Skip to main content

जब सबने मजाक उड़ाया

  स्मित एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण परिवार का लड़का था, लेकिन उसके सपने साधारण नहीं थे। वह बचपन से ही कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे उसकी पहचान पूरे इलाके में बने और उसके माता-पिता को उस पर गर्व हो। उसके पिता रमेश गाँव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। दुकान से इतनी ही कमाई होती थी कि घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उसकी माँ सुनीता घर संभालती थीं और सिलाई करके परिवार की आमदनी में थोड़ा योगदान देती थीं। घर में पैसों की कमी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने कभी स्मित को सपने देखने से नहीं रोका। वे अक्सर उससे कहते थे कि बेटा, इंसान की गरीबी उसके सपनों से बड़ी नहीं होती, बस उसे अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना आना चाहिए। स्मित इन बातों को अपने दिल में उतार लेता था। वह जब भी गाँव के बाहर बने बड़े-बड़े मकानों, बाजार में चलती गाड़ियों और शहर से लौटने वाले सफल लोगों को देखता, तो उसके मन में भी कुछ बड़ा करने की इच्छा जाग उठती थी। वह सोचता था कि एक दिन वह भी ऐसा काम करेगा, जिससे उसके परिवार को कभी पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। स्मित पढ़ाई में औसत था, लेकि...

अकेले चलने वाला यात्री

 


बहुत दूर तक फैली हुई पहाड़ियों, घने जंगलों और सूनी पगडंडियों के बीच एक छोटा-सा गाँव था, जिसका नाम देवपुर था। देवपुर इतना शांत था कि सुबह के समय पक्षियों की आवाजें ही वहाँ की सबसे बड़ी हलचल लगती थीं। गाँव के चारों ओर ऊँचे पेड़, छोटी-छोटी पहाड़ियाँ और दूर तक फैले खेत थे। उसी गाँव में राकेश नाम का एक युवक रहता था। राकेश स्वभाव से शांत, मेहनती और जिज्ञासु था। उसके मन में हमेशा कुछ नया जानने और दुनिया को अपने तरीके से देखने की इच्छा रहती थी। गाँव के लोग उसे अक्सर समझाते थे कि जीवन में वही रास्ता चुनना चाहिए जिस पर पहले से बहुत लोग चल चुके हों, लेकिन राकेश का मन हमेशा उन रास्तों की ओर खिंचता था जिन पर किसी के पैरों के निशान बहुत कम दिखाई देते थे। वह मानता था कि अगर हर व्यक्ति केवल दूसरों के बनाए रास्ते पर चलेगा, तो नए रास्ते कभी बनेंगे ही नहीं।

राकेश के पिता का देहांत उसके बचपन में ही हो गया था। उसकी माँ ने बड़ी कठिनाइयों के बीच उसे पाला था। घर में धन की कमी थी, लेकिन संस्कारों की नहीं। उसकी माँ हमेशा उससे कहती थी कि दुनिया में सबसे बड़ी संपत्ति मनुष्य का साहस, धैर्य और सच्चाई है। राकेश ने अपनी माँ की बातों को मन में बसा लिया था। वह खेतों में काम करता, गाँव के छोटे बच्चों को पढ़ाता और खाली समय में दूर-दूर तक घूमने निकल जाता। उसे यात्राएँ बहुत पसंद थीं। वह नदी के किनारे बैठकर घंटों बहते पानी को देखता और सोचता कि यह पानी भी तो बिना किसी डर के अपनी मंजिल की ओर बढ़ता रहता है। कभी पत्थर रास्ता रोकते, कभी मिट्टी उसका रास्ता बदल देती, फिर भी नदी रुकती नहीं थी। राकेश को लगता था कि मनुष्य को भी नदी की तरह चलते रहना चाहिए।

