रामगोपाल गांव कोहरे की मोटी चादर में लिपटा हुआ था। अमीरों के घरों की चिमनियों से धुआं निकल रहा था और अंदर अंगीठी की आग जल रही थी। लेकिन मूलचंद की झोपड़ी में ठंड सीधी हड्डियों तक पहुंच रही थी। मूलचंद के पास केवल एक पतली रजाई थी जिसे वे चारों बारी-बारी से ओढ़ते थे। उसकी पत्नी दामिनी अपने पुराने ऊनी कपड़े में लिपटी हुई चूल्हे के पास बैठी थी। जहां आग जल नहीं रही थी। दामिनी मूलचंद जी आप बाहर जाने की तैयारी कर रहे [संगीत] हैं। ठंड कितनी है आपको अंदाजा है? और देखिए चूल्हा भी ठंडा है। घर में [संगीत] एक मुट्ठी भी राशन नहीं बचा है। कल रात बच्चों को हमने बस पानी पिलाकर सुला दिया था। दामिनी क्या करूं? रणजीत सेठ को देर बिल्कुल पसंद नहीं है। अगर आज देरी हुई तो वह मेरी बची खुची पगार भी काट लेगा। तुम्हें तो पता है उसके होटल की चाय के बिना गांव वालों की सुबह नहीं होती। आज कैसे भी जाकर पैसे लाने ही होंगे। तभी उनकी 7 साल की बेटी तारा अपने बड़े भाई प्रवीण के साथ रजाई से निकल कर आती है। उसकी आंखें नींद और ठंड से लाल थी। तारा पापा रात में बहुत ठंड लगती है। मुझे डर लगता है। मेरी रजाई बहुत पतली हो गई है। प्लीज आज आप जब वापस आना तो हमारे लिए नई मोटी वाली रजाई लेकर आना प्लीज। हां बाबा और मेरी टीशर्ट भी फट गई है। मुझे दुकान पर जाने में शर्म आती है। अगर आप रजाई और राशन ले आए तो मैं नया स्वेटर नहीं मांगूंगा। मूलचंद का गला भर आया। वह अपने बच्चों की ओर देखते हैं। उनके पास उन्हें देने के लिए गर्म कपड़े या अच्छा खाना भी नहीं था। वह दर्द को अंदर ही निगल जाते हैं। अपनी आंखों से आंसू नहीं गिरने देते। मूलचंद मजबूरी भरा आश्वासन अपनी आवाज को मजबूत बनाते हुए। हां, मेरी बिटिया रानी तारा और मेरे पहलवान प्रवीण। तुम चिंता मत करो। मैं पूरी कोशिश करूंगा। आज सेठ से पूरे पैसे लेकर आऊंगा और सबसे पहले तुम्हारे लिए नई रजाई और ढेर सारा गरम खाना लेकर आऊंगा। तुम दोनों मां के पास रहो। वह अपनी पत्नी की ओर देखते हैं जो निराश आंखों से उनकी ओर देख रही थी। वह बिना कुछ कहे बाहर निकल जाते हैं। कोहरे में तेजी से दामिनी के डर और बच्चों के सपने पीछे छोड़ते हुए। रंजीत सेठ का होटल चाय महल नाम का गांव में सबसे शानदार था। ठंड के बावजूद दुकान के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी। मूलचंद को चाय बनाने का जन्मजात हुनर था। मूलचंद को पढ़ना लिखना नहीं आता था। इसलिए चाय बनाने के अलावा वह कोई और काम नहीं कर सकता था। रंजीत सिंह सेठ अरे ओ मूलचंद बहरा हो गया है क्या तू?
