बहुत पुरानी बात है। धौलपुर नामक गांव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम सुखीलाल था। वो बहुत धनवान था। उसका आलीशान घर और संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। और दूसरे का भोलाराम जो बहुत गरीब था उसे दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती थी। फिर भी भोाराम दयालु और नेक दिल था। वो रूखी-सूखी रोटी खाकर ईश्वर का धन्यवाद करता और मेहमानों का अपना हैसियत से स्वागत करता। सुखीलाल इसके विपरीत कंजूस और घमंडी था। उसे मेहमान और गरीब रिश्तेदार बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। वो गरीबों को तुष्ट समझता था और अपनी दौलत पर इतराता था। सुखीलाल की हवेली के चौड़े दरवाजे चमक रहे हैं। सामने उसका आंगन साफ सुथरी हवेली। वहीं कुछ दूरी पर भोलाराम का छोटा सा झोपड़ा, मिट्टी के बर्तन और एक तंग सा चूल्हा था। एक दिन एक बूढ़ी औरत गांव में आती है। बूढ़ी औरत की चाल थकी हुई पर आंखों में रोशनी थी। सुखीलाल के आलीशान घर का दरवाजा खटखटाती है। बेटा मैं बहुत लंबे रास्ते से आई हूं। बहुत थक आई हूं। क्या मुझे एक रात का आसरा और थोड़ा सा खाना मिल सकता है क्या? मेरे पास कुछ भी नहीं है। बस तुम्हारी दया की उम्मीद है बेटा। मदद करो बेटा। अरे बुढ़िया क्या तूने मेरी हवेली को कोई धर्मशाला समझ लिया है क्या? मुंह उठा के दरवाजा खटखटा दिया। अरे तुम जैसे गंदे कपड़े वाले यहां नहीं रुक सकते। मेरे पास तुम्हारी तरह भीखमंगों के लिए समय और जगह नहीं है। मेरी बात कान खोल के बुढ़िया सामने जो टूटा फूटा घर दिख रहा है ना वहां मेरा दोस्त भोलाराम रहता है। वो तुम जैसे गरीबों का स्वागत करता है। उसी के पास जाओ। चले आते हैं मुंह उठाकर किसी का भी दरवाजा खटखटाने। बूढ़ी औरत के चेहरे पर एक क्षण के लिए दुख और क्रोध भाव आया। उसने धीरे से सिर झुका लिया और बोली ठीक है बेटा मैं तुम्हारी बात मानती हूं शायद भोलाराम के पास मेरे लिए जगह हो धन्यवाद बेटा धन्यवाद वो चुपचाप पलटी और अपने थके हुए कदमों से धीरे-धीरे भोलाराम के घर की ओर बढ़ी भोाराम का टूटा फूटा घर खपैल की छत टूटी दीवारें बूढ़ी औरत ने दरवाजा खटखटाया। इसके बाद अंदर से भोलाराम हंसते हुए बाहर आया। अरे माता जी नमस्ते। नमस्ते। आप कैसे आई? अरे बाप रे बाहर बहुत धूप है। एक काम करिए आप पहले अंदर आइए। अंदर आइए। धूप में काहे खड़े हैं? आइए ना। बेटा मेरी बात सुनो। मैं बहुत थकी हुई हूं। लंबा रास्ता तय करके आई हूं। बस एक रात के लिए आसरा चाहिए बेटा। अरे माता जी यह तो आपका अपना ही घर है। पहले अंदर आइए। बैठ के पानी पीजिए। थोड़ा सांस लीजिए। बहुत थकी हुई हैं। फिर बाकी की बात बाद में करेंगे। आइए। रात का दृश्य। लालटेन टिमटिमा रही थी। भोलाराम ने अपने हिस्से की सूखी रोटी और पानी उनकी थाली में