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गरीब फिश करी वाला

  बिहार में बसे एक छोटे से गांव रामपुर की अपनी ही पहचान है। यहां के लोग बेहद मेहनती , सरल स्वभाव के और आपसी मेलजोल से रहने वाले हैं। मेहनत और सच्चाई इस गांव की पहचान मानी जाती है। और यहीं की मिट्टी में बसता है अपनापन और संस्कृति की सच्ची खुशबू। उसी गांव में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई संतोष और छोटा भाई आशीष। संतोष घर का बड़ा बेटा था और वह बेहद लालची स्वभाव का था। उसकी पत्नी सोनम भी उसी के जैसे गुणों वाली थी। सोनम हमेशा अपने पति संतोष के कान भरती रहती थी परिवार वालों के खिलाफ। संतोष भी बस सोनम की ही बातें सुनता था। दूसरी तरफ किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। दूसरी तरफ उसका छोटा भाई अशिष है जो मेहनती और शांत स्वभाव का है। उसकी पत्नी कमला थोड़ी गुस्सैल है लेकिन दिल की बहुत साफ है।  दोनों ही अपना काम मिलजुलकर करते हैं। भले ही दोनों छोटे हैं मगर घर को एक बड़े की तरह संभालते हैं। संतोष और आशिष की मां बहुत पहले ही एक हादसे में गुजर गई थी। बाऊजी की तबीयत भी पिछले कुछ महीनों से खराब रहने लगी है। बाऊजी का बस इतना ही सपना था कि पूरा परिवार आपस में मिलजुलकर साथ रहे। संतोष बाऊजी की उतन...

टूटे हुए घर में नई बहू

 यह कहानी है टूटे हुए घर की नई बहू। मां जी, क्या आपने मुझे आवाज लगाई? हां बहू, मैंने तुझे बुलाया है। तू जरा मुझे उठाकर बाहर ले चल। वहां मैं तेरी थोड़ी कुछ बैठे-बैठे ही मदद कर दूंगी। अरे नहीं मां जी, आप आराम से लेटिए। आपकी तबियत ठीक नहीं है? बहु मुझे तेरे लिए बहुत ज्यादा बुरा लगता है। तू भी क्या सोचती होगी? मैं अभागंडी तुझे शादी के बाद कोई सुख नहीं दे पाई। मां जी आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए। आपकी तबीयत वैसे भी ठीक नहीं है। क्या हुआ मां? उठ क्यों नहीं रही है? कुछ नहीं बहू। बड़ी जोरों की ठंड लग रही है। रुको मां मैं कंबल लाती हूं। आपको बुखार के कारण इतनी जोर की ठंड लग रही है। तू मेरा कितना ध्यान रखती है। मैंने आज बहू का कुछ सुख जाना है।

 वरना अपनी बड़ी बहू का तो कोई भी सुख नहीं जाना है। अच्छा मां मैं अभी आती हूं। कहां जा रही है बेटी? अरे मां घर में कुछ भी खाने के लिए नहीं है। इसलिए मैंने पड़ोस में शांता भाभी से बात की थी। उन्होंने कहा है कि मेरा अनाज साफ करवा देना। उसके बदले वो मुझे कुछ अनाज दे देंगी। तुम शांता के यहां काम करने जाओगी तो क्या अच्छा लगेगा। तुम भी क्या सोचती होगी कि मैं कहां आकर फंस गई। ऐसा कुछ नहीं है मां। हर किसी को अपने भाग्य का ही मिलता है ना। कभी किसी को अपने भाग्य से कम मिलता है और ना ही ज्यादा। इसलिए मैं कभी इस बात का दुख नहीं मानती। बल्कि मैं तो यह सोचती हूं कि मैं अपने पति और आपके बेटी की परेशानियों को कैसे कम कर सकूं। अरे तुम्हारे जैसी लक्ष्मी बहू तो कहीं लाखों में एक मिलती है। अच्छा मां मैं अभी चलती हूं। अगर यह काम से आए तो इनको कह देना कि मैं पड़ोस में हूं। अरे आ गए आप? थक गए होंगे। थोड़ा सा दूध रखा है। आधा कप चाय बना देती हूं। जिससे थोड़ी थकावट दूर हो जाएगी। अरे उसमें थोड़ा सा पानी डाल लेना जिससे हम दोनों ही आधी-आधी कप पी लेंगे। आपको मेरा बड़ा ही ख्याल रहता है।

