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जगन्नाथ परिवार की दिव्य लीला

  आधा दिन निकल गया। शाम होने को है। अब इसके मौन व्रत को तोड़ने कुछ बड़ा करना होगा। अभी करता हूं। ओ अब क्या करूं ? ये क्या ? धन्यवाद। ये मधुमक्खियां वहां क्या कर रही हैं ? ये पेड़ काटेंगे तो सीधा जाकर बलराम के सर पर गिरेगा। इतना दर्द होगा कि उसका मौन व्रत जरूर टूटेगा। अरे ये सब डर के क्यों भाग रहे हैं ? प्रणाम। भैया आपने बलराम को बचाया। धन्यवाद। जिसके साथ जगन्नाथ हो , उस भक्त का साथ सारी सृष्टि देती है। तुम भले ही उसकी मदद ना कर सके , पर हम में से कोई भी उसका व्रत नहीं टूटने देंगे। अब तो इस बलदाम का व्रत तोड़ के रहूंगी। मेरी प्यारी सुभद्रा अब क्या करें ? उसका व्रत तो नहीं टूटा।  उसका व्रत तो तुड़वा के ही रहूंगी मैं। अब हमें कुछ और करना होगा। क्या कुछ जो बलराम के लिए अपने जगन्नाथ प्रभु से भी ज्यादा जरूरी हो। ऐसा कुछ है क्या ? हां है। बलराम बलराम वो डाकू वो डाकू। हां वो मंदिर में चोरी करने आए थे। तेरे मां-बा ने उन्हें रोका तो वो उनको उठाकर ले गए। जल्दी जल्दी चल। लेकिन मां बाबा ये बलराम का मौन टूट गया टूट गया बलराम का मौन अरे ये तो मोर बाबा के सिर्फ पुतले कैसे बुद्धू बनाया इस बोंद...

कर्मा बाई की अनसुनी कथा

 घोर अंधेरा जगन्नाथ मंदिर में सिर्फ कुछ दियों की टिमटिमाती रोशनी गर्भगृह में पसरी खामोशी को तोड़ रही है। मुख्य पुजारी परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को जगाने और स्नान कराने के लिए प्रवेश करते हैं। दिए की रोशनी में भगवान का मुस्कुराता चेहरा चमकता है। राजेंद्र जी की आंखें रोज की तरह श्रद्धा से झुक जाती हैं। लेकिन आज कुछ अलग है। उनकी नजर भगवान के होठों के कोने पर अटक जाती है। वहां कुछ पीला सा लगा है। दाल और चावल का एक दाना। ये ये क्या है? वे करीब जाकर देखते हैं। यह खिचड़ी का दाना है। भगवान के गालों पर भी हल्के पीले दाग हैं। जैसे किसी बच्चे ने जल्दबाजी में खाकर हाथ पोंछ लिए हो। राजेंद्र जी का दिल बैठ जाता है। मंदिर में खिचड़ी का भोग तो शाम को लगता है। सुबह तो बिल्कुल नहीं। और गर्भगृह में उनके अलावा किसी को आने की इजाजत नहीं। यह अपवित्रता है या कोई चमत्कार।

 भक्ति जब सारे नियम तोड़ देती है तो भगवान भी अपने नियम तोड़ देते हैं। यह कहानी किसी भक्त की नहीं बल्कि उस मां की है जिसके लिए भगवान ने अपना सिंहासन छोड़ दिया। जरा सोचिए। भगवान के होठों तक खिचड़ी कैसे पहुंची? कौन था वो जो जगन्नाथ के द्वारों के पार पहुंच गया? वीडियो के अंत में एक सवाल पूछा जाएगा जिसका जवाब आपको कमेंट में देना है। इसलिए हर दृश्य को ध्यान से देखिएगा। राजा गजपति एक न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक अपने मंत्रियों के साथ राज्य के मामलों पर चर्चा कर रहे हैं। तभी घबराए हुए राजेंद्र पुजारी वहां पहुंचते हैं। आचार्य राजेंद्र आप इस समय यहां सब कुशल तो है? महाराज अनर्थ भी कह सकते हैं और चमत्कार भी। समझ नहीं आ रहा। राजा खड़े हो जाते हैं। दरबार में सन्नाटा छा जाता है। स्पष्ट कहिए आचार्य क्या हुआ है? महाराज आज भोर में जब मैं गर्भगृह में गया तो मैंने प्रभु जगन्नाथ के श्री मुख पर खिचड़ी के कण देखे।

