बस्ती वालों का नया साथ दिल्ली शहर की सर्द दिसंबर की आखिरी रात थी। शहर की ऊंची-ऊंची महंगी इमारतें लाइटों से जगमगा रही थी। मॉल, होटल, क्लब सब जगह नए साल की पार्टी की तैयारियां जोरों पर थी। लेकिन शहर के एक कोने में रेलवे लाइन के पास बसी एक छोटी सी बस्ती थी। धारावी बस्ती जहां अंधेरा था, ठंड थी और खामोशी में छुपी सैकड़ों मजबूर सासे थी।
उस फटे टाट प्लास्टिक की चादरी, जलती हुई लकड़ियों का छोटा सा अलाव। जहां उस अलाव के पास बैठी थी 40 साल की शांति। जिसकी आंखों में थकान और चेहरे पर मजबूरी साफ दिखती थी। उसके पास बैठा था उसका 12 साल का बेटा रोहन। मां सब लोग नए साल की तैयारी कर रहे हैं।
सारा शहर कैसे सजा हुआ है लेकिन हमारी बस्ती में तो जैसे कुछ भी रौनक नहीं है। हम गरीबों के लिए नया साल भी वही होता है बेटा। कल भी रोटी की तलाश आज भी रोटी की तलाश। हमारे लिए साल भले ही बदलता है लेकिन हालात वही के वही रहते हैं। पता है ना जब मैं मंदिर से घर लौट रहा था तो दूसरी कॉलोनी के कुछ स्कूल के बच्चे कह रहे थे कि नए साल में केक कटता है। लाइटें जलती है। जलते होंगे बेटा। लेकिन जब से मैं इस बस्ती में आई हूं, हमारी बस्ती में बस अलाव जलता है बेटा। अरे भाई नया साल आने वाला है। कम से कम चाय तो मीठी पी लेते हैं। वही नए साल का जश्न हो जाएगा। उस अलाव के पास और भी लोग बैठे थे। जैसे बबलू चाचा जो कि रिक्शा चालक थे। मीरा जो कि एक विधवा थी। सुना है शहर में आतिशबाजी होगी। काश हमारे बच्चों की आंखों में भी रोशनी होती। यह बेचारी तो इस बस्ती से ही दूर दिख रही। बड़ी-बड़ी इमारतों में चमकती रोशनी को देखकर ही खुश हो जाते हैं। इसके बाद वह सभी उस अलाव की ओर देखने लगते हैं जैसे अग्निदेव से नए साल पर अपने लिए ढेरों दुआएं मांग रहे हो। जहां एक तरफ बस्ती वालों के लिए नए साल की तैयारी कुछ ऐसी थी। वहीं दूसरी तरफ शहर के एक बड़े से घर में सिद्धार्थ खड़ा था। हां भाई इस बार नया साल दुबई में मनाने का प्लान था। पर सच कहूं यार मन नहीं लग रहा। मन अजीब सा बेचैन था। उसके सामने खिड़की से शहर दिख रहा था। लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। सब कुछ है मेरे पास। ऊपर वाले की दया से किसी भी चीज की कमी नहीं है। लेकिन फिर भी खालीपन क्यों है मन में?
सिद्धार्थ ने अपने नौकर से कहा। रामू ड्राइवर को बोलो गाड़ी निकाले। लेकिन मालिक रात के 11:30 बज रहे हैं। इस वक्त आप जितना कहा है उतना करो। जी मालिक सूरज साहब ने जो पार्टी होस्ट की है उस तरफ जाना है ना सर। नहीं मनोज आज पार्टी नहीं देखनी बल्कि आज शहर देखना है। अब ड्राइवर गाड़ी लेकर निकल पड़ा। सारा शहर रोशनी से जगमगा रहा था। सभी नए साल के जश्न की तैयारी में लगे हुए थे। कोई गिफ्ट्स लेकर किसी के घर जा रहा था तो कोई केक लेकर चला जा रहा था। ऐसे ही गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी। कुछ देर बाद फिर गाड़ी धीरे-धीरे बस्ती के पास पहुंची। जहां सिद्धार्थ ने देखा कि एक बस्ती के पास कुछ लोग अलाव जलाकर फटे कपड़े पहने। साथ ही ठंड से कांपते बच्चे बैठे हुए थे। जिन्होंने कपड़ों के नाम पर पतले कपड़े पहने हुए थे और किसी तरह ठंड से बचने के लिए उस अलाव के पास बैठे हुए थे। उनको देख सिद्धार्थ का दिल कांप उठा। ड्राइवर गाड़ी रोको। साहब यहां आई सेड स्टॉप द कार। फिर सिद्धार्थ गाड़ी से उतरा। सूटबूट में बड़ी सी कार से उतरते हुए उसे देख रोहन ने डरते-डरते पूछा। मां ये अमीर अंकल कौन है?
