एक छोटे से गांव धरमपुर में श्यामू नाम का एक गरीब आदमी अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता था। श्यामू के पास कोई जमीन नहीं थी। इस वजह से वो जंगल से लकधी काट कर बेचता और उसी से अपना और अपनी मां का गुजारा करता था। एक दिन श्यामू बेटा जल्दी निकल जा। सूरज उग आया है। जंगल जाने में देर कर देगा तो शाम तक लकड़ी काट कर लौटना मुश्किल हो जाएगा। हां मां मैं अभी निकलता हूं। तू चिंता मत कर। आज कोशिश करूंगा ज्यादा लकड़ियां लाऊं ताकि दो दिन का खर्चा निकल जाए। श्यामू अपनी कुल्हाड़ी उठाता है और झोपड़ी से बाहर निकल पड़ता है। श्यामू जंगल की ओर जा रहा था। अचानक रास्ते में उसे गांव का सेठ गोपाल दास मिलता है।
अरे श्यामू कहां जा
रहा है सुबह-सुबह? प्रणाम सेठ जी
जंगल जा रहा हूं लकड़ी काटने मां के खाने का इंतजाम करना है ना बस वही करने निकल
पड़ा तू भी अजीब आदमी है श्यामू ना जमीन है ना खेत बस यही जंगल की लकड़ियों से पेट
पालता है सेठ जी भगवान ने जो दिया है उसी में जी रहा हूं। बात तो ठीक कहता है तू।
अच्छा सुन मुझे अपनी गाय की गौशाला बनाने के लिए कुछ लकड़ियों की जरूरत पड़ेगी।
क्या तू ला सकेगा? क्यों नहीं सेठ
जी? अगर आपको लकड़ी
चाहिए तो मैं पहुंचा दूंगा। बस बता दीजिए कितनी चाहिए और कब तक? अच्छा तो कल से ही लकड़ी
मेरे गोदाम में पहुंचाना शुरू कर। दाम अच्छा दूंगा। अगर तेरा काम ठीक रहा तो आगे
भी तुझसे ही काम लूंगा। धन्यवाद सेठ जी। मैं अपनी पूरी मेहनत लगा दूंगा। श्यामू
जंगल में पहुंचता है। चारों ओर हरेभरे पेड़, पक्षियों की चहचहाट। श्यामू कुल्हाड़ी उठाकर लकड़ी काटना
शुरू करता है। अगर यह काम सही रहा तो मां को आराम मिलेगा। शायद झोपड़ी भी ठीक कर
सकूं। भगवान बस तू साथ देना। धीरे-धीरे शाम होती है।
श्यामू लकड़ियां
बांधकर अपने कंधे पर लाता है और गांव लौटता है। उसकी मां दरवाजे पर बैठी इंतजार कर
रही थी। आ गया बेटा। कितनी देर लगा दी? थक गया होगा। हां मां। पर आज मन खुश है। सेठ जी ने मुझसे
ढेर सारी लकड़ी मंगवाई है। अगर काम सही हुआ तो आने वाले दिन बदल सकते हैं। भगवान
तेरा भला करे बेटा। तेरी मेहनत रंग लाएगी। मां बचे हुए राशन से खाना बनाती है। फिर
दोनों खाना खाते हैं।
शाम का समय। आसमान पर काले बादल छा जाते हैं। तेज हवाएं
चलने लगती हैं। अचानक बारिश शुरू हो जाती है। गांव की पगडंडियाओं कीचड़ से भर जाती
हैं। झोपड़ी के अंदर श्यामू की बूढ़ी मां घाट पर लेटी थी। बारिश में चल रही ठंडी
हवा से श्यामू की मां को तेज बुखार हो गया था। ओ राम ओ श्यामू मेरा सिर जल रहा है
बेटा। अरे मां ये क्या हो गया? तेरा शरीर तो तपा हुआ है। तू बिल्कुल चिंता मत कर। मैं अभी
तेरे लिए दवा लेकर आता हूं। इसके बाद श्यामू तुरंत भीगते हुए बाहर निकल जाता है।
तेज बारिश में श्यामू की हालत भीग कर बदतर हो जाती है। वह भीगते हुए सेठ गोपाल दास
के हवेली पर पहुंचता है और दरवाजा खटखटाता है।
तभी दरवाजा खुलता