6:00 बज गए। आज फिर देर से आया है। तुझे पता
है ना कि मेरी दुकान पर सुबह की पहली चाय
कितने बजे बन जानी चाहिए। अगर आज तू 1 मिनट भी देर करता तो मैं तेरी आधी पगार काट लेता।
माफ कर दीजिए। ठंड बहुत ज्यादा थी और बच्चों को
थोड़ी देर आग के पास बिठाना पड़ा था। मैं कसमें खाता हूं। अब 1 मिनट की भी देरी नहीं होगी। कसमें चल चल हाथ चला। तेरे कसमें खाने से मेरी दुकान का
नुकसान नहीं भरेगा। देख बाहर कितनी भीड़ है।
यह सब तेरी चाय पीने आए हैं। जल्दी कर। तेरी चाय
में स्वाद है। तेरी मेहनत में नहीं। हां चला। मूलचंद ठंड को भूलकर तेजी से चाय बनाने लगता है। उसकी चाय की खुशबू पूरे चौक में फैल जाती है। वह लगातार चाय बनाता रहा। उसके हाथ और
पांव ठंड से सुन हो गए थे। मूलचंद चुप
होकर काम करता रहा। वह उस दिन बिना कुछ खाए
भूखा ही पूरी दोपहर काम करता रहा। सेठ जी, आज के दिन की पगार और मेरी पिछली बकाया पगार अगर आप दे दें तो बहुत मेहरबानी होगी।
घर में राशन और बच्चों के लिए रजाई लानी है। हां हां
पगार मैं जानता हूं पर आज नहीं।
आज तो मुझे बाहर से सामान लाना है इसलिए पैसे मेरे पास कम है। मैं तुम्हें कल
दे दूंगा। वैसे भी तुम इतने कंगाल नहीं हो कि एक दिन खाना ना खा सको। प्लीज सेठ जी कल नहीं। मेरी छोटी बेटी बहुत ठंड से कांप रही है।
प्लीज थोड़े ही दे दीजिए। मैं आपकी कसम खाता हूं। मैं
कोई बहाना नहीं बना रहा। घर में कल के लिए अनाज भी नहीं है। बहाना तेरी जैसी औकात के आदमी को बहाना बनाना खूब आता है। जा झूठा मत बन। इतने भी
गरीब नहीं हो कि एक दिन का खाना भी ना हो।
और अगर तूने ज्यादा मुंह चलाया तो जो बची खुची पगार
है वह भी कट जाएगी। निकल यहां से। वह लगभग उसे धक्का दिया। मूलचंद दुखी मन से वहां से चला जाता है। उसके हाथ खाली थे और दिल टूटा हुआ था। मूलचंद
घर के बाहर कुछ देर खड़ा रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था
कि वह किस मुंह से अंदर जाए। आखिरकार वह हिम्मत करके अंदर गया। पापा पापा आप आ गए रजाई रजाई कहां है?
क्या आप हमारे लिए गरम-गरम
जलेबियां लाए हैं?
मूलचंद दर्द भरा झूठ। माफ करना बच्चों। आज मैं लाना भूल गया। सेठ जी ने कहा
कि कल देंगे। कल मैं पक्का लाऊंगा। बच्चे उदास हो जाते हैं पर मासूमियत से चुपचाप बैठ
जाते हैं। जब वे आसपास नहीं थे तो दामिनी आगे आई।
उसकी आंखें आंसू से भरी थी। मूलचंद जी मैं आपकी बहुत आभारी हूं। पर कल का मैं कुछ करता हूं। आज आज किसी तरह सूखी रोटी और नमक है। उससे काम चला लो। वह रात ठंड और
भूख में सूखी रोटी खाकर गुजर गई। मूलचंद को पूरी रात नींद नहीं आई। उसने फैसला कर लिया कि अब उसे सेठ के सामने कमजोर नहीं पड़ना है। उसे
कुछ और करना होगा। पिछली रात की ठंड और भूख के
बावजूद आज समय से पहले होटल पहुंच गया था। उसका शरीर अंदर से कांप रहा था। लेकिन उसके मन में एक