उसे देखकर शीतल घबरा गई।
कहीं यह कोई बड़ा अधिकारी तो नहीं जो हमसे यह जमीन खाली करवाने को कहने आया है? नहीं नहीं ऐसा
हुआ तो हम इतनी ठंड में बच्चों को लेकर कहां जाएंगे?
ठंड किसी की औकात नहीं
देखती। वो तो बस अपना शिकार ढूंढती है। वैसे आप सब नया साल नहीं मना रहे। यहां क्या कर रहे हैं?
हम गरीबों का क्या नया और
क्या पुराना साल साहिब। ए बबलू जा जल्दी जा और साहब के लिए कुर्सी ले आ। लेकिन कुर्सी तो टूट गई मीरा। वो कल मोटी विमला काकी उस पर बैठ गई थी। तभी विमला काकी ने अपनी
चप्पल बबलू की ओर फेंकते हुए कहा, कमबख्त तेरे बाप के पैसों का नहीं खाती। सरकार से
जो थोड़ा सा राशन मिलता है वही खाती हूं।
कमबख्त यह सुनकर सभी हंसने लगे। कमाल है। ऐसे तो विमला काकी को कुछ सुनाई नहीं देता। लेकिन यह बात अच्छे से सुनाई दे गई। आप सब
परेशान मत होइए। मैं यहीं ठीक हूं। तभी सिद्धार्थ ने किसी को फोन किया। जल्दी से 100 गरम कंबल, अलग-अलग तरह के
पकवान, केक और कॉफी स्नैक्स का इंतजाम करो और धारा भी बस्ती ले आओ। यह सुनकर सभी बस्ती वाले
हैरान रह गए। हे भगवान, आज तूने हम
गरीबों पर भी नजर डाली। तेरा लाख-लाख शुक्रिया। कुछ देर बाद वहां एक बड़ा ट्रक आया जिसमें सिद्धार्थ का मैनेजर था।
वो सारा सामान साथ लेकर आया था। उसने एक-एक
कर सभी कंबल उस बस्ती के लोगों को बांटे। वह तो उन
सबके लिए जैसे नए साल की पार्टी हो गई थी। फिर रात को घड़ी में 12:00
बजने वाले थे। सिद्धार्थ ने केक निकाला। रोनी आओ केक नहीं काटोगे? अरे वाह पहली बार अपने मोहल्ले में भी केक कटेगा। बड़े साहब आप भी नया साल हम सबके साथ मना रहे हैं। आज नया
साल इस बस्ती के साथ। साहब आज तो हमारी बस्ती
भी वीआईपी बन गई। ये सुनकर सब हंस पड़े। साहब आज तुमने हमें सिर्फ चीजें नहीं दी बल्कि इज्जत दी है। यह सुनकर
सिद्धार्थ की आंखें भर आई। घड़ी में 12:20 हो चुके थे। केक भी खत्म हो चुका था, चाय भी खत्म हो चुकी थी। लेकिन बस्ती वालों के
दिल अब भी गर्म थे। तभी अचानक एक पुलिस जीप तेज
आवाज के साथ बस्ती के बाहर आकर रुकी। ये क्या हो रहा
है यहां?
एक कड़क आवाज गूंजी। बस्ती
के लोग डर गए। मां, कहीं यह सब
सपना तो नहीं था? पुलिस इंस्पेक्टर आगे
आया। मिस्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा शहर के जानेमाने बिल्डर आप यहां क्या कर रहे हैं?
यह बात सुनकर बस्ती वाले
हैरान रह गए। मल्होत्रा इतना बड़ा नाम जिससे शहर में हर कोई वाकिफ था। शीतल ने घबरा कर पूछा। इंस्पेक्टर
साहब आप इस वक्त यहां हमसे कोई गलती हो गई है
क्या?