एक दिन गाँव में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। लगातार कई वर्षों से बारिश कम हो रही थी और गाँव के खेत सूखते जा रहे थे। कुओं में पानी घट गया था और लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। गाँव के बुजुर्गों ने बैठक की और तय किया कि गाँव के कई परिवार पास के बड़े शहर में जाकर काम करेंगे। राकेश की माँ ने भी उससे कहा कि अगर वह शहर चला जाए तो शायद कोई अच्छी नौकरी मिल सके। राकेश ने माँ की बात सुनी, लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था। वह वर्षों से एक पुराने पहाड़ी मार्ग के बारे में सुनता आया था। कहा जाता था कि उस मार्ग के पार एक ऐसी घाटी है जहाँ एक पुराना जलस्रोत आज भी बहता है। बहुत पहले उस जलस्रोत से एक छोटी नदी निकलती थी, जो आसपास के कई गाँवों की प्यास बुझाती थी। समय के साथ रास्ता बंद हो गया और लोगों ने उस जगह को भुला दिया।

राकेश को अचानक लगा कि अगर वह उस पुराने जलस्रोत को खोज ले, तो शायद उसके गाँव की समस्या का कोई समाधान मिल सकता है। गाँव के लोगों ने उसकी बात सुनकर हँसी उड़ाई। किसी ने कहा कि वह बेकार में जंगलों में भटक जाएगा। किसी ने कहा कि पुरानी कहानियों पर विश्वास करना मूर्खता है। एक बुजुर्ग ने उसे समझाया कि पहाड़ों का रास्ता खतरनाक है और वहाँ जंगली जानवर भी मिल सकते हैं। राकेश ने सबकी बातें सुनीं, लेकिन उसके भीतर का विश्वास कमजोर नहीं हुआ। उसने माँ से अनुमति माँगी। माँ की आँखों में चिंता थी, मगर वह अपने बेटे के साहस को समझती थी। उसने उसे एक छोटा-सा थैला, कुछ सूखी रोटियाँ, पानी की बोतल, एक पुराना नक्शा और पिता की दी हुई छोटी-सी लकड़ी की छड़ी दी। उसने केवल इतना कहा, “रास्ता चाहे कितना भी कठिन हो, अपनी सच्चाई मत छोड़ना और अगर कभी लगे कि लौटना जरूरी है, तो बिना शर्म लौट आना।”

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले राकेश यात्रा पर निकल पड़ा। गाँव अभी नींद में था। कच्ची गलियों पर रात की नमी थी और खेतों पर हल्का कोहरा छाया हुआ था। राकेश ने पीछे मुड़कर अपने घर को देखा। माँ दरवाजे पर खड़ी थी। दोनों की आँखों में बहुत कुछ था, लेकिन शब्द कम थे। राकेश ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और धीरे-धीरे आगे बढ़ गया। कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा तो माँ अब दिखाई नहीं दे रही थी। उसके सामने लंबी पगडंडी थी, जो पहाड़ियों की ओर जा रही थी। वह अकेला था, लेकिन उसके भीतर एक उद्देश्य था।

पहले दिन का रास्ता आसान था। खेतों को पार करने के बाद वह एक सूखे नाले के किनारे पहुँचा। नाले के किनारे पुराने पत्थर पड़े थे, जिन पर काई जम चुकी थी। राकेश ने नक्शे को देखा और दिशा तय की। दोपहर तक वह जंगल के किनारे पहुँच गया। जंगल घना था। ऊँचे पेड़ों की शाखाएँ एक-दूसरे में उलझी हुई थीं और सूर्य की रोशनी मुश्किल से जमीन तक पहुँच रही थी। हवा में पत्तों की सरसराहट थी। राकेश ने अपनी चाल धीमी कर ली। उसने लकड़ी की छड़ी हाथ में मजबूती से पकड़ ली और सावधानी से आगे बढ़ने लगा।

