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ज्ञान का सौदा

  लालच की नींव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। यह गाँव अपने शांत वातावरण , सादे लोगों और आपसी प्रेम के लिए जाना जाता था। गाँव में कच्चे-पक्के मकान थे , सुबह-शाम मंदिर की घंटी बजती थी और बच्चे नंगे पाँव गलियों में खेलते फिरते थे। सूरजपुर में एक ही सरकारी स्कूल था , जो देखने में भले ही साधारण लगता था , लेकिन वही गाँव के बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा था। इसी स्कूल में पढ़ाते थे मास्टर हरिदत्त शर्मा , जिन्हें लोग सम्मान से “शर्मा जी मास्टर” कहते थे। मास्टर हरिदत्त शर्मा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उनकी उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष थी , सिर पर हल्की सफेदी और आँखों पर मोटे शीशों का चश्मा। बाहर से देखने पर वे एक आदर्श शिक्षक लगते थे—सफेद धोती-कुर्ता , हाथ में किताबें और मुँह पर गंभीर भाव। गाँव के लोग उन्हें ईमानदार और सख्त शिक्षक मानते थे , लेकिन उनके मन के भीतर छिपा हुआ लालच किसी को दिखाई नहीं देता था। वे मानते थे कि दुनिया में बिना पैसे के कोई इज्जत नहीं होती और शिक्षक की तनख्वाह में कभी सुख नहीं मिल सकता। शुरुआत में हरिदत्त शर्मा भी बाकी शिक्षकों की त...

किसान की सर्द रातें

सर्दियों की वह सुबह कुछ अलग ही थी। कोहरा इतना घना था कि सूरज मानो खेतों से डरकर कहीं छिप गया हो। गाँव के बाहर फैले खेत सफ़ेद चादर ओढ़े सो रहे थे और ठंडी हवा हर साँस के साथ किसान के फेफड़ों में उतर रही थी। रामदयाल अपने कच्चे घर के आँगन में खड़ा था, हाथ में फटी हुई ऊनी शाल, आँखों में कई बरसों की थकान और उम्मीदों का बोझ लिए। वह इस धरती का बेटा था, उसी मिट्टी में जन्मा, उसी मिट्टी में पसीना बहाने वाला। सर्दी उसके लिए मौसम नहीं थी, बल्कि एक परीक्षा थी—हर साल लौटने वाली, हर बार कुछ छीन लेने वाली।

रामदयाल के खेत गाँव के आख़िरी छोर पर थे। तीन बीघा ज़मीन, जो कभी उसके पिता की शान हुआ करती थी, अब उसकी ज़िम्मेदारी थी। गेहूँ की फसल खड़ी थी, लेकिन ठंड ने उसकी बढ़त रोक दी थी। पाला पड़ने का डर हर रात उसे सोने नहीं देता था। वह जानता था कि एक भी कड़ाके की रात उसकी महीनों की मेहनत को बर्बाद कर सकती है। जब वह खेत की ओर चला, तो उसके पैरों के नीचे ज़मीन कड़कड़ाकर आवाज़ कर रही थी, जैसे ठंड से जमी हुई मिट्टी भी दर्द में हो।

उसकी पत्नी, सीता, पीछे से आवाज़ लगाती है—“थोड़ा संभलकर जाना, हवा बहुत तेज़ है।” उसकी आवाज़ में चिंता थी, पर शब्दों में आदत की मजबूरी। किसान के घर में चिंता रोज़ की मेहमान होती है। रामदयाल ने पलटकर देखा, सीता दरवाज़े पर खड़ी थी, सिर पर पुरानी साड़ी, हाथों में फटे दस्ताने, और आँखों में वही सवाल—इस साल फसल बचेगी या नहीं? रामदयाल ने कुछ नहीं कहा, बस हल्की सी मुस्कान दी, जो ज़्यादा दिलासा देने के लिए थी, यक़ीन के लिए नहीं।

खेत पर पहुँचकर उसने मिट्टी को हाथ में लिया। ठंडी, सख़्त, बेजान-सी। उसे अपने पिता की याद आई, जो सर्दियों में ऐसे ही खेत में बैठकर कहते थे कि “मिट्टी ज़िंदा चीज़ है, बेटा, इसे समझना पड़ता है।” तब रामदयाल हँसता था, लेकिन आज वह हर कण को समझने की कोशिश कर रहा था। वह जानता था कि अगर अगले दो हफ़्तों में मौसम थोड़ा भी मेहरबान हुआ, तो फसल बच सकती है। अगर नहीं, तो कर्ज़ का बोझ और बढ़ेगा।