 तब तक आप आ जाओ। मां जी के पास बैठो। उनकी तबीयत बिल्कुल भी ठीक नहीं है। तुम्हारा ख्याल इसलिए रहता है क्योंकि आज के जमाने में पति की परिस्थितियों को इतना समझने वाली बीवी ढूंढने से भी नहीं मिलती है। अच्छा आप जाओ मैं चाय बनाकर लाती हूं। ठीक है चंपा। लीजिए मां जी। चाय पीजिए। आपको थोड़ा आराम मिलेगा बुखार में। यह रही आपकी चाय। और तुम्हारी चाय कहां है? आपने पी ली? यानी मैंने पी ली। बस यही मानी है। अरे यह भी कोई बात हुई क्या भला? अरे मैं आज शांता ताई के घर जब अनार साफ करने गई थी तो उन्होंने मुझे एक बढ़िया सी चाय पिलाई थी। अच्छा आप यह बताइए कि आपको कोई काम मिला कि नहीं? हां बेटा मैं भी आज पूरे दिन प्रभु से यही प्रार्थना कर रही थी कि मेरे श्याम बेटे को कोई अच्छा काम मिल जाए। अरे मां अब क्या बताऊं मैं? कोशिश तो पूरी कर रहा हूं लेकिन फिर भी कोई अच्छा काम हाथ नहीं लग रहा है। वैसे अभी कुछ दिन काम चलाने लायक काम तो मिल गया है। फिर तो अच्छी बात है। कुछ दिन के लिए ही सही हमारी परेशानी तो दूर होगी और वैसे भी मैंने शांता ताई से बात कर ली है।

 उन्होंने मुझे और भी जगह अनाज साफ करने का काम दिलाने का वादा किया है। बहू, तू ऐसे जगह-जगह काम करने जाती है। मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। एक समय हुआ करता था जब मेरे घर में काम वाले हुआ करते थे और आज मेरी बहू कहीं काम करने जा रही है। इतना कहकर इमरती देवी फूट-फूट कर रोने लगती है। अरे मां तुम रोती क्यों हो? मैं हूं ना तुम्हारा बेटा। तू तो है मेरे लाल लेकिन उसको भी तो मैंने ही जन्म दिया है। फिर वो कैसे इतना निकम्मा निकल गया कि अपने पिताजी के जाने के बाद अपने भाई मां को भूलकर सब कुछ अकेले ही हड़प लिया। मां तुम रो मत। तुमको वैसे ही बुखार आ रहा है। अभी और तबीयत खराब हो जाएगी। तुम अब आराम से सो जाओ। मैं कल सुबह तुमसे बात करूंगा। आपने कुछ खाया ही नहीं। चलिए कुछ खा लीजिए। नहीं चंपा मेरा कुछ भी खाने का मन नहीं है। आओ चलो हम दोनों अपनी झोपड़ी के बाहर बैठकर चांदनी रात में बैठकर आराम से बात करते हैं। ठीक है। जी मैं आती हूं। अरे चंपा तुम भी ना मुझे कितना प्रेम करती हो।

 इस चांदनी रात जितना ही मैं आपसे एक बात पूछूं? हां चंपा पूछो ना। ऐसी भी क्या बात है जो तुमको इतना सोचकर पूछना पड़ रहा है? नहीं, नहीं जी ऐसी कोई बात नहीं है जी। मां जी की कभी मैं किसी बात का बुरा नहीं मानती हूं। और मां जी भी क्या वो मुझसे कभी कुछ भी नहीं कहती हैं। तो भला और क्या बात है चंपा। जी मैं बस यही जानना चाह रही थी कि क्या आपके कोई सगे भाई भी हैं क्या? क्योंकि मां जी के मुंह से कई बार बातों में उनका जिक्र सुना है। हां चंपा मेरे एक बड़े भाई हैं। चलो आज मैं तुम्हें पूरी बात बताता हूं। हमारे पिताजी एक गांव के सबसे धनवान लोगों में से एक थे। फिर एक दिन महामारी के चलते हमारे पिताजी की मृत्यु हो गई। और फिर फिर क्या हुआ? फिर भाभी के कहने पर भैया ने सारी जायदाद अपने नाम करवा ली। और उनका कहना है कि पिताजी का सारा सब कुछ उन्हीं का है। जिस बड़ी सी कोठी में वो आज रहते हैं ना वो भी पिताजी की ही बनवाई हुई है।