है और सेठ अंदर से निकलता है। अरे श्यामू तू इस वक्त और इस बारिश में यहां क्या कर
रहा है? सेठ जी मेरी मां
को तेज बुखार हो गया है। हालत बहुत खराब है। घर में ना दवा है ना राशन। मुझे पैसों
की सख्त जरूरत है। तो तू चाहता क्या है? सेठ जी मुझे कुछ ज्यादा पैसे उधार दे दीजिए। मैं कुछ पैसे
लकड़ी में कटवा दूंगा और बाकी मैं मजदूरी करके लौटा दूंगा। ठीक है श्यामू। पैसे तो
मैं दे दूंगा लेकिन ब्याज देना होगा। ब्याज सेठ जी मैं गरीब आदमी हूं। ब्याज के
साथ पैसे कैसे लौटाऊंगा? तो सुन मैं बिना
ब्याज के पैसे नहीं देता। यदि ब्याज के साथ पैसे देने हैं तो बता वरना पैसे भूल
जा। ठीक है सेठ जी जो शर्त आप कहें मैं मान लूंगा। ये ले कुछ रुपए और याद रखना
श्यामू। ब्याज सहित पैसे समय पर चुका देना। वरना तू जानता ही है। धन्यवाद सेठ जी।
मैं मेहनत करके एक-एक पैसा चुका दूंगा।
श्यामू बारिश में
फिर से भीगता हुआ बेते जी की झोपड़ी की ओर दौड़ता है। वैद्य जी एक दिया लेकर
दरवाजा खोलते हैं। अरे श्यामू इस तूफानी बारिश में यहां क्या कर रहा है? सब ठीक तो है? वैद्य जी मेरी मां को तेज
बुखार हो गया है। कृपा करके कुछ दवा दे दीजिए। ओह ठीक है। रुक। मैं अभी जड़ी
बूटियां तैयार करता हूं। वैद्य जी जल्दी से एक छोटी थैली में दवा भरकर श्यामू को
देते हैं। यह दवा हर 3 घंटे में देना।
मां को आराम मिलेगा। धन्यवाद वैद्य जी। श्यामू पैसे देकर झोपड़ी की ओर लौटता है।
मां देखो वैद्य जी से दवा ले आया हूं। यह लो अभी खा लो। श्यामू मां को दवा खिलाता
है और पानी पिलाता है। कुछ देर बाद मां का पसीना छूटता है। अरे अब थोड़ा आराम लग
रहा है बेटा।
भगवान का शुक्र है मां। तू जल्दी ठीक हो जाएगी। अगली सुबह
मां कुछ बेहतर महसूस कर रही थी। श्यामू थका हुआ पास बैठा था। श्यामू बेटा एक बात
पूछूं? यह दवा और खर्च
के लिए पैसे तू कहां से लाया? मां कल रात मैं सेठ गोपाल दास के पास गया था। उनसे उधार
लिया है। मगर सेठ ने ब्याज की शर्त रखी है। ओह बेटा ब्याज वाला पैसा गरीब आदमी को
और गरीब बना देता है। हमें सोच समझ कर कदम रखना होगा। हां मां लेकिन उस समय और कोई
रास्ता ही नहीं था। मां कुछ देर सोचती है। श्यामू क्यों ना तू इन बचे हुए पैसों से
समोसे बनाकर बेचने लगे। देख इस बरसात में लकड़ी सुखाना और बेचना मुश्किल होगा। पर
गरमा गरम समोसे लोग खुशी से खरीदेंगे। अरे मां, यह तो बहुत अच्छा सुझाव है। अगर काम चल पड़ा तो हम
धीरे-धीरे सेठ का उद्धार भी चुका देंगे। हां बेटा मेहनत ईमानदारी से करोगे तो
भगवान जरूर साथ देगा।
इसके बाद श्यामू
कुछ पैसे लेकर गांव की किराना दुकान पर पहुंचता है। राम राम लाला जी। मुझे बेसन, तेल, हरी मिर्च, धनिया और मसाले चाहिए।
समोसे बनाने का सामान दे दीजिए। अरे श्यामू, तू लकड़ी का काम छोड़ अब समोसे बनाएगा। वाह रे किस्मत। हां
लाला जी वक्त के अनुसार रास्ता बदलना ही पड़ता है। मेहनत करूंगा सब ठीक होगा।
दुकानदार सामान तौल कर थैली में रख देता है। श्यामू पैसे चुका देता है और घर की ओर