परोसा। माता जी हमारे पास यही है लेकिन दिल से दे रहे हैं। इसीलिए अब बिना संकोच रहिए। बेटा तुम्हारे पास तो खुद इतना कम है। फिर भी मुझे अपने हिस्से का खाना दे रहे हो। यह मैं कैसे ले लूं बेटा? माता जी मेहमान तो भगवान का रूप होता है। अब हमारे पास भले ही खाना कम हो लेकिन आपका स्वागत करने का मौका मिला। यही हमारे लिए अनमोल है। आप तो खाइए मन हल्का होगा। थक गई होगी ना? खाइए खाइए। बुढ़िया की आंखों में आंसू आ जाते हैं। बेटा तुम्हारा दिल सोने से भी कीमती है। मैंने बहुत से घर देखे लेकिन तुम जैसा स्वागत कहीं नहीं मिला। आनंद आ गया। हां अब अच्छा लग रहा है। अच्छे तो देखो बेटा भोलाराम। तुमने मेरे साथ इतना प्यार दिखाया। मैं इस गांव में एक जरूरी काम से आई हूं। माता जी हम आपकी बात का मतलब नहीं समझे। मतलब आप कौन हैं और यह कौन से काम की बात कर रहे हैं आप? बेटा मैं कोई साधारण औरत नहीं हूं। 50 साल पहले मैं इसी गांव में रहती थी। मेरे पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। सोने के सिक्के, कीमती जवाहरात सब कुछ था मेरे पास। मेरा एक भरा पूरा परिवार था। मेरे पति और दो-दो बच्चे थे। अच्छा। फिर क्या हुआ माता जी? आप यहां इतने सालों बाद क्यों लौटे भला? हां, एक दिन की बात है। मेरे पति और मेरे बच्चे बस से दूसरे गांव जा रहे थे। बस पलट गई और मैं उन्हें बचा ना सकी। मैं उस दिन उनके साथ नहीं थी बेटा। इसीलिए मैं बच गई। लेकिन वो हमेशा हमेशा के लिए मुझे छोड़कर चले गए। लेकिन उस दुख ने मुझे तोड़ दिया। मैंने दुनिया से नाता तोड़ लिया और यात्रा पर निकलने का फैसला किया। भोलाराम की आंखें नम हो आई। उसने धीरे से एक गहरी सांस ली। आसपास का माहौल भी जैसे थम गया हो। फिर मैंने अपनी सारी दौलत को पास के एक जंगल में एक गुप्त जगह पर छुपा दी। सिर्फ एक सोने के कुछ जवाहरात अपने पास रखी ताकि उसे बेचकर यात्रा का खर्चा उठा सकूं। लेकिन जब मैंने एक सुनार को वो कीमती जवाहरात बेचना चाहे तो उसने लालच में आकर मुझ पर ही चोरी का इल्जाम लगा दिया और मुझे जेल में डलवा दिया। ओह माताजी यह तो बड़ा भयानक हादसा हुआ। फिर क्या किया आपने? आपकी बात क्या किसी ने ना सुनी? नहीं बेटा, कोतवाल ने सुनार की बात मानी और मुझे जेल में डाल दिया। कई सालों तक मैं जेल में रही। अब सजा पूरी करके मैं अपने गांव लौटी हूं और मैं अब उस छुपाए हुए खजाने को निकालना चाहती हूं। तो आप चाहती हैं कि हम उसमें आपकी मदद करें। हां बेटा अगर तुम मेरे साथ जंगल चलो और खजाना निकालने में मदद करो तो मैं उसका आधा हिस्सा तुमको दे दूंगी। माता जी देखिए मुझे धन का लालच नहीं है लेकिन आपकी मदद करना मेरा धर्म है तो मैं आपके साथ जरूर चलूंगा। हां हां तुम्हारा दिल सच्चा है भोलाराम। तुम जैसे लोग इस दुनिया में बहुत ही कम हैं। ठीक है। कल