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गरीब फिश करी वाला

  बिहार में बसे एक छोटे से गांव रामपुर की अपनी ही पहचान है। यहां के लोग बेहद मेहनती , सरल स्वभाव के और आपसी मेलजोल से रहने वाले हैं। मेहनत और सच्चाई इस गांव की पहचान मानी जाती है। और यहीं की मिट्टी में बसता है अपनापन और संस्कृति की सच्ची खुशबू। उसी गांव में दो भाई हुआ करते थे। बड़ा भाई संतोष और छोटा भाई आशीष। संतोष घर का बड़ा बेटा था और वह बेहद लालची स्वभाव का था। उसकी पत्नी सोनम भी उसी के जैसे गुणों वाली थी। सोनम हमेशा अपने पति संतोष के कान भरती रहती थी परिवार वालों के खिलाफ। संतोष भी बस सोनम की ही बातें सुनता था। दूसरी तरफ किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। दूसरी तरफ उसका छोटा भाई अशिष है जो मेहनती और शांत स्वभाव का है। उसकी पत्नी कमला थोड़ी गुस्सैल है लेकिन दिल की बहुत साफ है।  दोनों ही अपना काम मिलजुलकर करते हैं। भले ही दोनों छोटे हैं मगर घर को एक बड़े की तरह संभालते हैं। संतोष और आशिष की मां बहुत पहले ही एक हादसे में गुजर गई थी। बाऊजी की तबीयत भी पिछले कुछ महीनों से खराब रहने लगी है। बाऊजी का बस इतना ही सपना था कि पूरा परिवार आपस में मिलजुलकर साथ रहे। संतोष बाऊजी की उतन...

जंगल में उस रात

रात का समय था। रिमझिम बारिश लगातार गिर रही थी। हवा में एक अजीब सी खामोशी फैल गई थी। ऐसी खामोशी जिसमें दूर तक कोई आवाज नहीं आती। आसमान पर बादल घूम रहे थे जैसे ऊपर कहीं से कोई अनहोनी की आहट दी जा रही हो। कुणाल 26 साल का शहर की भागदौड़ से तंग आकर आज अपने गांव लौट रहा था। उसे कोशिश थी कि शाम होने से पहले घर पहुंच जाए। क्योंकि उनके इलाके में बहरूपिया की डरावनी बातें अभी भी लोग धीमी आवाज में याद करते थे। लेकिन बस उसकी किस्मत की तरह ही परेशान कर रही थी। खैर कुछ किलोमीटर बाद रुक जाती। फिर थक कर दोबारा चलती।

 खिड़की से बाहर देखते हुए कुणाल को लगा कि सड़क के दोनों तरफ जंगल और घना हो गया है। पेड़ इतने करीब खड़े थे कि बारिश की बूंदे अंदर तक जाती महसूस होती थी। शाम पूरी तरह ढल चुकी थी और गांव अभी भी करीब 25 कि.मी. दूर था। पिछले कुछ मिनटों से बस अजीब तरह से चल रही थी। कभी धीमी कभी झटके से आगे बढ़ जाती। फिर अचानक एक तेज झटके के साथ बस बिल्कुल रुक गई। बाहर इतना अंधेरा था कि खिड़की से कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था। सिर्फ बारिश की टपटप और पेड़ों की हल्की सरसराहट सुनाई दे रही थी। अरे यार यह कैसी बस है? लगता है रात भर यहीं अटके रहेंगे। गांव पहुंचना तो दूर चल भी नहीं रहे ठीक से। कुणाल 4 साल बाद अपने गांव लौट रहा था। रात गहरी थी। बस में बिल्कुल सन्नाटा। ड्राइवर टॉर्च लेकर नीचे उतरा और इंजन के पास झुक कर देखने लगा।

