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दो भाई की कहानी

  FULL STORY   N कड़ाके की ठंड अपनी पूरी ताकत के साथ गांव पर उतर आई थी। तालाब के किनारे बने कच्चे घर की दीवारों की दरारों से सर हवा सीटी बजाती हुई भीतर घुस रही थी। मिट्टी के उस छोटे से घर   में टूटी चारपाई पर एक पुरानी पतली रजाई ओढ़े हरीलाल   और उसका बीटा सोहन सिमटे बैठे थे। SON बाबा घर में आटा भी खत्म हो चुका है और जलाने के लिए लकड़ियां भी नहीं बची हैं। अगर सुबह तक कुछ इंतजाम नहीं हुआ तो हम क्या खाएंगे और इतनी ठंड में रात कैसे गुजरेगी ? FATHER बेटा   आज पूरा दिन गांव में काम की तलाश में भटकता रहा। पर किसी ने एक वक्त की मजदूरी तक नहीं दी। जेब खाली है और दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है। समझ नहीं आ रहा कि किस दरवाजे पर जाऊं। SON आप फिर से जाइए बाबा। कहीं ना कहीं तो काम मिलेगा ही। जब तक आप हिम्मत नहीं हारेंगे , मैं भी नहीं हारूँगा । FATHER जाऊंगा बेटा   जरूर जाऊंगा। जब तक मेरे बूढ़े हाथ चल रहे हैं , तब तक तुझे भूखा पेट नहीं सोने दूंगा। N अगली सुबह धुंध के बीच हरीलाल   अलग-अलग घरों के दरवाजों पर जाता है। FATHER काकी कोई भी छोटा-मो...

नदी किनारे दो बहनों का रसोई

प्रीतमपुरा गांव की कोकिला एक गरीब बूढ़ी औरत है कुछ साल पहले तक वो लोगों के घर काम करके पैसे कमाती थी लेकिन अब उम्र के बोझ से लाचार होकर उसे काम छोड़ना पड़ा उसकी दो बेटियां हैं आस्था और शारदा आस्था सिलाई का काम करती है और शारदा छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाती है शारदा तुझे बताया था मेरी दवा खत्म हो गई है शाम को लौटते वक्त लेती आना बेटा मां महीने के आखिर में एक पैसा भी नहीं बचा है हर कुछ दिन में दवा बाजार का खर्चा मैं थक चुकी हूं सब कुछ संभालते-सालते क्या करूं बेटा खुद कुछ कर नहीं सकती इसलिए तुम लोगों पर ही निर्भर हूं मुझे भी अच्छा नहीं लगता हर बार तंग करना सब कुछ मुझ पर ही क्यों कभी आस्था से भी कुछ बोल सकती हो वो भी सिलाई करके अच्छा कमाती है कुछ दिन पहले उससे ही पैसे लिए थे इसलिए अब शर्म आती है दोबारा कहने में उस वक्त तो शर्म आती है लेकिन मुझसे कुछ कहने में हिचक नहीं होती सच कहूं तो अब और नहीं झेला जाता कब इस बोझ से छुटकारा मिलेगा

कौन जाने मेरी बेटियां कितना संघर्ष करती हैं जहां बाकी लड़कियां शादी करके अपनी जिंदगी सजा रही हैं वहां मेरी वजह से यह बोझ उठा रही हैं मैं अब कोई पैसा नहीं दे सकती आस्था आए तो उससे दवा के लिए पैसे मांग लेना सब कुछ तुम्हारे और घर के पीछे लग जाए तो खुद के लिए क्या बचेगा ठीक है बेटा मैं आस्था से कहूंगी तू अपने काम पर जा ध्यान रखना शारदा चली जाती है बूढ़ी कोकिला खुद को अपनी बेटियों की जिंदगी पर बोझ की तरह महसूस करने लगती है और उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं आस्था पास के घर अपने सिले हुए कपड़े देकर पैसे लेकर लौट रही थी चलो आखिरकार कुछ पैसे आए थोड़ा खुद के लिए रखूंगी बाकी मां को दे दूंगी दूर से एक गांव का गुंडा मुरली उसे देख लेता है

