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तीन बहनों का घर

  संगलपुर नामक गांव में माधव नाम का एक आदमी अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ में रहा करता था वो चाट और गुपचुप का ठेला लगाया करता और उसी से उसके घर का गुजारा चला करता उसकी तीनों बेटियों के नाम थे सीमा निधि और सविता सविता सबसे छोटी थी और मां-बाप की सबसे लाडली थी वैसे तो सविता बहुत समझदार और बहुत बुद्धिमान थी और घर के कामों में अपनी मां की मदद भी किया करती थी परंतु सविता सांवली थी सविता की दोनों बड़ी बहनें उसे हमेशा ही सांवली होने का ताना दिया करती थी ऐसे ही एक दिन सविता की मां ने अपनी बेटियों के पास आकर कहा अरे सीमा और निधि सविता को देखो तो जरा वो मेरे साथ हमेशा ही घर के कामों में मदद करती है और तुम दोनों हो कि सारा दिन बैठी रहती हो जरा कुछ काम भी कर लिया करो मां सविता ठीक ही तो करती है अरे उसे तो आपके साथ बस काम ही करना चाहिए और वो धूप में जाकर काली तो हो ही नहीं सकती क्योंकि वो तो पहले से ही काली है हां मां सीमा दीदी ठीक ही कहती है यदि हमने इसकी तरह बर्तन मारने शुरू किए तो हमारे हाथ काले हो जाएंगे और यदि धूप में जाकर पानी लाना शुरू कर दिया तो हम खुद काले हो जाएंगे आप तो बस सविता से...

दो बहनों का ससुराल

दो बहनों की यह कहानी है। छोटी बहन का नाम सरस्वती था और बड़ी बहन का नाम गौरी। दोनों बहनों की शादी बहुत कम उम्र में ही कर दी गई थी। सरस्वती लक्ष्मी की सगी बेटी थी। इसलिए लक्ष्मी ने उसके लिए एक अमीर और अच्छे घर का लड़का देखकर उसकी शादी करा दी। लेकिन गौरी लक्ष्मी की सौतेली बेटी थी। इसी कारण उसके साथ हमेशा भेदभाव किया गया। लक्ष्मी ने गौरी की शादी एक गरीब घर के लड़के से कर दी। मां होते हुए भी लक्ष्मी के दिल में अपनी सौतेली बेटी के लिए वह ममता और अपनापन कभी नहीं रहा।

 और यही बात आगे चलकर दोनों बहनों की जिंदगी में बड़ा अंतर पैदा कर गई। तो बेटी सरास्वती आज तू वापस अपने ससुराल चली जाएगी। तेरे जाने के बाद मुझे तेरी बहुत याद आएगी बेटी। अरे मां कोई बात नहीं। वैसे भी मैं आपके पास आती जाती रहूंगी। आप इतनी चिंता क्यों कर रही हैं? और फिर मैं अभी नहीं जा रही हूं। शाम को आपके दामाद जी मुझे लेने आएंगे। वैसे मां इन्होंने मुझे अभी ही घर जाने को कहा था। उन्होंने बताया कि उन्हें काम पर जाना है। इसलिए मुझे अकेले ही जाने को कहा है। अरे गौरी तुझे किसने रोक रखा है? जब तेरे पति ने तुझे जाने को कहा है तो चली जा। वैसे भी तू रहे या ना रहे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

 आखिर तू है ही तो एक लावारिस। मां ने बिल्कुल सही कहा दीदी। वैसे भी आपके पति तो मजदूरी करते हैं। उस गरीब से भला क्या उम्मीद की जा सकती है? वो आपको लेने कैसे आ पाएंगे? बेहतर है आप अकेले ही चली जाइए। सरस्वती तुम ऐसे मत कहो वे भले ही मजदूरी करते हो लेकिन मेरे दिल में वे बहुत अमीर हैं तुम्हारे पति से भी कहीं ज्यादा गौरी की इस बात में गहरा आत्मविश्वास झलक रहा था यह सुनते ही लक्ष्मी को बहुत गुस्सा आ गया और उसने कठोर स्वर में कहा तेरी जुबान आजकल बहुत चलने लगी है गौरी तू मेरी बेटी से इस तरह बात कर रही है अभी यहां से चली जा तेरे पति तुझे लेने तो आएंगे नहीं इसीलिए तू अकेले ही निकल जा नहीं तो देर हो जाएगी। ठीक है मां, मैं चलती हूं। आप अपना और पिताजी का ख्याल रखना। गौरी यह कहकर अपने ससुराल की ओर निकल पड़ी।