लौट पड़ता है। उसकी मां पहले से तैयार बैठी थी। मां सारा सामान ले आया हूं। अब काम
शुरू करें। हां बेटा। आज हम दोनों मिलकर मेहनत करेंगे। देखना सब अच्छा होगा। दोनों
मिलकर समोसे बनाते हैं।
झोपड़ी में समोसों की खुशबू फैल जाती है। श्यामू, यह तो बहुत अच्छे बन रहे
हैं। इन्हें बेचने ले जा और ईमानदारी से मेहनत कर। हां मां, आज से हमारी नई शुरुआत
होगी। श्यामू समोसे एक टोकरी में रखता है और सिर पर उठाकर बाजार की ओर निकल पड़ता
है। बाजार में लोगों की भीड़ थी। श्यामू सड़क के किनारे एक साफ जगह पर टोकरी रखता
है और ऊंची आवाज में समोसे बेचना शुरू करता है। गरमा गरम समोसे, ताजे और स्वादिष्ट समोसे।
कुछ लोग उसके आसपास रुक कर देखते हैं पर समोसे नहीं खरीदते। पास ही एक और ठेला लगा
था। जहां पहले से समोसे बिक रहे थे। उस ठेले का मालिक था। हेमु जो वर्षों से बाजार
में समोसे बेचता आ रहा था। अरे ये क्या? यह श्यामू लकड़हारा यह समोसे बेचेगा और वो भी मेरे सामने।
इसकी इतनी हिम्मत। हेमू श्यामू की ओर घूरता है। ठीक है। अब देखता हूं कि यह कैसे
समोसे बेचता है। इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा।
श्यामू ग्राहकों को
बुलाने में व्यस्त था। उसे हेमु की चालाकी का अंदाजा नहीं था। गरमा गरम समोसे।
ताजे और स्वादिष्ट समोसे। ले लो भाई ले लो। तभी दो आदमी उसके पास आते हैं। अरे
श्यामू तू लकड़हारा था ना?
अब समोसे बेच रहा
है? हां भाई, करना पड़ता है। पेट पालने
के लिए मेहनत करनी ही पड़ती है। चल ठीक है। जरा हमको भी समोसे खिला। देख तेरे
समोसे कैसे हैं। श्यामू खुशी से तुरंत दो समोसे निकाल कर उन्हें देता है। लीजिए
भाई ताजे गरमा गरम समोसे हैं। जरूर पसंद आएंगे। दोनों आदमी एक-एक निवाला खाते हैं।
अचानक वे चेहरे बिगाड़ लेते हैं और समोसे जमीन पर फेंक देते हैं। अरे यह क्या
बनाया है? बिल्कुल बेस्वाद
ना नमक है ना मसाले का स्वाद। यह समोसे खाने लायक ही नहीं है। श्यामू तुझे किसने
समोसे बनाना सिखाया? एकदम बकवास है
यह।
ऐसे तो कोई ग्राहक तेरे पास नहीं आएगा। लोग यह देख हंसने
लगते हैं। श्यामू का चेहरा उतर जाता है। उसकी आंखों में आंसू भर आते हैं। हे भगवान, इतनी उम्मीद से काम शुरू
किया था। क्या सच में मैं समोसे बेचने लायक नहीं हूं? पास खड़ा हेमू यह दृश्य
देखकर मन ही मन मुस्कुराता है। हां हां यही होता है जब कोई मेरे सामने समोसे बेचने
की कोशिश करता है। अब देखता हूं यह श्यामू कितने दिन टिकता है। अरे भाइयों क्यों
उन बेसवाद समोसों के चक्कर में पड़े हो। आओ मेरे पास आओ। यहां गरमा गरम चटपटा और
मजेदार समोसा मिलेगा। दोनों आदमी हेमु के ठेले की ओर बढ़ते हैं। आसपास खड़े अन्य
ग्राहक भी हेमु के पास जाने लगते हैं। हां भाई हेमु के समोसे तो हमेशा लजीज होते
हैं। चलो वहीं खाते हैं। धीरे-धीरे सभी लोग हेमु के ठेले पर जुट जाते हैं।
श्यामू अकेला सड़क
किनारे अपनी टोकरी लिए रह जाता है। लगता है आज कोई भी मेरे समोसे नहीं खरीदेगा।
श्यामू निराश मन से अपनी टोकरी उठाता है और भीगी आंखों के साथ घर लौट आता है।
