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ज्ञान का सौदा

  लालच की नींव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। यह गाँव अपने शांत वातावरण , सादे लोगों और आपसी प्रेम के लिए जाना जाता था। गाँव में कच्चे-पक्के मकान थे , सुबह-शाम मंदिर की घंटी बजती थी और बच्चे नंगे पाँव गलियों में खेलते फिरते थे। सूरजपुर में एक ही सरकारी स्कूल था , जो देखने में भले ही साधारण लगता था , लेकिन वही गाँव के बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा था। इसी स्कूल में पढ़ाते थे मास्टर हरिदत्त शर्मा , जिन्हें लोग सम्मान से “शर्मा जी मास्टर” कहते थे। मास्टर हरिदत्त शर्मा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उनकी उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष थी , सिर पर हल्की सफेदी और आँखों पर मोटे शीशों का चश्मा। बाहर से देखने पर वे एक आदर्श शिक्षक लगते थे—सफेद धोती-कुर्ता , हाथ में किताबें और मुँह पर गंभीर भाव। गाँव के लोग उन्हें ईमानदार और सख्त शिक्षक मानते थे , लेकिन उनके मन के भीतर छिपा हुआ लालच किसी को दिखाई नहीं देता था। वे मानते थे कि दुनिया में बिना पैसे के कोई इज्जत नहीं होती और शिक्षक की तनख्वाह में कभी सुख नहीं मिल सकता। शुरुआत में हरिदत्त शर्मा भी बाकी शिक्षकों की त...

लोभी भिक्षु

बहुत समय पहले हिमालय की तलहटी में एक शांत राज्य बसा था, जहाँ प्रकृति और साधना का अनोखा संगम देखने को मिलता था। उस राज्य से थोड़ा दूर एक प्राचीन बौद्ध मठ था, जहाँ भिक्षु आत्मज्ञान की खोज में अपना जीवन समर्पित कर देते थे। उसी मठ में भद्रसेन नाम का एक भिक्षु रहता था। बाहर से देखने पर वह अत्यंत शांत, संयमी और अनुशासित दिखाई देता था। उसकी आँखों में झुकी हुई विनम्रता, धीमी चाल और मधुर वाणी लोगों को यह विश्वास दिलाती थी कि वह सच्चा साधक है। मठ में आने वाले दानदाता और नए शिष्य उसे आदर की दृष्टि से देखते थे, पर कोई यह नहीं जानता था कि उसके मन के भीतर लोभ की गहरी जड़ें फैली हुई थीं।

भद्रसेन का अतीत अभावों से भरा था। बचपन में उसने गरीबी का ऐसा रूप देखा था जिसने उसके मन में हमेशा के लिए डर बसा दिया था। कई बार वह बिना भोजन सोया, कई बार अपमान सहा। उसी पीड़ा ने उसके भीतर यह भावना पैदा कर दी थी कि जीवन में सबसे बड़ा खतरा खाली हाथ रह जाना है। जब वह बड़ा हुआ और मठ में आया, तब उसने सोचा कि भिक्षु बनने से उसे सुरक्षा मिलेगी, सम्मान मिलेगा और जीवन की अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी। उसने त्याग का मार्ग अपनाया, पर उसका मन अब भी संग्रह करना चाहता था।

मठ के नियम स्पष्ट थे—भिक्षु केवल आवश्यकता भर लें, अधिक कुछ न रखें और हर वस्तु को अस्थायी मानें। शुरू में भद्रसेन ने इन नियमों का पालन किया, पर धीरे-धीरे उसका मन विचलित होने लगा। जब वह देखता कि दान में अच्छा भोजन आया है, तो वह अपने हिस्से से थोड़ा अधिक लेने लगा। वह अपने लिए अतिरिक्त सूखे फल और अन्न छिपाकर रखने लगा। वह सोचता था कि इसमें बुराई क्या है, भविष्य का सोच लेना समझदारी है। इसी सोच ने उसके भीतर के लोभ को चुपचाप बढ़ने दिया।