उम्मीद थी कि आज सेठ उसे कल और आज का पूरा हिसाब
देगा। रणजीत सिंह ओए मूलचंद आज जल्दी आया है। कल की धमकी का असर हुआ लगता है। पर यह क्या तेरे शरीर में जान नहीं है क्या? इतना धीरे क्यों चल रहा है? कल का गुस्सा अभी भी है क्या? हाथ चला। मुझे काम चाहिए बहाना नहीं। मालिक मेरा शरीर थोड़ा कमजोर है पर मैं पूरी
ताकत से काम कर रहा हूं। आज की चाय कल से
भी ज्यादा स्वादिष्ट बनेगी। आप देख
लीजिएगा। मूलचंद जानता था कि अगर उसने जवाब दिया
तो सेठ पैसे नहीं देगा। उसने अपने दर्द को चाय में
मिला दिया। थोड़ी देर में चाय की गर्म खुशबू से होटल भर गया
और भीड़ लगने लगी। रणजीत सिंह। अरे सुनिए। मेरी चाय
की तारीफ मत कीजिए। यह सब इस गरीब का कमाल है। यह चाय नहीं जादू है। मैंने इसे महल की चाय का नुस्खा सिखाया
है। पियो और ठंड को भूल जाओ। वह मूलचंद की तरफ घृणा
से देखता है। मूलचंद पूरे दिन भूखा काम करता रहा। उसे हर बार सेठ की बातें सुननी पड़ती थी, जिनमें अपमान और कड़वाहट थी। उसके शरीर में अब शक्ति नहीं बची थी। समय शाम 7:30 बजे। पूरा दिन बीत गया। मूलचंद ने हिम्मत जुटाकर सेठ के पास जाने का फैसला किया। उसकी पिछली बकाया पगार लगभग ₹550 थी और आज की मजदूरी अलग। उसे आज हर हाल में
पैसे चाहिए थे। सेठ जी मालिक मेरा आज का और पिछला
हिसाब अगर आप पूरा कर दें। मेरे बच्चों को ठंड से बचाना है। मेरा कुल हिसाब ₹550 हो रहा था। और 2 दिन कितना?
900 तेरी औकात है इतनी बड़ी रकम बोलने की?
तूने कभी एक साथ ₹900 देखे भी हैं? जा और देख मैं
आज भी तेरे लायक नहीं हूं। ले यह ₹100 रख। आज के लिए इतना
ही काफी है। ज्यादा मुंह मत चला। आज बाहर से सामान आ रहा है। मेरे पास खुद पैसे नहीं है। का सेठ जी
यह क्या? मेरे ₹550 बकाया है और आपने सिर्फ सिर्फ ₹100 दिए। मैं इतने पैसों में क्या करूंगा?
प्लीज कम से कम 500 तो दे दीजिए। ओए लेना है तो ले नहीं तो यह भी
नहीं मिलेगा। जा तुझे लगता है तू मेहनत करता है। जिस हिसाब से तेरा मुंह चलता है उस हिसाब से काम भी करना चाहिए। निकल मेरे धंधे में रुकावट मत डाल। मूलचंद आंखों में अपमान का आंसू लिए। वह ₹100 का नोट उठा लेता है। वह भगवान का धन्यवाद करता है कि कुछ तो मिला। वह जानता था कि सेठ से लड़कर कोई फायदा नहीं। मैं ₹100 लेकर मूलचंद बाजार पहुंचता है। उसकी पहली प्राथमिकता थी खाना और दूसरी रजाई। वहां सबसे पहले
सब्जी वाले के पास जाता है। मूलचंद भैया यह आलू
कैसे दिया और टमाटर का क्या भाव है?
आलू ठंड में गरम खाने का
मजा ₹70 के 2 किलो और टमाटर ₹50 किलो एकदम ताजा। मूलचंद के होश उड़
जाते हैं। ₹100 में तो मुश्किल से 1 किलो आलू और थोड़ा सा आटा ही आएगा। इतना महंगा वह
दूसरी सब्जियों की तरफ देखता है। तभी उसकी नजर गोभी पर पड़ती है जिसका भाव बाकियों से कम था। भैया यह गोभी कैसे है?