 अच्छा वो एक बड़ी सी कोठी में रहते हैं और हम यहां चंपा इस जगह जहां हमारी झोपड़ी है, इस जगह तो हमारे जानवर बंधा करते थे। लेकिन सब ऊपर वाले का कर्म है। आप बिल्कुल भी दुखी ना हो। अगर हमारे भाग्य में भी कोठी में रहना लिखा है तो उसे कोई नहीं मिटा सकता और ऊपर वाले का कर्म नहीं कर्म तो हमारा ही होगा तो जो हम इस जन्म में भोगना पड़ रहा है लेकिन अब हम कुछ भी ऐसा नहीं करेंगे जिससे हमें आगे कुछ और ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़े तुम कितनी समझदार हो चंपा तुम्हारे जैसी पत्नी पाकर मैं धन्य हो गया लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि आपने किसी के साथ गलत नहीं किया है तो आपके साथ कभी गलत नहीं होगा और सच जरूर एक दिन सबके सामने आएगा। अरे यार आज तो बहुत ही थोड़ी सब्जियां हैं। इन सब से क्या ही बनेगा। चलो मैं आटा गूंदकर रोटियां बना लेती हूं। हम लोग प्याज भूनकर नमक से खा लेंगे। और फिर आज जाकर शांता ताई से भी बाकी घरों के लिए बात करती हूं। जिससे मैं और अनाज का घर ले सकूं। मां जी लीजिए खाना खाइए।

 बहू मुझे तो जरा सी भी भूख नहीं है। अरे अगर आप ऐसे करेंगी तो बीमार हो जाएंगी। उठिए खाना खाइए। फिर आपको दवा भी तो खानी है। बहू तुम मेरा इतना ख्याल रखती हो। लेकिन मैंने तो तुम्हें कभी कोई सुख नहीं दिया मेरी बेटी। मेरी बड़ी बहू जिसे मैं राजकुमारी की तरह रखा करती थी। उसने मुझे घर से निकालने से पहले एक भी बार नहीं सोचा। यह कहकर इमरती देवी जोर-जोर से रोने लगती है। फिर चंपा उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाकर दवाई देती है और शांता ताई के घर वो अपना काम करने के लिए चली जाती है। अरे आज तो इनकी झोपड़ी के बाहर बड़ी ही साफ सफाई दिख रही है। इसका मतलब यह सही बात है कि श्याम कहीं से शादी कर लाया है। क्योंकि उस बुढ़िया से तो साफ सफाई होने से ना रही। वो चरपाई पर लेटे खांसती रहती है। चल देखती हूं जाकर कैसी है श्याम की पत्नी। नैना झोपड़ी के अंदर जाती है। अरे तुम तो चारपाई पर ही पड़ी रहती हो। कहां है तुम्हारी वो प्यारी सी बहू? इमरती देवी आंख खोल कर देखती है। कौन है? अरे मैं हूं तुम्हारी बड़ी बहू। अरे तुम यहां क्यों आई हो? अब क्या और चाहिए तुम्हें? हमारा सब कुछ तो तुमने पहले से ही ले लिया है।