गलती आज से 23 साल पहले हुई थी। 23 साल पहले ऐसी बस्ती में एक गरीब औरत रहती थी जिसका नाम था
पायल। इतने सालों बाद यह नाम सुनकर शीतल का
दिल धक से रह गया। पायल वो वो वो मेरी बहन थी। उसकी मौत सर्दी में हो गई थी और सरकारी फाइल में लिखा
गया था गरीबी। ठंड में गरीबी के कारण उनकी मौत हो
गई थी। इसके बाद सिद्धार्थ ने कहा। लेकिन उसका बेटा उस रात जिंदा बच गया था और वो बच्चा और
कोई नहीं बल्कि मैं ही हूं। जो उस रात ठंड से कांप
रहा था। मेरी मां ने अपनी आखिरी शॉल मुझे दे दी थी ताकि मैं ठंड से बच सकूं। फिर पूरी बस्ती में सिसकियां गूंज
उठी। शीतल फूट-फूट कर रो पड़ी। तो तुम तुम मेरी बहन
के बेटे हो। हां मौसी उस रात मैंने कसम खाई थी। अगर जिंदा बचा तो किसी बस्ती का नया साल फिर कभी अंधेरे में
नहीं बीतेगा। तो आप हमारे जैसे ही थे। मैं आज भी तुम
सब जैसा ही हूं। बस फर्क इतना है कि अब देने की हालत में हूं। सर, सरकार ने आज ये बस्ती अवैध घोषित कर दी है और इसे 3 दिन में खाली करना होगा यहां के लोगों को। यह सुनकर सभी
बस्ती वालों के चेहरे एक पल में उतर गए। तो
क्या नया साल बस एक रात का था हम गरीबों
का?
नहीं, अब यह लड़ाई शुरू होगी। मैं सिद्धार्थ
मल्होत्रा सबके सामने ऐलान करता हूं। मैं अपनी
मां के नाम पर यह जमीन खरीदूंगा और यह कानूनी
लड़ाई लडूंगा और अगर जरूरत पड़ी तो मैं फिर से उसी बस्ती में रहूंगा। यह बात सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर चुप
हो गया और वहां से चला गया। मां आज सच में नया साल
आया है। हां बेटा आज बस्ती ने डर से नहीं बल्कि हक से नया साल शुरू किया है। नया साल कपड़ों, पार्टी और शोर
से नहीं इंसानियत,
प्यार और साथ से मनाया जाता है। अगर एक इंसान भी ठान ले तो कई
जिंदगियां बदल सकती हैं। सुखिया ट्रेनों में चने
बेचता था। ए चना खा लो चना ए खट्टामीठा चने साहब चना खाओगे क्या?
ऐसे ही सुखिया का घर चलता
था। लेकिन उसका घर तो सेठ के पास गिरवी था। एक दिन सुखिया लास्ट ट्रेन में चने बेचकर घर गया और देखा वहां पहले से ही सेठ उसका इंतजार कर रहे थे। आइए आइए सुखिया जी आइए। आप ही का इंतजार कर रहा था। अब
सेठ क्या बात है सेठ इतनी रात को मेरे घर पे आपका घर
ओ हो हो ये आपका घर है क्या होगा लेकिन कुछ ही दिनों में यह घर तो मेरा होने वाला है तूने मुझे आज इंतजार करवाया हां बहुत बड़ा आदमी बन गया है तू
क्षमा कर दीजिए सेठ मुझसे गलती हो गई आज पैसा
लौटाने का आखिरी दिन था ना मेरे पैसे कहां
है दे मेरे पैसे निकल पैसों का इंतजाम नहीं हो
पाया सेठ तो फिर घर से निकल चल अभी निकल चल अभी मैं बीवी बच्चे लेकर कहां जाऊंगा? सेठ थोड़ी तो
दया कीजिए। चल ठीक है।
तुझे दो दिन की मोहलत और दी। दो दिन के अंदर
मुझे पैसे नहीं मिले ना तो यह घर मेरा
समझा। धमकी देकर सेठ चला गया। सुखिया घर के अंदर घुसा। वहां उसकी बीवी सरला और दो छोटी-छोटी
बेटियां चुन्नी और मुन्नी डर के मारे कांप रही
थी। क्या हुआ? सेठ ने क्या कहा? वो हमें घर से निकाल देंगे क्या?