जंगल के भीतर कुछ दूर जाने के बाद उसे एक टूटा हुआ पत्थर का पुल दिखाई दिया। पुल के नीचे सूखी नदी की चौड़ी धारा थी। वहाँ किसी समय पानी बहुत तेज बहता होगा, लेकिन अब केवल सूखे पत्थर बचे थे। राकेश ने पुल पार किया और दूसरी ओर उसे एक पुराना रास्ता मिला। रास्ते के किनारे कुछ पत्थरों पर अजीब निशान बने थे। नक्शे में भी उन्हीं निशानों का उल्लेख था। राकेश समझ गया कि वह सही दिशा में जा रहा है। उसका उत्साह बढ़ गया। उसने थोड़ी देर विश्राम किया और फिर आगे चल पड़ा।

शाम होते-होते जंगल और भी घना हो गया। राकेश ने रात के लिए एक सुरक्षित स्थान खोजा। उसे एक बड़ी चट्टान के नीचे थोड़ी जगह मिल गई। उसने सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और छोटी-सी आग जलाई। रात का जंगल डरावना था। दूर कहीं किसी जानवर की आवाज सुनाई देती, फिर अचानक सब शांत हो जाता। राकेश ने अपनी माँ को याद किया। एक पल के लिए उसके मन में घर लौटने का विचार आया, लेकिन फिर उसने खुद से कहा कि डर रास्ते का हिस्सा है, मंजिल का अंत नहीं। उसने सूखी रोटी खाई, पानी पिया और चट्टान से पीठ टिकाकर बैठ गया।

उस रात उसे नींद कम आई। सुबह होते ही उसने यात्रा फिर शुरू कर दी। दूसरे दिन रास्ता पहाड़ी होने लगा। कभी उसे चट्टानों पर चढ़ना पड़ता, कभी फिसलन भरी मिट्टी से बचकर निकलना पड़ता। दोपहर के समय अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। राकेश ने अपने थैले को सिर के ऊपर रख लिया और एक बड़ी चट्टान के नीचे शरण ली। बारिश कई घंटों तक होती रही। पहाड़ों से पानी की धाराएँ नीचे आने लगीं। जिस रास्ते से वह आया था, वह भी पानी में डूब गया। अब लौटना आसान नहीं था। राकेश ने महसूस किया कि यात्रा केवल शरीर की परीक्षा नहीं ले रही थी, बल्कि उसके मन की भी परीक्षा हो रही थी।

बारिश रुकने के बाद उसने देखा कि एक छोटी-सी मिट्टी की दीवार पानी में बह गई थी और उसके पीछे एक संकरी गुफा का रास्ता दिखाई दे रहा था। राकेश ने मशाल जलाकर गुफा के भीतर झाँका। अंदर दीवार पर कुछ पुराने चित्र बने थे। चित्रों में पहाड़, नदी और एक बड़े वृक्ष का निशान था। राकेश ने अपने नक्शे को उन चित्रों से मिलाया। उसे विश्वास हुआ कि यह वही रास्ता है जिसकी तलाश वह कर रहा था। उसने गुफा के भीतर कदम रखा।

गुफा बहुत लंबी थी। अंदर ठंडी हवा चल रही थी। कुछ दूर जाने पर उसे दीवार पर एक वाक्य लिखा दिखाई दिया—“जो अकेला चलता है, वह रास्ते से नहीं, अपने डर से लड़ता है।” यह वाक्य पढ़कर राकेश कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसे लगा जैसे किसी अज्ञात व्यक्ति ने वर्षों पहले उसके लिए ही यह संदेश छोड़ा हो। उसने अपने मन में दोहराया कि वह अकेला जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं। उसने फिर यात्रा शुरू कर दी।

