गंगापुर एक गांव में रवि नाम का एक बुजुर्ग व्यक्ति अपनी
इकलौती बेटी के साथ रहता था। उसकी आर्थिक हालत बहुत खराब थी। वे बहुत गरीबी में
अपना जीवन बिता रहे थे। एक दिन उसके घर सेठ मंगलदास आता है। मुझे उधार दिए हुए
महीने बीत गए हैं। पर तूने आज तक एक भी पैसा वापस नहीं किया है। आज मुझे मेरे पैसे
चाहिए नहीं तो मैं तुम सबको इस घर से बाहर निकाल दूंगा। बस तीन दिन की मोहलत और दे
दीजिए सेठ जी। कल मेरा बेटा शहर से लौटने वाला है। जैसे ही वह वापस आएगा, मैं सारे पैसे चुका
दूंगा। आपने इतने सालों तक सब्र रखा है तो क्या आप सिर्फ दो-तीन दिन और नहीं रुक
सकते? मैं आपसे हाथ
जोड़कर विनती करता हूं।
मेरी मजबूरी को
समझिए। अच्छा ठीक है। मैं तुम्हें तीन दिन की और मोहलत देता हूं। अगर दो-तीन दिन
में मेरे पैसे मुझे नहीं मिले तो तुम्हारा सारा सामान बाहर फेंक दूंगा। ऐसा कहकर
सेठ मंगलदास वहां से चला जाता है। तब रिया अपने पिताजी से कहती है, पिताजी भैया दो-तीन दिन
में आ जाएंगे ना। अगर इस बार भैया नहीं आए तो सेठ मंगलदास तो हमें घर से निकलवा
देगा। इस बार वह हमारी एक भी नहीं सुनेगा। तुम फिक्र मत करो बेटी। सुमित ने कहा है
वह जरूर आएगा और उसने पैसों का इंतजाम भी कर लिया है। उसके आते ही सेठ मंगलदास के
सारे पैसे लौटा दूंगा। फिर फिक्र करने की कोई बात नहीं होगी। तीन दिन ऐसे ही बीत
जाते हैं लेकिन सुमित नहीं आता है। दोनों बाप बेटी सुमित का इंतजार कर रहे थे। तभी
एक आदमी रवि के घर आकर बोलता है अरे
रवि भाई यह क्या हो गया? जिस कंपनी में तुम्हारा बेटा काम करता था, उस कंपनी में बहुत भीषण
आग लग गई है और उस कंपनी में काम करने वाले जितने भी लोग थे, सारे के सारे बहुत बुरी
तरह से जल गए हैं। खबर मिली है कि उसमें से कोई नहीं बचा और इस कंपनी में तुम्हारा
बेटा भी काम करता था। यह सुनकर रवि के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है और वो
फूट-फूट कर रोने लगता है। हे भगवान, यह क्या कर दिया आपने? अब क्या होगा मेरा और मेरी बेटी का? हम कैसे जिएंगे? ऐसे ही कुछ दिन बीत जाते
हैं। उनके गांव में एक कंपनी का आदमी आता है। उसी समय सेठ मंगलदास भी वहां से गुजर
रहा था। अरे भाई साहब जरा सुनिए यहां पर रवि जी का घर कहां है? क्या आप मुझे बता सकते
हैं तुम कौन हो? अरे भाई साहब मैं
कंपनी से आया हूं। आप तो जानते ही होंगे कि रवि जी के बेटे की कंपनी में आग लगने
की वजह से मृत्यु हो गई थी। उसने इतने सालों तक बहुत मेहनत करके बहुत सारे पैसे
जमा कर लिए थे।
वह सब लेकर घर आने
ही वाला था। लेकिन उससे पहले यह दुर्घटना हो गई। जिस वजह से अब कंपनी के मालिक ने
उनके परिवार वालों के लिए पैसे भेजे हैं। मैं उसके वही पैसे उसके पिताजी रवि जी को
देने आया हूं। यह सुनकर सेठ मंगलदास के मन में लालच जाग जाता है और वह सोचता है
क्यों ना मैं इसे बोल दूं कि मैं ही रवि हूं और इससे सारे पैसे ले लूं। वैसे भी
रवि ने मुझसे कर्जा लिया है। अरे भाई तुम एकदम सही आदमी से मिले हो। मैं ही रवि
हूं और जिसकी बात तुम कर रहे हो वह मेरा ही बेटा था। अच्छा हुआ भाई साहब। आप मुझे
