घना जंगल, चारों तरफ ऊंचे-ऊे पेड़ और उनके बीचों-बीच एक छोटा सा कच्चा घर। घर की दीवारें मिट्टी की बनी थी और ऊपर खपैल की छत थी। घर के बाहर छोटा सा आंगन था जहां मिट्टी का चूल्हा बना रहता था। उसी घर में दो बहनें रहती थी। बड़ी बहन का नाम था गीता और छोटी बहन का नाम सीता। माता-पिता कई साल पहले बीमारी में चल बसे थे। तब से यह घर और जीवन की सारी जिम्मेदारी गीता और सीता पर आ गई थी। बड़ी बहन गीता गंभीर स्वभाव की थी। काम में निपुण और समझदार। जबकि छोटी बहन सीता चंचल, मासूम और हसमुख थी। उस शाम गीता काम से लौटी थी और सीता भी घर का काम लगभग समाप्त करके अपने दीदी की राह देख रही थी।
गीता सिर पर लकड़ी का गट्ठर रखे आंगन में आई और बोली, देख सीता, आज का गट्ठर बड़ा भारी
है। अब इसे कल सुबह गांव के बाजार ले जाकर बेचना पड़ेगा। आज की दाल तो तुझे ही
बनानी पड़ेगी। दीदी, तुम हमेशा मुझे
चूल्हे पर भेज देती हो। कभी तुम भी बनाओ ना। मैं भी लकड़ी उठाकर लाती हूं तो
तुम्हें भी कभी-कभी चूल्हे पर बैठना चाहिए। अरे पगली, तू छोटी है। इसीलिए तुझे
काम सीखना है। चूल्हा, चौका, आटा, पानी सब समझना होगा। वरना
बाद में क्या करेगी। मैं तो चाहती हूं कि तू सब जान ले। हां दीदी, मैं समझती हूं। पर
कभी-कभी लगता है जैसे मां हमारे साथ होती तो हमें यूं मेहनत ना करनी पड़ती। कितना
अच्छा होता।
मां हंसते हुए हमें रोटी परोसती और बाबा चौपाल से लौट कर
हमारे लिए कुछ खाने के लिए मिठाई लाते। अरे तू फिर क्या वही बातें ले बैठ गई। सीता
भगवान ने मां-बा को हमसे छीन लिया। लेकिन हिम्मत भी दी है। यह जंगल हमारा साथी है।
देख जब पेड़ों की पत्तियां सरसराती हैं तो मुझे लगता है जैसे बाबा की आवाज आ रही
हो। और जब चूल्हे की आंच में धुआं उठता है तो ऐसा लगता है जैसे अम्मा पास बैठी
हैं। हम अकेली नहीं हैं। दीदी तुम हमेशा मुझे समझा देती हो। सच कहूं तुम्हारे साथ
रहते हुए मुझे डर कभी नहीं लगता। चाहे घर कितना भी छोटा हो लेकिन अगर तुम पास हो
तो यह घर मुझे किसी राजमहल जैसा लगता है।
दोनों बहनों ने उस
दिन देर तक बातें की। चूल्हे पर दाल पक रही थी और घर के बाहर जंगल का सन्नाटा
गहराता जा रहा था। लेकिन उस छोटे से घर में बहनों की हंसी और उनके विश्वास से एक
अलग ही उजाला फैला हुआ था। सुबह का समय था। गीता और सीता ने लकड़ी का गठ्ठर सिर पर
उठाया और गांव की ओर चल पड़े। रास्ता जंगल से होकर जाता था। पक्षियों की चहचहाट, पत्तों की सरसराहट और
बीच-बीच में झाड़ियों में जानवरों की हल्की आवाज। जब वे गांव पहुंचे तो चौपाल की
तरफ से गए। चौपाल पर गांव के बड़े बुजुर्ग बैठे थे।
अरे गीता सीता आज
फिर इतनी लकड़ियां लेके आ गए। यह भारी गट्ठर तुम दोनों अकेले कैसे ढो लेती हो? जंगल में डर नहीं लगता।
बाबा, डर तो कभी-कभी
लगता है पर हमें भरोसा है कि भगवान हमारे साथ है और जंगल हमारे लिए माता-पिता जैसा
है। वही हमें सहारा देते हैं। हां बाबा, हमें पेड़ों से फल मिलते हैं, नदी से पानी मिलता है, लकड़ी मिलती है, जो कुछ मिलता है, हम उसी से संतोष कर लेते
हैं। हमें डर नहीं लगता। अभी हम चलते हैं बाबा। हमें देर हो जाएगी। इन सब लकड़ियों
को बाजार में बेच के भी आना होगा। चल सीता। यह बोल के दोनों लकड़ियों का गट्ठर लिए
बाजार की तरफ निकल जाते हैं। कुछ समय बाद जब दोनों बहनें लकड़ियां बेच के घर आते
हैं तो आसमान पूरा काला हो गया था।
बरसात का मौसम था।
शाम होते-होते तेज आंधी शुरू हो गई। देखते-देखते बारिश की धारे बरसने लगी। गीता और
सीता अपने घर के अंदर बैठी थी। दीदी छप्पर टूट ही जाएगा लगता है। सुनो बाहर तूफान
में पेड़ों के हिलने की आवाज भी आ रही है। अब हम कहां रहेंगे? डर मत बहन। भगवान सब देख
रहे हैं। और अगर घर टूट जाएगा तो हम फिर से बनाएंगे। हिम्मत रख। जब तक हम दोनों
साथ हैं, कोई संकट हमें
तोड़ नहीं सकता। बारिश पूरी रात चलती रही। घर की दीवारें गीली हो गई लेकिन छप्पर
को कुछ भी नहीं हुआ। बहनें रात की खाना खाकर कोने में एक दूसरे के पास बैठी रही।
दीदी मुझे डर लग रहा है। अगर दीवार भी भीगभी भीग के गिर गई तो हम कहां जाएंगे? डर मत। सीता याद रख
कठिनाइयां हमेशा नहीं रहती।
यह रात भी बीत जाएगी। सुबह सूरज निकलेगा और हम फिर से अपने
इस घर में मां बाबा के यादों के साथ जीने लगेंगे। और तू देख छप्पर भी नहीं टूटा।
तूफान अब रुक गया है। बस थोड़ी सी बारिश हो रही है। गीता ने सीता को थोड़ी सी
हिम्मत देके उसको चुप करा दिया था। लेकिन पूरी रात दोनों बहनों को अपने घर की
चिंता सता रही थी। सुबह जब गांव की निराला काकी उनके घर देखने आई तो उसने घर की
हालत देखकर बोली अरे बेटियों शुक्र है तुम्हारा घर ठीक है मुझे और तुम्हारे काका
को तुम दोनों की चिंता सता रही थी पता नहीं दोनों बच्चियां इतनी तेज आंधी बारिश
में कैसी होगी लेकिन भगवान का शुक्र है तुम दोनों और तुम्हारा घर ठीक है काकी आप
लोगों के आशीर्वाद और भगवान की कृपा से हमेशा की तरह यह घर बस गया और हम भी
सुरक्षित हैं और लगभग बारिश की मौसम खत्म होने ही वाला है।
तो अब मन से थोड़े फिक्र कम होने भी लगी है। आप सब हमारे
लिए मां-बाप जैसे हैं। अच्छा लगा कि आप हमारी हाल पूछने आए काकी। हमारा आशीर्वाद
तो हमेशा रहेगा। लेकिन बेटी हम तो कब से चाहते हैं कि तुम दोनों हमारे वहां आकर
रुको। इस जंगल के बीच तुम लोग इतने भी सुरक्षित नहीं लगते। नहीं काकी आप तो जानते
हैं यह जमीन और घर मां बाबूजी की आखिरी निशानी है। इसे छोड़कर हम कहीं नहीं जा
सकते। हां मैं जानती हूं गीता। इसलिए तो तुम दोनों को ले जाने की तुम्हारे काका और
मैं जिद नहीं करते। चलो बेटी अभी मैं चलती हूं। थोड़ी देर रुकिए ना काकी। चाय पी
के जाते तो अच्छा लगता। नहीं नहीं बेटी। तुम लोग काम करो। मैं चलती हूं। यह बोल के
निराला काकी दोनों बहनों की हालचाल पूछ के वहां से चली जाती है और दोनों बहनें भी
काम में लग जाती है। गीता पानी भरने नदी में जाती है और सीता रसोई के काम में लग
जाती है।
बरसात का मौसम थम
चुका था। खेतों में हरियाली लौट रही थी। गांव में धीरे-धीरे मेले की तैयारी शुरू
हो गई थी। हर साल बरसात के बाद मेले का आयोजन होता था। पर हर बार की तरह गांव के
लोग खुश कम और चिंतित ज्यादा थे। कारण था गांव का जमींदार रामलाल और मुखिया हरछू।
दोनों आपस में मिले हुए थे और गरीबों से जबरन चंदा वसूलते थे। उस दिन सुबह गीता और
सीता घर के आंगन में अनाज सुखा रही थी। चूल्हे पर सीता दलिया चढ़ा चुकी थी। तभी
दूर से जमींदार और मुखिया और जमींदार का आदमी दिखते हैं। दीदी देखो तो यह तो
जमींदार और मुखिया है। यहां क्यों आ रहे होंगे? शायद वही होगा जिसकी मुझे आशंका थी। मेला नजदीक है और अब यह
लोग चंदा मांगने आए होंगे। लेकिन चंदा मांगना नहीं जबरदस्ती ऐंठना कहो। कुछ ही देर
में जमींदार रामलाल और मुखिया हरखू एक नौकर के साथ आंगन में आ पहुंचे।
रामलाल के चेहरे पर
घमंड साफ झलक रहा था और हरखू इतराता चला आ रहा था। ओ गीता सीता हम आए हैं। थोड़ा
आवाज लगाओ। गांव का मेला आने वाला है। हर घर से चंदा लेना है। गरीब अमीर सबको देना