गुफा से बाहर निकलते ही उसके सामने एक विशाल घाटी थी। नीचे हरियाली के बीच एक पतली जलधारा चमक रही थी। राकेश की आँखों में खुशी भर आई। उसने दूर से ही पहचान लिया कि यही वह जलस्रोत होगा जिसकी कहानी गाँव में सुनी जाती थी। लेकिन वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं था। घाटी के बीच गहरी खाई थी और उसके पार जाने के लिए कोई सीधा रास्ता नहीं था। राकेश ने आसपास देखा। थोड़ी दूरी पर पुराने लकड़ी के तख्ते पड़े थे। उसने उन्हें उठाकर एक अस्थायी पुल बनाने की कोशिश की। कई बार तख्ते फिसले, एक बार उसका पैर भी खाई के किनारे फिसल गया, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। लंबे प्रयास के बाद वह दूसरी ओर पहुँच गया।

जलस्रोत के पास पहुँचकर राकेश ने देखा कि पानी सचमुच साफ और मीठा था। उसके पास पुराने पत्थरों से बना एक बाँध जैसा ढाँचा था, जो अब मिट्टी और पत्थरों से बंद हो चुका था। राकेश समझ गया कि यदि इस पुराने मार्ग को साफ कर दिया जाए, तो पानी फिर से नीचे की ओर जा सकता है। वह घंटों तक मिट्टी और पत्थर हटाता रहा। उसके हाथों में छाले पड़ गए, कपड़े गंदे हो गए और शरीर थककर टूटने लगा, लेकिन वह काम करता रहा। शाम तक उसने जलधारा का एक छोटा रास्ता खोल दिया। पानी धीरे-धीरे उस मार्ग से बहने लगा।

राकेश ने खुशी से आकाश की ओर देखा। उसे लगा कि उसने अपनी यात्रा का उद्देश्य पा लिया है। लेकिन तभी आसमान पर काले बादल छा गए। पहाड़ों पर तेज बारिश होने लगी। जलधारा अचानक उफान पर आ गई। राकेश समझ गया कि अब यहाँ रुकना खतरे से खाली नहीं है। वह जल्दी से ऊपर की ओर जाने लगा। रास्ता फिसलन भरा था। एक जगह उसका थैला नीचे गिर गया। उसने थैला उठाने की कोशिश की, लेकिन पानी की तेज धारा उसे दूर ले गई। उसमें उसका नक्शा, भोजन और कुछ जरूरी सामान था। राकेश कुछ क्षणों के लिए निराश हुआ, लेकिन उसने खुद से कहा कि सामान खो गया है, उद्देश्य नहीं।

रात उसने एक पेड़ की जड़ों के पास बिताई। भूख और ठंड से उसका शरीर काँप रहा था। उसे अपनी माँ की याद आई। उसे लगा कि शायद माँ भी इस समय उसकी चिंता कर रही होगी। उसने आँखें बंद कीं और मन ही मन वचन दिया कि वह सुरक्षित वापस जाएगा। सुबह होते ही उसने जलस्रोत के पास फिर जाकर देखा। उसने पाया कि पानी अब पहले से अधिक तेजी से बह रहा था। वह समझ गया कि उसका प्रयास सफल हो रहा है। अब उसे गाँव तक लौटना था और लोगों को इस जलस्रोत के बारे में बताना था।

वापसी का रास्ता पहले से कठिन था क्योंकि बारिश ने पगडंडियों को बदल दिया था। कई जगह मिट्टी खिसक गई थी। राकेश को अनुमान से रास्ता चुनना पड़ा। उसे एक पहाड़ी ढलान पर पुराने पेड़ों के निशान मिले। उसने उन्हीं को मार्गदर्शक बनाया। चलते-चलते उसे एक घायल यात्री दिखाई दिया, जो एक चट्टान के पास पड़ा था। वह व्यक्ति शहर से पहाड़ों की ओर आया था और फिसलकर घायल हो गया था। राकेश ने अपनी बची हुई पट्टी से उसके पैर पर कपड़ा बाँधा और उसे सहारा देकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। वह जानता था कि इससे उसकी अपनी यात्रा और लंबी हो जाएगी, लेकिन उसने घायल व्यक्ति को अकेला छोड़ना सही नहीं समझा।