यहीं पर मिल गए। यह लीजिए आपकी अमानत। अब मैं चलता हूं। यह कहकर वह कंपनी का आदमी
वहां से चला जाता है और सेठ मंगलदास वह पैसा लेकर अपने घर चला जाता है और उधर रवि
और उसकी बेटी सोच में पड़ जाते हैं। बेटी मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। अब
हमारा गुजारा कैसे होगा। हम तो पूरी तरह से सुमित के भरोसे पर थे। लेकिन पता नहीं
भगवान यह कैसी परीक्षा ले रहा है। सुमित ही तो हमारा सहारा था। भगवान ने उसे भी
हमसे छीन लिया। भगवान इतने कठोर दिल कैसे हो सकते हैं? पिताजी आप चिंता मत
कीजिए। मैं भी काम में आपका हाथ बटाऊंगी।
हम कुछ ना कुछ करके सेठ मंगलदास का कर्ज लौटा ही देंगे।
रिया दूसरों के घर में काम करने और खाना बनाने का काम करने लगती है। इसी तरह से
कुछ दिन बीत जाते हैं। एक दिन रिया पानी लेने सेठ मंगलदास के कुएं पर जाती है और
उसी दिन सेठ मंगलदास के दोस्त का बेटा अरुण सेठ मंगलदास के घर आता है। तभी उसकी
नजर रिया पर पड़ती है। वह रिया को देखकर उसे पसंद करने लगता है। फिर वह अंदर चला
जाता है। नमस्ते काका जी। क्या आपने मुझे पहचाना? मैं आपके दोस्त रघुनाथ का बेटा हूं। मेरा नाम
अरुण है। अरे बेटा अरुण तुम कितने बड़े हो गए हो? बोलो बेटा कैसे आना हुआ? वो क्या है ना काका जी? दरअसल पिताजी ने एक जमीन
का सौदा करने के लिए मुझे यहां भेजा है। बस वही जमीन देखने के लिए मैं आया हूं।
अच्छा तो तुमने अब अपने पिताजी का कारोबार भी संभालना शुरू कर लिया है। हां काका
जी। थोड़ा बहुत मैं भी देख लेता हूं। अब पिताजी की उम्र के कारण उनसे ज्यादा काम
नहीं हो पाता है। इसलिए अब मुझे ही करना पड़ता है। यह तो बहुत अच्छी बात है बेटा।
आपसे एक बात पूछनी थी काका जी।
दरअसल मैं जब आ रहा
था तब कुएं के पास मैंने एक लड़की को देखा। क्या आप बता सकते हैं कि वह लड़की कौन
है? लड़की कौन सी
लड़की? वो आपके घर के
सामने जो कुआं है, उस कुएं पर मैंने
एक लड़की को पानी भरते देखा। क्या आप बता सकते हैं वो कौन है? रुको अरुण बेटा मैं देख
कर आता हूं। सेठ मंगलदास बाहर जाकर कुएं की ओर देखता है तो कुएं के पास कोई नहीं
था। रिया वहां से जा चुकी थी। अरे अरुण बेटा जिस लड़की के बारे में तुम पूछ रहे हो
वहां पर कोई लड़की नहीं है। अच्छा ठीक है काका जी जाने दीजिए। आप बताइए आप कैसे
हैं? अरुण बात को पलट
देता है। लेकिन सेठ मंगलदास को इस बात पर शक हो जाता है। अरुण बाबू किस लड़की के
बारे में बात कर रहा था? अच्छा काका जी
मैं अब निकलता हूं। मुझे देर हो रही है। नहीं बेटा एक दिन रुक जाओ। जरा गांव की भी
शुद्ध हवा में रहो। शहर तो रोज ही रहते हो। हमें भी थोड़ा मौका दो तुम्हारी
खातिरदारी करने का। नहीं काका जी इस बार नहीं। अगली बार आऊंगा तो जरूर रुकूंगा।
इतना कहकर अरुण वहां से चला जाता है और घर जाकर डरते हुए अपने पिताजी से कहता है, पिताजी मैंने गांव में एक
लड़की देखी है। मुझे वो लड़की बहुत पसंद आई और मैं उसी से शादी करना चाहता हूं।
अरे बेटा तुम किस लड़की की बात कर रहे हो? पिताजी वो आपके गांव के
