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योद्धा राजा

बहुत समय पहले उत्तर दिशा की पर्वत-श्रृंखलाओं के बीच बसा हुआ एक समृद्ध राज्य था , जिसका नाम था वीरगढ़ । यह राज्य अपनी ऊँची प्राचीरों , अनुशासित सेना और न्यायप्रिय शासन के लिए प्रसिद्ध था। वीरगढ़ का राजा था राजा आर्यवर्धन , जिसे लोग एक महान योद्धा के रूप में जानते थे। उसने किशोरावस्था में ही तलवार और धनुष में महारत हासिल कर ली थी और अनेक युद्धों में अपने राज्य की रक्षा की थी। उसके शरीर पर कई युद्धों के निशान थे , जो उसकी वीरता की कहानी स्वयं कहते थे , लेकिन इन सबके बावजूद राजा आर्यवर्धन के हृदय में एक ऐसा भार था , जिसे कोई देख नहीं पाता था। राजा आर्यवर्धन बाहर से जितना निडर और कठोर दिखाई देता था , भीतर से उतना ही चिंतित और विचारों में डूबा रहता था। उसे हर समय अपने राज्य , प्रजा , भविष्य और संभावित युद्धों की चिंता सताती रहती थी। वह रातों को ठीक से सो नहीं पाता था। जब पूरा महल दीपक बुझाकर विश्राम करता , तब राजा अकेले अपने कक्ष में बैठा रहता और सोचता कि यदि कल शत्रु आक्रमण कर दे तो क्या होगा , यदि उसकी एक गलती से राज्य को हानि पहुँच गई तो क्या वह स्वयं को क्षमा कर पाएगा। एक योद्धा हो...

राजा और उनका राज्य

 बहुत समय पहले की बात है, एक विशाल और समृद्ध राज्य था जिसका नाम सौरभपुर था। इस राज्य का शासन एक निष्ठावान और बहादुर राजा, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह कर रहे थे। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने प्रजा के बीच बहुत ही लोकप्रिय थे। उनके राज्य में अमीरी और शांति थी, और लोग खुशी-खुशी जीवन जीते थे।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह का महल शहर के बीचों-बीच स्थित था। यह महल सोने और रत्नों से सजा हुआ था। महल की दीवारें ऊँची और मजबूत थीं, और हर कोने पर राजा की बहादुरी की कहानियाँ लिखी हुई थीं। महल में राजा के अलावा उनकी रानी राजमाता गंगा देवी, मंत्री राजेश्वर दास, और कई सेनापति रहते थे।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह का सबसे बड़ा उद्देश्य था कि उनका राज्य कभी भी संकट में न पड़े। इसके लिए उन्होंने अपनी सेना को मजबूत किया, और अपने प्रजा के कल्याण के लिए नए कानून बनवाए। उन्होंने गाँव-गाँव में स्कूल और अस्पताल बनवाए, ताकि हर कोई पढ़-लिख सके और बीमार होने पर इलाज करवा सके।

लेकिन किसी भी राजा के जीवन में चुनौतियाँ आती हैं। सौरभपुर राज्य के पास एक दूसरा राज्य था, जिसका नाम अंधेरराज्य था। अंधेरराज्य के राजा, अशोकराज बहुत ही लालची और युद्धप्रिय थे। वह हमेशा सौरभपुर के धन और संसाधनों पर नजर रखते थे।

एक दिन, अंधेरराज्य के शत्रु सेनापति ने अंधेरराज्य में एक सभा बुलाई और कहा,
अगर हम सौरभपुर पर हमला करें, तो हम उसके खजाने और समृद्धि को अपने राज्य में ला सकते हैं। हमें बस योजना बनानी होगी।”

अशोकराज ने मुस्कुराते हुए कहा,
तो तैयार हो जाओ। अगले महीने हम सौरभपुर पर हमला करेंगे।”

इस खबर की सूचना सौरभपुर के मंत्री राजेश्वर दास ने राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह को दी। राजा ने तुरंत अपनी सेना को तैयार करने का आदेश दिया और कहा,
हम अपने राज्य की रक्षा करेंगे। लेकिन युद्ध में सिर्फ ताकत नहीं, बुद्धि भी जरूरी है।”

राजा ने अपने सभी सेनापतियों और विद्वानों की बैठक बुलाई। उन्होंने रणनीति बनाना शुरू किया। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह बहुत ही दूरदर्शी थे। उन्होंने कहा,
हम शत्रु से सीधे युद्ध नहीं करेंगे। हमें चालाकी से उनकी योजना को विफल करना होगा। इसके लिए हमें गुप्त जासूसों की जरूरत है जो अंधेरराज्य में जाकर उनकी योजनाओं का पता लगाएँ।”

इस तरह राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिए तैयारियाँ शुरू की।

गुप्त जासूस और शत्रु की चाल

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने सभा समाप्त होते ही अपने सबसे विश्वासपात्र सेनापति सेनापति अर्जुन सिंह को बुलाया। अर्जुन सिंह न केवल युद्ध में निपुण थे, बल्कि गुप्त योजनाएँ बनाने में भी माहिर थे। राजा ने उनसे गंभीर स्वर में कहा,
हमें अंधेरराज्य की हर चाल की जानकारी चाहिए। बिना रक्तपात के युद्ध जीतना ही सच्ची विजय होती है।”

सेनापति अर्जुन सिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया,
महाराज, मेरे पास तीन ऐसे जासूस हैं जो किसी भी रूप में ढल सकते हैं। वे अंधेरराज्य में जाकर सच्चाई पता लगा लेंगे।”

अगले ही दिन, तीन जासूस—धीरू, माधव, और केतनअंधेरराज्य की ओर रवाना हुए। किसी ने व्यापारी का वेश धारण किया, कोई साधु बना, और कोई सैनिक। अंधेरराज्य की सीमा में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा कि वहाँ चारों ओर हथियारों की तैयारी हो रही थी। लोहार दिन-रात तलवारें और भाले बना रहे थे।