गोभी ₹20 किलो ले जा। मूलचंद ₹20 की गोभी लेता है और बाकी बचे ₹80 लेकर रजाई बाजार की तरफ बढ़ता है। बाजार में रजाई की दुकानें सजी
थी। रंग बिरंगी मोटी रजाइयां देखकर मूलचंद को
तारा और प्रवीण का मासूम चेहरा याद आया। लेकिन दाम ₹800,
₹900 यह तो 400 की भी है। मेरे पास तो सिर्फ ₹80 हैं। मैं क्या
करूं? तभी उसे अपने बचपन
का दोस्त और पड़ोसी जगदीश यानी जग्गू दिखाई देता है।
जिसकी रजाई की सबसे बड़ी दुकान थी। अरे जग्गू तू यहां वह दौड़कर उसके पास जाता है। कैसा है भाई?
मूलचंद मेरे भाई मैं तो
बहुत बढ़िया हूं। तू बता, इतनी ठंड में
यहां क्या कर रहा है? रजाई लेने आया है?
मूलचंद मैं भाई रजाई देख बस इतने ही पैसे हैं। वह अपने हाथ में ₹80 दिखाते हुए कहता है, बस इतने ही पैसे हैं। मेरी छोटी बेटी तारा वो
रात भर ठंड से कांपती रहती है। सेठ ने
पैसे नहीं दिए। देख मेरे भाई काम धंधा अपनी जगह है और भाईचारा अपनी जगह है। मैं तुझे बिना पैसे के रजाई नहीं दे सकता। यह बाजार है भाई। प्लीज जग्गू
तुझे मेरी कसम बस एक रजाई दे दे। मैं तुझे
कुछ दिनों बाद पूरे पैसे वापस कर दूंगा। मेरी हालत देख। तुझे पता है ना मैं झूठ नहीं बोलता। बच्चों की जिंदगी का सवाल है। बस कर मेरे यार। ठीक है। मैं यह
नहीं देख सकता। वह एक मोटी गर्म रजाई
उठाता है। ले यह रजाई रख। पर देख तू मेरा दोस्त है इसलिए दे रहा हूं। पैसे जब हो जाए तब जे देना और कभी
जरूरत हो तो सीधा मेरे पास आना। वह भगवान
और अपने दोस्त का धन्यवाद करता है। वह रजाई और गोभी
लेकर खुशी से घर की तरफ भागता है। मूलचंद झोपड़ी में रजाई और गोभी लेकर घुसता है।
बच्चे खुशी से झूम उठते हैं। पापा रजाई इतनी
मोटी। थैंक यू। अब मुझे ठंड नहीं लगेगी। बाबा आज आप सबसे अच्छे पापा हो। मूलचंद जी मैं
आपकी बहुत आभारी हूं। पर पर यह रजाई और
खाना सिर्फ ₹100 में। सेठ ने सिर्फ 100 दिए। पर मेरा दोस्त जग्गू
उसने मुझे उधार में रजाई दे दी। भगवान का
शुक्र है दामिनी। रजाई को बच्चों को उड़ाती है और
गोभी को आग पर रखती है। रात का खाना बन रहा था। बच्चे खुशी से गर्म रजाई में थे। दामिनी अब गंभीर हो
चुकी थी। उसने फैसला कर लिया था। दामिनी। मूलचंद जी, मैं आपसे कुछ जरूरी बात करना चाहती हूं। हां दामिनी बोलो। आप वहां क्यों
काम करते हैं जहां आपकी कोई इज्जत नहीं है।
जहां आपकी और आपके बच्चों की ठंड और भूख की कोई कीमत
नहीं है। क्या करूं दामिनी? मुझे पढ़ना
लिखना नहीं आता। मेरे पास कोई दूसरा हुनर नहीं है। चाय ही मेरा सहारा है। तो तो आप अपनी
ही दुकान क्यों नहीं खोलते?