दोस्त हैं ना जिनके यहां आपने मुझे आज भेजा था। उन्हीं के घर के पास एक लड़की को
देखा और हां वो लड़की बहुत खूबसूरत है। मैं उन्हीं से शादी करूंगा। अरे वाह यह तो
अच्छी बात है बेटा। मैं कल ही उसके पास जाकर उस लड़की के बारे में पूछताछ करूंगा।
दूसरे दिन अरुण के पिता सेठ मंगलदास के यहां आते हैं। अरे मेरे दोस्त रघुनाथ बहुत
दिनों के बाद आज मिल रहा है। तू तो बहुत बड़ा आदमी हो गया है यार। याद है हम दोनों
ने साथ में ही कारोबार शुरू किया था। आज तू कहां से कहां पहुंच गया? अरे यार अरुण की वजह से
हमें अभी आना ही पड़ा। दरअसल अरुण को तुम्हारी गांव की बेटी बहुत पसंद आ गई है। और
वह उसी से ही शादी करना चाहता है। उसी की बात करने के लिए हम यहां आए हैं। हां हां
रघुनाथ यह तो बहुत अच्छी बात है। अरे काका जी उस लड़की का कुछ पता चला कि नहीं? अरे अरुण बेटा मैं उस
लड़की को जल्द से जल्द ढूंढ कर बता दूंगा। काका जल्दी से उस लड़की को ढूंढो। ठीक
है अरुण बेटा अगर ऐसी बात है तो मैं खुद उस लड़की को तुम्हारे लिए ढूंढ कर लाऊंगा।
आप चिंता मत कीजिए। फिर रघुनाथ और अरुण अपने घर चले जाते
हैं। अरे अरुण तुम जिस लड़की की बात कर रहे हो उसका कोई अता-पता भी नहीं है। कहां
ढूंढोगे तुम उसे? पिताजी मैं कुछ
भी करके उसे ढूंढ लूंगा। बस मुझे थोड़ा सा समय दे दीजिए। ठीक है। अगर तुम्हारी यही
मर्जी है तो मैं तुम्हें एक हफ्ते का समय देता हूं। अगर एक हफ्ते में तुमने उस
लड़की को ढूंढ लिया तो ठीक है। वरना तुम्हें उसे भूलना होगा। और कुछ दिन बीतने के
बाद सेठ मंगलदास रवि के घर जाता है। रवि तुम मेरे अच्छा होने का फायदा उठा रहे हो।
मैं इतने दिनों से चुप इसलिए बैठा हूं क्योंकि तुम्हारा बेटा अभी-अभी गुजरा है और
उसके गुजरने की वजह से मैं खुद तुम्हारे यहां नहीं आया। पर मैं तुम्हारी राह देख
रहा था। पर तुम तो मेरी अच्छाई का फायदा उठा रहे हो। अब मैं कुछ नहीं सुनने वाला।
अब तो मेरा सारा पैसा लौटा दो। और वैसे भी मैंने तुम्हें बहुत ज्यादा मोहलत दे दी
है। सेठ जी मैं इतने सारे पैसे अभी कहां से लौटा पाऊंगा? आपको तो पता है अब मेरा
बेटा भी नहीं। मैं कुछ नहीं जानता। मुझे बस मेरे पैसे चाहिए। अगर पैसे नहीं है
तुम्हारे पास तो अभी के अभी मुझे यह घर खाली करके दे दो। मैं इसे बेचकर मेरा कर्ज
वसूल कर लूंगा।
बस अब बहुत हो चुका। नहीं सेठ जी ऐसा मत कीजिए। ऐसे तो मैं
रोड पर आ जाऊंगा। मैं इतने दिनों से तुम पर तरस खाकर तुम्हें कुछ नहीं कह रहा हूं।
इसका मतलब यह नहीं है कि तुम मेरे सिर पर बैठ जाओ। अब मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।
बस तुम यह घर खाली कर दो और यहां से चले जाओ। नहीं तो मैं मेरे लोगों को कहकर
तुम्हें घर से बाहर निकलवा दूंगा। चलिए पिताजी अब हम खुद को झूठी तसल्ली नहीं दे
सकते। हम यूं लकड़ियां बेचकर और दूसरों के घरों में काम करके जमींदार के पैसे नहीं
लौटा पाएंगे। हमें यह घर छोड़कर जाना ही होगा। इतना कहकर रिया अपने पिताजी को लेकर
घर से बाहर चली जाती है और दूर जंगल में जाकर एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर उसमें रहने