 पूरे दरबार में कान्हा फूंसी शुरू हो जाती है। खिचड़ी सुबह-सुबह यह असंभव है। क्या आपने स्वयं देखा? कोई भ्रम तो नहीं महाराज अपनी इन आंखों से देखा है जैसे किसी ने प्रभु को भोग लगाया हो और उन्होंने उसे स्वीकार भी किया हो पर सवाल यह है कौन और कैसे मंदिर के सारे द्वार बंद थे राजा गजपति की आंखों में चिंता के साथ-साथ एक अजीब सी जिज्ञासा तैर जाती है। यह कोई साधारण घटना नहीं है या तो यह मंदिर की सुरक्षा में बहुत बड़ी चूक है। या फिर स्वयं प्रभु की कोई लीला पता लगाइए। आज रात मंदिर की सुरक्षा दोगुनी कर दी जाए। एक परिंदा भी पर ना मार पाए। एक छोटी साफ सुथरी झोपड़ी। तुलसी के पौधे के पास मिट्टी के चूल्हे पर एक मिट्टी की हांडी छरी है। कर्माबाई जिनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियों से ज्यादा ममता और भोलापन है। बाजरे की खिचड़ी बना रही हैं। उनकी हर हरकत में एक लय है। एक प्रेम है। एक साधु ज्ञानानंद। वहां से गुजरते हुए रुकते हैं।

 देवी तुम यह क्या कर रही हो? कर्माबाई मुस्कुरा कर उनकी ओर देखती है। प्रणाम महात्मा अपने लाला के लिए भोग बना रही हूं। उसे मेरी खिचड़ी बहुत पसंद है। लाला और तुमने अभी तक स्नान भी नहीं किया। बिना स्नान किए भगवान का भोग ये तो घोर पाप है। शास्त्र इसके विरुद्ध है। कर्माबाई का चेहरा थोड़ा उतर जाता है। उनकी आंखों में एक बच्चे जैसी उलझन है। पर महात्मा मेरा लाला सुबह-सुबह भूखा होता है। मैं स्नान ध्यान में लगूंगी तो उसे भोग मिलने में देर हो जाएगी। वो बेचैन हो जाता है। मूर्ख स्त्री भक्ति का अर्थ अनुशासन है। नियम पहले आते हैं। भावना बाद में। भगवान को तुम्हारी मैली खिचड़ी नहीं। शुद्ध मन और तन से दिया गया भोग चाहिए। कल से पहले स्नान फिर पूजा और तब भोग बनाना। समझे? कर्माबाई चुपचाप सिर झुका लेती है। साधु ज्ञानानंद संतुष्टि के भाव से आगे बढ़ जाते हैं। तभी एक सात आठ साल का बालक दौड़ता हुआ आता है। उसकी आंखें नटखट हैं और चेहरे पर एक दिव्य चमक मां मां कर्मा भूख लगी है। खिचड़ी बनी? हां मेरे बच्चे। बस बन गई।

