली पानी में डाली और एक बूंद उठाकर उसे गौर से देखने लगा। उसे वर्षों पहले की वह गर्मी याद आ गई जब उसकी माँ ने अपने हिस्से का पानी भी बचाकर रखा था। उसे वह सूखा कुआँ याद आया, वह बूढ़ा किसान याद आया, सूखे खेत याद आए और वह दिन भी याद आया जब लोग पानी की तलाश में कई किलोमीटर चलते थे। उसने महसूस किया कि कभी-कभी इंसान किसी चीज की कीमत तब समझता है जब वह उसके हाथ से निकलने लगती है।

गौरी उसके पास आकर बैठ गई। उसने पूछा, “भैया, आप क्या सोच रहे हो?” विक्रम ने हथेली पर रखी पानी की बूंद की ओर देखते हुए कहा, “मैं सोच रहा हूँ कि इस एक बूंद की कीमत कितनी है।” गौरी हँसकर बोली, “एक बूंद की भी कोई कीमत होती है?” विक्रम ने कहा, “हाँ, अगर किसी प्यासे के पास पानी की आखिरी बूंद हो तो उसकी कीमत दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा हो सकती है। अगर खेत में सूखे पौधे की जड़ तक पानी की एक बूंद पहुँच जाए तो वह बूंद पूरे पौधे को जीवन दे सकती है। अगर किसी बच्चे की प्यास बुझाने के लिए पानी की आखिरी बूंद बची हो तो वही बूंद उसके लिए अमूल्य हो जाती है। पानी की कीमत उसके बाजार के दाम से नहीं, उसके बिना जीवन की कीमत से समझी जाती है।”

गौरी कुछ देर तक चुप रही। उसने तालाब की ओर देखा। फिर बोली, “तो क्या हमें हमेशा पानी की कीमत याद रखनी चाहिए?” विक्रम ने कहा, “हाँ, क्योंकि पानी खत्म होने के बाद उसकी कीमत समझना बहुत देर हो जाती है। असली समझदारी यही है कि जब हमारे पास पानी हो, तभी उसकी कद्र करें।” दोनों भाई-बहन कुछ देर तक तालाब के किनारे बैठे रहे।

कुछ महीनों बाद सोनपुर में एक नई परंपरा शुरू हुई। हर साल पहली बारिश के दिन गाँव के सभी लोग तालाब के किनारे इकट्ठा होते और पानी बचाने का संकल्प लेते। बच्चे मिट्टी के छोटे घड़े बनाकर उनमें पानी भरते और उन्हें पेड़ों के पास रखते। महिलाएँ घरों में पानी बचाने के तरीके बतातीं। किसान खेतों में पानी रोकने के उपाय साझा करते। बुजुर्ग पुराने समय की बातें सुनाते। विक्रम हर वर्ष बच्चों से केवल एक बात कहता, “पानी को कभी छोटा मत समझना। नदी बड़ी होती है, तालाब बड़ा होता है, कुआँ बड़ा होता है, लेकिन इन सबकी शुरुआत बूंदों से होती है।”

एक बार गाँव के बाहर से कुछ लोग सोनपुर देखने आए। उन्होंने देखा कि जिस गाँव को कुछ वर्ष पहले पानी की कमी के कारण लोग छोड़ने की सोच रहे थे, वही गाँव अब पानी बचाने का उदाहरण बन चुका था। उन्होंने विक्रम से पूछा, “तुमने यह सब कैसे किया?” विक्रम ने कहा, “मैंने कुछ नया नहीं किया। हमने बस वह काम शुरू किया जिसे हमारे पूर्वज पहले से जानते थे। पानी को रोकना, पेड़ लगाना, मिट्टी को बचाना और जरूरत के अनुसार पानी इस्तेमाल करना। हमने केवल अपनी भूल सुधारने की कोशिश की है।” उन लोगों ने उसकी बात ध्यान से सुनी और अपने गाँव में भी ऐसी व्यवस्था शुरू करने का निर्णय लिया।

धीरे-धीरे सोनपुर की कहानी आसपास के गाँवों तक पहुँची। कई गाँवों के लोग वहाँ आए और तालाब की व्यवस्था देखने लगे। विक्रम ने उन्हें बताया कि पानी बचाने के लिए किसी बड़े साधन की जरूरत नहीं होती। छोटे-छोटे कदम भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। अगर एक घर रोज कुछ लीटर पानी बचाए और सौ घर ऐसा करें तो हजारों लीटर पानी बचाया जा सकता है। अगर हर व्यक्ति एक पेड़ लगाए और उसे बड़ा होने तक बचाए तो कुछ वर्षों में जमीन की नमी, छाया और वातावरण में बड़ा बदलाव आ सकता है। अगर बारिश की हर बूंद को बहने देने के बजाय जमीन में पहुँचाया जाए तो कुओं और तालाबों का जीवन बढ़ सकता है।