 गौरी घर जाने के लिए पास खड़ी एक चाचा की बैलगाड़ी के पास आ जाती है और उनसे कहती है, अरे चाचा जी, क्या आप मुझे मेरे घर तक छोड़ देंगे? अरे बेटी मैं तो यहां लोगों को उनके लक्ष्य स्थान तक पहुंचाने के लिए ही खड़ा हूं। वैसे बेटी तुम्हारा घर यहां से कितनी दूर है? चाचा जी मेरा घर ज्यादा दूर नहीं है। बाजार के उस पार पहुंचते ही मेरा घर आ जाएगा। तकरीबन आधे घंटे से थोड़ा पहले ही हम वहां पहुंच जाएंगे चाचा। अच्छा तो बेटी। चलो बैलगाड़ी में बैठ जाओ। मैं तुम्हें घर तक पहुंचा देता हूं और उसके बाद आज के लिए मैं भी अपने घर चला जाऊंगा। चाचा के ऐसा कहने पर गौरी बैलगाड़ी पर बैठ गई और चाचा ने भी बैलगाड़ी आगे बढ़ा दी। कुछ घंटे बाद रघुनाथ यानी सरस्वती और गौरी के पिता बाजार से घर लौट आए। अरे भाग्यवान कहां हो तुम? देखो मैं बाजार से दोनों बेटियों के लिए सब्जी लेकर आया हूं।

आज दोनों बेटियां चली जाएंगी ना। रघुनाथ की पुकार सुनते ही लक्ष्मी बाहर आ जाती है और कहती है, अरे आप बाजार से आ गए? और जी गौरी तो घर चली गई है। उस लावारिश को उसका पति भी लेने नहीं आया था। इसलिए वह अकेली ही चली गई। क्या? लेकिन तुम उसकी मां होते हुए भी उसे अकेले क्यों जाने दी? दोपहर का खाना हम चारों साथ में खा लेते। उसके बाद मैं खुद उसे घर छोड़ आता। और भला कोई मां अपनी ही बेटी को लावारिस कहकर कैसे बुला सकती है? बेटी अरे वह तो आपकी पहली पत्नी की बेटी थी। मेरी बेटी तो सरस्वती है। मैं भला कब से उस लावारिस की मां बन गई। क्या अब बेकार की जिम्मेदारियां भी मेरे ही सिर म जाएंगी। अरे भाग्यवान मानता हूं कि गौरी तुम्हारी सगी बेटी नहीं है। लेकिन वह मेरे ही खून की औलाद है। अगर तुम उसे मां का थोड़ा सा प्यार दे दोगी तो क्या सच में तुम्हारा कुछ बिगड़ जाएगा? अरे जी यह सब बातें आपको समझाकर भी कोई फायदा नहीं। आप जरा बाजार का सामान मुझे दे दीजिए। मैं रसोई में जाकर खाना बनाने लगती हूं।

 दामाद जी सरस्वती को लेने आने वाले हैं। खाना खाकर ही जाएंगे। लक्ष्मी यह कहते हुए रघुनाथ से बाजार का ठेला लेकर रसोई की ओर चली गई। पता नहीं भाग्यवान की यह भेदभाव भरी जिद आखिर कब खत्म होगी। मां, मैंने इनके लिए लड्डू बना लिए हैं और चावल भी चूल्हे पर चढ़ा दिए हैं। अब बस सब्जी बनानी बाकी है। पिताजी सब्जी लेकर आ गए हैं। तो चलो अब जल्दी से सब्जी भी बना लेते हैं। हां बेटी। तेरे पिताजी बाजार से ताजीताजी सब्जियां ले आए हैं। आज दामाद जी को खूब खिलाएंगे। आखिर बहुत दिनों बाद अपने ससुर के घर आएंगे ना। लक्ष्मी अपनी बेटी सरस्वती के पति से भी बहुत [संगीत] प्यार करती थी। लेकिन गौरी के पति के साथ वे ठीक वैसा ही व्यवहार करती थी जैसा वे खुद गौरी के साथ करती थी। चलिए मां अब देर ना करते हुए सब्जियों को गमले में रखकर जल्दी-जल्दी काट लेते हैं।