सालों से वो आस्था के पीछे पड़ा है कि उससे शादी करेगा लेकिन आस्था उससे नफरत करती है फिर भी मुरली उसका पीछा नहीं छोड़ता अरे वाह वाह वाह वाह वाह आज तो सुबह-सुबह अपने होने वाली बीवी के दर्शन हो गए चलो जरा मिलते हैं मुरली जैसे ही आस्था के सामने आता है आस्था डर से सहम जाती है तुम तुम यहां क्या कर रहे हो अरे यह गांव सिर्फ तुम्हारा है क्या तुम घूम सकती हो तो मैं भी तो घूम सकता हूं मेरे रास्ते से हटो क्यों बीच में खड़े हो अरे अरे अरे इतनी जल्दी भी क्या है चलो थोड़ा बातें तो कर लेते हैं मुझे जाने दो मुरली नहीं तो मैं लोगों को बुला लूंगी ओहो इसमें गुस्सा होने वाली कौन सी बात है मैं बस बातें तो करना चाहता हूं वो भी अपने होने वाली बीवी से हैं कितनी बार कहूं मैं तुमसे शादी नहीं करना चाहती मुझे तुमसे नफरत है पसंद करो या ना करो शादी तो तुम मुझसे ही करोगी तुम्हारी डोली मैं ही उठाऊंगा हां मैं मर जाऊंगी लेकिन तुमसे शादी नहीं करूंगी रास्ता छोड़ो मेरा अरे अरे इतना क्या शर्माना हा चाहे तुम जो कहो मैं ही हूं

 तुम्हारे दिलों का राजा तुम्हारा शहजादा तुम्हारा बादशाह तुम मुझे ही मिलोगी बेगम हां आस्था डर के मारे रोती हुई वहां से भाग जाती है मुरली पीछे से जोर-जोर से हंसता है बीमार कोकिला घर पर थी आस्था रोती हुई दौड़कर घर आई उसे इस हालत में देख कोकिला घबरा गई क्या हुआ बेटी इस हालत में क्यों आई किसी ने कुछ कहा उस कुंडी मुरली ने फिर से मुझे तंग किया मां अब तो घर से बाहर निकलने में भी डर लगता है ओफो इस मुरली ने तो जीना मुश्किल कर दिया है समझ में नहीं आता क्या चाहता है

 वो मुझसे शादी करना चाहता है कहता है कि मेरी शादी सिर्फ उसी से होगी मां मैं मर जाऊंगी लेकिन उस मुरली से शादी नहीं करूंगी जब तक मैं जिंदा हूं उसकी गंदी मंशा कभी पूरी नहीं होगी मैं जल्द ही तेरे और शारदा के लिए अच्छे लड़के ढूंढूंगी लेकिन मां अगर हमारी शादी हो गई तो तुम मैंने बहुत सोचा है मेरी वजह से तुम लोग अपनी जिंदगी क्यों बर्बाद करो यही सही वक्त है तुम्हारी शादी का लेकिन मां मुरली अगर शादी ना होने दे तो मैं अभी जिंदा हूं सब संभाल लूंगी मैं तुम्हारे लिए राजकुमार जैसा लड़का ढूंढूंगी अपनी बेटियों को जिम्मेदारी से मुक्त करने और समाज की बुरी नजरों से बचाने के लिए कोकिला उनके लिए अच्छे लड़के ढूंढने लगती है जयपुर के मशहूर कपड़ा व्यापारी पीतांबर अपने बेटों प्रणव और आनंद के लिए योग्य लड़कियां ढूंढ रहे थे तभी उन्हें आस्था और शारदा की तस्वीरें मिली उन्होंने शारदा को प्रणव के लिए और आस्था को आनंद के लिए पसंद किया हम प्रणव और आनंद मैंने तुम दोनों के लिए दो लड़कियां ढूंढी है देखो यह रही आस्था और शारदा दो बहनें पीतांबर ने तस्वीरें दिखाई लेकिन जैसे ही प्रणव ने आस्था की तस्वीर देखी