समय के साथ उसका लालच केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा। उसे मठ में सम्मान चाहिए था, दूसरों से अधिक आदर। जब किसी भिक्षु की प्रशंसा होती, तो भद्रसेन के मन में हलचल मच जाती। वह मुस्कराता जरूर था, पर भीतर ही भीतर जलता रहता था। उसे लगता था कि वह सबसे अधिक योग्य है और यदि उसे वह स्थान नहीं मिल रहा, तो यह अन्याय है। इसी भावना ने उसके भीतर ईर्ष्या और तुलना की आदत डाल दी।

भद्रसेन चालाक भी था। उसने यह समझ लिया था कि खुले लोभ से कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए उसने विनम्रता का मुखौटा और मजबूत कर लिया। वह प्रधान भिक्षु की सेवा में हमेशा आगे रहता, उनके आदेशों का बिना प्रश्न पालन करता और सभा में उनके विचारों की प्रशंसा करता। धीरे-धीरे प्रधान भिक्षु को लगने लगा कि भद्रसेन सबसे भरोसेमंद शिष्य है। उसे छोटे-छोटे उत्तरदायित्व सौंपे जाने लगे, जो आगे चलकर बड़े अधिकारों में बदल गए।

जैसे-जैसे भद्रसेन का प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे उसके भीतर का लोभ भी गहराता गया। अब वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि नियंत्रण के लिए भी संग्रह करने लगा था। उसे अच्छा लगने लगा था कि मठ में लोग उसके निर्णयों पर निर्भर हैं। वह खुद को साधारण भिक्षु नहीं, बल्कि व्यवस्था का केंद्र मानने लगा था। साधना पीछे छूटने लगी और महत्वाकांक्षा आगे बढ़ने लगी।

भद्रसेन को यह एहसास ही नहीं हुआ कि जिस लोभ को वह सुरक्षा समझ रहा था, वही धीरे-धीरे उसकी शांति को खा रहा था। ध्यान में बैठते समय उसका मन भोजन, अधिकार और सम्मान के विचारों में उलझा रहता। फिर भी वह खुद को यह समझाता रहा कि वह सब कुछ मठ के भले के लिए कर रहा है। इसी आत्म-भ्रम के साथ उसकी कहानी एक नए मोड़ की ओर बढ़ रही थी, जहाँ उसके जीवन में एक ऐसा व्यक्ति आने वाला था जो उसके भीतर छिपे सत्य को आईने की तरह सामने रख देगा।

कुछ ही दिनों बाद मठ में एक नया भिक्षु आया, लेकिन उसकी आयु नई नहीं थी। वह वृद्ध था, शरीर से दुर्बल पर आँखों में अद्भुत शांति और गहराई थी। उसका नाम आनंद था। उसके चेहरे पर न कोई महत्वाकांक्षा थी, न ही स्वयं को सिद्ध करने की लालसा। वह चुपचाप मठ के नियमों का पालन करता, जो मिलता उसी में संतुष्ट रहता और अधिकतर समय ध्यान में बिताता। प्रारंभ में किसी ने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया, पर धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति लोगों को भीतर से छूने लगी। उसकी मौन साधना और सरल व्यवहार में एक ऐसी शक्ति थी जो बिना बोले ही बहुत कुछ कह देती थी।

भद्रसेन ने आनंद को पहली बार सभा में देखा तो उसे हल्की असहजता महसूस हुई। आनंद ने कुछ कहा नहीं था, फिर भी भद्रसेन को लगा जैसे उसकी आँखें सब कुछ देख रही हों। यह भावना उसे अच्छी नहीं लगी। उसे डर था कि कहीं यह वृद्ध भिक्षु उसकी वर्षों से बनाई हुई छवि को प्रभावित न कर दे। जब उसने देखा कि कुछ युवा भिक्षु आनंद के पास बैठकर शांति अनुभव कर रहे हैं, तो उसके भीतर ईर्ष्या की आग भड़क उठी।

अब भद्रसेन ने अपने अधिकारों का उपयोग करना शुरू किया। उसने आनंद को सबसे कठिन कार्य सौंपे—जल लाना, लकड़ी काटना, और दूर के खेतों में सेवा करना। भोजन वितरण के समय आनंद को सबसे अंत में बुलाया जाता, और कई बार भोजन भी कम पड़ जाता। पर आनंद के चेहरे पर न कभी शिकायत दिखी, न क्रोध। वह हर कार्य को स्वीकार करता और शांत भाव से करता। यह शांति भद्रसेन को और भी अधिक परेशान करने लगी, क्योंकि वह समझ नहीं पा रहा था कि अपमान और अभाव के बाद भी कोई इतना स्थिर कैसे रह सकता है।

