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दो बहनों का ससुराल

  एक गांव में नदी किनारे दो बहनें रहती थी। बड़ी बहन कमला का पति कुछ समय से बीमार रह रहा था। इसलिए वो रोज छोटी बहन माया के घर काम करने जाती थी। माया की शादी एक अमीर व्यापारी से हुई थी। वह बहुत कंजूस और लालची थी। सुबह के समय कमला जल्दी-जल्दी अपने घर का काम निपटा के अपनी छोटी बहन माया के घर की ओर निकलती है। अरे दीदी आज फिर तुमको देर हो गई। सुबह-सुबह इतने बड़े घर का काम पड़ा रहता है और तुम आराम से घर में बैठी रहती हो। जल्दी आना चाहिए था। खैर अब आ ही गई हो तो चलो। काम में लग जाओ। माफ करना बहन। मेरा मुन्ना रात भर रोता रहा पेट दर्द से इसलिए देर हो गई। मैं जल्दी-जल्दी सब काम कर दूंगी। ठीक है , चलो। पहले आंगन और बैठक अच्छे से झाड़ पोंछ दो। घर चमकना चाहिए। उसके बाद रसोई में जाकर सारे बर्तन मांझ देना। और हां काम ठीक से होना चाहिए। कमला तुरंत काम पर लग जाती है। सबसे पहले माया के घर का आंगन बैठक और सारे कमरों में झाड़ू पूछा करती है। वह एक-एक कोना साफ करती है। फिर बर्तन मांझने बैठ जाती है। उधर माया आराम से बैठकर चाय पीती है। अच्छा सुनो। सारे काम तो तुमने कर ही दिए हैं। अब यह ध्यान रखा है। इसमे...

घमंडी बिरयानी वाला

  यह कहानी है सुंदरनगर नाम के एक बड़े और व्यस्त शहर की। सुंदरनगर शहर अपनी चमक-धमक और लजीज खाने के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। शहर के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा और पुराना [संगीत] बाजार था। इस बाजार में वैसे तो सैकड़ों दुकानें थी, लेकिन चर्चा सिर्फ दो दुकानों की होती थी। एक थी शहर की सबसे बड़ी और आलीशान दुकान जिसका नाम था गिरधारी की शाही बिरयानी और ठीक उसके सामने सड़क के उस पार एक छोटा सा पुराना सा ठेला लगता था जिसका नाम था राजू की असली बिरयानी। एक तरफ अमीरी और दिखावा था तो दूसरी तरफ गरीबी और सादगी। दोपहर का समय था। गिरधारी अपनी गद्दी पर बैठा नोट गिन रहा था। उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी थी। गिरधारी का ध्यान खाने की गुणवत्ता पर नहीं बल्कि गल्ले में आ रहे पैसों पर था। तभी सेठ गिरधारी अपनी नौकर छोटू से कहा। अरे ओ छोटू। हां जल्दी चला। देख नहीं रहा ग्राहकों की लाइन लगी है। मालिक मैं तो जल्दी ही कर रहा हूं। लेकिन वो पतीले में बिरयानी खत्म होने वाली है और जो अंदर बची है वो कल की है। अरे तो क्या हुआ? तू ग्राहक को मना करेगा क्या? जा अंदर से वो कल वाला पतीला उठा ला। लेकिन मालिक वो कल वाली बिरयानी में से अब थोड़ी महक आने लगी है। अगर किसी ग्राहक को पता चल गया तो हंगामा हो जाएगा। छोटू की यह बात सुनके सेठ गुस्सा हो जाता है। चुप कर बेवकूफ। तू मुझे सिखाएगा कि धंधा कैसे करते हैं। तुझे मैंने नौकरी पर रखा है। सलाह देने के लिए नहीं। जा जल्दी लेकर आ। गिरधारी जानता था कि बासी खाने को ताजा कैसे दिखाना है। वो अपनी दुकान के पिछले हिस्से में गया