उसे वह बहुत पसंद आ गई और उसने आस्था से शादी की इच्छा जताई आस्था छोटी है इसीलिए मैं उसे आनंद के लिए सोच रहा था लेकिन अगर तुम्हें आस्था पसंद है तो आनंद से शारदा की बात कर लेंगे क्या कहते हो आनंद कोई आपत्ति है अब नहीं पिताजी जो आप तय करेंगे मुझे मंजूर है हम तो ठीक है फिर मैं कोकिला और उसकी बेटियों को घर बुला लेता हूं आगे की बात वही करेंगे ठीक है उधर कोकिला आस्था और शारदा को प्रणव और आनंद की तस्वीरें दिखाकर उनकी राय पूछती है बड़े बेटे का नाम प्रणव है और छोटे का आनंद दोनों ही अपने पिताजी का कारोबार संभालते हैं मां जो भी तुम तय करोगी मुझे मंजूर है आनंद ठीक-ठाक दिखता है आस्था के साथ अच्छा लगेगा और अगर मां को प्रणव पसंद है तो मुझे कोई दिक्कत [संगीत] नहीं आस्था की शादी आनंद से नहीं प्रणव से होगी लेकिन क्यों मैं बड़ी हूं तो प्रणव से मेरी शादी होनी चाहिए पीतांबर जी ने भी ऐसा ही सोचा था लेकिन जैसे ही प्रणव ने तस्वीर देखी उसे आस्था पसंद आ गई और उन्होंने तुझे आनंद के लिए चुना है

 यह क्या बात हुई मैं बड़ी हूं मेरी शादी बड़े बेटे से होनी चाहिए मां क्यों ना तुम प्रणव से दीदी की शादी की बात करो मुझे आनंद से कोई परेशानी नहीं प्रणव ने आस्था को पसंद कर लिया है जबरदस्ती कुछ करेंगे तो रिश्ता टूट जाएगा बचपन से आस्था ही सब कुछ ले जाती है अब मेरी पसंद का लड़का भी उसे पसंद कर बैठा वो मेरी बहन नहीं मेरी बदकिस्मती है इस तरह आस्था और प्रणव और शारदा और आनंद की शादी पक्की हो जाती है लेकिन मन ही मन शारदा ठान लेती है कि आस्था को वो चैन से जीने नहीं देगी मुरली को जब पता चला कि आस्था की शादी प्रणव से तय हुई है तो वह बहुत गुस्से में आ गया वो सीधा कोकिला के घर पहुंचा और तोड़फोड़ करने लगा क्या यह क्या कर रहे हो रुको मैं कह रही हूं रुको मैं सालों से कह रहा हूं कि मैं आस्था से शादी करना चाहता हूं और तुमने बिना मुझसे पूछे किसी और से उसकी शादी कैसे तय कर दी हैं आस्था तुमसे डरती है वो तुमसे शादी नहीं करना चाहती उसने यह बात तुम्हें कई बार कही है उसे क्या पसंद है क्या नहीं इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं उसी से शादी करूंगा और अगर वह मुझसे शादी नहीं करती है तो मैं किसी और से उसकी शादी होने भी नहीं दूंगा मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कभी नहीं करूंगी