 हां, सब ले लिया है और अब ये झोपड़ी भी लेने आई हूं। यह भी हमारी ही है। चार दिन में इसे भी खाली कर देना। समझी बुढ़िया? इतना कहकर नैना पैर पटकते हुए वहां से चली जाती है। और फिर अपने घर पहुंचकर अपने पति लखन से कहती है, सुनो जी, मैं आज तुम्हारी मां से कह आई हूं कि कल तक वो झोपड़ी खाली कर दे। नहीं तो मैं पुलिस को लेकर जाऊंगी और अपने वकील से भी बात करके आई हूं जिसने हमारी पहले भी मदद की है। क्या तुम आंखें फस गई थी? अरे अब तो उन लोगों को चैन से जीने दो। नैना आखिर तुम चाहती क्या हो? वो फूटी टूटी झोपड़ी पर भी अब तुम्हारी आंखें अटक गई है। कुछ तो शर्म करो। अरे वह झोपड़ी कितनी बड़ी है। उसके आगे पीछे की जगह देखो। आज जब मैं वहां से गुजरी तो वहां की साफ सफाई देखकर मेरा तो जी उस जगह पर आ गया था। और खुद की इतनी बड़ी कोठी तुमको रास नहीं आ रही क्या? पिताजी के जाने के बाद मुझे अपना फर्ज निभाना चाहिए था। मैं अपनी मां का बड़ा बेटा और श्याम का बड़ा भाई था। लेकिन सिर्फ तुम्हारे कहने पर मैंने उनसे सब हड़प लिया। हां हां ठीक है। अब ज्यादा भाईचारे का दिखावा ना करो और कल ही जाकर देखो। उन्होंने वो झोपड़ी खाली की या नहीं। अरे झोपड़ी के पीछे वाला भैंसों का तवेला हमने पहले ही उनसे हड़प लिया। मैं कुछ भी नहीं जानती। मुझे बस वो झोपड़ी वाली जमीन चाहिए। मैंने सोच लिया है।

 मैं उस जमीन पर बढ़िया डेरी खोलूंगी और खूब सारा पैसा कमाऊंगी। वैसे भी पीछे की जमीन तो पहले से ही हमारी है। इधर चंपा अपने पड़ोसियों के यहां से अनाज साफ करके अपने घर आ जाती है। मां जी क्या हुआ? आप ऐसे सिर पर हाथ रखकर क्यों बैठे हैं? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि आपको किसी बात की चिंता सता रही है? चंपा के मुंह से यह सारी बातें सुनते ही देवी जोर-जोर से रोने लगती है और पूरी बात चंपा को बताती है। आज तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी जेठानी यहां आई थी और कह कर गई है कि कल ये झोपड़ी खाली चाहिए उसे। क्या? अब उनको यह भी चाहिए। हां बेटा, अब हम तीनों कहां जाएंगे? बस यही चिंता मुझे सताए जा रहे हैं। तो मां जी हमारे पास कोई भी कागजात नहीं है। ऐसे जिस पर ऐसे लिखा हो कि यह जमीन पिताजी ने दोनों भाइयों में आधी-आधी बांटी है। है ना बहू? एक संदूक था जिसमें तुम्हारे ससुर जी सारे काक रखते थे। लेकिन उनके गुजरते ही पता नहीं वो सारे कागज और संदूक कहां चला गया। अच्छा मां जी आप घबराओ मत। अभी ये काम से आते ही होंगे। हम लोग बैठकर कुछ रास्ता जरूर निकालेंगे। तब तक मैं आपके लिए खाना बना देती हूं। फिर आपको दवा भी तो खानी है।

 चंपा अपने पति और सास के लिए खाना बनाती है। और तब तक श्याम भी काम से वापस आ जाता है। चंपा चंपा मां मां क्या हुआ जी? आज तो आप बड़े ही खुश लग रहे हैं। कोई खास बात है क्या? हां, आज मुझे बढ़िया काम मिल गया है और ठेकेदार ने कहा है कि काम पूरे 6 महीने तक चलेगा। इसलिए अब हमें 6 महीने तक के लिए कोई चिंता नहीं करनी है। अरे वाह ये तो बहुत ही बढ़िया बात है। लेकिन ईश्वर हमारी परेशानियां कम ही नहीं कर रहा है। कुछ ना कुछ करके हमें परेशानियों के आगे डाल ही रहा है। क्या हुआ चंपा? तुम ऐसे क्यों कह रही हो? तुम्हारी भाभी आई थी और धमकी देकर गई है कि कल ही यह झोपड़ी खाली कर दो। क्या? अब यह झोपड़ी भी उन्हीं को चाहिए। ऐसे कैसे चलेगा? हम कल ही पुलिस के पास चलेंगे और अपनी परेशानी बताएंगे। चंपा पुलिस भी उसी की होती है जिसकी जेब भारी होती है। भैया ने पहले भी पुलिस और वकील को पैसे देकर ऐसे ही सारी जमीन हड़प ली थी। पीछे जहां आज उनकी भैंसें बंधी हुई हैं, वो तबेला भी पहले हमारा ही था। जिसमें हम खेती करके कुछ सब्जियां उगा लेते थे।