झोपड़ी के दरवाजे पर उसकी मां इंतजार कर रही होती है। क्या हुआ बेटा? समोसे बिके नहीं क्या? श्यामू चुपचाप टोकरी जमीन
पर रख देता है। मां बाजार में सबने मेरे समोसे बेसवाद कह कर फेंक दिए। किसी ने
पसंद नहीं किए और सारे पैसे भी इसमें लग गए। अब सेठ का कर्ज कैसे चुकाएंगे? बेटा चिंता मत कर। हर नया
काम शुरुआत में कठिन होता है। भगवान तेरे लिए कोई ना कोई रास्ता जरूर निकालेंगे।
वे दोनों बात कर ही रहे थे। तभी बाहर से आवाज आती है। दरवाजे पर सेठ गोपाल दास
अपने दो आदमियों के साथ खड़ा था। अरे श्यामू कहां है तू? बाहर आ। आज हिसाब करना
है। मां यह तो सेठ है। लगता है पैसे वसूलने आया है। हिम्मत रख बेटा। सच बोलना।
भगवान सब देख रहे हैं। श्यामू अपनी मां के साथ बाहर आता है। सेठ गोपाल दास अपनी
मूछों पर ताव देते हुए खड़ा था। सेठ जी मुझे पता है कि आप पैसे लेने आए हैं। मगर
क्षमा कीजिए। अभी मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैंने आपसे जो रुपए लिए थे, वह सब समोसे के काम में
लगा दिए। अभी काम अच्छा नहीं चल रहा। लेकिन जैसे ही काम संभल जाएगा, मैं आपके पैसे चुका
दूंगा। यह सुन सेठ भौहे चढ़ाता है और ऊंची आवाज में बोलता है, अरे मुझे बेवकूफ मत बना।
तेरे समोसों का क्या भरोसा?
बिके या ना बिके।
मैं यहां हाथ पर हाथ धरे कब तक बैठा रहूं? मैंने तुझे उधार पैसे दिए थे। कोई मजाक नहीं किया था।
श्यामू सिर झुका लेता है। उसकी मां की आंखों में भी आंसू भर आते हैं। सुन ले
श्यामू। आज से यह घर मेरा है।
जब तेरे पास पैसे हो तब आकर इसे छुड़ा लेना। अभी के अभी
अपना सामान बाहर निकालो। सेठ के दोनों आदमी आगे बढ़कर झोपड़ी के अंदर घुसते हैं।
वे बर्तन, कपड़े और चटाई
उठाकर बाहर फेंकना शुरू कर देते हैं। सेठ जी ऐसा मत कीजिए। मेरी बूढ़ी मां कहां
जाएगी? बेटा सब्र रख।
भगवान सब देख रहे हैं। आसपास के कुछ गांव वाले यह दृश्य देखकर इकट्ठा होने लगते
हैं। पर कोई भी सेठ के डर से आगे नहीं आता। श्यामू और उसकी मां अपना सामान उठाकर
गांव से बाहर निकलते हैं। चलते-चलते वे नदी किनारे पहुंचते हैं। नदी के किनारे पर
घास और पेड़-पौधे थे। बेटा अब हम कहां रहेंगे? मां जब तक भगवान साथ हैं, हम भूखे प्यासे नहीं मरेंगे। यहीं नदी किनारे
एक छोटी सी झोपड़ी बना लेंगे। इसके बाद श्यामू कुछ लकड़ियां और पत्ते इकट्ठा करता
है। मां उसकी मदद करती है। धीरे-धीरे दोनों एक छोटी सी कच्ची झोपड़ी बना लेते हैं।
देख अब सिर पर छत तो है। चाहे कितनी भी छोटी क्यों ना हो। हां मां यह झोपड़ी ही
हमारे लिए महल से कम नहीं। कुछ समय बाद श्यामू फिर से अपने बनाए समोसे टोकरी में
रखकर बाजार जाता है। उसका चेहरा उम्मीद से भरा था।
शायद आज कोई मेरे
समोसे खरीदे। शायद आज सब कुछ बदल जाए। वह सड़क किनारे बैठ जाता है और आवाज लगाता
है। गरमा गरम समोसे, घर के बने समोसे।
लो भाई लो। उसी समय एक बूढ़ा कमजोर आदमी लाठी टेकते हुए हेमु के ठेले के पास