दोपहर तक कोहरा थोड़ा छँटा, पर धूप में वह गर्माहट नहीं थी जो फसल को राहत दे सके। रामदयाल ने खेत के किनारे लगे नीम के पेड़ के नीचे बैठकर सूखी रोटी खाई। उसके हाथ ठंड से सुन्न थे, पर पेट की आग ठंड से ज़्यादा तेज़ थी। खाते हुए उसने आस-पास नज़र दौड़ाई। दूर-दूर तक फैले खेत, कुछ हरे, कुछ मुरझाए, सब एक जैसी कहानी कह रहे थे—संघर्ष की।

शाम ढलते-ढलते हवा और तेज़ हो गई। गाँव लौटते समय रामदयाल ने देखा कि कुछ किसान अलाव जला रहे थे। सर्दी से बचने के लिए नहीं, बल्कि फसल को पाले से बचाने की आख़िरी कोशिश के तौर पर। उसने भी अपने खेत के पास सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कीं। रात को जागना पड़ेगा, यह उसे पता था। सर्दी की रात किसान के लिए आराम नहीं, इम्तिहान होती है।

घर पहुँचकर उसने अपने बच्चों को देखा। दोनों एक ही रज़ाई में दुबके हुए थे। बड़ा बेटा, मोहन, उसे देखकर बोला, “बाबा, इस बार स्कूल की फ़ीस भर पाएँगे न?” रामदयाल के सीने में कुछ चुभ गया। उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा, “देखेंगे।” किसान के पास अक्सर यही जवाब होता है।

रात गहरी हुई। आसमान में तारे साफ़ दिख रहे थे, जो ठंड के और बढ़ने का संकेत थे। रामदयाल खेत पर अलाव जलाकर बैठ गया। आग की लपटें उसकी आँखों में चमक रही थीं, लेकिन दिल में डर भी था। हर कुछ देर में वह गेहूँ की बालियों को छूकर देखता, मानो उनसे बात कर रहा हो। उसे लगता था कि वे भी उसकी तरह ठंड सह रही हैं, चुपचाप।

उस रात उसे नींद नहीं आई। वह अपने जीवन के बारे में सोचता रहा—पिता की मौत, ज़मीन का बँटवारा, साहूकार से लिया कर्ज़, और हर साल बढ़ती अनिश्चितता। सर्दी की यह रात बाकी रातों जैसी नहीं थी। यह उसके धैर्य, उसकी उम्मीद और उसकी मेहनत की परीक्षा ले रही थी। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन प्रार्थना की कि सुबह तक पाला न पड़े।

जब पूरब की ओर हल्की सी रोशनी दिखने लगी, तो रामदयाल की आँखों में थकान के साथ उम्मीद भी थी। उसने खेत पर आख़िरी नज़र डाली। बालियाँ अब भी खड़ी थीं। वह जानता था कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन आज की रात वह जीत गया था। सर्दियों की इस कहानी में यह बस शुरुआत थी—एक किसान, उसकी ज़मीन, और ठंड से जूझता उसका हौसला।

सूरज निकल तो आया था, लेकिन उसकी रोशनी में गर्मी नहीं थी। रामदयाल ने खेत का चक्कर लगाया। कुछ बालियों पर हल्की-सी नमी जमी हुई थी, जो इस बात का संकेत थी कि रात भर पाला पास ही मंडराता रहा। उसने राहत की साँस ली, पर यह राहत अधूरी थी। सर्दी का असली वार अक्सर धीरे-धीरे होता है—एक ही रात में नहीं, कई रातों में। उसे पता था कि आने वाले दिन और भी कठिन होंगे।

गाँव में लौटते समय रास्ते में उसे हरिहर मिला, जो उसके पड़ोसी किसान थे। हरिहर का चेहरा उतरा हुआ था। उसने बताया कि उसके खेत के निचले हिस्से में पाला पड़ गया है और आधी फसल झुलस गई है। उसकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं था, बस थकान थी। रामदयाल ने उसे ढाढ़स दिया, लेकिन शब्द खोखले लग रहे थे। किसान एक-दूसरे को दिलासा तो देते हैं, पर तक़दीर का बोझ सबको अकेले ही उठाना पड़ता है।