एक दिन विक्रम गाँव के उसी पुराने कुएँ के पास पहुँचा जहाँ कभी लंबी कतार लगी रहती थी। उसने कुएँ के अंदर झाँका। इस बार नीचे साफ पानी दिखाई दे रहा था। वह मुस्कुराया। तभी वही बूढ़ा किसान, जिसने वर्षों पहले उसे पानी को जीवन समझकर बचाने की बात कही थी, वहाँ आ गया। बूढ़े ने विक्रम को देखकर कहा, “देखा बेटा, धरती ने हमारी मेहनत का जवाब दे दिया।” विक्रम ने कहा, “हाँ चाचा, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि धरती हमें पानी देती है, तो हमें भी धरती को पानी बचाकर लौटाना होगा।” बूढ़े किसान ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “अब मुझे विश्वास है कि यह गाँव सुरक्षित हाथों में है।”

विक्रम ने कुएँ के पास पड़ी मिट्टी उठाई और अपनी हथेली में रख ली। मिट्टी में नमी थी। कुछ वर्ष पहले यही मिट्टी धूल बनकर उड़ती थी। उसने मन ही मन अपने पिता को याद किया। उसे लगा जैसे पिता कहीं दूर से मुस्कुराकर कह रहे हों कि उसने उनकी बात समझ ली है। उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के बीच से सूरज की हल्की रोशनी निकल रही थी। हवा में पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं। पास के तालाब से पक्षियों की आवाजें आ रही थीं। सोनपुर अब केवल एक गाँव नहीं था, बल्कि एक सीख बन चुका था।

एक शाम गाँव के बच्चों ने विक्रम से कहानी सुनाने को कहा। वे बरगद के नीचे उसके चारों तरफ बैठ गए। विक्रम ने उनसे पूछा, “तुम लोग बताओ, पानी क्यों जरूरी है?” एक बच्चे ने कहा, “पीने के लिए।” दूसरे ने कहा, “खेती के लिए।” तीसरे ने कहा, “पेड़ों के लिए।” एक छोटी बच्ची बोली, “जानवरों के लिए।” विक्रम मुस्कुराया और कहा, “तुम सब सही कह रहे हो। लेकिन पानी केवल इन सबके लिए जरूरी नहीं है। पानी जीवन की शुरुआत है। जहाँ पानी है, वहाँ जीवन के लिए उम्मीद है।” फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी काँच की शीशी निकाली। उसमें थोड़ा-सा पानी था। उसने बच्चों से कहा, “यह पानी बहुत कम है, लेकिन इसे ध्यान से देखो। इसमें कोई रंग नहीं, कोई खास गंध नहीं और इसका कोई चमकदार रूप नहीं। फिर भी दुनिया की सबसे कीमती चीजों में से एक है, क्योंकि इसके बिना जीवन संभव नहीं।”

एक बच्चे ने पूछा, “अगर हमारे पास बहुत पानी हो तो क्या हम उसे खर्च कर सकते हैं?” विक्रम ने कहा, “जरूरत के लिए इस्तेमाल करो, लेकिन बर्बाद मत करो। याद रखो, पानी हमारा मालिकाना हक नहीं है। हम केवल कुछ समय के लिए इसके संरक्षक हैं। जैसे कोई व्यक्ति हमें किसी कीमती चीज की जिम्मेदारी दे, वैसे ही प्रकृति ने हमें पानी की जिम्मेदारी दी है।” बच्चों ने एक साथ कहा, “हम पानी बचाएँगे।” विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, “अगर तुमने यह बात सच में समझ ली, तो सोनपुर का भविष्य सुरक्षित है।”

उस रात बारिश हुई। छतों पर पानी की बूंदें गिरती रहीं। पेड़ों की पत्तियाँ चमकने लगीं। तालाब की सतह पर अनगिनत गोल घेरे बनते रहे। हर बूंद तालाब में गिरकर जैसे कह रही थी कि छोटी चीज को कभी छोटा मत समझो। सुबह जब सूरज निकला तो तालाब का पानी चमक रहा था। विक्रम ने तालाब के किनारे खड़े होकर पानी की ओर देखा और उसे लगा कि हर बूंद में एक कहानी छिपी है। किसी बूंद ने खेत को जीवन दिया था, किसी ने पेड़ को बचाया था, किसी ने प्यास बुझाई थी और किसी ने किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लौटाई थी।