पहुंचता है। उसका चेहरा भूख से मुरझाया हुआ था। बेटा सुबह से कुछ नहीं खाया। जरा
कुछ खाने को दे दो। पेट में कुछ सहारा हो जाए। हेमू बूढ़े की ओर देखता है। फिर
गुस्से में चिल्लाता है। अरे तुझे दिख नहीं रहा? यहां कितनी भीड़ लगी है। जाओ आगे बढ़ो। न जाने
कहां-कहां से चले आते हैं। उसी समय श्यामू दूर से यह दृश्य देख रहा होता है। उसकी
आंखों में करुणा भर आती है। बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए श्यामू के पास
आता है। बेटा बहुत भूख लगी है। अगर कुछ खाने को हो तो दे दो। श्यामू बूढ़े को
देखता है।
ठीक है बाबा। वैसे
भी मेरे समोसे कोई नहीं खा रहा। आप ही खा लीजिए। श्यामू अपने हाथ से प्लेट में दो
गरमा गरम समोसे रखकर बूढ़े को देता है। पहला निवाला लेते ही उसका चेहरा चमक उठता
है। वाह बेटा तुम्हारे समोसे तो बहुत स्वादिष्ट हैं। सचमुच गजब का स्वाद है। बाबा
क्या आप सच कह रहे हो? सब तो कहते थे कि
मेरे समोसे बेस्वाद हैं। अरे बेटा मैं झूठ क्यों बोलूंगा? यकीन ना हो तो खुद खाकर
देख ले। श्यामू थोड़ी हिचकिचाहट के साथ टोकरी से एक समोसा उठाता है। अरे यह तो सच
में बहुत स्वादिष्ट है। यह कैसे हो गया? श्यामू की आंखों में हैरानी के साथ खुशी भी झलकने लगती है।
बूढ़ा आदमी मुस्कुराते हुए श्यामू की ओर देखता है। फिर वह
अपनी झोली में हाथ डालता है और एक छोटी सी थैली निकालकर श्यामू को देता है। बेटा
यह बहुत दुर्लभ झड़ी बूटी है। इसे जब भी अपने समोसे में मिलाएगा तेरे समोसों का
स्वाद कई गुना बढ़ जाएगा। लेकिन याद रखना यह बूटी सिर्फ भलाई के काम में ही
इस्तेमाल करनी है। बाबा आप कौन हैं? और मुझे यह सब क्यों दे रहे हैं? बूढ़ा मुस्कुराता है और
धीरे-धीरे गायब हो जाता है। यह बाबा थे या खुद भगवान का कोई रूप। संध्या तक श्यामू
के कुछ और समोसे बिक जाते हैं। वह थका हुआ, मगर थोड़ा खुश होकर घर लौट आता है। मां, आज भगवान ने चमत्कार कर
दिया। कुछ समोसे बिक गए और हां एक बाबा ने मुझे एक जड़ी बूटी दी है। बेटा हो सकता
है वह बाबा भगवान के ही भेजे दूत हो।
उनकी बात को हल्के में मत लेना। सुबह होते ही श्यामू गांव
की किराना दुकान पर पहुंचता है। लाला जी यह कुछ पैसे हैं। बाकी उधार में लिख
लीजिए। मुझे समोसे बनाने का सामान चाहिए। ठीक है श्यामू। तू ईमानदार आदमी है। तेरे
लिए उधार लिख दूंगा। श्यामू सामान लेकर घर लौटता है। घर पहुंचकर मां और बेटा मिलकर
समोसे बनाने लगते हैं। श्यामू बाबा की दी हुई जड़ी बूटी उठाता है और मसाले में
मिलाता है। जैसे ही जड़ी बूटी मिलती है, रसोई में एक अद्भुत और मनमोहक खुशबू फैल जाती है। मां, यह कैसी अद्भुत सुगंध है? लगता है सचमुच यह जड़ी
बूटी जादुई है। बेटा, अब तेरे समोसे
जरूर बिकेंगे। श्यामू ताजे और सुगंधित समोसे टोकरी में भरता है और उम्मीद भरी
नजरों से बाजार की ओर चल पड़ता है। बाजार पहुंचते ही समोसे की महक चारों ओर फैलने
लगती है और लोग उसकी ओर मुड़कर देखने लगते हैं। तभी दो आदमी उस उत्साह से श्यामू
की ओर बढ़ते हैं।
