सुबह का समय पंछियों की हल्की चहचहाट के बीच एक झोपड़ी का दरवाजा खुला था। अंदर रामधन अपने बिस्तर से उठता है। सामने कोने में दो जवान बेटियां मिट्टी के चूल्हे पर चाय बना रही थी। सीता गीता कुछ बना कि नहीं? मेरे पेट में तो चूहे कूद रहे हैं। बाबा चाय चढ़ा दी है। थोड़ी सी सूखी रोटी भी है रात की। गरम कर देती हूं। हां। और खेतों में जाना भी है ना बाबा। आज सिंचाई जो करनी थी। हां बेटा। खेत ही तो है जो दो वक्त की रोटी दिलाते हैं। वरना इस दुनिया में हमारा कौन? दोपहर का समय। खेत में रामधन और उसकी बेटियां काम कर रहे थे। गर्मी का मौसम और धूप तेज थी। तीनों बिना चप्पल, बिना छांव के काम में जुटे थे। यह मिट्टी भी अब फल नहीं देती।
बीज डालता हूं तो
सोचता हूं क्या यह बेटियों के हाथ पीले कर पाएगी? बाबा आप चिंता मत करो। हम मेहनत करेंगे। कुछ ना
कुछ जरिया निकल ही आएगा। हां। और हमें कोई राजकुमार से तो शादी नहीं करनी। एक
अच्छा इंसान मिल जाए और मेहनत का शो हो। बस वही काफी है। बेटी अब तुम दोनों तो
मेरी जिंदगी हो। काश तुम्हारी अम्मा होती तो कुछ सलाह देती। मैं तो बस डरता हूं
समाज से और यहां के लोगों से। शाम का समय रामधन घर से निकल कर गांव के पुजारी से
मिलते हैं।
पुजारी जी चौपाल पर बैठे थे। रामधन पास आकर धीरे से बात
करता है। पंडित जी आप तो सब जानते हैं। मेरी बेटियां अब शादी लायक है। कोई अच्छा
लड़का दिखे तो जरा मेरी ओर भी ध्यान दीजिएगा। रामधन जमाना बदल गया है। अब लोग दहेज
देखते हैं। जमीन जायदाद पूछते हैं। तुम्हारे पास है क्या? पंडित जी मेरे पास तो बस
दो बीघा जमीन है और मेरी दो बेटी जो मेरे लिए अनमोल रत्न है। अच्छा ठीक देखता हूं।
एक दो परिवार हैं जो सीधे-साधे हैं। बात करूंगा उनसे लेकिन लेकिन क्या पंडित जी? तुम्हें दहेज की बात
सोचनी पड़ेगी। रामधन यह समाज का चलन है। पंडित जी मेरे पास देने को कुछ नहीं। बस
अपनी बेटियां ही हैं। रात का समय दोनों बहनें एक कोने में बैठी थी जहां टूटी दीवार
से चांद की रोशनी छन कर आ रही थी। दीदी बाबा रोज रोते हैं और हम कुछ नहीं कर पा
रहे। सीता मैंने तय कर लिया है मैं शहर जाऊंगी नौकरी ढूंढने। कुछ भी करूंगी पर
बाबा को इतना परेशान नहीं देख सकती। हां और मैं यहीं रहकर खेत संभालूंगी। जब तक तू
पैसे भेजेगी मैं घर संभाल लूंगी।
हम एक दिन बाबा का
सपना पूरा करेंगे सीता। दोनों बहनें एक दूसरे को देखकर रोती हैं। अगली सुबह रामधन
अकेला खेत पर काम कर रहा था। दोपहर का समय हो चुका था। गर्मी तेज थी। खेतों से कुछ
दूरी पर एक पुराना पीपल का पेड़ था। वहीं उसके नीचे रामधन अकेला बैठा गया। पास में
टूटी चप्पलें और पसीने से भीगा उसका शरीर भीग गया। लेकिन आज रामधन की आंखों में
