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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

दयालु मगरमच्छ

 हरेभरे जंगल के बीचोंबीच एक साफ सुथरी चमचमाती नदी बहती थी उस नदी में रहता था एक मगरमच्छ बच्चों मगरमच्छ का नाम सुनते ही लोग डर जाते। वह अकेला था। कोई उसका दोस्त नहीं था। जब भी जंगल के जानवर मकरा को देखते वे डर कर भाग जाते। अरे मगरमच्छ आ गया। पास मत जाना काट लेगा। मकरा चुपचाप सबको जाता देखता और मन ही मन दुखी होता। उसका दिल भारी हो जाता। उसकी आंखें उदास हो जाती। मैं तो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। मकरा मन ही मन सोचता। फिर सब मुझसे इतना डरते क्यों हैं? नदी के किनारे अकेला बैठा मकरा। पानी में अपनी परछाई देखता और धीरे से आह भरता। उसे दोस्त चाहिए थे। कोई जो उससे बात करे उसके साथ खेले। एक दिन मकरा नदी के किनारे अकेला खेल रहा था। वह कभी पानी में छपछप करता तो कभी पत्थरों पर चढ़ता। तभी आसमान में हल्केहके बादल आए।

 थोड़ी देर बाद आसमान काला होने लगा। हवा तेज चलने लगी। एक घबराई हुई आवाज सुनाई दी। बचाओ बचाओ। यह आवाज जंगल की ओर से आ रही थी। ध्यान से सुनने पर मकरा समझ गया। यह तो बंदर के बच्चे की आवाज थी। मकरा चौंक गया। उसका दिल तेज-तेज़ धड़कने लगा। कोई मुसीबत में है। उसने सोचा और बिना देर किए उस आवाज की दिशा में देखने लगा। चारों तरफ अंधेरा फैल चुका था। बारिश तेज थी और नदी का पानी डरावनी आवाज के साथ बह रहा था। बंदर मकरा जोर से बोला डरो मत। मैं यहीं हूं। वह इधर-उधर देखने लगा। कभी दाई ओर। कभी बाई ओर। लेकिन अंधेरे में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। लहरिन उसे धक्का देती। पानी उसकी आंखों में चला जाता। बारिश के बीच से एक कांपती हुई आवाज आई।

 मकरा मैं यहां हूं। मकरा का दिल भर आया। वह उस आवाज की दिशा में तेजी से तैरने लगा। डरो मत। मकरा ने प्यार से कहा। अब सब ठीक है। तभी अचानक चरर तेज आवाज आई। जिस टहनी को पकड़कर बंदर लटका हुआ था। वह जोर से हिलने लगी। बंदर की पकड़ ढीली पड़ने लगी। उसकी आंखें डर से फैल गई। मकरा वह घबरा कर चिल्लाया। टहनी टूट रही है। मकरा ने अपनी पीठ आगे बढ़ाई। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ। बंदर ने धीरे से मकरा की पीठ पकड़ ली। अब वह सुरक्षित था। उसी पल हवा धीमी होने लगी। बारिश की बूंदे। हल्कीहल्की हो गई। काले बादल धीरे-धीरे हटने लगे। और आसमान साफ होने लगा। नदी अब डरावनी नहीं लग रही थी। लहरें शांत हो गई। अब तूफान खत्म हो चुका था। और एक नई दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। मकरा बंदर मुस्कुराते हुए बोला। आज अगर तुम नहीं होते तो मैं मैं बच नहीं पाता।

 मुझे दोस्त मिल गया। मकरा ने मन ही मन सोचा। अगले दिन से दोनों साथ खेलने लगे। बंदर पेड़ों पर उछलता कूदता और मकरा नीचे से देखता और जोरजोर से हंसता। यह लो मकरा। बंदर ने मीठा आम नीचे फेंका। यह दोस्ती का आम है। बंदर हंसते हुए बोला, जंगल के जानवर यह सब देखते और मुस्कुराते। अगली शाम सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। आसमान नारंगी रंग से भर गया था। तभी जंगल की ओर से आवाज आई। धप्प धप्प। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा एक बड़ा सा हाथी। गहरे कीचड़ में फंसा हुआ था। जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही और धंस जाता। मकरा आगे बढ़ा। डरो मत। उसने शांत आवाज में कहा। तुम्हें निकाल लेंगे। हाथी खुशी से अपनी सूंड हिलाने लगा। धन्यवाद मकरा। उस दिन से हाथी भी उनका दोस्त बन गया। हाथी अपनी सूंड से पानी उछालता हंसहंस कर भागता और मकरा नदी में गोलगोल तैरता जंगल में फिर से खुशी लौट आई थी जिस मकरा से कभी सब डरते थे आज वही सबका सबसे अच्छा दोस्त बन चुका था और जंगल समझ गया था मिलकर काम करने से हर समस्या हल हो जाती है।

 प्यारे बच्चों, इस कहानी से हमें कुछ बहुत सुंदर सीख मिलती है। जो दूसरों की मदद करता है, उसे दोस्त जरूर मिलते

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