 बैठ अभी परोसती हूं। वह बालक को खिचड़ी परोसती है। बालक बड़े चाव से खाता है। मां आज स्वाद थोड़ा अलग है। तुम्हारी आंखों में चिंता क्यों है? कुछ नहीं बेटा। तू बस पेट भर के खा। कल से थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा तुझे। बालक कुछ नहीं कहता। बस एक रहस्यमई मुस्कान के साथ कर्मा को देखता रहता है। राजा गजपति स्वयं राजेंद्र पुजारी के साथ गर्भगृह में मौजूद हैं। कड़ी सुरक्षा के बावजूद आज भी वही नजारा है। भगवान की मूर्ति पर खिचड़ी के ताजे दाग हैं। यह कैसे हो सकता है? मेरी पूरी सेना मेरे सबसे भरोसेमंद लोग पहरे पर थे। महाराज ये किसी इंसान का काम नहीं है। यह स्वयं प्रभु की इच्छा है। हे प्रभु जगन्नाथ यह क्या लीला है? हमें मार्ग दिखाएं। कौन है वह भाग्यशाली भक्त जिसका भोग आप सारे नियमों को तोड़कर स्वीकार कर रहे हैं। राजा को क्या पता था कि जवाब एक साधारण सी कुटिया में छिपा है। जवाब छिपा था उस सवाल में जो सालों पहले राजस्थान के एक छोटे से गांव में भी पूछा गया था। क्या आपने कभी भगवान को रोते देखा है? अगर आपकी आंखें भी नम हो गई हैं तो वीडियो को अभी लाइक करके कमेंट में सिर्फ जय जगन्नाथ मत लिखिए बल्कि अपनी भावनाएं, अपनी प्रार्थना या जो भी कहना चाहें जगन्नाथ जी के चरणों में अपनी अर्जी रखिए।

 देख बेटी कर्मा हम पुष्कर जा रहे हैं। चार-प दिन लगेंगे। घर का और ठाकुर जी का ध्यान रखना। आप चिंता मत करो बाबू। मैं सब संभाल लूंगी। और हां सबसे जरूरी बात ठाकुर जी को भोग लगाए बिना तू भी अन्न का दाना मुंह में मत डालना। जी बापू, मैं रोज अपने हाथों से भोग बनाऊंगी। माता-पिता चले जाते हैं। कर्मा अगले दिन सुबह उठकर बाजरे की खिचड़ी बनाती है। एक कांसे की थाली में खिचड़ी, ऊपर से ढेर सारा घी और गुड़ डालकर वह उसे भगवान कृष्ण की छोटी सी मूर्ति के सामने रखती है। प्रभु भोग तैयार है। मैं जरा गाय को चारा डालकर आती हूं। आप खा लेना। भूख लगी होगी आपको। वह काम करके लौटती है। थाली वैसी की वैसी रखी है। अरे आपने खाया नहीं। क्यों? क्या खिचड़ी अच्छी नहीं बनी या गुड़ कम रह गया? वह थाली में और गुड़ मिलाती है। फिर इंतजार करती है। कुछ नहीं होता।

शाम हो जाती है। कर्मा को अब भूख भी लग रही है। उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। प्रभु आप ऐसे क्यों कर रहे हैं? आप नहीं खाएंगे तो मैं भी नहीं खाऊंगी। मैं भूखी मर जाऊंगी। बापू ने कहा था आपके बाद ही खाना है। खा लीजिए ना। उसका भोलापन, उसका हठ और उसके आंसू गर्भ गृह में पत्थर की मूर्ति को भी पिघला देते हैं। एक दिव्य प्रकाश फैलता है। मूर्ति से स्वयं भगवान श्री कृष्ण एक बालक के रूप में प्रकट होते हैं। कर्मा उन्हें देखकर डरती नहीं। बस मुस्कुराती है जैसे उसे पता था कि वो आएंगे। रोती क्यों है कर्मा? बस पर्दा लगा दो। मैं चुपचाप भोग लगा लूंगा। अरे इतनी सी बात थी। पहले कह देते ना प्रभु ना आप भूखे रहते ना मैं उपवास करती। कर्मा अपनी ओढ़नी से पर्दा करके उन्हें अपने हाथ से खिचड़ी खिलाती है। भगवान पूरी थाली साफ कर देते हैं। राजा गजपति गहरी नींद में हैं।