बेबसी थी। क्या मैं अच्छा बाप नहीं हूं? दो-दो बेटियां जवान है और मेरे पास ना दहेज है, ना रिश्तेदार और ना ही
पैसे कमाने का कोई दूसरा साधन और ऊपर से सेठ का कर्ज भी बाकी है। वह थोड़ा रुकता
है। फिर पेड़ की ओर देखता है। क्यों जी रहा हूं मैं? और किसके लिए? मैं तो बोझ बन गया हूं सीता और गीता पर। मेरा
तो मर जाना ही बेहतर है। रामधन धीरे-धीरे पेड़ की ओर बढ़ता है। उसकी चाल लड़खड़ाती
है। वह डालियों को पकड़ कर चढ़ता है। फिर एक मजबूत टहनी पर पहुंचता है और कमर से
एक पुरानी रस्सी निकालता है। माफ करना बेटियों तुम्हारा बाबा हार गया। धीरे से वह
रस्सी गले में डालता है और फिर एक झटका कुछ क्षण सन्नाटा। हवा थम जाती है।
उसी समय रास्ते से एक मछुआरा भोलू गुजर रहा था। वह एक टोकरी
में मछलियां लेकर घर लौट रहा होता है। तभी उसकी नजर अचानक पेड़ की ओर जाती है। अरे
बाप रे रामधन ये तो फांसी लगाए लटका है। भोलू जल्दी से टोकरी फेंक कर पेड़ की ओर
दौड़ता है। फिर किसी तरह रामधन को नीचे उतार लेता है। मगर हे भगवान इसकी तो धड़कन
रुक चुकी है। यह तो मर गया। भोलू जल्दी से चिल्लाता हुआ गांव की ओर भागता है। गांव
वालों अरे कोई है रामधन ने खुदकुशी कर ली है। कुछ देर बाद रामधन के घर गांव वाले
इकट्ठा हो गए। रामधन का मृतक शरीर एक चादर में लिपटा हुआ पड़ा था। सीता और गीता
उसके पास बैठकर फूट-फूट कर रो रही थी। गांव की कुछ औरतें उन्हें संभालने की कोशिश
कर रही थी। बाबा तुमने ऐसा क्यों किया? हम तो तुम्हारे बिना जी ही नहीं पाएंगे। आप वादा करके गए थे
कि सब संभाल लेंगे। फिर क्यों छोड़ गए हमें? हाय रामधन तो बहुत सीधा आदमी था।
बेटियों की चिंता
खा गई उसे। हां, आजकल दहेज के डर
ने ना जाने कितने बापों को निगल लिया है। शाम का समय। श्मशान घाट पर रामधन की चिता
जल रही थी। सीता और गीता बेहोशी जैसी हालात में बैठी थी। उनके चेहरे पर आंसू सूख
चुके थे। पर अब सिर्फ खालीपन और भविष्य का डर था। रात का समय। झोपड़ी में काफी
अंधेरा था। पास में एक दीपक जल रहा था। दोनों बहनों के सामने एक रोटी और आधा प्याज
रखा था। अब तू ही है मेरा सहारा गीता। हां, और तू मेरा। अब बाबा की चिता के साथ हमारा डर जल चुका है।
अब सिर्फ एक मकसद है अपने पैरों पर खड़ा होना। हां, हम बाबा के सपने को अधूरा नहीं छोड़ेंगे। अब जो
होगा हम दोनों साथ मिलकर करेंगे। एक महीने बाद टूटी हुई झोपड़ी के अंदर सीता और
गीता चुपचाप बैठी थी। गीता एक महीना हो गया बाबा को गए। अब ऐसा लगता है जैसे सब
कुछ थम सा गया हो। हां दीदी ना कोई काम मिला ना कोई सहारा।
बस यही जमीन और
झोपड़ी बची है जिसे अब बचा पाए या नहीं पता नहीं। तभी बाहर से एक भारी आवाज आती
है। सीता गीता ओ दोनों बहनों बाहर आओ। सीता और गीता जल्दी से बाहर आती हैं। सामने