माधव, जो साधु के वेश में था, अंधेरराज्य के महल के पास पहुँचा। वहाँ उसने सुना कि राजा अशोकराज अपने मंत्रियों से कह रहा था,
सौरभपुर की सेना बहादुर है, लेकिन हम रात के अंधेरे में हमला करेंगे। उनकी उत्तरी सीमा सबसे कमजोर है।”

यह सूचना अत्यंत महत्वपूर्ण थी। माधव ने तुरंत गुप्त संकेत के माध्यम से यह संदेश केतन तक पहुँचाया, जिसने उसे लिखित रूप में सुरक्षित किया। तीनों जासूस रात के अंधेरे में अंधेरराज्य से निकल पड़े और कई कठिनाइयों के बाद सौरभपुर पहुँचे।

महल में पहुँचकर उन्होंने सारी जानकारी राजा को दी। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने ध्यानपूर्वक सब सुना और कहा,
अब समय आ गया है कि हम अपनी बुद्धि का सही उपयोग करें।”

राजा ने आदेश दिया कि उत्तरी सीमा पर अतिरिक्त सेना तैनात की जाए, लेकिन दिखावे के लिए वहाँ कमजोरी बनी रहने दी जाए। साथ ही, दक्षिणी और पश्चिमी सीमा पर सेना को पूरी तरह तैयार रखा जाए।

कुछ ही दिनों बाद, अंधेरराज्य की सेना रात के अंधेरे में उत्तरी सीमा की ओर बढ़ी। उन्हें लगा कि सौरभपुर सो रहा है, लेकिन असल में राजा की योजना पूरी तरह तैयार थी।

जैसे ही शत्रु सेना आगे बढ़ी, सौरभपुर की सेना ने चारों ओर से उन्हें घेर लिया। युद्ध शुरू हुआ। तलवारों की टकराहट, घोड़ों की टापें और युद्ध की गर्जना से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह स्वयं युद्धभूमि में उतरे। उनकी तलवार बिजली की तरह चल रही थी।

अशोकराज को जब यह पता चला कि उनकी योजना असफल हो गई है, तो वे क्रोधित हो उठे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनकी सेना हार की कगार पर थी।

अंततः अशोकराज को पीछे हटना पड़ा। यह सौरभपुर की पहली बड़ी विजय थी। युद्ध के बाद राजा ने अपनी सेना और प्रजा को संबोधित करते हुए कहा,
यह जीत सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि आप सभी की है। जब राजा और प्रजा एक साथ खड़े होते हैं, तब कोई भी शक्ति उन्हें हरा नहीं सकती।”

प्रजा ने खुशी से जयकारे लगाए, लेकिन राजा जानते थे कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अंधेरराज्य फिर कोई नई चाल चल सकता है।

राजकुमार और नई साजिश

सौरभपुर की पहली बड़ी जीत के बाद, राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह जानते थे कि शत्रु केवल पीछे हटे हैं, और अगली बार वे और भी चालाकी से हमला करेंगे।

इस बीच, महल में एक नई हलचल थी। राजा के घर में उनका एकमात्र पुत्र राजकुमार अंशु प्रताप बड़ा हो रहा था। अंशु प्रताप बाल्यावस्था से ही तेज और चतुर था। वह अपने पिता के साथ युद्ध के अभ्यास में भाग लेता और राज्य की राजनीति सीखता।

राजकुमार अंशु के बचपन का सबसे अच्छा दोस्त राहुल था, जो राजकुमार के समान ही बुद्धिमान और बहादुर था। दोनों अक्सर महल की लाइब्रेरी में इतिहास और रणनीति की किताबें पढ़ते और भविष्य के लिए योजनाएँ बनाते।

एक दिन, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने राजकुमार अंशु को बुलाया और कहा,
अंशु, अब समय आ गया है कि तुम अपने राज्य और प्रजा की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाओ। युद्ध केवल तलवार से नहीं, बल्कि बुद्धि से भी जीता जाता है। तुम तैयार हो?”

राजकुमार ने दृढ़ निश्चय के साथ उत्तर दिया,
पिताजी, मैं आपके मार्गदर्शन में हर चुनौती का सामना करूंगा और सौरभपुर को सुरक्षित रखूंगा।”

लेकिन उसी समय, अंधेरराज्य में राजा अशोकराज फिर योजना बनाने में लगे थे। इस बार उन्होंने सोचा कि वे सीधे युद्ध नहीं करेंगे, बल्कि साजिश और धोखे का सहारा लेंगे।

अशोकराज ने अपने सबसे विश्वासपात्र मंत्री कालनंद से कहा,
हम सीधे हमला नहीं करेंगे। इस बार हम सौरभपुर में गुप्त संकट पैदा करेंगे। एक झूठी खबर फैलाओ कि राजा वीरेंद्र प्रताप गंभीर रूप से बीमार हैं। इससे उनकी सेना कमजोर दिखेगी।”

कालनंद ने तुरंत योजना शुरू कर दी। अंधेरराज्य के जासूस सौरभपुर में घुसपैठ कर रहे थे। उन्होंने बाजारों और गाँवों में अफवाहें फैलाना शुरू कर दीं।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह को जब यह खबर मिली, तो उन्होंने तुरंत सभी अधिकारियों की बैठक बुलाई। उन्होंने कहा,
शत्रु हमारी ताकत को कमज़ोर दिखाना चाहते हैं। हमें अपनी प्रजा और सेना को सचेत करना होगा और इस साजिश का मुकाबला करना होगा।”

राजकुमार अंशु ने कहा,
पिताजी, मैं स्वयं गुप्त रूप से इस साजिश की तह तक जाऊँगा और कालनंद का पता लगाऊँगा।”

