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दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

चतुर मछवारा

अरब के समंदर के पास एक गरीब मछुआरा रहता था। जिसका सहारा ना कोई खजाना था, ना कोई ताकत। बस मेहनत और अल्लाह पर यकीन। हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ वो अपना टूटा फूटा जाल लेकर समंदर किनारे पहुंच जाता। चलो आज भी कोशिश करते हैं। शायद आज की लहरें रहमत लेकर आई हो। क्योंकि रब कभी अपने बंदे को खाली नहीं लौटाता। लेकिन उस दिन समंदर की लहरों में कुछ अनकहा, कुछ अनसुना था। जैसे हवा फुसफुसा रही हो कि आज किस्मत पलटने वाली है। हम शायद अभी नहीं सब्र सब्र ही तो इम्तिहान है। ए समंदर की लहरों, तुम्हें भी तो मालूम है मैं क्यों आता हूं हर सुबह। मेरे घर में दो भूखे पेट इंतजार करते हैं।

कुछ तो रहमत भेजो। और फिर चौथी बार जब उसने जाल फेंका तो समंदर ने उसे वो दिया जिसकी उसे तुम्हारी क्यों? मगर बड़ी मछली फंसी बदलने वाली थी। यह यह मछली नहीं। यह तो बोतल है और कैसी अजीब नक्शाकारी है इस पर। और यह ढक्कन शीशे का किसका सामान होगा यह? जैसे ही मछुआरे ने बोतल का ढक्कन खोला, धुएं के गुबार से निकला एक जिन मछुआरा तांप उठा। उसका चेहरा पसीने से भीग गया। मगर उसकी आंखों में दर्द से ज्यादा सोच थी। आखिरकार आखिरकार किसी ने मुझे आजाद किया। 100 साल नहीं 200 साल से मैं इस तंग बोतल में तैत था। पहले 100 साल मैंने कसम खाई थी। जो मुझे आजाद करेगा उसे मैं खजाने दूंगा। मगर किसी ने मुझे आजाद नहीं किया। दूसरे 100 साल मैंने कसम खाई।

 जो मुझे आजाद करेगा उसे मैं मार डालूंगा। अब तेरा वक्त आ गया ए इंसान। ए रहम दिल जिन ठहरो। मैंने तो सिर्फ जिज्ञासा में बोतल खोली थी। मुझे नहीं मालूम था कि उसमें कोई कैद है। क्या मैं तेरे लिए कुछ नहीं। मैंने तुझे बंदिश से आजाद किया। क्या यही तेरी इनायत है। इनायत तू क्या जाने इनायत क्या होती है गरीब मछुआरे। सदियों से मैं अंधेरों में सर रहा था। तंग बोतल में बंद। हर रोज हर पल मैंने इंसानों से नफरत करना सीखा है। अब जो मुझे आजाद करेगा उसका अंजाम सिर्फ मौत है। लेकिन गरीबी इंसान को तोड़ती है और उम्मीद उसे जिंदा रखती है। मछुआरा हार मानने वालों में से नहीं था। या खुदा यह कैसी मुसीबत है। अगर मैं डर गया तो यह मुझे मार डालेगा। मगर अगर मैं सोच समझ कर बात करूं तो शायद रास्ता निकल आए। ए जिन तेरा गुस्सा बेवजह नहीं मैं जानता हूं। मगर सोच क्या एक बेकसूर को सजा देना इंसाफ है? क्या तू इतना बड़ा और ताकतवर होकर इतना छोटा दिल रखता है? इंसाफ। मुझसे इंसाफ की बात मत कर ए इंसान। सदियों पहले एक बादशाह ने मुझे धोखे से बोतल में कैद किया था। उस दिन मैंने कसम खाई। अब कोई भी इंसान मुझे आजाद करेगा तो मैं उसकी गर्दन उड़ा दूंगा और अब तू तू वही इंसान है। अगर तेरी नजर में सब इंसान गुनहगार है तो फिर तू और उनमें क्या फर्क है? ए जिन जो दर्द तूने सहा वही अब तू दूसरों को देना चाहता है।