पड़ेगा। गीता ने नम्रता से आकर हाथ जोड़ लिया। जमींदार बाबू हम तो दो अनाथ बहनें
हैं। जैसे तैसे जंगल से लकड़ी बेचकर गुजारा करते हैं। हमारे पास इतना बचता ही कहां
है कि चंदा दे सके। माफ कीजिएगा। यह सुनकर रामलाल का चेहरा तमतमा गया। अरे ओ हमें
बहाने मत सुना। मेला गांव की इज्जत है। अगर तुमने चंदा नहीं दिया तो कल तुम्हारा
नाम चौपाल पर खराब कर दूंगा। सबको बता दूंगा कि तुम दोनों बहनें गांव के काम में
साथ नहीं देती। पिछले साल भी वही किया था तुम दोनों ने।
लेकिन हमने तुम्हारी बातें मान ली थी। सीता अब तक चुप थी।
मगर रामलाल के मुंह से यह सब बात सुनके वह बात सह नहीं पाई। जमींदार बाबू गांव की
इज्जत हमसे ज्यादा कौन समझेगा? हम भी तो गांव की ही बच्चियां हैं। लेकिन जो पेट भरने लायक
अनाज मुश्किल से जुटाता हो उससे आप सोना चांदी की तरह चंदा चाहते हैं। यह तो
अन्याय है। हरकू मुखिया तुरंत बीच में कूद पड़ा। चुप रह लड़की। ज्यादा जुबान मत
चला। गांव के सम्माननीय व्यक्ति से कोई ऐसे बात करते हैं क्या? हम मुखिया हैं इस गांव
के। हमें पता है किसके घर में कितना है। तू मत समझ कि तेरी गरीबी हमें नहीं दिखती।
गरीब को हमेशा चुप रहना चाहिए और जो हुक्म दिया जाए मान लेना चाहिए। गीता ने गहरी
सांस ली और शांत स्वर में बोली मुखिया जी हम आपकी इज्जत करते हैं। लेकिन जबरदस्ती
चंदा लेना सही नहीं है। मेला गांव वालों की खुशी के लिए होता है ना कि किसी की
ताकत दिखाने के लिए।
हम चाहें तो अपने
हाथों से मेला सजाने का काम कर देंगे। लेकिन चंदा देना हमारे लिए असंभव है। रामलाल
और हरखू दोनों उनकी अपमान करते हुए बोले सुना ना हरखू ये लड़कियां हमें उपदेश दे
रही हैं। इन्हें लगता है कि इनकी बात मानकर हम चंदा छोड़ देंगे। देखो लड़कियों
जमींदार और मुखिया की बात कभी टाली नहीं जाती। वरना नतीजा अच्छा नहीं होता। उनके
धमकी और अपमान को देखकर सीता को गुस्सा आ जाता है और गुस्से में बोलती है, नतीजा चाहे जो हो, हम अपना पेट काटकर आपका
लालच पूरा नहीं कर सकते। आप बड़े हैं आपसे झगड़ा नहीं करेंगे।
लेकिन सच यही है कि
गांव वालों के चंदे का हिस्सा मेले से ज्यादा आप लोगों के पेट में जाता है। आंगन
में सन्नाटा छा गया। जमींदार और मुखिया को उनके इल्जाम लगाने पर बहुत गुस्सा आया।
और हरखू ने गुस्से में बोला रामलाल जी छोड़िए इन्हें। चलिए चौपाल पर इनका नाम
चढ़ाते हैं और इनको मेले में प्रवेश करने से पाबंदी लगा देंगे। फिर देखेंगे गांव
के लोग इनसे कैसा व्यवहार करते हैं। रामलाल ने ठंडी सांस लेकर कहा। ठीक है। हम अभी
चलते हैं। लेकिन याद रखना लड़कियों जमींदार की बात टालना आसान नहीं। आज नहीं तो कल
तुम्हें हिसाब चुकाना ही होगा। इतना कहकर दोनों और उनका नौकर चले गए। गीता और सीता
देर तक खामोश खड़ी रही। हवा में अजीब सा बोझिलपन था। दीदी अब क्या होगा? अगर उन्होंने चौपाल पर
हमारा नाम खराब कर दिया तो गांव वाले भी हमें ताने देंगे।
हम तो पहले ही अनाथ हैं। सबके सामने और अपमानित होना
पड़ेगा। डर मत बहन। सच का रास्ता हमेशा कठिन होता है। लेकिन हमें झुकना नहीं
चाहिए। अगर हम आज हार गए तो कल यह जमींदार और मुखिया हम गरीब पर और जुल्म करेंगे।
हमें डटकर खड़ा होना होगा। सीता ने अपनी दीदी की आंखों में देखा। वहां डर नहीं
बल्कि आग की तरह चमकता हुआ साहस था। उसने सिर हिलाया और बोली, हां दीदी, अब चाहे पूरा गांव हमें
गलत समझे, पर हम सच से पीछे
नहीं हटेंगे। कुछ समय बाद अंधेरा होता है। उस शाम दोनों बहनों ने चूल्हे पर खिचड़ी
पकाई। लेकिन उनके दिलों में सवाल गहरे उतरते जा रहे थे। क्या सचमुच अब पूरा गांव