राजा वीरेंद्र प्रताप ने मुस्कुराते हुए कहा,
बिलकुल, अंशु। लेकिन सावधान रहो। धोखे और जाल बहुत गहरे हैं। तुम्हें केवल अपनी बहादुरी नहीं, बल्कि समझदारी और धैर्य का भी उपयोग करना होगा।”

इस तरह, राजकुमार अंशु प्रताप और उसका मित्र राहुल नई साजिश का सामना करने के लिए निकल पड़े। उनके साहस और चतुराई से अब सौरभपुर की किस्मत फिर से बदलने वाली थी।

गुप्त मिशन और पहला सामना

राजकुमार अंशु प्रताप और उसका मित्र राहुल रात के अंधेरे में गुप्त रूप से महल से बाहर निकले। उनका उद्देश्य था अंधेरराज्य के जासूसों और मंत्री कालनंद की चालों का पता लगाना।

अंशु और राहुल ने एक छोटा रास्ता चुना जो जंगल और नदी के किनारे से गुजरता था। उन्होंने अपने साथ केवल कुछ जरूरी चीजें लीं—कुछ भोजन, पानी, और हथियार। अंशु ने राहुल से कहा,
हम चुपचाप रहेंगे और बिना किसी को पकड़े सच्चाई पता लगाएंगे। याद रखो, बुद्धि और धैर्य हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”

जंगल में चलते समय दोनों को अंधेरराज्य के जासूस दिख गए। वे गाँवों में अफवाह फैलाने में लगे थे। अंशु ने धीरे से कहा,
राहुल, हमें उनका पीछा करना होगा, लेकिन ध्यान रहे, हमें खुद पकड़ाया नहीं जाना है।”

कुछ समय बाद जासूस एक पुराने खंडहर वाले घर में घुस गए। अंशु और राहुल ने पास के पेड़ की छाया में छुपकर देखा कि वहां कालनंद स्वयं उनकी योजना की निगरानी कर रहा था।
कालनंद ने कहा,
सौरभपुर में अफवाहें फैल रही हैं। जल्दी ही प्रजा और सेना भ्रमित हो जाएगी। अगला कदम, हमारी सेना को भीतर से कमजोर करना होगा।”

अंशु ने राहुल से फुसफुसाया,
हमें तुरंत यह सूचना महल पहुंचानी होगी। अगर राजा को पता चल गया, तो वे इस साजिश का सही समय पर मुकाबला कर सकते हैं।”

लेकिन तभी, कालनंद ने अपने जासूसों को आदेश दिया कि घर के आसपास सतर्क रहो। अंशु और राहुल को पता चल गया कि अब उन्हें तुरंत छिपना होगा। वे धीरे-धीरे जंगल की ओर चले गए, लेकिन एक जासूस ने उन्हें देख लिया।

जासूस ने तुरंत चिल्लाया,
रुको! कौन हो तुम?”

अंशु ने तुरन्त तलवार निकाली और चुपचाप जासूस को बाहर खींचकर बंद कर दिया। राहुल ने पास जाकर उसे बाँध दिया ताकि वह कुछ ना कह सके।

इस घटना के बाद, अंशु और राहुल ने जल्दी से महल की ओर लौटने का रास्ता लिया। रास्ते में कई कठिनाइयाँ आईं—जंगल में ऊँचे पेड़, नदियाँ और जंगली जानवर। लेकिन दोनों ने साहस और धैर्य के साथ उन सभी कठिनाइयों का सामना किया।

अंततः, अंशु और राहुल महल पहुँच गए। उन्होंने राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह और सेनापति अर्जुन सिंह को सारी जानकारी दी। राजा ने गंभीर स्वर में कहा,
अंशु, तुमने बहादुरी और चतुराई दोनों दिखाई। अब हम समय रहते अपनी सेना और प्रजा को सचेत कर सकते हैं।”

राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पूरे राज्य में सचाई और सावधानी का संदेश फैलाया जाए। अंधेरराज्य की साजिश असफल हो गई।

राजकुमार अंशु और राहुल की इस पहली गुप्त यात्रा ने उन्हें केवल बहादुर ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान भी बना दिया था। लेकिन राजा जानते थे कि यह केवल शुरुआत है। अंधेरराज्य फिर से कोई नई योजना बना सकता है, और सौरभपुर को और भी सावधानी की जरूरत थी।

नई चाल और युद्ध की तैयारी

अंधेरराज्य की पहली साजिश विफल होने के बाद, राजा अशोकराज और मंत्री कालनंद बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने फैसला किया कि अब केवल जासूसी और अफवाहों से काम नहीं चलेगा। उन्हें सीधे युद्ध करना पड़ेगा।

अशोकराज ने अपने सेनापतियों को बुलाया और कहा,
सौरभपुर की सेना बहादुर और बुद्धिमान है। इसलिए इस बार हम केवल ताकत से ही नहीं, बल्कि रणनीति से हमला करेंगे। उनके राजा और राजकुमार को भ्रमित करना होगा।”

वहीं, सौरभपुर में राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने राजकुमार अंशु और सेनापति अर्जुन सिंह के साथ बैठक बुलाई। राजा ने कहा,
अशोकराज फिर योजना बना रहे हैं। हमें उनकी हर चाल का अनुमान लगाना होगा और अपनी सेना को पूरी तरह तैयार रखना होगा। अंशु, तुम्हें अब अपनी बुद्धि और साहस का और भी ज्यादा उपयोग करना पड़ेगा।”

राजकुमार अंशु ने उत्तर दिया,
पिताजी, मैं तैयार हूँ। इस बार हम उन्हें हर प्रकार से चकमा देंगे और सौरभपुर की रक्षा करेंगे।”

राजा ने निर्णय लिया कि उत्तरी, दक्षिणी, और पश्चिमी सीमा पर गुप्त दल तैनात किए जाएँ। इसके अलावा, राजा ने अंशु और राहुल को विशेष मिशन पर भेजा, जिसमें उन्हें अंधेरराज्य के नए ठिकानों और सेना की तैयारी का पता लगाना था।