 क्या इससे तेरी रूह को सुकून मिलेगा?  तेरी जुबान तो तेज है मछुआरे मगर इससे तेरा अंजाम नहीं बदलेगा। मैं तेरी अक्ल की दाद देता हूं। मगर मौत तेरे लिए तय है। मौत तय है या नहीं यह वक्त बताएगा। पर अगर मैं चालाकी से काम लूं तो शायद इस जिन को उसके ही जाल में फंसा दूं। ए जिन एक बात कहूं मुझे यकीन ही नहीं होता कि तू इतना बड़ा है और इस छोटी सी बोतल में बंद था। तू तो बादलों से ऊंचा है। यह तो नामुमकिन बात लगती है। नामुमकिन ऐ नादान मछुआरे तू मेरी ताकत पर शक करता है। मैं हवा बनकर कहीं भी समा सकता हूं। चाहे वह बोतल हो या पहाड़ की दरार। तो फिर मुझे दिखा देना। मैं देखना चाहता हूं कि तू वाकई उसी बोतल में घुस सकता है या सिर्फ बातों का जिन है। जिन को मछुआरे की बात चुभ गई। उसके अहंकार को जैसे आग लग गई। वो हंसा एक डरावनी गड़गड़ाहट जैसी हंसी। देख अब अपनी आंखों से देख। मैं तुझे दिखाऊंगा कि जिन क्या होता है।

 पल भर में जिन फिर से उसी बोतल में कैद हो गया। बाहर उसकी आवाज गूंजने लगी। अब तू वहीं रह जहां तेरी जगह थी। मछुआरे तूने धोखा दिया। मुझे बाहर निकाल वरना तुझे पछताना पड़ेगा। धोखा नहीं अक्ल लगाई है। ए जिन जो दूसरों के साथ बुरा सोचता है वह खुद अपने जाल में फंस जाता है। तूने इंसानियत को सजा देनी चाही। अब खुद सजा भुगत। जिन अब बोतल में बंद था। वह वही जिन था जो कुछ देर पहले आसमान से ऊंचा था। अब एक छोटी सी बोतल में कैद होकर पछता रहा था। ए मछुआरे सुनो मेरी बात। मैं गलत था। बहुत गलत। गुस्से ने मेरी अकल पर पर्दा डाल दिया था। अब मैं तुझसे मिन्नत करता हूं। मुझे आजाद कर दे। मैं तुझे इनाम दूंगा।

ऐसा इनाम जो तेरे ख्वाबों में भी ना हो। मैं मानता हूं। शैतान ने मेरे दिल में नफरत भर दी थी। पर अब मैं तेरे सामने दुआ करता हूं। मुझे छोड़ दे। वरना मैं इस अंधेरे में तड़प तड़प कर मर जाऊंगा। तू रहम दिल इंसान है। तेरे सीने में रहम है। मेरे साथ रहम कर। हम अब याद आई रहम की बात। जब तेरा गुस्सा आसमान तक जा रहा था। तब तो तू मुझे मिटाने पर तुला था। अब जब कैद हुआ है तो तेरे लफ्ज भी बदल गए। जिन मैं तुझे छोड़ सकता हूं। लेकिन पहले मुझे यकीन दिला कि तू झूठ नहीं बोल रहा। कसम खा कि तू अब किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। कसम मैं कसम खाता हूं अल्लाह और अपनी रूह की। अब मैं किसी को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। जो भी मैंने पहले कहा उसे भूल जा मछुआरे। ठीक है। अगर तू अपनी बात से फिरा तो याद रखना। अल्लाह सब देखता है। अब मैं तुझे आजाद करता हूं। अब मैं तेरे एहसान को कभी नहीं भूलूंगा। तेरा शुक्रिया। ए नेक दिल इंसान। तूने मुझ पर रहम किया जब मैं उस लायक नहीं था। अब मैं तुझे वो दिखाऊंगा जो किसी ने नहीं देखा। एक ऐसी झील जहां हर मछली में सोना चांदी और जादू की चमक है। मछुआरे ने जिनकी बात मान ली थी।