आप दूसरे के यहां नौकरी क्यों करते हैं? आपकी चाय में जादू है। पूरा गांव आपकी चाय पीने सेठ के होटल जाता है। यह क्या बात कर रही हो दामिनी? दुकान, दुकान कैसे? हमारे पास पैसे
नहीं है। एक दिन का खाना नहीं है और तुम ठेला, बर्तन, गैस और सामान की बात कर रही हो। यह नामुमकिन है। अरे नामुमकिन नहीं है। सुनिए आपके ₹900 से ज्यादा सेठ के पास बकाया है। कल आप सेठ के पास जाइए और सीधे पूरे पैसे मांगिए। उसे
कहिए कि अब आप काम नहीं करेंगे। इतने पैसों से
थोड़ा सा सामान तो आ ही जाएगा। हम जमीन पर छोटी सी टपरी लगा लेंगे। सेठ सेठ मुझे पैसे नहीं देगा। वो बहुत कंजूस है। पर पर तुम्हारी बात में दम है दामिनी। हां
मैं कोशिश करूंगा। कल मैं काम पर जाऊंगा और
शाम को उससे पूरा हिसाब मांगूंगा। मूलचंद अब सोने चला गया। बच्चों की गर्म रजाई देखकर उसे
शांति मिली। लेकिन कल की लड़ाई अभी बाकी थी। उसे सेठ से अपने अधिकार के लिए लड़ना था। यह लड़ाई उसके और उसके परिवार के भविष्य के लिए थी। समय तीसरे दिन
की शाम 7:00 बजे। मूलचंद आज सुबह से ही
चुपचाप और पूरी ताकत से काम कर रहा था। उसके
दिमाग में बस दामिनी की बात घूम रही थी। पूरा
हिसाब वो जानता था कि यह उसकी आखिरी शाम है इस होटल पर। उसने अपनी पूरी ताकत बटोर ली थी। मूलचंद सीधे सेठ के
पास जाकर बोलता है। सेठ जी मालिक मेरा
पूरा हिसाब कर दीजिए। मेरा पिछला बकाया और
आज की मजदूरी मिलाकर मेरा कुल हिसाब ₹900 हो गया है। मुझे अब आगे काम नहीं करना
है। मुझे पूरे पैसे चाहिए। रंजीत सिंह जो
हमेशा मूलचंद को दबाकर रखता था। यह सीधा और
आत्मविश्वास से भरा लहजा सुनकर हक्का बक्का रह जाता
है। ₹900? तेरी औकात है इतनी बड़ी रकम बोलने की? तूने कभी अपनी जिंदगी में ₹900 एक साथ देखे भी हैं? क्या बकवास कर
रहा है? जा तेरी नौकरी खत्म पर पैसे
नहीं दूंगा। मूलचंद सेठ से रिक्वेस्ट करता है। सेठ जी आप धोखा मत दीजिए। ईमानदारी से मेरा हिसाब कर
दीजिए। मैं जानता हूं मेरा ₹900 बनता है। रंजीत सिंह बहुत गुस्से से उसकी तरफ देखता है। जेब से ₹50
का एक नोट निकाल कर मूलचंद की ओर फेंकता है। ले हंसी ले आज के लिए
यह ₹50 बहुत हैं तेरे जैसे गरीब के लिए।
और पिछला हिसाब वो मैं नहीं दूंगा। जा नहीं
तो जो बचे खुचे पैसे हैं वो भी कट जाएंगे। निकल यहां
से। मूलचंद का चेहरा गुस्से और अपमान से लाल हो जाता है। वो उस ₹50 को नहीं उठाता। उसने सेठ को गुस्से से देखा और फिर एक भयानक बात कहता है। सेठ जी आप गरीब का हक मार रहे हैं। मैं आपको शराब
देता हूं। यह आपकी दुकान या आपका पूरा
व्यापार बर्बाद हो जाएगा। आपको एक दिन अपनी
गलती का एहसास होगा। मूलचंद ₹50 को जमीन पर
छोड़कर बिना कुछ और कहे आंसू पोंछ कर वहां से तेजी
से चला जाता है। उसकी आंखों में भविष्य की आग थी। मैं तभी उसकी नजर वो पर पड़ी जो अपने कंधों पर लकड़ी के भारी गट्ठे लादकर जल्दी-जल्दी