एक दिन भद्रसेन ने जानबूझकर सभा में आनंद की बात को काट दिया और उसे तुच्छ दिखाने का प्रयास किया। पर आश्चर्य की बात यह थी कि सभा में बैठे कुछ भिक्षुओं को भद्रसेन का व्यवहार कठोर लगा। पहली बार उसके प्रति लोगों की दृष्टि में हल्का सा संदेह उभरा। भद्रसेन ने इसे महसूस किया, लेकिन अपने अहंकार में वह इसे स्वीकार नहीं कर पाया। उसने सोचा कि यदि वह और अधिक नियंत्रण रखेगा, तो सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा।

इसी बीच एक रात भद्रसेन ने एक विचित्र सपना देखा। उसने देखा कि वह ऊँचे सिंहासन पर बैठा है और उसके चारों ओर सोने, अन्न और वस्त्रों के ढेर लगे हैं। लोग उसकी प्रशंसा कर रहे हैं, पर जैसे ही वह किसी वस्तु को पकड़ने आगे बढ़ता है, वह वस्तु धुएँ में बदल जाती है। अंत में वह अकेला बैठा रह जाता है, खाली हाथ और भय से काँपता हुआ। नींद खुलते ही उसका हृदय तेजी से धड़क रहा था, पर उसने स्वयं को समझा लिया कि यह केवल थकान का प्रभाव है।

कुछ ही समय बाद राज्य में भयानक अकाल पड़ा। वर्षा नहीं हुई, फसलें सूख गईं और दान की मात्रा अचानक बहुत कम हो गई। मठ में चिंता का माहौल बन गया। प्रधान भिक्षु ने सभी को एकत्र कर कहा कि अब हर भिक्षु को कम भोजन मिलेगा और सबको समान त्याग करना होगा। यह सुनकर भद्रसेन के भीतर भय ने जन्म लिया। उसे लगा कि वही पुराना अभाव फिर लौट रहा है, जिससे वह जीवन भर भागता रहा था।

उसी भय ने उसके लोभ को और प्रबल कर दिया। उसने गुप्त रूप से भंडार से अतिरिक्त भोजन निकालकर छिपाना शुरू कर दिया। वह सोचता था कि यदि स्थिति और बिगड़ी, तो कम से कम उसके पास पर्याप्त होगा। हर रात वह छिपे हुए अन्न को देखकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करने की कोशिश करता, पर उसके मन की बेचैनी कम नहीं होती थी। लोभ ने अब पूरी तरह से उसकी साधना को निगल लिया था।

एक दिन एक युवा भिक्षु ने उसे भंडार में चोरी करते देख लिया। वह भयभीत था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। अंततः उसने यह बात आनंद को बताई। आनंद ने ध्यानपूर्वक सब सुना और केवल इतना कहा कि सत्य को दबाने से पीड़ा बढ़ती है, और सत्य को शांत भाव से सामने लाना ही करुणा है। यह सुनकर वह भिक्षु कुछ साहस जुटा पाया।

अगली सुबह मठ की सभा में जब यह विषय उठा, तो वातावरण भारी हो गया। भद्रसेन से जब पूछा गया, तो उसने पहले इनकार किया। पर उसके शब्दों में आत्मविश्वास नहीं था। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और उसका स्वर काँप रहा था। वर्षों से जिसे वह छिपाता आ रहा था, वह अब सबके सामने आने को तैयार था। उसी क्षण उसकी बनाई हुई दुनिया दरकने लगी, और उसकी कहानी एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई।