 इसके बाद दोनों मिलकर सब्जियां काटने में लग गए। अरे रोहित बेटा तुम तो शाम तक आने वाले थे। फिर इतनी देर कैसे हो गई? रास्ते में कहीं कोई तकलीफ तो नहीं हुई ना? अरे नहीं पिताजी मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई। बस कुछ काम की वजह से थोड़ा देर हो गई। इसलिए मैं एक रिक्शा भाड़े पर लेकर आ गया हूं। दोनों की बातों के बीच लक्ष्मी बाहर आ गई। अरे दामाद जी तुम आ गए लेकिन इतनी देर कैसे हो गई बेटा? तुमने तो कहा था कि तुम शाम को आ जाओगे। मां जी काम की वजह से थोड़ा देर हो गई। वैसे आप कैसी है? और सरस्वती कहां है मां जी? वो दिखाई नहीं दे रही। अरे बेटा मैं ठीक हूं। और सरस्वती तुम्हारे लिए खाने का इंतजाम कर रही है। भाग्यवान तुम भी जाकर सरास्वती की मदद कर दो ताकि दोनों आराम से खाना खा लें और जल्दी घर के लिए रवाना हो सके क्योंकि रात काफी हो चुकी है।

 रघुनाथ के ऐसा कहने के बाद लक्ष्मी रसोई की ओर चली गई। कुछ समय बाद लक्ष्मी और सरस्वती खाना लेकर बाहर आ गई। दामाद जी आज तुम्हारे आने की खबर सुनकर तुम्हारे लिए ढेर सारा खाने का इंतजाम किया है बेटा। जी भर कर खाओ। आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया मां जी। लेकिन गौरी दीदी और उनके जीजा जी दिखाई नहीं दे रहे हैं। क्या वे दोनों नहीं आए? अपने पति की यह बात सुनकर सरस्वती गुस्सा हो जाती है और कहती है, अरे जी, इस समय उन लोगों के बारे में पूछने की क्या जरूरत है भला? आपके लिए मां और मैंने इतने अच्छे से ढेर सारा खाने का इंतजाम किया है। आप पिताजी के साथ आराम से खाना खाइए। सरस्वती की ऐसी बातें सुनकर रघुनाथ के मन में गुस्सा तो आया लेकिन रोहित के सामने उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया। बेटे रोहित यह सब बातें छोड़ो और पहले खाना खा लो।

तुम दोनों भी रसोई में जाकर खाना खा लेना। उसके बाद देर ना करते हुए रोहित और सरस्वती घर के लिए रवाना हो जाएंगे क्योंकि काफी देर हो चुकी है। रघुनाथ के ऐसा कहने पर किसी ने कुछ नहीं कहा। रोहित और रघुनाथ खाना खाने लगे। दूसरी तरफ लक्ष्मी और सरस्वती भी खाना खाने के लिए रसोई चली गई। कुछ समय बाद रोहित और सरस्वती रिक्शे पर बैठकर घर की ओर चल पड़े। भाग्यवान आज मैं काम की वजह से तुम्हें लेने नहीं आ पाया। मांजी और पिताजी ने कुछ कहा तो नहीं ना? और तुम अकेली ही आई हो या पिताजी तुम्हें छोड़ने आए थे? नहीं जी, मांजी और पिताजी ने कुछ भी नहीं कहा। मैं अकेली ही आ गई क्योंकि उस समय पिताजी बाजार गए हुए थे और आप तो जानते ही हैं मां और सरस्वती मुझसे ज्यादा प्यार नहीं करती क्योंकि मैं उनकी सौतेली बेटी हूं ना। भाग्यवान इन बातों को लेकर ज्यादा फिक्र मत करो।