 लेकिन जब भाभी ने देखा कि हम उससे कमाई कर रहे हैं तो वो भी कोई बात नहीं। मुझे मेरे ईश्वर पर पूरा भरोसा है। आप जल्दी से हाथ मुंह धोकर खाना खा लीजिए। फिर कल सुबह आपको काम पर भी तो जाना है। हां चंपा। कल बिल्कुल भी देर नहीं होनी चाहिए। नहीं तो ठेकेदार बहुत नाराज होगा। अगले दिन सुबह-सुबह फिर नैना का वकील चंपा के घर आता है। क्यों? अभी तक तुम लोगों ने अपना सामान उठाना शुरू नहीं किया। अरे निकलो यहां से जल्दी नहीं तो कल ही पुलिस को लेकर आ जाऊंगा। जी, अभी मेरे पति काम पर गए हुए हैं। कल ही हम यह झोपड़ी खाली कर देंगे। फिर जैसे ही रात होती है, चंपा को पीछे के तबेले से बड़ी जोर-जोर से भैंसों की रोने की आवाज आती है। अरे इतनी रात गए ये भैंस क्यों रो रही हैं। कहीं इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं है। अरे इस तबेले में काम करने वाला नौकर भी जाने कहां चला गया है।

 चलो मैं जाकर सो जाती हूं। मुझे क्या? फिर से बड़ी जोर-जोर की आवाज आती है। पता नहीं क्या बात है। कहीं उसे किसी कीड़े-मकोड़े ने तो नहीं काट लिया। चलो चल कर देखती हूं आखिर बात क्या है। चंपा भैंस के तबेले में लालटेन लेकर वहां जाती है और वहां जाकर देखती है कि एक भैंस ने एक जगह पर गड्ढा जैसा कुछ खोद रखा है और वो चंपा के पास आकर उसकी साड़ी को मुंह में दबाकर उस गड्ढे के पास उसको ले जाती है। अरे यहां तो कोई बक्सा जैसा है। यह तो बहुत बड़ा बक्सा है। लेकिन यह भैंस क्यों रो रही थी? और अब यह मुझे देखते ही एकदम चुप हो गई। चंपा उस बक्से को उस गड्ढे में से बड़ी ही मुश्किल से निकालती है। अरे यह तो बड़ा ही भारी है और यह इस गड्ढे में क्या कर रहा है? ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने इसे जानबूझकर इस गड्ढे में दबा दिया हो। चंपा बड़ी ही मुश्किल से उसमें से वो संदूक निकालकर अपनी झोपड़ी में ले जाती है और उसके बाद वो भैंस भी रोना बंद कर देती है। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि जैसे मुझे मेरे ईश्वर ने उस भैंस के स्वरूप में मुझे वहां बुलाया था।

 अब देखो वो भैंस भी बिल्कुल शांत हो गई। लेकिन अभी तो बड़ा ही अंधेरा है। मैं सुबह होते ही संदूक को खोल कर देखूंगी कि आखिर इसमें है क्या? सुबह होते ही श्याम और इमरती देवी भी जाग जाते हैं। अरे यह संदूक कहां से आया? अरे बहु यह संदूक तो वही है जिसके बारे में हम कल बात कर रहे थे। यह तुमको कहां से मिला? क्या मां जी आप सच कह रही हैं? क्या यह वही संदूक है? हां, इसे खोलो तो सही। देखो इसमें आखिर है क्या? चंपा जल्दी से संदूक खोलती है और देखती है उस संदूक में कुछ पुराने कागज हैं। हां बेटा यह वही कागज हैं जो तेरे पिताजी के हाथ के लिखे हुए थे। जिसमें उन्होंने अपने दोनों बच्चों के लिए बराबर जायदाद की हिस्सेदारी लिखी थी। क्या मां सच में? यह वही कागज है क्या? लेकिन चंपा, तुमको यह संदूक कहां से मिला? मुझे यह संदूक पीछे तबेले से मिला। जब कल रात एक भैंस बड़े ही जोर-जोर से रो रही थी तो मुझे लगा कि कहीं वो किसी तकलीफ में ना हो। तो मैं उसे देखने गई और फिर मुझे यह संदूक वहां दिखाई दिया और मैं इसे उठा लाई। अब हमें पुलिस के पास चलना चाहिए सीधे। नहीं, अब हमें इंतजार नहीं करना चाहिए कि पुलिस हमें क्या कहती है। पहले।