सभा में फैला सन्नाटा भद्रसेन के कानों में गूंजने लगा। प्रधान भिक्षु ने गंभीर दृष्टि से उसकी ओर देखा और शांत स्वर में पूछा कि क्या आरोप सत्य हैं। उस क्षण भद्रसेन के सामने दो रास्ते थे—सत्य स्वीकार करना या अपने अहंकार की रक्षा करना। वर्षों से उसने जिस छवि को गढ़ा था, उसे बचाने की चाह में उसने झूठ का सहारा लिया। उसने कहा कि वह केवल भंडार की जाँच कर रहा था, पर उसके शब्दों में वह सरलता नहीं थी जो एक सच्चे साधक की पहचान होती है। सभा में बैठे भिक्षु यह अंतर स्पष्ट रूप से महसूस कर रहे थे।

तभी आनंद ने धीरे से बोलने की अनुमति मांगी। उसकी वाणी में न आरोप था, न क्रोध। उसने केवल इतना कहा कि अकाल के समय किसी एक का संग्रह पूरे संघ की भूख बन जाता है। यह वाक्य किसी तीर की तरह भद्रसेन के हृदय में लगा। उसे पहली बार लगा कि लोग उसके कर्मों को देख रहे हैं, केवल उसके वस्त्रों को नहीं। प्रधान भिक्षु ने निर्णय दिया कि भंडार की जाँच होगी और सत्य सामने लाया जाएगा।

जब छिपाया हुआ भोजन मिला, तो भद्रसेन के भीतर वर्षों से दबा भय टूट पड़ा। उसे ऐसा लगा मानो उसका सारा अस्तित्व ही उजागर हो गया हो। सभा में किसी ने ऊँची आवाज़ नहीं उठाई, फिर भी उसे हर दृष्टि बोझिल लग रही थी। उसे यह समझ में आने लगा कि उसका सबसे बड़ा शत्रु कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना लोभ था, जिसने उसे इस स्थिति तक पहुँचाया था।

उस रात भद्रसेन सो नहीं सका। उसका मन बार-बार बचपन की उन रातों में लौट जाता जब वह भूखा सोता था। उसे एहसास हुआ कि वही डर आज भी उसके भीतर जीवित है और वही उसे गलत रास्तों पर ले गया। पर अब वह डर उसे सुरक्षा नहीं, बल्कि अकेलापन दे रहा था। उसे लगने लगा कि मठ, भिक्षु और साधना—सब उससे दूर हो चुके हैं।

अगली सुबह किसी को बताए बिना वह मठ छोड़कर चला गया। उसने कुछ अन्न और वस्तुएँ साथ लीं और जंगल की ओर निकल पड़ा। चलते समय उसके कदम भारी थे, पर मन में यह भ्रम था कि अकेले रहकर वह स्वयं को बचा लेगा। प्रारंभ में उसे लगा कि वह सही कर रहा है, क्योंकि अब कोई उसे प्रश्न नहीं करेगा। पर जंगल की नीरवता में बैठकर उसे अपनी ही साँसों की आवाज़ डराने लगी।

दिन बीतते गए। भोजन कम होता गया और शरीर कमजोर पड़ने लगा। रात में ठंड, दिन में भय और चारों ओर अनजान आवाज़ें—इन सबने उसके भीतर की झूठी सुरक्षा को तोड़ दिया। तब उसे समझ आया कि उसने जीवन भर जो संग्रह किया, वह उसे शांति नहीं दे सका। उसके मन में बार-बार आनंद का शांत चेहरा उभरने लगा और उसके शब्द गूंजने लगे कि त्याग बाहर से नहीं, भीतर से होता है।

एक दिन कमजोरी के कारण वह गिर पड़ा। उस क्षण उसे पहली बार अपने जीवन पर ईमानदारी से विचार करने का अवसर मिला। उसने देखा कि लोभ ने उसे क्या दिया—न शांति, न संबंध, न आत्मसम्मान। आँसू उसकी आँखों से बहने लगे। पहली बार उसने स्वयं से स्वीकार किया कि वह भिक्षु तो बना, पर कभी साधक नहीं बन पाया।

कई दिनों के संघर्ष के बाद वह किसी तरह वापस मठ की ओर लौटा। उसका शरीर थका हुआ था और मन टूटा हुआ। मठ के द्वार पर खड़ा होकर उसे भीतर जाने का साहस नहीं हो रहा था। तभी उसने देखा कि सामने आनंद खड़ा है। उसकी आँखों में वही करुणा थी, जो पहले दिन थी। न कोई प्रश्न, न कोई आरोप—केवल मौन स्वीकृति।