अंशु और राहुल जंगल के रास्तों, पहाड़ों और नदी के किनारे यात्रा करते हुए अंधेरराज्य के प्रमुख ठिकानों तक पहुँचे। उन्होंने देखा कि अंधेरराज्य की सेना तेज़ी से युद्ध की तैयारी कर रही थी—भाले, तलवारें, घोड़े, और बाढ़ की तरह सैनिक तैयार थे।

अंशु ने राहुल से कहा,
हमें जल्दी से महल वापस लौटना होगा और राजा को यह जानकारी देनी होगी। अगर हम समय रहते योजना बना लें, तो हम युद्ध में विजयी हो सकते हैं।”

राहुल ने सिर हिलाया,
सच में, यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती होगी। लेकिन मैं जानता हूँ कि हम सफल होंगे।”

दोनों ने गुप्त मार्ग से लौटते हुए कई खतरों का सामना किया—जंगल में छुपे शिकारी, नदी में तेज़ धाराएँ, और पहाड़ों में ऊँचाई की कठिनाइयाँ। लेकिन उनका साहस और चतुराई उन्हें हर बार बचा लेती थी।

अंततः, अंशु और राहुल महल पहुँच गए। उन्होंने राजा को सारी जानकारी दी। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने गंभीरता से कहा,
अब समय आ गया है कि हम अपनी सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करें। इस बार हमें शक्ति, बुद्धि और रणनीति—तीनों का इस्तेमाल करना होगा। सौरभपुर का भविष्य हम सभी के हाथ में है।”

राजा की आवाज़ में दृढ़ता और साहस झलक रहा था। प्रजा भी सजग हो गई थी। पूरे राज्य में तैयारियाँ शुरू हो गईं। सौरभपुर अब केवल अपने राजा पर ही नहीं, बल्कि अपने राजकुमार और बहादुर युवाओं की सूझ-बूझ पर भी निर्भर था।

लेकिन राजा और अंशु जानते थे कि यह युद्ध आसान नहीं होगा। अंधेरराज्य अपने हर हथकंडे आजमाएगा। अब सौरभपुर की असली परीक्षा शुरू होने वाली थी।

युद्ध की शुरुआत

अंधेरराज्य ने अपनी पूरी सेना जुटा ली थी। हजारों सैनिक तलवारें और भाले लेकर सौरभपुर की सीमा की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी तैयारी पूरी कर ली थी। उनके सैनिक पूरी तरह सतर्क और संगठित थे।

सुबह होते ही, अंधेरराज्य की सेना ने उत्तरी सीमा पर हमला करने की कोशिश की। उन्हें लगा कि इस बार वे आसानी से जीत सकते हैं। लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, सौरभपुर की सेना ने उन्हें घेर लिया। तलवारें टकराईं, घोड़े दौड़े, और युद्ध का मैदान गूँज उठा।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर सीधे युद्धभूमि में उतरे। उनकी तलवार बिजली की तरह चमक रही थी। उन्होंने सैनिकों को प्रेरित किया,
धैर्य और साहस रखो! हम अपने राज्य की रक्षा करेंगे!”

राजकुमार अंशु भी युद्धभूमि में था। उसने राहुल के साथ मिलकर शत्रु की कमजोरियों को पहचानना शुरू किया। अंशु ने देखा कि अंधेरराज्य की सेना का दक्षिणी विंग कमजोर है। उसने तुरंत सेनापति अर्जुन सिंह को संदेश भेजा,
दक्षिणी तरफ हमला करें, वहां उनका प्रतिरोध कमज़ोर है।”

सैन्य नेतृत्व ने अंशु की योजना को अपनाया। सौरभपुर की सेना ने दक्षिणी विंग पर अचानक हमला किया, जिससे अंधेरराज्य की सेना भ्रमित हो गई। सैनिक अपने स्थानों से हिले और लड़ाई में अव्यवस्था पैदा हुई।

इस बीच, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह और अंशु ने मिलकर कालनंद को खोज निकाला। कालनंद ने देखा कि उसकी योजना विफल हो रही है, तो उसने भागने की कोशिश की। लेकिन अंशु ने उसे पकड़ लिया। राजा ने कालनंद से कहा,
तुमने अंधेरराज्य के लिए साजिश रची, अब तुम्हें न्याय के सामने खड़ा होना होगा।”

अंधेरराज्य की सेना हताश और भ्रमित हो गई। उनका राजा अशोकराज अब समझ चुका था कि इस युद्ध में केवल ताकत नहीं, बल्कि रणनीति और बुद्धि भी निर्णायक है। अंततः, अशोकराज को अपनी सेना पीछे हटाने का आदेश देना पड़ा।

सौरभपुर की जीत हुई। पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। प्रजा ने राजा और राजकुमार को बधाई दी। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा,
यह जीत केवल तलवारों की नहीं, बल्कि आपकी एकता, बुद्धि और धैर्य की है। सौरभपुर के हर नागरिक ने इस विजय में भाग लिया है।”

राजकुमार अंशु ने अपने पिता की ओर देखकर कहा,
पिताजी, मैंने आज सीखा कि बहादुरी सिर्फ लड़ने में नहीं, बल्कि सोचने, योजना बनाने और धैर्य रखने में भी होती है।”

राजा मुस्कुराए और बोले,
सही कहा बेटा। यही असली राजा और प्रजा की शक्ति है।”

इस युद्ध ने सौरभपुर को केवल सुरक्षित ही नहीं बनाया, बल्कि राजकुमार अंशु को भी एक बुद्धिमान और बहादुर योद्धा बना दिया।

युद्ध के बाद – शांति और विकास

सौरभपुर में युद्ध समाप्त हो चुका था। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह और राजकुमार अंशु की बहादुरी की कहानियाँ पूरे राज्य में फैल गई थीं। अब समय था शांति और विकास का।