 उन्हें एक स्वप्न आता है। स्वप्न में भगवान जगन्नाथ स्वयं उनके सामने खड़े हैं। पर उनका चेहरा उतरा हुआ है। प्रभु आपने दर्शन दिए। मैं धन्य हो गया। पर आप चिंतित क्यों हैं? मुझसे कोई भूल हुई? राजा तुम्हारी व्यवस्था बहुत अच्छी है। पर एक समस्या हो गई है। आज्ञा दें प्रभु। पूरी में मेरी एक मां रहती है। कर्मा। वो रोज सुबह मुझे बड़े प्यार से खिचड़ी खिलाती है। मुझे उसके हाथ की खिचड़ी खाए बिना चैन नहीं मिलता। राजा हैरान है। पर किसी ज्ञानी ने उसे पूजा पाठ के चक्कर में उलझा दिया है। अब वो स्नान ध्यान करके भोग बनाती है। भूख के मारे मेरा बुरा हाल हो जाता है। जब तक भोग मिलता है तुम्हारे मंदिर का समय हो जाता है। तो मुझे जल्दी-जल्दी खाकर हाथ मुंह पोंछ कर यहां आना पड़ता है। इसीलिए मेरे मुख पर दाग रह जाते हैं। राजा गजपति की नींद टूट जाती है। वे पसीने से भीगे हुए हैं। उनके चेहरे पर आश्चर्य और भक्ति का मिलाजुला भाव है। कर्मा मां कर्मा राजा के सैनिक और मंत्री पूरे पूरी में कर्मा नाम की महिला को ढूंढ रहे हैं। वे कर्माबाई की कुटिया तक पहुंचते हैं। राजा और राजेंद्र पुजारी भी वहां आते हैं। वे देखते हैं कि कर्माबाई स्नान करके गीले बालों में जल्दी-जल्दी भोग बना रही हैं।

 वहीं नटखट बालक बाहर बैठा इंतजार कर रहा है। मां जल्दी करो ना। बहुत जोर की भूख लगी है। राजा और राजेंद्र जी एक दूसरे को देखते हैं। वे समझ जाते हैं यह साधारण बालक नहीं है। तभी साधु ज्ञानानंद भी वहां आ जाते हैं। महाराज आप यहां इस अज्ञानी स्त्री की कुटिया में महात्मा जिसे आप अज्ञानी कह रहे हैं। वो स्वयं भगवान जगन्नाथ की मां है। आपके थोपे हुए नियमों के कारण भगवान को भूखा रहना पड़ रहा है। ज्ञानानंद का चेहरा शर्म से झुक जाता है। उसे अपनी भूल का एहसास होता है। वह दौड़कर कर्माबाई के पैरों में गिर पड़ता है। मुझे क्षमा कर दो मां। मैं शास्त्रों का ज्ञान तो पा गया पर प्रेम का मर्म ना समझ सका। आपकी भक्ति ही सच्चा शास्त्र है। आप जैसे पहले करती थी वैसे ही अपने लाला को भोग लगाए। कर्माबाई उसे उठाती है। उनकी आंखों में कोई गुस्सा नहीं सिर्फ ममता है। महात्मा आप सही थे। पर मेरा लाला वो बच्चा है। वो नियम नहीं सिर्फ मां का प्यार समझता है। राजा गजपति और राजेंद्र पुजारी हाथ जोड़कर यह सब देख रहे हैं। उनकी आंखें नम है। कर्मा के माता-पिता तीर्थ से लौटते हैं। मां देखती है कि गुड़ का मटका लगभग खाली है। कर्मा, इतना सारा गुड़ कहां गया? मां ठाकुर जी रोज खिचड़ी खाते हैं ना तो उन्हें गुड़ ज्यादा पसंद है। मैं रोज डाल देती थी।