जहां कोई ग्राहक नहीं देख सकता था। वहां उसने अपनी जेब से एक छोटी सी शीशी निकाली और हंसते हुए बोली। ये दुनिया भी कितनी पागल है। इन्हें स्वाद से कोई मतलब नहीं। इन्हें बस खुशबू चाहिए और खुशबू तो मेरे बाएं हाथ का खेल है। यह है मेरा जादुई मंत्र। सिर्फ दो बूंद और सड़ी हुई बिरयानी भी ऐसी महकेगी जैसे जन्नत का खाना हो। गिरधारी ने उस बासी और खराब हो चुके चावलों पर वो खतरनाक केमिकल छिड़क दिया। देखते ही देखते सड़े हुए खाने से केसर और गुलाब की तेज खुशबू आने लगी। वाह, क्या खुशबू है। अब इसे खाकर लोग उंगलियां चाटेंगे और मेरी जेब भरेगी। इसे कहते हैं दिमाग। वहीं दूसरी तरफ राजू अपने छोटे से घर में सुबह-सुबह मसाले तैयार कर रहा था। उसकी पत्नी सरिता उसके पास बैठी उदास थी। सुनिए जी आज घर में राशन खत्म हो गया है और मुन्नू की स्कूल की फीस भी देनी है। आप इतने महंगे मसाले और सबसे महंगे चावल क्यों खरीदते हैं? हम थोड़ा सस्ता सामान भी तो इस्तेमाल कर सकते हैं ना। सरिता मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं। लेकिन मेरे बाबूजी हमेशा कहते थे कि खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं होता। वह आत्मा की तृप्ति के लिए होता है। अगर मैं चंद पैसों के लिए लोगों को मिलावटी खाना खिलाऊंगा तो ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाऊंगा? मैं जानती हूं आप ईमानदार हैं। लेकिन उस गिरधारी को देखिए वो लोगों को कुछ भी खिलाता है और महलों में रहता है और हम हम दानेदाने को मोहताज हैं। धीरज रखो सरिता। बेईमानी की कमाई बहुत जल्दी आती है लेकिन टिकती नहीं। ईमानदारी का फल मीठा होता है। देर से ही सही पर मिलेगा जरूर। बाजार खुल चुका था। गिरधारी की दुकान से केमिकल वाली तेज खुशबू उड़कर सड़क पर आ रही थी। लोग उस खुशबू के पीछे चुंबक की तरह खींचे चले जा रहे थे। भाई साहब क्या खुशबू आ रही है गिरधारी सेठ की दुकान से। ऐसा लगता है आज तो शाही दावत होगी। हां यार खुशबू तो गजब है। वो सामने वाला राजू तो सिर्फ ₹50 की प्लेट देता है लेकिन उसमें वो मजा नहीं आता जो गिरधारी की ₹100 वाली प्लेट में है। चलो वहीं चलते हैं। इतना कह के वो दोनों गिरधारी की दुकान की ओर चले जाते हैं। यहां राजू अपने ठेले पर ताजी बिरयानी सजाए बैठा था। उसने असली  केसर और घी डाला था। लेकिन उसकी हल्की और प्राकृतिक महक गिरधारी के केमिकल की तेज महक के आगे दब गई थी। राजू की आंखों में मायूसी थी। शाम के वक्त गिरधारी अपनी दुकान से बाहर निकला। उसने देखा कि राजू का पतीला अभी भी भरा हुआ है और कोई ग्राहक नहीं है। गिरधारी जोर से हंसते हुए बोला, क्यों राजू भाई क्या हुआ? आज भी मक्खियां ही मार रहे हो क्या? अरे भाई अगर बिरयानी नहीं बिक रही तो मेरे यहां बर्तन धोने की नौकरी कर लो। कम से कम शाम को दो वक्त की रोटी तो मिल जाएगी। गिरधारी की बात सुनकर वहां खड़े कुछ लोग हंसने लगे। राजू का दिल दुखा पर उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया। सेठ जी वक्त वक्त की बात है। मैं कम कमाता हूं पर रात को चैन की नींद सोता हूं। मुझे डर नहीं लगता कि कोई मेरी मिलावट पकड़ लेगा। ए जा बड़ी-बड़ी बातें और वड़ा पाव खाते हैं। यह कलयुग है। कलयुग। यहां सच्चाई नहीं दिखावा बिकता है। मेरी दुकान देख। इसे कहते हैं कामयाबी। तभी गिरधारी की दुकान पर एक ग्राहक ने पेट पकड़ लिया। वो दर्द से कराने लगा। आ अरे भाई यह बिरयानी में कुछ गड़बड़ है क्या? जैसे ही खाया मेरे पेट में मरोड़ उठ रही है और इसका स्वाद भी कुछ अजीब सा खट्टा लग रहा है। गिरधारी तुरंत घबराया लेकिन उसने अपनी चालाकी दिखाई। वो दौड़ कर ग्राहक के पास गया। अरे बाबूजी आप कैसी बातें कर रहे हैं? मेरी बिरयानी तो पूरे शहर में नंबर वन है। लगता है आप पहले से ही बीमार होंगे या धूप की वजह से चक्कर आ गया होगा। छोटू जल्दी से साहब के लिए एक ठंडी बोतल ला फ्री में। नहीं भाई मुझे नहीं चाहिए। मुझे डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। उफ बहुत दर्द हो रहा है। ग्राहक वहां से चला गया। गिरधारी ने राहत की सांस ली। बच गया। अगर यह ज्यादा शोर मचाता, तो बाकी ग्राहक भाग जाते। यह सब तमाशा दूर खड़ा राजू देख रहा था। उसे शक तो था लेकिन कोई सबूत नहीं था। उधर शहर के बड़े सरकारी दफ्तर में फूड इंस्पेक्टर विक्रम अपनी फाइलों में उलझा हुआ था। सर, पिछले एक महीने से सुंदरनगर इलाके से बहुत शिकायतें आ रही हैं। अस्पताल के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहां फूड पोइजनिंग के मामले बढ़ रहे हैं और हैरानी की बात यह है कि ज्यादातर मरीजों ने बाजार की बिरयानी खाई थी। हम बिरयानी मैंने भी सुना है वहां दो दुकानें हैं। क्या हमने वहां चेकिंग की? जी सर दो बार टीम गई थी लेकिन वहां सब कुछ साफ सुथरा मिलता है। शायद वो लोग हमारे आने से पहले ही सतर्क हो जाते हैं। इसका मतलब मुखबिरी हो रही है। वर्दी देखकर चोर भाग जाते हैं। इस बार तरीका बदलना होगा। इस बार मैं खुद जाऊंगा और वह भी ऐसे रूप में कि कोई पहचान नहीं पाएगा। रात हो गई थी। राजू उदास होकर अपना ठेला बंद कर रहा था। आज की कमाई से बम मुश्किल अगले दिन का सामान आएगा। हे भगवान ये कैसी परीक्षा है? क्या ईमानदारी का यही सिला है? अगर ऐसा ही चलता रहा तो मुझे गांव वापस जाना पड़ेगा। तभी एक भूखा भिखारी राजू के पास आया। बेटा बहुत भूख लगी है। कुछ बचा है क्या? हां बाबा बहुत कुछ बचा है। आज बिक्री नहीं हुई। आप बैठिए मैं आपको भरपेट खिलाता हूं। खाना फेंकने से अच्छा है कि किसी के पेट में जाए। राजू ने खुद भूखा रहकर वो सारी बिरयानी गरीबों में बांट दी। अगली सुबह इंस्पेक्टर विक्रम ने अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी। उसने फटे पुराने कपड़े पहने। अब वो शहर का सख्त इंस्पेक्टर नहीं बल्कि एक लाचार बूढ़ा भिखारी लग रहा था। आज होगा असली फैसला। आज मैं स्वाद नहीं इंसानियत परखूंगा। देखूं तो सही कौन क्या बेचता है। इंस्पेक्टर विक्रम बाजार पहुंचा। वो लड़खराते हुए चल रहा