लंबा चौड़ा मोटा ताजा सेठ भीमसेन खड़ा था। पीछे उसका नौकर लाठी थामे हुए था।
भीमसेन की आंखों में लालच और चालाकी साफ झलक रही थी। सेठ जी प्रणाम। सब कुशल है।
प्रणाम नमस्ते बाद में करना। तुम्हारे बाप रामधन ने अपनी औरत की बीमारी के इलाज के
लिए मुझसे ₹100 का कर्ज लिया था।
अब वो मर गया। तो कर्ज तुम दोनों को चुकाना होगा। सेठ जी अभी तो हमारे पास खाने तक
को कुछ नहीं है। आप थोड़ा समय दे दीजिए। समय? यह मेरी रकम है। कोई दया नहीं है। अगर हफ्ते भर में पैसे
नहीं दिए तो यह जमीन और झोपड़ी मेरी हो जाएगी। दस्तखत करवाने की जरूरत नहीं। सब
पहले से लिखा जा चुका है।
सेठ जी यह जमीन बाबा की जान थी। कम से कम कुछ तो रहम कीजिए।
रहम अब मैं नहीं करता। सात दिन है तुम्हारे पास या पैसे दो या अपना घर खाली करो।
सेठ घमंडी अंदाज में हंसता है और वहां से चला जाता है। दोनों बहने अवा खड़ी रह
जाती हैं। रात का समय झोपड़ी के अंदर अंधेरा था। दोनों बहने चुपचाप बैठी थी। एक
कोने में सत्तू और सूखी रोटी रखी थी। पर किसी को भूख नहीं थी। गीता बाबा की छोड़ी
जमीन भी अब हमारी नहीं रहेगी। हां बचपन इसी मिट्टी में बीता और अब यहीं छीन ली
जाएगी। इस समाज में गरीब होना पाप है दीदी। कुछ करना होगा गीता। कहीं काम मिल जाए
तो शायद कुछ उम्मीद जगे। कल ही मैं कहीं मजदूरी जाऊंगी। अब चाहे नौकरानी बनूं या
बर्तन मांझूं पर कुछ तो करूंगी। इसके बाद सीता घर का काम करती और गीता गांव में ही
अमीर लोगों के यहां काम करने लगी। इस तरह पूरा हफ्ता बीत गया। 7 दिन बाद सेठ भीमसेन फिर
आया। इस बार उसके साथ दो आदमी और थे।
एक नौकर और एक
पटवारी। गीता काम करने गई हुई थी। जिस वजह से सीता अकेली थी। समय पूरा हुआ। कहां
है मेरे पैसे? सेठ जी मेरी बहन
काम करने गई है। कुछ पैसे मिलेंगे तो बकवास बंद कर। अब यह जमीन और झोपड़ी मेरी है।
पटवारी जी कागज तैयार है?
हां सेठ जी सब
लिखा पड़ा है। चलो हटो लड़की। यह जगह अब मेरी है। सेठ सीता का सामान बाहर फेंक
देता है। यह सब देख सीता जमीन पर गिर जाती है। हे भगवान अब हम क्या करें? हमारे पास कुछ भी नहीं
बचा। गीता काम से लौट रही थी। जैसे ही उसे खबर मिली, वह दौड़ते हुए आई और सामने जमीन पर बैठी सीता
को देखा। दीदी, क्या हो गया? सेठ, उसने हमारी जमीन, हमारा घर सब छीन लिया
गीता। यह लड़ाई अब रुकेगी नहीं दीदी। अब हम झुकेंगे नहीं। अब बारी हमारी है समाज
को जवाब देने की। सीता और गीता अपनी झोपड़ी को आखिरी बार पलट कर देखती हैं। उनकी
आंखों में आंसू थे। सिर पर एक छोटी पोटली और हाथ में सिर्फ एक दूसरे का सहारा था।
चलो गीता अब इस गांव में कुछ नहीं बचा। बस यादें हैं और दर्द। हां दीदी।
लेकिन जब तक हम साथ