लगती है और इसी के चलते रिया के पिता की तबीयत खराब हो जाती है। इसी वजह से अपने
पिताजी का लकड़ी बेचने का काम रिया संभाल लेती है और किसी तरह से घर चलाने लगती
है।
मैं तो कितना
बदकिस्मत हूं जो तुझे मेरे जैसा पिता मिला और मेरी वजह से तुझे कितनी मुश्किलों का
सामना करना पड़ रहा है। पिताजी आप ऐसा मत बोलिए। आपकी सेवा करने के लिए मुझे कोई
मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ रहा है। आपकी सेवा करना मेरा धर्म है। आपकी सेवा
करने में कैसी मुश्किल? पिताजी मैंने
खाना बनाकर रख दिया है। आप खाना खा लेना। मैं लकड़ी तोड़ने जा रही हूं। जल्दी लौट
आऊंगी। इतना कहकर रिया जंगल में लकड़ी काटने चली जाती है। देखते ही देखते सुबह से
शाम हो जाती है। पर रिया जंगल से नहीं लौटी। इसी वजह से रवि बहुत परेशान हो जाता
है। रिया को अभी तक आ जाना चाहिए था। पर वह अभी तक नहीं आई। कहीं वह किसी मुसीबत
में तो नहीं फंस गई। मुझे अपनी बच्ची को जाकर ढूंढना चाहिए। मैं घर पर ऐसे हाथ पर
हाथ धरे नहीं बैठ सकता। इतना कहकर रवि रिया को ढूंढने के लिए जंगल की ओर निकल
पड़ता है। लेकिन रास्ते में रवि की तबीयत बहुत खराब हो जाती है और वह चक्कर खाकर
नीचे गिर जाता है। तभी रिया घर पहुंच जाती है और अरुण रिया को ढूंढते-ढूंढते वहां
पहुंचता है। वह देखता है कि एक बूढ़ा आदमी जमीन पर बेसुद पड़ा है। वह रवि के पास
जाता है और बोलता है बाबा आप ठीक तो हो ना? इतना कहकर वह रवि को उठाता है और किसी तरह उठाकर एक पेड़ के
नीचे बिठा देता है और बोलता है अरे बाबा आप इस जंगल में क्या कर रहे हैं? आपकी तबीयत भी बहुत खराब
लग रही है।
अरे बेटा क्या बताऊं? मैं अपनी बेटी रिया को ढूंढने के लिए जंगल में आया था। वह
लकड़ियां तोड़ने गई थी। पर अब तक घर नहीं लौटी। पता नहीं कैसे मुझे चक्कर आ गया।
कोई बात नहीं बाबा। बस आप मुझे आपके घर का पता बताइए। मैं आपको आपके घर छोड़ देता
हूं। तभी अरुण रवि को लेकर उनके घर जाता है। जैसे ही अरुण की नजर रिया पर पड़ती है, वह हैरान हो जाता है और
बहुत खुश भी हो जाता है। पिताजी आप ठीक तो हो ना? बेटा, मैं तो ठीक हूं। तुम्हें ढूंढने बाहर गया था। पता नहीं कैसे
मुझे चक्कर आ गए थे और मैं बीच रास्ते पर गिर गया था। तभी इन्होंने मेरी मदद की और
मुझे घर तक लेकर आए। अगर यह वहां नहीं होते तो पता नहीं मेरा क्या होता। आपका
बहुत-बहुत शुक्रिया। आपने मेरे पिताजी की मदद की। मैं हमेशा आपकी शुक्रगुजार
रहूंगी। बाबा आप गांव के बाहर ऐसे जंगल में इस छोटी सी झोपड़ी में क्यों रह रहे
हैं? तब रवि अपनी सारी
बात बताता है।
सेठ मंगलदास की सारी करतूतें भी और अपने बेटे के बारे में
भी बताता है कि एक कंपनी में आग लगने की वजह से अपना बेटा खो दिया और यह सुनकर
अरुण बोलता है बाबा वह कंपनी हमारी थी। मैं ही उस कंपनी का मालिक हूं। दरअसल
तकनीकी खराबी की वजह से वह आग लगी थी। उसमें काफी लोग मारे भी गए थे। लेकिन मैंने
मुआवजे के तौर पर सभी परिवारों को पैसे भिजवाए थे। पर बेटा यहां तो कोई भी नहीं