 अब दोनों समुद्र किनारे से निकल कर एक अनजानी दिशा में बढ़ रहे थे। जहां कोई इंसान पहले कभी नहीं गया था। ए जिन तू कह रहा था कि तू मुझे किसी झील तक ले जाएगा। मगर यहां तो सिर्फ रेगिस्तान है। ना हरियाली ना पानी। सब्र रख ए मछुआरे हर चीज का वक्त होता है। जिस झील की बात मैं कर रहा हूं वो आम झील नहीं वो जादू से बनी है। जादू से बनी झील मतलब वहां सचमुच सोने चांदी की मछलियां है। हां वो झील एक पुराने जादूगर की थी जिसने अपनी रूह को पानी में बांध दिया था। उसके बाद से वहां हर रंग की मछलियां पैदा हुई। लाल जैसे सूरज, नीली जैसे आसमान और सुनहरी जैसे खालिस सोना। या खुदा यह तो जैसे ख्वाब हो। इतनी खूबसूरत झील मैंने जिंदगी में नहीं देखी। यही है वो झील। यहां हर मछली में जादू है। तू इनमें से कुछ पकड़ ले और उन्हें अपने सुल्तान को दे। वो तुझे इनाम में इतना सोना देगा कि तू जिंदगी भर आराम से जी सकेगा। पर क्या ये मछलियां किसी जादू के कैद में तो नहीं? कहीं इन्हें पकड़ने से कोई नुकसान तो नहीं होगा? नहीं, ए नेक दिल मछुआरे, यह झील अब वीरान है।

 इसका जादू सिर्फ तेरे लिए है। ले जा जितनी मछलियां पकड़ सकता है, यह तेरे अच्छे दिल का इनाम है। मछुआरे ने जिन की बात सुनी और झील में अपना जाल फेंका। जाल में लाल, नीली, सुनहरी और चांदी जैसी मछलियां फंस गई। वाह, यह तो किसी दौलत से कम नहीं। अब मैं इन्हें सुल्तान के पास ले जाऊंगा। तेरी तकदीर अब बदलने वाली है। और याद रखना हमेशा अक्ल और अच्छाई को अपनी ताकत बनाए रखना। अगले सवेरे मछुआरे ने वो रंग बिरंगी मछलियां सुल्तान के दरबार में पेश की। दरबार की हवा में खामोशी थी। जैसे हर निगाह उन चमकती मछलियों में खो गई हो। वो मछलियां मानो रोशनी का जादू थी। कोई नीली, कोई सुनहरी, कोई लाल तो कोई चांदी जैसी चमकती हुई। खुदा की कसम ऐसी मछलियां तो मैंने अपने ख्वाबों में भी नहीं देखी। हर रंग जैसे कोई दुआ बन गया हो। मछुआरे यह तुझे कहां से मिली? हुजूर आला, यह मछलियां एक रहस्यमई झील से मिली। झील ऐसी थी जैसे चांदनी उसमें घुल गई हो। वहां की हवा तक में कोई नूर था और जब मैंने जाल फेंका तो ऐसा लगा जैसे किसी ने धीमे से कहा हमें छूना नहीं हम आम नहीं है। जहां पना यह मामूली मछलियां नहीं है।

