Skip to main content

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

मिट्टी से बना घड़ा

 


 

गर्मी की तपती दोपहरी में जब आसमान से आग बरस रही होती है, तब गाँव के एक छोटे से कोने में नीम की ठंडी छाँव के नीचे रखा मिट्टी का घड़ा जीवन का दूसरा नाम बन जाता है। गाँव के उसी पुराने और पारंपरिक कुम्हार बाड़े में एक बुजुर्ग कुम्हार रहते थे, जिनका नाम मोहन था। मोहन की उम्र भले ही ढल चुकी थी, लेकिन उनके हाथों का जादू आज भी जवान था। उनके बनाए हुए मिट्टी के बर्तन न केवल उनके गाँव में, बल्कि आसपास के कई इलाकों में अपनी खूबसूरती और मजबूती के लिए प्रसिद्ध थे। मोहन के लिए मिट्टी केवल जीविका का साधन नहीं थी, बल्कि वह उसकी साधना, उसका इष्ट और उसका सबसे सच्चा साथी थी। वह अक्सर कहा करता था कि मिट्टी मूक नहीं होती, अगर इसे सच्चे दिल से सुना जाए तो यह अपने भीतर छुपे सारे रहस्यों को बयां कर देती है।

मोहन की सुबह रोज सूरज उगने से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर चाक के पास बैठ जाता और मिट्टी तैयार करने की प्रक्रिया में जुट जाता। एक बेहतरीन घड़ा बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी का चुनाव करना होता था। मोहन तालाब की पक्की और चिकनी मिट्टी चुनकर लाता था, जिसमें वह अपने अनुभव के अनुसार बालू और भूसी का सही अनुपात मिलाता था। इसके बाद वह उस मिट्टी को अपने पैरों से भली-भांति गूंथता और फिर हाथों से मलता था ताकि उसमें हवा का कोई बुलबुला न रहे। इस पूरी प्रक्रिया में मोहन पूरी तल्लीनता से डूबा रहता था। उसके लिए यह किसी पवित्र अनुष्ठान से कम नहीं था। वह मानता था कि चाक पर चढ़ने से पहले मिट्टी का मन से शुद्ध होना बहुत जरूरी है, क्योंकि जो भाव कुम्हार के दिल में होते हैं, वही उसकी कलाकृति में उतर आते हैं।

एक दिन मोहन ने एक विशेष घड़ा बनाने का निर्णय लिया। उसने चाक पर मिट्टी का एक बड़ा लोंदा रखा और अपने अनुभवी हाथों से उसे थपथपाना शुरू किया। जैसे-जैसे चाक घूमने लगा, मोहन की उंगलियों के स्पर्श से वह बेजान मिट्टी धीरे-धीरे एक सुंदर और सुडौल आकार लेने लगी। उसने बड़ी सावधानी से उस घड़े के पेट को गोलाई दी, उसकी गर्दन को संवारा और उसके मुँह को एक बेहतरीन फिनिशिंग दी। उस दिन मोहन ने उस घड़े को बनाते समय कुछ खास ही प्रेम और समर्पण दिखाया था। जब घड़ा पूरी तरह तैयार होकर चाक से अलग किया गया, तो वह धूप में सूखने के लिए रख दिया गया। दो-तीन दिन की प्राकृतिक धूप खाने के बाद, वह घड़ा और भी मजबूत हो गया। मोहन उसे देखकर मन ही मन मुस्कुराया और उसे अपनी भट्टी में पकाने के लिए रख दिया।

भट्टी की आग किसी भी बर्तन के लिए उसकी असली परीक्षा होती है। जब मोहन ने उस घड़े को आग की तपिश में डाला, तो वह भट्टी की भयंकर गर्मी में सुलग उठा। आम तौर पर बहुत से बर्तन इस प्रक्रिया में चटक जाते हैं या अपना आकार खो बैठते हैं, लेकिन मोहन की कला और उस घड़े के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। वह आग की लपटों से पूरी तरह तपकर निकला और कुम्हार की भट्टी से बाहर आते ही उसका रंग एक चमकती हुई सौंधी धूप जैसा हो गया। जब मोहन ने उसे थपथपाकर देखा, तो उसमें से एक गहरी, गूंजती और सुरीली सी आवाज़ आई। वह समझ गया कि यह घड़ा साधारण नहीं है; इसमें एक अनूठी जान बस गई है। मोहन ने प्यार से उस पर हाथ फेरा और उसे अपने स्टॉल के सबसे आगे वाले हिस्से में सजाकर रख दिया।