 कभी ना कभी अचानक कुछ ऐसा भी हो सकता है कि मांजी और सरस्वती तुम्हें खुद अपना लें और पिताजी तो तुमसे प्यार करते ही हैं। उनके मन में कभी तुम्हारे लिए कोई भेदभाव आया ही नहीं। अपने पति नितिन की यह बातें सुनकर गौरी थोड़ी हैरान हो जाती है और कहती है अरे जी आप क्या कहना चाह रहे हैं? मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा। ऐसा भला क्या हो जाएगा कि मांजी और सरस्वती मुझे अपना लें। वे दोनों तो बचपन से ही मुझे ताने सुनाती आई हैं। अरे भाग्यवान तुम कुछ ज्यादा ही सोच रही हो। इतना सोचने की कोई जरूरत नहीं है। कभी ना कभी सब ठीक हो ही जाएगा। और इन दो दिनों में तुम घर पर नहीं थी इसलिए घर का सामान भी खत्म हो गया है। एक काम करते हैं। कल हम दोनों साथ-साथ बाजार चलेंगे और घर की जरूरत का सारा सामान ले आएंगे। हां जी ठीक है। लेकिन कल आपको काम पर नहीं जाना है क्या? अगर काम रुक गया तो पैसों की समस्या हो सकती है। नहीं भाग्यवान कल कोई काम नहीं है। कल मैं पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताऊंगा।

 इन दो दिनों में तुम्हारी बहुत याद आ रही थी। अब तुम आ गई हो तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। खैर अभी वह सब बातें छोड़िए। आप दिन भर काम करके आए हैं। थक गए होंगे। मैंने खाना बना लिया है। चलिए पहले खाना खा लेते हैं। फिर सो जाते हैं। भले ही सौतेली मां लक्ष्मी ने गौरी के साथ भेदभाव करते हुए उसकी शादी एक गरीब लड़के से करा दी। लेकिन मिथिन बहुत अच्छा लड़का है। गरीबी भरे इस जीवन में भी दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश रहते हैं। अगले दिन नितिन और गौरी साथ-साथ बाजार खरीदारी करने आ गए। इसी तरह बाजार में सामान खरीदते-खरीदते अचानक गौरी की नजर बाजार के बीच अपनी छोटी बहन और उसके पति पर पड़ गई। अरे सरस्वती तुम यहां कहां से आ रही थी? और रोहित तुमसे भी कितने दिनों बाद मुलाकात हुई? बाकी सब ठीक-ठाक चल रहा है ना रोहित? हां दीदी ऊपर वाले की कृपा से सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा है। वैसे कल मैं भाग्यवान को लेने तुम लोगों के घर गया था। लेकिन आप और जीजाजी क्यों नहीं आए? अरे रोहित अब तुझे क्या ही बताऊं।

 हम मजदूरी करने वालों को ससुर के घर जाने की फुर्सत कहां मिलती है? एक दिन भी काम ना करें तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से गौरी दिन में ही घर अकेली आई। अपनी दीदी और जीजा के साथ अपने पति रोहित को इस तरह बातें करते देख स्वरास्वती को बहुत गुस्सा आ गया और वह तीखे स्वर में बोली अरे दीदी आप हमेशा मेरे ही रास्ते में क्यों आ जाती हैं? भला आपको पता नहीं है क्या कि मुझे आपसे नफरत है। अब आप सामने दिख गई तो मेरा पूरा दिन ही खराब हो जाएगा। ऊपर से आज तो अपने उस गरीब पति को भी साथ ले आई हैं। स्वरास्वती की ऐसी तीखी बातें सुनकर गौरी को बहुत बुरा लगा। वहीं नितिन को भीतर ही भीतर बहुत ज्यादा गुस्सा आया। लेकिन उसने अपने गुस्से को जाहिर होने नहीं दिया। सरस्वती तुम भला ऐसी बातें क्यों करती हो? आखिर तुम मेरी बहन हो ना। फिर मुझसे इतनी नफरत क्यों? बहन तू कब से मेरी बहन हो गई भला? और वैसे भी तुझे कुछ कहने से कोई फायदा नहीं। अभी यहां बाजार के बीच तमाशा मत खड़ा कर और हमें शांति से खरीदारी करने दे।