कई वर्ष बीत गए। विक्रम के बालों में हल्की सफेदी आने लगी, लेकिन वह आज भी पानी बचाने के काम में सबसे आगे रहता था। सोनपुर में अब एक बड़ा जल संरक्षण केंद्र भी बन चुका था। वहाँ बच्चों को पानी, मिट्टी, पेड़ और प्रकृति के बारे में सिखाया जाता था। गौरी भी गाँव के बच्चों को पढ़ाती थी। गाँव के लोग हर साल नए तालाब और छोटे जलसंचय क्षेत्र बनाते थे। आसपास के गाँवों में भी लोग पेड़ लगाने और बारिश का पानी जमा करने लगे थे। सोनपुर की वह कहानी जिसने कभी एक सूखे कुएँ से शुरुआत की थी, अब कई गाँवों तक पहुँच चुकी थी।

एक दिन एक छोटा बच्चा विक्रम के पास आया और बोला, “दादा, मेरे शिक्षक ने कहा है कि पानी बचाना हमारी जिम्मेदारी है। क्या सच में एक बूंद पानी इतनी महत्वपूर्ण होती है?” विक्रम ने बच्चे का हाथ पकड़कर उसे तालाब के पास ले गया। उसने पानी की सतह से एक बूंद अपनी उँगली पर ली और कहा, “इस बूंद को देखो। यह अकेली है, लेकिन ऐसी करोड़ों बूंदें मिलकर तालाब बनाती हैं। तालाब की बूंदें मिलकर नदी बनाती हैं, नदियाँ मिलकर समुद्र तक पहुँचती हैं और वही पानी बादल बनकर फिर धरती पर आता है। इसलिए किसी भी बूंद को छोटा मत समझो। हर बड़ी चीज छोटी-छोटी चीजों से मिलकर बनती है।”

बच्चे ने पूछा, “और अगर कोई पानी बर्बाद करे तो?” विक्रम ने कहा, “उसे डाँटना जरूरी नहीं, उसे समझाना जरूरी है। क्योंकि पानी बचाने की लड़ाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। यह हमारी अपनी जिंदगी के लिए है। अगर आज हम पानी बचाएँगे तो कल हमारे बच्चे सुरक्षित रहेंगे। अगर आज हम इसे बर्बाद करेंगे तो कल वे हमारी गलती की कीमत चुकाएँगे।” बच्चा कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला, “मैं आज से पानी की हर बूंद बचाऊँगा।” विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, “बस यही सबसे बड़ी जीत है।”

उस दिन शाम को विक्रम फिर बरगद के नीचे बैठा। वही पेड़ अब पहले से भी बड़ा हो चुका था। उसकी शाखाएँ दूर तक फैली थीं और उसकी छाया में कई बच्चे खेल रहे थे। तालाब में पानी था, खेतों में हरियाली थी, कुएँ में पानी था और गाँव के घरों में उम्मीद थी। विक्रम ने अपनी हथेली में पानी की एक बूंद ली और उसे आसमान की ओर उठाकर देखा। उसे लगा जैसे उस छोटी-सी बूंद में पूरा संसार समाया हुआ है। उसने धीरे से कहा, “पानी की कीमत तब मत समझना जब आखिरी बूंद बची हो। उसकी कीमत आज समझो, जब तुम्हारे पास पानी है। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी गलतियों में से एक यह है कि हम किसी अमूल्य चीज की कीमत उसके खत्म होने के बाद समझते हैं।”

सोनपुर की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। हर नई बारिश के साथ वह कहानी आगे बढ़ती रही। हर नया पेड़ उस कहानी का एक नया पन्ना बनता, हर बचाई गई बूंद उस कहानी की एक नई पंक्ति होती और हर बच्चा जो पानी बचाना सीखता, उस कहानी का नया लेखक बन जाता। विक्रम ने लोगों को केवल पानी बचाना नहीं सिखाया था, उसने उन्हें यह समझाया था कि प्रकृति से मिली चीजों की कोई साधारण कीमत नहीं होती। पानी को हम पैसे से खरीद सकते हैं, लेकिन पानी की जगह पैसा पी नहीं सकते। सोना हमें कुछ समय के लिए अमीर बना सकता है, लेकिन पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए किसी भी इंसान के लिए सबसे बड़ी समझदारी यही है कि वह उस चीज की कद्र करे जिसके बिना उसका अस्तित्व संभव नहीं।