 बारिश की हल्की बूंदे गिर रही थी और जंगल का रास्ता धुंध में लगभग गायब सा लग रहा था। तभी उस धुंधले रास्ते से एक बुजुर्ग आदमी जल्दी-जल्दी चलता हुआ नजर आया। कपड़े भीगे हुए कांस थोड़ी तेज। जैसे वो यहां ज्यादा देर रुकने से डर रहा हो। वो ड्राइवर के पास पहुंचा और हल्की घबराहट में बोला, "भाई साहब, यह बस लखनपुर मोड़ तक जाएगी क्या? मुझे वहीं उतरना है। काफी देर से कोई सवारी नहीं मिली। जी चाचा जी, जाएगी तो सही पर अभी थोड़ा समय लगेगा। इंजन गर्म होकर बंद हो गया है। देख रहा हूं। बस थोड़ी देर में चल पड़ेगी। ठीक है बेटा। कोई बात नहीं। रात में इस रास्ते पर रुक कर खड़ा रहना अच्छा भी नहीं। मैं बस में बैठ जाता हूं। और हां बेटा मैं यह हनुमान जी का ताबीज बस में बैठे यात्रियों को देना चाहता हूं।

 हां चाचा जी आप अंदर जाकर दे दीजिएगा। बारिश भी बढ़ रही है। मैं 2 मिनट और देख लेता हूं। फिर कोशिश करता हूं बस स्टार्ट करने की। बुजुर्ग चुपचाप बस की तरफ बढ़ने लगा। उसके कदमों की आवाज गीली मिट्टी में दबकर अजीब सी लग रही थी। हनुमान जी का ताबीज ले लो भक्तों। यह तुम्हारी रक्षा करेगा। अंधेरे में जो छुपा है उससे सबको बचाएगा। यात्री उस बुजुर्ग को ऐसे नजरअंदाज कर रहे थे जैसे उसका होना ही बोझ हो। कुणाल ने भी खिड़की की ओर चेहरा घुमा लिया। मन में थोड़ी घबराहट और चिढ़ के साथ। लेकिन वो बुजुर्ग सीधे उसके पास आकर ठहर गया। उसकी धुंधली थकी हुई आंखें कुणाल को ऐसे टटोल रही थी जैसे उसके भीतर की कोई छुपी बात पहचान रही हो। तभी अचानक बस स्टार्ट हो जाती है और धीरे-धीरे चलने लगती हैं। सबसे पहले खतरा तेरे ही पास आएगा बेटा।

इसलिए यह चीज तेरे लिए ही है। तेरी राह में जो खड़ा है, उससे बचने की सबसे ज्यादा जरूरत तुझे ही पड़ेगी। नहीं बाबा यह मैं नहीं ले रहा। मैं ऐसी चीजों पर यकीन नहीं करता। कर लेगा बेटा। जब वो सामने खड़ा होगा तब तुझे यकीन अपने आप हो जाएगा। और हां, अभी तुझे यह मामूली लगेगा। पर आगे जाकर यही तेरी जिंदगी बचाएगा। कुणाल ने घबराकर उस बुजुर्ग की ओर देखा। बुजुर्ग ने धीरे से उसकी हथेली में हनुमान जी का एक पुराना ताबीज रख दिया। ताबीज छूते ही कुणाल को एक हल्की सी सकारात्मक गर्माहट महसूस हुई। बाबा की धीमी हंसी में कुछ ऐसा था कि कुणाल का दिल अनायास सहम गया। उसने अनमने मन से ताबीज अपनी जेब में डाल लिया। बस कुछ किलोमीटर ही आगे बढ़ी थी कि अचानक बुजुर्ग चाचा का छोटा सा पड़ाव आ गया और बारिश की धुंध में खोते हुए बस से उतर गए। बस दोबारा चल पड़ी। रात के करीब 10:00 बज चुके थे। बाहर अंधेरा इतना गहरा था कि पेड़ों की आकृतियां भी सिर्फ साए जैसी दिख रही थी।

 बस जंगल के बीचोंबीच अपने सुस्त इंजन की घरघराहट में रास्ता काट रही थी। करीब एक घंटे बाद बस झटके से रुकी। उसका गांव का स्टेशन आ चुका था। स्टेशन सुनसान पड़ा था। ना कोई रिक्शा, ना बैलगाड़ी, ना कोई आदमी। बस के जाते ही जगह और भी सुनी लगने लगी। कुणाल ने बैग कंधे पर डाला और लंबी सांस लेकर आगे बढ़ा। स्टेशन से उसके घर तक अभी भी 3 कि.मी. का रास्ता था और वह भी पूरी तरह जंगल के भीतर से। कच्ची कीचड़ भरी सड़क दोनों तरफ घने पेड़ों के बीच गायब सी हो जाती थी। हवा ठंडी थी। मगर कुणाल की पीठ पसीने से भीग रही थी। जैसे अंधेरा उसके हर कदम को चुपचाप देख रहा हो। अजीब खामोशी है। एक परछाई तक नहीं दिख रही। पता नहीं क्यों कदम भारी लग रहे हैं। जैसे कुछ पास ही छुपा हो। लेकिन बस थोड़ा और चलना है। घर पहुंच जाऊंगा फिर सब ठीक हो जाएगा।