 सरस्वती की यह बातें सुनकर गौरी को बहुत बुरा लगा। उसने कुछ कहे बिना अपने पति के साथ वहां से जाना ही बेहतर समझा और उधर सरस्वती भी अपने पति के साथ अपने रास्ते चल दी। ऐसे ही जब गौरी और नितिन घर की ओर जा रहे थे तभी रास्ते में अचानक गौरी की नजर उन चाचा पर पड़ गई जिनके साथ वो कल ही मां के घर से अपने ससुराल आई थी। अरे चाचा जी आप यहां और चाचा जी आप इस तरह उदास खड़े क्यों हैं? अरे बेटी अब तुझे क्या ही बताऊं। जब से वह रिक्शा चलने लगा है ना तब से बैलगाड़ी में जाने के लिए सवारी ही नहीं मिलती। आज तो अभी तक एक भी सवारी नहीं मिली। घर में थोड़ा सा भी राशन नहीं बचा है। यही सब सोचकर मन बहुत उदास हो गया है। अब हम जैसे गरीब लोग तो वो नया रिक्शा खरीद भी नहीं सकते। अरे भाग्यवान ये चाचा कौन है? मैंने तो इन्हें पहचाना नहीं। अरे जी कल जब मैं घर आ रही थी तब इन्हीं चाचा जी ने अपनी बैलगाड़ी में मुझे घर तक छोड़ दिया था।

 अच्छा वैसे भाग्यवान इनकी हालत देखकर मुझे बहुत बुरा लग रहा है और जैसा इन्होंने बताया कि आज इनके घर में थोड़ा सा भी राशन नहीं है तो क्यों ना हम जो सामान अपने घर के लिए लाए हैं उसमें से इन्हें दे दें। इससे इनकी मदद भी हो जाएगी और हमारे लिए थोड़ा सा सामान रख लेंगे। अरे जी आपने तो बिल्कुल मेरे दिल की बात कह दी। चलिए हम अपने सामान में से इन्हें कुछ सामान दे देते हैं। चाचा जी क्या आपके पास ठेला है? आप हमारे सामान में से कुछ सामान ले लीजिए। हां बेटी। मेरी बैलगाड़ी में हमेशा एक ठेला रखा रहता है। चाचा जी के ऐसा कहने पर गौरी ने अपने ठेले से कुछ सामान निकाला और आदर पूर्वक चाचा जी को दे दिया। बेटी तुम दोनों का दिल सच में बहुत बड़ा है। तुम दोनों का दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया। अगर आज तुम लोगों ने मेरी यह मदद ना की होती तो शायद आज घर पर सभी को बिना खाए ही रहना पड़ता। तुम दोनों का एक बार फिर से बहुत-बहुत धन्यवाद। अरे चाचा जी धन्यवाद की कोई जरूरत नहीं है। यह तो हमारा फर्ज है। वैसे चाचा जी अब हम चलते हैं।

 आप अपना ख्याल रखिए। ऐसा कहकर गौरी और नितिन अपने घर की ओर चल पड़े। भाग्यवान मुझे तुमसे एक बात पूछनी थी। हां जी पूछिए ना क्या बात है? भाग्यवान मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि तुम अपनी दीदी से इतनी नफरत क्यों करती हो? सौतेली ही सही वह तुम्हारी बहन तो है। तुम दोनों एक ही घर में साथ-साथ खेलते हुए बड़े हुए हो। ऐसे में दिल में इस तरह की नफरत पालना ठीक बात नहीं है। अरे जी अब आप भी उस गरीब गौरी की तरफ होने लगे हैं। आखिर आपने उस लावारिस गौरी में ऐसा क्या देख लिया जो आप मुझसे इस तरह बातें कर रहे हैं? अरे भाग्यवान मेरा कहने का मतलब वो नहीं है जो तुम सोच रही हो। मैं तो बस इतना कहना चाहता हूं कि तुम दोनों ही बहनें हो और अगर तुम मिलजुलकर रहोगी तभी जीवन में खुशियां आएंगी। आप यह सारी बातें रहने ही दीजिए। मैं उस लावारिस गरीब बहन के साथ मिलजुलकर नहीं रह सकती हूं। कृपया आप यह सब बातें यहीं छोड़ दीजिए। रोहित भले ही अमीर था, लेकिन उसका मन सरस्वती की तरह अमीरी गरीबी का भेद नहीं करता था।