आया। हमें कोई पैसा भी नहीं मिला। अगर मिल जाते तो तुम ही सोचो हम यहां जंगल में
ही क्यों होते? यह सुनकर अरुण को
धक्का सा लग जाता है और अरुण बोलता है बाबा आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए। मुझे एक
दिन का वक्त दीजिए। मैं इस बात का पता लगाकर आपको आपके पैसे दिलवा कर रहूंगा।
दूसरे दिन अरुण अपने आदमी को लेकर रवि के घर आता है और पूछता है। पर वह आदमी साफ
इंकार कर देता है और बोलता है नहीं साहब मैंने वह पैसे इनको नहीं दिए। मैंने वह
पैसे रवि नाम के एक आदमी को दिए हैं। उसने ही कहा था कि उसका नाम रवि है और वह
सुमित का पिता है और मैंने वह पैसे उनको दे दिया और मैं फिर वहां से चला आया। मुझे
नहीं पता था कि वह मुझसे झूठ बोल रहा है। मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती
हो गई।
क्या तुम मुझे बता
सकते हो कि वह आदमी कौन है जिसको तुमने पैसे दिए? हां साहब, मैं अगर उसे देख लूं तो मैं उसको पहचान जाऊंगा। मैं तुम्हें
एक घंटे का वक्त देता हूं। मुझे जल्द से जल्द वो आदमी चाहिए। पूरे गांव में पता
करो जिसको तुमने वह पैसे दिए हैं। और कुछ दिन बीतने के बाद मालिक मैंने पता कर
लिया। उस आदमी का नाम रवि नहीं सेठ मंगलदास है और वह इस गांव का जमींदार है। उसी
ने मुझसे झूठ कहा था कि वह रवि है। इतना बड़ा धोखा मैं सोच भी नहीं सकता कि
मंगलदास इतना गिर सकता है। उसने मेरे बेटे के सारे पैसे खुद रख लिए और ऊपर से हमें
घर से भी निकाल दिया। बाबा आप फिक्र मत करिए मैं सब ठीक कर दूंगा। फिर अरुण अपने
आदमी को लेकर सेठ मंगलदास के घर जाता है। जैसे ही सेठ मंगलदास उस आदमी को देखता है, वह हक्का बक्का रह जाता
है। तभी वह आदमी बोलता है,
हां साहब, यही है जिसने मुझे कहा था
कि वह रवि है। मैंने इसी को पैसे दिए। यह सुनकर सेठ मंगलदास के पसीने छूट जाते
हैं। वह अरुण के सामने बहुत शर्मिंदा हो जाता है। काका जी यह सब आपने किया है।
मुझे तो यकीन नहीं होता। आपने एक गरीब आदमी के हक का पैसा उससे छीन लिया। आपको पता
है सुमित के पिताजी को कितनी तकलीफ झेलनी पड़ रही है।
और इतना ही नहीं आपने उनसे पैसे लेकर भी उन्हें इस गांव से बाहर निकाल दिया। आपने तो इससे सारे पैसे ले लिए थे। फिर आपने ऐसा क्यों किया? जवाब दीजिए। अरुण बेटा मुझे माफ कर दो। मुझसे गलती हो गई। मैं पैसों के लालच में आ गया था इसलिए मैंने ऐसा किया। जब तुमने लड़की के बारे में बताया तभी मैं पहचान गया था कि वह लड़की कोई और नहीं रिया ही थी। इसलिए मैंने यह चाल चली और रिया और उसके पिताजी को इस गांव से निकलवा दिया ताकि तुम्हें वह लड़की ना मिले। मुझे माफ कर दो बेटा। मैं बहक गया था। तभी रघुनाथ भी वहां पर आ जाता है। उसे भी यह सारी घटना पता चल जाती है और वह भी मंगल दास को बहुत खरीखोटी सुनाता है। फिर अरुण और उसके पिताजी रिया के घर जाते हैं और सारे पैसे उसके पिताजी को देते हैं और उसके पिताजी से रिया का हाथ भी मांगते हैं। अरुण को उसका प्यार मिल जाता है और वे खुशी-खुशी रहने लगते हैं।
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