अब यहां से निकल जाओ वरना मैं पुलिस को बुलाऊंगी अरे जिसे बुलाना है बुला लो मैं यहां से नहीं हिलने वाला मैं भी देखता हूं कि उसकी शादी होती कैसे है अब तो तुम शांति से नहीं जाओगे रुको अभी बताती हूं तुम्हें कोकिला घर के अंदर से एक धारदार छुरी लेकर भागती हुई बाहर आती है मुरली उसे देखकर डर जाता है कोकिला जोर-जोर से चिल्लाने लगती है आसपास के लोग जमा हो जाते हैं शादी के दिन घर में सब लोग मौजूद हैं शारदा और आस्था सजध कर बैठी हैं पीतांबर कोकिला को बुलाता है पीतांबर बाबू आपने बुलाया आ हा हा ये कुछ गहने हैं यह प्रणव की मां के गहने हैं उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह यह सारी चीजें दोनों बहुओं में बांट दी जाए अब तुम जाकर आस्था और शारदा को बराबर हिस्सों में बांट दो बारात आने ही वाली है ठीक है कोकिला गहने लेकर आस्था और शारदा के पास जाती है लेकिन बांटते समय आस्था को एक जोड़ी झुमके और एक बड़ा हार ज्यादा दे देती है ये क्या तुमने बड़ा हार आस्था को दे दिया मेरा क्या धीरे बोलो कोई सुन लेगा आस्था बड़ी बहू है उसे थोड़ा ज्यादा देना पड़ेगा तुम्हें भी एक हार मिला है बस थोड़ा छोटा है बड़ी बहू को बड़ा हार मिलना ही चाहिए मां मुझे छोटा हार पहनने में कोई दिक्कत नहीं दीदी तुम मेरा हार ले लो और अपना मुझे दे दो ओफो तुम लोग मुझसे ज्यादा समझदार हो क्या अगर पीतांबर बाबू या प्रणव ने देख लिया तो बहुत गुस्सा करेंगे शारदा तुम्हें जो दिया गया है वही पहन लो बड़ी बहू होने के कारण आस्था को ज्यादा सम्मान और अहमियत मिलने लगी जिसे शारदा सह नहीं पाई वो अंदर ही अंदर आस्था से जलने लगी और उसका जीवन बर्बाद करने की योजना बनाने लगी शादी बहुत धूमधाम से हुई पूरा गांव शादी की बात कर रहा था

आस्था और प्रणव बहुत खुश थे अच्छा मैंने तुमसे पूछा ही नहीं तुमने पढ़ाई कहां तक की है घर की जिम्मेदारी इतनी ज्यादा थी कि मैं और दीदी ज्यादा पढ़ नहीं पाए गरीबी और तंगी ही हमारी साथी रही [संगीत] अगर तुम्हें दोबारा पढ़ने का मौका मिले तो क्या करोगी अगर मौका मिले तो मैं पूरी मेहनत से पढ़ाई करूंगी ताकि मां का नाम रोशन कर सकूं लेकिन अब इन बातों का क्या मतलब मैंने एक फैसला लिया है तुम दोबारा पढ़ाई शुरू करोगी मन लगाकर पढ़ोगी तुम्हारी पहचान सिर्फ मेरी पत्नी के रूप में नहीं होगी सच कह रहे हैं मैं फिर से पढ़ाई कर सकती हूं हां हां बिल्कुल पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती है मैं कल ही जाकर सरकारी स्कूल में तुम्हारे दाखिले की बात करूंगा मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन दिल से पढ़ना चाहती थी बाद में सिलाई करके कुछ पैसे कमाती थी ताकि मां की मदद कर सकूं अब तुम पढ़ाई शुरू करो मुझे पूरा भरोसा है कि तुम बहुत आगे जाओगी और मां की चिंता मत करो मैं उनकी देखभाल के लिए आदमी तय कर दिया है तो वह देखेगा है ना

आस्था के दिल में खुशी की लहर दौड़ जाती है उसे ऐसा ही जीवन साथी चाहिए था प्रणव के सहयोग से उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह फिर से सपने देखने लगती है जहां आस्था और प्रणव की जिंदगी खुशहाल चल रही थी वहीं आनंद और शारदा की जिंदगी बिल्कुल उल्टी थी आनंद शारदा से हमेशा अच्छा व्यवहार करता लेकिन शारदा हमेशा झगड़ा करने को तैयार रहती इस घर में रहना मुश्किल है ना आराम है ना शांति दिन भर खटती हूं और बदले में क्या मिलता है आ हा हा शांति शांति शांति क्या हुआ तुम्हें फिर से इतनी नाराज क्यों हो कुछ नहीं दिन भर तुम बस किताबों में घुसे रहते हो मैं ही सब कुछ झेलती हूं तुमसे शादी करके कोई सुख नहीं मिला अरे ऐसे क्यों बोल रही हो क्या हो गया किसी ने कुछ कहा क्या तुम तुम क्या करोगे तुम तो डरपोक हो अरे बस बहुत हो गया मैं हमेशा प्यार से बात करता हूं इसका मतलब यह नहीं है कि तुम मुझे इस तरह से जलील करती रहो फालतू की बात करती हो अगर हिम्मत है तो जाकर अपने भाई और उसकी बीवी से उलझो सिर्फ मुझ पर चिल्ला सकते हो अरे तो मैं उनसे क्यों उलझूं क्या मेरे सींग हो गए हैं क्या जाकर उनको मार दूं उनसे मेरा क्या लेना देना फालतू की बात करती हो मैं दिन भर काम करती हूं घर संभालती हूं और आस्था वो आराम से पढ़ाई करती है बस इसलिए क्योंकि वह प्रणव की पत्नी है