कुछ ही दिनों में उस गाँव में भीषण गर्मी ने दस्तक दी और तापमान लगातार बढ़ने लगा। लोग चिलचिलाती धूप और गर्म हवा के थपेड़ों से बेहाल हो रहे थे। उसी दौरान गाँव में एक बड़ा मेला लगा हुआ था, जिसमें दूर-दूर से लोग आए हुए थे। शहर से एक धनी व्यापारी और उसकी छोटी बेटी अनिका भी उस मेले में घूमने आए थे। अनिका को पुरानी और पारंपरिक हस्तशिल्प की चीजें इकट्ठा करने का बहुत शौक था। जब वे दोनों मोहन की दुकान के सामने से गुजर रहे थे, तो अनिका की नजर अचानक उस खास घड़े पर पड़ी। उस घड़े की बनावट, उसकी अनूठी गोलाई और उस पर पड़ी मिट्टी की प्राकृतिक चमक ने अनिका को अपनी ओर खींच लिया। उसने तुरंत अपने पिता का हाथ खींचा और मोहन की दुकान की तरफ बढ़ने लगी।

अनिका ने उत्सुकता से उस घड़े को उठाया और मोहन से उसकी विशेषता पूछी। मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटी, यह कोई आम घड़ा नहीं है। यह मेरी बरसों की साधना और इस धरती की खुशबू का मेल है। इसमें पानी भरोगे तो वह फ्रिज के पानी से भी ज्यादा ठंडा और सेहतमंद हो जाएगा।" मोहन की बातों में एक अपनापन और सच्चाई थी, जिससे अनिका बहुत प्रभावित हुई। उसके पिता ने बिना मोल-भाव किए मोहन को उसकी मनचाही कीमत चुकाई और उस घड़े को बड़े आदर के साथ अपने घर ले गए। मोहन के मन में थोड़ी उदासी जरूर हुई क्योंकि वह घड़ा उसे बहुत प्यारा था, लेकिन उसे इस बात की खुशी भी थी कि उसकी बनाई हुई कलाकृति किसी ऐसे इंसान के घर जा रही है जो उसकी कद्र करना जानता है।

शहर की एक बड़ी और शानदार कोठी में पहुँचने के बाद उस घड़े की दुनिया ही बदल गई। उसे कोठी के बैठक कक्ष में एक विशेष लकड़ी के स्टैंड पर सजाया गया। शुरुआत में कोठी के आधुनिक गैजेट्स और एसी की ठंडी हवा को देखकर वह घड़ा थोड़ा असहज महसूस करता था। वहाँ के लोग उसे एक शोपीस या पुरानी संस्कृति के प्रतीक के रूप में देखते थे। लेकिन कुछ ही दिनों में अनिका ने उसे अपनी असली जगह पहुँचा दी। उसने उस घड़े को रसोई के पास एक ठंडी छाँव वाली जगह पर रखा, उसमें साफ पानी भरा और ऊपर से एक लाल सूती कपड़े से ढक दिया। जब अनिका ने उस घड़े का पहला घूंट पानी पिया, तो उसके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई और उसने अपने माता-पिता से कहा कि आज उन्हें असली जीवन का स्वाद मिला है।

गर्मी के उन दिनों में वह घड़ा उस कोठी के सभी सदस्यों का सबसे चहेता बन गया। दोपहर के वक्त जब भी कोई बाहर से धूप में थका-हारा घर लौटता, तो अनिका सबसे पहले उस घड़े से एक गिलास ठंडा पानी लाकर देती थी। उस पानी में न केवल ठंडक थी, बल्कि मोहन के हाथों की वो सौंधी खुशबू भी थी जो माटी से सीधे जुड़ी हुई थी। कोठी के नौकर से लेकर बड़े-बड़े मेहमान तक उस घड़े के पानी की तारीफ करते थे। जो लोग महंगे मिनरल वाटर और फ्रिज के पानी के आदि हो चुके थे, वे भी अब गर्मी के दिनों में उसी घड़े का पानी पीना पसंद करते थे। वह घड़ा चुपचाप अपने अंदर के पानी को ठंडा करता रहता और बदले में लोगों की प्यास बुझाकर एक असीम आनंद का अनुभव करता था।

समय बीतता गया और मौसम बदलते चले गए। गर्मी के बाद बरसात आई और फिर सर्दियाँ आ गईं। सर्दियों के दिनों में जब ठंडी हवाएँ चलने लगीं, तो फ्रिज के पानी की जरूरत खत्म हो गई। ऐसे में उस घड़े को रसोई के एक कोने में रख दिया गया। कुछ समय के लिए लोग उसे जैसे भूल से गए थे, लेकिन उस घड़े के मन में कोई शिकायत नहीं थी। वह जानता था कि प्रकृति का चक्र इसी तरह चलता है। उसने अपनी जगह पर रहकर भी कभी अपना धैर्य नहीं खोया। वह मोहन की उस सीख को भूला नहीं था जो उसने चाक पर देते वक्त सिखाई थी कि जीवन में हर मौसम का अपना महत्व होता है। धैर्य और संयम ही इंसान और उसकी बनाई हर चीज की असली पहचान होते हैं।