उनके खिलाफ हो जाएगा? या फिर गांव वाले
उनकी सच्चाई को समझेंगे? अगली सुबह गीता
और सीता कुछ लकड़ियों को साथ ले गांव के बाजार जा रहे थे। तभी दोनों ने देखा कि
जमींदार और मुखिया गांव के कुछ लोगों को जमा करके गांव के होने वाले मेले के बारे
में बता रहे थे।
सुनो सुनो गांव
वालों इस साल का मेला हमारे गांव की शान है। हर घर से चंदा लिया जाएगा और कोई
बहाना नहीं चलेगा। चाहे गरीब हो या अमीर सबको देना पड़ेगा। हां। और जिसने चंदा
देने से इंकार किया उसका नाम गांव में बदनाम किया जाएगा। उसकी जमीन जायदाद पर भी
बुरा असर पड़ेगा। याद रखो मेरा हुकुम टल नहीं सकता। लोग चौपाल पर सहमे-सहमे खड़े
थे। कुछ ने डर के मारे तुरंत पैसे दे दिए थे। कुछ चुपचाप सिर झुका कर खड़े रहे।
तभी मुखिया की नजर गीता और सीता पर पड़ी। अरे देखो तो यह दोनों बहनें भी खड़ी हैं।
इनका घर तो जंगल के किनारे है, खेती भी है पर मेले में चंदा नहीं दे सकते। गांव से दूर हो
ही अब समाज से भी दूर हो जाओगी। दीदी, हमारे पास तो बस लकड़ी बेचकर जो मिलता है वही होता है। अब
यह लोग चंदा मांग रहे हैं। हम कहां से देंगे? चुप रह सीता। सब सुन रहे हैं।
पहले हम इनसे बात करते हैं। हमारी मजबूरी सबके सामने आएगी।
तभी लोग हमारे साथ होंगे। गीता आगे बढ़ी और मुखिया के सामने हाथ जोड़कर बोली
मुखिया जी जमींदार बाबू हम तो दो अनाथ बहने हैं। जो मिलता है उसी से पेट पालते
हैं। यह सब गांव वालों के साथ आप भी जानते हैं। मेले में हम सेवा देंगे जैसे हर
साल करते हैं। लेकिन पैसा देने की ताकत हम में नहीं। कृपा करिए हमें माफ कीजिए। और
जब मां बाबूजी थे तब तो उन्होंने गांव के मेले में हर साल चंदा देते थे। लेकिन अभी
आप लोग हमारी परिस्थितियों को समझे। क्या कहा तूने? पैसा नहीं दोगी? गांव का मेला कोई बच्चों का खेल है।
अगर हर कोई तेरे जैसा सोचने लगे तो मेला ही ना लगे और ऊपर
से तू हमें समझाने चली है। हां गीता। तू अपने आप को बहुत सयानी समझती है। लेकिन मत
भूल गांव में हमारी चलती है। तेरे घर की जमीन भी जंगल के किनारे है। अगर हम चाहे
तो तेरे लिए रास्ता बंद करवा दें। तब देखना तू लकड़ी बेचने भी नहीं जा पाएगी। गांव
वाले यह सब सुन रहे थे। पर डर के मारे कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था। सीता
डर रही थी। लेकिन गीता का चेहरा और कड़ा हो गया। जमींदार बाबू हम गरीब हैं लेकिन
डरपोक नहीं। आपने सही कहा। गांव का मेला सबका होता है। लेकिन क्या मेला गरीबों के
पेट काटकर होगा? अगर अमीर लोग
दोगे तो ही मेला चल पाएगा। हम अनाथ बहनों से चंदा लेकर आप क्या अपनी इज्जत बढ़ाओगे? जो भी हो हमारे हाथ से
मेहनत का अन्न उठता है। दूसरों का हक नहीं छीनते।
आप चाहे तो हमें मेले की सेवा से भी निकाल दीजिए। पर
जबरदस्ती चंदा नहीं देंगे। गीता की बात सुनकर चौपाल पर सन्नाटा छा गया और सीता भी
आगे आकर बोलती है, हां दीदी सही कह
रही हैं। हम तो मेले में हर साल पानी भरते हैं। मंदिर की सफाई करते हैं। यही हमारी
भेंट है। लेकिन पैसे वो तो हमारे पास है ही नहीं। और यह बात हम भी जानते हैं। आखिर
बात सिर्फ चंदे की नहीं है। जो हर साल आप दोनों हम बहनों को चंदे के नाम पर परेशान
करते हो। जमींदार का चेहरा लाल हो गया। सीता की बात उसके सीधे दिल पर आ लगी थी। वो
समझ गया कि सीता क्या कहना चाहती है। अरे ओ लड़की बहुत जुबान चल रही है तेरी।
थोड़े आवाज नीची करके बात कर। यह जो गांव के लोगों के सामने साहस दिखा रही है।
याद रख बाद में यह