सुबह हम जंगल चलेंगे। माता जी आज रात यहीं रुकिए। सुबह भोलाराम आपके साथ जाएगा। हमारी झोपड़ी छोटी है लेकिन आपका स्वागत करने के लिए जगह बहुत है। ठीक है बहू। ठीक है। तुम लोग सचमुच अनमोल हो। चांदनी धीरे-धीरे फीकी पड़ रही थी। और पक्षियों की हल्की चहचहाट सुबह का संदेश ला रही थी। भोाराम और माताजी सूरज उगने से पहले जंगल की ओर निकल पड़े। माताजी यह जंगल तो बहुत बड़ा है। आपने खजाना कहां छुपाया? धैर्य रख बेटा धैर्य। हां वो देख वो वो पुराना बरगद का पेड़। उसी के पास एक गुप्त जगह है। मैंने सारी दौलत वहीं दबाई थी। अरे इतने सालों के बाद भी आपको सही जगह याद है? बेटा जब जिंदगी का हर पल उसी खजाने की याद में बीते तो भूल कैसे सकती हूं मैं। मेरे लिए यह सिर्फ धन नहीं। मेरे परिवार की आखिरी निशानी है। हां माता जी। मैं आपका दुख समझ सकता हूं। खैर चलिए माता जी जल्दी से उस जगह को ढूंढते हैं। चलिए दोनों बरगद के पेड़ के पास पहुंचे। पेड़ की विशाल जड़े और मोटी डालियां पूरे इलाके में फैली थी। माताजी ने हाथ से जमीन पर एक छोटा सा गड्ढा दिखाया। हां, यहीं है। यहीं खोदो भोलाराम। थोड़ा नीचे संदूक मिलेगा। अच्छे से खोदो। हां, ठीक है माता जी। मैं अभी शुरू करता हूं। हां बेटा, यह मेरी जिंदगी भर की कमाई है। इसमें मेरे परिवार की यादें हैं। बेटा, इसका आधा हिस्सा अब तुम्हारा है। माता जी, देखिए मुझे इतना धन नहीं चाहिए। हमारे परिवार के लिए दो वक्त की रोटी और थोड़ा सा सुख बस इतना ही काफी है। बाकी सब आप रख लीजिए। बूढ़ी की आंखों में चमक थी। वो धीरे मुस्कुराई और बोली बेटा भोलाराम तुम्हारा दिल सोने से भी ज्यादा कीमती है। फिर भी कुछ सिक्के रख लो अपने परिवार के लिए। ठीक है माता जी। आप इतना कह रही हैं तो मैं थोड़ा सा लूंगा लेकिन बाकी आपका है। मैं इसे आपके लिए संभाल लूंगा बस। भोलाराम ने फावड़े से जमीन में हल्का सा खोदकर कुछ मोहरे अपने बैग में रख लिए। माताजी ने उनकी आंखों में संतोष देखा और धीरे से कहा, माताजी चिंता मत कीजिए। आपके परिवार की यादें और यह खजाना दोनों सुरक्षित रहेंगे। लालच नहीं आने दूंगा। अब हम इसे सुरक्षित गांव ले जाएंगे। बूढ़ी की ने हाथ में बैग लिया और दोनों धीरे-धीरे जंगल से बाहर निकलने लगे। गांव में पहुंचते ही भोलाराम की पत्नी ने उसे देखा और आश्चर्य से बोली अरे यह क्या लाए हो इतना सोना यह कहां से मिला आपको? अरे भाग्यवान यह पूरा का पूरा माताजी का खजाना है। मैंने तो बस थोड़ा सा लिया है। वह भी माताजी ने कहा इसीलिए बाकी माताजी का है। बहू यह खजाना मेरे ज्यादा काम का नहीं। मैं इसे गरीबों में बांटना चाहती हूं। भोाराम तुम इसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने में मेरी मदद करो। माता जी आप सचमुच महान है। हम आपकी बात मानेंगे। अगली सुबह बूढ़ी औरत