दोपहर तक गाँव में यह ख़बर फैल गई कि मौसम और बिगड़ने वाला है। रेडियो पर सुनी गई चेतावनी ने सबकी चिंता बढ़ा दी। कुछ बुज़ुर्ग कह रहे थे कि उन्होंने ऐसी सर्दी बरसों बाद देखी है। रामदयाल ने पंचायत के चबूतरे पर बैठे किसानों की बातें सुनीं—कोई बीमा की बात कर रहा था, कोई सरकार को कोस रहा था, कोई साहूकार से और कर्ज़ लेने की सोच में था। हर चेहरे पर एक ही सवाल लिखा था: अगर फसल चली गई, तो आगे क्या?

घर पर सीता चूल्हे के पास बैठी थी। उसने पानी में ज़्यादा आटा मिलाकर रोटियाँ बनाई थीं, ताकि थोड़ी ज़्यादा बन सकें। रामदयाल यह समझ गया, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। गरीबी में अक्सर चुप्पी ही सबसे बड़ा समझौता होती है। बच्चों ने रोटियाँ खाईं, पर उनके सवाल खत्म नहीं हुए। मोहन बार-बार किताबों की ओर देखता, मानो पढ़ाई ही उसे इस ज़िंदगी से बाहर निकाल सके।

शाम होते-होते आसमान फिर साफ़ हो गया। यह साफ़ आसमान किसान के लिए शुभ नहीं होता। ठंडी हवा फिर से तेज़ चलने लगी। रामदयाल ने बिना कुछ कहे अलाव की तैयारी शुरू कर दी। इस बार वह अकेला नहीं था। गाँव के कई किसान अपने-अपने खेतों पर आग जला रहे थे। दूर-दूर तक छोटे-छोटे अलाव किसी युद्ध के मोर्चे जैसे लग रहे थे, जहाँ हर किसान अपनी फसल की रखवाली कर रहा था।

रात गहरी होते ही ठंड ने अपना रंग दिखाया। हवा चुभने लगी, हाथ सुन्न होने लगे। रामदयाल अलाव के पास बैठा रहा, कभी आग में लकड़ी डालता, कभी खेत में घूमता। उसे लगा जैसे हर पौधा उसकी ओर उम्मीद से देख रहा हो। उसने अपने पिता की सीख याद की—“किसान की सबसे बड़ी ताक़त उसका सब्र होता है।” लेकिन सब्र की भी एक सीमा होती है, और यह सीमा सर्द रातों में बार-बार टूटती है।

आधी रात के बाद पाला पड़ने लगा। ज़मीन पर हल्की सफ़ेदी दिखने लगी। रामदयाल का दिल धड़कने लगा। उसने आग और तेज़ की, खेत के चारों ओर घूमता रहा। उसकी आँखों में जलन थी, शरीर में दर्द, पर वह रुका नहीं। उसे पता था कि अगर वह थककर बैठ गया, तो सर्दी जीत जाएगी। यह लड़ाई सिर्फ़ फसल की नहीं थी, बल्कि उसके आत्मसम्मान की भी थी।

सुबह हुई तो हालात मिले-जुले थे। कुछ हिस्सों में फसल सुरक्षित थी, कुछ जगहों पर पत्तियाँ झुलसी हुई थीं। रामदयाल ने नुकसान का अंदाज़ा लगाया। पूरी फसल तो नहीं गई थी, लेकिन पैदावार कम होना तय था। इसका मतलब था—कम दाम, कम आमदनी, और वही पुराना कर्ज़। उसने मन ही मन हिसाब लगाया और माथे पर पसीना आ गया, जबकि ठंड अब भी कम नहीं हुई थी।

कुछ दिनों बाद मंडी का समय आया। रामदयाल अपनी उपज लेकर गया। वहाँ दलालों की आवाज़ें, ट्रैक्टरों की धूल, और किसानों की बेचैनी सब एक साथ मौजूद थीं। गेहूँ के दाम उम्मीद से कम थे। दलाल नुकसान का बहाना बना रहे थे—नमी ज़्यादा है, दाने छोटे हैं। रामदयाल जानता था कि यह आधा सच है, आधा मजबूरी। लेकिन उसके पास बहस की ताक़त नहीं थी। उसे पैसे चाहिए थे—घर चलाने के लिए, कर्ज़ चुकाने के लिए।