राजा ने घोषणा की कि युद्ध के दौरान प्रभावित गाँवों और कस्बों की तुरंत मरम्मत की जाए। उन्होंने नये स्कूल, अस्पताल और बाज़ार बनवाने का आदेश दिया। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह चाहते थे कि उनकी प्रजा न केवल सुरक्षित, बल्कि शिक्षित और संपन्न भी हो।

राजकुमार अंशु भी अपने पिता के मार्गदर्शन में राज्य के कामकाज में हिस्सा लेने लगा। उसने देखा कि केवल युद्ध में बहादुरी नहीं, बल्कि न्याय, समझदारी और योजनाबद्ध कार्य करना भी एक सच्चे नेता की पहचान है।

राहुल के साथ अंशु ने कई नयी योजनाएँ बनाई:

1.    सैनिक प्रशिक्षण केंद्रताकि हर युवा शौर्य और रणनीति में निपुण हो।

2.    सुरक्षा गुप्त दलजो भविष्य में किसी भी खतरे से पहले सूचना जुटा सके।

3.    कृषि और व्यापार सुधार योजनाजिससे प्रजा की आजीविका बेहतर हो और राज्य समृद्ध बने।

एक दिन, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अंशु से कहा,
बेटा, युद्ध सिर्फ एक हिस्सा था। असली चुनौती है कि राज्य को स्थायी रूप से समृद्ध और खुशहाल बनाना। याद रखो, एक राजा का सबसे बड़ा हथियार उसकी प्रजा की भलाई और उसका विश्वास होता है।”

अंशु ने उत्तर दिया,
पिताजी, मैं इसे कभी नहीं भूलूँगा। मैं अपने राज्य और प्रजा की सेवा में हर समय तत्पर रहूँगा।”

राजा ने मुस्कुराते हुए कहा,
तुम्हारी यही सोच सौरभपुर के भविष्य को मजबूत करेगी। तुम्हारे जैसे युवा योद्धा और नेता देखकर मैं निश्चिंत हूँ कि हमारा राज्य सुरक्षित रहेगा।”

सौरभपुर धीरे-धीरे और भी अधिक समृद्ध और खुशहाल बनता गया। व्यापार बढ़ा, शिक्षा और संस्कृति का विकास हुआ, और प्रजा में संतोष और प्रेम का वातावरण छा गया।

अंधेरराज्य अब कभी भी सौरभपुर पर हमला करने की हिम्मत नहीं कर सका। अशोकराज और कालनंद अपनी हार से सीख गए थे। और सौरभपुर के राजा और राजकुमार ने साबित कर दिया कि सच्ची शक्ति केवल तलवार में नहीं, बल्कि बुद्धि, न्याय और प्रजा के प्यार में होती है।

राजकुमार अंशु अब न केवल एक बहादुर योद्धा, बल्कि एक भविष्य के महान राजा के रूप में तैयार हो रहा था। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने अनुभव और ज्ञान से उसे राज्य की गहरी समझ दी।

इस तरह सौरभपुर में शांति और समृद्धि का युग शुरू हुआ।

राजकुमार अंशु का राज्य संचालन

सौरभपुर में शांति और समृद्धि का युग शुरू हो चुका था। अब राजकुमार अंशु प्रताप धीरे-धीरे राज्य के प्रशासन में सक्रिय हो गया था। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने उसे हर विभाग, हर नीति और हर निर्णय में शामिल किया।

अंशु ने सबसे पहले सुरक्षा और शिक्षा पर ध्यान दिया। उसने सैनिक प्रशिक्षण केंद्रों और विद्यालयों का दौरा किया। उसने युवाओं को प्रेरित किया कि वे केवल युद्ध कौशल में नहीं, बल्कि ज्ञान और नैतिकता में भी निपुण बनें।

एक दिन अंशु ने अपने पिता से पूछा,
पिताजी, क्या मुझे अब पूर्ण रूप से राज्य का संचालन संभाल लेना चाहिए?”

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा,
अंशु, तुम्हें अभी और अनुभव चाहिए। लेकिन तुम्हारा ज्ञान, साहस और समझदारी देखकर मुझे भरोसा है कि तुम जल्द ही महान राजा बनोगे। याद रखो, एक राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य अपनी प्रजा की भलाई है।”

इस बीच, अंधेरराज्य में अशोकराज और कालनंद अपनी हार को भूल नहीं पाए थे। उन्होंने सोचा कि अब भी वे किसी योजना से सौरभपुर को परेशान कर सकते हैं। लेकिन अंशु और राजा ने पहले से ही सुरक्षा गुप्त दल और सैन्य तैयारियाँ सुनिश्चित कर रखी थीं।

राजकुमार अंशु ने कहा,
हमें शांति बनाए रखनी होगी, लेकिन हमेशा तैयार रहना होगा। हमें केवल शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धि और रणनीति से भी सौरभपुर की रक्षा करनी होगी।”

राजा ने सिर हिलाया और कहा,
बिलकुल सही। यही तुम्हें एक महान राजा बनाएगा।”

राजकुमार अंशु ने नए अधिकारी और शिक्षकों को नियुक्त किया। उसने कृषि और व्यापार सुधार योजनाओं को और आगे बढ़ाया। उसने नदी के किनारे नए तालाब बनवाए और किसानों के लिए नई मशीनें लाईं। इससे सौरभपुर और भी समृद्ध और खुशहाल बन गया।

एक दिन, अंशु ने राहुल से कहा,
हमारे पिता ने हमें केवल युद्ध की कला नहीं सिखाई, बल्कि यह भी कि एक राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रजा की भलाई में है। यही सच्ची वीरता है।”

राहुल ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया,
और यही तुम्हें भविष्य का महान राजा बनाएगा।”