 वो स्वभाव से सीधा साधा, सरल और नेक इंसान था। रघुनाथ अकेले चारपाई पर हाथ बांधे बैठे थे और मन ही मन खुद से बातें कर रहे थे। पता नहीं भाग्यवान और सरस्वती गौरी से क्यों इतना नफरत करती हैं। सौतेली हुआ तो क्या हुआ? वह भी इसी घर की बेटी है। आज जो मैंने बाजार जाते देखा उसके बाद तो सरस्वती ने हद ही कर दी। सबके सामने बाजार में अपनी दीदी से वैसा व्यवहार कौन करता है भला? अब ऐसे और नहीं चलेगा। मुझे नितिन से मिलकर अच्छे से बात करनी पड़ेगी। इसी तरह रघुनाथ जब खुद से बातें कर रही होती है, तभी लक्ष्मी उनके पास आ जाती है और उनसे कहती है, अरे जी, ऐसे अकेले-अकेले बैठकर इतना क्या सोच रहे हैं आप? नहीं भाग्यवान, कुछ नहीं। वैसे मैं सोच रहा हूं कि कल एक बार गौरी के घर होकर आऊं। उस दिन भी बेटी गौरी मेरे पहुंचने से पहले ही चली गई थी इसलिए उसे ठीक से मिल नहीं पाया।

 नितिन से भी मिले हुए बहुत दिन हो गए हैं तो कल एक बार जाकर आऊंगा। वाह उस लावारिस के घर जाने का तो आप सोच रहे हैं। लेकिन मेरी बेटी सरस्वती के घर भी तो आप जा सकते हैं। भाग्यवान मुझे इस समय कोई बहस नहीं चाहिए। कुछ बातें दिमाग लगाकर भी सोचा करो। उस दिन मैंने सरस्वती और रोहित को खानावाना खिलाकर अच्छे से घर के लिए रवाना किया था। लेकिन गौरी से जाते वक्त मिल भी नहीं पाए। खैर, यह सब तुम्हें कहकर भी कोई फायदा नहीं। अगर खाना बन गया हो तो चलो दोनों मिलकर खा लेते हैं। रघुनाथ के ऐसा कहने पर लक्ष्मी ने कुछ नहीं कहा और दोनों खाना खाने रसोई में चले गए। शांत भरी सुबह थी। चारपाई पर नितिन बैठा हुआ था। उसके पास चाय का कप। तभी गौरी नितिन के पास आ जाती है। अरे आप चाय पीकर अभी तक यहीं बैठे हैं। आज आपको काम पर नहीं जाना है क्या? कल भी तो पूरा दिन घर का सामान खरीदने में ही चला गया था।

 नहीं भाग्यवान इन दिनों कहीं भी काम नहीं मिल रहा है। इसलिए इन दिनों मुझे घर पे ही रहना पड़ेगा। लेकिन ऐसे तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा। कल जो राशन लिया था उसमें से आधा तो चाचा को भी दे दिया था। अरे भाग्यवान तुम इतनी चिंता क्यों करती हो? मैं हूं ना मुझ पर भरोसा रखो। घर चल जाएगा। आप पर तो मुझे पूरा भरोसा है। जी। ठीक है। अगर इन दिनों काम नहीं है तो आप थोड़ा आराम ही कर लीजिए। वैसे भी आप बहुत मेहनत करते हैं। अब मैं रसोई में जाकर काम में लगती हूं। अरे पिताजी आप ऐसे अचानक हां नितिन बेटा कुछ परिस्थितियां ऐसी बन गई कि अचानक आना पड़ा। वैसे गौरी बेटी कहां है? रघुनाथ के ऐसा कहते ही गौरी बाहर आ गई। अपने पिताजी को देखते ही वो खुशी से भर गई और बोली अरे पिताजी आप कब आए और मां को साथ क्यों नहीं लेकर आए? ओ बेटी उस दिन तू मेरे घर पहुंचने से पहले ही चली आई थी। तो तेरी बहुत याद आ रही थी। इसीलिए तुझे देखने आ गया। और रही बात तेरी मां की उनकी बात छोड़ो। मैं आया हूं ना।