शरदा यह तुम्हारा वहम है तुम और भाभी दोनों ही इस घर की बहुएं हो दोनों का सम्मान बराबर है सच एक बार अपने आप को देखो पिताजी सारे काम प्रणव को देते हैं और तुम उनके बिजनेस में बस एक सहायक हो जहां तुम्हारा कोई मान नहीं वहां तुम्हारी बीवी को क्या मिलेगा शारदा की बातें आनंद के मन में गहरी चुभ जाती हैं अब वो अपने भाई और पिता के प्रति जलन और नाराजगी महसूस करने लगता है सुबह-सुबह शारदा रसोई में आनंद के लिए नाश्ता बनाने जाती है तभी आस्था भी रसोई में आती है दीदी आप थोड़ी देर में ठाकुरपु के लिए नाश्ता बना देना पहले मैं बना लूं क्यों मैं पहले आई हूं तो नाश्ता मैं बनाऊंगी तुम बाद में करना दीदी समझिए ना उन्हें जल्दी काम पर जाना है शहर से बाहर और ठाकुरपो तो घर में ही है ना आनंद यह सारी बातें सुन रहा था वो धीरे से आस्था के पीछे आकर खड़ा हो जाता है तो अगर दादा शहर जा रहे हैं तो फिर तो मेरा कोई काम ही नहीं हो सकता हमेशा उन्हीं का नाश्ता पहले बनेगा और मैं इंतजार करूंगा है ना ठाकुर पो मैंने ऐसा मतलब नहीं निकाला आप तो घर पर हैं इसलिए थोड़ी देर से भी नाश्ता हो जाए तो कोई परेशानी नहीं मुझे अभी नाश्ता चाहिए आज मेरा नाश्ता पहले बनेगा अगर दादा इंतजार नहीं कर सकते हैं तो बाहर खा लें बस पर ठाकुर बोत दादा को जरूरी श्रद्धदा मेरा नाश्ता पहले बनाओ मैंने कह दिया ना मुझे किसी की बात नहीं सुननी है यह रसोई किसी एक की नहीं है समझ लो आनंद के इस बदले हुए व्यवहार से आस्था बहुत दुखी होती है

 शादी के बाद पहली बार आनंद ने उससे ऐसे गुस्से में बात की थी वो चुपचाप खड़ी रह जाती है कुछ समझ नहीं पाती आस्था चुपचाप सिर झुका कर कमरे में आती है और प्रणव बिना उसे देखे बोलता रहता है मुझे तो लगा तुम नाश्ता लेकर आई हो खैर अब समय नहीं बचा है बहुत देर हो गई है अब मैं जाता हूं नाश्ता बनाने देती तो जरूर बना लाती लेकिन रसोई में घुसते ही मुझे अपमान सहना पड़ा क्या मतलब किसने तुम्हें अपमानित किया अरे किसकी इतनी हिम्मत हुई बताओ मुझे कोई नहीं छोड़ो तुम्हें तो देर हो रही है चलो मैं तुम्हें बाहर तक छोड़ देती हूं बात मत घुमाओ आस्था साफ-साफ बताओ किसने तुम्हें अपमानित किया जब यहां पर मैं हूं तो कौन ऐसी जरूरत कर सकता है बताओ कुछ खास नहीं हुआ मैं नाश्ता बनाने गई थी ठाकुर वो चिल्लाकर बोले कि अब से उसका नाश्ता पहले बनेगा और कहा रसोई किसी एक की नहीं है क्या आनंद ने ऐसा बोला आस्था तुम सच कह रही हो वो तो कभी ऐसी बात नहीं करता मैं भी यही सोच रही थी पहली बार उन्होंने इस तरह गुस्से में मुझसे बात की पता नहीं उन्हें क्या हो गया है ओहो उसकी हिम्मत बहुत बढ़ गई है