कुछ समय बाद दोनों को जंगल से निकलने का रास्ता मिल गया। घायल यात्री ने राकेश से पूछा कि वह इतनी कठिन जगह पर अकेला क्यों आया है। राकेश ने उसे गाँव और जलस्रोत की पूरी कहानी बताई। यात्री उसकी बात सुनकर प्रभावित हुआ। उसने कहा कि कभी-कभी मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसके साथ चलने वाले लोगों की संख्या नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य की सच्चाई होती है। यह बात राकेश के मन में बस गई।

कई दिनों की यात्रा के बाद राकेश आखिरकार देवपुर पहुँचा। गाँव के लोग उसे देखकर हैरान रह गए। उसकी हालत बहुत खराब थी। कपड़े फटे हुए थे, पैरों में चोट थी और चेहरा थकान से भरा था। उसकी माँ उसे देखते ही दौड़कर आई और उसे गले लगा लिया। राकेश ने माँ को बताया कि वह जलस्रोत तक पहुँच गया है और पानी का रास्ता खोल दिया है। गाँव के लोग पहले उसकी बात पर विश्वास नहीं कर पाए। अगले ही दिन कुछ लोग उसके साथ पहाड़ की ओर चल पड़े। राकेश ने उन्हें रास्ता दिखाया। जब वे जलस्रोत तक पहुँचे और साफ पानी बहता देखा, तो सबकी आँखों में आश्चर्य और खुशी थी।

गाँव के लोगों ने मिलकर पुराने जलमार्ग को साफ करना शुरू किया। कई दिनों तक लगातार मेहनत हुई। पत्थर हटाए गए, मिट्टी निकाली गई और पुराने रास्ते को मजबूत किया गया। धीरे-धीरे जलधारा गाँव की ओर आने लगी। सूखे खेतों में पानी पहुँचा तो लोगों के चेहरों पर फिर से उम्मीद लौट आई। कुछ महीनों के भीतर खेतों में हरियाली दिखाई देने लगी। जिन परिवारों ने गाँव छोड़ने का निर्णय लिया था, उनमें से कई वापस लौट आए। देवपुर फिर से जीवंत हो गया।

लेकिन राकेश के लिए यात्रा वहीं समाप्त नहीं हुई। उसने समझ लिया था कि किसी एक समस्या का समाधान मिल जाना जीवन की अंतिम मंजिल नहीं है। वह अब आसपास के दूसरे गाँवों की समस्याओं को समझने लगा। कभी वह किसी सूखी बावड़ी की सफाई करता, कभी किसी पुराने रास्ते की मरम्मत में लोगों की मदद करता। उसने गाँव के बच्चों को यात्राओं, प्रकृति और पानी के महत्व के बारे में पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग उसे केवल एक यात्री नहीं, बल्कि प्रेरणा देने वाले व्यक्ति के रूप में देखने लगे।

एक दिन गाँव के कुछ युवकों ने राकेश से पूछा कि जब वह यात्रा पर निकला था तब उसे डर नहीं लगा था। राकेश मुस्कुराया और बोला कि डर तो हर कदम पर लगा था। फर्क सिर्फ इतना था कि उसने डर को अपना मालिक नहीं बनने दिया। उसने कहा कि अकेले चलना आसान नहीं होता। रास्ते में कोई ताली बजाने वाला नहीं होता, कोई हर कदम पर हौसला देने वाला नहीं होता और कई बार ऐसा लगता है कि शायद हम गलत दिशा में जा रहे हैं। लेकिन अगर उद्देश्य साफ हो और मन सच्चा हो, तो अकेले उठाया गया एक कदम भी बहुत दूर तक असर डाल सकता है।

समय बीतता गया। राकेश की यात्रा की कहानी दूर-दूर के गाँवों तक पहुँच गई। लोग उससे मिलने आने लगे। कुछ लोग उसे बहादुर कहते, कुछ भाग्यशाली और कुछ उसे जिद्दी। राकेश हर बात सुनकर मुस्कुरा देता। वह जानता था कि उसके भीतर कोई असाधारण शक्ति नहीं थी। वह भी बाकी लोगों की तरह डरता था, थकता था और कभी-कभी हार मानने का मन करता था। लेकिन उसने अपने डर से भागने के बजाय उसके साथ चलना सीख लिया था।

