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रामू की पाव भाजी

गांव की शाम होने वाली थी। आसमान में काले घने बादल ऐसे छा गए थे जैसे दिन में ही रात हो गई हो। ठंडी हवाएं चल रही थी और बिजली कड़क रही थी। रामू   अपनी पुरानी लकड़ी की रेड़ी को धकेलता हुआ चौराहे की तरफ जा रहा था। रामू   बहुत गरीब था। उसके पास बस यही एक ठेला था जिससे वो   पाव भाजी बेचकर अपना गुजारा करता था। उसके घर की छत कच्ची थी जो हर बारिश में टपकने लगती थी। हे भगवान आज बस बारिश ना हो। अगर आज भाजी नहीं बिकी तो कल तक सब खराब हो जाएगी । घर में राशन भी खत्म हो चुका है।सीता इस उम्मीद में होगी कि आज कुछ पैसे लेकर आऊंगा तो घर का चूल्हा जलेगा। जैसे ही रामू   ने चौराहे पर अपना ठेला लगाया वैसे ही मोटी-मोटी बूंदे गिरने लगी। देखते ही देखते बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। लोग अपनी-अपनी दुकानों के शटर गिराकर घर जाने लगे। तभी रामू   ने जल्दी से एक फटी हुई पन्नी निकाली और अपनी पाव भाजी को बचाने के लिए उसे ढक दिया। वो खुद तो भीग रहा था पर उसे चिंता अपनी भाजी की थी। तभी गांव का एक आदमी धनिया   जो रामू   के ठेले के पास से जा रहा था। उसने रामू   से कहा अरे रामू  ...

दयालु मगरमच्छ

 हरेभरे जंगल के बीचोंबीच एक साफ सुथरी चमचमाती नदी बहती थी उस नदी में रहता था एक मगरमच्छ बच्चों मगरमच्छ का नाम सुनते ही लोग डर जाते। वह अकेला था। कोई उसका दोस्त नहीं था। जब भी जंगल के जानवर मकरा को देखते वे डर कर भाग जाते। अरे मगरमच्छ आ गया। पास मत जाना काट लेगा। मकरा चुपचाप सबको जाता देखता और मन ही मन दुखी होता। उसका दिल भारी हो जाता। उसकी आंखें उदास हो जाती। मैं तो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। मकरा मन ही मन सोचता। फिर सब मुझसे इतना डरते क्यों हैं? नदी के किनारे अकेला बैठा मकरा। पानी में अपनी परछाई देखता और धीरे से आह भरता। उसे दोस्त चाहिए थे। कोई जो उससे बात करे उसके साथ खेले। एक दिन मकरा नदी के किनारे अकेला खेल रहा था। वह कभी पानी में छपछप करता तो कभी पत्थरों पर चढ़ता। तभी आसमान में हल्केहके बादल आए।

 थोड़ी देर बाद आसमान काला होने लगा। हवा तेज चलने लगी। एक घबराई हुई आवाज सुनाई दी। बचाओ बचाओ। यह आवाज जंगल की ओर से आ रही थी। ध्यान से सुनने पर मकरा समझ गया। यह तो बंदर के बच्चे की आवाज थी। मकरा चौंक गया। उसका दिल तेज-तेज़ धड़कने लगा। कोई मुसीबत में है। उसने सोचा और बिना देर किए उस आवाज की दिशा में देखने लगा। चारों तरफ अंधेरा फैल चुका था। बारिश तेज थी और नदी का पानी डरावनी आवाज के साथ बह रहा था। बंदर मकरा जोर से बोला डरो मत। मैं यहीं हूं। वह इधर-उधर देखने लगा। कभी दाई ओर। कभी बाई ओर। लेकिन अंधेरे में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। लहरिन उसे धक्का देती। पानी उसकी आंखों में चला जाता। बारिश के बीच से एक कांपती हुई आवाज आई।

 मकरा मैं यहां हूं। मकरा का दिल भर आया। वह उस आवाज की दिशा में तेजी से तैरने लगा। डरो मत। मकरा ने प्यार से कहा। अब सब ठीक है। तभी अचानक चरर तेज आवाज आई। जिस टहनी को पकड़कर बंदर लटका हुआ था। वह जोर से हिलने लगी। बंदर की पकड़ ढीली पड़ने लगी। उसकी आंखें डर से फैल गई। मकरा वह घबरा कर चिल्लाया। टहनी टूट रही है। मकरा ने अपनी पीठ आगे बढ़ाई। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ। बंदर ने धीरे से मकरा की पीठ पकड़ ली। अब वह सुरक्षित था। उसी पल हवा धीमी होने लगी। बारिश की बूंदे। हल्कीहल्की हो गई। काले बादल धीरे-धीरे हटने लगे। और आसमान साफ होने लगा। नदी अब डरावनी नहीं लग रही थी। लहरें शांत हो गई। अब तूफान खत्म हो चुका था। और एक नई दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। मकरा बंदर मुस्कुराते हुए बोला। आज अगर तुम नहीं होते तो मैं मैं बच नहीं पाता।

 मुझे दोस्त मिल गया। मकरा ने मन ही मन सोचा। अगले दिन से दोनों साथ खेलने लगे। बंदर पेड़ों पर उछलता कूदता और मकरा नीचे से देखता और जोरजोर से हंसता। यह लो मकरा। बंदर ने मीठा आम नीचे फेंका। यह दोस्ती का आम है। बंदर हंसते हुए बोला, जंगल के जानवर यह सब देखते और मुस्कुराते। अगली शाम सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। आसमान नारंगी रंग से भर गया था। तभी जंगल की ओर से आवाज आई। धप्प धप्प। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा एक बड़ा सा हाथी। गहरे कीचड़ में फंसा हुआ था। जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही और धंस जाता। मकरा आगे बढ़ा। डरो मत। उसने शांत आवाज में कहा। तुम्हें निकाल लेंगे। हाथी खुशी से अपनी सूंड हिलाने लगा। धन्यवाद मकरा। उस दिन से हाथी भी उनका दोस्त बन गया। हाथी अपनी सूंड से पानी उछालता हंसहंस कर भागता और मकरा नदी में गोलगोल तैरता जंगल में फिर से खुशी लौट आई थी जिस मकरा से कभी सब डरते थे आज वही सबका सबसे अच्छा दोस्त बन चुका था और जंगल समझ गया था मिलकर काम करने से हर समस्या हल हो जाती है।

 प्यारे बच्चों, इस कहानी से हमें कुछ बहुत सुंदर सीख मिलती है। जो दूसरों की मदद करता है, उसे दोस्त जरूर मिलते

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