 इनके रंगों में कोई राज छुपा है। शायद किसी जिन या तिलिस्म का असर हो। अब्बा हुजूर देखिए ना इन मछलियों के रंग जैसे जिंदा हो। कभी नीली रोशनी फैलती है तो कभी लाल चमक। क्या यह हमसे कुछ कहना चाहती हैं? कुदरत के हर करिश्मे में एक इशारा होता है। लेकिन यह तो उस इशारे से भी बढ़कर हैं। खैर इन्हें शाही बावर्ची को दे दो। देखें इनका जायका भी इनकी खूबसूरती जैसा है या नहीं। क्या तुम हमें भूल गए? यह क्या तिलिस्म है? कौन बोल रहा है वहां? जवाब दो। पूरा दरबार जैसे जम गया। सांसे थम गई, आंखें ठहर गई। वो मछलियां जो कुछ देर पहले खामोश थी। अब उनमें से कोई रूह बोल रही थी और यह सिर्फ एक आवाज नहीं थी बल्कि किसी गहरे जादू की शुरुआत थी। उस रात जब सब सो गए शहजादी ज़ैनब के दिल में एक बेचैनी थी। वह सोचती रही आखिर इन रंग बिरंगी मछलियों का राज क्या है? सवेरा होते ही उसने अपने खास पहरेदारों को रुकने का हुक्म दिया और अकेली ही मछुआरे के झोपड़े की ओर रवाना हुई। सलाम ए बुजुर्ग मछुआरे तुम्हारे हुनर और तुम्हारी ईमानदारी की बातें पूरे बाजार में सुनी जाती हैं। आज मैं तुम्हारे पास सिर्फ एक जवाब के लिए आई हूं।

 वो झील वही रहस्यमई झील जिसकी रंग बिरंगी मछलियों ने पूरे महल को हैरत में डाल दिया। दुनिया कहती है कि झीलें सिर्फ पानी का आईना होती हैं। लेकिन उन मछलियों में ऐसा लगा जैसे किसी भूली हुई दास्तान की परछाई थी। मुझे बताओ ए मछुआरे वो झील कहां है? कहां से आई वो मछलियां जिसे इंसानी आंखों ने पहले कभी नहीं देखा। सलाम है शहजादी। आपके कदम मेरे जैसे गरीब की झोपड़ी में आए यह मेरे लिए इज्जत है। लेकिन उस झील का नाम लेना भी दिल में कांटे उगा देता है। वो कोई साधारण जगह नहीं। वो रास्ता मुझे एक जिन ने बताया था। रेगिस्तान की सुनसान रेत के उस पार जहां दिन में धूप आग बरसाती है और रात में नीली रोशनी ऐसे चमकती है जैसे चांद ने धरती को रहस्य सुनाए हों वहां हवा भी अजीब सी फुसफुसाहट करती है। मुझे वहां जाना ही होगा। ए मछुआरे मैं सुल्तान की बेटी हूं। लेकिन उससे भी पहले मैं एक ऐसी इंसान हूं जो अधूरे सचों के साथ जी नहीं सकती। इन मछलियों में एक दबी हुई दास्तान है। एक ऐसी दास्तान जिसकी गूंज महल की दीवारों तक नहीं बल्कि दिलों तक पहुंचती है। अगर उस झील में कोई राज छिपा है तो मुझे उसे अपने हाथों से उजागर करना होगा। कभी-कभी एक शहजादी को ताज नहीं सच्चाई की तलाश आगे बढ़ाती है।

 शहजादी आप बहादुर है लेकिन वो जगह बहादुरी से भी ज्यादा मांगती है। मुझे मालूम नहीं कि वो झील अब भी वैसे ही है या नहीं। क्योंकि वहां एक अजीब सी खामोशी है। ऐसी खामोशी जो आदमी के दिल की धड़कन तक सुन ले। झील तक जाने वाला रास्ता हवा की तरह बदलता रहता है। मैंने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है। इसीलिए डरता हूं कहीं वो झील आपको भी अपने रहस्यों में ना बांध ले। जिस दिल में डर हो वो कभी सच्चाई तक नहीं पहुंच पाता। और मैं डर के आगे झुकने वालों में से नहीं हूं। मैंने अपने अब्बा हुजूर से सीखा है कि किसी भी रहस्य से लड़ने के लिए तलवार नहीं इरादा चाहिए। अगर रास्ता मुश्किल है तो वही मेरे लिए सही है। मुझे बस रास्ता बता दो ए मछुआरे बाकी सफर की जिम्मेदारी मेरी होगी। मेरी हिम्मत और मेरी सच्चाई मेरे कदम बढ़ाएगी। मछुआरे ने सिर झुकाया और उसे दिशा बता दी। उत्तर पूर्व की ओर सात टीलों के पार जहां हवा भी रुक जाती है वहीं है वो झील।