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह अब धीरे-धीरे अपने अनुभव साझा करने में लगे थे। उन्होंने अंशु को राज्य के हर छोटे-बड़े निर्णय में मार्गदर्शन देना जारी रखा। राज्य में अब नई ऊर्जा, नई योजनाएँ और युवा नेतृत्व दिखाई देने लगा था।

सौरभपुर का भविष्य सुरक्षित था, और राजकुमार अंशु के नेतृत्व में यह राज्य और भी अधिक समृद्ध और शक्तिशाली बनने वाला था।

पहला बड़ा प्रशासनिक संकट

सौरभपुर अब काफी समृद्ध और सुरक्षित हो चुका था, लेकिन राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह और राजकुमार अंशु जानते थे कि केवल युद्ध ही खतरा नहीं है। कभी-कभी संकट राज्य के भीतर भी आ सकता है।

एक दिन, राज्य के कुछ किसान राजा के पास आए और शिकायत की कि नए व्यापारिक नियम और कर प्रणाली के कारण उन्हें आर्थिक कठिनाई हो रही है। यह समस्या जल्दी ही पूरे राज्य में फैल गई।

राजकुमार अंशु ने तुरंत सभी अधिकारियों की बैठक बुलाई। उसने कहा,
हमें केवल कानून लागू करने के लिए कठोर कदम नहीं उठाने हैं। हमें समझना होगा कि प्रजा की भलाई और खुशहाली ही सच्ची शक्ति है। हमें उनके साथ मिलकर समाधान ढूँढना होगा।”

अंशु और उसके मित्र राहुल ने गाँवों का दौरा किया। उन्होंने देखा कि कुछ व्यापारी नियमों का गलत फायदा उठा रहे थे और किसानों को अधिक कर दे रहे थे। अंशु ने तत्काल उन व्यापारियों को बुलाया और स्पष्ट किया,
किसानों की मेहनत और आजीविका हमारी प्राथमिकता है। जो भी नियम किसानों के लिए कठिनाई पैदा कर रहे हैं, उन्हें तुरंत सुधारना होगा।”

इस कार्रवाई से प्रजा में विश्वास बढ़ा। अंशु ने नई योजना बनाई:

1.    किसानों को उचित कर और अनुदान दिया जाए।

2.    व्यापारियों और किसानों के बीच सीधे संवाद की सुविधा हो।

3.    नए बाजार और भंडारण केंद्र बनाए जाएँ ताकि उत्पाद सुरक्षित और उचित मूल्य पर बिकें।

इसी दौरान, अंधेरराज्य ने भी एक नई चाल चलने की कोशिश की। अशोकराज ने फिर से सौरभपुर में जासूस भेजे। लेकिन इस बार अंशु और सुरक्षा गुप्त दल पूरी तरह तैयार थे। उन्होंने जासूसों को पकड़ लिया और अंधेरराज्य की योजना नाकाम कर दी।

राजकुमार अंशु ने राजा से कहा,
पिताजी, केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक और आर्थिक संकट का सही समाधान करना भी सच्चे राजा की परीक्षा है। आज मैंने यह सीखा कि बुद्धि और निर्णय क्षमता तलवार जितनी ही महत्वपूर्ण होती है।”

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह मुस्कुराए और बोले,
सही कहा बेटा। यही तुम्हें भविष्य का महान राजा बनाएगा। संकट चाहे बाहर से आए या भीतर से, एक राजा का साहस और समझदारी ही राज्य को स्थायी रूप से सुरक्षित रख सकती है।”

इस प्रकार, राजकुमार अंशु ने न केवल शांति और समृद्धि बनाए रखी, बल्कि यह भी साबित किया कि वह सिर्फ बहादुर योद्धा ही नहीं, बल्कि निपुण और न्यायप्रिय प्रशासक भी है।

अंधेरराज्य की आखिरी कोशिश और पूर्ण विजय

अंधेरराज्य, लगातार हार के बावजूद, हार मानने को तैयार नहीं था। अशोकराज और उसका मंत्री कालनंद अब अपनी आखिरी और सबसे बड़ी योजना बनाने में लगे थे। उन्होंने सोचा कि अगर इस बार सौरभपुर के राजा वीरेंद्र प्रताप और राजकुमार अंशु को सीधे ही चुनौती दी जाए, तो शायद वे राज्य को कमजोर कर पाएँ।

अशोकराज ने अपनी पूरी सेना को इकठ्ठा किया। उन्होंने कई गुप्त मार्गों से सैनिकों को सौरभपुर की सीमाओं के पास भेजा। उनका इरादा था कि राज्य के कई हिस्सों में एक साथ हमला किया जाए और सौरभपुर भ्रमित हो जाए।

लेकिन सौरभपुर के राजा और राजकुमार पहले से ही सतर्क थे। राजकुमार अंशु ने सैनिकों को पूरी तरह से तैयार कर दिया था। उन्होंने गुप्त दलों को भेजकर हर मार्ग की जाँच करवाई और शत्रु की योजना को भांप लिया।

जैसे ही अंधेरराज्य की सेना ने हमला किया, सौरभपुर की सेना ने चारों ओर से उन्हें घेर लिया। तलवारें टकराईं, घोड़े दौड़े, और पूरे मैदान में युद्ध की गर्जना गूंज उठी। इस बार, राजकुमार अंशु ने नेतृत्व की कमान अपने हाथ में ले ली।

अंशु ने रणनीति बनाई कि सेना को तीन हिस्सों में बांटकर शत्रु को भ्रमित किया जाए। उसका मित्र राहुल और गुप्त दलों ने शत्रु की आपूर्ति लाइन काट दी। इससे अंधेरराज्य की सेना में अव्यवस्था फैल गई।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह भी युद्धभूमि में थे। उन्होंने देखा कि अंशु ने कितनी सूझ-बूझ और बहादुरी से सेना का नेतृत्व किया। राजा गर्व से बोले,
देखो बेटा, तुम्हारी बुद्धि और साहस ने सौरभपुर को बचाया। अब तुम वास्तव में इस राज्य के भविष्य के राजा हो।”