था। उसने देखा कि गिरधारी की दुकान पर रोज की तरह भीड़ थी और राजू का थैला खाली पड़ा था। विक्रम ने सबसे पहले गिरधारी की दुकान का रुख किया। ओ बेटा ओ सेठ जी अरे कौन है भाई सुबह-सुबह बोहनी के वक्त कौन आ गया बेटा मैं तीन दिन से भूखा हूं क्या थोड़ा सा चावल मिल जाएगा भगवान तुम्हारा भला करेगा तुम्हारी दुकान बहुत बड़ी है। मेरे थोड़े से खाने से कुछ कम नहीं होगा। गिरधारी ने उस बूढ़े को ऊपर से नीचे तक देखा। उसे घिन आ रही थी। अबे हट हट यहां से। यह दुकान है। कोई धर्मशाला नहीं। यहां पैसे वालों को खाना मिलता है। भिखारियों को नहीं। तू यहां खड़ा होकर मेरी दुकान की शोभा खराब कर रहा है। बेटा ज्यादा नहीं बस एक मुट्ठी दे दो। अरे छोटू यह बूढ़ा ऐसे नहीं मानेगा। इसे वो कल रात की बची हुई खुरचन है ना जो हम कुत्तों को डालते हैं। वो एक दोने में डालकर दे दे और यहां से भगाए इसे। दिमाग खराब कर दिया। छोटू ने एक गंदे से कागज पर थोड़ी सी बासी बिरयानी रखकर विक्रम दिया। विक्रम ने उसे हाथ में लिया। उसमें से सरांद आ रही थी जिसे मसालों से छिपाने की कोशिश की गई थी। विक्रम मन ही मन बोला। उफ यह तो चावल पूरी तरह सड़ चुके हैं और इसमें सिंथेटिक एसेंस मिलाया गया है। यह आदमी पैसे के लिए लोगों की जान ले रहा है। तभी इंस्पेक्टर विक्रम गिरधारी से पूछा। बेटा इसका स्वाद तो बहुत कड़वा है। यह तो खराब लग रहा है। मुफ्त की रोटियां तोड़ रहा है और ऊपर से नुक्स निकाल रहा है। चुपचाप खा और निकल वरना डंडे मार कर भगाऊंगा। अपमान का घूंट पीकर विक्रम वहां से उठा। उसने वो खाना चुपके से अपनी झोली में रख लिया। सबूत के तौर पर। फिर वो लड़खड़ाता हुआ सड़क पार राजू के ठेले पर पहुंचा। बेटा, क्या गरीब को पानी मिलेगा? बहुत प्यास लगी है। अरे बाबा आप यहां धूप में क्यों खड़े हैं? आइए यहां छाया में स्टूल पर बैठिए। पानी नहीं मैं आपको शरबत पिलाता हूं। आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। राजू  ने बड़े प्यार से उस बूढ़े आदमी को बैठाया और उसे ठंडा पानी और गुड़ दिया। जुग-जुक जियो बेटा। तुम बहुत भले आदमी लगते हो। सामने वाले सेठ ने तो मुझे धक्के मार कर भगा दिया। अरे बाबा वो बड़े लोग हैं। उनका बड़ा कारोबार है। मैं तो छोटा आदमी हूं। आप भूखे लग रहे हैं। क्या मैं आपके लिए खाना लगा दूं? लेकिन बेटा मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। मैं तुम्हें पैसे नहीं दे पाऊंगा। राजू मुस्कुराते हुए बोला। पैसे कौन मांग रहा है बाबा? मेरे पिताजी कहते थे कि भूखे को खाना खिलाना सबसे बड़ी पूजा है। आज मेरी दुकान पर ग्राहक नहीं आए तो क्या हुआ? आज आप मेरे खास मेहमान हैं। राजू एक साफ प्लेट में गरमा गरम बिरयानी ली और पूरे आदर के साथ विक्रम के हाथों में दे दी। लीजिए बाबा आराम से खाइए और चाहिए तो मांग लेना। विक्रम ने पहला निवाला मुंह में डाला। चावल का एक-एक दाना खिला हुआ था। मसालों का स्वाद एकदम शुद्ध और घर जैसा था। उसमें कोई बनावटी खुशबू नहीं थी। बस प्यार