अरे भाई क्या डाला है समोसे में? खुशबू तो बड़ी लाजवाब आ
रही है। हां भाई जल्दी खिलाओ। रुका ही नहीं जा रहा। श्यामू मुस्कुरात हुए उन्हें
गरमागरम समोसे परोसता है। दोनों आदमी समोसे लेते हैं। वाह भाई कमाल कर दिया।
तुम्हारे समोसों में तो बिल्कुल अलग ही स्वाद है। ऐसा तो हमने कहीं नहीं खाया। सही
कहा। यह समोसे तो जैसे मुंह में घुल रहे हैं। भाई हमें और पैक कर दो। धीरे-धीरे
लोग इकट्ठे होने लगते हैं। कोई खुशबू से आकर्षित होकर आता है। कोई पहले खा चुके
लोगों की तारीफ सुनकर श्यामू के पास भीड़ लग जाती है। भैया दो समोसे इधर ही देना।
श्यामू पसीने से लथपथ होते हुए भी प्रसन्नता से सभी को समोसे परोसता जाता है।
संध्या तक श्यामू के सारे समोसे बिक जाते हैं। वह टोकरी उठाकर हल्की थकान के साथ
मगर दिल में अपार खुशी लिए घर की ओर चल पड़ता है। मां आज तो चमत्कार हो गया। मेरे
सारे समोसे बिक गए। लोग बार-बार तारीफ कर रहे थे। देखा बेटा भगवान मेहनती और नेक
दिल का साथ कभी नहीं छोड़ते। अगली सुबह का बाजार सुबह-सुबह श्यामू टोकरी में ताजे
समोसे लेकर बाजार पहुंचता है।
समोसे में बाबा की
दी हुई जड़ी बूटी मिलाता है। थोड़ी ही देर में समोसों की सुगंध चारों ओर फैल जाती
है। अरे वही समोसे वाला आ गया। चलो जल्दी-जल्दी ले लें वरना खत्म हो जाएंगे। कुछ
ही देर में श्यामू की दुकान पर भीड़ लग जाती है। उधर हेमू अपने ठेले पर गुस्से से
देख रहा था। उसके ठेले पर एक भी ग्राहक नहीं था। हम यह लकड़हारा कहां से समोसे
वाला बन गया? और ऊपर से सब लोग
इसके ठेले पर टूट पड़ते हैं। मुझे तो एक-एक ग्राहक के लिए आवाज लगानी पड़ रही है।
आखिर चक्कर क्या है? क्योंकि इसमें
ऐसा कोई हुनर नहीं है। वह गुस्से में मुट्ठियां भी लेता है। इस प्रकार धीरे-धीरे
दिन बीतते हैं। श्यामू का नाम पूरे गांव और आसपास के कस्बों में फैल जाता है। कुछ
महीनों में श्यामू अब सड़ किनारे से हटकर एक छोटी सी दुकान खोल लेता है। श्यामू की
दुकान पर ग्राहकों की लंबी कतार लगी थी। भैया दो प्लेट समोसे देना और हां छटनी
ज्यादा डालना। श्यामू सबको खुशी-खुशी परोसता है। उसकी मां दुकान के कोने में बैठकर
गर्व से बेटे को देखती रहती है। कुछ दिनों बाद श्यामू कमाई का बड़ा हिस्सा लेकर
सीधे सेठ के घर पहुंचता है। सेठ दरवाजे पर बैठा हिसाब किताब लिख रहा होता है। सेठ
जी यह लीजिए आपके सारे पैसे। अब कृपा करके मेरा घर मुझे वापस कर दीजिए। श्यामू मैं
तुझसे शर्मिंदा हूं। उस दिन मैंने लालच में आकर तुझ पर ज्यादती की थी। तूने मेहनत
और ईमानदारी से अपनी किस्मत बदल दी। मैं तुझसे माफी मांगता हूं।
सेठ खाते से नाम
काटता है। जा अब तेरा घर तेरा हुआ। भगवान तुझे और तरक्की दे। धन्यवाद सेठ जी।
श्यामू घर लौटता है। मां की आंखों में आंसू भर आते हैं। उधर हेमु का ठेला खाली
पड़ा था। अब तो मेरा पूरा काम ठप हो गया है। सब लोग उस श्यामू के पास क्यों जा रहे
हैं? जरूर कोई राज है
उसके समोसों में। मुझे यह जानना ही होगा। एक शाम श्यामू दुकान बंद करने के बाद घर