लोग तुझे बचाने नहीं आएंगे। तब खूब तमाशा देखेंगे हम। जमींदार बाबू बच्चियां सच कह
रही हैं। इनका हाल सबको पता है। इनसे जबरदस्ती चंदा लेना ठीक नहीं। जो सेवा यह
बहनें करती हैं वही सबसे बड़ा दान है। अरे चुप रहो तुम। तुम्हारी बातों से काम
नहीं चलेगा। यहां जमींदार की हुकुम चलता है। गांव के उन्नति में जमींदार जी ने
बहुत मदद की है। तुम लोग तो बस जबान चलाना जानते हो। मुखिया की बात सुनकर अब गांव
की औरतें भी बोलने लगी। गीता सीता सच्ची मेहनतकश है। इनके पास पैसा कहां से आएगा? इन्हें छोड़ दीजिए। अगर
आप इनसे चंदा लेंगे तो हम सब भी अपना चंदा रोक देंगे। गांव का माहौल बदल गया। जहां
पहले डर था, अब धीरे-धीरे
विरोध की आवाज उठने लगी। जमींदार और मुखिया दोनों ने देखा कि अगर और दबाव डाला तो
लोग खुलकर उनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे। ठीक है। ठीक है। इन बहनों से हम कुछ नहीं
लेंगे।
लेकिन याद रखना जिसने जमींदार की बात टाली उसका भला कभी
नहीं हुआ। यह कहकर वह अपने नौकर और मुखिया को लेकर आगे बढ़ गया। मुखिया ने
जाते-जाते गीता और सीता पर तिरछी नजर डाली। मानो कह रहा हो कि यह मामला यहीं खत्म
नहीं हुआ है। सीता थोड़ी सी डरी हुई होती है। उसने गीता से कहा दीदी ये लोग
दुश्मनी पर उतर आएंगे। मुझे डर लग रहा है। डर मत सीता। आज हमने सच कहा है। अगर हम
झुक जाते तो कल यह लोग और भी दबाव डालते। सच बोलने से डरना नहीं चाहिए।
हां, मुसीबतें आएंगी। पर अगर
गांव हमारे साथ हुआ तो हमें कोई नहीं हरा पाएगा। गांव वाले जमींदार और मुखिया से
डर के भी बहनों का साथ दिया था और दोनों बहनों का हिम्मत देख के सब खुश होते हैं।
लेकिन गांव वालों का साथ पाकर भी उस रात दोनों बहनें देर तक सो ना सकी। जंगल की
हवा में सरसराहट थी। लेकिन उनके दिल में तूफान था। गीता जानती थी कि असली लड़ाई
अभी शुरू हुई है। [संगीत] अगली सुबह दोनों बहनें चिंतित अवस्था में एक दूसरे से
बात करते हैं। दोनों डरी हुई थी। दीदी रात को आंखें बंद करूं तो वहीं छवि आ जाती
है। मुखिया की ठसक और जमींदार की आंखों की चुभन। वे जातेजाते कुछ कह रहे थे। ऐसा
लगा जैसे उनकी साजिश हमारी जमीन से जुड़ी हुई है। मैं सो नहीं पा रही। मैं भी नहीं
सीता। तू ठीक बोली। वे शांत नहीं बैठेंगे। उनकी नजरों में सिर्फ फायदा है। हमारे
मां-बाप ने जो मेहनत की वही उन्हें सही नहीं बैठ रही। यहां जमींदार के घर। कमरे
में उसका एक नौकर और मुखिया बैठा हुआ है। हम कितने समय से उनके जमीन पर नजर डाले
हुए हैं। जब दोनों लड़कियों के पिता थे तब गया था मैं एक दिन। उससे वह जमीन
खरीदने। लेकिन उसने मुझे बेइज्जत करके भेज दिया था। आज भी नहीं भुला पाता हूं। और
उसी को कल उनके बेटियों ने दोहराया है।
मुझे अब उनकी वह जमीन ले उनसे बदला लेना ही होगा। हमारा
फायदा भी तो है। अगर गीता सीता की जमीन हमारे हाथ में आई तो हम वहां आपके नशीली
पदार्थ की व्यापार को बढ़ा भी तो सकेंगे। अरे वही तो मैं कब से चाहता हूं। लेकिन
हो नहीं पा रहा। मेरे व्यापार के लिए वह जगह एकदम सही है। अब हमें यह मेले के नाम
पर ही उन्हें वहां से खदेड़ने का मौका मिला है। और अगर गांव वाले भी उनके तरफ से
बोले तो सबके सामने दोनों बहनों को कुछ पैसे देकर उस जमीन से निकाल फेंकेंगे। यही
सब बात करके सब यह योजना बनाकर दोपहर को ही बहनों के घर मुखिया और जमींदार अपने
नौकर के साथ आते हैं। अब तुम्हें तुम्हारी बातों की सजा मिलेगा। तुमने जो मेले में
अपना योगदान ना देकर पूरे गांव का अपमान किया है, उसका भुगतान करना ही होगा। अब बात चंदे की नहीं