और ईमानदारी की महक थी। बेटा ऐसा खाना तो मैंने बरसों से नहीं खाया। इसमें तो जादू है। तुम इतना अच्छा खाना बनाते हो फिर भी तुम्हारी दुकान खाली क्यों है? बाबा आज का जमाना दिखावे का है। मैं केमिकल नहीं डालता इसलिए मेरी बिरयानी दूर से नहीं महकती। पर जो एक बार खा लेता है वो खुश होकर जाता है। खाना खत्म करने के बाद विक्रम अपनी जगह से खड़ा हुआ। उसकी आंखों में अब लाचारी नहीं बल्कि एक तेज चमक थी। उसने अपनी कमर सीधी की ओर बोला। राजू तुम्हारा खाना तो लाजवाब है ही पर तुम्हारा दिल उससे भी बड़ा है। राजू उसकी बदलते आवाज सुनकर हैरान हो गया। बाबा आपकी आवाज अचानक बदल ली। हां राजू क्योंकि मैं कोई भिखारी नहीं हूं। मैं इस शहर का फूड इंस्पेक्टर विक्रम हूं। यह सुनते ही आसपास के लोग भी रुक कर देखने लगे। तभी विक्रम ने अपनी पुलिस की वर्दी पहन लिया। यह देखकर राजू डर गया और घबराते हुए बोला, साहब आप मुझसे कोई गलती हो गई क्या साहब? नहीं राजू, गलती तुमने नहीं उस सामने वाले बेईमान ने की है। तभी इंस्पेक्टर विक्रम तेजी से सड़क पार करके गिरधारी की दुकान पर पहुंचे। गिरधारी अभी भी नोट गिनने में मगन था। अचानक अपने सामने एक सख्त अफसर को देखकर उसके पसीने छूट गए। अरे साहब आप आइए आइए क्या सेवा करूं? बिरयानी खिलाऊं? तेरी जहरीली बिरयानी मैंने चख ली गिरधारी जिसे तूने अभी बासी और सड़ा हुआ कह कर एक बूढ़े को दिया था वो बूढ़ा मैं ही था। क्या? वो वो आप थे। सर मुझसे गलती हो गई। सर माफ कर दो। मैं तो बस चुप रह तूने सिर्फ कानून नहीं तोड़ा तूने लोगों का सेहत के साथ खिलवाड़ किया है। तेरी दुकान के पीछे वो केमिकल की बोतलें मैंने अपनी आंखों से देखी है। तभी कोने में छिपी पुलिस की टीम आ जाती है। पुलिस वालों ने तुरंत गिरधारी को पकड़ लिया। पूरे बाजार में सन्नाटा छा गया। पुलिस ने गिरधारी की दुकान से वो सारे केमिकल और सड़े हुए चावल बरामद कर लिए और बोला इस दुकान को अभी सील कर दिया जाए और इस मिलावटखोर को थाने ले जाओ इसे अब जेल की हवा और जेल का ही खाना मिलेगा सेठ गिरधारी गिड़गिड़ाते हुए बोला इंस्पेक्टर साहब रहम करो मेरी इज्जत मच जाएगी इज्जत कमाई जाती है गिरधारी नोटों से खरीदी नहीं जाती ले जाओ इसे गिरधारी को हद हथकड़ी लगाकर पुलिस ले गई। उसके घमंड का महल आज चकनाचूर हो गया था। भीड़ अब राजू के थैले के पास जमा हो गई थी। इंस्पेक्टर विक्रम राजू के पास आए और बोली, सुनो सब लोग। अगर असली खाना खाना है तो चमक-धमक मत देखो। इस राजू के पास देखो। इसने गरीबी में रहकर भी अपना ईमान नहीं बेचा। आज से मैं ऐलान करता हूं। राजू की बिरयानी शहर की सबसे सुरक्षित और बेहतरीन बिरयानी है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद साहब। उस दिन के बाद राजू की दुकान पर पैर रखने की जगह नहीं बची। उसकी ईमानदारी की खुशबू अब पूरे शहर में फैल चुकी थी और वह गिरधारी जेल की सलाखों के पीछे अपने किए पर पछता रहा था।

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