हैं हम कुछ ना कुछ कर ही लेंगे। बाबा की आत्मा हमें देख रही होगी। दोनों बहने जंगल
की ओर बढ़ जाती हैं। उनके पांव कांप रहे थे। पर उनका हौसला उन्हें थामे हुए था।
दोपहर का समय सूरज सिर पर था। पसीने से लथपथ बहनें एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के
लिए बैठती हैं। तभी दूर से एक लाठी पकड़े झुकी हुई बूढ़ी औरत आती है। उसकी चाल
धीमी पर आंखों में अपनापन था। अरे बेटियां कहां जा रही हो इस तपती दोपहर में? चेहरे से तो लग रहा है
कोई भारी दुख लेकर निकली हो। दादी हम अपना घर खो बैठे हैं। बाबा की मौत के बाद सेठ
हमारी जमीन और झोपड़ी दोनों छीन ली। अब हमारे पास ना पैसा है ना कोई ठिकाना। बस
पेट भरने और इज्जत बचाने की कोशिश में निकले। हाय राम। कैसा जमाना आ गया है। बेटियों
को यूं दर भटकना पड़ रहा है। मैं पास के ही एक छोटे कारखाने में माली का काम करती
हूं। वहां फूल पौधे लगाती हूं। सफाई करती हूं।
वहां एक दो हाथ और लग जाए तो काम भी आसान होगा और तुम्हें
भी कुछ कमाने को मिलेगा। क्या सच में दादी हम कुछ भी करने को तैयार हैं। बस इज्जत
से जीना चाहते हैं। हां बेटा बस मेहनत से मत डरना। बिल्कुल नहीं। हमने तो खेतों
में भी काम किया है। चूल्हा भी जलाया है और बर्तन भी मांझे हैं। इसके बाद दोनों
बहने बूढ़ी औरत के छोटे से घर में पहुंचते हैं। झोपड़ी साफ सुथरी थी। सामने तुलसी
का पौधा और बगल में रंग बिरंगे फूलों के पेड़ थे। यह मेरा घर है बेटियों। छोटा है
पर दिल से बड़ा। तुम यहीं रहो। सुबह हम सात कारखाने चलेंगे। दादी आपने जो किया वो
कोई अपना ही करता है। हम कर्जदार हैं आपके। बस एक ही बात याद रखना। दुनिया भले
बेरहम हो लेकिन मेहनत कभी धोखा नहीं देती।
अगले दिन तीनों एक
मध्यम आकार के कारखाने में पहुंचती हैं। जहां रोजमर्रा के सामान की पैकिंग हो रही
थी। पर सीता और गीता माली का काम शुरू करती हैं। पौधों की सफाई, पानी देना और निराई करना।
शाम तक दोनों बहनें थक चुकी थी। दिनभर के थके हुए शरीर लेकिन शांत मन के साथ दोनों
बहनें एक कोने में बैठी थी। आज पहली बार लगा कि हम जिंदा हैं। किसी ने हमें
अपनाया। उम्मीद दी। हां दीदी अब कुछ कर दिखाना है। यह शुरुआत है। मंजिल बहुत दूर
है लेकिन अब डर नहीं लगता। अगली सुबह सीता और गीता एक हल्का बक्शा उठाकर फूलों की
क्यारी से पैकिंग यूनिट की ओर ले जा रही थी। दोनों बहनों के चेहरे पर सादगी, मेहनत और मासूमियत झलक
रही थी। तभी कारखाने के अंदर से एक जवान और तड़क-भड़क में रहने वाला व्यक्ति आता
है। नाम था रंजीत जो इस यूनिट का लीडर था। कपड़े साफ सुथरे, बाल सजे हुए पर नजरें
गंदी। ये दोनों कौन है? पहली बार देख रहा
हूं। कितना खूबसूरत चेहरा है। वह चालाकी से उनके पास पहुंचता है। अरे नई आई हो।
नाम क्या है तुम दोनों का?