कई वर्षों बाद जब राकेश फिर उसी पहाड़ी रास्ते से गुजरा, तो उसने देखा कि जिस जगह कभी केवल सूखी मिट्टी और टूटे पत्थर थे, वहाँ अब पेड़ उग आए थे। जलधारा के किनारे पक्षियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। दूर कुछ बच्चे खेल रहे थे और कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। राकेश एक चट्टान पर बैठ गया। उसने उस पुराने रास्ते को देखा जिस पर कभी वह अकेला चला था। उसे याद आया कि कैसे उसने बारिश, भूख, डर, चोट और अकेलेपन का सामना किया था। उसे यह भी याद आया कि अगर उस समय वह डरकर वापस लौट जाता, तो शायद यह हरियाली कभी दिखाई नहीं देती।

उसने अपनी माँ की बात याद की—“रास्ता चाहे कितना भी कठिन हो, अपनी सच्चाई मत छोड़ना।” राकेश की आँखें नम हो गईं। उसने महसूस किया कि असली यात्रा पहाड़ों की नहीं थी। असली यात्रा उसके भीतर हुई थी। जब वह घर से निकला था, तब वह केवल एक युवक था जो एक पुराने जलस्रोत की तलाश में जा रहा था। जब वह वापस लौटा, तब वह समझ चुका था कि मनुष्य की मंजिल केवल अपने लिए कुछ हासिल करना नहीं है। सच्ची मंजिल तब मिलती है जब हमारी यात्रा किसी और के जीवन में भी रोशनी पैदा करती है।

राकेश ने फिर अपनी लकड़ी की छड़ी उठाई और आगे चल पड़ा। उसके सामने एक नया रास्ता था। इस बार भी वह अकेला था, लेकिन उसके कदमों में पहले से अधिक विश्वास था। वह जानता था कि दुनिया में रास्ते कभी खत्म नहीं होते। एक रास्ता मंजिल तक पहुँचाता है, तो दूसरी मंजिल से नया रास्ता शुरू हो जाता है। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहाड़ों के बीच उसकी परछाईं लंबी होती गई और धीरे-धीरे शाम की रोशनी में खो गई। लेकिन उसके कदमों के निशान उस पगडंडी पर बने रहे, जैसे आने वाले यात्रियों से कह रहे हों कि रास्ता कठिन हो सकता है, अकेलापन गहरा हो सकता है और मंजिल दूर हो सकती है, फिर भी जो व्यक्ति सच्चे उद्देश्य के साथ चलता रहता है, उसके लिए कोई रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता।

उस दिन से देवपुर में एक कहावत प्रसिद्ध हो गई—“रास्ता पूछने से पहले अपने कदमों पर भरोसा करो।” लोग इस कहावत को राकेश की यात्रा से जोड़ते थे। गाँव के बच्चे जब पहाड़ों की ओर देखते, तो उन्हें डर नहीं बल्कि संभावना दिखाई देती। बुजुर्ग जब जलधारा का पानी देखते, तो उन्हें उस युवक की याद आती जिसने अकेले उस पुराने स्रोत को खोजा था। किसानों के लिए वह पानी जीवन था और यात्रियों के लिए वह रास्ता साहस की निशानी बन गया था।

राकेश ने जीवन में बहुत कुछ खोया भी और पाया भी। उसने सीखा कि अकेलापन हमेशा कमजोरी नहीं होता। कभी-कभी अकेलापन मनुष्य को अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। भीड़ में हम दूसरों की आवाजें सुनते हैं, लेकिन अकेले रास्ते पर हम अपने मन की आवाज सुन पाते हैं। राकेश ने उसी आवाज को सुना था और उसी के सहारे वह आगे बढ़ा था। उसकी यात्रा ने उसे सिखाया कि किसी भी कठिन परिस्थिति में पहला कदम सबसे महत्वपूर्ण होता है। पहला कदम डर के बावजूद उठाया जाता है, दूसरा अनुभव के आधार पर और तीसरा विश्वास के आधार पर। फिर धीरे-धीरे रास्ता स्वयं बनता चला जाता है।