अंततः, अशोकराज और कालनंद की सेना पर पूरी तरह से विजय प्राप्त हुई। उन्हें पीछे हटना पड़ा और सौरभपुर की सीमाओं से दूर चले जाना पड़ा। यह युद्ध अंधेरराज्य की आखिरी कोशिश थी।

सौरभपुर में पूरी प्रजा ने जश्न मनाया। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने सभी सैनिकों और प्रजा को संबोधित किया:
आज हमने दिखा दिया कि शक्ति केवल तलवार में नहीं, बल्कि बुद्धि, साहस और एकता में होती है। जब राजा और प्रजा एक साथ खड़े होते हैं, तो कोई भी ताकत उन्हें हरा नहीं सकती।”

राजकुमार अंशु अब न केवल बहादुर योद्धा, बल्कि एक न्यायप्रिय, समझदार और दूरदर्शी नेता बन चुके थे। उन्होंने राज्य की रक्षा, प्रजा की भलाई और शासन की जिम्मेदारियों में पूरी तरह महारत हासिल कर ली थी।

सौरभपुर अब और भी अधिक समृद्ध, सुरक्षित और खुशहाल राज्य बन गया। और इस तरह, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह और राजकुमार अंशु की गाथा सदियों तक लोगों के दिलों में जीवित रही।

राजकुमार अंशु का शासनकाल शुरू

अंधेरराज्य की आखिरी हार के बाद, राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने महसूस किया कि अब राजकुमार अंशु पूरी तरह से राज्य का नेतृत्व संभालने के लिए तैयार हैं। एक भव्य समारोह में राजा ने अंशु को भविष्य का उत्तराधिकारी घोषित किया।

राजकुमार अंशु ने जनता से वादा किया,
मैं अपने पिता के दिखाए मार्ग पर चलूंगा। मेरा उद्देश्य सिर्फ शक्ति नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, समृद्धि और शांति को बढ़ाना है। मेरी प्रजा मेरे लिए सबसे बड़ा खजाना है।”

सभी नागरिक खुश थे। उन्होंने राजकुमार अंशु के नेतृत्व में राज्य के उज्जवल भविष्य की कामना की। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अंशु को सलाह दी,
याद रखना बेटा, एक राजा का सबसे बड़ा धर्म है प्रजा की भलाई। शक्ति और सम्मान सिर्फ तभी टिकते हैं जब लोग तुम्हारे साथ हों।”

अंशु ने तुरंत प्रशासनिक सुधारों की योजना बनाई। उसने नए अधिकारी और मंत्री नियुक्त किए जो ईमानदार, कुशल और न्यायप्रिय थे।

भाग 12: विकास और शिक्षा

राजकुमार अंशु ने शिक्षा और संस्कृति पर विशेष ध्यान दिया। उसने राज्य के हर गाँव और शहर में स्कूल और पुस्तकालय बनवाए। युवाओं को न केवल युद्ध और सैन्य प्रशिक्षण सिखाया गया, बल्कि विज्ञान, गणित, कला और इतिहास में भी पारंगत बनाया गया।

कृषि और व्यापार में भी सुधार हुआ। अंशु ने नदियों और तालाबों का जीर्णोद्धार करवाया, किसानों को आधुनिक उपकरण दिए, और बाजारों में व्यापार को सुव्यवस्थित किया।

राजकुमार ने यह भी सुनिश्चित किया कि सौरभपुर में हर व्यक्ति—चाहे अमीर हो या गरीब—को न्याय और सुरक्षा मिले।

भाग 13: नई चुनौतियाँ

हालांकि राज्य समृद्ध था, लेकिन नए संकट भी सामने आने लगे। अंधेरराज्य के छोटे सेनापति और जासूस अब भी सौरभपुर की ताकत पर नज़र रख रहे थे। साथ ही, राज्य के कुछ बाहरी क्षेत्रों में स्थानीय विद्रोह और असंतोष फैलने लगे थे।

अंशु ने अपने मित्र राहुल और गुप्त दलों के साथ मिलकर इन सभी संकटों को समय रहते हल किया। उन्होंने समझाया कि शांति केवल युद्ध से नहीं आती, बल्कि समझदारी, न्याय और प्रजा की भलाई से आती है।

अंशु ने राज्य में सूचना तंत्र को मजबूत किया ताकि कोई भी खतरा पहले ही पता चल सके।

इस तरह, राजकुमार अंशु का शासन केवल युद्ध की वीरता पर आधारित नहीं था, बल्कि बुद्धि, नेतृत्व और प्रजा की सेवा पर भी आधारित था।

राज्य का विस्तार और नए नायक

राजकुमार अंशु का शासन अब पूरी तरह प्रभावशाली हो चुका था। उसने केवल सौरभपुर के भीतर ही नहीं, बल्कि आस-पास के छोटे-छोटे राज्यों और गाँवों के साथ भी अच्छे संबंध स्थापित किए। वह समझ गया था कि एक राज्य की सुरक्षा केवल सेना और युद्ध से नहीं, बल्कि मित्रता और गठबंधनों से भी सुनिश्चित होती है।

अंशु ने अपने सबसे भरोसेमंद मित्र राहुल को दक्षिणी सीमाओं का प्रमुख बनाया। राहुल ने वहां गाँवों और कस्बों में शिक्षा और सुरक्षा के कार्यक्रम लागू किए। जल्दी ही दक्षिणी इलाके में सौरभपुर की प्रतिष्ठा और शक्ति बढ़ गई।

इसके अलावा, अंशु ने उत्तर और पश्चिम की सीमाओं पर भी सुरक्षित और संगठित प्रशासन तैनात किया। उसने स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित किया ताकि वे अपने क्षेत्रों की रक्षा स्वयं कर सकें।