मंडी से लौटते समय उसके हाथ में जो रकम थी, वह उसकी मेहनत के मुकाबले बहुत कम थी। रास्ते में उसे साहूकार का घर दिखा। वही ऊँचा पक्का मकान, वही कठोर नज़रें। उसे पता था कि उसे वहाँ जाना पड़ेगा। कर्ज़ बढ़ेगा, ब्याज बढ़ेगा, लेकिन विकल्प भी तो कोई नहीं था। किसान अक्सर दो ही रास्तों के बीच फँसा रहता है—खेत और कर्ज़।

रात को घर में सन्नाटा था। सीता ने पैसे गिने, कुछ बोले बिना अलग रख दिए। रामदयाल बाहर आँगन में बैठ गया। ठंडी हवा अब भी चल रही थी, लेकिन उसकी लड़ाई अब सिर्फ़ मौसम से नहीं थी। वह अपने बच्चों के भविष्य, अपनी ज़मीन, और अपनी पहचान के बारे में सोच रहा था। क्या वह हमेशा इसी तरह सर्दियों से लड़ता रहेगा? या कभी ऐसा दिन आएगा जब उसकी मेहनत को पूरा सम्मान मिलेगा?

आसमान में चाँद निकल आया था। उसकी रोशनी में खेत चमक रहे थे। रामदयाल ने उन खेतों की ओर देखा और महसूस किया कि चाहे हालात कितने भी कठिन हों, वह इस मिट्टी को छोड़ नहीं सकता। सर्दी हर साल आएगी, मुश्किलें भी आएँगी, लेकिन किसान का रिश्ता धरती से कभी खत्म नहीं होता। यही रिश्ता उसे हर बार फिर खड़ा कर देता है।

सर्दी अब अपने आख़िरी दौर में थी, लेकिन उसके निशान हर जगह मौजूद थे। खेतों में गेहूँ की बालियाँ पकने लगी थीं, पर उनकी भरावट कम थी। रामदयाल हर दिन खेत पर जाकर फसल को देखता, मानो उसकी कमज़ोरी को अपने दिल में महसूस कर रहा हो। उसे पता था कि इस बार घर का खर्च चलाना और बच्चों की ज़रूरतें पूरी करना आसान नहीं होगा। इसी बीच गाँव में यह ख़बर आई कि सरकार की ओर से नुकसान झेलने वाले किसानों के लिए एक योजना आई है।

पंचायत भवन में बैठक बुलाई गई। रामदयाल भी गया। वहाँ एक सरकारी कर्मचारी काग़ज़ों का पुलिंदा लिए बैठा था। वह योजनाओं की बातें कर रहा था—मुआवज़ा, बीमा, सहायता राशि। सुनने में सब अच्छा लग रहा था, लेकिन शर्तें लंबी थीं। ज़मीन के काग़ज़, बैंक खाता, बीमा पॉलिसी, नुकसान का प्रमाण। रामदयाल के मन में उम्मीद जगी, लेकिन साथ ही डर भी। उसके कई काग़ज़ अधूरे थे, कुछ पुराने थे, कुछ साहूकार के पास गिरवी।

घर लौटकर उसने सीता से बात की। दोनों देर तक चुप बैठे रहे। फिर सीता ने कहा कि कोशिश तो करनी चाहिए। उसकी आवाज़ में थकान थी, लेकिन हार नहीं थी। अगले दिन रामदयाल काग़ज़ इकट्ठा करने में लग गया। तहसील के चक्कर, बैंक की लाइन, पंचायत के दफ्तर—हर जगह इंतज़ार और सवाल। हर बार कोई न कोई कमी निकल आती। कभी दस्तख़त सही नहीं, कभी रिकॉर्ड मेल नहीं खाता। रामदयाल को लगा जैसे यह व्यवस्था भी उसकी परीक्षा ले रही हो।