 कुणाल खुद से बड़बड़ाता आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे गुजरा हो। उसने धीरे से कदम रोके। दिल एक पल को अटक गया। पीछे मुड़कर देखा काली सड़क, हिलते पेड़ और दूर तक फैला हुआ घना अंधेरा। लेकिन फिर भी कहीं बहुत पास से आती हुई हल्की सी हवा जैसे किसी की छुपी हुई सांस छू गई हो। कुणाल की रीड में ठंड उतर गई। उसे साफ महसूस हुआ। अभी कुछ पल पहले कोई उसके ठीक पीछे से गुजरा था। कुणाल कहा जा रहा है। जरा रुक जा। कौन है? अब क्या सच में यहां कोई है? कोई जवाब नहीं मिला। बस हवा में अचानक एक तेज ठंडी सरसराहट फैल गई। जिसने कुणाल की रीड तक सिहरन उतार दी। सहमे हुए उसने जेब में हाथ डाला और तावीज को छुआ। उसी पल उसकी उंगलियों में हल्की सी गर्माहट दौड़ गई। मानो कोई अदृश्य बल उसे थाम रहा हो। कुणाल ने घबराहट में तावीज गले में पहन लिया और धीमे कदमों से आगे बढ़ा। अचानक पेड़ों के पीछे से एक काली परछाई उभरने लगी। शरीर इंसान जैसा।

 उसकी आंखें हल्की सी लाल चमक में झिलमिला रही थी और वो बिना आवाज किए कुणाल की ओर बढ़ रही थी। रुक जा पास मत आना। कौन हो तुम? क्या चाहते हो? परछाई रुकी नहीं। वो तेजी से कुणाल की तरफ बढ़ी। जैसे ही वह कुछ कदम दूर पहुंची, ताबीज से हल्की सी चमक निकली। उस रोशनी को देखते ही परछाई एक अजीब सी खराब सीख के साथ पीछे हट गई। कुणाल का पूरा शरीर डर से कांप उठा। उसका गला सूख गया था। सांस भारी हो चुकी थी और कदम खुद ब खुद तेज होने लगे। वो अंधेरे रास्ते पर लड़खराता हुआ भागा। और किसी तरह अपने घर तक पहुंच गया। घर लकड़ी का पुराना था। दरवाजा हवा के साथ धीमे-धीमे चरमरा रहा था। कुणाल ने कांपते हाथों से दरवाजा खटखटाया। दादा जी दरवाजा खोलो। मैं हूं कुणाल। शहर से वापस आ गया। जल्दी खोलो। अंदर से कोई आवाज नहीं आई।

 कुणाल ने फिर धीरे-धीरे दरवाजे को खटखटाया। तभी अंदर से उसके दादाजी की घबराई हुई आवाज धीरे-धीरे सुनाई दी। को कौन है रे? इस वक्त दरवाजा कौन खटखटा रहा है? कहीं तू वो रात वाली परछाई तो नहीं? दादा जी मैं हूं कुणाल। दरवाजा खोलिए जल्दी। बाहर कुछ अजीब सा घूम रहा है। लेकिन दरवाजा अभी भी नहीं खुला। कुणाल ने देखा खिड़कियां भी पूरी तरह बंद थी और अंदर कहीं से हल्की सी भी रोशनी नहीं आ रही थी। उसी पल वही धीमी फुसफुसाहट फिर से उसके पीछे से गुजरी। कुणाल तू बच नहीं सकेगा। चल मेरे साथ। इस काली रात में कुणाल ने अंधेरे से बीच में देखा। वो काली परछाई वही उड़ गई। पर अब पहले से ज्यादा भयानक। उसका सरा हुआ चेहरा धुंध में उभर आया था। आंखें बिल्कुल खाली और उसके मुंह से काला धुआं निकल रहा था। कुणाल की सांसे अटकने लगी। उसने कांपते हाथों से ताबीज थामा और डर से भरकर चीख उठा। मुझसे दूर रह। तू मुझे छू नहीं सकता।