कई वर्षों बाद जब विक्रम बहुत बूढ़ा हो गया, तब भी वह हर सुबह तालाब के किनारे जाता था। एक दिन वह वहाँ बैठा पानी की लहरों को देख रहा था। सूरज की रोशनी पानी पर पड़ रही थी। उसके पास गाँव के बच्चे बैठे थे। उनमें से एक ने पूछा, “विक्रम दादा, आपने अपने जीवन में सबसे जरूरी बात क्या सीखी?” विक्रम ने कुछ देर तक तालाब को देखा और फिर कहा, “मैंने सीखा कि दुनिया में कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें हम बड़ा समझते हैं, लेकिन वास्तव में जीवन छोटी चीजों पर टिका होता है। एक छोटी बूंद पानी, एक छोटा पौधा, मिट्टी की एक मुट्ठी और एक इंसान की छोटी-सी अच्छी कोशिश मिलकर बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है। मैंने यह भी सीखा कि जब समस्या बहुत बड़ी लगे, तब हाथ पर हाथ रखकर बैठना सबसे बड़ी गलती होती है। शुरुआत हमेशा छोटी करनी चाहिए।”

बच्चों ने पूछा, “और पानी की कीमत?” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा, “पानी की कीमत कोई तय नहीं कर सकता। अगर तुम्हारे पास पानी है तो उसकी कीमत समझो, अगर कम है तो उसे बचाओ और अगर किसी के पास नहीं है तो उसके साथ बाँटो। पानी को बचाना केवल प्रकृति को बचाना नहीं है, यह इंसानियत को बचाना भी है।” इतना कहकर विक्रम ने तालाब से एक बूंद पानी उठाई और पास खड़े एक छोटे पौधे की जड़ में डाल दी। बच्चे उसे देखते रहे। उस छोटी-सी बूंद ने मिट्टी में समाते हुए जैसे पूरी कहानी का अर्थ बता दिया था।

सोनपुर की धरती ने बहुत कुछ देखा था। सूखा देखा था, प्यास देखी थी, निराशा देखी थी और फिर उम्मीद भी देखी थी। उसने देखा था कि कैसे लोग अपनी गलतियों से सीख सकते हैं और कैसे एक व्यक्ति की छोटी-सी कोशिश पूरे समाज को बदल सकती है। विक्रम की कहानी इस बात की गवाही बन गई कि किसी भी संसाधन की असली कीमत उसकी कमी के समय नहीं बल्कि उसकी उपलब्धता के समय समझनी चाहिए। पानी की एक बूंद शायद देखने में छोटी हो, लेकिन वही बूंद किसी पौधे को बचा सकती है, किसी प्यासे की जान बचा सकती है, किसी खेत को हरा कर सकती है और किसी गाँव का भविष्य बदल सकती है। इसलिए पानी को कभी व्यर्थ नहीं बहाना चाहिए। क्योंकि जब आखिरी बूंद भी सूख जाती है, तब इंसान को समझ आता है कि उसने जिस चीज को सबसे साधारण समझा था, वही उसके जीवन की सबसे बड़ी जरूरत थी।

और उस दिन के बाद सोनपुर में एक कहावत हमेशा सुनाई देती रही, “पानी की बूंद छोटी जरूर होती है, लेकिन उसकी कीमत जीवन जितनी बड़ी होती है।” यह कहावत हर घर की दीवार पर लिखी गई, हर स्कूल में बच्चों को सिखाई गई और हर खेत के किनारे दोहराई गई। विक्रम ने अपनी पूरी जिंदगी इसी बात को साबित करने में लगा दी कि अगर इंसान समय रहते प्रकृति की आवाज सुन ले तो बड़ी से बड़ी समस्या को भी रोका जा सकता है। लेकिन अगर वह चेतावनी को नजरअंदाज करता रहे, तो एक दिन वही छोटी-सी बूंद उसके लिए सबसे बड़ी जरूरत बन जाती है। इसलिए हर बार जब बारिश की पहली बूंद सोनपुर की धरती पर गिरती, लोग आसमान की ओर देखकर धन्यवाद करते और पानी को सम्मान से बचाकर रखते। तालाब लहराता रहता, पेड़ हवा में झूमते रहते, खेत हरियाली से भरते रहते और विक्रम की कही बात पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जाती रहती कि “एक बूंद को बचाना, एक जीवन को बचाने के बराबर है।”

 

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