भद्रसेन वहीं बैठ गया और फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने अपने भीतर के डर, अपने लोभ और अपने पतन को स्वीकार किया। आनंद ने उसे उठाया और केवल इतना कहा कि जो अपने अंधकार को पहचान ले, वही प्रकाश की ओर पहला कदम रखता है। उस क्षण भद्रसेन को लगा कि वर्षों बाद उसके मन का भार थोड़ा हल्का हुआ है।

कहानी अब अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन की ओर बढ़ रही थी, जहाँ भद्रसेन को यह समझना था कि सच्चा त्याग क्या होता है और मुक्ति का मार्ग किस दिशा में जाता है।

आनंद भद्रसेन को भीतर मठ में ले आया। प्रधान भिक्षु को सब कुछ बताया गया। किसी ने डाँटा नहीं, किसी ने अपमान नहीं किया। यह मौन भद्रसेन के लिए किसी दंड से कम नहीं था। उसे महसूस हुआ कि करुणा कभी-कभी सबसे कठोर शिक्षा होती है। प्रधान भिक्षु ने कहा कि भद्रसेन मठ में रह सकता है, पर अब उसे किसी पद या अधिकार का दायित्व नहीं दिया जाएगा। वह एक साधारण भिक्षु की तरह जीवन बिताएगा और अपने कर्मों के माध्यम से स्वयं को शुद्ध करेगा।

भद्रसेन ने यह निर्णय सिर झुकाकर स्वीकार किया। अब उसका जीवन पूरी तरह बदल चुका था। वह सबसे पहले उठता, सबसे कठिन कार्य करता और सबसे अंत में भोजन करता। वह किसी से विशेष व्यवहार की अपेक्षा नहीं करता था। पहले जो कार्य उसे अपमान लगते थे, अब वही उसे आत्मचिंतन का अवसर देते थे। धीरे-धीरे उसके भीतर का डर कम होने लगा, क्योंकि उसने यह समझ लिया था कि अभाव से अधिक विनाशकारी चीज़ लोभ होता है।

साधना में बैठते समय अब उसका मन भटकता नहीं था। जब भी पुराने विचार आते, वह उन्हें पहचानकर छोड़ देता। आनंद कभी-कभी उसके पास बैठता और मौन में ही उसे सिखा देता कि शांति शब्दों से नहीं, स्वीकृति से आती है। भद्रसेन को यह समझ में आने लगा कि सच्चा त्याग वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उस भय को छोड़ना है जो हमें वस्तुओं से बाँधता है।

समय बीतता गया। अकाल समाप्त हुआ, पर भद्रसेन के भीतर एक स्थायी परिवर्तन हो चुका था। जो भिक्षु कभी संग्रह करता था, अब वही बाँटने लगा। जो कभी नियंत्रण चाहता था, अब वही सेवा में संतोष खोजने लगा। नए भिक्षु जब उससे मार्गदर्शन मांगते, तो वह अपने अनुभव से उन्हें केवल इतना कहता कि यदि लोभ को समय रहते न पहचाना जाए, तो वह साधना को भी अहंकार बना देता है।

वर्षों बाद जब भद्रसेन वृद्ध हुआ, तब उसका शरीर कमजोर था, पर मन स्थिर और शांत था। लोग उसे एक बदले हुए मनुष्य के रूप में जानते थे। वह अब उदाहरण था इस बात का कि पतन अंतिम सत्य नहीं होता, यदि व्यक्ति स्वयं को ईमानदारी से देख सके। मठ में उसकी कहानी नई पीढ़ी को सुनाई जाती थी, ताकि वे समझ सकें कि भिक्षु का वस्त्र पहन लेना सरल है, पर भिक्षु का हृदय धारण करना सबसे कठिन साधना है।

इस प्रकार लोभी भिक्षु की यह कथा केवल एक व्यक्ति की नहीं रही, बल्कि एक चेतावनी और शिक्षा बन गई—कि जब तक मन में संतोष नहीं, तब तक कोई भी त्याग पूर्ण नहीं हो सकता, और जब संतोष आ जाता है, तब सबसे बड़ा धन स्वयं के भीतर प्रकट हो जाता है।

 


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