कहीं जा रहे थे। ठंड के मौसम में लकड़ी की
बहुत कीमत थी। यह विचार उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंधा। हां, लकड़ी। लकड़ी ठंड में हर घर और हर होटल को लकड़ी चाहिए। मेरे पास कोई पैसा नहीं है पर
जंगल तो भगवान का है। मैं लकड़ी काट कर बेच सकता हूं। वह तुरंत उन लोगों का पीछा करता है और देखता है कि वे
गांव के एक छोटे व्यापारी के पास जाकर लकड़ी बेचते
हैं और उन्हें ₹500 मिलते हैं।
मूलचंद जोर से बोलता है बस मुझे यही करना है। मूलचंद अपनी कुल्हाड़ी लेकर जंगल पहुंचता है और ईमानदारी से सूखी और पुरानी लकड़ियां काटना
शुरू करता है। तभी तीन-चार मोटेताजे आदमी जो उस क्षेत्र में लकड़ी बेचने का एकाधिकार रखते थे उसके पास आते हैं। जंगल ठेकेदार एक बीरबल जोर से
बोलता है ओय कौन है तू? तुझे हमने कभी यहां नहीं देखा तो कौन है? और तू यहां क्या कर रहा है? मैं मूलचंद मैं भी लकड़ी काटने आया हूं। मैं इसे बेचकर अपने परिवार का गुजारा करना चाहता हूं। जंगल ठेकेदार शंकर
बोलता है तू बेचेगा लकड़ी तुझे पता है यह किसका इलाका है इस जंगल की सारी लकड़ियां हमारे नाम की हैं। सिर्फ हमें अधिकार है यहां काम करने का।
मूलचंद नियम की बात करता है। यह कैसे? यह तो सरकार की और भगवान की जमीन है। इस पर किसी
एक का अधिकार नहीं हो सकता। कोई भी काट सकता है। ज्यादा जुबान मत चला। यह जो कुल्हाड़ी देख रहा है ना, यह तेरे मुंह पर मारूंगा। तेरा मुंह फट जाएगा। चुपचाप यहां से निकल जा। कल से यहां
देखना नहीं चाहिए। मूलचंद जानता था कि लड़ना बेकार
है। वो उदास मन से चुपचाप अपनी कुल्हाड़ी उठाकर चला जाता है। सेठ ने उसे होटल से निकाला और अब जंगल के दबंगों ने उसे भूखा मारने की कसम खाई थी।
मूलचंद घर पहुंचता है। पर वह किसी को कुछ नहीं बताता।
वो लकड़ी काटने का एक नया तरीका सोच रहा था। तभी उसका बेटा प्रवीण तेज बुखार से कांपने लगता
है। मूलचंद जी जल्दी देखिए। प्रवीण इसकी तबीयत बहुत खराब है। इसे बुखार चढ़ गया है। मूलचंद घबराकर
पास के डॉक्टर के पास भागता है। डॉक्टर चेक
करते हुए बोलते हैं। अरे इसे तो बहुत तेज बुखार है।
यह टाइफाइड हो सकता है। इसे तुरंत इलाज की जरूरत है। इसे कुल पांच इंजेक्शन लगेंगे। एक इंजेक्शन की कीमत ₹200 है। मूलचंद बहुत डर जाता है।
डॉक्टर साहब प्लीज इलाज शुरू कीजिए। मेरे
पास अभी बस थोड़े ही पैसे हैं। मैं बाकी पैसे बाद में
दे दूंगा। पहले पैसे इलाज
बाद में। इतना बड़ा इलाज उधार
में नहीं हो सकता। आपको कम से कम पहला
इंजेक्शन लगवाने के लिए ₹200 देने होंगे। मूलचंद की आंखों में आंसू आ जाते हैं। डॉक्टर साहब प्लीज यह ₹100 लीजिए। मैं कल सुबह कहीं से ₹200 और लाऊंगा। प्लीज बस आज इसे पहला इंजेक्शन लगा दीजिए। डॉक्टर डॉक्टर को दया आती है। ठीक है। तुम्हारे