 शहजादी उस झील को ढूंढने निकल पड़ी। आखिरकार इतने लंबे सफर और इतना ढूंढने के बाद उसे वह झील मिल ही जाती है। लेकिन इस बार कुछ अलग होता है। उस झील पर एक महल बना होता है। या खुदा यह तो कोई साधारण महल नहीं है और यह सन्नाटा जैसे सदियों से किसी ने यहां कदम ना रखा हो। क्या यही वो रहस्यमई जगह है जहां से वो रंग बिरंगी मछलियां थी। दिल कहता है कि यहां कोई बहुत पुरानी दास्तान दफन है जो आज मुझे पुकार रही है। महल के अंदर सन्नाटा था। शहजादी आगे बढ़ती गई और फिर उसने देखा पत्थर बना हुआ शहजादा। यह तो इंसान का चेहरा है। भले ही पत्थर का हो पर इन आंखों में दर्द साफ झलक रहा है। क्या यह वही राज है जो झील अपने अंदर छुपाए बैठी थी? क्या यह शख्स ही उस रहस्य की चाबी है? तुमने सही पहचाना। ऐ शहजादे तुमने सच्चाई की राह चुनी है। यह झील किसी चमत्कार से नहीं बनी बल्कि मेरे आंसुओं से, मेरे गम से, मेरी तन्हाई से मैं वही श्रापित शहजादा हूं जिसे एक जालिम जिनकी चाल ने पत्थर में कैद कर दिया। और जो मछलियां तुमने देखी वो दरअसल मेरी रूह के टुकड़े हैं जो सदियों से आजादी की तलाश में भटक रही हैं। तो सच यह है कि वो सिर्फ मछलियां नहीं थी। वो तुम्हारी टूट चुकी उम्मीदें थी।

 तुम्हारी दबी हुई पुकारें, तुम्हारे दिल का बिखरा हुआ नूर। और यह झील तुम्हारी पीड़ा की गवाही देती रही। मगर किसी ने इसे समझा ही नहीं। डरो मत। मैं तुम्हें इस कैद से निकालने आई हूं। मैं उस सच्चाई को उजागर करूंगी जिसे सदियों ने धूल में छुपा दिया था। तुम्हारा दर्द अब सिर्फ तुम्हारा नहीं। यह मेरा फर्ज है कि तुम्हें इंसाफ दिलाऊं। शहजादी ज़ैनब ने अब सब समझ लिया था। वह जान चुकी थी कि शहजादे पर पड़ा हुआ श्राप जिन की जलन और छल का नतीजा था। लेकिन अब वक्त था उसे तोड़ने का। शहजादी ने जिन का नाम लेकर दुआ मांगी कि अगर पश्चाताप सच है तो श्राप मिट जाए और सच की जीत हो। ए खुदा के बंदे अगर यह पूरी झील तेरे आंसुओं से बनी है तो इसका मतलब है कि तूने बरसों सबर किया। बरसों तक अकेला दर्द सहा।

 लेकिन अब वक्त आ गया है कि इस रूह को उम्मीद, रिहाई और सुकून तीनों मिले। ए महल की रूह तेरे सारे गम हमेशा के लिए खत्म हो जाए। इसे जितना अज़ाब मिला है, उतनी ही रहमत अब इसे मिलनी चाहिए। तभी वो जिन वहां आता है। पर इस बार गम और शर्म से झुका हुआ। ऐ शहजादी, आज मैं तुम्हारे सामने सिर झुका कर खड़ा हूं। तुम्हारी रहमदली ने मेरी रूह तक को झकझोर [संगीत] दिया है। मैंने अपने गुरूर और गुस्से में आकर उस मासूम शहजादे को पत्थर बना दिया था। सदियों से मैं अपनी ही गलती की कैद में जल रहा था। पर किसी को भी यह इकरार करने की हिम्मत ना हुई। आज तुम्हारी बातों ने मेरी आंखें खोल दी। अगर इजाजत दो तो मैं अपनी इस खता का बोझ खुद उठाऊं और इस श्राप को तोड़ दूं।