है। अब या तो यह जमीन छोड़कर यहां निकल जाओ या तो पूरी जिंदगी समाज से अलग रहो। तब
तो तुमको कुछ हो भी गया तो समाज के नियमों की वजह से तुम्हें कोई पूछने भी नहीं
आएगा। हमने कुछ भी गलत नहीं किया। यह हमारी मां-बाप की जमीन है। आप लोग कानून और
लोगों का विश्वास का गलत फायदा मत उठाओ। हम जानते हैं जब जमींदार जी और आपकी नजर
बरसों से हमारी इस जमीन पर थी।
लेकिन हम आपको यह
जमीन कभी नहीं देंगे। तो इसमें गलत ही क्या है? वैसे भी तुम दोनों इस जमीन का करोगे क्या? आखिर में दोनों को
लकड़ियां ही तो बेचने जाना है। इससे अच्छा जमीन हमें देकर निकल जाओ कहीं और हम
तुमको पैसे भी दे देंगे। हमें पैसों की जरूरत नहीं है। हम यह मां बाबूजी की
संपत्ति कभी नहीं छोड़ेंगे। जमींदार और मुखिया को दोनों बहनों की जिद देख के बहुत
गुस्सा आया और मुखिया बोला ठीक है फिर देखना अब तुम्हें समाज में कैसे बेइज्जत
करता हूं और समाज से कैसे निकाल फेंकता हूं। फिर देखूंगा तुम लोग कैसे और कहां
लकड़ियां बेच के घर चलाते हो। यह बोल के सब वहां से गुस्से से निकल गए। दोनों
बहनों को यह सुनकर बहुत डर लगता है और दोनों चिंतित होकर गांव के रामधन काका के
पास जाते हैं जो कि उन्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे। बेटियों क्या हुआ? तुम दोनों थोड़े चिंतित
लग रहे हो। काका वे लोग जमींदार और मुखिया वे हमारी जमीन पर नजर डाल रहे हैं। आज
वे लोग हमें धमका कर गए और इसीलिए हम डरे हुए हैं।
इन्हें डर दिखाकर लोगों की जायदाद हथियाना कोई नई बात नहीं।
पर डरने की कोई बात नहीं है। तुम लोगों के पास तो जमीन के कागजात है ही तो कागज
संभाले रखना। मैंने पहले ही कहा था कि तुम्हें हमारे साथ रहना चाहिए। तुम्हें वहां
अकेले छोड़ना सही नहीं है। मैं जानता हूं यह दोनों वो घर कभी नहीं छोड़ के आएंगे।
वहां उनकी यादें हैं। यह दोनों भी अपने पिता जैसे ही हैं। लेकिन बेटियों तुम लोग
चिंता मत करो। मैं अभी ठाकुर हरि प्रताप के पास जाऊंगा और सब बताऊंगा। उनकी कई
गांव में चलती है। उनसे ऊपर कोई नहीं है। हमारे गांव के मुखिया चुनना भी उनके ही
हाथ में होता है। काका क्या ठाकुर जी हमारा साथ देंगे? चिंता मत करो। ठाकुर जी
सच्चे लोगों की हमेशा मदद करते हैं।
मैं अभी ठाकुर जी
को बताकर आता हूं। और तुम्हें डरने की जरूरत नहीं। थोड़े समय बाद रामधन काका ठाकुर
हर प्रताप के पास आता है। ठाकुर बड़े सख्त पर न्यायप्रिय किस्म के थे। रामधन काका
सब कहानी ठाकुर को विस्तार से बताते हैं। ठाकुर साहब दोनों बहनें अनाथ हैं। उनकी
मां-बाप ने वर्षों पहले इस जमीन पर मेहनत की। अब जमींदार और मुखिया उसे छीनना
चाहते हैं। वे पहले से ही कुछ गलत काम करते रहे हैं। कुछ अवैध व्यापार भी करते हैं
और यही जमीन उनके गलत काम के लिए काम आ सकती है और इसलिए वह लोग अनाथ लड़कियों को
परेशान कर रहे हैं। मैं भी सुन चुका था कि रामलाल की नजर किसी की जमीन पर थी जो कि
वह कोई अवैध व्यापार करना चाहता है। पर अब जब खबर पुख्ता है तब कदम उठाना पड़ेगा।
तुमने क्या सबूत प्रस्तुत किए? अभी कोई सबूत तो नहीं है ठाकुर जी लेकिन वे दोनों बहनों को
परेशान करते आए हुए हैं। जबकि दोनों बहनों के पास जमीन की कागजात भी है।
आप अपने एक आदमी को मेरे साथ भेज दीजिए। मैं और आपका आदमी
दोनों उन लोगों का सच आपके सामने लाएंगे। ठीक है। मैं अपने एक भरोसेमंद आदमी को
देखरेख के लिए भेज देता हूं। रामलाल की हर चाल पर नजर रखी जाएगी। अगर उसने कोई