 यह ताबीज तुझे राख बना देगा। ताबीज कब तक उसके सहारे बचेगा तू? वो बस तेरी सांसे थोड़ी देर और खींचे रखेगा। अंत से नहीं बचाएगा। कुणाल का पूरा शरीर कांप रहा था। वो डर से हाफते हुए दरवाजे पर जोर से पीटने लगा। दादा जी क्या आप सुन रहे हैं? कोई तो दरवाजा खोलो। मैं सच में मर जाऊंगा। दरवाजे के भीतर से दादा जी की हिचकिचाती डर से भरी आवाज सुनाई दी। कुणाल तू तू जिंदा है लेकिन लेकिन वो वो चलावा तेरे रूप में आता है। हमें कैसे यकीन हो सकता है कि यह सच है या कोई और खेल? कुणाल की हिम्मत जवाब दे रही थी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। हाथ कांप रहे थे। लेकिन घरवाले उसे प्रेत समझकर दरवाजा नहीं खोल रहे थे। तभी उसकी याद में एक पुरानी बात तैर आई।

 गांव की एक बूढ़ी दादी ने बताया था कि गांव के मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति है। कहा जाता है कि वहां कोई भी चलावा या प्रेत नहीं जाता। कुणाल ने मन ही मन सोचा कि अगर वो वहां पहुंच गया तो शायद उसकी जान बच जाएगी। कुणाल अंधेरे जंगल में तेजी से भाग रहा था। पीछे से आती छलावा की सरसराहट अब उसके बिल्कुल पास सुनाई दे रही थी। पेड़ों की टहनियां चेहरे और हाथों को काटती हुई गुजर रही थी। पर कुणाल रुकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। हनुमान जी का ताबीज उसकी छाती पर हल्का गर्म हो उठा। जैसे उसे संभाल रहा हो। कुणाल ने अपने आप को धीरे-धीरे संभाला और जैसे तैसे मंदिर के दरवाजे तक पहुंच गया।

वहीं थकावट और डर के कारण वो बेहोश हो गया। कुछ ही देर बाद उसकी आंखें खुली। कुणाल ने देखा कि उसके पास मंदिर के पुजारी बैठे हुए थे। उसकी तरफ गंभीर और शांत नजर डाल रहे थे। बेटा तू सच में बहुत ही किस्मत वाला है जो इतनी रात में यहां पहुंच गया। बाहर तू पूरी तरह बेहोश पड़ा था। मैंने जल्दी से तुझे उठाकर यहीं लाया है। पुजारी बाबा वो वो छाया वो अजीब सी आवाजें सब पीछे पड़ गई थी। बेटा अब तू निश्चिंत हो जा। मैंने तुझ पर हनुमान जी का विशेष आशीर्वाद मंत्र पढ़ा है। इस समय तेरे चारों तरफ एक अदृश्य सुरक्षा घेरा बन चुका है। कोई भी प्रेत कोई भी परछाई उस घेरे के भीतर कदम तक नहीं रख सकती। बाबा आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अगर आप मुझे समय पर वहां से नहीं उठाते तो शायद मैं आज बच ही नहीं पाता। चलो बेटा मैं तुम्हें सुरक्षित तुम्हारे घर तक छोड़ देता हूं।

 वैसे भी इस जंगल में अकेले जाना ठीक नहीं होता। कुणाल पुजारी बाबा के साथ मंदिर से बाहर निकला। आगे थोड़ा बढ़ा ही था कि उसकी नजर एक पुराने पेड़ पर अटक गई। वहां एक बूढ़ा आदमी उल्टा लटका हुआ था। उसकी आंखें सीधे कुणाल पर जड़ी थी। पुजारी बाबा कुणाल को उसके घर के दरवाजे तक लेकर आए। उन्होंने धीरे से दरवाजा खटखटाया। पर अंदर से कोई आवाज नहीं आई। अरे दरवाजा खोलो। बेटा कुणाल शहर से थक कर आया है। सच्चा तन बोले तो द्वार खुले। झूठा छाया गिरे धूल में। पुजारी बाबा की आवाज सुनते ही अंदर हल्की खड़खड़ाहट हुई और दरवाजा धीरे-धीरे खुला। चौखट पर एक बुजुर्ग आकृति दिखाई दी। मनोज के दादाजी उनके चेहरे पर चिंता और डर साफ झलक रहा था। बेटा कुणाल तू आ गया शहर से। अंदर आ बेटा। जल्दी आजा।