कई साल बाद जब राकेश बूढ़ा हुआ, तब भी उसकी यात्राएँ नहीं रुकीं। उसके बाल सफेद हो गए थे, कदम धीमे हो गए थे, लेकिन आँखों में वही चमक थी। वह अक्सर गाँव के बच्चों को अपने पास बुलाकर अपनी यात्रा की कहानी सुनाता। बच्चे बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनते। वह उन्हें बताता कि जीवन में कभी-कभी ऐसे रास्ते मिलेंगे जहाँ कोई साथ नहीं देगा। लोग रोकेंगे, डराएँगे और कहेंगे कि तुम यह नहीं कर सकते। लेकिन किसी की बात को आँख बंद करके मानना भी ठीक नहीं और अपने अहंकार में किसी की सलाह को पूरी तरह नकार देना भी ठीक नहीं। सही रास्ता वह है जिसे समझदारी, अनुभव और सच्चे उद्देश्य के साथ चुना जाए।

एक शाम राकेश अपने घर के बाहर बैठा सूर्यास्त देख रहा था। आसमान लाल और सुनहरे रंग से भर गया था। दूर पहाड़ों पर सूरज की अंतिम किरणें पड़ रही थीं। जलधारा की आवाज हवा के साथ उसके कानों तक पहुँच रही थी। उसने आँखें बंद कीं और वर्षों पुरानी यात्रा को याद किया। उसे लगा जैसे वह फिर उसी पगडंडी पर चल रहा है। वही जंगल, वही बारिश, वही गुफा, वही खाई और वही जलस्रोत। लेकिन इस बार उसे किसी चीज से डर नहीं लग रहा था। उसे समझ आ गया था कि जीवन की हर यात्रा बाहर से जितनी लंबी दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही गहरी होती है।

राकेश ने अपनी आँखें खोलीं और मुस्कुराया। उसके सामने गाँव के बच्चे खेल रहे थे। कुछ बच्चे उस रास्ते की ओर जा रहे थे जहाँ से पहाड़ी जलधारा दिखाई देती थी। उसने उन्हें आवाज देकर सावधान रहने को कहा। बच्चे हँसते हुए आगे बढ़ गए। राकेश उन्हें देखता रहा। उसे लगा कि अब उसकी यात्रा किसी और के कदमों में आगे बढ़ रही है। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

उसने जीवन में कोई बड़ा महल नहीं बनाया, कोई विशाल धन नहीं कमाया और अपने नाम की कोई बड़ी मूर्ति नहीं लगवाई। उसके पास केवल कुछ पुराने सामान, यात्राओं की यादें और लोगों के दिलों में जगह थी। लेकिन शायद यही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति थी। उसने साबित किया था कि अकेले चलने वाला यात्री हमेशा अकेला नहीं रहता। उसके पीछे उसके कर्मों के निशान चलते हैं, उसके विचार दूसरों के रास्ते रोशन करते हैं और उसकी हिम्मत उन लोगों में जीवित रहती है जो कभी उसके कदमों के निशान देखकर आगे बढ़ने का साहस करते हैं।