नकली कागज बनवाए या फिर दोनों बहनों को परेशान किया और कुछ गलत व्यापार करने का
सोचा तो मैं तुरंत उनको सजा दूंगा। ठाकुर जी पर उनके पास पैसे और दबाव है। वे
पटवारी को खरीद सके तो तुम यह सब की चिंता मत करो। अगर तुम और मेरा आदमी उनकी सच
सामने ना ला पाए तो मैं कुछ और लोगों को हर जगह भेज दूंगा। गांव के पेड़ों के पास
रास्तों पर जो रात दिन उनकी हरकतों पर नजर रखेंगे। और अगर कोई फर्जीवाड़ा हुआ तो
मैं चौपाल में सारे कागज खोल कर रख दूंगा और न्याय करूंगा। उसी रात रामधन काका और
ठाकुर की आदमी ने जमींदार और मुखिया की निगरानी करते हुए सुना कि अरे मुखिया अब
मुझसे यह सब सहा नहीं जा रहा। मेरा बहुत नुकसान हो रहा है। मुझे जल्दी से उन दोनों
लड़कियों की जमीन लेनी होगी और व्यापार शुरू करना होगा। हां, सब्र तो मुझसे भी नहीं हो
रहा लेकिन क्या करूं? दोनों लड़कियां
बहुत जिद्दी है। नहीं मानेगी। कैसे नहीं मानेंगे? उनको उनकी ही भाषा में समझाना होगा।
दोनों को आज रात ही
जाकर निकाल फेंकते हैं। बहुत मुंह चलता है उनका। अब हम हाथ चलाएंगे। फिर देखता हूं
डर के मारे अपनी जमीन कैसे नहीं देते हैं। तभी रामधन और ठाकुर का आदमी उनके सामने
आते हैं और उनसे गुस्से में बोलते हैं हम भी देखते हैं कैसे क्या कर लेते हो।
बच्चियों को अकेला समझा है क्या? यह देखो ठाकुर हरी प्रताप जी का आदमी अब तुम दोनों की खैर
नहीं। अब तो तुम लोगों की सच्चाई सबको पता चलेगा। मेले के नाम पर क्या-क्या गलत
योजना बनाते हो। अकेली लड़कियों को परेशान करते हो। यह बोल के रामधन और ठाकुर का
आदमी तुरंत ठाकुर को सूचना देने जाता है और यहां जमींदार और मुखिया की चेहरे का
रंग उड़ जाता है। जैसे उन्हें एक झटका लग गया था। एक पल में दोनों की सब योजना
खत्म हो गई थी। रामधन काका और ठाकुर की आदमी ने ठाकुर को सब बताया और तब ठाकुर को
बहुत गुस्सा आया। ठीक है। अब मैं समय तय कर रहा हूं। कल चौपाल में मैं सब खोल
दूंगा। सारे लोगों को यहीं ले आ जाना। मैं तो पहले से उनके कर्मों को भांप रहा था।
लेकिन मेरे पास कोई सबूत नहीं था। लेकिन अब मेरे खुद के
आदमी ने ही सब देखा और सुना है तो अब उनको मैं नहीं छोडूंगा। उनको सबके सामने धमका
कर उनकी सच्चाई सबके सामने बाहर लाऊंगा। [प्रशंसा] अगली सुबह चौपाल में गांव के
बहुत लोग जमा हैं। जमींदार और मुखिया को भी बुलाया जाता है। दोनों डर और शर्म के
मारे सिर झुकाए हुए थे। ठाकुर उठते हैं और बोलते हैं रामलाल मुखिया तुमने अपने
बैसाखी दिखाकर काफी भय फैलाया। पर आज हम सबके सामने यह फैसला होगा। सत्य क्या है
और झूठ क्या? तुम लोग खुद से
सब सच बोलोगे तो तुम्हें कम सजा होगा और अगर मुझे निकलवाना पड़ा तो बात बहुत गंभीर
होगी। जमींदार और मुखिया के पास सच बोलने के सिवा और कुछ रास्ता नहीं था। वे जानते
थे कि ठाकुर को सब सच पता है और सबूत के तौर पर पिछले रात का घटना है। और इसीलिए दोनों
ठाकुर के सामने गिड़गिड़ाने लगता है। ठाकुर जी हमसे भूल हो गई। हमें दोनों बहनों
से चंदा मांग के उनको परेशान नहीं करना चाहिए था। हमें माफ कर दीजिए। वाह, माफी भी ऐसे सफाई से मांग
रहे हो जैसे हमको कुछ पता ही नहीं है तुम्हारे बारे में। अरे सच बोलो कि तुम लोग
चंदे के नाम पर दोनों अनाथ बहनों को इसलिए परेशान करते थे ताकि तुम्हें उनकी जमीन
मिल सके और उस जमीन पर तुम लोग नशीली पदार्थ का अवैध व्यापार कर सको।
यह सुनकर मुखिया और
जमींदार सबके सामने बहुत शर्मिंदा होता है और अपना सिर झुका लेते हैं। अब यह शर्म
से सिर झुका कर खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है। जल्दी से सबसे माफी मांगो और