 रुको आज मैं उसको सबक सिखाता हूं छोड़ो ना सुबह-सुबह झगड़ा मत करो शायद दीदी से लड़ाई हुई हो इसलिए गुस्से में है तुम निकलो देर हो रही है तुम कह रही हो इसीलिए जा रहा हूं वरना आज उसे दिखा ही देता प्रणव काम के लिए जयपुर रवाना हो जाता है आस्था आनंद के व्यवहार को याद कर दुखी होती है कुछ दिन बाद पीतांबर 10 बीघा जमीन खरीद कर उसका मालिकाना हक प्रणव के नाम कर देता है यह बात जैसे ही शारदा को पता चलती है वह आनंद को सब बता देती है आनंद गुस्से में पीतांबर से बात करने जाता है पापा बचपन से आप जो कहते आए हैं मैंने वही किया कभी आपका विरोध नहीं किया लेकिन आप मेरे साथ ऐसा करोगे मैंने सोचा भी नहीं था ये क्या बातें कर रहे हो मैंने क्या कर दिया आपने हमेशा दादा को मुझसे ज्यादा अहमियत दी है शादी में उसकी पसंद मानी खाने में उसकी पसंद चलती है पढ़ाई में उसकी पसंद अरे मैं कहां हूं मेरा तो कुछ नहीं माना ना यह क्या बकवास करते हो आनंद तुम दोनों मेरे लिए बराबर हो फालतू की बातें ना [संगीत] करो सारी बातें झूठ है कोई बराबर नहीं है व्यापार के हर बड़े फैसले में आप दादा की राय लेते हैं उसे भेजते हैं और मुझे हां बस एक साधारण सा सहायक बनाकर रखा है

किनारे में बैठा रहता है जो क्योंकि प्रणव तुमसे ज्यादा समझदार है और बड़ा भी है ओ तो क्या बड़े होने से ही सारे फायदे मिलेंगे आपने 10 बीघा जमीन उसके नाम कर दी मुझे क्या दिया बस बहुत हो गया पापा मुझे भी जमीन चाहिए अलग घर चाहिए और मेरी पत्नी के लिए अलग रसोई चाहिए वरना मैं इस घर को जला दूंगा पहली बार आनंद के ऐसे तेवर देख पीतांबर चौंक जाता है वो यकीन नहीं कर पाता कि उसका सीधा बेटा उसे धमकी देकर चला [संगीत] गया कुछ दिनों बाद दुखी पीतांबर दो कागज लेकर प्रणव के पास आता है पापा आप इतनी रात को जाग रहे हैं सब कुछ ठीक तो है ना जिंदगी भर सारी जिम्मेदारी तुम्हें दी है आज आखिरी एक जिम्मेदारी सौंपने आया हूं उम्मीद है कि तुम हमेशा की तरह इसे भी निभाओगे ऐसा क्यों कह रहे हो पापा आप तो बस कहिए करना क्या है तुम्हारी मां के जाने के बाद मैंने बहुत कोशिश की कि तुम दोनों बेटों को खुशियां दूं शायद पूरी तरह से सफल नहीं रहा पापा आपके कारण ही तो हम आज इस मुकाम पर हैं आपने हमारी हर जरूरत पूरी की है तुम तो मुझसे खुश हो लेकिन तुम्हारा छोटा भाई शायद नहीं उसे लगता है कि मैंने मैं उसकी फिक्र करता ही नहीं पीतांबर कागज प्रणव को देता है इन कागजों पर मेरी सारी जमीन दोनों बेटों के नाम पर बराबर बंटी हुई है अगर मैं ना रहूं तो तुम अपने भाई को उसका हिस्सा प्यार से दे देना समझ गए पापा आप ही सब कुछ हैं आप खुद आनंद को समझा दीजिए ना नहीं नहीं नहीं वो मुझसे नाराज है