 दादाजी ने कुणाल का हाथ पकड़ लिया और उसे भीतर खींचा। एक झटके में उन्होंने दरवाजा जोर से बंद कर दिया। मानो बाहर कोई खतरा मंडरा रहा हो। दादा जी बाहर पुजारी बाबा अकेले खड़े हैं। उन्हें भी अंदर आने दीजिए। दरवाजा अचानक बंद क्यों कर दिया आपने? ये कौन? यह पुजारी कौन है? तुम किसकी बातें कर रहे हो? मुझे तो समझ नहीं आ रहा। वही पुजारी हैं दादा जी जो हनुमान जी के पुराने मंदिर में रहते हैं। उन्होंने मुझे उस चलावा से बचाया था। तभी मैं सुरक्षित महसूस हूं। क्या कह रहा है तू बेटा? उस हनुमान जी वाले मंदिर के पुजारी वो तो एक साल पहले ही रहस्यमय तरीके से चले गए थे। उनकी मौत आज तक किसी को समझ नहीं आई। दादाजी की यह बात सुनते ही कुणाल के भीतर जैसे ठंड की एक लहर दौड़ गई। उसकी उंगलियां तक कांपने लगी। उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें अचानक सिकुड़ आई हो।

 वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उसके साथ घर तक कौन आया था। जबकि दादाजी साफ-साफ कह रहे थे कि उस पुजारी की मौत तो पूरा एक साल पहले हो चुकी थी। दादा जी यह आप क्या कह रहे हो? वह तो मेरे साथ-साथ चलकर आए। उन्होंने ही मुझे बचाया था। मैं मैं अभी-अभी उनके साथ ही दरवाजे तक पहुंचा हूं। दादाजी कुणाल को पकड़ कर पूजा वाले कमरे में ले आए। अंदर आते ही उन्होंने बिना कुछ कहे हनुमान जी की मूर्ति के सामने आकर मंत्र जपना शुरू कर दिया। कुणाल बाजू में खड़ा था। डर से उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी-अभी उसके साथ जो हुआ वो असल था या कोई मायाजाल। बेटा हमारे गांव में रात के समय दरवाजा खोलने का एक ही नियम है। जिसे भीतर आना हो उसे बाहर से वह पहचान वचन कहना पड़ता है।

 सच्चा तन बोले तो द्वार खुले झूठा छाया गिरे धूल में। क्योंकि छलावा इस वचन को कभी पूरा नहीं बोल पाता। उसकी आवाज बीच में टूट जाती है। इसलिए हम बिना यह सुने किसी को अंदर नहीं आने देते। हां दादा जी यह वचन मैं पहचानता हूं। यह तो बाहर उस पुजारी बाबा ने ही बोला था। सच्चा तन बोले तो द्वार खुले झूठा छाया गिरे धूल में। सच कहूं तो लगता है ऊपर वाले ने मेरी सुन ली। दो बार मौत सामने थी। पर हर बार किसी ना किसी रूप में बचा लिया गया। भगवान का उपकार है कि मैं आपके सामने खड़ा हूं। बेटा कुणाल तू सच में भगवान भरोसे बच गया है। हमारे यहां जो भी रात में ऐसे बाहर दिखाई देता है, सुबह उसकी लाश ही मिलती है जंगल की झाड़ियों में। तू अकेला है जो आज तक उस छाया के मुंह से बचकर घर पहुंचा है। दादा जी आखिर यह छलावा है कौन? और हमारे ही गांव के लोगों के पीछे क्यों पड़ा है? कुछ तो वजह होगी कि वह हर रात किसी ना किसी को ले जाने आता है।