दोनों बहनों से हाथ जोर के माफी मांगो और तो और मुखिया तुमको अब से गांव के मुखिया
पद से निकाला जाता है। और जमींदार रामलाल तुमको सजा के तौर पर गांव के मेले के लिए
सब गांव वालों की चंदा तुमको देना होगा। ऐसा मत कीजिए ठाकुर जी। मैं अब से यह गलती
दोबारा नहीं करूंगा। आप मुझे मुखिया पद से मत निकालिए। हां ठाकुर जी। मैं भी पूरे
मेले का खर्चा नहीं उठा पाऊंगा। ऐसे तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा। हम आगे से यह गलती
नहीं करेंगे। हम पर दया कीजिए। यह सब मैं नहीं जानता। बहुत हो चुका तुम लोगों की
मनमानी। अब तुमको कोई भी दूसरा मौका नहीं मिलेगा। मैं तो तुम दोनों की हरकतों को
बहुत पहले से देख रहा था। लेकिन अब तुम्हारी गलतियों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
ठाकुर उनकी एक नहीं सुनता और दोनों को सजा के तौर पर ठाकुर ने सबके सामने दोनों को
बहनों के सामने माफी मंगवाई और हर को मुखिया पद से बहिष्कार किया। और जमींदार को
मेले का खर्चा अकेला उठाने को दिया। और मुखिया और जमींदार भी ठाकुर की बात ताल
नहीं सके और ना चाहकर भी बात माननी पड़ी।
कुछ समय बाद गांव
के सब लोगों के अपने-अपने घर जाने के बाद दोनों बहनें ठाकुर को शुक्रिया अदा करने
लगते हैं। ठाकुर जी आपने आज हमको सिर्फ न्याय नहीं दी। बल्कि आपने हमारी जिंदगी
बचाई है। आप बहुत दयालु और न्यायप्रिय हैं। हां, दीदी ने सच कहा है। आपने आज हम दोनों बहनों का
उद्धार किया है। आप नहीं होते तो यह दोनों जमींदार और मुखिया हमको हर साल परेशान
करते रहते। अरे, इसमें धन्यवाद की
कोई जरूरत नहीं है। यह सब मेरा काम है। बहुत से गांव मुझे मानते हैं। और इसी मान
को रखने के लिए मैं हमेशा सबकी मदद करता हूं। और अगर धन्यवाद देना ही है तो अपने
रामधन काका को दो। इन्हीं को तुम दोनों को न्याय दिलाने का श्रेय जाता है। यह तो
हमारा सौभाग्य है कि हमें इनके जैसा काका मिला है। भले ही खून का रिश्ता ना हो फिर
भी इन्होंने खून के रिश्तों से हमेशा ज्यादा निभाया है।
आपका बहुत-बहुत
शुक्रिया काका। आपका शुक्रिया काका। आप हमेशा हम पर अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए
रखना। अरे अरे यह क्या बोल रहे हो तुम दोनों? भला अपनों से क्या ही शुक्रिया कहना। और वैसे भी मेरा और
तुम्हारी काकी का आशीर्वाद और प्यार तुम दोनों पर हमेशा से था और रहेगा। बस यह
शुक्रिया बोल के शर्मिंदा मत करो। यही सब बात करके सबके चेहरे पर हंसी आ जाती है
और सब हंसी-खुशी घर चले जाते हैं। घर पहुंचकर दोनों बहनें राहत की सांस लेते हैं
और अपनी मां बाबूजी की जमीन घर और यादों को सही सलामत है। यह सोच के दोनों की मन
में शांति आता है। देख बहन मैंने बोला था ना कि सच का रास्ता कठिन होता है। लेकिन
हमेशा अच्छा होता है। हम हमेशा मां-बाबू जी की दिखाई सच के राह पर चलते आए हैं।
इसीलिए आज भगवान ने हमारी लाज और ये घर दोनों बचा लिया। पता नहीं आगे क्या-क्या
कठिनाई आएगी लेकिन हमें ऐसे ही डटकर सामना करना होगा। हां दीदी। आप हमेशा से सही
होती है और आज तो हमें मां बाबूजी भी देख के खुश हो रहे होंगे। हम पे गर्व कर रहे
होंगे। सही कहा बहन। मां बाबूजी जहां है वहां से हमें देख के खुश हो रहे होंगे।
यही सब संघर्षों को
झेलने के बाद और दोनों के एक दूसरे के साथ देने से अब उनके जीवन में कठिनाई कम हो
रही थी और दोनों की गांव में सम्मान बरकरार रहती है।
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