 अब यह जिम्मेदारी तुम्हें देता हूं मैं मुझे भरोसा है कि तुम संभाल लोगे पीतांबर प्रणव के सिर पर हाथ फेरता है और सोने चला जाता है उसी रात नींद में ही उनकी मौत हो जाती है प्रणव टूट जाता है लेकिन आनंद में ज्यादा दुख नहीं दिखता पीतांबर की मौत के बाद भी स्वार्थी शारदा आनंद को भड़काती रहती है देखो जो डर था वही हुआ तुम्हारे पिता सब कुछ प्रणव को दे गए अब हमें उसका नौकर बनकर रहना पड़ेगा मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मेरे पापा मेरे साथ ऐसा कर सकते हैं क्या तुम सच में उनके बेटे हो कोई बाप ऐसा कर सकता है चुप रहो सरदा मैं कुछ नहीं समझ पा रहा क्या समझना है अब सारी जिंदगी तुम्हारे दादा मजे करेंगे और हम देखते रह जाएंगे ऐसा नहीं होने दूंगा हम उनके सामने झुकेंगे नहीं अब तो वो आस्था भी रसोई पर कब्जा कर लेगी रोज झगड़े करेगी तुम्हें बेइज्जत करेगी अच्छा हुआ जो पापा मर गए वरना मैं ही उन्हें मार देता गद्दार बाहर छिपकर खड़ा प्रणव यह सब सुन रहा था कहती हूं किसी तरह प्रणव से वो 10 बीघा जमीन छीन लो फिर हम राज करेंगे छी छी छी छी छी पापा को गए बस एक ही दिन हुआ है और यह लोग जमीन के पीछे पड़े हैं

 आनंद को पापा के मरने का दुख ही नहीं है बस लालच लालच लालच यह सब सोचते ही प्रणव को आनंद और शारदा से घृणा होने लगती है वो चुपचाप वहां से चला जाता है एक महीने बाद आस्था और प्रणव कोकिला को लेकर नदी किनारे जाते हैं वहीं वो आनंद और शारदा को बुलाते हैं यह दोपहर में सबको नदी के किनारे क्यों बुलाया है आज सारे हिसाब साफ करने हैं इसीलिए मैंने सबको बुलाया है अच्छा किस चीज का हिसाब पापा ने मरने से पहले मुझे कुछ जिम्मेदारियां दी थी आज वह मैं पूरी कर रहा हूं हां हां हां पापा तो हमेशा से ही सब तुम्हें ही देते आए हैं इसमें नया क्या है बताओ आज तुम्हारा यह भ्रम टूट जाएगा आनंद और जो जहर तुम्हारे दिमाग में भर गया है वह भी साफ हो जाएगा प्रणव पीतांबर द्वारा दी गई जमीन के कागज आनंद को दिखाता है यह देखो यह जमीन 20 बीघा है 10 तुम्हारी 10 मेरी घर भी पापा ने हमारे नाम पर बराबर बांटा है हां मतलब मैं मैं अब तक जो सोचता रहा वो सब गलत था हां और पापा की मौत के बाद जो बातें मैंने तुम्हारी पत्नी से सुनी उसके बाद मैंने तय किया अब हम अलग रहेंगे अलग घर अलग व्यापार और अलग रसोई आनंद और शारदा दो रसोई घर देखते हैं अब रोज झगड़े नहीं होंगे यह रही तुम्हारी रसोई यहीं से

तुम अलग खाना बनाओगे और जल्द ही हम अलग घर भी बना लेंगे यह सब सुनकर आनंद और शारदा को अपनी गलती का एहसास होता है वो रोते हुए माफी मांगते हैं दादा मैंने श्रद्धा की बातों में आकर तुम्हें गलत समझा लगा तुम और पापा मुझे नजरअंदाज करते हो इसी गलतफहमी में मैंने बुरा बर्ताव किया

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