चुपके से गांव छोड़ गई। लेकिन उसने भोलाराम से वादा लिया कि वो खजाने का सही इस्तेमाल करेगा। भोलाराम का घर पुरानी मिट्टी का था। दीवारें झुर्रीदार लेकिन अब उसके हाथ में थोड़े सिक्के हैं और दिल में नेक इरादे। भोलाराम ने छोटा व्यापार शुरू किया। उसके मेहनत और ईमानदारी से व्यापार धीरे-धीरे फैलने लगा। भोाराम तुम्हारी मेहनत और माता जी का आशीर्वाद रंग लाया। अब हमारे घर में सुख शांति है। हां सही कहा भाग्यवान। यह सब ईश्वर की कृपा और माता जी की दया से हुआ है। अब मैं इस ढंग से गांव वालों की मदद करूंगा। भोाराम अब पूरे गांव में लोगों की मदद कर रहा है। वो गरीबों को अनाज बांटता है। बीमारों की देखभाल करता है और बच्चों के लिए एक छोटा स्कूल खुलवाया। भैया भोलाराम जैसा नेक इंसान तो इस गांव में कोई है ही नहीं। उस सबके लिए कुछ ना कुछ करता है। गजब आदमी है वह। हां, पहले भोलाराम के पास कुछ नहीं था। फिर भी उसने हमें खाली हाथ कभी नहीं लौटाया। अब वो हमारा भगवान है। अरे भगवान तो बस एक ही है। ऊपर वाले सबका मालिक एक है। और मैं तो देखो भाई अपना फर्ज निभा रहा हूं। अगर मेरे पास है तो दूसरों को बांटना मेरा धर्म है। भोाराम ने अपने टूटे फूटे मकान को तोड़कर एक सुंदर घर बनवाया। अब वह मेहमानों का पहले से ज्यादा आदर करने लगा है। कभी-कभी असली दौलत सोने और जवाहरात में नहीं होती। असली दौलत होती है इंसानियत, नेक दिल और दूसरों की मदद करने का साहस। भोलाराम ने दिखा दिया कि सच्चे दिल का सोना ही सबसे कीमती होता है। भोलाराम की तरक्की की खबर अब सुखीलाल तक पहुंची थी। वो अपनी पत्नी के साथ भोलाराम के नए घर में बहुत गुस्सा आता है। ए भोलाराम यह तेरा नया घर इतने सारे नौकर चाकर इतना सामान इतना पूरे गांव में सम्मान यह बता तू इतना अमीर कैसे हो गया? पहले तो तेरे पास एक रोटी भी मुश्किल से थी। भैया सब ईश्वर की कृपा है। मेहनत और दया से जो भी मिलता है वही मेरे पास है। चाहे जितना अमीर हो जाओ भोलाराम हमारी बराबरी नहीं कर सकता। हमारा घर हमारी दौलत इस गांव में सबसे बड़ी है। तुम तो बस एक गरीब थे। अरे तुम्हें क्या लगता है? हम कम हैं। हमारे पास तो अभी और भी खजाना है। उसे निकालकर हम तुमसे कहीं ज्यादा अमीर हो जाएंगे। तुम ये किस खजाने की बात कर रही हो? अरे कुछ नहीं कुछ नहीं। यह तो बस ऐसे ही बोल रही है कुछ भी। अरे तुम लोग इतनी जल्दी और अचानक से इतने अमीर कैसे हो गए? अरे दोस्त, आप गलत सोच रहे हो। यह जो भी कुछ आज हमारे पास है सब भगवान की देन है। भोाराम उस वक्त बात को संभाल लेता है और सेठ और उसकी पत्नी घर से चले जाते हैं। सुनिए भोलाराम ने जंगल से कोई खजाना निकाला है। उसकी पत्नी कह रही थी कि जंगल में और भी खजाना है। हमें वह ढूंढना होगा। वरना भोलाराम हमसे आगे निकल जाएगा। सुखीलाल का घमंड और लालच अब