इन्हीं दिनों मोहन ने स्कूल से आकर कहा कि उसे आगे पढ़ना है, शहर में। उसकी आँखों में सपने थे—खेतों से बाहर की दुनिया के। रामदयाल ने बेटे की बात सुनी और मन भारी हो गया। वह चाहता था कि उसका बेटा उस ज़िंदगी से आगे बढ़े, जिसमें वह खुद फँसा हुआ था। लेकिन पैसे? वह सवाल फिर सामने खड़ा था। उस रात रामदयाल देर तक जागता रहा, खेत और भविष्य के बीच उलझा हुआ।

कुछ दिनों बाद सरकारी कर्मचारी गाँव में सर्वे के लिए आया। रामदयाल उसे अपने खेत पर ले गया। उसने नुकसान दिखाया, समझाया। कर्मचारी ने नोट्स लिए, फोटो खींचे, और कहा—“देखते हैं।” यह शब्द रामदयाल को चुभ गया। “देखते हैं” किसान की ज़िंदगी में अक्सर टालने का दूसरा नाम होता है। फिर भी, यह एक उम्मीद थी, और उम्मीद ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी थी।

सर्दी जाते-जाते एक और सच्चाई छोड़ गई—साहूकार का दबाव। ब्याज बढ़ चुका था। रामदयाल को बुलावा आया। वह गया। ऊँचे मकान के सामने खड़ा होकर उसे अपनी झोंपड़ी और खेत याद आए। साहूकार ने साफ़ कहा कि पैसे समय पर चाहिए। रामदयाल ने कुछ समय माँगा। बाहर निकलते समय उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने खुद को संभाला। वह जानता था कि डर से ज़्यादा ज़रूरी है कोई रास्ता ढूँढना।

इसी दौरान गाँव के कुछ युवाओं ने मिलकर एक सहकारी समूह बनाने की बात शुरू की। सीधे मंडी में बेचने, बिचौलियों से बचने की योजना थी। रामदयाल ने पहले हिचकिचाहट महसूस की, लेकिन फिर उसने सोचा—अगर कोशिश नहीं की, तो हालात कभी नहीं बदलेंगे। उसने समूह में शामिल होने का फ़ैसला किया। यह उसका एक बड़ा कदम था, जो उसने अपने डर के बावजूद उठाया।

समूह के साथ काम करना आसान नहीं था। मतभेद थे, बहसें थीं, लेकिन एक बात साफ़ थी—सबकी तकलीफ़ एक जैसी थी। जब पहली बार उन्होंने मिलकर अनाज बेचा और थोड़ा बेहतर दाम मिला, तो रामदयाल के चेहरे पर बरसों बाद हल्की-सी संतुष्टि दिखी। यह जीत छोटी थी, लेकिन उसके मायने बड़े थे।

सरकारी योजना का जवाब भी आया। पूरी भरपाई तो नहीं हुई, लेकिन थोड़ी सहायता मिली। उस पैसे से उसने साहूकार का कुछ हिस्सा चुकाया। बोझ पूरी तरह उतरा नहीं, पर हल्का ज़रूर हुआ। उस दिन रामदयाल ने महसूस किया कि हालात भले ही पूरी तरह न बदलें, लेकिन सही फैसले उन्हें मोड़ सकते हैं।

सर्दी अब जा चुकी थी। खेतों में नई हरियाली उगने लगी थी। रामदयाल ने मिट्टी को हाथ में लिया। वह अब भी वही किसान था—थका हुआ, पर टूटा नहीं। उसने आसमान की ओर देखा और सोचा कि हर मौसम कुछ न कुछ सिखाकर जाता है। सर्दी ने उसे सहनशीलता सिखाई थी, और इस बार उसने बदलाव का साहस भी दिया था।

कहानी यहाँ एक मोड़ पर आकर ठहरती है—जहाँ संघर्ष अब भी है, लेकिन उसके साथ समझ और निर्णय भी हैं। किसान की ज़िंदगी में सुख कभी पूरा नहीं होता, पर उम्मीद अगर ज़िंदा रहे, तो हर मौसम का सामना किया जा सकता है।

बसंत की पहली हवा में ठंड की आख़िरी यादें घुली हुई थीं। खेतों में नई फसल की तैयारी शुरू हो चुकी थी। रामदयाल सुबह-सुबह खेत पर गया और ज़मीन को पलटते हुए उसने महसूस किया कि यह मिट्टी हर साल की तरह फिर तैयार है—सब कुछ सहने के बाद भी। उसे लगा जैसे धरती उससे कह रही हो कि हार मानना उसका स्वभाव नहीं है, और शायद किसान का भी नहीं होना चाहिए।