मैं सीता और यह मेरी बहन गीता। मेहनती लगती हो, लेकिन यहां काम करने के
कुछ कायदे हैं। वह चारों ओर देखता है। फिर धीरे से इशारे में उन्हें एक कोने की
तरफ ले जाता है। जहां कोई नहीं होता। रंजीत का चेहरा अब मुस्कुराहट से हटकर असली
नियत दिखाने लगा था। देखो,
इस कारखाने में
टिकना है तो मेरे कहे अनुसार चलना होगा। तुम जैसी लड़कियां तो मेरी खास होती है।
मैं उन्हें हमेशा सपोर्ट करता हूं। आप क्या कहना चाह रहे हैं? सीधा बोलूं तो अगर यहां
काम चाहिए तो मेरी सहूलियत का भी ध्यान रखना होगा। वरना निकालने में देर नहीं
लगेगी। गीता की आंखों में आंसू आ जाते हैं। सीता की मुट्ठियां भी जाती है। दोनों
बहनों के चेहरे शर्म और गुस्से से तपने लगते हैं। हमें यह काम नहीं चाहिए। हम यहां
अपनी इज्जत बेचने नहीं आए हैं। हम चुप हैं। इसका मतलब यह मत समझो कि हम डर गए। हम
मजबूर हैं पर तुम्हारी गुलामी नहीं करेंगे। रंजीत हंसता है और अपनी जगह से हट जाता
है। बहनें चुपचाप काम पर लौटती हैं। शाम को कारखाने से लौटती बहनों की चाल धीमी थी
और आंखें सुनी थी। झोपड़ी में घुसते ही दोनों दीवार के पास बैठकर फूट-फूट कर रोने
लगती हैं।
हम कहां आ गए हैं? जहां मेहनत से नहीं शरीर
से पहचान मिलती है। क्या गरीब की इज्जत कोई मायने नहीं रखती? बूढ़ी औरत उनकी हालत
देखकर चौंक जाती है और पास आती है। क्या हुआ बेटियां? इतना टूट क्यों गई हो? दादी कारखाने में लीडर ने
हमारी इज्जत से खेलने की कोशिश की। कहा कि अगर काम चाहिए तो उसकी बातें माननी
होंगी। उस नीच ने ऐसा कहा वो रंजीत उस पर तो पहले भी कई शिकायतें आई थी। लेकिन कोई
सबूत नहीं था। इसलिए बच गया। हम अब वहां नहीं जाएंगे दादी। और सोच रही हैं कि अब
क्या करेंगे? तुमने सही किया
उस बदतमीज को जवाब देकर। अब मैं तुम्हें ऐसे रास्ते पर ले जाऊंगी जहां मेहनत की
कद्र होती है और इज्जत भी मिलती है। झोपड़ी के अंदर हल्का दिया जल रहा था। बाहर
रात की चांदनी थी। सीता खाना बना रही थी। गीता छटनी पीस रही थी। बूढ़ी औरत कोने
में बैठकर उनकी गतिविधि गौर से देख रही थी। बेटी सीता मैं कई दिनों से देख रही
हूं। तू जो खाना बनाती है उसमें एक अलग ही स्वाद होता है। कुछ नहीं दादी मां से
सीखा था थोड़ा बहुत और बाकी तो जरूरतें सिखा देती हैं। हां दादी दीदी के हाथ में
स्वाद का जादू है। आज तुम खाओगी तो उंगलियां चाटती रह जाओगी। बूढ़ी औरत कुछ सोचते
हुए मुस्कुराती है। फिर बात पलट देती है।
तो क्यों ना तुम
दोनों बहनें समोसे का ठेला लगाओ। पास के चौराहे पर रोज मजदूर रिक्शे वाले बच्चे
घूमते हैं। गरमागरम समोसे और चटनी अगर तुम बेचना शुरू करो तो शायद ईमानदारी की
कमाई से गुजारा हो जाए। ठेला पर दादी सामान, तेल,
मसाले, ठेला सब कुछ कहां से लाए? तुमने जो कारखाने से
महीने भर की मजदूरी बचाई है वो रखी है ना उसी से शुरुआत करो और हां मैं भी साथ
रहूंगी बूढ़ी ही सही पर मेहनत अब भी जानती हूं अगली सुबह सीता और गीता पुराना सा
झोला लेकर बाजार जाती हैं। वहां से आलू, आटा,
मसाले, तेल सब खरीद लेती हैं।