सेठ ने दो दिन की मोहलत दी
है। लेकिन दो दिन में पैसों का इंतजाम कैसे करूंगा?
मेरी वजह से आज आपको इतनी
तकलीफ उठानी पड़ रही है। नहीं नहीं ऐसा
मत बोलो सरला तुम्हारी तबीयत खराब थी। मैं और क्या
करता?
अपनी दूसरी बेटी को जन्म
देने के बाद सरला की तबीयत खराब हो गई थी। उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था। उसी वजह से सुखिया को सेठ से पैसा उधार लेना पड़ा। उसके बदले सुखिया को उसका घर सेठ के पास गिरवी रखना पड़ा और उसके बाद वह अभी तक पैसा चुका नहीं पाया। यह
सब सोचते-सचते पूरी रात सुखिया सो नहीं पाया। अगले
दिन वह चना बेचने के लिए स्टेशन पर चला गया और ट्रेन में चना बेचने लगा। चना ले ले चना ये खट्टा
मीठे चना ये चना ले लो साहब। लेकिन दो दिन
में चना बेचकर उसे बहुत ज्यादा पैसे तो नहीं मिलने
वाले थे। ट्रेन में चना बेचते हुए उसने देखा कि एक आदमी का बटुआ उसकी जेब से थोड़ा सा निकला हुआ है। बटुए में
पैसे बहुत हैं। वो देखकर सुखिया अपने आप को संभाल
नहीं पाया।
उसने बटुआ चुरा लिया। लेकिन उस आदमी को यह पता लग गया। अरे चोर चोर अरे मेरा बटुआ मार लिया। पकड़ो उसे पकड़ो उसे। उस आदमी ने सुखिया को पकड़
लिया और उसे ट्रेन से स्टेशन पर खींच कर उतार दिया। मां माफ कर माफ कर दीजिए मालिक। माफ कर दीजिए। हम
स्वभाव से चोर नहीं है। हम गरीब हैं मालिक।
गरीब है तो क्या हुआ? चोरी करेगा। ये ले। उस आदमी ने सुखिया को बहुत मारा और उसे स्टेशन मास्टर के पास ले गया। सर इस चना बेचने वाले ने
मेरा बटवा चुराने की कोशिश की। आप कुछ
कीजिए इसका। स्टेशन मास्टर ने कहा, सुखिया यह क्या
सुन रहा हूं? तुमने चोरी की?
माफ कर दीजिए साहब। मुझसे
गलती हो गई। नहीं सुखिया चोरी की माफी नहीं मिल सकती। सजा तो भगतनी ही होगी। आज के बाद तुम इस स्टेशन पर कुछ
नहीं बेच सकोगे। माफ कर दीजिए साहब। मुझसे गलती हो गई। नहीं सुखिया चोरी की माफी नहीं मिल सकती। सजा तो भगतनी ही होगी। आज के बाद तुम इस स्टेशन पर कुछ
नहीं बेच सकोगे। सुखिया बहुत रोया धोया लेकिन कोई
फायदा नहीं हुआ। उसे स्टेशन से निकाल दिया गया। अब उसके पास काम भी नहीं रहा। वो घर गया और सरला से सब कुछ
बताया। उसकी दोनों बेटियां रोने लगी। पापा क्या
अब हम इस घर में नहीं रह पाएंगे? क्या हमें भीख मांगनी होगी?
रो मत बेटी। माफ कर दे
मुझे। मैं बाप होकर भी कुछ नहीं कर पाया। अपनी दोनों
बेटियों को सुलाकर सुखी और सरला सिसक-सिसक
कर रोने लगे। अगले दिन सुबह-सुबह सेठ अपने लोगों
को लेकर चले आए और सुखिया को परिवार समेत घर से बाहर निकाल दिया। बहुत हो गया रे अब और इंतजार नहीं कर सकता मैं। चल निकल जा यहां से। हम मर जाएंगे
सेठ हम मर जाएंगे। हां तो मर जा। किसने मना किया है? वैसे भी धरती पर पहुंच हो तुम लोग। सुखिया अपनी बीवी और बच्चियों को लेकर वहां से चला
गया। बाबा अब हम कहां रहेंगे?