ईमानदार चेहरे को देखकर मैं पहला इंजेक्शन लगा
देता हूं। दवा भी दे रहा हूं। पर कल तुम्हें किसी भी
कीमत पर ₹200 लेकर आना होगा। डॉक्टर प्रवीण को इंजेक्शन देते हैं। मूलचंद रात भर जागकर सोचता है। अब ₹200 कहां से आएंगे? मूलचंद को डर लग रहा था। तभी उसे जंगल के दबंगों की धमकी
याद आई। उसने सोचा अगर मैं दिन
में लकड़ी काटता हूं तो वह मुझे मारेंगे।
पर रात में बस अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है। प्रवीण की जान के लिए बच्चों के भविष्य के लिए मुझे रिस्क लेना होगा। पूरी रात 3:00 बजे की गहन ठंड में मूलचंद अपनी कुल्हाड़ी लेकर चुपचाप जंगल की ओर जाता है। वह जानता था कि
यह खतरनाक है। पर बेटे की जिंदगी से ज्यादा खतरा
क्या हो सकता है। मूलचंद रात के
गहन अंधेरे और कंपा देने वाली ठंड में जंगल में था।
जंगल ठेकेदार दिन में आते थे इसलिए रात ही उसके लिए सुरक्षित थी। वो जानता था कि यह गैप कानूनी है।
पर उसके बेटे की जान बचाने के लिए यह एकमात्र रास्ता था। मूलचंद भगवान मुझे माफ करना। मैं मजबूर हूं। मेरे
बच्चे को बचाना है। शक्ति दो ताकि मैं जल्दी से लकड़ियां काट सकूं। पूरी रात लकड़ी काटने के बाद वो छिपकर गांव
में वापस आता है। मैं वो उसी
व्यापारी के पास जाता है जिसने पहला गट्ठा
बेचते हुए देखा था। व्यापारी खुशी-खुशी उससे लकड़ी लेता है और उसे ₹500 देता है। मूलचंद पैसे लेते हुए
शुक्रिया मालिक। वो तुरंत डॉक्टर के पास जाता
है। ₹200 देकर अगले इंजेक्शन के लिए कहता है
और बाकी ₹300 दामिनी को देता है।
दामिनी घबराओ मत। प्रवीण ठीक हो जाएगा। मैं रात
को काम कर रहा हूं। अब हमारे पास राशन और दवा
दोनों के पैसे होंगे। तुम बच्चों का ध्यान रखो। यह सिलसिला तीन-चार दिन तक चलता है। मूलचंद रात को लकड़ी
काटता, सुबह बेचता और डॉक्टर को ₹200 देकर इंजेक्शन लगवाता। कुछ ही दिनों में
प्रवीण पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है। प्रवीण अब खेल रहा है। तारा भी खुश है। आपकी
मेहनत रंग लाई मूलचंद जी। आपने सेठ की नौकरी से
ज्यादा पैसा खुद कमा लिया। हां दामिनी अब
प्रवीण बिल्कुल ठीक है। और सुनो मैंने
थोड़ा-थोड़ा करके ₹500 बचा लिए हैं। लगभग एक हफ्ते बाद। इधर मूलचंद के
होटल से जाने के बाद सेठ रंजीत सिंह ने दूसरे लोगों
से चाय बनवाना शुरू कर दिया था। पर किसी के हाथ में वह जादू नहीं था। सेठ जी यह क्या चाय है?
इसमें तो पहले वाला स्वाद
बिल्कुल नहीं है। यह तो फीकी लग रही है। क्या आप मिलावट कर रहे हैं? पैसे वापस कीजिए। ग्राहक दो। हां, हमें ऐसी चाय नहीं पीनी। जब से मूलचंद गया है,
आपकी चाय का स्वाद खराब हो गया है। हमें अपनी चाय चाहिए। लगातार तीन दिन
तक ग्राहक आते, चाय पीते और बुरा भला कह
कर चले जाते। सेठ का धंधा पूरी तरह ठप हो गया था। उसे
अपनी गलती का एहसास होने लगा था। हाय मैंने क्या कर दिया?