बूढ़ी औरत भी साथ चलती है। तीनों के चेहरे पर मेहनत और उम्मीद की चमक थी। चौराहा
पर सुबह 10:00 बजे का समय।
चौराहे के एक किनारे पर एक छोटा सा लकड़ी का ठेला सज चुका था। पीछे चटनी का डिब्बा, कढ़ाई में गर्म तेल। पास
में बूढ़ी अम्मा आलू मसल रही थी। सीता समोसे बेल रही थी और गीता गर्म तेल में
समोसे डाल रही थी। बहन जी समोसा कितने का है? ₹ का एक गरम और खस्ता।
मजदूर एक खाता है
और आश्चर्य से आंखें खोलता है। अरे वाह! ऐसा स्वाद तो होटल में भी नहीं मिलता। तीन
और देना। धीरे-धीरे भीड़ जुटने लगती है। कुछ रिक्शा वाले और कुछ औरतें सभी तारीफ
कर रहे थे। तुम दोनों बहनें तो सचमुच काबिल हो। ईमानदारी से कमाया गया हर निवाला
अमृत होता है। शाम को ठेले के पीछे तीनों बैठी गिनती कर रही थी। पूरे दिन के कुल
मिलाकर ₹280 हो गए थे। सोचो
पहले ही दिन ₹280 हमें अब किसी की
नौकरी की जरूरत नहीं। अब हम अपना काम करेंगे। अपने पैरों पर चलेंगे। बेटियों यही
तो असली इज्जत है। खुद के हाथ की कमाई। अब मेहनत और स्वाद तुम्हें उस ऊंचाई तक ले
जाएगा जहां कभी तुमने सोचा भी नहीं था। अगली सुबह सीता और गीता का समोसे का ठेला
अब पहले से ज्यादा सजा हुआ था। एक तरफ ताजेताजे समोसे की खुशबू उड़ रही थी। दूसरी
ओर ग्राहकों की भीड़ लगी थी।
पास ही बूढ़ी अम्मा की खाली चौकी पड़ी थी। आज वो बीमार होने
के कारण नहीं आई। दोपहर का समय भीड़ के बीच अचानक एक मोटा सा आदमी महंगे कपड़े
पहने मुंह में गुटखा दबाए गुस्से से आता है। वो था पास के समोसे होटल का मालिक
जिसका नाम है हरिराम। अरे ओ बहनों तुमने ठेला यहां क्यों लगाया है? यह जगह मेरी दुकान के
सामने है। हमारे ग्राहक छीन रही हो तुम। सेठ जी यह सार्वजनिक जगह है और हम किसी के
हक में दखल नहीं दे रहे। तुम्हारे जैसे लोगों को सड़कों पर व्यापार करने का हक
नहीं हटाओ यह ठेला वरना वरना क्या हम मेहनत कर रहे हैं भीख नहीं मांग रहे हरिराम
और जोर से चिल्लाने लगता है भीड़ तमाशा देखने लगती है वहीं पास के एक चाट ठेले पर
खड़ा एक नौजवान यह सब देख रहा था साफ सुथरे कपड़े आत्मविश्वास भरी आंखें नाम था
शिवम वह अपना प्लेट रखकर धीरे से बहस की तरफ आता एक मिनट सेठ जी अगर यह ठेला सड़क
के किनारे है और ट्रैफिक में रुकावट नहीं बना रहा तो आप इन्हें हटाने वाले कौन
होते हैं? तू बीच में मत
बोल लड़के। मैं बोलूंगा और कानून के हिसाब से बोलूंगा। भारत के संविधान की धारा 19 बंजी के अनुसार हर नागरिक
को ईमानदारी से व्यापार करने का अधिकार है और यह दोनों बहनें अपने हक के तहत
व्यापार कर रही हैं।
इनका ठेला पंजीकृत
हो या ना हो जब तक कोई नियम नहीं तोड़ा जा रहा तब तक आप इन्हें यूं धमका नहीं
सकते। यह सुन हरिराम थोड़ा सहम जाता है। अगर आप दोबारा इन्हें परेशान करेंगे तो
पुलिस को बुलाने में मुझे 1
मिनट नहीं लगेगा।
हरिराम गुस्से में पैर पटकता वहां से चला जाता है। थोड़ी देर बाद सीता और गीता
शिवम के पास जाती हैं। शिवम जी आपने आज हमें बहुत बड़ा सहारा दिया नहीं तो वो सेठ
हमारा ठेला उलटवा ही देता। मैंने सिर्फ वही किया जो सही था। तुम दोनों जैसी बहनों