 शायद इससे मेरी रूह को भी कुछ सुकून मिल जाए। जिन अगर तेरे दिल में सच में पछतावा है तो फितरत का कानून कहता है कि इंसान अपने कर्मों से ही माफी का दरवाजा खोलता है। जिसने गलती कबूल कर ली वो आधा पाक हो गया। अगर तू सच में उस शहजादे को आजाद करना चाहता है तो कर दे। क्योंकि रहम और इंसाफ दोनों तेरे इंतजार में खड़े हैं। शुक्रिया। ए सच्ची दिल वाली शहजादी आज तुमने मुझे वह रास्ता दिखाया जो मैं अपनी ताकत के घमंड में भूल चुका था। अब मैं इस लानत को खत्म करूंगा और उस बेकसूर शहजादे को उसके कैद से रिहा कर दूंगा। जिनने अपने हाथ आकाश की ओर उठाए और एक दुआ पढ़ी। ऐ परवरदिगार जिसने आसमानों को रोशन किया और समंदरों को रास्ता दिया। अगर मेरे दिल में सचमुच पछतावा है तो इस बेगुनाह शहजादे पर से यह लानत उठा ले। मैं अपनी सारी ताकत, अपनी रूह की रोशनी और तेरे हुक्म की बरकत से इसके जिस्म पर आई यह लानत हटाता हूं। इस बंदे को वही हालात लौटा दे जिसमें तूने इसे पैदा किया था। आजाद और सलामत। और फिर वो पत्थर का बुत इंसान में बदल गया। तुम तुमने सचमुच मुझे रिहाई दे दी। मैंने तो अपने दिल में उम्मीद का आखिरी चिराग भी बुझा दिया था।

 मुझे लगा था कि मैं सारी उम्र इसी खामोश कैद में एक पत्थर बनकर पड़ा रहूंगा। लेकिन तुमने अपने हौसले और रहम से वो कर दिखाया जिस पर मुझे भी यकीन नहीं था। उम्मीद कभी मरती नहीं बस छुप जाती है। कभी-कभी वह हमें उसी जगह मिलती है जहां हम उसे सबसे कम तलाश करते हैं। तुम्हारी कहानी ने मुझे सिखाया है कि सच्चाई और सब्र दोनों मिलकर हर बंद दरवाजा खोल सकते हैं। शहजादी और शहजादे मैं तुम दोनों के सामने सिर झुकाता हूं। आज मैंने इंसानियत, [संगीत] रहम और उम्मीद की कीमत समझी है। मेरी गलती ने तुम्हें अंधेरे में धकेला। लेकिन शहजादी तुमने और उस मछुआरे ने मुझे फिर से रोशनी दिखा दी। मैं अब इस दुनिया से [संगीत] रुखसत लेता हूं और अपने रब के सामने कसम खा कर जाता हूं कि फिर कभी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। शायद इसी तरह मेरा दिल भी हल्का हो जाए। शहजादा और शहजादी दोनों महल वापस लौट आते हैं। मछुआरे को सुल्तान बड़ा इनाम देता है। और इस तरह से मछुआरे और जिन की यह कहानी एक शहजादे की रिहाई पर खत्म हुई।

 एक ऐसी कहानी जिसने सिखाया बुद्धि और समझदारी ताकत से कहीं बड़ी होती है। क्योंकि जो इंसान अपनी नियत साफ रखता है, किस्मत भी उसी का साथ देती है। 

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