मैंने उस गरीब को अपमानित किया। उसकी चाय में स्वाद था मेरी अक्ल में नहीं। जब वह आएगा तो मैं उससे माफी मांगूंगा
और पूरे पैसे दूंगा। उधर मूलचंद ने ₹6500 से एक छोटा सा ठेला, चाय बनाने के
लिए बर्तन और जरूरी सामान खरीदा। अगली सुबह ठंड और कोहरे के बीच रंजीत होटल के ठीक सामने एक छोटा सा साफ
सुथरा चाय का ठेला लग गया था। ठेले पर सुंदर
अक्षरों में लिखा था तारा टी स्टॉल। मशहूर गांव की
चाय। अरे यह तो वही है। यह तो मूलचंद है जो सेठ के यहां काम करता था। इसकी चाय में असली स्वाद था। गांव वाले पहचान गए और कुछ ही मिनटों में तारा टी स्टॉल पर भीड़ लग गई। लोगों को वही पुराना और
जादुई स्वाद वापस मिल गया था। तुम्हारी चाय
पीकर ठंड गायब हो गई। कितना अच्छा हुआ कि
तुम खुद का काम कर रहे हो। रंजीत सेठ यह
देखकर आग बबूला हो जाता है। उसका धंधा पूरी
[संगीत] तरह ठप हो गया था। वो गुस्से से
तमतमाते हुए मूलचंद के पास जाता है। मूलचंद मेरे प्यारे मूलचंद ये क्या नाटक लगा रखा है? बाहर इतनी ठंड है। चल हम पहले की तरह वापस
अपनी दुकान पर काम करते हैं। मैं तुझे एक
दिन का पूरा ₹500 दूंगा। माफ कर दीजिए सेठ जी।
मुझे अब आपकी कोई जरूरत नहीं है। मैं अब अपने पैर पर खड़ा हो चुका हूं। मैं खुद की मेहनत से कमाता हूं।
तुझे मैं देख लूंगा। यह सब तेरा नाटक है।
कुछ महीनों बाद मूलचंद का तारा टी स्टॉल तेजी से चलता
रहा। उसने दो मंजिला नीले रंग का एक छोटा सा पक्का घर भी
बना लिया था। उसने बच्चों के लिए शिक्षा और शादी के
लिए ₹44 लाख भी बचा लिए थे। सेठ का धंधा पूरी तरह बंद हो गया था। उसने बदला लेने की सोची। सेठ
रंजीत सिंह ने दो गुंडों को ₹5,000 दिए। जाओ उसके
घर जाओ। उसने जो पैसे रखे हैं वे चुरा लाओ। रात 2:00 बजे। सेठ के दो आदमी मूलचंद के घर के दरवाजे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। तभी पड़ोस के बुजुर्ग दयाराम ने उन्हें देख लिया। दयाराम चोर चोर पकड़ो। डायराम की चीख सुनकर पूरा गांव जाग गया और मूलचंद के घर के बाहर जमा हो गया। चोरों कोंगे हाथों पकड़ा गया। गांव वाला तुम
कौन हो? यहां क्या कर रहे थे? चोर एक। सेठ रंजीत सिंह हमें उसने भेजा था।
उसी ने ही दुकान भी जलाई थी। पूरा गांव गुस्से में
उठ खड़ा हुआ। पुलिस बुलाई गई और गांव वालों ने सारी बात बताई। सेठ रंजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। अंत में कोर्ट ने सेठ को सजा सुनाई और मूलचंद को उसके पुराने बकाया और नुकसान के लिए ₹1 लाख की बड़ी रकम दी गई। मूलचंद ने अपनी ईमानदारी,
मेहनत और दामिनी के समझदार फैसले से किस्मत को बदल दिया था। अब ठंड हो
या गर्मी तारा टी स्टॉल पर हमेशा भीड़ रहती थी। उसकी चाय अब गांव की सबसे बड़ी पहचान बन गई थी। यहीं पर कहानी कोहरे
की चादर और किस्मत का उजाला समाप्त होती
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