 फिर दिन चढ़ते ही पुलिस उनके घर आती है और साथ में नैना और लखन भी आते हैं। उनके साथ में उनका वकील भी होता है। क्या हुआ? तुम दोनों ने इनका घर खाली क्यों नहीं किया अभी तक? क्या इनके पास कोई सबूत है कि ये घर इनका ही है? अच्छा तो तू है वो नागिन और इसकी जुबान तो देखो कितनी लंबी है। अरे सबूत की क्या जरूरत है जब ससुर जी ने जाते-जाते अपना सब कुछ अपने बड़े बेटे के नाम किया था। अच्छा तो छोटे बेटे को क्यों नहीं कुछ दिया? अरे छोटा बेटा तो नकारा था। वह जब कुछ करता ही नहीं था तो उसे क्या ही देते फिर? भाभी आप कैसी बातें करती हैं? क्या आपको नहीं पता कि पिताजी के गुजरते समय मेरी उम्र ही कितनी थी? बहू तो पराए घर से आई है। लेकिन तू तो अपना खुद का खून है। तेरा क्या मुंह में दही जम गया है लखन। मां ये झोपड़ी वाली जमीन भी पिताजी हमको ही दे गए थे। भैया कम से कम आपको तो मां से ऐसा नहीं बोलना चाहिए था। पुलिस इंस्पेक्टर साहब अब हम सीधा कोर्ट में मिलेंगे। क्या मतलब? कोर्ट में क्यों मिलेंगे? यह तो आप लोगों को जज साहब ही बताएंगे। चंपा की बात सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर डर जाता है।

 अरे नहीं नहीं ये क्या कर रही हो तुम बेटी? ऐसा कुछ भी मत करना। मेरी नौकरी का आखिरी साल बचा है। मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं। अगर मुझे सस्पेंड कर दिया तो मेरी जीवन भर की कमाई मिट्टी में मिल जाएगी। फिर वो चाहे मेरी इज्जत हो या फिर मेरा फंड। तो फिर यह आपको गलत का साथ देने से पहले पूछना चाहिए था। मैंने इनको कई बार पूछा भी था। लेकिन इन्होंने कहा कि यही सच है जो यह कह रहे हैं और ऊपर से यह वकील साहब भी मेरे ऊपर काफी दबाव बना रहे थे। तो आप अभी के अभी मेरे सामने खड़े भाई और भाभी से पूछिए। क्या यह जेल जाना पसंद करेंगे? या फिर यह स्वीकार करेंगे कि पिताजी ने हमको बराबर का हिस्सा दिया था। नहीं नहीं हमें जेल नहीं जाना है। तुम लोग अपना हिस्सा ले लो और हमें अपने हिस्से में हम खुश हैं। नहीं नहीं भाभी अब तो हिस्सा बराबरी का होगा। जिस कोठी में आप रह रही हैं उसमें भी और जो सारे खेत आपने हमसे हड़पे हैं उसमें भी। हां हां मैं देने को तैयार हूं। लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि पिताजी हमें आधा-आधा हिस्सा लेकर गए थे।

 तभी इमरती देवी वही संदूक उठाकर लाती है। जिसे देख लखन और नैना चौंक जाते हैं। अरे ये संदूक आपको कहां से मिला? ये मेरी छोटी बहू की ईश्वर की प्रति श्रद्धा और दिन रात की मेहनत का परिणाम है। जो किसी के साथ गलत नहीं करते। ईश्वर भी उनके साथ कभी गलत नहीं करता। ये उसी के विश्वास का परिणाम है। क्यों लखन और नैना? तुम पहचानते हो इस संदूक को? हां, मैंने ही यह संदूक पीछे तबेले में छुपाया था। अच्छा तो तुम दोनों को अब मैं सजा दिलवाऊंगा और इस वकील को भी। नहीं, नहीं। इन्हें अपनी गलती का एहसास है। हमारे लिए वही बड़ी बात है। बस अब हमें हमारा हिस्सा चाहिए।

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