एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...
दिल्ली की सुबहें हमेशा झूठी होती हैं। वे उजाले का वादा तो करती हैं , लेकिन अपने भीतर रात के सारे राज़ छिपाए रखती हैं। आरव सिंह यह बात अच्छी तरह जानता था। वह अपनी बालकनी में खड़ा नीचे बहती ट्रैफिक की आवाज़ सुन रहा था—कारों के हॉर्न , चायवालों की पुकार , और अख़बारों की चरमराहट—सब कुछ सामान्य , फिर भी असहज। ब्लैक सन और किंगमेकर की घटनाओं के बाद उसने खुद को परछाइयों से दूर रखने की कोशिश की थी , लेकिन कुछ ज़िंदगियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें अंधेरे छोड़ते नहीं , वे अंधेरे को अपने भीतर ढोती हैं। आरव अब किसी एजेंसी का हिस्सा नहीं था , फिर भी उसकी आदतें नहीं बदली थीं—हर आवाज़ का विश्लेषण , हर चेहरे का मूल्यांकन , और हर शांति पर संदेह। उस सुबह मीरा क़ाज़ी का संदेश आया , और उसी पल आरव को समझ आ गया कि यह दिन सामान्य नहीं रहेगा। मीरा अब सिर्फ़ पत्रकार नहीं थी ; वह उन लोगों की सूची में आ चुकी थी जिनसे सत्ता डरती है। उसका संदेश छोटा था , लेकिन भारी—“मुझे कुछ मिला है। इस बार बात सिर्फ़ नेटवर्क की नहीं , विरासत की है।” आरव ने जव...