को देखकर भरोसा होता है कि मेहनत अब भी जिंदा है। आजकल ऐसा सोचने वाले लोग बहुत कम
मिलते हैं। शिवम गीता की ओर देखता है और उसकी आंखों में झलकता आत्मसम्मान और
मासूमियत उसे भीतर तक छू जाता है। कुछ देर के लिए गीता शिवम को निहारती रहती है।
मुस्कुराहट उसके होंठों पर टिक जाती है।
दिल कुछ कहने लगता है। शाम को दोनों हंसीखुशी से घर जाती
हैं। गीता आज शिवम ने जो किया वो कोई सामान्य बात नहीं थी। दीदी पता नहीं क्यों
मुझे आज पहली बार किसी अजनबी पर भरोसा हुआ। कहीं तुझे वो पसंद तो नहीं आ गया। बस
इतना कह सकती हूं दीदी। उसकी बातों में इंसानियत थी। वो भी हमारी जैसी लड़कियों के
लिए बस वही सबसे कीमती होती है। रात को तीनों खाना खाकर सो जाती हैं। अब शिवम रोज
सीता गीता के ठेले के पास आने लगा। कभी समोसे की तारीफ करता कभी जरूरत का सामान
लाकर देता। पर उसकी नजरें अक्सर गीता को खोजती थी। गीता भी अब उसके आने का इंतजार
करती थी। शाम का समय। सीता पानी लेने के लिए गई हुई थी। तभी शिवम धीरे से गीता के
पास आता है। गीता मैं कब से सोच रहा था आज कह ही देता हूं। तुम्हारा मेहनती स्वभाव, तुम्हारा आत्मसम्मान और
तुम्हारी सादगी ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।
गीता थोड़ा चौंकती है। फिर मुस्कुरा कर नीचे देखने लगती है।
मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं गीता। क्या तुम मेरी जीवन साथी बनोगी? वह एक पल के लिए मौन हो
जाती है। उसकी आंखें भर आती हैं। फिर धीरे से हां में सिर हिला देती है। शिवम मैं
गरीब जरूर हूं मगर अपने चरित्र की अमीरी पर गर्व है। अगर तुम्हें मेरे साथ यह
जिंदगी मंजूर है तो मैं भी राजी हूं। अगले दिन शिवम अपने मां-पिता को गीता के बारे
में बताता है। पिता मुस्कुराते हैं लेकिन मां थोड़ा नाराज होती है। शिवम एक सड़क
पर ठेला लगाने वाली लड़की से शादी करोगे। हमारे खानदान की इज्जत का क्या? इज्जत मेहनत से मिलती है।
खानदान से नहीं। अगर हमारी बहू मेहनती सच्ची और आत्मसम्मी है तो उससे अच्छा और
क्या चाहिए? शिवम विनम्रता से
समझाता है।
मां मैंने बहुत
लड़कियां देखी लेकिन गीता जैसी गरिमा और ईमानदारी कभी नहीं मिली। मैं अपने फैसले
से खुश हूं और चाहता हूं आप भी मेरे साथ हो। मां धीरे-धीरे पिघलती है। अगर तुम खुश
हो तो हम भी राजी हैं बेटा। जाओ बहू को घर ले आओ। इसके बाद गीता और शिवम की शादी
हो जाती है। कुछ दिन बाद शिवम सीधा तहसील कार्यालय पहुंचकर पुराने कागज दिखाता है
और सेठ के झूठे दस्तावेजों की पोल खोलता है। इसके बाद शिवम, सीता गीता और सरकारी अफसर
एक गाड़ी में बैठकर अपने पुराने गांव लौटते हैं। गांव में पहुंचते ही पुराने लोग
उन्हें देख चौंकते हैं। सेठ भीमसेन दूर से देख रहा होता है। भीमसेन तुमने धोखे से
इनकी जमीन हथियाई थी। अब यह जमीन वापस इन्हीं को सौंपी जाती है। ये लो अपने पैसे।
मैं माफी चाहता हूं। मुझसे गलती हो गई। बाबा तुम्हारा सपना आज पूरा हुआ। अब हम फिर
से अपनी जमीन पर खड़े हैं। मगर इस बार सम्मान और प्यार के साथ।
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