एक दिन, जब एक बार फिर से गर्मी के दिन वापस लौटने लगे थे, तो अनिका के घर में एक बड़ी दावत का आयोजन किया गया। उस दावत में शहर के कई प्रतिष्ठित लोग, डॉक्टर और लेखक शामिल होने आए थे। दावत के दौरान खाने-पीने की कई आधुनिक और महंगी चीजें परोसी गईं, लेकिन जब मेहमानों के सामने उस मिट्टी के घड़े का ठंडा पानी रखा गया, तो सभी हैरान रह गए। एक बुजुर्ग डॉक्टर ने उस पानी का गिलास हाथ में लेते हुए कहा कि आज के इस रासायनिक युग में भी माटी के घड़े का पानी पीना किसी वरदान से कम नहीं है। यह पानी न केवल शरीर को ठंडक देता है, बल्कि हमारे प्राचीन संस्कारों से भी जोड़ता है। उस शाम उस कोठी में उस घड़े की चर्चा हर मेहमान की जुबान पर थी।

इधर गाँव में बूढ़े मोहन की सेहत थोड़ी ढीली पड़ने लगी थी। बढ़ती उम्र के कारण अब वह पहले की तरह लगातार चाक पर नहीं बैठ पाता था। लेकिन जब भी कोई ग्राहक उससे पूछता कि उसका सबसे बेहतरीन काम कौन सा था, तो मोहन की आँखें चमक उठती थीं। वह गर्व से उस घड़े की कहानी सुनाता था जो उसने उस शहर की लड़की को बेचा था। मोहन अक्सर सोचता था कि उसका वह घड़ा अब कैसा होगा और क्या वह आज भी लोगों की प्यास बुझा रहा होगा या नहीं। उसे इस बात की गहरी संतुष्टि थी कि उसने अपने जीवन में जो कुछ भी गढ़ा, वह किसी न किसी के काम आया और उसने समाज में ठंडक और प्रेम का संदेश फैलाया।

एक दिन एक अजीब संयोग हुआ। अनिका के पिता किसी जरूरी काम से उसी गाँव के पास से गुजर रहे थे। उन्हें अचानक मोहन की वह छोटी सी दुकान याद आ गई। उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवाई और मोहन से मिलने के लिए उसकी दुकान पर चले आए। जब उन्होंने मोहन को देखा और अपना परिचय देते हुए बताया कि वे वही हैं जो पिछले साल उसका वह खास घड़ा खरीद कर ले गए थे, तो मोहन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मोहन ने तुरंत बड़े प्यार से उन्हें अपने पास बैठाया और गुड़ की एक डली के साथ ताजा पानी पिलाया। अनिका के पिता ने मोहन को बताया कि वह घड़ा आज भी उनके घर की शान बना हुआ है और उनके परिवार का हर सदस्य उसे बहुत संभाल कर रखता है।

बातचीत के दौरान अनिका के पिता ने मोहन को यह भी बताया कि उनकी बेटी अनिका अब कला और संस्कृति विषय पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है और उसने अपने कॉलेज के प्रोजेक्ट में मोहन की कला और उस घड़े की कहानी को प्रमुखता से शामिल किया है। यह सुनकर मोहन की आँखें भर आईं। उसके जीवन की यह सबसे बड़ी कमाई थी कि उसकी साधारण सी मिट्टी की कला आज किसी की प्रेरणा बन चुकी थी। मोहन ने महसूस किया कि इंसान का शरीर भले ही नश्वर हो और एक दिन मिट्टी में मिल जाना हो, लेकिन उसके द्वारा किए गए अच्छे कर्म और उसकी कला हमेशा जीवित रहती है। ठीक उसी तरह, जैसे वह घड़ा आज भी अपनी ठंडक के जरिए लोगों के दिलों में जीवित था।

कुछ साल और बीत गए। मोहन इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन उसकी बनाई हुई कला और उसकी सीख गाँव के बच्चों और नए कुम्हारों के दिलों में हमेशा के लिए बस गई। शहर की उस कोठी में भी वह घड़ा आज पूरी शान के साथ अपनी जगह पर रखा हुआ था। अनिका अब बड़ी हो चुकी थी और उसने अपने घर के एक हिस्से में एक छोटा सा सांस्कृतिक कोना बना रखा था, जिसके बिल्कुल केंद्र में वह पुराना घड़ा रखा रहता था। जब भी कोई नया मेहमान उस घर में आता और उस घड़े को देखकर उसकी तारीफ करता, तो अनिका बड़े गर्व से बताती कि यह कोई साधारण बर्तन नहीं, बल्कि एक सच्चे कलाकार के समर्पण और माटी की जीवंत गाथा है।

इस प्रकार, मिट्टी से बने उस साधारण घड़े ने एक साधारण गाँव की भट्टी से लेकर शहर की आलीशान कोठी तक का एक लंबा और प्रेरणादायक सफर तय किया। उसने यह साबित कर दिया कि असली खूबसूरती दिखावे में नहीं, बल्कि उपयोगिता, सादगी और दूसरों के जीवन को शीतलता प्रदान करने में होती है। वह घड़ा भले ही बेजुबान था, लेकिन उसकी हर बूंद में मोहन की मेहनत, लगन और मिट्टी की वह सोंधी खुशबू हमेशा महकती रही, जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि जब कला में सच्ची भावना मिल जाती है, तो वह अमर हो जाती है।


Comments

Popular posts from this blog

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...