एक दिन अंशु ने अपने पिता से कहा,
पिताजी, अब केवल सौरभपुर ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और न्याय फैलाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए।”

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह मुस्कुराए और बोले,
सही कहा बेटा। यही तुम्हें महान बनाता है—केवल राज्य की रक्षा नहीं, बल्कि क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास सुनिश्चित करना।”

भाग 15: प्रजा और संस्कृति

अंशु ने राज्य के भीतर संस्कृति और परंपरा को भी महत्व दिया। उसने त्योहारों, मेलों और खेलों का आयोजन किया। यह न केवल प्रजा को जोड़ता था, बल्कि युवाओं में साहस और एकता भी बढ़ाता था।

शहरों और गाँवों में नाटक, संगीत और कला के कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे लोगों में रचनात्मकता और खुशहाली आई। अंशु ने सुनिश्चित किया कि शिक्षा और संस्कृति दोनों का विकास बराबर हो।

सौरभपुर में त्योहारों का माहौल अब पहले से ज्यादा जीवंत और आनंदपूर्ण हो गया। लोग अपने राजा और राजकुमार के नेतृत्व में गर्व महसूस करने लगे।

भाग 16: नई चुनौतियाँ और रोमांच

हालांकि सौरभपुर अब काफी मजबूत था, लेकिन जीवन में हमेशा नए संकट आते रहते हैं। एक दिन, अंधेरराज्य के छोटे सेनापति और जासूसों ने फिर से सौरभपुर की सीमा पर घुसपैठ करने की कोशिश की।

इस बार अंशु और राहुल ने योजना बनाई कि उन्हें केवल रोकना ही नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि सौरभपुर की रक्षा हर हालत में मजबूत है। उन्होंने गुप्त मार्गों और जंगलों का इस्तेमाल कर जासूसों को पकड़ लिया और अंधेरराज्य के ठिकानों की जानकारी हासिल की।

अंशु ने कहा,
सूर्य की तरह हमारी शक्ति और ज्ञान भी अंधकार को हर बार मिटा देता है। जो भी सच्चाई और न्याय के खिलाफ खड़ा होगा, उसे रोका जाएगा।”

राजकुमार अंशु की यह दूरदर्शिता और बहादुरी सभी को प्रेरित करती थी।

राजकुमार अंशु का पूर्ण रूप से राजा बनना

समय बीतता गया, और राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने महसूस किया कि राजकुमार अंशु अब पूरी तरह सक्षम हैं राज्य का नेतृत्व संभालने के लिए। एक भव्य समारोह में राजा ने अंशु को पूर्ण अधिकार और राज्य का भविष्य सौंप दिया।

राजकुमार अंशु ने जनता से वादा किया,
मैं अपने पिता के आदर्शों और ज्ञान के अनुसार राज्य का संचालन करूंगा। मेरी प्राथमिकता हमेशा प्रजा की भलाई, न्याय और शांति रहेगी। हम सब मिलकर सौरभपुर को और समृद्ध बनाएँगे।”

इस घोषणा के बाद राज्य में उत्सव का माहौल बन गया। नागरिकों ने अपने नए राजा का उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

भाग 18: राज्य का अंतिम समृद्धिकरण

राजा अंशु ने तुरंत अपने शासन की प्राथमिकताओं को तय किया:

1.    शिक्षा का विस्तारप्रत्येक गाँव और शहर में विद्यालय और पुस्तकालय।

2.    कृषि और व्यापार सुधारकिसानों को उन्नत तकनीक और उचित मूल्य सुनिश्चित करना।

3.    सुरक्षा और सेनासैनिकों और गुप्त दलों का प्रशिक्षण और सतर्कता।

4.    सांस्कृतिक विकासत्योहार, कला, संगीत और खेलों के आयोजन।

अंशु ने यह सुनिश्चित किया कि राज्य की हर योजना प्रजा की भलाई के लिए हो। उन्होंने राज्य के अधिकारियों और शिक्षकों के साथ लगातार बैठकें कीं, ताकि हर निर्णय समय पर और सही तरीके से लागू हो।

सौरभपुर अब न केवल सुरक्षित और समृद्ध था, बल्कि उसकी संस्कृति और शिक्षा भी नई ऊँचाइयों पर पहुँच चुकी थी।

भाग 19: अंधेरराज्य का अंत

अंधेरराज्य अब पूरी तरह कमजोर हो गया था। अशोकराज और कालनंद ने अपनी अंतिम कोशिशें भी नाकाम पाईं। उन्होंने महसूस किया कि सौरभपुर के राजा और राजकुमार की बुद्धि, साहस और रणनीति का मुकाबला करना असंभव है।

सौरभपुर की सेना अब पूरे क्षेत्र में सम्मानित थी। अन्य छोटे राज्यों ने भी सौरभपुर से मित्रता और सहयोग की पहल की। अंधेरराज्य की शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो गई और शांति कायम हुई।

भाग 20: कहानी का महान अंत

राजकुमार अंशु अब पूर्ण रूप से राजा बन चुके थे। उन्होंने राज्य की सीमा, सुरक्षा और प्रजा की भलाई सुनिश्चित की। उनका शासन केवल शक्ति पर आधारित नहीं था, बल्कि न्याय, शिक्षा, संस्कृति और प्रजा के प्यार पर आधारित था।

राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह अब शांति से अपने अनुभव और ज्ञान को अंशु को सिखाते रहे। प्रजा ने अपने नए राजा का सम्मान किया और सौरभपुर का नाम पूरी दुनिया में शक्ति, बुद्धि और न्याय का प्रतीक बन गया।

इस प्रकार, सौरभपुर की गाथा एक महान और प्रेरणादायक कहानी बन गई। राजा और राजकुमार ने यह साबित किया कि

सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि बुद्धि, न्याय और प्रजा के प्रेम में होती है।”

और इस तरह सौरभपुर में शांति, समृद्धि और खुशहाली का युग हमेशा बना रहा।


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