सहकारी समूह धीरे-धीरे मज़बूत होने लगा। किसान अब पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास से बात करने लगे थे। मंडी में उनकी आवाज़ थोड़ी ऊँची होने लगी थी। रामदयाल भले ही ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन अनुभव ने उसे समझदार बना दिया था। वह बैठकों में अपनी बात रखने लगा, पहले हिचकता था, अब साफ़ बोलता था। यह बदलाव उसके भीतर ही नहीं, गाँव में भी महसूस किया जाने लगा।

मोहन का दाख़िला शहर के एक सरकारी कॉलेज में हो गया। फीस कम थी, लेकिन खर्च फिर भी चिंता का विषय था। रामदयाल ने कुछ और ज़िम्मेदारियाँ उठाईं—कभी मज़दूरी, कभी अतिरिक्त काम। वह थक जाता था, पर जब वह बेटे की आँखों में चमक देखता, तो उसकी थकान कुछ कम हो जाती। उसे लगता था कि शायद उसकी मेहनत का फल उसी रूप में मिल रहा है, जैसा वह हमेशा चाहता था।

सीता अब पहले से ज़्यादा मज़बूत दिखने लगी थी। उसने घर के पास थोड़ी सब्ज़ी उगानी शुरू की। छोटे-छोटे बदलावों से घर की हालत थोड़ी सुधरने लगी। खाने में विविधता आई, और खर्च कुछ कम हुआ। रामदयाल को एहसास हुआ कि संघर्ष सिर्फ़ खेत में नहीं, घर के भीतर भी होता है, और उसमें सीता हमेशा उसके साथ खड़ी रही थी।

एक दिन गाँव में फिर सर्दी की चर्चा हुई। किसी ने कहा कि इस साल भी मौसम कड़ा हो सकता है। रामदयाल ने वह बात सुनी और मुस्कुरा दिया। डर अब भी था, लेकिन वह डर उसे जकड़े नहीं था। उसने सर्दी को दुश्मन नहीं, एक चुनौती की तरह देखना सीख लिया था। वह जानता था कि तैयारी और साथ मिलकर किए गए प्रयास किसी भी मौसम को थोड़ा आसान बना सकते हैं।

खेत में नई फसल उग आई थी। हरी-भरी पत्तियाँ हवा में लहराने लगी थीं। रामदयाल अक्सर शाम को वहीं बैठ जाता और दूर तक फैले खेतों को देखता। उसे याद आता कि कैसे हर सर्दी उसे तोड़ने की कोशिश करती रही, और कैसे वह हर बार थोड़ा-थोड़ा मजबूत होता गया। किसान की ज़िंदगी में जीत कभी पूरी नहीं होती, लेकिन हार भी अंतिम नहीं होती।

एक शाम मोहन घर आया। शहर की बातें, पढ़ाई के सपने, और नए विचार लेकर। उसने पिता से कहा कि वह आगे चलकर खेती को नए तरीके से करना चाहता है—बेहतर बीज, पानी का सही इस्तेमाल, और तकनीक के साथ। रामदयाल ने बेटे की बातें सुनीं और पहली बार उसे लगा कि खेती सिर्फ़ मजबूरी नहीं, एक संभावना भी हो सकती है।

रात को आँगन में बैठकर रामदयाल ने आसमान देखा। वही तारे, वही खुला आकाश। लेकिन भीतर कुछ बदल चुका था। सर्दियों की वह लंबी कहानी अब उसे डराती नहीं थी। वह जानता था कि हर ठंड के बाद एक सुबह ज़रूर आती है, और हर किसान के भीतर इतनी ताक़त होती है कि वह उस सुबह तक टिक सके।

कहानी यहीं समाप्त होती है—एक किसान की, जो हर सर्दी में लड़ता रहा, गिरता रहा, फिर भी खड़ा होता रहा। यह कहानी सिर्फ़ रामदयाल की नहीं थी, बल्कि हर उस किसान की थी, जो ठंड, कर्ज़ और अनिश्चितता के बीच भी मिट्टी से अपना रिश्ता नहीं तोड़ता। खेतों में खड़ी नई फसल की तरह, उसकी उम्मीदें भी अब लहराने लगी थीं—शांत, दृढ़, और जीवित।


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