पर समोसे बनाने की तैयारी कर रहा होता है। वह अपने छोटे से डिब्बे से बाबा की दी
हुई जड़ी बूटी निकालकर समोसे में डालता है। उस समय खिड़की के पीछे छिपकर हेमू सब
देख रहा होता है। ओ अब समझा यही उस जड़ी बूटी का कमाल है। बिना इसके तो उसके समोसे
साधारण ही होंगे। अब देखता हूं श्यामू तेरी दुकान कैसे चलती है। रात गहराने पर
श्यामू और उसकी मां सो जाते हैं। तभी हेमू दबे पांव श्यामू के घर में पहुंचता है
और उस डिब्बे को ढूंढ निकालता है। मिल गया।
यही है वो जड़ी बूटी। अब आएगा असली मजा। कल से लोग फिर मेरे
पास ही आएंगे। वह डिब्बा अपने हाथ में दुखा कर चुपके से निकल जाता है। अगली सुबह
श्यामू दुकान की तैयारी में जुटा था। श्यामू डिब्बा निकालने अलमारी में हाथ डालता
है लेकिन डिब्बा नहीं मिलता। श्यामू पूरे घर के कोने-कोने में ढूंढता है। लेकिन
जड़ी बूटी का डिब्बा कहीं नहीं मिलता। उधर हेमू अपनी ठेली के पास बैठा था। सामने
वहीं चुराई हुई जड़ी बूटी का डिब्बा रखा था। हां हां। अब देखना जब यह समोसे तैयार
होंगे तो खुशबू चारों ओर फैल जाएगी और लोग फिर से मेरी ठेली पर टूट पड़ेंगे।
श्यामू का खेल अब खत्म। वह जल्दी-जल्दी समोसे ठेले पर सजा देता है। कुछ ही देर में
बाजार में लोग आते हैं। एक ग्राहक हेमु की ठेली पर खड़ा होकर सूंघता है। अरे यह
कैसी गंध है? बड़ी अजीब सी लग
रही है। खुशबू तो बिल्कुल वैसी नहीं जैसी श्यामू के समोसों से आती थी। चलो फिर भी
एक खाकर देखते हैं। वे समोसा लेते हैं और जैसे ही मुंह में डालते हैं तुरंत थूक
देते हैं।
अरे यह तो कड़वा और
बेस्वाद है। क्या मिला रखा है इसमें? भाई यह तो सेहत बिगाड़ देगा। चलो यहां से चलते हैं। हेमु के
माथे पर पसीना छलकने लगता है। वह खुद एक समोसा खाता है और तुरंत खांसने लगता है।
अरे यह तो सचमुच कड़वा है। उस श्यामू के समोसे ऐसे कैसे मीठे और स्वादिष्ट हो गए।
मैंने तो वहीं जड़ी बूटी मिलाई थी। वह चिढ़कर डिब्बा फेंक देता है। अचानक तेल की
कढ़ाई गिर जाती है और आग भड़क उठती है। देखते ही देखते उसकी ठेली जलकर राख हो जाती
है। अरे अरे बचाओ। मेरी ठेली जल गई। सन्नाटे में हेमु राख हुए ठेले को देखता है।
आंखों से आंसू बहने लगते हैं। अगली सुबह हेमू सीधे श्यामू की दुकान पर पहुंचता है।
श्यामू ग्राहकों को सम्मू से परोस रहा था। हेमु हाथ जोड़कर उसके सामने खड़ा हो
जाता है। श्यामू भाई मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी जड़ी बूटी चुराई थी। मैंने
सोचा कि तुम्हारी सफलता को छीन लूंगा। पर मेरा सब कुछ जलकर राख हो गया। हेमु लालच
का रास्ता हमेशा बर्बादी की ओर ले जाता है। मेहनत और सच्चाई ही इंसान को आगे
बढ़ाती है। मैं तुझे माफ करता हूं। लेकिन एक बात याद रखना लालच मत करना। बस मेहनत और
ईमानदारी से काम करना। तभी सुख और सम्मान मिलेगा। हां श्यामू अब मैं मेहनत से ही
कमाऊंगा। यही मेरी सबसे बड़ी सीख है।
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