 बेटा इसका मैं भी सही-सही जवाब नहीं दे सकता। सच्चाई तो वहीं जाकर पता चलेगी। कहते हैं जंगल के बीच एक पुराना पीपल का पेड़ है और उसी पेड़ के पास यह सारी आत्माएं अपना ठिकाना बनाती हैं। कुणाल का मन सवालों से भरा था। पुजारी की बातें सुनकर उसकी नींद जैसे उड़ गई हो। बार-बार वह उस पीपल के पेड़ के बारे में सोच रहा था। सोचते-सचते उसके दिमाग में एक अजीब ख्याल चमक उठा। अचानक मेरा गांव आना, बस में उस बाबा से मिलना, मंदिर में पुजारी को देखना यह सब महज संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे कोई उद्देश्य जरूर होगा। शायद मैं उन भटकती आत्माओं को मुक्ति दिला सकूं और अपने गांव को इस डर से बचा सकूं। कुणाल बिस्तर से उठता है और हाथ में पुरानी लालटेन थामे धीरे-धीरे जंगल की ओर बढ़ता है। घने पेड़ों के बीच हर कदम पर उसकी सांस [संगीत] तेज होती जाती है। तभी दूर रास्ते के बीचोंबीच उसकी नजर कुछ अजीब पर पड़ती है। शायद कोई बुजुर्ग व्यक्ति सिर पर काले कपड़े ढके हुए बिना आवाज के खड़ा। जैसे-जैसे कुणाल उसके पास बढ़ता है, उसकी रीड पर सिहरन दौड़ जाती है।

 थोड़ी दूरी तय करने के बाद वो आकृति अचानक गायब हो जाती है और अगले ही पल कुणाल के सामने खड़ी होकर उसे घूरने लगती है। मानो उसकी हर सांस पर निगाह रख रही हो। तुम कौन हो? क्यों? तुमने यह रास्ता रोक रखा है? कहां से आए और क्या चाहते हो मुझसे? तुम्हें अपनी जान की जरा भी फिक्र नहीं है ना? दो बार बच कर निकल गए। पर अब बचना आसान नहीं होगा। अंधेरा तुम्हारे नाम से जाग चुका है और तुम्हारा अंत पास है। कुणाल ने घबराकर अपने मन में हनुमान जी का नाम लिया। हे हनुमान जी मेरी रक्षा करो। मेरी मदद करो। जैसे ही आवाज गूंजी उस साए का असली रूप सामने आ गया। कुणाल की सांस अटक गई। सामने खड़ा कोई अजनबी नहीं वही मंदिर का पुजारी था। वही जिसने कुछ समय पहले उसकी जान बचाई थी। लेकिन अब उसका [संगीत] रूप कुछ और ही था।

 अरे पुजारी बाबा आप पर आप तो कुणाल सोच ले जिस राह पर तू चल पड़ा है, क्या सच में तुझे लगता है कि तू उनका सामना कर पाएगा? जिनसे पूरा गांव वर्षों से डर कर भागता है। क्या तू अकेला उनके सामने टिक पाएगा? बाबा जब मैं यह गांव छोड़कर शहर गया था तब तो यहां ऐसी कोई भी डरावनी बात नहीं होती थी। लेकिन अब यह सब कैसे हो रहा है? यह बदलाव क्यों आया? बदला कुणाल वो सिर्फ बदला ले रहा है। पूरे गांव से अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला। करीब 4- 5 साल पहले की बात है। ठीक उसी समय जब तुम शहर चले गए थे। इस गांव का जमींदार भैरव सिंह। उसका नाम ही काफी था डर फैलाने के लिए। क्रूर, लालची और निर्दयी इंसान था वो। गांव वालों की कई जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया था।

 पर उसकी सबसे भारी भूल थी मंदिर की भूमि पर नजर डालना। उस जमीन को हथियाने के लिए उसने मंदिर गिराने की ठान ली और मुझे उस मंदिर के पुजारी को बेरहमी से खत्म कर दिया। यह देखकर गांव वाले भड़क उठे और उन्होंने मिलकर भैरव [संगीत] सिंह को मार डाला। पर उसी दिन से उसकी आत्मा भटकती है। रूप बदलकर वही छलावा बनकर इस गांव से बदला ले रहा है। बाबा बताइए इस गांव को उस आत्मा से बचाने का रास्ता क्या है? आखिर हम उसे कैसे रोक सकते हैं? उस जमींदार की आत्मा अभी भी भटकी हुई है कुणाल। उसका क्रोध शांत नहीं हुआ। उसे रोकने का केवल एक ही उपाय है। तुम्हें उसके शरीर के बचे खुचे अवशेष ढूंढने होंगे। वो अवशेष कहां मिलेगा पुजारी बाबा? वो तो मुझे भी नहीं पता। उसे तुम्हें ही ढूंढना होगा। हां, याद आया। सूखा पीपल का पेड़ जरूर वहीं आसपास में जमींदार को मारा होगा।

