एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान अपनी एकमात्र बेटी रानी के साथ रेहता था। रानी की मां का देहांत उसके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गया था। उस वक्त रानी इतनी छोटी थी कि उसे मां का चेहरा भी याद नहीं रहा। गांव के लोगों ने कई बार पिता को समझाया कि वो दूसरी शादी कर ले ताकि बच्ची को मां का साया मिल सके। पर उसने हर बार मना कर दिया। रानी मेरी पत्नी की आखिरी निशानी है। मैं उसे किसी और के साए में नहीं पालना चाहता। सौतेली मां चाहे कितनी भी अच्छी क्यों ना हो उसके मन में वो अपनापन नहीं हो सकता जो एक सगी मां के दिल में होता है। मैं ही इसका पिता भी हूं और मां भी। जब तक जिंदा हूं इसे किसी की कमी मेंहसूस नहीं होने दूंगा। उसने ठान लिया था कि वो अपनी बेटी को खुद ही पाल पोस कर बड़ा करेगा। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये । वो खेतों में दिन रात मेहनत करता और जो थोड़ा बहुत कमाता उसी में दोनों का जीवन चलता। गरीबी थी पर उस घर में प्रेम और अपनापन की कोई कमी नहीं थी। रानी के लिए उसके पिता ही उसका पूरा संसार थे। मां भी , पिता भी और ...
दिल्ली की सुबहें हमेशा झूठी होती हैं। वे उजाले का वादा तो करती हैं , लेकिन अपने भीतर रात के सारे राज़ छिपाए रखती हैं। आरव सिंह यह बात अच्छी तरह जानता था। वह अपनी बालकनी में खड़ा नीचे बहती ट्रैफिक की आवाज़ सुन रहा था—कारों के हॉर्न , चायवालों की पुकार , और अख़बारों की चरमराहट—सब कुछ सामान्य , फिर भी असहज। ब्लैक सन और किंगमेकर की घटनाओं के बाद उसने खुद को परछाइयों से दूर रखने की कोशिश की थी , लेकिन कुछ ज़िंदगियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें अंधेरे छोड़ते नहीं , वे अंधेरे को अपने भीतर ढोती हैं। आरव अब किसी एजेंसी का हिस्सा नहीं था , फिर भी उसकी आदतें नहीं बदली थीं—हर आवाज़ का विश्लेषण , हर चेहरे का मूल्यांकन , और हर शांति पर संदेह। उस सुबह मीरा क़ाज़ी का संदेश आया , और उसी पल आरव को समझ आ गया कि यह दिन सामान्य नहीं रहेगा। मीरा अब सिर्फ़ पत्रकार नहीं थी ; वह उन लोगों की सूची में आ चुकी थी जिनसे सत्ता डरती है। उसका संदेश छोटा था , लेकिन भारी—“मुझे कुछ मिला है। इस बार बात सिर्फ़ नेटवर्क की नहीं , विरासत की है।” आरव ने जव...