और इस तरह राकेश की कहानी केवल एक यात्री की कहानी नहीं रही। वह उस हर व्यक्ति की कहानी बन गई जो कठिन रास्तों से डरता है, लेकिन फिर भी अपने सपने की ओर पहला कदम उठाता है। वह उस हर इंसान की कहानी बन गई जो भीड़ से अलग होकर अपने रास्ते की तलाश करता है। वह उस हर मनुष्य की कहानी बन गई जो गिरकर उठता है, हारकर फिर कोशिश करता है और अकेले होने के बावजूद आगे बढ़ता रहता है। राकेश ने अपनी यात्रा से यही सिखाया कि मंजिल तक पहुँचने के लिए हमेशा भीड़ की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक सच्चा उद्देश्य, थोड़ा साहस, थोड़ा धैर्य और आगे बढ़ने वाला एक अकेला कदम ही पर्याप्त होता है। रास्ते चाहे कितने भी लंबे हों, पहाड़ चाहे कितने भी ऊँचे हों और रात चाहे कितनी भी अंधेरी हो, जो यात्री अपने भीतर की रोशनी को बुझने नहीं देता, वह अंततः किसी न किसी सुबह की पहली किरण तक पहुँच ही जाता है।

 

Comments

Popular posts from this blog

मेंढक की कहानी

एक घने जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और गहरा कुआँ था। उस कुएँ में एक छोटा सा मेंढक रहता था , जिसका नाम मोनू था। मोनू ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कुएँ के अंदर बिताई थी। उसने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी , इसलिए उसके लिए वही कुआँ उसकी पूरी दुनिया था। उसे लगता था कि यही सबसे बड़ा स्थान है और इसके बाहर कुछ भी नहीं है। मोनू का जीवन बहुत साधारण था। वह रोज सुबह उठता , कुएँ के ठंडे पानी में तैरता , छोटे-छोटे कीड़े पकड़कर खाता और दिनभर आराम करता। उसे किसी बात की चिंता नहीं थी , क्योंकि उसने कभी अपने जीवन से आगे कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की थी। एक दिन अचानक कुछ अजीब हुआ। आसमान में बादल छा गए और तेज हवा चलने लगी। बारिश शुरू हो गई और कुछ ही देर में पानी की बूंदें तेजी से कुएँ में गिरने लगीं। उसी दौरान एक दूसरा मेंढक , जिसका नाम सोनू था , फिसलकर उस कुएँ में गिर गया। सोनू एक बड़े तालाब में रहता था। वह खुली दुनिया का आदी था—जहाँ ताजी हवा , बड़ी जगह और बहुत सारे जीव-जंतु थे। जैसे ही वह कुएँ में गिरा , उसे महसूस हुआ कि यह जगह बहुत छोटी और बंद है। मोनू ने जैसे ही सोनू को देखा , वह हैरान रह गया। उस...

लालची दूधवाला

हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

अंधेरे में खड़ा साया

  महाद्वीप आर्यवर्त के बीचोंबीच बसा था देश “रुद्रायन” ,  एक ऐसा राष्ट्र जो बाहर से शांत और समृद्ध दिखता था ,  लेकिन भीतर ही भीतर रहस्यों ,  साज़िशों और छिपे युद्धों से भरा हुआ था। रुद्रायन की सीमाएँ ऊँचे पहाड़ों ,  घने जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरी थीं ,  जिससे बाहरी दुनिया से इसका संपर्क सीमित रहता था। राजधानी “वज्रनगर” आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण थी। इसी राजधानी के नीचे ,  ज़मीन से कई मंज़िल नीचे ,  स्थित था देश का सबसे गोपनीय संगठन — “त्रिनेत्र एजेंसी”। इस एजेंसी का अस्तित्व आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया था ,  लेकिन देश की सुरक्षा इसी के हाथों में थी। अद्वित वर्मा त्रिनेत्र एजेंसी का सबसे तेज़ ,  सबसे शांत और सबसे रहस्यमय एजेंट था। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल थी ,  चेहरा साधारण ,  आँखें गहरी और भावनाओं को छुपाने में माहिर। जो लोग उसे पहली बार देखते ,  वे कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते थे कि यही व्यक्ति अकेले दम पर कई देशों की खुफिया योजनाओं को नाकाम कर चुका था। अद्वित का अतीत उतना ही ध...