 वैसे आते-आते तुम्हारे लिए बाजार से कुछ सामान भी लेकर आया हूं। रघुनाथ ऐसा कहकर सामान का ठेला गौरी को दे देते हैं और फिर चारपाई पर बैठ जाते हैं। पिताजी आप इनसे बातें कीजिए। मैं आप दोनों के लिए रसोई में जाकर चाय बनाती हूं। ऐसा कहकर गौरी चाय बनाने रसोई में चली जाती है। बेटे नितिन भाग्यवान और सरस्वती का भेदभाव और उनकी जिद दिन-बदिन जिस तरह बढ़ रही है, उसे देखकर मुझे चिंता हो रही है। मुझे लगता है कि अब हमें सब कुछ सबके सामने लाना ही पड़ेगा। नहीं तो भाग्यवान कभी गौरी को मां का प्यार नहीं देंगे। एक तो वह सौतेली बेटी है। ऊपर से गरीब घर की बहू कम से कम तुम्हारा सच जानकर भाग्यवान गौरी को बेटी का प्यार दे ही देंगे शायद। हां पिताजी आपने बिल्कुल सही कहा। कल भी बाजार में मिलने पर सरस्वती ने भाग्यवान को बहुत सुनाया।

 लेकिन मैंने वहां कुछ नहीं कहा। आपके कहे मुताबिक अब सब कुछ सबको बता देने में ही भलाई है। और वैसे भी पिताजी ने जो समय दिया था वह भी लगभग खत्म हो चुका है। और अब मेरे अपने असली घर जाने का वक्त आ चुका है। तो बेटे अब मैं यहां आ ही गया हूं। तो कुछ देर यहीं रुक लेता हूं। उसके बाद तुम और गौरी मेरे साथ हमारे घर चलना। फिर वहीं पर हम सरस्वती और रोहित को भी बुला लेंगे। और तुम्हारा असली सच सबके सामने रख देंगे। मेरा मन कहता है कि तुम्हारी सच्चाई जानकर सब हैरान रह जाएंगे और दूसरी ओर भाग्यवान व सरस्वती गौरी को भले ही अमीरी के लालच में ही सही अपना ही लेंगे। हां पिताजी आपकी बात एकदम सही है। मैंने गौरी को बहुत करीब से देखा है। वह भले ही सबके सामने हंसती मुस्कुराती रहती है लेकिन अपने मन में मां और बहन के भेदभाव की जिदबद के कारण वो बहुत गहरा दुख लेकर बेचारी चुपचाप जी रही है। हां नितिन बेटे मुझे सब पता है।

 गौरी बेटी को बचपन से ही इस भेदभाव भरी जिंदगी में जीना पड़ रहा है। इसी वजह से उस भेदभाव भरी शादी में भाग्यवान के घमंड को एक दिन तोड़ने के लिए मैंने तुम्हें देखकर गौरी की शादी कर दी। लेकिन अब समय आ गया है कि सारा सच सबके सामने आ जाए। इसी तरह जब रघुनाथ और नितिन बातें कर रहे होते हैं तभी गौरी चाय लेकर आ जाती है। पिताजी चाय पी लीजिए और अगर आपको कोई दिक्कत ना हो तो आज यहीं रुक जाइए। वैसे भी आप बहुत दिनों बाद आए हैं। अरे बेटी मैं तो अभी नितिन से वही बात कर रहा था। आज मैं यहां नहीं रुकूंगा बल्कि तुम दोनों मेरे साथ हमारे घर चलोगे। लेकिन पिताजी ऐसे अचानक क्यों? वहां जाकर तुम्हें सब कुछ खुद ब खुद पता चल जाएगा बेटी। रघुनाथ के ऐसा कहने के बाद सब ने चाय पी। फिर रघुनाथ मिथिन और गौरी को अपने साथ लेकर अपने घर की ओर चल पड़े। रघुनाथ ने सरस्वती और उसके पति को भी बुला लिया।