 मुझे उन हड्डियों को ढूंढकर आप दोनों को मुक्ति देना होगा। कुछ आत्माएं मरने के बाद भी यूं ही भटकती रहती हैं। और वे नहीं चाहती कि कोई उनकी सीमाओं को पार करें। पर आज की रात कुणाल ने वही कदम उठा दिया। एक ऐसा कदम जिसकी सजा कभी-कभी जिंदगी नहीं सीधा मौत होती है। करीब रात के 2:00 बजे जब पूरा गांव गहरी नींद में डूबा था। कुणाल अकेला एक लालटेन लिए रास्तों पर उतर पड़ा। वो उसी पुराने पीपल के पेड़ की ओर बढ़ रहा था। एक ऐसा स्थान जहां आज तक कोई लौट कर आया नहीं। कुछ ही देर में जंगल की खामोशी चीरते हुए कुणाल उस डरावने पीपल के पेड़ के सामने खड़ा था। जिसे मैं अब तक डर समझता रहा। शायद वही अब मेरा रास्ता बन गया है। कुणाल किस हिम्मत से इस जगह कदम रखा। यहां आने वाले कभी लौटते नहीं और तू भी अब यहीं खत्म होगा। लेकिन वो आत्मा तो किसी भी तरह की शांति स्वीकार ही नहीं करना चाहती थी। उसकी

आंखों में सिर्फ बदले की आग धक रही थी। अचानक उसकी विकराल काया हवा में फैल गई। वो साया उड़ता हुआ सीधा कुणाल की ओर बढ़ा। उसे देखते ही कुणाल का खून मानो जम सा गया। उसकी उंगलियां कांपतेकांपते सुन्न पड़ने लगी। हाथ की लालटेन डर से थरथरा रही थी। रुक रुक जा। ये ये तावीज ये मेरी खाल तक को चीर रहा है। आग की तरह चुभ रहा है। इसे हटा दे दूर फेंक दे। आत्मा क्रोध से भरकर जोरजोर से चिल्लाने लगी। उसकी आवाज इतनी तेज थी कि पूरा जंगल गूंज उठा। अचानक आत्मा उसके पास आकर उसे दूर फेंक देती है और इतनी ताकत से फेंक देती है कि कुणाल वहीं गिर पड़ता है जहां पहले भैरव सिंह जमींदार का शव फेंका गया था। वहां उसके कंकाल बिखरे हुए थे। कुणाल डर के बावजूद झट से खड़ा हो गया।

आंखों में सेन और दिल में धड़कनों की आवाज के साथ कुणाल डर के मारे हड़बड़ाने लगा। अब उसके पास सिर्फ वही पुरानी लालटेन बची थी जिसकी हल्की रोशनी अंधेरे में फरक रही थी। पर तभी उसकी नजर कुछ बिखरी हुई हड्डियों पर पड़ी। दिल तेजी से धड़कने लगा। कुणाल समझ गया कि यह कोई प्रेतात्मा की हड्डियां हैं। हाथ कांपते हुए उसने लालटेन उठाई और झटके में उसे उन हड्डियों के ऊपर फेंक दिया। जैसे ही लालटेन की आग हड्डियों को छूती है, एक भयंकर रोशनी और गर्मी फैल गई। तभी वह अनुभूति हुई। भैरव सिंह जमींदार की आत्मा शांत हो गई और उसकी आत्मा धीरे-धीरे मुक्त होने लगी थी। उसी के साथ अन्य भटकती आत्माएं भी मुक्ति पा गई। मंदिर के पुजारी बाबा की आत्मा भी अब शांति से मुक्ति मिल गई। कुणाल की ताकत खत्म हो चुकी थी। डर, थकान और राहत के मिश्रित एहसास में वो वहीं जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया।

 फिर सब कुछ शांत पड़ जाता। कुछ दिनों के बाद फिर से कुणाल अपने काम से शहर चला जाता है और अब फिर से गांव में शांति लौट आती है। 

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