चरम पर था। भोलाराम के नए घर की खबर ने उसके मन में जलन की आग भड़का दी। उसका आत्मसम्मान चोटिल हुआ और वो यह सोचने लगा कि किसी भी तरह भोलाराम को पीछे छोड़ना है। अरे जरूर उस बूढ़ी औरत ने भोलाराम को बताया होगा जिसे मैंने अपने घर से भगाया था। मैं किसी भी तरह से उस खजाने को ढूंढ निकालूंगा। भोाराम मुझसे ज्यादा अमीर हो ही नहीं सकता। और इसी लालच ने सुखीलाल को भोलाराम की हरकतों पर नजर रखने के लिए मजबूर कर दिया। अब वो हर समय उसकी झोपड़ी और आसपास की गतिविधियों पर नजर रखने लगा। उसकी निगाहें हर कदम पर तैनात थी। जैसे कोई शिकारी शिकार का पीछा कर रहा हो। गांव की गलियां, दिन का समय लेकिन भाग्य ने फिर एक नई करवट ली। कुछ दिनों बाद वही बूढ़ी औरत गांव में लौटी। सुखीलाल ने उसे देखते ही छिपकर उसका पीछा करना शुरू कर दिया। उसकी निगाहें ताजा हो गई और लालच के साथ उत्सुकता भी बढ़ गई। बूढ़ी औरत ने बिना किसी डर के सीधे भोलाराम के घर की ओर कदम बढ़ाए। माता जी आप फिर आ गए। देखिए आपकी कृपा से मेरा घर अब सजा हुआ है। आप देखिए तो सही। अच्छा आइए आइए अंदर आइए अंदर आइए। बेटा मैं ज्यादा देर नहीं रुकूंगी। बस एक जरूरी बात बताने आई थी। मेरे साथ जंगल चलो। माता जी आप कहें तो मैं अभी चलूं। लेकिन माता जी बात क्या है? बेटा मैं शायद अब इस गांव में दोबारा ना आ सकूं। जंगल में एक और खजाना दबा है। मेरे जाने के बाद उसे निकाल लेना और सुरक्षित रखना। समय आने पर मैं तुमसे ले लूंगी। माता जी आपका खजाना मैं आपके लिए ही संभालूंगा। आप निश्चिंत रहिए। मैं अभी आपके साथ चलता हूं। चलिए। दोनों जंगल की ओर बढ़े। घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच सूरज की हल्की किरणें जमीन पर बिखरी थी। सुखीलाल छिप कर उनका पीछा कर रहा था। उसकी आंखों में लालच साफ दिख रहा था। माता जी आप तो निश्चिंत रहिए। मैं इसे सुरक्षित रखूंगा। लेकिन आप यह बताइए कि आप जा कहां रहे हैं? बेटा अब मेरा समय पूरा हो रहा है। मैं यात्रा पर जा रही हूं और शायद अब ना लौटूं। तुम्हारा दिल साफ है इसीलिए तुम्हें यह जिम्मेदारी दे रहा हूं। माता जी आपने हमको इतना कुछ दिया है। हम आपका एहसान कैसे चुकाएंगे? बस अपनी दयालुता और ईमानदारी को बनाए रखना। यही मेरा इनाम है। जंगल की खामोशी में यह पल दोनों के लिए एक नए भरोसे और जिम्मेदारी का प्रतीक बन गया। भोलाराम ने ना केवल खजाने को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया बल्कि अपने दिल में माताजी की सीख को भी गहरे उतार लिया। सुखीलाल की आंखों में लालच और अहंकार का मेल साफ झलक रहा था। उसने माताजी और भोाराम की सारी बातें सुन ली और खजाने की जगह अपने मन में उतार ली। अब उसकी नजरें केवल उस खजाने पर टिक गई थी। सुखीलाल का घर, शाम का समय। सुनती हो? अरे मुझे खजाने का सारा भेद