 पूरा परिवार एक साथ बैठा हुआ था। रघुनाथ हाथ बांधे गंभीर मुद्रा में बैठे थे। तभी लक्ष्मी ने बात शुरू करते हुए कहा, "अरे जी, आपने ऐसे अचानक सबको क्यों बुला लिया? सरास्वती और रोहित को बुलाना तो ठीक था। लेकिन इन दोनों गरीबों को भी साथ क्यों ले आए? कहीं कुछ हुआ है क्या? हां, भाग्यवान। अभी जो तुमने अपनी जुबान से कहा, इन दो गरीबों की बात। आज उसी पर फैसला होगा। यह फैसला सिर्फ इन गरीबों के ऊपर ही नहीं बल्कि तुम्हारे अमीर, दामाद और अपनी बेटी पर भी लागू होगा। अरे पिताजी, यह सब आप क्या कह रहे हैं? हमें तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा। आप सीधे-सीधे बताइए ना। आज इन गरीबों के बारे में ऐसा कौन सा फैसला होने वाला है? सरस्वती, तू अभी चुप ही रह। तुझे अपनी दीदी की इज्जत करना भी नहीं आता। बाजार के बीच जिस तरह तूने अपनी दीदी से वैसा व्यवहार किया वो बिल्कुल गलत था। अभी तुम सब चुपचाप बैठे रहो। आज मैं तुम सबको नितिन की असलियत बताऊंगा तब तुम लोगों को खुद समझ आ जाएगा कि असली गरीब कौन है और असली अमीर कौन? हां तो बताइए ना। हम कहां मना कर रहे हैं आपको बताने से।

 हमें भी तो इस गरीब की असलियत जाननी है। तो भाग्यवान ध्यान से सुनो। नितिन किसी गरीब घर का नहीं बल्कि एक सफल व्यवसाई का बेटा है। जमीन जायदाद की बात अलग है और नितिन उनका इकलौता बेटा है। जब तुमने मुझसे कहा था कि सरस्वती के लिए अमीर लड़का देखो और गौरी के लिए गरीब तब मैंने तुम्हारी तरह भेदभाव नहीं किया। मैंने अमीर गरीब नहीं देखा। बस दोनों बेटियों के लिए अच्छा इंसान देखा। अगर यह नितिन इतना अमीर ही है तो फिर वह उस झोपड़ी में क्यों रहता है? उसे तो महल जैसे घर में रहना चाहिए था। तो सुनो भाग्यवान नितिन के पिताजी का एक उसूल है। उसी उसूल के कारण उन्होंने कुछ साल नितिन को गरीबी में रखकर जीवन का असली अनुभव लेने दिया। क्योंकि उन्होंने भी जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना करके आज उस मुकाम तक पहुंचा है। बेटा तुझे मेरा उसूल तो पता ही है। जिस मुकाम तक मैं पहुंचा हूं वही अनुभव तू भी पाए। अगर तू सीधे मेरे काम में लग गया तो जिंदगी का असली मतलब नहीं समझ पाएगा। और मैं नहीं चाहता कि हमारे घर की बहू हमारी जमीन, जायदाद और पैसे देखकर आए। तू कुछ समय गरीबी में रह, जीवन को समझ और अपने लिए एक सच्चे और अच्छे मन की लड़की से शादी कर। जब जीवन का अनुभव अच्छे से हो जाए तब अपनी बहू को लेकर घर वापस आ जाना। ठीक है पिताजी आप जैसा चाहते हैं, मैं बिल्कुल वैसा ही करूंगा। आखिर मैं भी आपका ही बेटा हूं और मैं भी चाहता हूं कि आपकी मेहनत भरी जिंदगी के अनुभव मैं खुद भी हासिल करूं। रघुनाथ से यह सारी बातें जानकर सभी लोग हैरान रह गए।

 यह राज सिर्फ रघुनाथ और नितिन ही जानते थे। यहां तक कि गौरी को भी इस सच की कोई जानकारी नहीं थी। तो भाग्यवान सरस्वती अब पता चल गया ना कि कौन गरीब है और कौन अमीर। तुम दोनों हमेशा इसी में उलझे रहते हो। कभी इंसान को दिल से भी पहचानो। गौरी भले ही मेरी पहली पत्नी की बेटी है, फिर भी वह तुम दोनों को अपनी मां और बहन ही मानती रही। पर तुम्हारे पास उसे समझने का दिल नहीं था। खैर, छोड़ो दिल से नहीं तो कम से कम उसकी अमीरी देखकर ही सही। शायद अब तुम दोनों उसे अपना मान लो। सारी सच्चाई जानकर और रघुनाथ की बातें सुनकर लक्ष्मी और सरस्वती को अपने बुरे कर्मों का एहसास हुआ। दोनों ने गौरी से दिल से माफी मांगी। इसके बाद पूरा परिवार फिर से एक हो गया और नितिन भी गौरी को साथ लेकर अपने असली घर लौट आया। 

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