चल बेटी देखते हैं। बाबा हमें घर तो मिल जाएगा ना। घर मिलना तो
मुश्किल है बेटी लेकिन रहने की जगह तो मिल
ही जाएगी। सुखिया उन्हें लेकर स्टेशन के पास ही आ गया। स्टेशन से थोड़ी ही दूर पटरी पर एक पुरानी ट्रेन
की कुछ बोगियां खड़ी थी। सुखिया ने वो देखा और कहा चल बेटी चलो सरला उस ट्रेन के पास चलते हैं। लेकिन ट्रेन के अंदर घुसेंगे कैसे? दरवाजे तो बंद है। ट्रेन के अंदर नहीं ट्रेन के नीचे रहेंगे हम। सुखिया अपनी बीवी और बेटियों को लेकर ट्रेन की बोगियों के पास चला गया। सरला घर से कुछ ही चीजें ला पाई थी। उन चीजों में कुछ बोरे थे। उन्होंने ट्रेन के नीचे पटरी पर बोरे बिछा दिए और वहीं पर बस गए। चलो अच्छा है।
बारिश वारिश होगी तो हम भीगेंगे नहीं। बेबस
इंसान थोड़ी सी उम्मीद में ही जीता है। लेकिन
सुखिया के पास तो कोई उम्मीद ही नहीं थी। फिर भी
रहने की जगह तो मिल गई। लेकिन वो अपने परिवार को क्या खिलाता?
ट्रेन के नीचे पटरी पर जगह तो मिल गई लेकिन मैं स्टेशन पर और चने नहीं बेच सकता। स्टेशन पर जाने से ही मुझे मना कर दिया है। कोई बात नहीं जी। मैं दोनों बेटियों को लेकर भीख मांगूंगी। उसी से कैसे भी करके पेट तो चल जाएगा। हां बाबा हम भीख मांग लेंगे। भीख मांगकर पैसों का जुगाड़ कर लेंगे। सरला अपनी दोनों बेटियों को लेकर सच में स्टेशन पर भीख मांगने लगी और सुखिया इधर-उधर कुछ काम पाने की कोशिश करने लगा। ऐसे ही ट्रेन के नीचे उनका दिन बीतने लगा लेकिन सुखिया को कहीं पर भी काम नहीं मिला। हर जगह यह रट गया था कि सुखिया बटुआ चोर है। इसीलिए कोई भी सुखिया पर भरोसा नहीं करना चाहता था। ऐसे ही एक दिन वो पटरी पर बैठा हुआ था और उसकी आंखों से आंसू टपक रहे थे। उधर उसकी बीवी और बेटियां भीख मांग रही थी। तभी स्टेशन पर सेठ अपनी मां को लेकर आया और सरला को भीख मांगते हुए देखकर कहा, अच्छा हुआ तुम लोग इसी के लायक हो। यह लो ₹2। सेठ अपनी मां से बहुत प्यार करता था। सेठ की मां बीमार थी इसीलिए सेठ उन्हें लेकर शहर के अस्पताल में जा रहे थे। इसीलिए वो स्टेशन पर आए थे। लेकिन अचानक से उनकी मां का पैर फिसल गया और वो पटरी पर गिर पड़ी और उसी पटरी पर एक ट्रेन आ रही थी। मां मां अरे अरे क्या हुआ आपको? मां। सेठ भी खुद पटरी पर उतरने से डर रहे थे। ट्रेन बहुत पास आ गई थी। सभी ने आंख बंद कर ली। लेकिन तभी सुखिया दौड़ते हुए आया और सेठ की मां को पकड़ कर प्लेटफार्म पर उठा दिया। लेकिन खुद पटरी से हटने से पहले ट्रेन ने उसे धक्का मार दिया। सुखिया का नसीब अच्छा था कि उसका सिर्फ दाहिना पैर ही टूटा। वो जान से नहीं मरा। और यह देखकर सेठ की आंखों में आंसू आ गए। सुखिया तूने तूने अपनी जान की बाजी लगाकर मेरी मां को बचाया। मैंने तेरे साथ कितना बुरा किया रे। लेकिन तू तो अच्छा आदमी निकला। उन्होंने अपने पैसों से सुखिया का ट्रीटमेंट करवाया और उसे घर भी वापस दे दिया। साथ में उसे जमीन जायदाद और अपनी कंपनी में काम भी दे दिया। इस तरह सुखिया की जिंदगी बदल गई। इसीलिए कहते हैं कि बुराई को सिर्फ अच्छाई ही मिटा सकती है।
Comments
Post a Comment