पता चल गया। अब वो दूसरा खजाना मेरा होगा। भोलाराम को कुछ ना मिलेगा। सचमुच अब हम इस गांव में सबसे अमीर होंगे। भोलाराम और उसकी पत्नी को उनकी औकात दिखा देंगे। लेकिन इसी लालच में सुखीलाल की सोच में जल्दबाजी और मूर्खता भी जुड़ गई। उसने नहीं सोचा कि भोलाराम की सादगी और चालाकी उसके सभी प्रयासों को मात दे सकती है। एक दिन भोलेराम की पत्नी कुएं से पानी भर रही होती है। तभी वहां सुखीलाल की पत्नी आ जाती है और जलन में बोलने लगती है। इस गांव में सबसे ज्यादा अमीर हम ही रहेंगे क्योंकि मेरे पति को भी जंगल में मौजूद एक खजाना मिल गया है जिसे निकाल कर हम लोग एक बार फिर से तुम लोगों से आगे निकल जाएंगे। इतना कहकर वह इतराती हुई अपने घर वापस चली गई। लेकिन उसकी यह घमंडी चाल भोलाराम तक पहुंच गई। अरे सुनिए आपकी भाभी कह रही थी कि सुखीलाल को जंगल में खजाने की जगह पता है। वो उसे निकालकर हमसे ज्यादा अमीर होने की बात कह रही थी। यह कैसे हुआ? ओ शायद सुखीलाल ने मुझे और माताजी को जंगल में देख लिया। मेरी गलती है। मैंने गुस्से में खजाने की बात कह दी थी। मुझे माफ कर दीजिए। ओहो। मैंने तुमसे पहले ही कहा था ना भाग्यवान कि खजाने की बात किसी से ना करना है। जल्दी करना होगा। और ऐसे ही जंगल और खजाने की सच्चाई अब भोलाराम के हाथ में थी। जबकि सुखीलाल की लालच और अहंकार उसे धोखे में डाल रहे थे। अब भोलाराम की चालाकी और ईमानदारी ही इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी। आज रात ही वह खजाना निकाल लाऊंगा मैं। वरना सुखीलाल उसे हथिया लेंगे। आप सही कह रहे हो लेकिन सावधान रहना कहीं कोई देख ना ले। भोलाराम का मन अब पूरी तरह निर्णय कर चुका था। रात के अंधेरे को उसने अपने साथी की तरह चुना और कदम बढ़ा दिए उस जंगल की ओर जहां रहस्य और लालच दोनों दबे हुए थे। पेड़ के नीचे मिट्टी को हटाते हुए भोलाराम की सांसे तेज हो गई। हर वार के साथ उसकी उम्मीद गहरी होती जा रही थी और आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई। भोलाराम खजाने को निकालकर अपने घर की तरफ निकल जाता है। अब यह खजाना माताजी के लौटने तक सुरक्षित रहेगा। किसी को भी इसकी भनक बिल्कुल नहीं लगनी चाहिए। सुन रही हो ना? मैं अब किसी से कुछ नहीं कहूंगी। तुमने जो कहा वही करूंगी। भोाराम ने खजाने को अपने घर के भीतर सुरक्षित जगह पर छिपा दिया। उसका दिल साफ था और नियत भी नेक। लेकिन लालच की आग में जल रहा सुखीलाल अब भी अंधेरे रास्तों पर भटक रहा था। अगली रात सुखीलाल जंगल में हाथ में फावड़ा और पसीने से तर-बतर। अरे यह क्या? वो खजाना यहां नहीं है। इसका मतलब भोलाराम मुझसे पहले आया था। ओह वो बहुत चालाक निकला। भोलाराम। लालच ने सुखीलाल की आंखों पर पर्दा डाल दिया था। उसने यह सोचा ही नहीं कि किस्मत मेहनत करने वाले और सच्चे