पिता जीवन राम को विश्वास नहीं होता। उन्हें लगता है बेटी झूठ बोल रही है। हमसे झूठ बोलती है? तूने ही खाया होगा सब। नहीं बापू आपको यकीन नहीं तो कल खुद देख लेना। अगले दिन कर्मा फिर खिचड़ी बनाती है। माता-पिता छिप कर देखते हैं। कर्मा थाली रखती है। ओढ़नी का पर्दा करती है और प्रार्थना करती है। वे अपनी आंखों से देखते हैं कि थाली में से खिचड़ी धीरे-धीरे गायब हो रही है। उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। वे दौड़कर अपनी बेटी के पैरों में गिर पड़ते हैं। बेटी हमें माफ कर दे। हम तुझे पहचान ना सके। तू तू साक्षात भक्ति का रूप है। समय बीत गया है। कर्माबाई अब बहुत वृद्ध और कमजोर हो गई है। वह अपनी चारपाई पर लेटी हैं। उनकी सांसे धीमी चल रही हैं। वही बालक जो अब भी उतना ही बड़ा है। उनका हाथ पकड़ कर उनके पास बैठा है। लाला अब मुझसे उठा नहीं जाता।

आज खिचड़ी कैसे बनाऊंगी। तू भूखा रह जाएगा। तुम चिंता मत करो मां। तुमने मुझे जीवन भर खिलाया। आज मैं तुम्हें अपने साथ ले जाने आया हूं। जहां तुम्हें मेरे लिए कुछ बनाना नहीं पड़ेगा। कर्माबाई मुस्कुराती हैं और शांति से अपनी आंखें बंद कर लेती हैं। उनकी आत्मा शरीर छोड़ देती है। मंदिर में कोहराम मचा है। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति की आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बह रही है। पत्थर की मूर्ति रो रही है। राजा गजपति और राजेंद्र पुजारी भागे-भागे आते हैं। वे यह दृश्य देखकर कांप उठते हैं। हे प्रभु यह क्या हो रहा है? हमसे क्या अपराध हुआ? राजा गजपति समझ जाते हैं। वे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। रात को राजा को फिर स्वप्न आता है। भगवान जगन्नाथ एक छोटे बच्चे की तरह सुबक-सुबक कर रो रहे हैं। राजा मेरी मां चली गई। मेरी कर्मा मां मुझे छोड़कर चली गई। अब मुझे सुबह-सुबह प्यार से खिचड़ी कौन खिलाएगा? अब मैं किसका इंतजार करूंगा? राजा की नींद खुलती है। उनकी आंखों से भी आंसू बह रहे हैं। लेकिन यह एकमात्र मां नहीं थी। ऐसी और भी कहानियां हैं।

 जहां भक्ति ने भगवान को विवश कर दिया। राजा गजपति ने सभी पुजारियों और पूरे राज्य के लोगों को इकट्ठा किया है। उनका चेहरा दृढ़, निश्चय और गहरी भावना से भरा हुआ है। आज से और इस सृष्टि के अंत तक भगवान श्री जगन्नाथ को अर्पित होने वाले छप्पन भोग से भी पहले सबसे पहला भोग मेरी मां भगवान की मां कर्माबाई के नाम से बाजरे की खिचड़ी का लगाया जाएगा। ताकि मेरे प्रभु को कभी यह ना लगे कि उनकी मां उन्हें छोड़कर चली गई है। उनकी मां अब यहीं है हम सबके दिलों में और इस मंदिर की परंपरा में हमेशा के लिए। और इस तरह एक साधारण किसान की बेटी अपने निश्चल प्रेम और भक्ति से जगन्नाथ की मां बन गई। आज भी जगन्नाथ पूरी में हर सुबह दुनिया के सबसे शक्तिशाली भगवान अपनी मां के हाथ की खिचड़ी के लिए एक बच्चे की तरह इंतजार करते हैं।

अब देखते हैं आप में से किसने इस कहानी को ध्यान से देखा है? एक सवाल है आपके लिए उत्तर दे। हो सकता है कि अगली वीडियो में आपका नाम आ जाए। प्रश्न खरमाबाई पहली बार भगवान को कौन सी चीज का भोग लगाती है? ए दूध और केला, बी बाजरे की खिचड़ी, सी पूरी सब्जी। डी, दूध चावल। सही उत्तर कमेंट में लिखें। अगर आपकी आंखों में भी आंसू आ गए तो आप भी जगन्नाथ के भक्त हैं जो इस कलयुग के सबसे जागृत देवता है।

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