दिल वालों का साथ देती है ना कि धोखे और लालच में डूबे इंसानों का। और जब सुखीलाल अंधेरे जंगल में मिट्टी खोद रहा था उसी समय उसके घर पर आग लग जाती है। उसकी सालों की कमाई, कीमती सामान और दौलत सब कुछ जलकर राख हो जाता है। अब घर में सिर्फ सन्नाटा और पछतावे की गूंज रह गई थी। आप कहां थे? हमारे घर में आग लग गई। हम तो बर्बाद हो गए। सब कुछ लूट गया। अब हमारे पास कुछ भी नहीं बचा। मैंने खजाना ढूंढने की बहुत कोशिश की। लेकिन भोलाराम वहां मुझसे पहले ही पहुंच गया और अब हमारा अपना भी धन चला गया। हमारा सब कुछ लुट गया। घर भी जल गया। ना खजाना मिला ना घर। हम बर्बाद हो गए। अरे रे ये सब तुम्हारे लालच की वजह से हुआ है। मैंने गलती की। मुझे उससे जलन नहीं करनी चाहिए थी। अब हम बर्बाद हो गए। अरे तुमने भोलाराम से जलन ना की होती ना तो आज हमें यह दिन ना देखना पड़ता। लालच और जलन ने सुखीलाल को कंगाल बना दिया। जो धन उसने जिंदगी भर बचा कर रखा था, वह एक ही रात में खत्म हो गया। अब उसे समझ आया कि दयालुता ही असली दौलत है ना कि सोने चांदी के ढेर। समय बीता और फिर वही बूढ़ी औरत गांव लौटी। गांव वाले उसके आने से चौंक उठे। लेकिन भोलाराम के घर में उसका स्वागत पहले जैसा ही हुआ। यह देखिए। मैंने आपका खजाना सुरक्षित रखा है। मेरा दोस्त इसे हथियाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मैंने इसे बचा लिया। बेटा भोलाराम। तुमने मेरे भरोसे को सही साबित किया। अब यह खजाना तुम्हारा है। मैं इस उम्र में भला इसका क्या करूंगी? माता जी, एक बात कहूं। मेरा दिल कहता है कि अब आप कहीं मत जाइए। हमारे साथ ही रहिए। हमें आपका आशीर्वाद चाहिए। मुझे आप में अपनी माता दिखती हैं। क्या क्या आप मुझे अपना बेटा मानकर हमारे साथ नहीं रह सकती? बेटा, तुमने मुझे वो सम्मान और प्यार दिया है जो मेरे अपने परिवार ने भी नहीं दिया था। ठीक है। ठीक है। मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। माता जी आप हमारे घर की शान हैं। अब यह घर आपका भी है। उस पल से बूढ़ी औरत ने अकेलापन छोड़ दिया। वो अब भोलाराम और उसकी पत्नी के साथ परिवार का सुख पाने लगी। भोलाराम ने खजाने को गरीबों और जरूरतमंदों में बांट दिया। उसके हाथों से बांटे गए अनाज ने भूखों का पेट भरा और उसके दिल से बहता प्रेम सबका सहारा बन गया। गांव का चौपाल लोग इकट्ठे हैं। भोाराम भाई तुमने तो इस गांव का नाम ही रोशन कर दिया। तुम्हारी दयालुता की मिसाल तो हर जगह दी जाती है। भोाराम भाई तुमने तो इस गांव का नाम ही रोशन कर दिया। तुम्हारी दयालुता की मिसाल तो हर जगह दी जाती है। भोाराम, उसकी पत्नी और बूढ़ी औरत ने मिलकर एक सुखी शांतिमय जीवन बिताया। उनकी दयालुता और ईमानदारी की कहानी एक मिसाल बन गई।
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